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Monday, September 7, 2026

जनता की जागरूकता लोकतंत्र के लिए ज़रूरी

जब से ‘जेन-ज़ी’ ने जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ सफल धरने का आयोजन किया है, तब से पूरे देश के विद्यार्थियों में अभूतपूर्व नवचेतना का उदय हुआ है। आज देश भर के ग्रामीण अंचलों के खस्ता हाल सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी अपने स्कूलों की अव्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाने लगे हैं। उनमें स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल पूछने की हिम्मत आ गई है। प्रसन्नता तो इस बात की है कि अब ऐसी चेतना प्राथमिक पाठशालाओं के बच्चों तक में पैदा हो गई है। वे अपने स्कूल की जरजर या नदारद इमारत, शौचालयों का अभाव, शिक्षकों की संख्या में भारी कमी, स्कूल से मिलने वाले भोजन की खराब क्वालिटी, स्कूल तक पहुँचने वाले मार्गों की दुर्दशा, जैसे गंभीर मुद्दों पर खुलकर और संगठित होकर सवाल पूछने लगे हैं। राजस्थान के एक माध्यमिक विद्यालय की छात्राओं ने तो विद्यालय के गेट पर ताला ही डाल दिया और धरने पर बैठ गईं। उनका कहना था कि जबतक उनकी मांगे पूरी नहीं हो जाती, स्कूल का ताला नहीं खुलेगा। 



देश भर में पनप रही इस नई प्रवृत्ति से प्रशासन और सत्तारूढ़ दल हक्के-बक्के हो गए हैं। उन्हें जवाब देते नहीं बन रहा। सोशल मीडिया पर ऐसे दर्जनों वीडियो रोज़ वायरल हो रहे हैं जिनमें ये घटनाक्रम प्रमुखता से दिखाए जा रहे हैं। सबसे रोचक बात यह है कि इस तरह विरोध के स्वर उठाने वाले छात्र किसी राजनैतिक दल के बहकावे में आ कर ये कदम नहीं उठा रहे। राजनैतिक दल और उनके कार्यकर्ता तो ख़ुद इस नई परिस्थिति से बेचैन हैं। क्योंकि आजतक जनता और शासन के बीच बिचौलिये की उनकी आत्मघोषित भूमिका अब निरर्थक होती जा रही है। यही हाल मीडिया का भी है। जो मीडिया सरकारों की चाटुकारिता या उनका प्रचारक बन कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहा था वो अचानक यह महसूस कर रहा है कि आम जनता की दृष्टि में अब उनकी कोई अहमियत नहीं बची। एक और रोचक तथ्य यह है कि ऐसी जागृति केवल भाजपा शासित राज्यों में आई हो, ये बात नहीं है। जिन राज्यों में कांग्रेस या अन्य दलों की सरकारें हैं वहाँ के छात्र भी शिक्षा व्यवस्था की खामियों को लेकर अब मुखर हो गए हैं। 



कुछ पत्रकार तो हमेशा ही अपना कर्तव्य निष्ठा से निभाते आए हैं। इस माहौल से उत्साहित हो कर जब उन्होंने कुछ राज्यों में विद्यालयों की दुर्दशा पर रिपोर्टिंग की तो उससे घबराकर वहाँ के मुख्यमंत्रियों ने ऐसे पत्रकारों के विरुद्ध पुलिस की दंडात्मक कार्यवाही शुरू करवा दी। मज़े की बात यह है कि ऐसा करने वालों में वो मुख्यमंत्री भी हैं जो दिन-रात सैंकड़ों करोड़ रुपया अपने प्रचार-प्रसार पर खर्च करके अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते हैं। दरअसल ऐसे मुख्यमंत्री, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों, इस मुग़ालते में थे कि उनका आक्रामक प्रचार, उनके शासन की कमज़ोरियों को ढक लेगा। जब मीडिया ही मैनेज हो गया तो उनकी सरकारों की कमज़ोरियाँ आम जनता तक कौन पहुँचाएगा? 



लेकिन अब पासा पलट गया। मीडिया तो मैनेज हो गया, लेकिन टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठा कर अब हर छात्र एक रिपोर्टर बन चुका है। वो एक स्मार्ट फ़ोन से ज़मीनी हक़ीक़त दिखाकर, सरकार के झूठे दावों की पोल खोल रहा है। ये तो एक तरह का ऐसा सैलाब है जिसे काबू कर पाना अब किसी भी दल की सरकार के लिए नामुमकिन होगा। दो-चार पत्रकारों पर तो दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है लेकिन जब विद्यालयों के सैंकड़ों छात्र हकीकत बयान करने लगें तो उन पर दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा सकती। अगर किसी मूर्ख नेता ने अहंकारवश ऐसा करने का दुस्साहस किया तो वो वोट बैंक को खो देगा। क्योंकि बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य को लेकर हर माता-पिता चिंतित रहता है। जब वो देखेंगे कि उनके बच्चों को स्कूलों में बुनियादी सुविधा मिलना तो दूर उल्टा उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने पर पुलिस की दंडात्मक कार्यवाही को झेलना पड़ रहा है तो उनका पारा भी सातवें आसमान पर चढ़ेगा। ऐसे हालातों को क़ाबू कर पाना किसी भी मंत्री या सरकार के लिए असंभव होगा। 



ये तो एक शुरुआत है, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है। लेकिन इसका दायरा अब और बढ़ना चाहिए। हर आम नागरिक को अपने परिवेश पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए। अगर उनके घर के सामने सड़क टूटी पड़ी है या उसमें पानी भर रहा है, या उनके इर्दगिर्द कूड़े के अम्बार लगे हैं तो उन्हें उसकी फ़ोटो खींच कर फ़ौरन सोशल मीडिया पर वायरल कर देना चाहिए। जिससे स्थानीय प्रशासन हरकत में आए और जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करे। जब हर नागरिक ऐसा करना शुरू कर देगा तो भ्रष्ट अधिकारियों या राजनेताओं पर भारी दबाव पड़ेगा। उन्हें मजबूरन जनता की परेशानियों का निदान करना होगा। जब एक ही इलाक़े के दर्जनों या सैंकड़ों लोग एक सी समस्याओं का खुलासा करेंगे तो फिर उन सबका सामूहिक दमन करना किसी भी प्रांतीय सरकार या स्थानीय निकायों को करना मुश्किल होगा। इससे अपना लोकतंत्र मजबूत बनेगा और नेताओं और अधिकारियों में ज़िम्मेदारियों की भावना विकसित होगी। जो आज़ादी मिलने के दो दशक बाद से ही लुप्त होना शुरू हो गई थी। आज तो हालत ये हो गई है कि जो नेता या अफसर जितना ज़्यादा भ्रष्ट होता है वो उतनी ही दबंगई दिखाता है। उसे अभी तक ये गलतफहमी है कि उससे कोई सवाल नहीं कर सकता। 

जो राजनेता, मुख्यमंत्री, मंत्री, सच्चे और ईमानदार हैं और यह चाहते हैं कि विकास कार्यों के लिए आवंटित धन का सदुपयोग हो वो जनता की इस पहल का स्वागत करेंगे, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपने प्रांत के बारे में ज़मीनी हकीकत बिना किसी लाग-लपेट के नियमित मिलने लगेगी। ऐसे में वे अपने प्रशासन को कड़े निर्देश देकर जनता की समस्याओं का हल करवा पाएंगे।  

Monday, August 10, 2026

लोकतंत्र में प्रदर्शन, विरोध और सरकार की ज़िम्मेदारी !

लोकतंत्र में प्रदर्शन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को सत्ता तक पहुँचाने का संवैधानिक अधिकार है। भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(ए) और (बी) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है। जब व्यवस्था में असंतोष बढ़ता है, नौकरियाँ नहीं मिलतीं, परीक्षाओं में गड़बड़ी होती है या भ्रष्टाचार पनपता है, तो युवा सड़कों पर उतरते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन में असामाजिक तत्व घुसपैठ कर लेते हैं और हिंसा भड़काते हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह असली प्रदर्शनकारियों की रक्षा करे और तोड़फोड़ करने वालों को अलग करे। लेकिन अक्सर प्रशासन या तो अत्यधिक बल का इस्तेमाल करता है या फिर पूरी तरह लापरवाह रहता है। परिणामस्वरूप, शांतिपूर्ण आवाज़ दब जाती है और असामाजिक तत्व हावी हो जाते हैं।



2026 में भारत में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में जेन-ज़ी प्रदर्शन ने इस पूरे समीकरण को नया रूप दिया। यह आंदोलन सोशल मीडिया की एक व्यंग्यात्मक पोस्ट से शुरू हुआ। जब भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहा, तो अभिजीत दिपके नाम के युवक ने ‘अगर सारे कॉकरोच इकट्ठा हो जाएँ’ जैसी पोस्ट डाली, जिससे हजारों युवा जुड़ गए। जल्द ही यह आंदोलन नीट परीक्षा लीक और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं के खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन बन गया। दिल्ली के जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना, संसद की ओर मार्च, मीम्स, रील और इंस्टाग्राम की भाषा ने पारंपरिक विरोध को चुनौती दी। पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, सैकड़ों घायल हुए, लेकिन युवा शांति बनाए रखने पर अड़े रहे। अंत में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी सरकार के 12 वर्षों में दूसरी बार सार्वजनिक दबाव से किसी कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा था।



गौरतलब है कि इस नई प्रवृत्ति के चलते अब प्रदर्शन सिर्फ झंडे और नारे नहीं, बल्कि डिजिटल संगठित प्रतिरोध हैं। जेन-ज़ी ने व्हाट्सऐप के बजाय इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स और वायरल वीडियो का इस्तेमाल किया। वे पारंपरिक राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखते हुए भी बड़े पैमाने पर जुट सके। यह आंदोलन बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और भविष्य की अनिश्चितता का प्रतीक बन गया। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों में जेन-ज़ी आंदोलनों ने सरकारें गिराईं, लेकिन भारत में यह अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। फिर भी, पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें वायरल होकर आंदोलन को और ताकत दे गईं। यह साबित करता है कि आज की युवा पीढ़ी अब चुपचाप नहीं बैठेगी।



प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को सुरक्षित रखना है। ऐसे में जब असामाजिक तत्व प्रदर्शन में घुसते हैं तो वो पत्थरबाजी करते हैं, वाहन जलाते हैं या दुकानों को लूटते हैं। जिससे पूरा आंदोलन बदनाम हो जाता है। प्रशासन अक्सर असली प्रदर्शनकारियों और तोड़फोड़ करने वालों में फर्क नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि लाठीचार्ज सब पर होता है, निर्दोष युवा घायल होते हैं और मीडिया में हिंसा का प्रचार हो जाता है। ऐसे में प्रशासन को पहले से खुफिया जानकारी जुटाकर असामाजिक तत्वों को अलग करना चाहिए था। पुलिस को यह समझना होगा कि बल का अत्यधिक इस्तेमाल सिर्फ नाराजगी बढ़ाता है।



सवाल है कि सरकार को प्रदर्शनों से कैसे निपटना चाहिए? सबसे पहले, संवाद। सरकार को प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत करनी चाहिए। उनकी माँगें सुननी चाहिए और जहाँ संभव हो, समाधान निकालना चाहिए। दूसरा, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति और सुरक्षा सुनिश्चित करना। जंतर मंतर जैसे स्थानों को प्रदर्शन स्थल के रूप में संरक्षित रखना। तीसरा, असामाजिक तत्वों की तुरंत पहचान कर अलग कार्रवाई हो। सीसीटीवी, ड्रोन और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल कर हिंसा फैलाने वालों को पकड़ना, लेकिन निर्दोषों को परेशान न करना। चौथा, सोशल मीडिया पर सकारात्मक संवाद। युवाओं की भाषा में जवाब देना। पाँचवाँ, दीर्घकालिक सुधार। जिस भी समस्या को लेकर प्रदर्शन किया जाता है उसकी व्यवस्था में पारदर्शिता लाना। अगर सरकार सिर्फ दमन करती है तो असंतोष और गहरा होता है। अगर वह सुनती है तो लोकतंत्र मजबूत होता है।


भारत का इतिहास प्रदर्शनों से भरा पड़ा है, जिन प्रदर्शनों से बड़े बदलाव आए हैं। 1974-75 का जेपी आंदोलन भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ था। जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ के नारे ने इंदिरा गांधी सरकार को चुनौती दी। आपातकाल लगा, लेकिन 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था। जंतर मंतर पर अनशन ने लोकपाल कानून बनवाया और आम आदमी पार्टी जैसी नई राजनीति को जन्म दिया। 2012 का निर्भया आंदोलन महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कानून बदलने का कारण बना। आपराधिक कानून में बड़े संशोधन हुए। 2020-21 का किसान आंदोलन तीन कृषि कानूनों को रद्द कराने में सफल रहा। ये आंदोलन साबित करते हैं कि जब जनता एकजुट होती है तो सत्ता को झुकना पड़ता है।


विश्व भर में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। 1789 में फ्रांसीसी क्रांति में बैस्टिल का गिरना आधुनिक लोकतंत्र की नींव बना। 1963 में अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग का ‘आई हैव अ ड्रीम’ भाषण नागरिक अधिकार आंदोलन का प्रतीक बना। 1989 में बर्लिन दीवार गिरने वाले प्रदर्शनों ने पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का अंत किया। दक्षिण कोरिया में 2016-17 का कैंडललाइट आंदोलन राष्ट्रपति को हटाने में सफल रहा। अर्मेनिया में 2018 की वेलवेट क्रांति ने भ्रष्ट शासन को उखाड़ फेंका। ये उदाहरण बताते हैं कि शांतिपूर्ण और संगठित प्रदर्शन लोकतंत्र की रक्षा करते हैं, जबकि हिंसा उसे कमजोर करती है।

आज की चुनौती यह है कि असामाजिक तत्व और राजनीतिक स्वार्थ प्रदर्शनों को अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल न करें। सरकार को भी यह समझना होगा कि युवाओं की आवाज़ को दबाना नहीं, बल्कि सुनना है। सीजेपी आंदोलन ने साबित कर दिया कि जेन-ज़ी अब सिर्फ रील्स नहीं बनाता, वह प्रतिरोध भी करता है। लोकतंत्र में प्रदर्शन अपरिहार्य हैं। प्रशासन की सफलता इस बात में है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की रक्षा करे और असामाजिक तत्वों को अलग करे। अगर सरकार संवाद, पारदर्शिता और सुधार का रास्ता अपनाती है तो प्रदर्शन सहयोग का माध्यम बन सकते हैं। अन्यथा, असंतोष की आग और भड़केगी। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देनी होगी, न कि उसे कुचलना। यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है। 

विदेशी फंडिंग के नियमन में एक अहम मोड़!

संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 एक बार फिर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यह संशोधन विधेयक एफसीआरए 2010 में बड़े बदलाव ला सकता है। सरकार इसे विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और नागरिक समाज संगठन इसे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), ट्रस्ट और धार्मिक संस्थाओं पर राज्य के नियंत्रण का विस्तार मान रहे हैं। देखना यह है कि इसके प्रावधानों, पक्ष-विपक्ष, सरकारी तर्क, विपक्षी आलोचना और विशेषज्ञों राय के अनुसार, इस विधेयक में ऐसा क्या है?


एफसीआरए विदेशी दान को विनियमित करने वाला कानून है। इसके तहत एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण कराना पड़ता है, जो पांच साल के लिए वैध होता है और नवीनीकरण की जरूरत होती है। आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 तक करीब 14,449 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण थे, जबकि 22,498 रद्द हो चुके थे और 15,212 समाप्त माने गए। 2019-2022 के बीच पंजीकृत संगठनों को लगभग 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। कई रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन का स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं था। नया विधेयक इसी खामी को भरने का दावा करता है।


विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान एक ‘नामित प्राधिकरण’ (डेज़ीग्नेटेड अथॉरिटी) का निर्माण है। इसके अनुसार जब किसी संगठन का एफसीआरए प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियां अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण में निहित हो जाएंगी। यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो वे स्थायी रूप से निहित हो सकती हैं और सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल या बिक्री भी हो सकती है। बिक्री की राशि भारत की समेकित निधि में जाएगी। इसके साथ ही धार्मिक चरित्र वाली संपत्तियों के संरक्षण का प्रावधान भी है। प्राधिकरण पूजा स्थलों को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। प्रभावित संगठन 90 दिनों में पुनरीक्षण और जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील कर सकते हैं। इसके अलावा, नवीनीकरण के लिए पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी योगदान के उपयोग की शर्त लगाई गई है। कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम कारावास पांच साल से घटाकर एक साल किया गया है और जांच शुरू करने से पहले केंद्र की पूर्व अनुमति जरूरी होगी।


सरकार का तर्क है कि यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए आवश्यक है। सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो, वो विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना चाहेगी। सरकार का कहना है कि रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद हजारों करोड़ की संपत्तियां अधर में लटकी रह जाती थीं; राज्य सरकारें उन्हें न तो कब्जे में ले सकती थीं और न प्रबंधित कर सकती थीं। नया ढांचा इन संपत्तियों की सुरक्षा, प्रबंधन और उचित उपयोग सुनिश्चित करेगा। न्यूनतम उपयोग सीमा निष्क्रिय संगठनों को लाइसेंस धारण करने से रोकेगी। दंड का युक्तिकरण और जांच में केंद्र की अनुमति मनमाने कार्रवाई को सीमित करेगी। सरकार का तर्क है कि यह सिविल सोसायटी को कमजोर नहीं करता, बल्कि विदेशी योगदान को वैध प्रयोजनों तक सीमित रखता है और शासन को मजबूत बनाता है।


वहीं विपक्ष इसे ‘दमनकारी’ और सिविल सोसायटी पर हमला मानता है। उनका तर्क है कि नामित प्राधिकरण को व्यापक शक्तियां मिलने से सरकार एनजीओ की संपत्तियों पर कब्जा कर सकती है। पंजीकरण का स्वतः समापन प्रक्रियात्मक देरी से भी हो सकता है। नवीनीकरण आवेदन लंबित रहने या समय पर न लगाने पर संगठन पंगु हो जाएंगे। यह विशेष रूप से छोटे संगठनों, धार्मिक संस्थाओं (खासकर ईसाई चर्चों और अल्पसंख्यक समूहों से जुड़े ट्रस्ट) और आलोचनात्मक आवाजों को निशाना बना सकता है। अमेरिका के कुछ सांसदों ने भी इसे ईसाइयों के खिलाफ हमला बताया है और भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ने की चेतावनी दी है। विपक्ष का कहना है कि 2020 के संशोधनों के बाद पहले ही हजारों लाइसेंस रद्द हो चुके हैं; नया विधेयक कार्यपालिका की शक्ति को और बढ़ाता है, न्यायिक समीक्षा को कमजोर करता है और लोकतांत्रिक स्थान को संकुचित करता है। केरल जैसे राज्यों में विदेशी फंड पर निर्भर स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं।


इस विधेयक के फायदे देखे जाएँ तो इसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और संपत्ति प्रबंधन की स्पष्टता है। विदेशी फंड का दुरुपयोग (यदि कोई हो) रोका जा सकता है। निष्क्रिय संगठनों को फिल्टर करने से सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण काम करने वाले संगठनों को प्राथमिकता मिलेगी। इसके साथ ही दंड में नरमी और अपील का प्रावधान कुछ सुरक्षा देता है। यदि इस विधेयक के नुकसान की बात करें तो सरकार का अत्यधिक नियंत्रण, छोटी और स्थानीय संस्थाओं पर अनुपालन का बोझ, प्रक्रियात्मक जोखिम और संभावित चयनात्मक कार्रवाई शामिल हैं। उद्देश्य और भूगोल-विशिष्ट पंजीकरण लचीलापन कम कर सकता है। धार्मिक गतिविधियों पर स्पष्ट प्रतिबंध (धर्मांतरण) विवाद बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे मौजूदा खामियों को भरने वाला व्यावहारिक कदम मानता है, जबकि दूसरे वर्ग का कहना है कि यह एफसीआरए को विनियमन से आगे ले जाकर सिविल सोसायटी पर व्यापक राज्य नियंत्रण का औजार बना रहा है। कुछ कानूनी विश्लेषक कहते हैं कि संपत्तियों का निहित होना और स्थायी वेस्टिंग संवैधानिक सवाल उठा सकते हैं, खासकर बिना पर्याप्त न्यायिक निगरानी के।


कुल मिलाकर देखा जाए तो एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 विदेशी फंडिंग के नियमन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। सरकार की मंशा राष्ट्रीय हित और पारदर्शिता की है, लेकिन प्रावधानों में कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार विपक्ष और नागरिक समाज की चिंताओं को जायज ठहराता है। सच्चा लोकतंत्र पारदर्शिता और स्वतंत्र सिविल सोसायटी दोनों की मांग करता है। ऐसे में विधेयक पर विस्तृत संसदीय चर्चा, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और छोटे संगठनों के लिए राहत के बिना इसे पारित करना अनुचित होगा। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि अपील प्रक्रिया को मजबूत किया जाए, स्वतः समापन के प्रावधानों में सुरक्षा जोड़ी जाए और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों के लिए स्पष्ट, निष्पक्ष दिशानिर्देश हों। अंततः कानून का उद्देश्य विदेशी योगदान को नियंत्रित करना होना चाहिए, न कि वैध सामाजिक कार्यों को बाधित करना। संसद को इस संतुलन को साधना चाहिए, ताकि पारदर्शिता के नाम पर स्वतंत्रता का गला न घोंटा जाए। 

Monday, July 27, 2026

सरकार की व्यवस्था कैसे सुधरे?

पिछले कुछ सालों से मीडिया दो खेमों में बटा हुआ है। एक तरफ़ है निजी टीवी चैनल और दूसरी तरफ़ है सोशल मीडिया। निजी टीवी चैनलों के मालिकों को सरकार विज्ञापन के नाम पर बहुत मोटी रकम देती है। इसलिए इन चैनलों के उन एंकरों को भी बहुत मोटी रकम मिलती है जो रात-दिन सरकार का इकतरफ़ा गुणगान करते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछली सरकारों में जब निजी चैनल और सोशल मीडिया दोनों ही नदारद थे तब भी ये बँटवारा इस तरह था कि सरकारी नियंत्रण वाला दूरदर्शन और सरकार से विज्ञापनों के नाम पर मोटा पैसा लेने वाले अख़बार, तत्कालीन सरकार का भौपूँ हुआ करते थे। जबकि दूसरे अख़बार विपक्षी दलों से समर्थन लेकर सरकार की आलोचना किया करते थे। हालांकि उस दौर में ये फ़र्क़ इतना प्रखर नहीं था कि आम आदमी उसकी गहराई समझ सके। पर आज जो देश में हो रहा है उसमें दोनों ही पक्ष इकतरफ़ा अभियान चलाते हैं। जिससे हकीकत पता नहीं चल पाती। उदाहरण के तौर पर, सोशल मीडिया में आए दिन वीडियो आते हैं कि भाजपा सरकारों के बनाए पुल ताश के पत्तों की तरह ढहते रहते हैं और भाजपा सरकारों के बनाए राजमार्गों पर जगह-जगह भारी गड्डे हो गए हैं। ऐसा ही एक वीडियो समाचार आया कि नवनिर्मित दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, बनते ही जगह-जगह टूट गया है। पिछले हफ़्ते जब मैं इस राजमार्ग पर पहली बार गया तो लगातार कार की खिड़की से बाहर देख रहा था कि वो गड्डे कहाँ हैं? पर मुझे ऐसा कोई गड्ढा नज़र नहीं आया। बल्कि ये राजमार्ग इतना बढ़िया बना है कि हम मात्र डेढ़ घंटे में दिल्ली से मुज़फ़्फ़रनगर पहुँच गए। 



सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार होना कोई नई बात नहीं है। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोग़ा’ 150 साल पहले भारत में चल रहे भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है। 2500 साल पहले राजनीति के महारथी चाणक्य पंडित ने कहा था, ‘शहद के गोदाम की रखवाली करने वाले के होठों पर शहद लगा मिलेगा’। आज़ादी के बाद से केंद्र और राज्यों की सभी सरकारों ने देश के संसाधनों को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्या वजह है कि नेता किसी भी दल का क्यों न हो, अगर वो पार्षद से लेकर मंत्री तक कभी भी किसी भी पद पर रहा होगा तो उसकी आर्थिक हैसियत उस दौर में कई गुना बढ़ी होगी। ये कोई छिपी बात नहीं है। अपवाद तो हमेशा और हर जगह होते हैं। पर आम धारणा तो यही है कि राजनीति कोयले की दलाली की तरह एक ऐसा पेशा है जिसमें हाथ काले होते ही हैं। इसलिए मौजूदा दौर में संघ और भाजपा पर जो तीव्र हमला हो रहा है वो क्या उन राजनेताओं द्वारा किया जा रहा है जिनका अपना दामन पाक साफ़ है? अगर नहीं तो फिर ग़ुलाम अली की ग़ज़ल की वो लाइन दोहराना अनुचित न होगा, हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है….



प्रधान मंत्री मोदी ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से लेकर, ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना’, ‘प्रधान मंत्री आवास योजना’, ‘आयुष्मान भारत’, ‘जल जीवन मिशन’, ‘स्किल इंडिया मिशन’, ‘नमामि गंगे’, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’, ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘अटल पेंशन योजना’, ‘प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना’, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’, ‘उजाला योजना’, ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’, ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ जैसी तमाम योजनाएं और अभियान चलाए। विपक्ष कहता है कि ये सब फ्लॉप हो गए, कहीं कुछ नहीं हुआ। जबकि इसका दूसरा पक्ष भी सामने आता है। हमारे घर और दफ्तर के स्टाफ़ में जो कर्मचारी हैं वे मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से हैं। उनका कहना है कि उन्हें घर बनाने के लिए सरकार से ख़ासा अनुदान मिला, आज़ादी के बाद उनके गाँव में पहली बार सड़क आई और पेयजल का संकट भी दूर हुआ। ये वो साधारण लोग हैं जिन्हें अकारण झूठ बोलने की कोई आवश्यकता नहीं। उन्हें लाभ मिला है इसलिए वे उसे बताने में संकोच नहीं करते। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि हर अभियान पूरी तरह से असफल हुआ है। कहीं सफलता और कहीं विफलता का होना असामान्य बात नहीं है।   



मुझे लगता है कि चाहे कोई भी दल सत्ता में हो जब तक उसका शासन और प्रशासन आम जनता के प्रति जवाबदेह न हो तब तक वो कितना भी ढोल पीटता रहे, जनता उसके दावों पर विश्वास नहीं करती। आम जनता को बड़े स्तर के बड़े घोटालों से इतना सरोकार नहीं होता जितना उनकी रोज़ की ज़िंदगी में पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार से होता है। इस स्तर का भ्रष्टाचार, हुक्मरानों का अहंकार और आम मतदाता की उपेक्षा का ख़ामियाज़ा सीधा मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री को भुगतना पड़ता है। ज़रूरत इस बात की है कि कोई ऐसी व्यवस्था बने जिसके अंतर्गत आम जनता की छोटी सी छोटी शिकायत पर तुरंत कारवाही हो और उसे राहत मिले। इस दिशा में तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय ने जो पहल की हैं उसका बहुत अच्छा संदेश आम जनता के बीच गया है। आगे चल कर वो कितने सफल होंगे ये तो समय ही बताएगा। पर तमिलनाडु तो एक राज्य है, आवश्यकता हर राज्य में ऐसे ही सुधार की है। डबल इंजन का दावा करने वाली प्रांतीय सरकारों में यह काम केंद्र सरकार की पहल पर अविलंब शुरू होना चाहिए। साथ ही महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां यदि भ्रष्टाचार में बदनाम हुए अफसरों और राजनेताओं की होती है तो उससे सरकार की छवि बहुत ख़राब होती है। भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के उसके दावे खोखले साबित होते हैं।  

एक बात और; इस देश में ईमानदार अफसरों और प्रतिष्ठित सामाजिक लोगों की संख्या इतनी कम नहीं है कि वे शासन और प्रशासन को जवाबदेह बनने के लिए मजबूर न कर सकें। आज के AI युग में किसी भी व्यक्ति के जीवन के विषय में पता लगाना कठिन कार्य नहीं है। आधुनिक तकीनिकी का इस्तेमाल करके देश के हर ज़िले में ऐसे लोगों की सूची बनाई जानी चाहिए और उन्हें कुछ अधिकार देकर स्थानीय शासन और प्रशासन पर निगरानी रखने के काम सौंपना चाहिए। अगर ऐसा हो सका तो ये जनता और सरकार के बीच की खाई को पाटने का एक महत्वपूर्ण कदम होगा।  

Monday, July 20, 2026

मंदिरों का प्रबंधन कैसे हो?

जबसे अयोध्या के श्री राम मंदिर में भारी मात्रा में चढ़ावा चोरी की खबरें सामने आई हैं उसके बाद से देश के अन्य मंदिरों के भी ऐसे घोटाले रोज़ सामने आ रहे हैं। फिर वो चाहे जम्मू कश्मीर के माता वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड का मामला हो, उत्तराखंड के केदारनाथ व बद्रीनाथ धाम का हो या मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकाल का हो या आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम का हो, हर जगह से भारी मात्रा में रुपया व सोने-चाँदी के चोरी के समाचार आ रहे हैं। सनातन धर्म के मंदिरों की संपत्ति पर सैंकड़ों सालों से लुटेरों की गिद्ध-दृष्टि रही है। फिर वो चाहे यवन आक्रांता हों या देश के ही विभिन्न राज्यवंशों के हिंदू या बौद्ध राजा ही क्यों न हों या अंग्रेज़ हुक्मरान और आज़ादी के बाद विभिन्न दलों के राजनेता। सबने जब मौक़ा मिला मंदिरों की अरबों की संपत्ति को चुराया या लूटा है। करण स्पष्ट है कि धर्म-प्रधान देश होने के कारण सनातन धर्म के मंदिरों में हमेशा से भावुक भक्त उदारता से सोना-चाँदी, ज़मीन-जायदाद और हीरे जवाहरात दान करते आए हैं। इस संपत्ति के प्रबंधन की कोई सुव्यवस्थित पारदर्शी व्यवस्था स्थापित नहीं की गई है। हर मंदिर के संरक्षकों, सेवायतों और भक्तों द्वारा अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार प्रबंधन की व्यवस्थाएं की जाती हैं। 


इस दिशा में जो सबसे प्रभावशाली उदाहरण है वो दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य का है। चोल राजवंश ने तमिलनाडु और आसपास के भूभाग पर नवीं से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक शासन किया। इन शासकों के कार्यकाल में विदेशों से व्यापार और देश में अच्छे उत्पादन के कारण बहुत सम्पन्नता आई। चोल राजाओं ने अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मंदिरों पर केंद्रित रखा। हर गांव, कस्बे और नगर की सभी आर्थिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक, कलात्मक, शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र ये मंदिर हुआ करते थे। इन मंदिरों में लोकतांत्रिक प्रणाली से विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समितियों का चयन किया जाता था। जैसे सरोवरों का प्रबंधन, कर संग्रह, वनों का संरक्षण आदि, इन्हीं समितियों के दायित्व होते थे। इस तरह हर मंदिर स्थानीय समाज के नियंत्रण में काम करता था। इस आशय के जो शिलालेख मिले हैं उनमें इन मंदिरों की कार्यप्रणाली का विस्तृत ब्योरा है। 


आज उपरोक्त अनेक क्षेत्रों में विभिन्न सरकारी या ग़ैर-सरकारी एजेंसियां काम कर रही हैं। इसलिए मंदिर पूरे समाज की गतिविधियों का केंद्र नहीं हो सकते। पर मंदिरों का प्रबंधन समाज की ही ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन लोगों की होनी चाहिए जो उस मंदिर विशेष को नियमित रूप से उदारता से दान देते हैं। ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से अपने श्रम अर्जित धन को उदारता से उस मंदिर को दान देता है वह उस धन की चोरी भी करेगा। ये हमारे संस्कारों में नहीं है। जो दैविक द्रव्य की चोरी करते हैं वे चाहे आस्तिक होने का कितना ही आडम्बर क्यों न रचें, निरे नास्तिक होते हैं। फिर वे चाहें किसी संगठन से जुड़े हों या राजनैतिक दल से। ऐसे लोगों को मंदिरों के प्रबंधन से कोसों दूर रखना चाहिए। इनमें सरकारी अधिकारी और न्यायपालिका के सदस्य भी शामिल हैं। हर मंदिर के प्रबंधन में प्रभावी मार्ग निर्देशक की भूमिका उस सम्प्रदाय के प्रतिष्ठित संतों को सौंपी जानी चाहिए। इस पूरे तंत्र के ऊपर निगरानी रखने का दायित्व चारों मान्य शंकराचार्यों का होना चाहिए। उन आत्मघोषित फर्जी शंकराचार्यों या नए बनाए गए तथाकथित संतों का नहीं जो किसी न किसी राजनैतिक दल या नेता द्वारा प्रायोजित किए जाते हैं। 


इसके साथ ही केंद्र या प्रांतों की सरकारों को मंदिरों के प्रबंधन में या उनकी समितियों में अपने प्रतिनिधि नामित करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। क्योंकि ऐसे नामित व्यक्तियों की जवाबदेही विराजमान देव विग्रह, उस संप्रदाय या उसके प्रतिष्ठित संतों के प्रति नहीं होती। इन लोगों की जवाबदेही तो अपने प्रशासनिक और राजनैतिक आकाओं के प्रति ही होती है। इसलिए इनकी मौजूदगी के बावजूद सरकारी अधिकृत मंदिरों में बड़े-बड़े घोटाले होते हैं। जैसे तिरुमाला तिरुपति देवस्थानममें आईएएस सीईओ के बावजूद भगवान को लगने वाले भोग के लड्डुओं में जानवरों की चर्बी पाई गई या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के भंडार में रखी चाँदी गलाने पर 80 फ़ीसदी नक़ली निकली। कोई भक्त तो नक़ली चाँदी चढ़ाएगा नहीं, क्योंकि सोना या चाँदी चढ़ाने की उस पर कोई बाध्यता नहीं होती। जो भक्त चाँदी या सोना चढ़ाता है वो श्रद्धा से चढ़ाता है। ज़ाहिर है कि चढ़ी हुई चाँदी को बदल कर व्यवस्थापकों द्वारा नक़ली चाँदी रखी गई होगी। 


सरकार का काम तो बस इतना होना चाहिए कि देश के बड़े धर्माचार्यों, विशेषकर चारों शंकराचार्यों के निर्देश में मंदिरों के प्रबंधन की एक नियमावली बना दी जाए। जिसमें प्रबंधन की कार्यप्रणाली का विस्तृत ब्योरा हो, साथ ही यह भी स्पष्ट हो कि चढ़ावे की संपत्ति का निस्तारण किस फार्मूले के तहत होगा? कितना धन मंदिर के रख-रखाव पर खर्च होगा? कितना देव विग्रह की सेवा-पूजा और विग्रहों पर खर्च होगा? कितने धन को भविष्य निधि के रूप में बैंकों में जमा कराया जाएगा? कितने धन को मंदिरों के सेवायतों के रख-रखाव पर खर्च किया जाएगा? कितने धन को निर्धन श्रद्धालुओं के भोजन, शिक्षा और इलाज पर खर्च किया जाएगा? और कितने धन को जनसुविधाओं के विस्तार पर खर्च किया जाएगा? इस नियमावली का शब्दशः अनुपालन करने की बाध्यता हर मंदिर की प्रबंध समिति की होनी चाहिए। हर समिति को सालाना ऑडिट कराना और ऑडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक करना अनिवार्य होना चाहिए। 


इसी तरह का प्रारूप मस्जिदों, गुरुद्वारों, चर्चों और अन्य धर्मों के केंद्रों के प्रबंधन के लिए भी बनाया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा नहीं है कि चढ़ावे की चोरी सिर्फ मंदिरों में ही होती है। अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों पर भी ऐसी मानवीय दुर्बलता समय-समय पर सामने आती रहती हैं। अब देखना यह है कि नेता और अफसर व धनलोलुप, ऐश्वर्यशाली तथाकथित संत ऐसी पारदर्शिता को लागू होने देंगे या नहीं?    

Monday, June 29, 2026

पासपोर्ट पर अनावश्यक विवाद !

24 जून 2026 को पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (ट्रैवल डॉक्युमेंट) है, न कि नागरिकता का निर्णायक प्रमाण। इस बयान ने सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया, विपक्षी दलों ने इसे सत्ता पक्ष की ‘नागरिकता राजनीति’ से जोड़ा। जिससे आम नागरिकों के मन में भ्रम और आशंका पैदा हो गई। लाखों पासपोर्ट धारकों ने पूछना शुरू कर दिया, क्या हमारी नागरिकता पर सवाल उठ सकता है? यह विवाद क्यों और कब उठा और क्या यह विवाद खड़ा करना आवश्यक था? इस विवाद की जड़ों को समझें। अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पासपोर्ट की भूमिका का विश्लेषण करेंगे और देखेंगे कि यह बयान वर्तमान भारतीय परिदृश्य में कितना प्रासंगिक या अप्रासंगिक है। साथ ही, यह कैसे अनावश्यक भ्रम पैदा कर रहा है और सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए।


गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज माना जाता है, जो धारक की राष्ट्रीयता (नेशनलिटी) की पुष्टि करता है। वियना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशंस और अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत, पासपोर्ट जारी करने वाला देश यह गारंटी देता है कि धारक उसके क्षेत्र में लौट सकता है। यह दस्तावेज सीमा पार यात्रा, वीजा प्राप्ति और विदेश में सुरक्षा के लिए आवश्यक होता है।


वहीं कई देशों में पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए, अमेरिका में भी पासपोर्ट नागरिकता का प्राथमिक प्रमाण है, लेकिन यह जन्म, वंशानुगतता या प्राकृतिकरण जैसे आधारों पर निर्भर करता है। भारत में भी पासपोर्ट एक्ट, 1967 के तहत पासपोर्ट यात्रा के लिए जारी किया जाता है। विदेश मंत्रालय का बयान इस कानूनी वास्तविकता को दोहराता है। पासपोर्ट नागरिकता नहीं बनाता, बल्कि सरकार की संतुष्टि पर आधारित होता है कि धारक भारतीय नागरिक है।



अंतरराष्ट्रीय रूप से, पासपोर्ट राष्ट्रीयता का प्रतीक है, लेकिन यदि किसी की नागरिकता पर विवाद हो (जैसे आप्रवासन, आतंकवाद या दोहरी नागरिकता के मामले में), तो कोर्ट या सक्षम प्राधिकरण मूल दस्तावेजों: जन्म प्रमाण-पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, प्राकृतिककरण प्रमाण आदि, की जांच करते हैं। भारत में यह स्थिति नई नहीं है; बॉम्बे हाईकोर्ट (2013) और सुप्रीम कोर्ट ने भी यही रुख अपनाया है कि पासपोर्ट अकेला निर्णायक साक्ष्य नहीं है।


भारतीय नागरिकता संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और नागरिकता अधिनियम, 1955 द्वारा निर्धारित होती है। नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिकरण या क्षेत्र समावेशन से प्राप्त होती है। 1987 और 2004 के संशोधनों ने जन्म-आधारित नागरिकता को माता-पिता की नागरिकता पर निर्भर कर दिया। कोई एकल दस्तावेज (पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी या पैन) नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं है।


वर्तमान विवाद का संदर्भ विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) है, जो 16 राज्यों में मतदाता सूचियों की सफाई के लिए चल रही है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट वोटर सूची से बाहर किए गए व्यक्ति के खिलाफ चुनौती के लिए पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि यह यात्रा दस्तावेज है। यह बयान ‘सीएए-एनआरसी’ बहस, ‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ नीति और सीमा सुरक्षा के संदर्भ में आया है।

 

वास्तव में, यह कानूनी रूप से सही है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अपर्याप्त। करोड़ों भारतीय पासपोर्ट धारक दैनिक जीवन में इसे अपनी भारतीयता का सबसे मजबूत प्रतीक मानते हैं। पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन, दस्तावेज जांच और जैवमितीय डेटा के बाद जारी होने वाला दस्तावेज है। सरकार के कई पोर्टल और फॉर्म्स में अक्सर पासपोर्ट को नागरिकता के सबूत के रूप में स्वीकार किया जाता है। विपरीत रूप से देखा जाए तो आम नागरिकों के पास कोई ‘नागरिकता प्रमाण-पत्र’ नहीं होता; यह मुख्य रूप से प्राकृतिककरण या विशेष मामलों में ही जारी किया जाता है।यह बयान इसलिए अप्रासंगिक लगता है क्योंकि भारत में अधिकांश नागरिक जन्म-आधारित हैं। पासपोर्ट जारी करने से पहले गहन जांच होती है। इसे अचानक केवल ‘यात्रा दस्तावेज’ कहकर सरकार ने जनता को यह महसूस कराया कि उनकी भारतीयता ‘कागजी’ है, जबकि वास्तव में यह संवैधानिक अधिकार है।


देख जाए तो यह विवाद अनावश्यक भ्रम का सबसे बड़ा उदाहरण है। आम आदमी सोच रहा है कि क्या उसका पासपोर्ट रद्द हो सकता है या ‘सीएए-एनआरसी’ जैसे अभियानों में इसे नजरअंदाज किया जाएगा? विपक्षी दल इसे मुस्लिम-विरोधी एजेंडे से जोड़ रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष इसे कानूनी स्पष्टीकरण बता रहा है। वहीं सोशल मीडिया की वायरल पोस्ट्स ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे अप्रवासी भारतीय और युवा पीढ़ी में भी आशंका फैली।सवाल उठता है कि आधार, वोटर आईडी आदि भी निर्णायक नहीं हैं, तो क्या सबकी नागरिकता संदिग्ध है? यह सवाल लाखों लोगों के मन में घूम रहा है। परिणामस्वरूप, विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया है। जो दस्तावेज विदेश यात्रा और पहचान के लिए सबसे मजबूत है, उसे ‘अपर्याप्त’ बताकर सरकार ने खुद को घेर लिया है।


पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, यह कानूनी सत्य है, लेकिन संदर्भ से बाहर कहे जाने पर यह भ्रम का कारण बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह यात्रा दस्तावेज है, जबकि भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह पहचान और गर्व का प्रतीक। वर्तमान विवाद अनावश्यक है क्योंकि यह मौजूदा कानूनी ढांचे को दोहराता है, लेकिन जनभावनाओं को नजरअंदाज करता है। सरकार को अब संवाद और स्पष्टता से इस संकट को दूर करना चाहिए। सरकार नागरिकों को आश्वस्त करें कि उनकी भारतीयता संवैधानिक है, न कि किसी दस्तावेज पर निर्भर। ऐसा करने से एक मजबूत, पारदर्शी नागरिकता ढांचा न केवल भ्रम दूर करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर और मजबूत बनाएगा।

Friday, June 26, 2026

चढ़ावा चोरी जघन्य पाप है !

अयोध्या के श्री राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को लेकर रोज़ विस्फोटक खुलासे हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो जांच समिति गठित की है वो अपने उद्देश में कितनी सफल हो पाएगी ये तो उसकी रिपोर्ट देखने के बाद ही पता चलेगा। किंतु एक बात निश्चित है कि भगवान के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन, सोना, चाँदी व जवाहरात आदि की लेशमात्र भी चोरी करना हमारे शास्त्रों में जघन्य अपराध बताया गया है। चूँकि योगी जी सनातन धर्म की ध्वजा संभालने में गर्व महसूस करते हैं इसलिए आशा की जानी चाहिए कि वे इस दान चोरी के सभी आरोपियों को यथासंभव सनातन धर्म के नियमों के अनुसार कठोरतम सज़ा देंगे। 

उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्मशास्त्रों में देवद्रव्य (देवता की संपत्ति) की चोरी को अत्यंत गंभीर पाप माना गया है। मनुस्मृति के अनुसार देवता की संपत्ति (सोना आदि) चोरी पर मृत्यु दंड का प्रावधान है। बृहस्पति स्मृति के अनुसार चोरी किए गए द्रव्य और सोना, रत्न आदि की कीमत का दोगुना जुर्माना भरना पड़ता है या अपराधी को मृत्युदंड दिये जाने का प्रावधान है। गरुड़ पुराण आदि में नरक के वर्णन में चोरों के लिए विशेष यातनाएँ जैसे जलते अंगारों पर चलना, ख़ूँख़ार कुत्तों द्वारा पीछा किए जाना, आदि का वर्णन आता है। चढ़ावा भगवान का होता है, उसे चुराना भगवान से चोरी के समान है। यह कर्म का भारी बोझ बनता है—इस जन्म में अपयश और अगले जन्म में घोर दुख मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि ऐसा पाप क्षमा नहीं होता जब तक पूर्ण प्रायश्चित न हो। तात्पर्य यह है कि श्री राम मंदिर अयोध्या के चढ़ावा चोरी के सभी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए, अन्यथा भक्तों का विश्वास सरकार पर नहीं रहेगा। क्योंकि श्री राम मंदिर के सभी ट्रस्टी सरकार द्वारा मनोनीत हैं, वे अपनी किसी धार्मिक उपलब्धि या सनातन धर्म के ऊँचे पद पर आसीन होने के कारण ट्रस्टी नहीं बनाए गए थे। 


2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश महोदय के अनुरोध पर मैंने मथुरा के दो प्रसिद्ध मंदिरों के रिसीवर का अवैतनिक पद स्वीकार किया। ये थे वृंदावन के श्री बांके बिहारी जी का मंदिर व गोवर्धन की दान घाटी का मंदिर। मंदिर प्रबंधन की चुनौती थी चढ़ावे की राशि का ईमानदारी से आंकलन और उसे बैंक में जमा कराना। इसमें काफी गड़बड़ी की शिकायत आती थी। मंदिर की आमदनी भी बहुत कम थी। एक वरिष्ठ गोस्वामी का फोन आया कि मैं हर महीने चौदह में से दो दान-पात्र अपने लाभ के लिए अलग करवा लूँ। ये सुनकर मुझे बहुत धक्का लगा। लेकिन इसे एक चेतावनी मानकर मैंने एक नई व्यवस्था बनाई। मंदिर के प्रांगण में जहाँ गुल्लकें (दानपत्र) खोली जाती थीं वहाँ वीडियो कैमरे लगवा दिए और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्कता बरतने के लिए वहाँ बिठा दिया। परिणाम यह हुआ कि पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा दानराशि गुल्लकों से निकली, जिसे बैंक में जमा करा दिया गया।


एक और रोचक अनुभव हुआ जो अयोध्या के संदर्भ में बहुत उपयोगी रहेगा। कैसे दानदाता और मंदिर प्रबंधन के बीच बिचौलिए दान का धन हड़प लेते हैं। वृन्दावन के एक प्रतिष्ठित नागरिक हैं, जो काफी धनवान हैं और आजकल एक प्रमुख राजनैतिक दल के नेता भी हैं। एक दिन सुबह वे मेरे घर आये और बोले कि उनके परिचित कलकत्ता के एक सेठ, बिहारी जी मंदिर को मोटी रकम नकद दान देना चाहते हैं। पर वो आपके हाथ में ही पैसा देना चाहते हैं। उन्हें मैं आज शाम को आपके घर लेकर आऊंगा। आप दान ले लेना और उसमें से एक तिहाई रूपये आप रख लेना व एक तिहाई रूपये मुझे दे देना। बाकी मंदिर में जमा करा देना। मैंने उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई। निर्धारित समय पर मंदिर के मैनेजर, अकाउंटेंट और दो बैंकों के कैशियरों को पहले से बुलाकर अपनी कोठी के स्टाफ क्वार्टर में बिठा दिया। दानदाता और उन स्थानीय नेता की मैंने आवभगत की। जब सेठ जी नोटों की गड्डियां बैग से निकालने लगे तो मैंने फौरन मंदिर के स्टाफ को वहीं बुला लिया। यह देख कर वो नेता जी बहुत विचलित हो गए। मंदिर स्टाफ ने जब नोट गिन लिए तो मैंने उन्हें यह सब धनराशि बैंक में जमा कराने को कह दिया और उन्हें तुरंत  ‘गुप्तदान’ की रसीद काट कर दिलवा दी। उस दिन के बाद से ऐसा प्रस्ताव लेकर कोई मेरे पास नहीं आया। श्री राम मंदिर अयोध्या के ट्रस्टीगणों ने अगर पहले दिन से चढ़ावे की व्यवस्था पारदर्शी बनाई होती तो आज उन्हें इतनी बदनामी नहीं झेलनी पड़ती। समाचार पत्रों से पता चल रहा है कि जब से ये चढ़ावा विवाद सामने आया है तब से मंदिर को होने वाली दान की आय एक-तिहाई से भी कम हो गई है। स्पष्ट है कि इस विवाद से सभी सनातन धर्मियों को गहरा आघात लगा है। 


त्रिवेंद्रम के विश्व प्रसिद्ध व दुनिया के सबसे ज़्यादा संपन्न पद्मनाभ स्वामी के मंदिर का उदाहरण पूरे भारत के लिए अनुकरणीय है। इस मंदिर का स्वामित्व वहाँ के राज परिवार के पास है। मंदिर के लॉकरों में लाखों करोड़ रुपये का सोना, चाँदी और जवाहरात जमा है। उल्लेखनीय बात यह है कि सदियों से राज परिवार ने अपनी निज संपत्ति होते हुए भी मंदिर के चढ़ावे में से कभी एक अंश भर भी लेना स्वीकार नहीं किया। हर दिन प्रातः भगवान के प्रथम दर्शन का अधिकार राज परिवार को प्राप्त है। ये परिवार जब हर रोज़ दर्शन करके मंदिर से बाहर निकलता है तो मंदिर के द्वार पर बैठ कर अपने पैर के तलवों पर चिपक गई मंदिर की धूल को अपने हाथों से झाड़ कर वहीं गिरा देता है। तात्पर्य यह है कि भगवान के मंदिर से धूल का कण भी ले जाना उनकी दृष्टि में जघन्य अपराध है। पिछले कुछ दशकों से केंद्र और राज्य सरकारें मंदिरों के अधिग्रहण के प्रति अति-उत्साहित हैं। पर अनुभव बताता है कि इन व्यवस्थाओं में लगाए जाने वाले लोग प्रायः संदेहास्पद आचरण वाले ही होते हैं। ऐसे में सरकारों को इस नीति को त्याग कर मंदिरों का प्रबंधन विरक्त संत महात्माओं या धन्ना सेठों को सौंपना चाहिए जिनकी भगवान में आस्था है और जो दैविक द्रव्य की चोरी को विषपान के समान समझते हैं।  

Monday, June 1, 2026

गौ-माता राष्ट्रीय पशु घोषित हो !

पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजों ने वो कर दिखाया जिसका दशकों से इंतज़ार था। पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने बक़रा ईद पर गौवंश की बलि न चढ़ाने का फ़ैसला किया है। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के मुसलमान संगठनों ने भारत सरकार से गौ-माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग की है। उन्होंने गौ हत्या करने वालों और गौ मांस का निर्यात करने वालों को सख्त सज़ा दिए जाने का क़ानून बनाने की भी माँग की है। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है तब से लगातार गौ हत्या को लेकर गौ रक्षकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आक्रोश व्यक्त किया जाता रहा है। इतना ही नहीं गौ मांस खाने व ले जाने के संदेह में कई बार मुसलमानों पर हिंसक हमले भी किए गए हैं। इस सबसे मुसलमानों के बीच ये संदेश गया है कि हिंदुस्तान में गौ वंश की हत्या को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए उनका ये ताज़ा फ़ैसला और गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग एक समझदारी भरा कदम माना जाना चाहिए। मुस्लिम समाज के नेताओं को यहीं माँग देश के अन्य प्रांतों से भी उठानी चाहिए।   

उल्लेखनीय है कि हमारे पूरे इतिहास में, इस देश के शासकों और आदर्श व्यक्तियों ने गाय की रक्षा और पोषण किया है। राजा पृथु, जिनके नाम पर पृथ्वी को पृथ्वीकहा जाता है, ने पृथ्वी के स्वरूप वाली गाय का दोहन कर पृथ्वी पर अकाल को समाप्त किया और मानवता की रक्षा की। भगवान श्रीकृष्ण एक गोपाल (गाय चराने वाले) थे। अर्जुन ने विराटनगर के युद्ध में गायों की रक्षा के लिए 14 वर्ष का और निर्वासन झेलने का जोखिम उठाना उचित समझा। राजा नहुष को ऋषि च्यवन के जीवन के बराबर पुरस्कार देकर मछुआरों को मुआवजा देना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने उन्हें एक गाय दान कर दी। चोल राजा मनु नीति चोलन ने अपने पुत्र वीधिविदंगन को मार डाला, क्योंकि उसके रथ के पहियों के नीचे एक गाय का बछड़ा कुचल गया था।


मुगल सम्राट अकबर (1556–1605), जहांगीर (1605–1627), और अहमद शाह (1748–1754) ने भी गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाए थे। मैसूर के सुल्तान हैदर अली (1761-82) ने गौ-हत्या को दंडनीय अपराध बनाया, जिसमें अपराधियों के हाथ काटे जाते थे। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में, सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पूरे राज्य में गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने 1857 में गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाया, गोमांस खाने पर रोक लगाई और गाय की हत्या करने वाले किसी भी व्यक्ति को तोप से उड़ाकर सजा देने की घोषणा की।


मराठा, जो सभी धर्मों के प्रति समावेशी और सहिष्णु माने जाते थे, उन्होंने गौ-हत्या को रोकने के लिए व्यापक कदम उठाए और गायों को मारने वालों से कठोरता से निपटा। कई मामलों में उन्हें फाँसी भी दी गई। उन्होंने 1790 के दशक के अंत में बसेन (वर्तमान वसई, महाराष्ट्र) के आसपास नाकेबंदी भी कर दी थी, ताकि गायों की लाशों को बॉम्बे और सलसेट के कसाइयों तक तस्करी से न पहुँचाया जा सके। हिंदू धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज से लेकर आज तक हर संत और सनातन धर्मी गौ वंश की हत्या रोकने की मांग करता आया है। फिर भी रोज़ाना भारत से हज़ारों ट्रक गौ वंश काटने के लिए अवैध रूप से बांग्लादेश भेजा जाता है। आश्चर्य है कि बीएसएफ उसे रोक क्यों नहीं पाती?   


दरअसल गौरक्षा का मुद्दा बिल्कुल धार्मिक नहीं है। यह तो शुद्धतम रूप में लोगों की कृषि, अर्थव्यवस्था और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है। हजारों साल पहले भारत के ऋषियो ने गौवंश के असीमित लाभ जान लिए थे। इसलिए उन्होंने भारतीय समाज में गौवंश को इतना महत्व दिया। अंग्रेज़ शासकों ने बाकायदा रणनीति बनाकर भारतीय गौवंश को पूरी तरह नष्ट करने का अभियान चलाया, जो आज तक चल रहा है। क्योंकि वह जानते थे कि हजारों साल से भारत की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत गौ आधारित कृषि रहा था। बिना गौवंश की हत्या किए भारत और भारतीयों को कमजोर नहीं किया जा सकता था। आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसमें बड़ी होशियारी से पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई। उन्होंने इस तरह की मानसिकता तैयार की कि घर-घर में पलने वाली गाय हमारी उपेक्षा और हीनभावना का शिकार हो गयी। जिससे गाय का दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ सेवन करके हर भारतीय परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान रहता था। आज आम भारतीयों को जीवन के लिए पोषक तत्व प्राप्त नहीं हैं। दूध, दही, घी के नाम पर जो बड़े ब्रांडो के नाम से बेचा जा रहा है, उसमें कितने कीटनाशक, रासायनिक खाद्य और नकली तत्व मिले हैं, इसका अब हिसाब रखना भी मुश्किल है। नतीजा सामने है कि मेडीकल का व्यवसाय हर गली व शहर में तेजी से पनप रहा है।


चिंता और दुख की बात ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन पर जीने वाले कैसे देश के हित में सोच सकते हैं ? वह तो वही लिखेंगे और बोलेंगे, जो उनके कॉरपोरेट आका उन्हें लिखने को कहेंगे। इस लॉबी के खिलाफ देशभक्तो को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। पर हिंसा से नहीं तर्क और प्रमाण के साथ। भारतीय गौवंश की श्रेष्ठता को भारतीय जनमानस के सामने लगातार हर मंच पर इस तरह रखना होगा कि एक बार फिर भारतीय परिवार गौवंश को अपने आंगन में स्थान दे।


गांवों में तो यह आसानी से संभव है, पर दुख की बात है कि वहां भी आज गौवंश की उपेक्षा हो रही है। हमने हमेशा कहा है कि गाय गौशाला में नहीं, बल्कि जब हर घर के आंगन में पलेंगी, तब गौवंश की रक्षा होगी। जिनके पास स्थान का अभाव है, उनकी तो मजबूरी है। पर वह भी भारतीय गौवंश के उत्पादों को सामूहिक रूप से प्रोत्साहन देकर अपने परिवार और समाज का भला कर सकते है। भूटान में हर व्यक्ति सुखी है, क्योंकि उनका जीवन गौ और कृषि आधारित है। उन्हें दुनिया के साथ दौड़ने की इच्छा नहीं है। क्योंकि वह तीव्र औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से परिचित हैं।

फिर भारत क्यों औद्योगीकरण की और ‘बीफ’ निर्यात की अंधी दौड़ में भागना चाहता है, जिसका फल भौतिक प्रगति तो हो सकता है, पर उससे समाज सुखी नहीं होता। बल्कि समाज और ज्यादा असुरक्षित होकर तनाव में आ जाता है। भारत की सनातन संस्कृति सादा जीवन और उच्च विचार को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देती है। इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज हजारों साल से निरंतर जिंदा रहा है। जबकि पश्चिमी समाज ने एक शताब्दी के अंदर ही औद्योगीकरण के नफे और नुकसान, दोनों का अनुभव कर लिया है। अब वह भारतीय जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में भारत को फिर से विश्वगुरू बनना होगा। जो गौ आधारित जीवन और वेद आधारित ज्ञान से ही संभव है। इसमें न तो कोई अतिश्योक्ति है और न ही कोई धर्मांधता। कहीं ऐसा न हो कि सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया।