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Monday, August 10, 2026

लोकतंत्र में प्रदर्शन, विरोध और सरकार की ज़िम्मेदारी !

लोकतंत्र में प्रदर्शन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को सत्ता तक पहुँचाने का संवैधानिक अधिकार है। भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(ए) और (बी) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है। जब व्यवस्था में असंतोष बढ़ता है, नौकरियाँ नहीं मिलतीं, परीक्षाओं में गड़बड़ी होती है या भ्रष्टाचार पनपता है, तो युवा सड़कों पर उतरते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन में असामाजिक तत्व घुसपैठ कर लेते हैं और हिंसा भड़काते हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह असली प्रदर्शनकारियों की रक्षा करे और तोड़फोड़ करने वालों को अलग करे। लेकिन अक्सर प्रशासन या तो अत्यधिक बल का इस्तेमाल करता है या फिर पूरी तरह लापरवाह रहता है। परिणामस्वरूप, शांतिपूर्ण आवाज़ दब जाती है और असामाजिक तत्व हावी हो जाते हैं।



2026 में भारत में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में जेन-ज़ी प्रदर्शन ने इस पूरे समीकरण को नया रूप दिया। यह आंदोलन सोशल मीडिया की एक व्यंग्यात्मक पोस्ट से शुरू हुआ। जब भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहा, तो अभिजीत दिपके नाम के युवक ने ‘अगर सारे कॉकरोच इकट्ठा हो जाएँ’ जैसी पोस्ट डाली, जिससे हजारों युवा जुड़ गए। जल्द ही यह आंदोलन नीट परीक्षा लीक और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं के खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन बन गया। दिल्ली के जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना, संसद की ओर मार्च, मीम्स, रील और इंस्टाग्राम की भाषा ने पारंपरिक विरोध को चुनौती दी। पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, सैकड़ों घायल हुए, लेकिन युवा शांति बनाए रखने पर अड़े रहे। अंत में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी सरकार के 12 वर्षों में दूसरी बार सार्वजनिक दबाव से किसी कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा था।



गौरतलब है कि इस नई प्रवृत्ति के चलते अब प्रदर्शन सिर्फ झंडे और नारे नहीं, बल्कि डिजिटल संगठित प्रतिरोध हैं। जेन-ज़ी ने व्हाट्सऐप के बजाय इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स और वायरल वीडियो का इस्तेमाल किया। वे पारंपरिक राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखते हुए भी बड़े पैमाने पर जुट सके। यह आंदोलन बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और भविष्य की अनिश्चितता का प्रतीक बन गया। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों में जेन-ज़ी आंदोलनों ने सरकारें गिराईं, लेकिन भारत में यह अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। फिर भी, पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें वायरल होकर आंदोलन को और ताकत दे गईं। यह साबित करता है कि आज की युवा पीढ़ी अब चुपचाप नहीं बैठेगी।



प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को सुरक्षित रखना है। ऐसे में जब असामाजिक तत्व प्रदर्शन में घुसते हैं तो वो पत्थरबाजी करते हैं, वाहन जलाते हैं या दुकानों को लूटते हैं। जिससे पूरा आंदोलन बदनाम हो जाता है। प्रशासन अक्सर असली प्रदर्शनकारियों और तोड़फोड़ करने वालों में फर्क नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि लाठीचार्ज सब पर होता है, निर्दोष युवा घायल होते हैं और मीडिया में हिंसा का प्रचार हो जाता है। ऐसे में प्रशासन को पहले से खुफिया जानकारी जुटाकर असामाजिक तत्वों को अलग करना चाहिए था। पुलिस को यह समझना होगा कि बल का अत्यधिक इस्तेमाल सिर्फ नाराजगी बढ़ाता है।



सवाल है कि सरकार को प्रदर्शनों से कैसे निपटना चाहिए? सबसे पहले, संवाद। सरकार को प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत करनी चाहिए। उनकी माँगें सुननी चाहिए और जहाँ संभव हो, समाधान निकालना चाहिए। दूसरा, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति और सुरक्षा सुनिश्चित करना। जंतर मंतर जैसे स्थानों को प्रदर्शन स्थल के रूप में संरक्षित रखना। तीसरा, असामाजिक तत्वों की तुरंत पहचान कर अलग कार्रवाई हो। सीसीटीवी, ड्रोन और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल कर हिंसा फैलाने वालों को पकड़ना, लेकिन निर्दोषों को परेशान न करना। चौथा, सोशल मीडिया पर सकारात्मक संवाद। युवाओं की भाषा में जवाब देना। पाँचवाँ, दीर्घकालिक सुधार। जिस भी समस्या को लेकर प्रदर्शन किया जाता है उसकी व्यवस्था में पारदर्शिता लाना। अगर सरकार सिर्फ दमन करती है तो असंतोष और गहरा होता है। अगर वह सुनती है तो लोकतंत्र मजबूत होता है।


भारत का इतिहास प्रदर्शनों से भरा पड़ा है, जिन प्रदर्शनों से बड़े बदलाव आए हैं। 1974-75 का जेपी आंदोलन भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ था। जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ के नारे ने इंदिरा गांधी सरकार को चुनौती दी। आपातकाल लगा, लेकिन 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था। जंतर मंतर पर अनशन ने लोकपाल कानून बनवाया और आम आदमी पार्टी जैसी नई राजनीति को जन्म दिया। 2012 का निर्भया आंदोलन महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कानून बदलने का कारण बना। आपराधिक कानून में बड़े संशोधन हुए। 2020-21 का किसान आंदोलन तीन कृषि कानूनों को रद्द कराने में सफल रहा। ये आंदोलन साबित करते हैं कि जब जनता एकजुट होती है तो सत्ता को झुकना पड़ता है।


विश्व भर में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। 1789 में फ्रांसीसी क्रांति में बैस्टिल का गिरना आधुनिक लोकतंत्र की नींव बना। 1963 में अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग का ‘आई हैव अ ड्रीम’ भाषण नागरिक अधिकार आंदोलन का प्रतीक बना। 1989 में बर्लिन दीवार गिरने वाले प्रदर्शनों ने पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का अंत किया। दक्षिण कोरिया में 2016-17 का कैंडललाइट आंदोलन राष्ट्रपति को हटाने में सफल रहा। अर्मेनिया में 2018 की वेलवेट क्रांति ने भ्रष्ट शासन को उखाड़ फेंका। ये उदाहरण बताते हैं कि शांतिपूर्ण और संगठित प्रदर्शन लोकतंत्र की रक्षा करते हैं, जबकि हिंसा उसे कमजोर करती है।

आज की चुनौती यह है कि असामाजिक तत्व और राजनीतिक स्वार्थ प्रदर्शनों को अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल न करें। सरकार को भी यह समझना होगा कि युवाओं की आवाज़ को दबाना नहीं, बल्कि सुनना है। सीजेपी आंदोलन ने साबित कर दिया कि जेन-ज़ी अब सिर्फ रील्स नहीं बनाता, वह प्रतिरोध भी करता है। लोकतंत्र में प्रदर्शन अपरिहार्य हैं। प्रशासन की सफलता इस बात में है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की रक्षा करे और असामाजिक तत्वों को अलग करे। अगर सरकार संवाद, पारदर्शिता और सुधार का रास्ता अपनाती है तो प्रदर्शन सहयोग का माध्यम बन सकते हैं। अन्यथा, असंतोष की आग और भड़केगी। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देनी होगी, न कि उसे कुचलना। यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है। 

विदेशी फंडिंग के नियमन में एक अहम मोड़!

संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 एक बार फिर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यह संशोधन विधेयक एफसीआरए 2010 में बड़े बदलाव ला सकता है। सरकार इसे विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और नागरिक समाज संगठन इसे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), ट्रस्ट और धार्मिक संस्थाओं पर राज्य के नियंत्रण का विस्तार मान रहे हैं। देखना यह है कि इसके प्रावधानों, पक्ष-विपक्ष, सरकारी तर्क, विपक्षी आलोचना और विशेषज्ञों राय के अनुसार, इस विधेयक में ऐसा क्या है?


एफसीआरए विदेशी दान को विनियमित करने वाला कानून है। इसके तहत एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण कराना पड़ता है, जो पांच साल के लिए वैध होता है और नवीनीकरण की जरूरत होती है। आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 तक करीब 14,449 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण थे, जबकि 22,498 रद्द हो चुके थे और 15,212 समाप्त माने गए। 2019-2022 के बीच पंजीकृत संगठनों को लगभग 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। कई रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन का स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं था। नया विधेयक इसी खामी को भरने का दावा करता है।


विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान एक ‘नामित प्राधिकरण’ (डेज़ीग्नेटेड अथॉरिटी) का निर्माण है। इसके अनुसार जब किसी संगठन का एफसीआरए प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियां अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण में निहित हो जाएंगी। यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो वे स्थायी रूप से निहित हो सकती हैं और सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल या बिक्री भी हो सकती है। बिक्री की राशि भारत की समेकित निधि में जाएगी। इसके साथ ही धार्मिक चरित्र वाली संपत्तियों के संरक्षण का प्रावधान भी है। प्राधिकरण पूजा स्थलों को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। प्रभावित संगठन 90 दिनों में पुनरीक्षण और जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील कर सकते हैं। इसके अलावा, नवीनीकरण के लिए पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी योगदान के उपयोग की शर्त लगाई गई है। कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम कारावास पांच साल से घटाकर एक साल किया गया है और जांच शुरू करने से पहले केंद्र की पूर्व अनुमति जरूरी होगी।


सरकार का तर्क है कि यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए आवश्यक है। सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो, वो विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना चाहेगी। सरकार का कहना है कि रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद हजारों करोड़ की संपत्तियां अधर में लटकी रह जाती थीं; राज्य सरकारें उन्हें न तो कब्जे में ले सकती थीं और न प्रबंधित कर सकती थीं। नया ढांचा इन संपत्तियों की सुरक्षा, प्रबंधन और उचित उपयोग सुनिश्चित करेगा। न्यूनतम उपयोग सीमा निष्क्रिय संगठनों को लाइसेंस धारण करने से रोकेगी। दंड का युक्तिकरण और जांच में केंद्र की अनुमति मनमाने कार्रवाई को सीमित करेगी। सरकार का तर्क है कि यह सिविल सोसायटी को कमजोर नहीं करता, बल्कि विदेशी योगदान को वैध प्रयोजनों तक सीमित रखता है और शासन को मजबूत बनाता है।


वहीं विपक्ष इसे ‘दमनकारी’ और सिविल सोसायटी पर हमला मानता है। उनका तर्क है कि नामित प्राधिकरण को व्यापक शक्तियां मिलने से सरकार एनजीओ की संपत्तियों पर कब्जा कर सकती है। पंजीकरण का स्वतः समापन प्रक्रियात्मक देरी से भी हो सकता है। नवीनीकरण आवेदन लंबित रहने या समय पर न लगाने पर संगठन पंगु हो जाएंगे। यह विशेष रूप से छोटे संगठनों, धार्मिक संस्थाओं (खासकर ईसाई चर्चों और अल्पसंख्यक समूहों से जुड़े ट्रस्ट) और आलोचनात्मक आवाजों को निशाना बना सकता है। अमेरिका के कुछ सांसदों ने भी इसे ईसाइयों के खिलाफ हमला बताया है और भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ने की चेतावनी दी है। विपक्ष का कहना है कि 2020 के संशोधनों के बाद पहले ही हजारों लाइसेंस रद्द हो चुके हैं; नया विधेयक कार्यपालिका की शक्ति को और बढ़ाता है, न्यायिक समीक्षा को कमजोर करता है और लोकतांत्रिक स्थान को संकुचित करता है। केरल जैसे राज्यों में विदेशी फंड पर निर्भर स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं।


इस विधेयक के फायदे देखे जाएँ तो इसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और संपत्ति प्रबंधन की स्पष्टता है। विदेशी फंड का दुरुपयोग (यदि कोई हो) रोका जा सकता है। निष्क्रिय संगठनों को फिल्टर करने से सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण काम करने वाले संगठनों को प्राथमिकता मिलेगी। इसके साथ ही दंड में नरमी और अपील का प्रावधान कुछ सुरक्षा देता है। यदि इस विधेयक के नुकसान की बात करें तो सरकार का अत्यधिक नियंत्रण, छोटी और स्थानीय संस्थाओं पर अनुपालन का बोझ, प्रक्रियात्मक जोखिम और संभावित चयनात्मक कार्रवाई शामिल हैं। उद्देश्य और भूगोल-विशिष्ट पंजीकरण लचीलापन कम कर सकता है। धार्मिक गतिविधियों पर स्पष्ट प्रतिबंध (धर्मांतरण) विवाद बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे मौजूदा खामियों को भरने वाला व्यावहारिक कदम मानता है, जबकि दूसरे वर्ग का कहना है कि यह एफसीआरए को विनियमन से आगे ले जाकर सिविल सोसायटी पर व्यापक राज्य नियंत्रण का औजार बना रहा है। कुछ कानूनी विश्लेषक कहते हैं कि संपत्तियों का निहित होना और स्थायी वेस्टिंग संवैधानिक सवाल उठा सकते हैं, खासकर बिना पर्याप्त न्यायिक निगरानी के।


कुल मिलाकर देखा जाए तो एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 विदेशी फंडिंग के नियमन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। सरकार की मंशा राष्ट्रीय हित और पारदर्शिता की है, लेकिन प्रावधानों में कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार विपक्ष और नागरिक समाज की चिंताओं को जायज ठहराता है। सच्चा लोकतंत्र पारदर्शिता और स्वतंत्र सिविल सोसायटी दोनों की मांग करता है। ऐसे में विधेयक पर विस्तृत संसदीय चर्चा, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और छोटे संगठनों के लिए राहत के बिना इसे पारित करना अनुचित होगा। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि अपील प्रक्रिया को मजबूत किया जाए, स्वतः समापन के प्रावधानों में सुरक्षा जोड़ी जाए और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों के लिए स्पष्ट, निष्पक्ष दिशानिर्देश हों। अंततः कानून का उद्देश्य विदेशी योगदान को नियंत्रित करना होना चाहिए, न कि वैध सामाजिक कार्यों को बाधित करना। संसद को इस संतुलन को साधना चाहिए, ताकि पारदर्शिता के नाम पर स्वतंत्रता का गला न घोंटा जाए। 

Monday, July 27, 2026

सरकार की व्यवस्था कैसे सुधरे?

पिछले कुछ सालों से मीडिया दो खेमों में बटा हुआ है। एक तरफ़ है निजी टीवी चैनल और दूसरी तरफ़ है सोशल मीडिया। निजी टीवी चैनलों के मालिकों को सरकार विज्ञापन के नाम पर बहुत मोटी रकम देती है। इसलिए इन चैनलों के उन एंकरों को भी बहुत मोटी रकम मिलती है जो रात-दिन सरकार का इकतरफ़ा गुणगान करते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछली सरकारों में जब निजी चैनल और सोशल मीडिया दोनों ही नदारद थे तब भी ये बँटवारा इस तरह था कि सरकारी नियंत्रण वाला दूरदर्शन और सरकार से विज्ञापनों के नाम पर मोटा पैसा लेने वाले अख़बार, तत्कालीन सरकार का भौपूँ हुआ करते थे। जबकि दूसरे अख़बार विपक्षी दलों से समर्थन लेकर सरकार की आलोचना किया करते थे। हालांकि उस दौर में ये फ़र्क़ इतना प्रखर नहीं था कि आम आदमी उसकी गहराई समझ सके। पर आज जो देश में हो रहा है उसमें दोनों ही पक्ष इकतरफ़ा अभियान चलाते हैं। जिससे हकीकत पता नहीं चल पाती। उदाहरण के तौर पर, सोशल मीडिया में आए दिन वीडियो आते हैं कि भाजपा सरकारों के बनाए पुल ताश के पत्तों की तरह ढहते रहते हैं और भाजपा सरकारों के बनाए राजमार्गों पर जगह-जगह भारी गड्डे हो गए हैं। ऐसा ही एक वीडियो समाचार आया कि नवनिर्मित दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, बनते ही जगह-जगह टूट गया है। पिछले हफ़्ते जब मैं इस राजमार्ग पर पहली बार गया तो लगातार कार की खिड़की से बाहर देख रहा था कि वो गड्डे कहाँ हैं? पर मुझे ऐसा कोई गड्ढा नज़र नहीं आया। बल्कि ये राजमार्ग इतना बढ़िया बना है कि हम मात्र डेढ़ घंटे में दिल्ली से मुज़फ़्फ़रनगर पहुँच गए। 



सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार होना कोई नई बात नहीं है। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोग़ा’ 150 साल पहले भारत में चल रहे भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है। 2500 साल पहले राजनीति के महारथी चाणक्य पंडित ने कहा था, ‘शहद के गोदाम की रखवाली करने वाले के होठों पर शहद लगा मिलेगा’। आज़ादी के बाद से केंद्र और राज्यों की सभी सरकारों ने देश के संसाधनों को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्या वजह है कि नेता किसी भी दल का क्यों न हो, अगर वो पार्षद से लेकर मंत्री तक कभी भी किसी भी पद पर रहा होगा तो उसकी आर्थिक हैसियत उस दौर में कई गुना बढ़ी होगी। ये कोई छिपी बात नहीं है। अपवाद तो हमेशा और हर जगह होते हैं। पर आम धारणा तो यही है कि राजनीति कोयले की दलाली की तरह एक ऐसा पेशा है जिसमें हाथ काले होते ही हैं। इसलिए मौजूदा दौर में संघ और भाजपा पर जो तीव्र हमला हो रहा है वो क्या उन राजनेताओं द्वारा किया जा रहा है जिनका अपना दामन पाक साफ़ है? अगर नहीं तो फिर ग़ुलाम अली की ग़ज़ल की वो लाइन दोहराना अनुचित न होगा, हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है….



प्रधान मंत्री मोदी ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से लेकर, ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना’, ‘प्रधान मंत्री आवास योजना’, ‘आयुष्मान भारत’, ‘जल जीवन मिशन’, ‘स्किल इंडिया मिशन’, ‘नमामि गंगे’, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’, ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘अटल पेंशन योजना’, ‘प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना’, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’, ‘उजाला योजना’, ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’, ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ जैसी तमाम योजनाएं और अभियान चलाए। विपक्ष कहता है कि ये सब फ्लॉप हो गए, कहीं कुछ नहीं हुआ। जबकि इसका दूसरा पक्ष भी सामने आता है। हमारे घर और दफ्तर के स्टाफ़ में जो कर्मचारी हैं वे मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से हैं। उनका कहना है कि उन्हें घर बनाने के लिए सरकार से ख़ासा अनुदान मिला, आज़ादी के बाद उनके गाँव में पहली बार सड़क आई और पेयजल का संकट भी दूर हुआ। ये वो साधारण लोग हैं जिन्हें अकारण झूठ बोलने की कोई आवश्यकता नहीं। उन्हें लाभ मिला है इसलिए वे उसे बताने में संकोच नहीं करते। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि हर अभियान पूरी तरह से असफल हुआ है। कहीं सफलता और कहीं विफलता का होना असामान्य बात नहीं है।   



मुझे लगता है कि चाहे कोई भी दल सत्ता में हो जब तक उसका शासन और प्रशासन आम जनता के प्रति जवाबदेह न हो तब तक वो कितना भी ढोल पीटता रहे, जनता उसके दावों पर विश्वास नहीं करती। आम जनता को बड़े स्तर के बड़े घोटालों से इतना सरोकार नहीं होता जितना उनकी रोज़ की ज़िंदगी में पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार से होता है। इस स्तर का भ्रष्टाचार, हुक्मरानों का अहंकार और आम मतदाता की उपेक्षा का ख़ामियाज़ा सीधा मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री को भुगतना पड़ता है। ज़रूरत इस बात की है कि कोई ऐसी व्यवस्था बने जिसके अंतर्गत आम जनता की छोटी सी छोटी शिकायत पर तुरंत कारवाही हो और उसे राहत मिले। इस दिशा में तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय ने जो पहल की हैं उसका बहुत अच्छा संदेश आम जनता के बीच गया है। आगे चल कर वो कितने सफल होंगे ये तो समय ही बताएगा। पर तमिलनाडु तो एक राज्य है, आवश्यकता हर राज्य में ऐसे ही सुधार की है। डबल इंजन का दावा करने वाली प्रांतीय सरकारों में यह काम केंद्र सरकार की पहल पर अविलंब शुरू होना चाहिए। साथ ही महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां यदि भ्रष्टाचार में बदनाम हुए अफसरों और राजनेताओं की होती है तो उससे सरकार की छवि बहुत ख़राब होती है। भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के उसके दावे खोखले साबित होते हैं।  

एक बात और; इस देश में ईमानदार अफसरों और प्रतिष्ठित सामाजिक लोगों की संख्या इतनी कम नहीं है कि वे शासन और प्रशासन को जवाबदेह बनने के लिए मजबूर न कर सकें। आज के AI युग में किसी भी व्यक्ति के जीवन के विषय में पता लगाना कठिन कार्य नहीं है। आधुनिक तकीनिकी का इस्तेमाल करके देश के हर ज़िले में ऐसे लोगों की सूची बनाई जानी चाहिए और उन्हें कुछ अधिकार देकर स्थानीय शासन और प्रशासन पर निगरानी रखने के काम सौंपना चाहिए। अगर ऐसा हो सका तो ये जनता और सरकार के बीच की खाई को पाटने का एक महत्वपूर्ण कदम होगा।  

Monday, June 29, 2026

पासपोर्ट पर अनावश्यक विवाद !

24 जून 2026 को पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (ट्रैवल डॉक्युमेंट) है, न कि नागरिकता का निर्णायक प्रमाण। इस बयान ने सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया, विपक्षी दलों ने इसे सत्ता पक्ष की ‘नागरिकता राजनीति’ से जोड़ा। जिससे आम नागरिकों के मन में भ्रम और आशंका पैदा हो गई। लाखों पासपोर्ट धारकों ने पूछना शुरू कर दिया, क्या हमारी नागरिकता पर सवाल उठ सकता है? यह विवाद क्यों और कब उठा और क्या यह विवाद खड़ा करना आवश्यक था? इस विवाद की जड़ों को समझें। अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पासपोर्ट की भूमिका का विश्लेषण करेंगे और देखेंगे कि यह बयान वर्तमान भारतीय परिदृश्य में कितना प्रासंगिक या अप्रासंगिक है। साथ ही, यह कैसे अनावश्यक भ्रम पैदा कर रहा है और सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए।


गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज माना जाता है, जो धारक की राष्ट्रीयता (नेशनलिटी) की पुष्टि करता है। वियना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशंस और अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत, पासपोर्ट जारी करने वाला देश यह गारंटी देता है कि धारक उसके क्षेत्र में लौट सकता है। यह दस्तावेज सीमा पार यात्रा, वीजा प्राप्ति और विदेश में सुरक्षा के लिए आवश्यक होता है।


वहीं कई देशों में पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए, अमेरिका में भी पासपोर्ट नागरिकता का प्राथमिक प्रमाण है, लेकिन यह जन्म, वंशानुगतता या प्राकृतिकरण जैसे आधारों पर निर्भर करता है। भारत में भी पासपोर्ट एक्ट, 1967 के तहत पासपोर्ट यात्रा के लिए जारी किया जाता है। विदेश मंत्रालय का बयान इस कानूनी वास्तविकता को दोहराता है। पासपोर्ट नागरिकता नहीं बनाता, बल्कि सरकार की संतुष्टि पर आधारित होता है कि धारक भारतीय नागरिक है।



अंतरराष्ट्रीय रूप से, पासपोर्ट राष्ट्रीयता का प्रतीक है, लेकिन यदि किसी की नागरिकता पर विवाद हो (जैसे आप्रवासन, आतंकवाद या दोहरी नागरिकता के मामले में), तो कोर्ट या सक्षम प्राधिकरण मूल दस्तावेजों: जन्म प्रमाण-पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, प्राकृतिककरण प्रमाण आदि, की जांच करते हैं। भारत में यह स्थिति नई नहीं है; बॉम्बे हाईकोर्ट (2013) और सुप्रीम कोर्ट ने भी यही रुख अपनाया है कि पासपोर्ट अकेला निर्णायक साक्ष्य नहीं है।


भारतीय नागरिकता संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और नागरिकता अधिनियम, 1955 द्वारा निर्धारित होती है। नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिकरण या क्षेत्र समावेशन से प्राप्त होती है। 1987 और 2004 के संशोधनों ने जन्म-आधारित नागरिकता को माता-पिता की नागरिकता पर निर्भर कर दिया। कोई एकल दस्तावेज (पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी या पैन) नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं है।


वर्तमान विवाद का संदर्भ विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) है, जो 16 राज्यों में मतदाता सूचियों की सफाई के लिए चल रही है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट वोटर सूची से बाहर किए गए व्यक्ति के खिलाफ चुनौती के लिए पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि यह यात्रा दस्तावेज है। यह बयान ‘सीएए-एनआरसी’ बहस, ‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ नीति और सीमा सुरक्षा के संदर्भ में आया है।

 

वास्तव में, यह कानूनी रूप से सही है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अपर्याप्त। करोड़ों भारतीय पासपोर्ट धारक दैनिक जीवन में इसे अपनी भारतीयता का सबसे मजबूत प्रतीक मानते हैं। पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन, दस्तावेज जांच और जैवमितीय डेटा के बाद जारी होने वाला दस्तावेज है। सरकार के कई पोर्टल और फॉर्म्स में अक्सर पासपोर्ट को नागरिकता के सबूत के रूप में स्वीकार किया जाता है। विपरीत रूप से देखा जाए तो आम नागरिकों के पास कोई ‘नागरिकता प्रमाण-पत्र’ नहीं होता; यह मुख्य रूप से प्राकृतिककरण या विशेष मामलों में ही जारी किया जाता है।यह बयान इसलिए अप्रासंगिक लगता है क्योंकि भारत में अधिकांश नागरिक जन्म-आधारित हैं। पासपोर्ट जारी करने से पहले गहन जांच होती है। इसे अचानक केवल ‘यात्रा दस्तावेज’ कहकर सरकार ने जनता को यह महसूस कराया कि उनकी भारतीयता ‘कागजी’ है, जबकि वास्तव में यह संवैधानिक अधिकार है।


देख जाए तो यह विवाद अनावश्यक भ्रम का सबसे बड़ा उदाहरण है। आम आदमी सोच रहा है कि क्या उसका पासपोर्ट रद्द हो सकता है या ‘सीएए-एनआरसी’ जैसे अभियानों में इसे नजरअंदाज किया जाएगा? विपक्षी दल इसे मुस्लिम-विरोधी एजेंडे से जोड़ रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष इसे कानूनी स्पष्टीकरण बता रहा है। वहीं सोशल मीडिया की वायरल पोस्ट्स ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे अप्रवासी भारतीय और युवा पीढ़ी में भी आशंका फैली।सवाल उठता है कि आधार, वोटर आईडी आदि भी निर्णायक नहीं हैं, तो क्या सबकी नागरिकता संदिग्ध है? यह सवाल लाखों लोगों के मन में घूम रहा है। परिणामस्वरूप, विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया है। जो दस्तावेज विदेश यात्रा और पहचान के लिए सबसे मजबूत है, उसे ‘अपर्याप्त’ बताकर सरकार ने खुद को घेर लिया है।


पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, यह कानूनी सत्य है, लेकिन संदर्भ से बाहर कहे जाने पर यह भ्रम का कारण बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह यात्रा दस्तावेज है, जबकि भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह पहचान और गर्व का प्रतीक। वर्तमान विवाद अनावश्यक है क्योंकि यह मौजूदा कानूनी ढांचे को दोहराता है, लेकिन जनभावनाओं को नजरअंदाज करता है। सरकार को अब संवाद और स्पष्टता से इस संकट को दूर करना चाहिए। सरकार नागरिकों को आश्वस्त करें कि उनकी भारतीयता संवैधानिक है, न कि किसी दस्तावेज पर निर्भर। ऐसा करने से एक मजबूत, पारदर्शी नागरिकता ढांचा न केवल भ्रम दूर करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर और मजबूत बनाएगा।

Monday, April 27, 2026

सांसदों का सामूहिक पलायन: लोकतंत्र के लिए चेतावनी !

पिछले सप्ताह आम आदमी पार्टी के सात राजसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भाजपा में स्वतः विलय कर लिया। पार्टी की कुल 10 राजसभा सीटों में से दो-तिहाई से अधिक सांसदों का यह कदम संवैधानिक प्रावधान के तहत लिया गया, जिससे उन्हें अयोग्यता से बचने का रास्ता मिल गया। इनमें से छह पंजाब से चुने गए थे, जबकि एक  दिल्ली से। यह घटना न केवल आम आदमी पार्टी के लिए करारा झटका है, बल्कि पंजाब की सत्तासीन पार्टी के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रही है।


राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि आम आदमी पार्टी अब अपनी मूल विचारधारा से भटक गई है। लेकिन विपक्षी दलों और आम आदमी पार्टी ने इसे भाजपा का ‘ऑपरेशन लोटस’ करार दिया। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘पंजाब के साथ धोखा’ बताया। सवाल यह है कि क्या यह महज व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम है या पंजाब की राजनीति में बड़े बदलाव की शुरुआत?



पंजाब में आम आदमी पार्टी 2022 के विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से सत्ता में आई थी। भगवंत मान सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और रोजगार जैसे क्षेत्रों में कुछ उपलब्धियां गिनाती रही है। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक एक साल पहले यह सामूहिक पलायन पार्टी की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। इन सात सांसदों में चार प्रमुख पंजाबी चेहरे, हरभजन सिंह (क्रिकेटर), अशोक मित्तल (एलपीयू चांसलर), विक्रम साहनी और संदीप पाठक, का जाना न केवल संसदीय ताकत कम करता है बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी कमजोर करता है।



पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वॉरिंग ने पहले ही चेतावनी दी है कि केजरीवाल की पार्टी के 50 विधायकों तक का पलायन हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो पंजाब में सरकार अल्पमत में आ सकती है। भाजपा, जो पंजाब में अभी कमजोर है, को यह घटना बड़ा नैतिक और संगठनात्मक बल प्रदान करेगी। पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्वनी कुमार के अनुसार, यह भाजपा को अकाली दल के साथ गठबंधन की मेज पर मजबूत स्थिति देगा। पंजाब की राजनीति में ‘ऑपरेशन लोटस’ की सफलता से भाजपा की छवि मजबूत होगी और मतदाताओं में यह धारणा बनेगी कि केजरीवाल की पार्टी का ‘अंत’ शुरू हो चुका है।


दूसरी ओर, यह घटना पंजाब के किसान-मजदूर वोट बैंक को भी प्रभावित करेगी। उल्लेखनीय है कि आंदोलन से जन्मीं आम आदमी पार्टी की छवि को भ्रष्टाचार-मुक्त और आम आदमी की पार्टी के रूप में बनाया गया था। अब जब उसके प्रमुख चेहरे भाजपा में शामिल हो रहे हैं, तो जनता में निराशा फैल सकती है। पंजाब की राजनीति पहले से ही कांग्रेस, अकाली दल और आप पार्टी के त्रिकोणीय संघर्ष में फंसी है। इस पलायन से कांग्रेस को भी फायदा हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर विपक्षी एकता टूटने का खतरा बढ़ गया है।


इस घटना ने अन्य विपक्षी दलों, कांग्रेस, टीएमसी, सपा, बसपा आदि को स्पष्ट संदेश दिया है कि भाजपा केंद्र की एजेंसियों का इस्तेमाल कर विपक्ष को तोड़ने की रणनीति पर अडिग है। ‘ऑपरेशन लोटस’ अब सिर्फ कर्नाटक, महाराष्ट्र या हरियाणा तक सीमित नहीं रहा; यह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की जड़ों को हिला रहा है। दलों को समझना होगा कि बिना आंतरिक लोकतंत्र, मजबूत संगठन और वैचारिक स्पष्टता के वे टिक नहीं सकते। आम आदमी पार्टी जैसी युवा पार्टी का टूटना साबित करता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और संसाधनों की कमी पार्टियों को कमजोर बनाती है।


वहीं आम जनता के लिए संदेश और भी गंभीर है। जब भी कोई नेता ईडी/सीबीआई छापे के ठीक बाद पार्टी बदल लेता है, तो लोकतंत्र में विश्वास डगमगाता है। जनता सोचती है कि क्या ये नेता सच्चे सुधारक थे या सत्ता के लालची? पंजाब की जनता, जो पहले ही महंगाई, बेरोजगारी और ड्रग समस्या से जूझ रही है, अब राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो रही है। यह घटना राजनीति को एक ‘धंधा’ साबित करती है, जहां सिद्धांतों की जगह स्वार्थ हावी है। लेकिन एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि जनता अब ज्यादा सजग हो रही है। 2027 के चुनाव में मतदाता इन ‘ट्रैक्टरों’ को याद रखेंगे और वोट से जवाब देंगे।


यह घटना आम आदमी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में सत्ता संभाली, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर संगठन अभी भी कमजोर है। राघव चड्ढा जैसे चेहरे, जो पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता थे, का जाना आंतरिक कलह को उजागर करता है। केजरीवाल की ‘सुप्रीमो’ शैली पर सवाल उठ रहे हैं। अशोक मित्तल पर ईडी के छापे के महज 10 दिन बाद उनका पलायन संदेहास्पद है। यदि पार्टी में सुधार नहीं हुआ, तो दिल्ली में भी ‘डोमिनो इफेक्ट’ शुरू हो सकता है। 


वहीं अन्य दलों के लिए भी यह एक संकेत है। भारतीय राजनीति में ‘माइग्रेशन’ की संस्कृति बढ़ रही है। भाजपा की मजबूत केंद्रीय शक्ति का फायदा उठाकर छोटी पार्टियां टूट रही हैं। यह लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है। जब विपक्ष कमजोर होता है, तो सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता है। यह प्रवृत्ति ‘एक पार्टी प्रभुत्व’ की ओर ले जा रही है, जो बहुलवाद को नुकसान पहुंचाएगी।


चिंता की बात यह है कि यह प्रवृत्ति ईडी/सीबीआई जैसी एजेंसियों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाती है। जब ये संस्थाएं केवल विपक्ष पर सक्रिय नजर आती हैं और सत्ता पक्ष पर चुप रहती हैं, तो जनता में भरोसा कम होता है। यह लोकतंत्र की नींव, ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ को हिला देता है। कुछ मामलों में भ्रष्टाचार सच्चा हो सकता है, लेकिन टाइमिंग संदिग्ध है। इससे राजनीति में ‘कोऑर्शन’ (दबाव) की संस्कृति बढ़ती है। जनता के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सत्ता हासिल करने का यही तरीका है? यह ट्रेंड छोटे दलों को खत्म करने और राष्ट्रपति शासन जैसी स्थितियां पैदा करने का खतरा बढ़ाता है।


आम आदमी पार्टी के सांसदों का भाजपा में विलय स्वस्थ राजनीति को खतरे में डालता है। यह पार्टी की कमजोरियों को उजागर करता है। लेकिन इससे बड़ा सबक यह है कि भारतीय राजनीति में वैचारिक स्थिरता, आंतरिक लोकतंत्र और संस्थागत निष्पक्षता की जरूरत है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब पार्टियां सिद्धांतों पर टिकी रहें, न कि सत्ता के लालच में। यदि यह ट्रेंड जारी रहा, तो ‘आम आदमी’ की पार्टी का सपना ही टूट जाएगा। समय है कि सभी दल, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, आत्मचिंतन करें। अन्यथा, राजनीति सिर्फ ‘ऑपरेशन’ का खेल बनकर रह जाएगी। 

Monday, April 6, 2026

राघव चड्ढा विवाद: लोकतंत्र की परीक्षा या आंतरिक अनुशासन?

हाल ही में आम आदमी पार्टी (आप) के राजसभा सांसद राघव चड्ढा और पार्टी नेतृत्व के बीच खुला विवाद सामने आया। 2 अप्रैल को पार्टी ने राजसभा सचिवालय को पत्र लिखकर चड्ढा को पार्टी के उपनेता पद से हटाने और उनकी जगह पंजाब के सांसद अशोक मित्तल को नियुक्त करने की सूचना दी। साथ ही, पार्टी ने अनुरोध किया कि चड्ढा को पार्टी की ओर से बोलने का समय न दिया जाए। अगले दिन चड्ढा ने ‘साइलेंस्ड, नॉट डिफीटेड’ शीर्षक से एक वीडियो जारी कर जवाब दिया। उन्होंने दावा किया कि वे हमेशा आम आदमी के मुद्दे उठाते रहे, लेकिन पार्टी उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। यह घटना पार्टी के आंतरिक मतभेदों को सार्वजनिक रूप से उजागर करती है और सवाल उठाती है कि क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या सख्त अनुशासन का मामला। 



राघव चड्ढा अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाते थे। लेकिन पिछले एक साल से रिश्तों में दरार दिखने लगी थी। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान चड्ढा विदेश में आंखों की सर्जरी करा रहे थे और पार्टी के कार्यक्रमों में अनुपस्थित रहे। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को हालिया छूट मिलने पर भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई बड़ा बयान नहीं दिया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह अनुशासनहीनता और पार्टी लाइन से विचलन माना गया। वहीं चड्ढा ने संसद में हवाई अड्डों पर महंगे खाने, डिलीवरी पार्टनर्स की समस्याएं, टोल प्लाजा और बैंक चार्जेस, गिग वर्कर्स के अधिकार जैसे मुद्दे उठाए, जिन्हें उन्होंने ‘आम आदमी’ के हितों से जोड़ा। लेकिन पार्टी ने इन्हें ‘सॉफ्ट पीआर’ करार दिया।



आम आदमी पार्टी के नेताओं ने इस विवाद पर बयान भी दिए। सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि चड्ढा बीजेपी से डरते हैं, विरोधी दलों के वॉकआउट में शामिल नहीं होते और पंजाब के मुद्दों पर चुप रहते हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने उन्हें ‘कम्प्रोमाइज्ड’ बताया और कहा कि जब पार्टी एमएसपी या केंद्र से फंडिंग जैसे बड़े मुद्दे उठाती है, तब चड्ढा छोटे-छोटे मुद्दों पर फोकस करते हैं। आतिशी और अनुराग धंडा ने भी यही स्वर दोहराया कि संसद में सीमित समय में ‘समोसे सस्ते’ जैसे विषयों पर बोलना राष्ट्रहित से दूर है। पार्टी का तर्क है कि एक छोटी पार्टी के पास संसद में बोलने का सीमित कोटा होता है, इसलिए उसे केंद्र सरकार के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए, न कि ‘सॉफ्ट’ मुद्दों पर।



इस पर चड्ढा ने अपने वीडियो में इन आरोपों का सीधा जवाब दिया। उन्होंने पूछा, क्या आम आदमी के मुद्दे उठाना अपराध है? मैंने हवाई अड्डे के खाने की महंगाई, गिग वर्कर्स की दुर्दशा, अशुद्ध भोजन और लूटखसोट के मुद्दे उठाए, जिससे आम आदमी को फायदा हुआ। पार्टी को इससे क्या नुकसान हुआ? उन्होंने पार्टी को चेतावनी दी, मेरे मौन को हार मत समझिए। मैं वह नदी हूं जो समय आने पर बाढ़ बन जाती है। यह बयान न केवल व्यक्तिगत दर्द जाहिर करता है, बल्कि पार्टी में असहमति के अधिकार पर भी सवाल खड़ा करता है।



वहीं अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया ने इस विवाद को और भी रंग दिया है। भाजपा ने इसे आम आदमी पार्टी का आंतरिक मामला बताया, लेकिन चड्ढा को बोलने से रोकने को ‘अत्यधिक आपत्तिजनक और तानाशाही’ करार दिया। कांग्रेस ने इसे पार्टी में दरार का सबूत माना। पंजाब कांग्रेस प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारींग ने कहा कि चड्ढा पहले से ही पार्टी से ‘अलग’ दिखते थे, खासकर केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय उनकी अनुपस्थिति को देखते हुए। कुछ कांग्रेस नेताओं का अनुमान है कि चड्ढा पार्टी छोड़कर कहीं और जा सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी पार्टी की एकता पर सवाल उठाए हैं। कुल मिलाकर, विपक्षी दलों ने इस घटना को पार्टी की कमजोरी के रूप में पेश किया है।


कुछ विश्लेषक मानते हैं कि चड्ढा पार्टी की आक्रामक एंटी-बीजेपी रणनीति से सहमत नहीं हैं। वे ज्यादा मुद्दा-आधारित और कम व्यक्तिगत हमले वाले रुख अपनाते रहे, जो आम आदमी पार्टी की मौजूदा जरूरत (केंद्र सरकार पर सीधा हमला) से मेल नहीं खाता। दूसरी अटकल यह है कि चड्ढा की बढ़ती लोकप्रियता और मीडिया कवरेज केजरीवाल के लिए खतरा बन गई। स्वाती मालीवाल जैसी पिछली घटनाओं की घटना की याद दिलाते हुए कुछ राजनैतिक पंडित कहते हैं कि आम आदमी पार्टी में ‘केजरीवाल से ज्यादा चमक’ बर्दाश्त नहीं की जाती। अनुशासन और पंजाब-केंद्रित रणनीति भी एक कारण हो सकता है, क्योंकि चड्ढा पंजाब से सांसद हैं लेकिन पंजाब के बड़े मुद्दों (जैसे एमएसपी) पर कम सक्रिय रहे। कुछ स्रोतों का दावा है कि चड्ढा को बीजेपी ‘प्रमोट’ कर रही है या वे स्वतंत्र रूप से राजनीति करने की सोच रहे हैं। हालांकि, इनमें से कोई भी पुष्टि नहीं हुई है। पार्टी ने इसे ‘रूटीन संगठनात्मक बदलाव’ बताया है, लेकिन टाइमिंग और बोलने पर रोक ने संदेह बढ़ा दिया है।


देखा जाए तो यह एक संसदीय लोकतंत्र में पार्टी अनुशासन बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल है। क्या एक सांसद को पार्टी कोटा से बोलने का अधिकार पार्टी नेतृत्व के विवेक पर निर्भर होना चाहिए? संविधान और संसदीय परंपरा में सांसद पार्टी से कहीं ज़्यादा जनता का प्रतिनिधि है। लेकिन वास्तविकता में व्हिप और पार्टी लाइन बाध्यकारी हैं। आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी जो स्वयं ‘स्वराज’ और पारदर्शिता का नारा देती रही, में यह घटना उसके सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। इसके साथ ही पार्टी की आंतरिक संरचना पर भी कई सवाल उठते हैं। केजरीवाल-केंद्रित पार्टी में असहमति को कैसे हैंडल किया जाता है? पार्टी बनने के समय जो-जो बड़े व चर्चित चेहरे केजरीवाल के साथ थे वे एक-एक करके अलग हुए। अब राघव चड्ढा जैसी घटनाएं पार्टी की ‘एकता’ की छवि को धक्का पहुंचाती हैं।


आम आदमी पार्टी जैसे दलों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत रहने के लिए आंतरिक एकता जरूरी है। चड्ढा जैसे युवा, शिक्षित और मीडिया-सेवी नेता पार्टी की छवि को आधुनिक बनाते थे। उनका साइडलाइन होना युवा नेताओं को निरुत्साहित कर सकता है। चड्ढा ने जो मुद्दे उठाए वे वाकई आम आदमी से जुड़े थे, महंगाई, श्रमिक अधिकार, उपभोक्ता शोषण। लेकिन राजनीति में संसद सीमित समय में प्राथमिकता ‘बड़े राजनीतिक हमले’ को दी जाती है। क्या यह ‘सॉफ्ट’ बनाम ‘हार्ड’ पॉलिटिक्स का टकराव है? दोनों पक्षों में सच्चाई तो है, एक तरफ पार्टी की रणनीतिक जरूरत, दूसरी तरफ संसद को जन-समस्याओं का मंच बनाने का प्रयास।


इस विवाद से भारतीय राजनीति को दो सबक मिलते हैं। पहला, कोई भी पार्टी कितनी भी लोकप्रिय क्यों न हो, आंतरिक लोकतंत्र के बिना टिक नहीं सकती। दूसरा, संसद में सांसदों की आवाज को पार्टी हित से ऊपर रखने की जरूरत है। राघव चड्ढा का भविष्य अनिश्चित है। वे पार्टी में रहकर संघर्ष कर सकते हैं, इस्तीफा दे सकते हैं या स्वतंत्र रूप से जन-मुद्दों पर बोलते रह सकते हैं। पार्टी के लिए यह आत्म-चिंतन का अवसर है। अगर पार्टी अपनी छवि ‘आम आदमी’ की रखना चाहती है, तो उसे अपने सांसदों की जन-केन्द्रित आवाज को दबाने के बजाय मजबूत करना चाहिए। दोनों पक्षों को संयम बरतना चाहिए। जनता देख रही है कि क्या आम आदमी पार्टी अपनी स्थापना के सिद्धांतों पर खरी उतरती है या सत्ता के खेल में फंस जाती है। भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी घटनाएं परीक्षा हैं। उम्मीद है कि यह विवाद संवाद का रास्ता खोलेगा, न कि और विभाजन का। 

Monday, January 5, 2026

नेताओं की भाषा का गिरता स्तर चिंताजनक 

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके नेताओं की गरिमा और संवाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में, राजनीतिक भाषणों व बयानों में अभद्र टिप्पणियां व असंसदीय भाषा, गाली-गलौज का बढ़ता प्रयोग एक गंभीर मुद्दा बन गया है। यह न केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित है, बल्कि चुनावी रैलियों, मीडिया इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर भी फैल चुका है। यह मुद्दा इतना संवेदनशील बन चुका है कि राजनीतिक दल चाहे कोई भी क्यों न हो उनके बिगड़े बोल, आम नागरिकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और मीडिया पर एक नकारात्मक प्रभाव  डालते हैं। साथ ही, महिलाओं, विपक्षी दलों और पत्रकारों के प्रति नेताओं के दुर्व्यवहार भी आजकल चर्चा में है जो कि इन अमर्यादित नेताओं के सच्चे चरित्र को सामने लाता है।


संसदीय परंपराओं में, असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली होती है। भारतीय संसद में, स्पीकर अक्सर ऐसी भाषा को हटाने का आदेश देते हैं, लेकिन संसद के बाहर ऐसे बयानों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता। राजनीतिक नेता अक्सर विपक्षी नेताओं को 'चोर', 'गद्दार' या इससे भी बदतर शब्दों से संबोधित करते हैं। चुनावी मौसम में यह और तीव्र हो जाता है, जहां व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की जगह ले लेते हैं। गौरतलब है कि कुछ नेताओं की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के युग में यह वायरल होकर लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे समाज पर इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।


भारतीय वोटर या नागरिक अपनी पसंद अनुसार राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं और उन दलों के नेताओं को अपना आदर्श भी मानते हैं। जब नेता सार्वजनिक मंचों पर गाली-गलौज करते हैं, तो यह नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान की भावना को कमजोर करता है। विशेषकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, इससे प्रभावित होती है। वे सोचते हैं कि अगर देश के लोकप्रिय नेता खुले मंचों पर ही ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो सामान्य जीवन में क्या करते होंगे? इससे समाज में असहिष्णुता और हिंसा की संस्कृति पनपती है। उदाहरणस्वरूप, जब कोई नेता विपक्षी को 'कुत्ता' या 'सुअर' जैसे शब्दों से नवाजता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति का अपमान है, बल्कि पूरे लोकतंत्र का मजाक उड़ाता है। नागरिकों में यह धारणा बनती है कि राजनीति एक गंदा खेल है, जहां नैतिकता की कोई जगह नहीं। परिणामस्वरूप, मतदान में उदासीनता बढ़ती है और लोग राजनीति से दूर होते जाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, कई नागरिकों का मानना है कि ऐसी भाषा से राजनीति की विश्वसनीयता घटती है, जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है।


राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करते हैं। जब शीर्ष नेता असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यह कार्यकर्ताओं में भी वैसी ही प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है। चुनावी रैलियों में कार्यकर्ता विपक्षी दलों के खिलाफ नारे लगाते समय अक्सर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो कभी-कभी हिंसक झड़पों में बदल जाता है। इससे दल के अंदर अनुशासनहीनता बढ़ती है और कार्यकर्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में उलझ जाते हैं। इसके अलावा, जब कोई नेता अपनी ही पार्टी के सदस्यों के खिलाफ ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है (जैसे असंतोषी सदस्यों को 'गद्दार' कहना), तो यह आंतरिक कलह को जन्म देता है। पार्टी कार्यकर्ता निराश होते हैं और उनका मनोबल गिरता है। लंबे समय में, यह दलों की एकजुटता को प्रभावित करता है और राजनीतिक स्थिरता को खतरे में डालता है। कार्यकर्ता सोचते हैं कि अगर नेता ही सम्मान नहीं रखते, तो वे क्यों रखें? इससे राजनीतिक संस्कृति में गिरावट आती है।

वहीं मीडिया पर इसका प्रभाव सबसे अधिक चिंताजनक है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो नेताओं से सवाल पूछकर जवाबदेही सुनिश्चित करती है। लेकिन जब पत्रकार तीखे सवाल पूछते हैं, तो कई नेता उन पर व्यक्तिगत हमला करते हैं या अभद्र व्यवहार करते हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेता पत्रकारों को 'पेड मीडिया' या 'दलाल' कहकर अपमानित करते हैं। कभी-कभी यह शारीरिक धमकी तक पहुंच जाता है, जैसे कैमरा छीनना या बाहर निकालना। इससे मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा मंडराता है। पत्रकार डर के मारे सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं, जिससे जनता को सच्ची जानकारी नहीं मिलती। सोशल मीडिया पर नेता पत्रकारों के खिलाफ ट्रोल आर्मी को सक्रिय करते हैं, जो अभद्र टिप्पणियों से उन्हें परेशान करते हैं। यह न केवल मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा को भी खतरे में डालता है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का उल्लेख है, और असंसदीय भाषा इसका एक प्रमुख कारण है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उनके खिलाफ लिंगभेदी टिप्पणियां एक बड़ी समस्या हैं। नेता अक्सर महिला विपक्षी नेताओं की शारीरिक बनावट, कपड़ों या व्यक्तिगत जीवन पर अभद्र टिप्पणियां करते हैं। जैसे 'आइटम' या 'डांस करने वाली' जैसे शब्दों का प्रयोग। यह न केवल महिलाओं का अपमान है, बल्कि पूरे समाज में लिंग असमानता को बढ़ावा देता है। इससे महिला कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है और वे राजनीति में आने से हिचकिचाती हैं। विपक्षी दलों के प्रति भी ऐसी भाषा का प्रयोग आम है। नीतिगत मतभेदों की बजाय, नेता व्यक्तिगत हमलों में उलझ जाते हैं, जैसे परिवार को निशाना बनाना या जाति-धर्म पर टिप्पणियां। इससे राजनीतिक बहस का स्तर गिरता है और समाज में विभाजन बढ़ता है। पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का जिक्र पहले हो चुका है, लेकिन महिलाओं पत्रकारों के साथ यह और गंभीर होता है, जहां लिंगभेदी टिप्पणियां जोड़ी जाती हैं।

यह सब देखकर लगता है कि भारतीय राजनीति में सभ्यता की कमी एक बड़ी चुनौती है। लेकिन इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सख्त नियम लागू करने चाहिए और बाहर के मंचों पर भी नैतिक दिशानिर्देश। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा न देकर, जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी चाहिए। नागरिकों को भी सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री को शेयर न करके, विरोध जताना चाहिए। राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना चाहिए कि बहस नीतियों पर हो, न कि व्यक्तिगत हमलों पर। महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाए जा सकते हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून सख्त किए जाएं।

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असंसदीय भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, तो राजनीतिक बयानों व भाषणों को सभ्य बनाना होगा। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया सब मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में चमकेगा।