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Monday, June 29, 2026

पासपोर्ट पर अनावश्यक विवाद !

24 जून 2026 को पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (ट्रैवल डॉक्युमेंट) है, न कि नागरिकता का निर्णायक प्रमाण। इस बयान ने सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया, विपक्षी दलों ने इसे सत्ता पक्ष की ‘नागरिकता राजनीति’ से जोड़ा। जिससे आम नागरिकों के मन में भ्रम और आशंका पैदा हो गई। लाखों पासपोर्ट धारकों ने पूछना शुरू कर दिया, क्या हमारी नागरिकता पर सवाल उठ सकता है? यह विवाद क्यों और कब उठा और क्या यह विवाद खड़ा करना आवश्यक था? इस विवाद की जड़ों को समझें। अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पासपोर्ट की भूमिका का विश्लेषण करेंगे और देखेंगे कि यह बयान वर्तमान भारतीय परिदृश्य में कितना प्रासंगिक या अप्रासंगिक है। साथ ही, यह कैसे अनावश्यक भ्रम पैदा कर रहा है और सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए।


गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज माना जाता है, जो धारक की राष्ट्रीयता (नेशनलिटी) की पुष्टि करता है। वियना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशंस और अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत, पासपोर्ट जारी करने वाला देश यह गारंटी देता है कि धारक उसके क्षेत्र में लौट सकता है। यह दस्तावेज सीमा पार यात्रा, वीजा प्राप्ति और विदेश में सुरक्षा के लिए आवश्यक होता है।


वहीं कई देशों में पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए, अमेरिका में भी पासपोर्ट नागरिकता का प्राथमिक प्रमाण है, लेकिन यह जन्म, वंशानुगतता या प्राकृतिकरण जैसे आधारों पर निर्भर करता है। भारत में भी पासपोर्ट एक्ट, 1967 के तहत पासपोर्ट यात्रा के लिए जारी किया जाता है। विदेश मंत्रालय का बयान इस कानूनी वास्तविकता को दोहराता है। पासपोर्ट नागरिकता नहीं बनाता, बल्कि सरकार की संतुष्टि पर आधारित होता है कि धारक भारतीय नागरिक है।



अंतरराष्ट्रीय रूप से, पासपोर्ट राष्ट्रीयता का प्रतीक है, लेकिन यदि किसी की नागरिकता पर विवाद हो (जैसे आप्रवासन, आतंकवाद या दोहरी नागरिकता के मामले में), तो कोर्ट या सक्षम प्राधिकरण मूल दस्तावेजों: जन्म प्रमाण-पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, प्राकृतिककरण प्रमाण आदि, की जांच करते हैं। भारत में यह स्थिति नई नहीं है; बॉम्बे हाईकोर्ट (2013) और सुप्रीम कोर्ट ने भी यही रुख अपनाया है कि पासपोर्ट अकेला निर्णायक साक्ष्य नहीं है।


भारतीय नागरिकता संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और नागरिकता अधिनियम, 1955 द्वारा निर्धारित होती है। नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिकरण या क्षेत्र समावेशन से प्राप्त होती है। 1987 और 2004 के संशोधनों ने जन्म-आधारित नागरिकता को माता-पिता की नागरिकता पर निर्भर कर दिया। कोई एकल दस्तावेज (पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी या पैन) नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं है।


वर्तमान विवाद का संदर्भ विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) है, जो 16 राज्यों में मतदाता सूचियों की सफाई के लिए चल रही है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट वोटर सूची से बाहर किए गए व्यक्ति के खिलाफ चुनौती के लिए पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि यह यात्रा दस्तावेज है। यह बयान ‘सीएए-एनआरसी’ बहस, ‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ नीति और सीमा सुरक्षा के संदर्भ में आया है।

 

वास्तव में, यह कानूनी रूप से सही है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अपर्याप्त। करोड़ों भारतीय पासपोर्ट धारक दैनिक जीवन में इसे अपनी भारतीयता का सबसे मजबूत प्रतीक मानते हैं। पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन, दस्तावेज जांच और जैवमितीय डेटा के बाद जारी होने वाला दस्तावेज है। सरकार के कई पोर्टल और फॉर्म्स में अक्सर पासपोर्ट को नागरिकता के सबूत के रूप में स्वीकार किया जाता है। विपरीत रूप से देखा जाए तो आम नागरिकों के पास कोई ‘नागरिकता प्रमाण-पत्र’ नहीं होता; यह मुख्य रूप से प्राकृतिककरण या विशेष मामलों में ही जारी किया जाता है।यह बयान इसलिए अप्रासंगिक लगता है क्योंकि भारत में अधिकांश नागरिक जन्म-आधारित हैं। पासपोर्ट जारी करने से पहले गहन जांच होती है। इसे अचानक केवल ‘यात्रा दस्तावेज’ कहकर सरकार ने जनता को यह महसूस कराया कि उनकी भारतीयता ‘कागजी’ है, जबकि वास्तव में यह संवैधानिक अधिकार है।


देख जाए तो यह विवाद अनावश्यक भ्रम का सबसे बड़ा उदाहरण है। आम आदमी सोच रहा है कि क्या उसका पासपोर्ट रद्द हो सकता है या ‘सीएए-एनआरसी’ जैसे अभियानों में इसे नजरअंदाज किया जाएगा? विपक्षी दल इसे मुस्लिम-विरोधी एजेंडे से जोड़ रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष इसे कानूनी स्पष्टीकरण बता रहा है। वहीं सोशल मीडिया की वायरल पोस्ट्स ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे अप्रवासी भारतीय और युवा पीढ़ी में भी आशंका फैली।सवाल उठता है कि आधार, वोटर आईडी आदि भी निर्णायक नहीं हैं, तो क्या सबकी नागरिकता संदिग्ध है? यह सवाल लाखों लोगों के मन में घूम रहा है। परिणामस्वरूप, विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया है। जो दस्तावेज विदेश यात्रा और पहचान के लिए सबसे मजबूत है, उसे ‘अपर्याप्त’ बताकर सरकार ने खुद को घेर लिया है।


पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, यह कानूनी सत्य है, लेकिन संदर्भ से बाहर कहे जाने पर यह भ्रम का कारण बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह यात्रा दस्तावेज है, जबकि भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह पहचान और गर्व का प्रतीक। वर्तमान विवाद अनावश्यक है क्योंकि यह मौजूदा कानूनी ढांचे को दोहराता है, लेकिन जनभावनाओं को नजरअंदाज करता है। सरकार को अब संवाद और स्पष्टता से इस संकट को दूर करना चाहिए। सरकार नागरिकों को आश्वस्त करें कि उनकी भारतीयता संवैधानिक है, न कि किसी दस्तावेज पर निर्भर। ऐसा करने से एक मजबूत, पारदर्शी नागरिकता ढांचा न केवल भ्रम दूर करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर और मजबूत बनाएगा।

Friday, June 26, 2026

चढ़ावा चोरी जघन्य पाप है !

अयोध्या के श्री राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को लेकर रोज़ विस्फोटक खुलासे हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो जांच समिति गठित की है वो अपने उद्देश में कितनी सफल हो पाएगी ये तो उसकी रिपोर्ट देखने के बाद ही पता चलेगा। किंतु एक बात निश्चित है कि भगवान के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन, सोना, चाँदी व जवाहरात आदि की लेशमात्र भी चोरी करना हमारे शास्त्रों में जघन्य अपराध बताया गया है। चूँकि योगी जी सनातन धर्म की ध्वजा संभालने में गर्व महसूस करते हैं इसलिए आशा की जानी चाहिए कि वे इस दान चोरी के सभी आरोपियों को यथासंभव सनातन धर्म के नियमों के अनुसार कठोरतम सज़ा देंगे। 

उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्मशास्त्रों में देवद्रव्य (देवता की संपत्ति) की चोरी को अत्यंत गंभीर पाप माना गया है। मनुस्मृति के अनुसार देवता की संपत्ति (सोना आदि) चोरी पर मृत्यु दंड का प्रावधान है। बृहस्पति स्मृति के अनुसार चोरी किए गए द्रव्य और सोना, रत्न आदि की कीमत का दोगुना जुर्माना भरना पड़ता है या अपराधी को मृत्युदंड दिये जाने का प्रावधान है। गरुड़ पुराण आदि में नरक के वर्णन में चोरों के लिए विशेष यातनाएँ जैसे जलते अंगारों पर चलना, ख़ूँख़ार कुत्तों द्वारा पीछा किए जाना, आदि का वर्णन आता है। चढ़ावा भगवान का होता है, उसे चुराना भगवान से चोरी के समान है। यह कर्म का भारी बोझ बनता है—इस जन्म में अपयश और अगले जन्म में घोर दुख मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि ऐसा पाप क्षमा नहीं होता जब तक पूर्ण प्रायश्चित न हो। तात्पर्य यह है कि श्री राम मंदिर अयोध्या के चढ़ावा चोरी के सभी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए, अन्यथा भक्तों का विश्वास सरकार पर नहीं रहेगा। क्योंकि श्री राम मंदिर के सभी ट्रस्टी सरकार द्वारा मनोनीत हैं, वे अपनी किसी धार्मिक उपलब्धि या सनातन धर्म के ऊँचे पद पर आसीन होने के कारण ट्रस्टी नहीं बनाए गए थे। 


2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश महोदय के अनुरोध पर मैंने मथुरा के दो प्रसिद्ध मंदिरों के रिसीवर का अवैतनिक पद स्वीकार किया। ये थे वृंदावन के श्री बांके बिहारी जी का मंदिर व गोवर्धन की दान घाटी का मंदिर। मंदिर प्रबंधन की चुनौती थी चढ़ावे की राशि का ईमानदारी से आंकलन और उसे बैंक में जमा कराना। इसमें काफी गड़बड़ी की शिकायत आती थी। मंदिर की आमदनी भी बहुत कम थी। एक वरिष्ठ गोस्वामी का फोन आया कि मैं हर महीने चौदह में से दो दान-पात्र अपने लाभ के लिए अलग करवा लूँ। ये सुनकर मुझे बहुत धक्का लगा। लेकिन इसे एक चेतावनी मानकर मैंने एक नई व्यवस्था बनाई। मंदिर के प्रांगण में जहाँ गुल्लकें (दानपत्र) खोली जाती थीं वहाँ वीडियो कैमरे लगवा दिए और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्कता बरतने के लिए वहाँ बिठा दिया। परिणाम यह हुआ कि पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा दानराशि गुल्लकों से निकली, जिसे बैंक में जमा करा दिया गया।


एक और रोचक अनुभव हुआ जो अयोध्या के संदर्भ में बहुत उपयोगी रहेगा। कैसे दानदाता और मंदिर प्रबंधन के बीच बिचौलिए दान का धन हड़प लेते हैं। वृन्दावन के एक प्रतिष्ठित नागरिक हैं, जो काफी धनवान हैं और आजकल एक प्रमुख राजनैतिक दल के नेता भी हैं। एक दिन सुबह वे मेरे घर आये और बोले कि उनके परिचित कलकत्ता के एक सेठ, बिहारी जी मंदिर को मोटी रकम नकद दान देना चाहते हैं। पर वो आपके हाथ में ही पैसा देना चाहते हैं। उन्हें मैं आज शाम को आपके घर लेकर आऊंगा। आप दान ले लेना और उसमें से एक तिहाई रूपये आप रख लेना व एक तिहाई रूपये मुझे दे देना। बाकी मंदिर में जमा करा देना। मैंने उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई। निर्धारित समय पर मंदिर के मैनेजर, अकाउंटेंट और दो बैंकों के कैशियरों को पहले से बुलाकर अपनी कोठी के स्टाफ क्वार्टर में बिठा दिया। दानदाता और उन स्थानीय नेता की मैंने आवभगत की। जब सेठ जी नोटों की गड्डियां बैग से निकालने लगे तो मैंने फौरन मंदिर के स्टाफ को वहीं बुला लिया। यह देख कर वो नेता जी बहुत विचलित हो गए। मंदिर स्टाफ ने जब नोट गिन लिए तो मैंने उन्हें यह सब धनराशि बैंक में जमा कराने को कह दिया और उन्हें तुरंत  ‘गुप्तदान’ की रसीद काट कर दिलवा दी। उस दिन के बाद से ऐसा प्रस्ताव लेकर कोई मेरे पास नहीं आया। श्री राम मंदिर अयोध्या के ट्रस्टीगणों ने अगर पहले दिन से चढ़ावे की व्यवस्था पारदर्शी बनाई होती तो आज उन्हें इतनी बदनामी नहीं झेलनी पड़ती। समाचार पत्रों से पता चल रहा है कि जब से ये चढ़ावा विवाद सामने आया है तब से मंदिर को होने वाली दान की आय एक-तिहाई से भी कम हो गई है। स्पष्ट है कि इस विवाद से सभी सनातन धर्मियों को गहरा आघात लगा है। 


त्रिवेंद्रम के विश्व प्रसिद्ध व दुनिया के सबसे ज़्यादा संपन्न पद्मनाभ स्वामी के मंदिर का उदाहरण पूरे भारत के लिए अनुकरणीय है। इस मंदिर का स्वामित्व वहाँ के राज परिवार के पास है। मंदिर के लॉकरों में लाखों करोड़ रुपये का सोना, चाँदी और जवाहरात जमा है। उल्लेखनीय बात यह है कि सदियों से राज परिवार ने अपनी निज संपत्ति होते हुए भी मंदिर के चढ़ावे में से कभी एक अंश भर भी लेना स्वीकार नहीं किया। हर दिन प्रातः भगवान के प्रथम दर्शन का अधिकार राज परिवार को प्राप्त है। ये परिवार जब हर रोज़ दर्शन करके मंदिर से बाहर निकलता है तो मंदिर के द्वार पर बैठ कर अपने पैर के तलवों पर चिपक गई मंदिर की धूल को अपने हाथों से झाड़ कर वहीं गिरा देता है। तात्पर्य यह है कि भगवान के मंदिर से धूल का कण भी ले जाना उनकी दृष्टि में जघन्य अपराध है। पिछले कुछ दशकों से केंद्र और राज्य सरकारें मंदिरों के अधिग्रहण के प्रति अति-उत्साहित हैं। पर अनुभव बताता है कि इन व्यवस्थाओं में लगाए जाने वाले लोग प्रायः संदेहास्पद आचरण वाले ही होते हैं। ऐसे में सरकारों को इस नीति को त्याग कर मंदिरों का प्रबंधन विरक्त संत महात्माओं या धन्ना सेठों को सौंपना चाहिए जिनकी भगवान में आस्था है और जो दैविक द्रव्य की चोरी को विषपान के समान समझते हैं।  

Monday, June 1, 2026

गौ-माता राष्ट्रीय पशु घोषित हो !

पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजों ने वो कर दिखाया जिसका दशकों से इंतज़ार था। पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने बक़रा ईद पर गौवंश की बलि न चढ़ाने का फ़ैसला किया है। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के मुसलमान संगठनों ने भारत सरकार से गौ-माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग की है। उन्होंने गौ हत्या करने वालों और गौ मांस का निर्यात करने वालों को सख्त सज़ा दिए जाने का क़ानून बनाने की भी माँग की है। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है तब से लगातार गौ हत्या को लेकर गौ रक्षकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आक्रोश व्यक्त किया जाता रहा है। इतना ही नहीं गौ मांस खाने व ले जाने के संदेह में कई बार मुसलमानों पर हिंसक हमले भी किए गए हैं। इस सबसे मुसलमानों के बीच ये संदेश गया है कि हिंदुस्तान में गौ वंश की हत्या को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए उनका ये ताज़ा फ़ैसला और गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग एक समझदारी भरा कदम माना जाना चाहिए। मुस्लिम समाज के नेताओं को यहीं माँग देश के अन्य प्रांतों से भी उठानी चाहिए।   

उल्लेखनीय है कि हमारे पूरे इतिहास में, इस देश के शासकों और आदर्श व्यक्तियों ने गाय की रक्षा और पोषण किया है। राजा पृथु, जिनके नाम पर पृथ्वी को पृथ्वीकहा जाता है, ने पृथ्वी के स्वरूप वाली गाय का दोहन कर पृथ्वी पर अकाल को समाप्त किया और मानवता की रक्षा की। भगवान श्रीकृष्ण एक गोपाल (गाय चराने वाले) थे। अर्जुन ने विराटनगर के युद्ध में गायों की रक्षा के लिए 14 वर्ष का और निर्वासन झेलने का जोखिम उठाना उचित समझा। राजा नहुष को ऋषि च्यवन के जीवन के बराबर पुरस्कार देकर मछुआरों को मुआवजा देना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने उन्हें एक गाय दान कर दी। चोल राजा मनु नीति चोलन ने अपने पुत्र वीधिविदंगन को मार डाला, क्योंकि उसके रथ के पहियों के नीचे एक गाय का बछड़ा कुचल गया था।


मुगल सम्राट अकबर (1556–1605), जहांगीर (1605–1627), और अहमद शाह (1748–1754) ने भी गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाए थे। मैसूर के सुल्तान हैदर अली (1761-82) ने गौ-हत्या को दंडनीय अपराध बनाया, जिसमें अपराधियों के हाथ काटे जाते थे। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में, सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पूरे राज्य में गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने 1857 में गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाया, गोमांस खाने पर रोक लगाई और गाय की हत्या करने वाले किसी भी व्यक्ति को तोप से उड़ाकर सजा देने की घोषणा की।


मराठा, जो सभी धर्मों के प्रति समावेशी और सहिष्णु माने जाते थे, उन्होंने गौ-हत्या को रोकने के लिए व्यापक कदम उठाए और गायों को मारने वालों से कठोरता से निपटा। कई मामलों में उन्हें फाँसी भी दी गई। उन्होंने 1790 के दशक के अंत में बसेन (वर्तमान वसई, महाराष्ट्र) के आसपास नाकेबंदी भी कर दी थी, ताकि गायों की लाशों को बॉम्बे और सलसेट के कसाइयों तक तस्करी से न पहुँचाया जा सके। हिंदू धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज से लेकर आज तक हर संत और सनातन धर्मी गौ वंश की हत्या रोकने की मांग करता आया है। फिर भी रोज़ाना भारत से हज़ारों ट्रक गौ वंश काटने के लिए अवैध रूप से बांग्लादेश भेजा जाता है। आश्चर्य है कि बीएसएफ उसे रोक क्यों नहीं पाती?   


दरअसल गौरक्षा का मुद्दा बिल्कुल धार्मिक नहीं है। यह तो शुद्धतम रूप में लोगों की कृषि, अर्थव्यवस्था और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है। हजारों साल पहले भारत के ऋषियो ने गौवंश के असीमित लाभ जान लिए थे। इसलिए उन्होंने भारतीय समाज में गौवंश को इतना महत्व दिया। अंग्रेज़ शासकों ने बाकायदा रणनीति बनाकर भारतीय गौवंश को पूरी तरह नष्ट करने का अभियान चलाया, जो आज तक चल रहा है। क्योंकि वह जानते थे कि हजारों साल से भारत की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत गौ आधारित कृषि रहा था। बिना गौवंश की हत्या किए भारत और भारतीयों को कमजोर नहीं किया जा सकता था। आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसमें बड़ी होशियारी से पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई। उन्होंने इस तरह की मानसिकता तैयार की कि घर-घर में पलने वाली गाय हमारी उपेक्षा और हीनभावना का शिकार हो गयी। जिससे गाय का दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ सेवन करके हर भारतीय परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान रहता था। आज आम भारतीयों को जीवन के लिए पोषक तत्व प्राप्त नहीं हैं। दूध, दही, घी के नाम पर जो बड़े ब्रांडो के नाम से बेचा जा रहा है, उसमें कितने कीटनाशक, रासायनिक खाद्य और नकली तत्व मिले हैं, इसका अब हिसाब रखना भी मुश्किल है। नतीजा सामने है कि मेडीकल का व्यवसाय हर गली व शहर में तेजी से पनप रहा है।


चिंता और दुख की बात ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन पर जीने वाले कैसे देश के हित में सोच सकते हैं ? वह तो वही लिखेंगे और बोलेंगे, जो उनके कॉरपोरेट आका उन्हें लिखने को कहेंगे। इस लॉबी के खिलाफ देशभक्तो को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। पर हिंसा से नहीं तर्क और प्रमाण के साथ। भारतीय गौवंश की श्रेष्ठता को भारतीय जनमानस के सामने लगातार हर मंच पर इस तरह रखना होगा कि एक बार फिर भारतीय परिवार गौवंश को अपने आंगन में स्थान दे।


गांवों में तो यह आसानी से संभव है, पर दुख की बात है कि वहां भी आज गौवंश की उपेक्षा हो रही है। हमने हमेशा कहा है कि गाय गौशाला में नहीं, बल्कि जब हर घर के आंगन में पलेंगी, तब गौवंश की रक्षा होगी। जिनके पास स्थान का अभाव है, उनकी तो मजबूरी है। पर वह भी भारतीय गौवंश के उत्पादों को सामूहिक रूप से प्रोत्साहन देकर अपने परिवार और समाज का भला कर सकते है। भूटान में हर व्यक्ति सुखी है, क्योंकि उनका जीवन गौ और कृषि आधारित है। उन्हें दुनिया के साथ दौड़ने की इच्छा नहीं है। क्योंकि वह तीव्र औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से परिचित हैं।

फिर भारत क्यों औद्योगीकरण की और ‘बीफ’ निर्यात की अंधी दौड़ में भागना चाहता है, जिसका फल भौतिक प्रगति तो हो सकता है, पर उससे समाज सुखी नहीं होता। बल्कि समाज और ज्यादा असुरक्षित होकर तनाव में आ जाता है। भारत की सनातन संस्कृति सादा जीवन और उच्च विचार को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देती है। इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज हजारों साल से निरंतर जिंदा रहा है। जबकि पश्चिमी समाज ने एक शताब्दी के अंदर ही औद्योगीकरण के नफे और नुकसान, दोनों का अनुभव कर लिया है। अब वह भारतीय जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में भारत को फिर से विश्वगुरू बनना होगा। जो गौ आधारित जीवन और वेद आधारित ज्ञान से ही संभव है। इसमें न तो कोई अतिश्योक्ति है और न ही कोई धर्मांधता। कहीं ऐसा न हो कि सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया। 

Monday, April 27, 2026

सांसदों का सामूहिक पलायन: लोकतंत्र के लिए चेतावनी !

पिछले सप्ताह आम आदमी पार्टी के सात राजसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भाजपा में स्वतः विलय कर लिया। पार्टी की कुल 10 राजसभा सीटों में से दो-तिहाई से अधिक सांसदों का यह कदम संवैधानिक प्रावधान के तहत लिया गया, जिससे उन्हें अयोग्यता से बचने का रास्ता मिल गया। इनमें से छह पंजाब से चुने गए थे, जबकि एक  दिल्ली से। यह घटना न केवल आम आदमी पार्टी के लिए करारा झटका है, बल्कि पंजाब की सत्तासीन पार्टी के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रही है।


राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि आम आदमी पार्टी अब अपनी मूल विचारधारा से भटक गई है। लेकिन विपक्षी दलों और आम आदमी पार्टी ने इसे भाजपा का ‘ऑपरेशन लोटस’ करार दिया। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘पंजाब के साथ धोखा’ बताया। सवाल यह है कि क्या यह महज व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम है या पंजाब की राजनीति में बड़े बदलाव की शुरुआत?



पंजाब में आम आदमी पार्टी 2022 के विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से सत्ता में आई थी। भगवंत मान सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और रोजगार जैसे क्षेत्रों में कुछ उपलब्धियां गिनाती रही है। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक एक साल पहले यह सामूहिक पलायन पार्टी की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। इन सात सांसदों में चार प्रमुख पंजाबी चेहरे, हरभजन सिंह (क्रिकेटर), अशोक मित्तल (एलपीयू चांसलर), विक्रम साहनी और संदीप पाठक, का जाना न केवल संसदीय ताकत कम करता है बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी कमजोर करता है।



पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वॉरिंग ने पहले ही चेतावनी दी है कि केजरीवाल की पार्टी के 50 विधायकों तक का पलायन हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो पंजाब में सरकार अल्पमत में आ सकती है। भाजपा, जो पंजाब में अभी कमजोर है, को यह घटना बड़ा नैतिक और संगठनात्मक बल प्रदान करेगी। पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्वनी कुमार के अनुसार, यह भाजपा को अकाली दल के साथ गठबंधन की मेज पर मजबूत स्थिति देगा। पंजाब की राजनीति में ‘ऑपरेशन लोटस’ की सफलता से भाजपा की छवि मजबूत होगी और मतदाताओं में यह धारणा बनेगी कि केजरीवाल की पार्टी का ‘अंत’ शुरू हो चुका है।


दूसरी ओर, यह घटना पंजाब के किसान-मजदूर वोट बैंक को भी प्रभावित करेगी। उल्लेखनीय है कि आंदोलन से जन्मीं आम आदमी पार्टी की छवि को भ्रष्टाचार-मुक्त और आम आदमी की पार्टी के रूप में बनाया गया था। अब जब उसके प्रमुख चेहरे भाजपा में शामिल हो रहे हैं, तो जनता में निराशा फैल सकती है। पंजाब की राजनीति पहले से ही कांग्रेस, अकाली दल और आप पार्टी के त्रिकोणीय संघर्ष में फंसी है। इस पलायन से कांग्रेस को भी फायदा हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर विपक्षी एकता टूटने का खतरा बढ़ गया है।


इस घटना ने अन्य विपक्षी दलों, कांग्रेस, टीएमसी, सपा, बसपा आदि को स्पष्ट संदेश दिया है कि भाजपा केंद्र की एजेंसियों का इस्तेमाल कर विपक्ष को तोड़ने की रणनीति पर अडिग है। ‘ऑपरेशन लोटस’ अब सिर्फ कर्नाटक, महाराष्ट्र या हरियाणा तक सीमित नहीं रहा; यह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की जड़ों को हिला रहा है। दलों को समझना होगा कि बिना आंतरिक लोकतंत्र, मजबूत संगठन और वैचारिक स्पष्टता के वे टिक नहीं सकते। आम आदमी पार्टी जैसी युवा पार्टी का टूटना साबित करता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और संसाधनों की कमी पार्टियों को कमजोर बनाती है।


वहीं आम जनता के लिए संदेश और भी गंभीर है। जब भी कोई नेता ईडी/सीबीआई छापे के ठीक बाद पार्टी बदल लेता है, तो लोकतंत्र में विश्वास डगमगाता है। जनता सोचती है कि क्या ये नेता सच्चे सुधारक थे या सत्ता के लालची? पंजाब की जनता, जो पहले ही महंगाई, बेरोजगारी और ड्रग समस्या से जूझ रही है, अब राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो रही है। यह घटना राजनीति को एक ‘धंधा’ साबित करती है, जहां सिद्धांतों की जगह स्वार्थ हावी है। लेकिन एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि जनता अब ज्यादा सजग हो रही है। 2027 के चुनाव में मतदाता इन ‘ट्रैक्टरों’ को याद रखेंगे और वोट से जवाब देंगे।


यह घटना आम आदमी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में सत्ता संभाली, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर संगठन अभी भी कमजोर है। राघव चड्ढा जैसे चेहरे, जो पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता थे, का जाना आंतरिक कलह को उजागर करता है। केजरीवाल की ‘सुप्रीमो’ शैली पर सवाल उठ रहे हैं। अशोक मित्तल पर ईडी के छापे के महज 10 दिन बाद उनका पलायन संदेहास्पद है। यदि पार्टी में सुधार नहीं हुआ, तो दिल्ली में भी ‘डोमिनो इफेक्ट’ शुरू हो सकता है। 


वहीं अन्य दलों के लिए भी यह एक संकेत है। भारतीय राजनीति में ‘माइग्रेशन’ की संस्कृति बढ़ रही है। भाजपा की मजबूत केंद्रीय शक्ति का फायदा उठाकर छोटी पार्टियां टूट रही हैं। यह लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है। जब विपक्ष कमजोर होता है, तो सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता है। यह प्रवृत्ति ‘एक पार्टी प्रभुत्व’ की ओर ले जा रही है, जो बहुलवाद को नुकसान पहुंचाएगी।


चिंता की बात यह है कि यह प्रवृत्ति ईडी/सीबीआई जैसी एजेंसियों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाती है। जब ये संस्थाएं केवल विपक्ष पर सक्रिय नजर आती हैं और सत्ता पक्ष पर चुप रहती हैं, तो जनता में भरोसा कम होता है। यह लोकतंत्र की नींव, ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ को हिला देता है। कुछ मामलों में भ्रष्टाचार सच्चा हो सकता है, लेकिन टाइमिंग संदिग्ध है। इससे राजनीति में ‘कोऑर्शन’ (दबाव) की संस्कृति बढ़ती है। जनता के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सत्ता हासिल करने का यही तरीका है? यह ट्रेंड छोटे दलों को खत्म करने और राष्ट्रपति शासन जैसी स्थितियां पैदा करने का खतरा बढ़ाता है।


आम आदमी पार्टी के सांसदों का भाजपा में विलय स्वस्थ राजनीति को खतरे में डालता है। यह पार्टी की कमजोरियों को उजागर करता है। लेकिन इससे बड़ा सबक यह है कि भारतीय राजनीति में वैचारिक स्थिरता, आंतरिक लोकतंत्र और संस्थागत निष्पक्षता की जरूरत है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब पार्टियां सिद्धांतों पर टिकी रहें, न कि सत्ता के लालच में। यदि यह ट्रेंड जारी रहा, तो ‘आम आदमी’ की पार्टी का सपना ही टूट जाएगा। समय है कि सभी दल, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, आत्मचिंतन करें। अन्यथा, राजनीति सिर्फ ‘ऑपरेशन’ का खेल बनकर रह जाएगी। 

Monday, April 6, 2026

राघव चड्ढा विवाद: लोकतंत्र की परीक्षा या आंतरिक अनुशासन?

हाल ही में आम आदमी पार्टी (आप) के राजसभा सांसद राघव चड्ढा और पार्टी नेतृत्व के बीच खुला विवाद सामने आया। 2 अप्रैल को पार्टी ने राजसभा सचिवालय को पत्र लिखकर चड्ढा को पार्टी के उपनेता पद से हटाने और उनकी जगह पंजाब के सांसद अशोक मित्तल को नियुक्त करने की सूचना दी। साथ ही, पार्टी ने अनुरोध किया कि चड्ढा को पार्टी की ओर से बोलने का समय न दिया जाए। अगले दिन चड्ढा ने ‘साइलेंस्ड, नॉट डिफीटेड’ शीर्षक से एक वीडियो जारी कर जवाब दिया। उन्होंने दावा किया कि वे हमेशा आम आदमी के मुद्दे उठाते रहे, लेकिन पार्टी उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। यह घटना पार्टी के आंतरिक मतभेदों को सार्वजनिक रूप से उजागर करती है और सवाल उठाती है कि क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या सख्त अनुशासन का मामला। 



राघव चड्ढा अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाते थे। लेकिन पिछले एक साल से रिश्तों में दरार दिखने लगी थी। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान चड्ढा विदेश में आंखों की सर्जरी करा रहे थे और पार्टी के कार्यक्रमों में अनुपस्थित रहे। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को हालिया छूट मिलने पर भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई बड़ा बयान नहीं दिया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह अनुशासनहीनता और पार्टी लाइन से विचलन माना गया। वहीं चड्ढा ने संसद में हवाई अड्डों पर महंगे खाने, डिलीवरी पार्टनर्स की समस्याएं, टोल प्लाजा और बैंक चार्जेस, गिग वर्कर्स के अधिकार जैसे मुद्दे उठाए, जिन्हें उन्होंने ‘आम आदमी’ के हितों से जोड़ा। लेकिन पार्टी ने इन्हें ‘सॉफ्ट पीआर’ करार दिया।



आम आदमी पार्टी के नेताओं ने इस विवाद पर बयान भी दिए। सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि चड्ढा बीजेपी से डरते हैं, विरोधी दलों के वॉकआउट में शामिल नहीं होते और पंजाब के मुद्दों पर चुप रहते हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने उन्हें ‘कम्प्रोमाइज्ड’ बताया और कहा कि जब पार्टी एमएसपी या केंद्र से फंडिंग जैसे बड़े मुद्दे उठाती है, तब चड्ढा छोटे-छोटे मुद्दों पर फोकस करते हैं। आतिशी और अनुराग धंडा ने भी यही स्वर दोहराया कि संसद में सीमित समय में ‘समोसे सस्ते’ जैसे विषयों पर बोलना राष्ट्रहित से दूर है। पार्टी का तर्क है कि एक छोटी पार्टी के पास संसद में बोलने का सीमित कोटा होता है, इसलिए उसे केंद्र सरकार के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए, न कि ‘सॉफ्ट’ मुद्दों पर।



इस पर चड्ढा ने अपने वीडियो में इन आरोपों का सीधा जवाब दिया। उन्होंने पूछा, क्या आम आदमी के मुद्दे उठाना अपराध है? मैंने हवाई अड्डे के खाने की महंगाई, गिग वर्कर्स की दुर्दशा, अशुद्ध भोजन और लूटखसोट के मुद्दे उठाए, जिससे आम आदमी को फायदा हुआ। पार्टी को इससे क्या नुकसान हुआ? उन्होंने पार्टी को चेतावनी दी, मेरे मौन को हार मत समझिए। मैं वह नदी हूं जो समय आने पर बाढ़ बन जाती है। यह बयान न केवल व्यक्तिगत दर्द जाहिर करता है, बल्कि पार्टी में असहमति के अधिकार पर भी सवाल खड़ा करता है।



वहीं अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया ने इस विवाद को और भी रंग दिया है। भाजपा ने इसे आम आदमी पार्टी का आंतरिक मामला बताया, लेकिन चड्ढा को बोलने से रोकने को ‘अत्यधिक आपत्तिजनक और तानाशाही’ करार दिया। कांग्रेस ने इसे पार्टी में दरार का सबूत माना। पंजाब कांग्रेस प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारींग ने कहा कि चड्ढा पहले से ही पार्टी से ‘अलग’ दिखते थे, खासकर केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय उनकी अनुपस्थिति को देखते हुए। कुछ कांग्रेस नेताओं का अनुमान है कि चड्ढा पार्टी छोड़कर कहीं और जा सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी पार्टी की एकता पर सवाल उठाए हैं। कुल मिलाकर, विपक्षी दलों ने इस घटना को पार्टी की कमजोरी के रूप में पेश किया है।


कुछ विश्लेषक मानते हैं कि चड्ढा पार्टी की आक्रामक एंटी-बीजेपी रणनीति से सहमत नहीं हैं। वे ज्यादा मुद्दा-आधारित और कम व्यक्तिगत हमले वाले रुख अपनाते रहे, जो आम आदमी पार्टी की मौजूदा जरूरत (केंद्र सरकार पर सीधा हमला) से मेल नहीं खाता। दूसरी अटकल यह है कि चड्ढा की बढ़ती लोकप्रियता और मीडिया कवरेज केजरीवाल के लिए खतरा बन गई। स्वाती मालीवाल जैसी पिछली घटनाओं की घटना की याद दिलाते हुए कुछ राजनैतिक पंडित कहते हैं कि आम आदमी पार्टी में ‘केजरीवाल से ज्यादा चमक’ बर्दाश्त नहीं की जाती। अनुशासन और पंजाब-केंद्रित रणनीति भी एक कारण हो सकता है, क्योंकि चड्ढा पंजाब से सांसद हैं लेकिन पंजाब के बड़े मुद्दों (जैसे एमएसपी) पर कम सक्रिय रहे। कुछ स्रोतों का दावा है कि चड्ढा को बीजेपी ‘प्रमोट’ कर रही है या वे स्वतंत्र रूप से राजनीति करने की सोच रहे हैं। हालांकि, इनमें से कोई भी पुष्टि नहीं हुई है। पार्टी ने इसे ‘रूटीन संगठनात्मक बदलाव’ बताया है, लेकिन टाइमिंग और बोलने पर रोक ने संदेह बढ़ा दिया है।


देखा जाए तो यह एक संसदीय लोकतंत्र में पार्टी अनुशासन बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल है। क्या एक सांसद को पार्टी कोटा से बोलने का अधिकार पार्टी नेतृत्व के विवेक पर निर्भर होना चाहिए? संविधान और संसदीय परंपरा में सांसद पार्टी से कहीं ज़्यादा जनता का प्रतिनिधि है। लेकिन वास्तविकता में व्हिप और पार्टी लाइन बाध्यकारी हैं। आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी जो स्वयं ‘स्वराज’ और पारदर्शिता का नारा देती रही, में यह घटना उसके सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। इसके साथ ही पार्टी की आंतरिक संरचना पर भी कई सवाल उठते हैं। केजरीवाल-केंद्रित पार्टी में असहमति को कैसे हैंडल किया जाता है? पार्टी बनने के समय जो-जो बड़े व चर्चित चेहरे केजरीवाल के साथ थे वे एक-एक करके अलग हुए। अब राघव चड्ढा जैसी घटनाएं पार्टी की ‘एकता’ की छवि को धक्का पहुंचाती हैं।


आम आदमी पार्टी जैसे दलों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत रहने के लिए आंतरिक एकता जरूरी है। चड्ढा जैसे युवा, शिक्षित और मीडिया-सेवी नेता पार्टी की छवि को आधुनिक बनाते थे। उनका साइडलाइन होना युवा नेताओं को निरुत्साहित कर सकता है। चड्ढा ने जो मुद्दे उठाए वे वाकई आम आदमी से जुड़े थे, महंगाई, श्रमिक अधिकार, उपभोक्ता शोषण। लेकिन राजनीति में संसद सीमित समय में प्राथमिकता ‘बड़े राजनीतिक हमले’ को दी जाती है। क्या यह ‘सॉफ्ट’ बनाम ‘हार्ड’ पॉलिटिक्स का टकराव है? दोनों पक्षों में सच्चाई तो है, एक तरफ पार्टी की रणनीतिक जरूरत, दूसरी तरफ संसद को जन-समस्याओं का मंच बनाने का प्रयास।


इस विवाद से भारतीय राजनीति को दो सबक मिलते हैं। पहला, कोई भी पार्टी कितनी भी लोकप्रिय क्यों न हो, आंतरिक लोकतंत्र के बिना टिक नहीं सकती। दूसरा, संसद में सांसदों की आवाज को पार्टी हित से ऊपर रखने की जरूरत है। राघव चड्ढा का भविष्य अनिश्चित है। वे पार्टी में रहकर संघर्ष कर सकते हैं, इस्तीफा दे सकते हैं या स्वतंत्र रूप से जन-मुद्दों पर बोलते रह सकते हैं। पार्टी के लिए यह आत्म-चिंतन का अवसर है। अगर पार्टी अपनी छवि ‘आम आदमी’ की रखना चाहती है, तो उसे अपने सांसदों की जन-केन्द्रित आवाज को दबाने के बजाय मजबूत करना चाहिए। दोनों पक्षों को संयम बरतना चाहिए। जनता देख रही है कि क्या आम आदमी पार्टी अपनी स्थापना के सिद्धांतों पर खरी उतरती है या सत्ता के खेल में फंस जाती है। भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी घटनाएं परीक्षा हैं। उम्मीद है कि यह विवाद संवाद का रास्ता खोलेगा, न कि और विभाजन का। 

Monday, March 30, 2026

आ अब लौट चलें !

जो लोग एक्स (ट्विटर) पर गंभीर विषयों को तलाशते रहते हैं उन्हें पता है कि किस तरह बाजारू शक्तियां हमारे दैनिक जीवन पर शिकंजा कसती जा रही हैं। हमारे खाद्यान, सब्ज़ियाँ, फल व दूध ही नहीं, हमारी दवाईयां और वैक्सीन तक सब पर इन ताकतों का क़ब्ज़ा है। इनका उद्देश्य ना तो हमें स्वस्थ रखना है और ना ही सुखी। अरबों खरबों रुपये का मुनाफा कमाना ही इनका उद्देश्य होता है। इनके लिए हम सब प्रयोगशाला के जानवर हैं, जिनपर ये लगातार खतरनाक परीक्षण करते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ताना-बना इस तरह बुना जाता है कि दुनिया के तमाम देशों का नेतृत्व इन ताकतों के चंगुल में फसा रहे और अपनी प्रजा के हितों का बलिदान करके भी इनके मुनाफ़े बढ़ाने में मदद करे। इन ताकतों का मुख्य केंद्र है अमरीका। ये सर्वविदित है कि अमरीका की शस्त्र उद्योग लॉबी अमरीकी शासकों को मोहरा बना कर दुनिया भर में युद्ध करवाती रहती है। जिससे उसका माल बिकता रहे। इन ताकतों के आगे अमरीका का सभ्य और सुसंस्कृत समाज भी लाचार है। ‘एपस्टीन फाइल्स’ में जिस क्रूर, पाशविक प्रवृत्तियों का खुलासा हुआ है उसके बाद अमरीका के तमाम मशहूर बड़े लोग जेल के सीखचों के पीछे होने चाहिए थे, पर वहाँ ऐसा नहीं हो रहा। गोस्वामी तुलसीदास जी लिख गए हैं कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं। 



जिस तरह के संकट और महामारियां अब लगातार हमारे जनजीवन पर बार-बार हमला करने लगी हैं, उससे यह स्पष्ट है कि हमारा और हमारी अगली पीढ़ियों का भविष्य अंधकार मय है। राष्ट्र का ‘सकल घरेलू उत्पादन’ या आर्थिक वृद्धि की दर उस राष्ट्र के लोगों के सुखी और स्वस्थ होने का पैमाना नहीं होते। ये आंकड़े उन्हें मुट्ठी भर लोगों को हर्षित करते हैं जो देश के तीन चौथाई संसाधनों पर क़ब्ज़ा किए बैठे हैं। अगर लोगों की खुशहाली देखना है तो हमें पड़ोसी देश भूटान की ओर रूख करना पड़ेगा। जो अपनी प्रगति को ‘सकल घरेलू उत्पादन’ के पैमाने पर नहीं बल्कि ‘सकल घरेलू उल्लास’ (हैप्पीनेस इंडेक्स) के पैमाने पर नापता है। हमें अपने विकास की दिशा और दशा बदलनी चाहिए। देश के 5.5 लाख गांवों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। जिससे आम भारतीय बाजारू शक्तियों के मकड़ जाल से बच कर सुखी और स्वस्थ जीवन जी सके।  



खाड़ी के देशों में चल रहा भयानक युद्ध, उससे निरंतर बढ़ता ऊर्जा संकट और वायु में घुलता ज़हर पूरी दुनिया के लिए हर दिन चिंता बढ़ा रहा है। इसका बुरा असर अर्थव्यवस्था और रोज़गार पर भी पड़ रहा है। समस्या भयावय होती जा रही है। हर घर में अनिश्चितता और हताशा बढ़ने लगी है। कुकिंग गैस पर से निर्भरता हटा कर गोबर के कंडों और लकड़ी पर लौटना पड़ सकता है। क्यों न इस दिशा में एक नई पहल की जाए। सनातन हिन्दू संस्कृति में गाय को माँ माना जाता है। धर्म शास्त्र कहते हैं कि गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है। गाय का दूध, उससे बना दही, छाछ, पनीर व घी स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। देशी गाय के गोबर और मूत्र के गुण वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो चुके हैं। सदियों से हर सनातनी के घर गौ पालन की प्रथा थी। पर शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को बहुत तेज़ी से नष्ट किया है। गौ वंश और कृषि आधारित जीवन आम भारतीय को स्वस्थ और सुखी रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ है। गत 79 वर्षों में हमारी सरकारों ने अगर इस अनुभव का लाभ उठाया होता और आर्थिक विकास के मॉडल को इस तरह दिशा दी होती की गाँव का जीवन आत्मनिर्भर बनता तो शहरीकरण और उससे पैदा हुई हज़ारों चुनौतियाँ आज हमारे सामने मुँह बाय न खड़ी होती। गाँव की लक्ष्मी गाँव में रहती और गाँव का युवा गाँव में ही रोज़गार पाता तो करोड़ों भारतवासियों को गंदी बस्तियों में नारकीय जीवन न जीना पड़ता। 



मुझे लगता है कि अगर गौ रक्षा के मामले में एक नई और समेकित सोच को केंद्र में रखते हुए विकास का मॉडल तैयार किया जाए तो गौ वंश और भूमिहीन परिवारों का बहुत कल्याण हो सकता है। ये कोरी कल्पना नहीं है। इस दिशा में हमने एक छोटा सा प्रयोग 20 बरस पहले मथुरा में करके देखा था। जिसके सकारात्मक परिणाम आए। हम इसे आगे इसलिए नहीं चला पाए क्योंकि हमारी प्राथमिकता ब्रज के कृष्ण कालीन सरोवरों और वनों को बचाने की थी। ये मॉडल बहुत सरल है। देश के हर गांव में चरागाह की काफ़ी भूमि हुआ करती थी। वोटों की राजनीति ने उसकी बंदरबाँट कर दी। फिर भी देश में 10,210,000 हेक्टर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है। जो देश के कुल भौगौलिक क्षेत्र की 3-4 फ़ीसद है। हर गाँव में अनेक भूमिहीन परिवार होते हैं। जिन्हें ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं चला कर, साल के कुछ दिन सरकार रोज़गार देती है। हर ज़िले में और उसके गाँवों में ऐसे तमाम पढ़े-लिखे सक्षम नौजवान हैं जो सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं। होना यह चाहिए कि गाँव के भूमिहीन परिवारों की समिति बना कर उन्हें चरागाहों की भूमि पर चारा उगाने के काम में लगाया जाए। ये चारा फिर हर उस भूमिहीन परिवार को दिया जाए जिसे दानदाता और सरकार नक़द दान की जगह स्वस्थ देशी नस्ल की गाय निशुल्क उपलब्ध कराए। ये परिवार चरागाह में मेहनत करके आय प्राप्त करे और मुफ्त के चारे से अपने गौ वंश की सेवा करके उसके दुग्ध उत्पादन से अपने परिवार का पालन-पोषण करे और स्वस्थ जीवन जी सके। आज गाँव बच्चों के मुँह में दूध नहीं जाता। गाँव की छोड़िये देश के महानगरों तक में नकली दूध, घी, पनीर आदि का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। हम शहरी लोग ही दूध के नाम पर अपने बच्चों को ज़हर पिला रहे हैं। आज देश में जितना दूध पैदा हो रहा है उससे कई गुना उसकी खपत है। ऐसे में ये बकाया दूध कहाँ से आ रहा है? 



दूध के नाम पर क्या पिलाया जा रहा है, इसकी चिंता किसी भी सरकार को नहीं है। छापे पड़ते हैं, नक़ली माल पकड़ा जाता है, खबर छपती है और मामले दबा दिए जाते हैं। इसलिए इस पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। हमने जब ये प्रयोग मथुरा में किया तो हमने दानदाताओं से कहा कि वे एक गाँव की चरागाह पर चारा उगाने में आर्थिक मदद करें और किसी को गौ सेवा के नाम पर धन का दान न करें। अपेक्षा के विपरीत हमें ऐसे अनेक उदारमना दानदाता मिल गए और उस गाँव के समर्पित नौजवान भी। जिन्होंने इस प्रयोग को सफल बनाने में सहयोग किया। हमारा प्रयोग तो बहुत छोटे स्तर का था। पर आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर और अमरीका में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोटे वेतन की नौकरियां छोड़ कर कुछ नौजवान मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने हज़ारों ग़रीबों की ज़िंदगी खुशहाल बना दी और इस प्रक्रिया से उत्पन्न गोबर की खाद से बंजर पड़ी ज़मीनों में फलों के बड़े-बड़े बगीचे लगा दिए हैं। शुरू में उनका उपहास करने वाले और उनके रास्ते में रोड़े अटकाने वाले ताक़तवर लोग, नेता और अफसर अब उनके सामने हथियार डाल चुके हैं और उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। आवश्यकता है एक ईमानदार और उदार सोच की।
  

Monday, January 5, 2026

नेताओं की भाषा का गिरता स्तर चिंताजनक 

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके नेताओं की गरिमा और संवाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में, राजनीतिक भाषणों व बयानों में अभद्र टिप्पणियां व असंसदीय भाषा, गाली-गलौज का बढ़ता प्रयोग एक गंभीर मुद्दा बन गया है। यह न केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित है, बल्कि चुनावी रैलियों, मीडिया इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर भी फैल चुका है। यह मुद्दा इतना संवेदनशील बन चुका है कि राजनीतिक दल चाहे कोई भी क्यों न हो उनके बिगड़े बोल, आम नागरिकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और मीडिया पर एक नकारात्मक प्रभाव  डालते हैं। साथ ही, महिलाओं, विपक्षी दलों और पत्रकारों के प्रति नेताओं के दुर्व्यवहार भी आजकल चर्चा में है जो कि इन अमर्यादित नेताओं के सच्चे चरित्र को सामने लाता है।


संसदीय परंपराओं में, असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली होती है। भारतीय संसद में, स्पीकर अक्सर ऐसी भाषा को हटाने का आदेश देते हैं, लेकिन संसद के बाहर ऐसे बयानों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता। राजनीतिक नेता अक्सर विपक्षी नेताओं को 'चोर', 'गद्दार' या इससे भी बदतर शब्दों से संबोधित करते हैं। चुनावी मौसम में यह और तीव्र हो जाता है, जहां व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की जगह ले लेते हैं। गौरतलब है कि कुछ नेताओं की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के युग में यह वायरल होकर लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे समाज पर इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।


भारतीय वोटर या नागरिक अपनी पसंद अनुसार राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं और उन दलों के नेताओं को अपना आदर्श भी मानते हैं। जब नेता सार्वजनिक मंचों पर गाली-गलौज करते हैं, तो यह नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान की भावना को कमजोर करता है। विशेषकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, इससे प्रभावित होती है। वे सोचते हैं कि अगर देश के लोकप्रिय नेता खुले मंचों पर ही ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो सामान्य जीवन में क्या करते होंगे? इससे समाज में असहिष्णुता और हिंसा की संस्कृति पनपती है। उदाहरणस्वरूप, जब कोई नेता विपक्षी को 'कुत्ता' या 'सुअर' जैसे शब्दों से नवाजता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति का अपमान है, बल्कि पूरे लोकतंत्र का मजाक उड़ाता है। नागरिकों में यह धारणा बनती है कि राजनीति एक गंदा खेल है, जहां नैतिकता की कोई जगह नहीं। परिणामस्वरूप, मतदान में उदासीनता बढ़ती है और लोग राजनीति से दूर होते जाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, कई नागरिकों का मानना है कि ऐसी भाषा से राजनीति की विश्वसनीयता घटती है, जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है।


राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करते हैं। जब शीर्ष नेता असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यह कार्यकर्ताओं में भी वैसी ही प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है। चुनावी रैलियों में कार्यकर्ता विपक्षी दलों के खिलाफ नारे लगाते समय अक्सर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो कभी-कभी हिंसक झड़पों में बदल जाता है। इससे दल के अंदर अनुशासनहीनता बढ़ती है और कार्यकर्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में उलझ जाते हैं। इसके अलावा, जब कोई नेता अपनी ही पार्टी के सदस्यों के खिलाफ ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है (जैसे असंतोषी सदस्यों को 'गद्दार' कहना), तो यह आंतरिक कलह को जन्म देता है। पार्टी कार्यकर्ता निराश होते हैं और उनका मनोबल गिरता है। लंबे समय में, यह दलों की एकजुटता को प्रभावित करता है और राजनीतिक स्थिरता को खतरे में डालता है। कार्यकर्ता सोचते हैं कि अगर नेता ही सम्मान नहीं रखते, तो वे क्यों रखें? इससे राजनीतिक संस्कृति में गिरावट आती है।

वहीं मीडिया पर इसका प्रभाव सबसे अधिक चिंताजनक है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो नेताओं से सवाल पूछकर जवाबदेही सुनिश्चित करती है। लेकिन जब पत्रकार तीखे सवाल पूछते हैं, तो कई नेता उन पर व्यक्तिगत हमला करते हैं या अभद्र व्यवहार करते हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेता पत्रकारों को 'पेड मीडिया' या 'दलाल' कहकर अपमानित करते हैं। कभी-कभी यह शारीरिक धमकी तक पहुंच जाता है, जैसे कैमरा छीनना या बाहर निकालना। इससे मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा मंडराता है। पत्रकार डर के मारे सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं, जिससे जनता को सच्ची जानकारी नहीं मिलती। सोशल मीडिया पर नेता पत्रकारों के खिलाफ ट्रोल आर्मी को सक्रिय करते हैं, जो अभद्र टिप्पणियों से उन्हें परेशान करते हैं। यह न केवल मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा को भी खतरे में डालता है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का उल्लेख है, और असंसदीय भाषा इसका एक प्रमुख कारण है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उनके खिलाफ लिंगभेदी टिप्पणियां एक बड़ी समस्या हैं। नेता अक्सर महिला विपक्षी नेताओं की शारीरिक बनावट, कपड़ों या व्यक्तिगत जीवन पर अभद्र टिप्पणियां करते हैं। जैसे 'आइटम' या 'डांस करने वाली' जैसे शब्दों का प्रयोग। यह न केवल महिलाओं का अपमान है, बल्कि पूरे समाज में लिंग असमानता को बढ़ावा देता है। इससे महिला कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है और वे राजनीति में आने से हिचकिचाती हैं। विपक्षी दलों के प्रति भी ऐसी भाषा का प्रयोग आम है। नीतिगत मतभेदों की बजाय, नेता व्यक्तिगत हमलों में उलझ जाते हैं, जैसे परिवार को निशाना बनाना या जाति-धर्म पर टिप्पणियां। इससे राजनीतिक बहस का स्तर गिरता है और समाज में विभाजन बढ़ता है। पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का जिक्र पहले हो चुका है, लेकिन महिलाओं पत्रकारों के साथ यह और गंभीर होता है, जहां लिंगभेदी टिप्पणियां जोड़ी जाती हैं।

यह सब देखकर लगता है कि भारतीय राजनीति में सभ्यता की कमी एक बड़ी चुनौती है। लेकिन इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सख्त नियम लागू करने चाहिए और बाहर के मंचों पर भी नैतिक दिशानिर्देश। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा न देकर, जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी चाहिए। नागरिकों को भी सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री को शेयर न करके, विरोध जताना चाहिए। राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना चाहिए कि बहस नीतियों पर हो, न कि व्यक्तिगत हमलों पर। महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाए जा सकते हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून सख्त किए जाएं।

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असंसदीय भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, तो राजनीतिक बयानों व भाषणों को सभ्य बनाना होगा। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया सब मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में चमकेगा।