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Monday, August 10, 2026

लोकतंत्र में प्रदर्शन, विरोध और सरकार की ज़िम्मेदारी !

लोकतंत्र में प्रदर्शन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को सत्ता तक पहुँचाने का संवैधानिक अधिकार है। भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(ए) और (बी) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है। जब व्यवस्था में असंतोष बढ़ता है, नौकरियाँ नहीं मिलतीं, परीक्षाओं में गड़बड़ी होती है या भ्रष्टाचार पनपता है, तो युवा सड़कों पर उतरते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन में असामाजिक तत्व घुसपैठ कर लेते हैं और हिंसा भड़काते हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह असली प्रदर्शनकारियों की रक्षा करे और तोड़फोड़ करने वालों को अलग करे। लेकिन अक्सर प्रशासन या तो अत्यधिक बल का इस्तेमाल करता है या फिर पूरी तरह लापरवाह रहता है। परिणामस्वरूप, शांतिपूर्ण आवाज़ दब जाती है और असामाजिक तत्व हावी हो जाते हैं।



2026 में भारत में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में जेन-ज़ी प्रदर्शन ने इस पूरे समीकरण को नया रूप दिया। यह आंदोलन सोशल मीडिया की एक व्यंग्यात्मक पोस्ट से शुरू हुआ। जब भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहा, तो अभिजीत दिपके नाम के युवक ने ‘अगर सारे कॉकरोच इकट्ठा हो जाएँ’ जैसी पोस्ट डाली, जिससे हजारों युवा जुड़ गए। जल्द ही यह आंदोलन नीट परीक्षा लीक और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं के खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन बन गया। दिल्ली के जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना, संसद की ओर मार्च, मीम्स, रील और इंस्टाग्राम की भाषा ने पारंपरिक विरोध को चुनौती दी। पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, सैकड़ों घायल हुए, लेकिन युवा शांति बनाए रखने पर अड़े रहे। अंत में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी सरकार के 12 वर्षों में दूसरी बार सार्वजनिक दबाव से किसी कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा था।



गौरतलब है कि इस नई प्रवृत्ति के चलते अब प्रदर्शन सिर्फ झंडे और नारे नहीं, बल्कि डिजिटल संगठित प्रतिरोध हैं। जेन-ज़ी ने व्हाट्सऐप के बजाय इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स और वायरल वीडियो का इस्तेमाल किया। वे पारंपरिक राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखते हुए भी बड़े पैमाने पर जुट सके। यह आंदोलन बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और भविष्य की अनिश्चितता का प्रतीक बन गया। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों में जेन-ज़ी आंदोलनों ने सरकारें गिराईं, लेकिन भारत में यह अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। फिर भी, पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें वायरल होकर आंदोलन को और ताकत दे गईं। यह साबित करता है कि आज की युवा पीढ़ी अब चुपचाप नहीं बैठेगी।



प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को सुरक्षित रखना है। ऐसे में जब असामाजिक तत्व प्रदर्शन में घुसते हैं तो वो पत्थरबाजी करते हैं, वाहन जलाते हैं या दुकानों को लूटते हैं। जिससे पूरा आंदोलन बदनाम हो जाता है। प्रशासन अक्सर असली प्रदर्शनकारियों और तोड़फोड़ करने वालों में फर्क नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि लाठीचार्ज सब पर होता है, निर्दोष युवा घायल होते हैं और मीडिया में हिंसा का प्रचार हो जाता है। ऐसे में प्रशासन को पहले से खुफिया जानकारी जुटाकर असामाजिक तत्वों को अलग करना चाहिए था। पुलिस को यह समझना होगा कि बल का अत्यधिक इस्तेमाल सिर्फ नाराजगी बढ़ाता है।



सवाल है कि सरकार को प्रदर्शनों से कैसे निपटना चाहिए? सबसे पहले, संवाद। सरकार को प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत करनी चाहिए। उनकी माँगें सुननी चाहिए और जहाँ संभव हो, समाधान निकालना चाहिए। दूसरा, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति और सुरक्षा सुनिश्चित करना। जंतर मंतर जैसे स्थानों को प्रदर्शन स्थल के रूप में संरक्षित रखना। तीसरा, असामाजिक तत्वों की तुरंत पहचान कर अलग कार्रवाई हो। सीसीटीवी, ड्रोन और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल कर हिंसा फैलाने वालों को पकड़ना, लेकिन निर्दोषों को परेशान न करना। चौथा, सोशल मीडिया पर सकारात्मक संवाद। युवाओं की भाषा में जवाब देना। पाँचवाँ, दीर्घकालिक सुधार। जिस भी समस्या को लेकर प्रदर्शन किया जाता है उसकी व्यवस्था में पारदर्शिता लाना। अगर सरकार सिर्फ दमन करती है तो असंतोष और गहरा होता है। अगर वह सुनती है तो लोकतंत्र मजबूत होता है।


भारत का इतिहास प्रदर्शनों से भरा पड़ा है, जिन प्रदर्शनों से बड़े बदलाव आए हैं। 1974-75 का जेपी आंदोलन भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ था। जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ के नारे ने इंदिरा गांधी सरकार को चुनौती दी। आपातकाल लगा, लेकिन 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था। जंतर मंतर पर अनशन ने लोकपाल कानून बनवाया और आम आदमी पार्टी जैसी नई राजनीति को जन्म दिया। 2012 का निर्भया आंदोलन महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कानून बदलने का कारण बना। आपराधिक कानून में बड़े संशोधन हुए। 2020-21 का किसान आंदोलन तीन कृषि कानूनों को रद्द कराने में सफल रहा। ये आंदोलन साबित करते हैं कि जब जनता एकजुट होती है तो सत्ता को झुकना पड़ता है।


विश्व भर में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। 1789 में फ्रांसीसी क्रांति में बैस्टिल का गिरना आधुनिक लोकतंत्र की नींव बना। 1963 में अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग का ‘आई हैव अ ड्रीम’ भाषण नागरिक अधिकार आंदोलन का प्रतीक बना। 1989 में बर्लिन दीवार गिरने वाले प्रदर्शनों ने पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का अंत किया। दक्षिण कोरिया में 2016-17 का कैंडललाइट आंदोलन राष्ट्रपति को हटाने में सफल रहा। अर्मेनिया में 2018 की वेलवेट क्रांति ने भ्रष्ट शासन को उखाड़ फेंका। ये उदाहरण बताते हैं कि शांतिपूर्ण और संगठित प्रदर्शन लोकतंत्र की रक्षा करते हैं, जबकि हिंसा उसे कमजोर करती है।

आज की चुनौती यह है कि असामाजिक तत्व और राजनीतिक स्वार्थ प्रदर्शनों को अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल न करें। सरकार को भी यह समझना होगा कि युवाओं की आवाज़ को दबाना नहीं, बल्कि सुनना है। सीजेपी आंदोलन ने साबित कर दिया कि जेन-ज़ी अब सिर्फ रील्स नहीं बनाता, वह प्रतिरोध भी करता है। लोकतंत्र में प्रदर्शन अपरिहार्य हैं। प्रशासन की सफलता इस बात में है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की रक्षा करे और असामाजिक तत्वों को अलग करे। अगर सरकार संवाद, पारदर्शिता और सुधार का रास्ता अपनाती है तो प्रदर्शन सहयोग का माध्यम बन सकते हैं। अन्यथा, असंतोष की आग और भड़केगी। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देनी होगी, न कि उसे कुचलना। यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है। 

Monday, December 8, 2025

राजधानी दिल्ली का भविष्य खतरे में! 

सर्वोच्च न्यायालय के ताज़ा आदेश ने दिल्लीवासियों और उनकी भविष्य की पीढ़ियों का जीवन खतरे में डाल दिया है। इस आदेश के अनुसार दिल्ली की सीमा से सटी अरावली पर्वत शृंखला की हरियाली पर दूरगामी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले ने अरावली पर्वतमाला को 100 मीटर की ऊंचाई के आधार पर परिभाषित कर दिया है, जिससे इसके विशाल भाग को कानूनी संरक्षण से बाहर रखा जा रहा है। यह फैसला उत्तर-पश्चिम भारत, ख़ासकर दिल्ली एनसीआर के पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि अरावली न केवल रेगिस्तानीकरण की एकमात्र रोक है, बल्कि यह जल संवर्धन क्षेत्र, प्रदूषण के लिए सिंक, वन्यजीवों के आवास और जन स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अरावली दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। यह थार मरुस्थल से आने वाली धूल और प्रदूषण को रोकती है। अगर अरावली के बड़े हिस्से को संरक्षण से बाहर रखा गया, तो दिल्ली-एनसीआर में धूल तूफान, वायु प्रदूषण और जल संकट बढ़ सकता है। अरावली की चट्टानों में दरारें प्राकृतिक जल संवर्धन के लिए अहम हैं। यहां प्रति हेक्टेयर दो मिलियन लीटर जल संवर्धन की क्षमता है, जिससे पूरे क्षेत्र का भूजल स्तर बना रहता है। इसके अलावा, अरावली विविध वन्यजीवों का आवास है, जिसमें सैकड़ों प्रजातियां शामिल हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को केवल उन्हीं भू-आकृतियों तक सीमित कर दिया है जो स्थानीय स्तर से 100 मीटर ऊंचाई पर हैं। इससे अरावली के लगभग 90% भाग को संरक्षण से बाहर रखा गया है, जिसमें छोटे टीले, ढलानें और बफर क्षेत्र शामिल हैं। यह निर्णय खनन, निर्माण और रियल एस्टेट गतिविधियों के लिए दरवाजे खोल देगा, जिससे जैव विविधता, जल संवर्धन और वायु गुणवत्ता पर गंभीर खतरा होगा। 


सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक संरक्षण के सिद्धांतों के खिलाफ भी जा सकता है। अदालतें पर्यावरणीय न्याय के लिए जानी जाती हैं। लेकिन इस निर्णय से ऐसा लगता है कि व्यावसायिक और विकासात्मक हितों को पर्यावरणीय और सामाजिक हितों पर प्राथमिकता दी जा रही है। यह भविष्य में अन्य पर्यावरणीय मामलों में भी खराब उदाहरण साबित हो सकता है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों की लूट को और बढ़ावा मिल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय भारत के पर्यावरणीय संतुलन को गहराई से प्रभावित करेगा। 


अरावली पर्वतमाला के संरक्षण का मुद्दा न केवल पर्यावरणीय और आर्थिक है, बल्कि यह नैतिक और न्यायिक भी है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 48A और 51A(g) में पर्यावरण संरक्षण का अधिकार और कर्तव्य शामिल है, जिसके तहत राज्य और नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करें। जानकारों के अनुसार इस नए निर्णय से यह जिम्मेदारी और अधिकार कमजोर हो रहा है, क्योंकि अरावली के बड़े हिस्से को संरक्षण से बाहर रखकर इसकी प्राकृतिक संपदा का दोहन आसान हो जाएगा।  

अरावली के आसपास रहने वाले स्थानीय समुदाय, आदिवासी, किसान और ग्रामीण इस पर्वतमाला की सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा आवाज उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि अरावली न केवल उनकी आजीविका का स्रोत है, बल्कि उनकी संस्कृति और पहचान का हिस्सा भी है। अगर इसकी सुरक्षा नहीं होगी, तो इन समुदायों की जीवन शैली, आस्था और भावनाएं भी खतरे में पड़ेंगी। यह निर्णय न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि सामाजिक असमानता और विस्थापन को भी बढ़ावा देगा। 

राजस्थान में जहाँ बादल उठते थे, वहीं अरावली के जंगल उन्हें बरसाते थे। खनन के कारण अरावली का तापमान 3 से 5 डिग्री तक बढ़ जाता है। पहले जयपुर की झालाना डूंगरी में खनन के कारण दोपहर बाद, जयपुर के अन्य हिस्सों की तुलना में, वहाँ का तापमान 1 से 3 डिग्री अधिक रहता था। सर्दियों में भी झालाना का तापमान जयपुर से अलग रहता था।

खनन अरावली की प्रकृति और संस्कृति — दोनों के विरुद्ध है। इससे हमारी पारिस्थितिकी बिगड़ती है। हाँ, कुछ खनन-मालिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, परंतु अधिकतर लोगों को सिलिकोसिस जैसी भयानक बीमारियाँ हो जाती हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ता है और फिर बीमारी के कारण आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगती है।

अरावली की हरियाली ही हमारी अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी का आधार है। जैसे हमारे शरीर का आधार हमारी रीढ़ है, वैसे ही अरावली भारत की रीढ़ है, इसलिए इसकी सुरक्षा आवश्यक है। अरावली को खनन-मुक्त करना ही भारत की समृद्धि का मार्ग है। समृद्धि केवल आर्थिक ढाँचा ही नहीं है; हमारे जीवन-ज्ञान ने हमें 200 वर्ष पूर्व तक 32% जीडीपी तक पहुँचाया था, तब भारत में बड़े पैमाने पर खनन नहीं था। हमारी खेती, संस्कृति और प्रकृति ने ही हमें समृद्ध बनाए रखा था।

अरावली की समृद्धि का ढाँचा खनन में नहीं, बल्कि हरियाली में है। हरियाली से बादल रूठकर बिना बरसे कहीं और नहीं जाते; अरावली में ही अच्छी वर्षा करते हैं। वर्षा का पानी खेतों में खेती करने हेतु रोजगार के अवसर देता है। अरावली के जवानों को अरावली के जल के सहारे खेती-किसानी करने का अवसर मिलेगा।

अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को केवल ऊंचाई पर आधारित करना भू-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गलत है। इसकी वास्तविक पहचान उसकी भू-आकृति, जैव विविधता, जल संवर्धन क्षमता और पारिस्थितिकी तंत्र पर आधारित होनी चाहिए। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि अरावली के छोटे टीले और ढलानें भी जल संवर्धन और वायु गुणवत्ता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन्हें संरक्षण से बाहर रखना पर्यावरणीय विज्ञान के सिद्धांतों के खिलाफ है। अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा न केवल पर्यावरण के लिए खतरनाक है, बल्कि इससे दिल्ली-एनसीआर के लिए जल सुरक्षा, वायु गुणवत्ता और जन स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा होगा। इस फैसले को समीक्षा के लिए तुरंत लाया जाना चाहिए ताकि उत्तर-पश्चिम भारत की जैव विविधता, जल संवर्धन और जन स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

अरावली की सुरक्षा न केवल वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी एक नैतिक दायित्व है। इसकी रक्षा के लिए नागरिक जागरूकता, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, वैज्ञानिक सलाह और नीतिगत समीक्षा जरूरी है। यह सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक, आर्थिक और नैतिक चुनौती है, जिसे हल करने के लिए सभी को एकजुट होना होगा। अरावली की रक्षा भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने के बराबर है, जिसके लिए हर नागरिक को जिम्मेदारी लेनी होगी। 

Monday, October 13, 2025

जल संकट की दस्तक: अब दिल्ली से दूर नहीं

इस वर्ष देश भर में हुई भारी बारिशों और जल प्रलय के बावजूद भारत के शहरी क्षेत्रों में जल संकट अब कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि एक कठोर सच्चाई बन चुका है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु जैसे महानगर, जो आर्थिक प्रगति और आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक हैं, अब जल प्रबंधन की विफलता के गंभीर परिणाम झेल रहे हैं। हाल ही में दिल्ली के वसंत कुंज क्षेत्र में तीन बड़े मॉल और आसपास की कॉलोनियों में पानी की सप्लाई पूरी तरह ठप हो जाने से यह संकट फिर सुर्ख़ियों में आया। इन प्रतिष्ठानों को बंद करने की नौबत इसलिए आ गई है क्योंकि टैंकरों से इनकी जल आपूर्ति रुक गई, जबकि भूजल दोहन (ग्राउंड वॉटर बोरिंग) पर पहले से ही एनजीटी ने प्रतिबंध लगा रखा है। यह स्थिति केवल अस्थायी तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक और नैतिक संकट की ओर संकेत करती है। पिछले सात दशकों में खरबों रुपया जल प्रबंधन पर खर्च किए जाने के बावजूद ऐसा क्यों है? 


दिल्ली जैसे शहर में जहाँ जनसंख्या 2 करोड़ से अधिक है, जल आपूर्ति व्यवस्था लंबे समय से दबाव में है। दिल्ली जल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, शहर में प्रतिदिन करीब 1,000 मिलियन गैलन पानी की मांग है, जबकि उपलब्धता मुश्किल से 850 मिलियन गैलन तक पहुँच पाती है। वसंत कुंज जैसे पॉश इलाकों में भी पिछले कुछ वर्षों से पानी की टंकियों और निजी टैंकरों पर निर्भरता बढ़ी है। परंतु इस बार स्थिति पहले से कहीं अधिक भयावह हो गई क्योंकि प्रशासन ने सुरक्षा और ट्रैफिक कारणों से टैंकरों की आवाजाही पर रोक लगा दी। इस निर्णय का सबसे बड़ा असर व्यापारिक केंद्रों जैसे मॉल्स, रेस्तरां और दुकानों पर पड़ा है। इन मॉल्स में हज़ारों कर्मचारी काम करते हैं और प्रतिदिन लाखों ग्राहक आते हैं; बिना पानी के ऐसी व्यवस्था एक दिन भी नहीं चल सकती। शौचालय, सफाई, भोजनालय, अग्निशमन प्रणाली, सब कुछ जल आपूर्ति पर निर्भर हैं। जब टैंकरों की आपूर्ति रुकी, तो केवल व्यापार ही नहीं, आसपास के आवासीय समाज भी संकट में पड़ गए।



दिल्ली सरकार ने कुछ वर्ष पहले भूजल दोहन पर सख्त प्रतिबंध लगाया था। उद्देश्य यह था कि गिरते जलस्तर को रोका जाए। यह पहल पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक थी, क्योंकि लगातार बढ़ते दोहन ने दिल्ली के अधिकांश क्षेत्रों में भूजल को 300 फीट से भी अधिक नीचे पहुँचा दिया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या वैकल्पिक व्यवस्था पर्याप्त रूप से विकसित की गई?


जब सरकार ने ग्राउंड वॉटर बोरिंग को गैरकानूनी घोषित किया, तब उसे समानांतर रूप से मजबूत टैंकर नेटवर्क, पुनर्चक्रण संयंत्र और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम विकसित करने चाहिए थे। दुर्भाग्यवश, नीतियाँ बनीं पर उनका कार्यान्वयन अधूरा रह गया। परिणामस्वरूप, लोग न तो कानूनी तरीके से पानी निकाल सकते हैं, न सरकारी वितरण पर भरोसा कर सकते हैं। सोचने वाली बात ये है कि यदि जाड़ों में यह हाल है तो गर्मियों में क्या होगा?



दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में पानी की आपूर्ति से जुड़ा टैंकर कारोबार वर्षों से विवादों में रहा है। कई जगह यह सार्वजनिक सेवा से अधिक निजी व्यवसाय बन चुका है। अधिकारियों और टैंकर ठेकेदारों के बीच मिलीभगत के आरोप नए नहीं हैं। दिल्ली में जल आपूर्ति में आई यह हालिया बाधा भी ऐसे ही भ्रष्टाचार की परतें उजागर करती प्रतीत होती है।


त्योहारों के मौसम में जब पानी की मांग बढ़ जाती है, घरों में सजावट, साफ-सफाई और उत्सव आयोजन अधिक होते हैं।ऐसे समय पर टैंकरों की आवाजाही पर प्रतिबंध या ‘तकनीकी समस्या’ का बहाना बना देना संदेह उत्पन्न करता है। कई स्थानीय निवासियों का कहना है कि कुछ जल एजेंसियों ने टैंकरों की उपलब्धता को कृत्रिम रूप से सीमित कर कीमतें बढ़ाने की कोशिश की है। इससे न केवल आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा, बल्कि मॉल्स और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बंद करने की स्थिति आ गई। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का उदाहरण होगा। जल जैसी बुनियादी संपदा के साथ ऐसा बर्ताव किसी नागरिक समाज में अक्षम्य अपराध है।


भारत में जल नीति के कई स्तर हैं। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और नगरपालिका निकाय सब अपने ढंग से काम करते हैं। लेकिन इन सबमें तालमेल का अभाव है। राष्ट्रीय जल नीति (2012) यह कहती है कि हर नागरिक को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण जल मिलेगा, पर छोटे शहरों को तो छोड़ें, दिल्ली जैसे शहरों में भी वास्तविकता इसके उलट है। नगर पालिकाएँ रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की अनिवार्यता घोषित तो करती हैं, पर अधिकांश इमारतों में यह प्रणाली केवल कागज़ों पर मौजूद है। जल पुनर्चक्रण संयंत्रों की क्षमता भी इस संकट का सामना करने के लिए अपर्याप्त है। यमुना का प्रदूषण भी दिल्ली की जल आपूर्ति पर सीधा असर डालता है। यदि यमुना से शुद्ध जल नहीं मिलेगा, तो शहर को बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे राजनीतिक टकराव भी बढ़ते हैं।


हालाँकि नीति-निर्माण और कार्यान्वयन की बड़ी जिम्मेदारी सरकार पर है, नागरिक भी पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं। शहरी समाज में जल का अनावश्यक उपयोग आम बात है। बागवानी में अत्यधिक पानी, कार धोने में व्यर्थ बहाव, और रिसाव की अनदेखी। स्वच्छ भारत मिशन या हर घर जल जैसे अभियानों की सफलता तभी संभव है जब लोग खुद बदलाव का हिस्सा बनें। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और ग्रे-वॉटर रीसाइक्लिंग जैसे उपाय व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर अपनाए जा सकते हैं। मॉल्स और हाउसिंग सोसाइटीज़ में यह व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि टैंकरों पर निर्भरता घटे।


दिल्ली का वर्तमान संकट केवल एक चेतावनी है। आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएँ और बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक़, यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए तो 2030 तक देश के आधे बड़े शहर ‘जल-विहीन’ क्षेत्रों की श्रेणी में आ सकते हैं। इसलिए अब समय है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर दीर्घकालिक रणनीति अपनाएँ। गौरतलब है कि अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी पानी के अभाव के कारण मात्र 15 सालों में ही उजड़ गई थी। महानगरों में वर्षा जल संग्रहण प्रणाली को सख्ती से लागू करना। जल पुनर्चक्रण संयंत्रों की संख्या और क्षमता बढ़ाना। टैंकर संचालन को पारदर्शी और जीपीएस-नियंत्रित बनाना ताकि रिश्वतखोरी पर रोक लगे। यमुना जैसी नदियों की सफाई और पुनर्जीवन को प्राथमिकता देना। पानी की बर्बादी रोकने के लिए सख्त कानून और जनजागरूकता अभियान चलाना। इन कदमों के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जल प्रबंधन केवल संकट आने पर चर्चा का विषय न बने, बल्कि शहरी नियोजन की मूल नीति का हिस्सा हो। 


दिल्ली पर आई जल संकट की दस्तक यह याद दिलाता है कि पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जब-जब हम इसे समझने में चूक करते हैं, तो सभ्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। यदि सरकार और नागरिक समाज अब भी इस संकट को गंभीरता से नहीं लेते, तो ‘जल युद्ध’ भविष्य का नहीं, वर्तमान का शब्द बन जाएगा। जलसंकट का समाधान केवल योजनाओं से नहीं, ईमानदार नीयत और सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। 

 Corruption

Monday, August 19, 2024

क्या पुलिस बलात्कार रोक सकती है?


काम की जगह पर या देश में कभी भी कहीं भी महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ तेज़ी बढ़ती जा रही हैं। विशेषकर छोटी उम्र की बच्चियों का बलात्कार करके उनकी हत्या करने के मामले भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं। हमारे समाज का ये नासूर इतना गहरा है कि पिछले चार-पाँच दिनों में ही देश के अलग-अलग प्रांतों में हुई ऐसी वारदातों को सुनकर आपका कलेजा हिल जाएगा। 


पंजाब में एक युवा अपनी प्रेमिका को भगा करे ले गया तो उसकी प्रेमिका के घरवालों ने उस युवक की बहन के साथ सामूहिक बलात्कार किया। उत्तराखण्ड में एक नर्स अस्पताल से ड्यूटी ख़त्म कर घर जा रही थी तो उसके साथ बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी गई। तमिलनाडू के तंजोर ज़िले में 22 वर्षीय युवती का तीन मित्रों ने सामूहिक बलात्कार किया। उड़ीसा में एक मशहूर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर को दो मरीज़ों के बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। मुंबई के साकी नाका में 3 साल की बच्ची से 9 साल के लड़के ने बलात्कार किया। राजस्थान के जोधपुर में 11 साल की लड़की के साथ उसके पड़ोसी ने उससे बार-बार बलात्कार किया। हरियाणा में बलात्कार और हत्या के आरोपी राम रहीम को हर चुनाव के पहले पैरोल पर रिहा किया जा रहा है। इस तरह वो अब तक 235 दिन की आज़ादी का मज़ा ले चुका है। 



उत्तर प्रदेश में एक बाप ने अपने 13 साल की बेटी के साथ बलात्कार किया। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में एक सरकारी अफ़सर ने दलित लड़की के घर में उससे बलात्कार किया और पुलिस ने एक बुजुर्ग मौलाना को एक बच्ची से बलात्कार से कोशिश करते हुए गिरफ़्तार किया। बिहार में 14 साल की दलित लड़की को सामूहिक बलात्कार के बाद मुज़फ़्फ़रपुर में मार डाला गया। झारखंड में एक स्कूल बस ड्राइवर ने 3 साल की छात्र के साथ बलात्कार किया। कर्नाटक में एक अध्यापक ने 11 साल की बच्ची से बलात्कार की कोशिश की और गिरफ़्तार हुआ। ये सब हादसे पिछले चार पाँच दिनों में हुए हैं। इसके अलावा सैंकड़ों अन्य मामले दबा दिए जाते हैं और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के हज़ारों मामले रोज़ होते हैं। हमारे समाज की ये भयावह तस्वीर सिद्ध करती है कि हम घोर कलयुग में जी रहे हैं।


महिलाओं के साथ बलात्कार की ये सारी वारदातें देश भर में पिछले हफ़्ते में ही हुई हैं। क्या कहीं भी पुलिस या प्रांतीय सरकार इन बलात्कारों को रोक पायी? कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी डॉक्टर से हुई दरिंदगी की खबर ने देश भर में एक बार फिर महिला सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठा दिए हैं। देश भर में मेडिकल के छात्र दिल्ली के निर्भया काण्ड की तर्ज़ पर इस हादसे के खिलाफ सड़क पर उतरे हुए हैं। 



हर कोई पुलिस की नाकामी पर सवाल उठा रहा है। परन्तु सोचने वाली बात यह है कि क्या हमारे देश में इतना पुलिस बल है कि वो देश के हर नागरिक को सुरक्षित रख सकता है? जिस तरह कोलकाता पुलिस ने अपनी सूझबूझ और तत्परता से आरजी कर मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी महिला डॉक्टर के साथ दरिंदगी करने वाले मुख्य अभियुक्त संजय रॉय को हिरासत में लिया वो सराहनीय है। परन्तु इससे यह साबित नहीं होता कि पुलिस अपराध होने से पहले ही घटनास्थल पर पहुँच कर अपराध को रोक सकती थी।


यदि ऐसे अस्पतालों में या ऐसे ही किसी अन्य स्थान, में जहां नाईट शिफ्ट में महिलाओं की कर्मचारी मौजूद होती हैं, वहाँ पर सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त प्रबंध भी किए जाने चाहिए। उल्लेखनीय है कि प्रायः यहाँ पर आपको सीसीटीवी कैमरे लगे ज़रूर दिखाई देंगे। परंतु ये तो अपराध होने के बाद ही सहायक साबित होते हैं। लेकिन ऐसा कुछ होना चाहिए कि यदि इन स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की कंट्रोल रूम में निगरानी होती रहे और कैमरों के साथ एक अलार्म भी लगा हो। कंट्रोल रूम में बैठा सुरक्षाकर्मी किसी भी अप्रिय घटना को देखते ही अलार्म बजाए और तुरंत उस स्थान पर मदद भी पहुँचाए तो ऐसे अपराध होने से पहले रोके जा सकते हैं। ज़रूरत केवल लीक से हट कर सोचने की है। यदि ऐसा होता है तो देश में हज़ारों की तादाद में अस्पतालों, होटलों, स्कूल व कॉलेज में इसका प्रबंधन किया जा सकता है। ऐसा करने से रोज़गार के अतिरिक्त मौक़े भी उत्पन्न होंगे। अपराध पर भी नियंत्रण पाने में आसानी होगी।


कोई पुलिस या प्रशासन बलात्कार रोक नहीं सकता। क्योंकि इतने बड़े मुल्क में किस गांव, खेत, जंगल, कारखाने, मकान या सुनसान जगह बलात्कार होगा, इसका अन्दाजा कोई कैसे लगा सकता है? वैसे भी जब हमारे समाज में परिवारों के भीतर बहू-बेटियों के शारीरिक शोषण के अनेकों समाजशास्त्रीय अध्ययन उपलब्ध हैं तो यह बात सोचने की है कि कहीं हम दोहरे मापदण्डों से जीवन तो नहीं जी रहे? उस स्थिति में हमारे पुरूषों के रवैये में बदलाव का प्रयास करना होगा। जो एक लम्बी व धीमी प्रक्रिया है। समाज में हो रही आर्थिक उथल-पुथल, शहरीकरण, देशी और विदेशी संस्कृति का घालमेल और मीडिया पर आने वाले कामोत्तेजक कार्यक्रमों ने अपसंस्कृति को बढ़ाया है। जहाँ तक पुलिसवालों के खराब व्यवहार का सवाल है, तो उसके भी कारणों को समझना जरूरी है। 1980 से राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रिपोर्ट धूल खा रही है। इसमें पुलिस की कार्यप्रणाली को सुधारने के व्यापक सुझाव दिए गए थे। पर किसी भी राजनैतिक दल या सरकार ने इस रिपोर्ट को प्रचारित करने और लागू करने के लिए जोर नहीं दिया। नतीजतन हम आज भी 200 साल पुरानी पुलिस व्यवस्था से काम चला रहे हैं।


पुलिसवाले किन अमानवीय हालतों में काम करते हैं, इसकी जानकारी आम आदमी को नहीं होती। जिन लोगों को वीआईपी बताकर पुलिसवालों से उनकी सुरक्षा करवायी जाती है, ऐसे वीआईपी अक्सर कितने अनैतिक और भ्रष्ट कार्यों में लिप्त होते हैं, यह देखकर कोई पुलिसवाला कैसे अपना मानसिक संतुलन रख सकता है? समाज में भी प्रायः पैसे वाले कोई अनुकरणीय आचरण नहीं करते। पर पुलिस से सब सत्यवादी हरीशचंद्र होने की अपेक्षा रखते हैं। हममें से कितने लोगों ने पुलिस ट्रेनिंग कॉलेजों में जाकर पुलिस के प्रशिक्षणार्थियों के पाठ्यक्रम का अध्ययन किया है? इन्हें परेड और आपराधिक कानून के अलावा कुछ भी ऐसा नहीं पढ़ाया जाता जिससे ये समाज की सामाजिक, आर्थिक व मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को समझ सकें। ऐसे में हर बात के लिए पुलिस को दोष देने वाले नेताओं और मध्यमवर्गीय जागरूक समाज को अपने गिरेबां में झांकना चाहिए। 

Monday, December 18, 2023

नौजवानों में प्रदूषण से बढ़ता कैंसर का ख़तरा


पाठकों को यह जानकर हैरानी होगी कि देश की राजधानी दिल्ली में रहने वाले हर व्यक्ति के फेंफड़ों में काले रंग के धब्बे मौजूद हैं। जैसे किसी सिगरेट पीने वाले के फेंफड़ों में होते हैं। आश्चर्य और चिंता की बात तो यह है कि दिल्ली में रहने वाले किशोरों में भी यह विकृति पाई जा रही है। यह चौकने वाला खुलासा किया है दिल्ली के मशहूर छाती रोग विशेषज्ञ (चेस्ट सर्जन) डॉ अरविंद कुमार ने। उनका कहना है कि, ‘वे तीन दशकों से अधिक समय से दिल्ली में चेस्ट सर्जरी कर रहे हैं। बीते कुछ वर्षों से उन्होंने ने दिल्ली के मरीज़ों के फेंफड़ों में एक बड़ा बदलाव देखा है। जहां 1988 में अधिकतर फेंफड़ों का रंग गुलाबी होता था वहीं बीते कुछ वर्षों में फेंफड़ों में कई जगह काले-काले धब्बे दिखाई दिये हैं। पहले ऐसे काले धब्बे केवल धूम्रपान करने वालों के फेंफड़ों में ही पाये जाते थे। किंतु अब हर उम्र के लोगों में, जिसमें अधिकतर किशोरों में, ऐसे काले धब्बे पाए जाने लगे हैं, यह बड़ी गंभीर स्थिति है। इन काले धब्बों का सीधा मतलब है कि जो लोग धूम्रपान नहीं करते उनके फेंफड़ों में यह धब्बे विषैला जमाव या ‘टॉक्सिक डिपोज़िट’ है।’ डॉ अरविंद कुमार का कहना है कि ‘फेंफड़ों में इन काले धब्बों के चलते निमोनिया, अस्थमा और फेंफड़ों के कैंसर के मामलों में भी तेज़ी आई है। पहले ऐसी बीमारियाँ अधिकतर 50-60 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों को होती थी। परंतु अब यह पैमाना घट कर 30-40 वर्ष की आयु वर्ग में होने लगा है। पहले के मुक़ाबले महिला रोगियों की तादाद भी बढ़ रही है। इतना ही नहीं महिला मरीज़ों की तादाद चालीस प्रतिशत तक है जिनमें से अधिकतर महिलाएँ धूम्रपान नहीं करतीं हैं। सबसे अहम बात यह है कि 1988 में ऐसे रोगियों में 90 प्रतिशत वह लोग होते थे जो धूम्रपान करते थे। परंतु अब यह आँकड़ा बराबरी का है।’ 



डॉ कुमार बताते हैं कि, ‘जो केमिकल सिगरेट में पाए जाते हैं वही केमिकल आज की हवा में भी हैं। यानी कैंसर के मुख्य कारक माने जाने वाले जो केमिकल सिगरेट के धुएँ में पाये जाते हैं यदि वही केमिकल हमें दूषित हवा में मिलने लगें तो हम धूम्रपान करें या ना करें हमारे फेंफड़ों के अंदर यह ज़हर ख़ुद-ब-ख़ुद प्रवेश कर ही रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि दूषित हवा से हमारे फेंफड़ों में कैंसर होने के आसार भी बढ़ गये हैं। कुछ वर्ष पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी यह माना कि दूषित हवा भी कैंसर का कारण हो सकती है। एक महत्वपूर्ण तर्क देते हुए डॉ अरविंद कुमार ने यह भी बताया कि पहले जब फेंफड़ों के कैंसर के मरीज़ों में इस बीमारी को पकड़ा जाता था तब उनकी उम्र 50-60 के बीच होती थी क्योंकि कैंसर के केमिकल को फेंफड़ों को अपनी गिरफ़्त में लेने के लिए तक़रीबन बीस वर्ष लगते थे। परंतु आज जहां दिल्ली की दूषित हवा का ‘एयर क्वालिटी इंडेक्स’ 500 से अधिक है तो ऐसी दूषित हवा में जन्म लेने वाला हर वो बच्चा इन केमिकल का सेवन पहले ही दिन से कर रहा है, इस ख़तरे का शिकार बन रहा है। आम भाषा में कहा जाए तो दूषित हवा में साँस लेना 25 सिगरेट के धुएँ के बराबर है। तो यदि कोई बच्चा अपने जन्म के पहले ही दिन से ऐसा कर रहा है तो जब तक वो 25 वर्ष की आयु का होगा उसके फेंफड़ों में और धूम्रपान करने वाले के फेंफड़ों में कोई अंतर नहीं होगा। इसीलिए डॉ अरविंद कुमार को इस बात पर कोई अचंभा नहीं होता जब वे कम उम्र के मरीज़ों में फेंफड़ों के कैंसर के लक्षण देखते हैं। उल्लेखनीय है कि जहां दिल्ली में ‘एयर क्वालिटी इंडेक्स’ 500 से अधिक है वहीं लंदन और न्यू यॉर्क में यह आँकड़ा 20 से भी कम है। यह बहुत भयावह स्थिति है चाहे-अनचाहे दिल्ली का हर निवासी इस ज़हरीले गैस चैम्बर में घुट-घुट कर जीने को मजबूर है। हवा के माणकों में 0-50 के बीच एक्यूआई को ‘अच्छा’, 51-100 को ‘संतोषजनक’, 101-200 को ‘मध्यम’, 201-300 को ‘खराब’, 301-400 को ‘बहुत खराब’ और 401-500 को ‘गंभीर’ श्रेणी में माना जाता है।



लगातार चुनाव जीतने की राजनीति में जुटे रहने वाले दल प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दों पर भी आरोप-प्रत्यारोप लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। इस समस्या के हल के लिए केंद्र या राज्य की सरकार कोई ठोस काम नहीं कर रही। पराली जलाने को लेकर इतना शोर मचता है कि ऐसा लगता है कि पंजाब और हरियाणा के किसान ही दिल्ली के प्रदूषण के लिये ज़िम्मेदार हैं। जबकि असली कारण कुछ और है। दिल्ली से निकलने वाले गंदे कचरे, कूड़ा करकट को ठिकाने लगाने का पुख्ता इंतजाम अब तक नहीं हो पाया। सरकार यही सोचने में लगी है कि यह पूरा का पूरा कूड़ा कहां फिंकवाया जाए या इस कूड़े का निस्तार यानी ठोस कचरा प्रबंधन कैसे किया जाए। जाहिर है इस गुत्थी को सुलझाए बगैर जलाए जाने लायक कूड़े को जलाने के अलावा और क्या चारा बचता होगा? इस गैरकानूनी हरकत से उपजे धुंए और जहरीली गैसों की मात्रा कितनी है इसका कोई हिसाब किसी भी स्तर पर नहीं लगाया जा रहा है। 


दिल्ली में 1987 से यह कूड़ा जलाया जा रहा है जिसके लिए पहले डेनमार्क से तकनीकी का आयात किया गया था। पर यह मशीन एक हफ़्ते में ही असफल हो गई क्योंकि इसकी बुनियादी शर्त यह थी कि जलाने से पहले कूड़े को अलग किया जाए और उसमें मिले हुए ज़हरीले पदार्थों को न जलाया जाए। इतनी बड़ी आबादी का देश होने के बावजूद भारतीय प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही इस कदर है कि आजतक कूड़े को छाँट कर अलग करने का कोई इंतज़ाम नहीं हो पाया है। आज दिल्ली में प्रतिदिन 7000 टन मिश्रित कूड़ा ‘इनसिनिरेटर्स’ में जलाया जाता है। जिसे जल्दी ही 10000 टन करने की तैयारी है। इस मिश्रित कूड़े को जलाने से निकलने वाला ज़हरीला धुआँ ही दिल्ली के प्रदूषण का मुख्य कारण है। जबकि इसी मशीन से सिंगापुर में जब कूड़ा जलाया जाता है तो उसमें से ज़हरीला धुआँ नहीं निकलता क्योंकि वहाँ सभी सावधानियाँ बरती जाती हैं। वैसे केवल सरकार को दोष देने से हल नहीं निकलेगा। दिल्ली और देश के निवासियों को अपने दैनिक जीवन में तेज़ी से बढ़ रहे प्लास्टिक व अन्य क़िस्म के पैकेजिंग मैटीरियल को बहुत हद तक घटाना पड़ेगा जिससे ठोस कचरा इकट्ठा होना कम हो जाए। हम ऐसा करें ये हमारी ज़िम्मेदारी है ताकि हम अपने बच्चों के फेंफड़ों को घातक बीमारियों से बचा सकें। मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी ने क्या खूब कहा शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा, कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा। पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था, जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा ।।
 

Monday, October 24, 2022

स्वच्छता अभियान कहाँ अटक गया ?


2014 में जब देश में मोदी जी
  ने सत्ता में आते ही स्वच्छता के प्रति ज़ोर-शोर से एक अभियान छेड़ा था तो सभी को लगा कि जल्द ही इसका असर ज़मीन पर भी दिखेगा। इस अभियान के विज्ञापन पर बहुत मोटी रक़म खर्च की गयी। कुछ ही महीनों में मोदी सरकार की प्राथमिकताएं दिखनी भी शुरू हो गईं। जितनी तीव्रता से इस विचार को सामने लाया गया उससे नई सरकार के योजनाकार भी भौचक्के रह गए। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने सफाई के काम को छोटा सा काम बताया था। पर अब तक का अनुभव बताता है की सफाई का काम उन बड़े-बड़े कामों से कम खर्चीला नहीं है जिनके लिए सरकारें हमेशा पैसा कि कमी का रोना रोते रहे हैं। आज आठ साल बाद भी देश की राजधानी दिल्ली के ही पॉश इलाक़ों तक में पर्याप्त सफ़ाई नहीं दिखती। जगह जगह कूड़े के ढेर  दिखाई दिखते हैं। 


प्रश्न है कि क्या इसके लिए केवल सरकार ज़िम्मेदार है? क्या स्वच्छता के प्रति हम नागरिकों का कोई दायित्व नहीं है? सोचने वाली बात है कि अगर देश की राजधानी का यह हाल है तो देश के बाक़ी हिस्सों में क्या हाल होगा?


देश के 50 बड़े शहरों में साफ़ सफाई के लिए क्या कुछ करने कोशिश नहीं की गई? रोचक बात ये है कि 600 से ज्यादा जिला मुख्यालयों में जिला प्रशासन और स्थानीय प्रशासन अगर वाकई किसी मुद्दे पर आँखें चुराते हुए दिखता है तो वह साफ सफाई का मामला ही है। उधर देश के 7 लाख गावों को इस अभियान से जोड़ने के लिए हम न जाने कितने साल से लगे हैं। यानी कोई कहे कि इतने छोटे से काम पर पहले किसी का ध्यान नहीं गया तो यह बात ठीक नहीं होगी। महत्वपूर्ण बात यह होगी कि इस सार्वभौमिक समस्या के समाधान के लिए व्यवहारिक उपाय ढूंढने के काम पर लगा जाए तो शायद सही दिशा में अच्छे परिणाम आएँगे। इसके लिए नागरिकों और सरकार की सहभागिता के बिना कुछ नहीं होगा। 



गांधी जयन्ती पर केंद्र या राज्य सरकार के तमाम मंत्री किस तरह खुद झाड़ू लेकर सड़कों पर सफाई करते दिखाई देते हैं उससे लगता है कि इस समस्या को कर्तव्यबोध बता कर निपटाने की बात सोची गई थी। यानी हम मान रहे हैं कि नागरिक जब तक अपने आसपास का खुद ख़याल नहीं रखेंगे तब तक कुछ नहीं होगा। इस खुद ख्याल रखने की बात पर भी गौर करना ज़रूरी है।


शोधपरख तथ्य तो उपलब्ध नहीं है लेकिन सार्वभौमिक अनुभव है कि देश के मोहल्लों या गलियों में इस बात पर झगड़े होते हैं कि ‘मेरे घर के पास कूडा क्यों फेंका’? यानी समस्या यह है कि घर का कूड़ा कचरा इकट्ठा करके कहाँ ‘फेंका’ जाए?


निर्मला कल्याण समिति जैसी कुछ स्वयमसेवी संस्थाओं के पर्यीवेक्षण है कि उपनगरीय इलाकों में घर का कूड़ा फेकने के लिए लोगों को आधा किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है। ज़ाहिर है कि देश के 300 कस्बों में लोगों की तलाश बसावट के बाहर कूड़ा फेंकने की है। खास तौर पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का अनुभव यह है कि हमारे बेशकीमती जल संसाधन मसलन तालाब, कुण्ड और कुँए – कूड़ा कचरा फेंकने के खड्ड बन गए हैं। इन नए घूरों और खड्डों की भी अपनी सीमा थी। पर अब हर जगह ये घूरे और कूड़े से पट गए हैं। आने वाले समय में नई चुनौती यह खड़ी होने वाली है कि शहरों और कस्बों से निकले कूड़े-कचरे के पहाड़ हम कहाँ-कहाँ बनाए? उसके लिए ज़मीने कहाँ ढूंढें? दिल्ली जैसे महानगर में भी कूड़ा इकट्ठा करने के स्थान भर चुके हैं और यहाँ भी कूड़ा इकट्ठा करने के लिए नए स्थान खोजे जा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय पूर्वी दिल्ली में बने कूड़े के पहाड़ों को लेकर दिल्ली सरकार की खिंचाई कर रहा है। 


गाँव भले ही अपनी कमज़ोर माली हालत के कारण कूड़े कचरे की मात्रा से परेशान न हों लेकिन जनसँख्या के बढते दबाव के चलते वहां बसावट का घनत्व बढ़ गया है। गावों में तरल कचरा पहले कच्ची नालियों के ज़रिये भूमिगत जल में मिल जाता था। अब यह समस्या है कि गावों से निकली नालियों का पानी कहाँ जाए। इसके लिए भी गावों की सबसे बड़ी धरोहर पुराने तालाब या कुण्ड गन्दी नालियों के कचरे से पट चले हैं।



यह कहने की तो ज़रूरत है ही नहीं कि बड़े शहरों और कस्बों के गंदे नाले यमुना जैसी देश की प्रमुख नदियों में गिराए जा रहे हैं। चाहे विभिन्न प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हों और चाहे पर्यावरण पर काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाएँ – और चाहे कितनी भी चिंतित सरकारें – ये सब गंभीर मुद्रा में ‘चिंता’ करते हुए दिखते तो हैं लेकिन सफाई जैसी ‘बहुत छोटी’ या बहुत बड़ी समस्या पर गम्भीर कोई नहीं दिखता। अगर ऐसा होता तो ठोस कचरा प्रबंधन, औद्योगिक कचरे के प्रबंधन, नदियों व सरोवरों या कुंडों के प्रदूषण स्वच्छता और स्वास्थ्य के सम्बन्ध जैसे विषयों पर भी हमें बड़े अकादमिक आयोजन होते ज़रूर दिखाई देते। 


विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय दिवसों और राष्ट्रीय दिवसों पर सरकारी पैसे से कुछ सेमीनार और शोध सम्मेलन होते ज़रूर हैं। लेकिन उनमें समस्याओं के विभिन्न पक्षों की गिनती से ज्यादा कुछ नहीं हो पाता। ऐसे आयोजनों में आमंत्रित करने के लिए विशेषज्ञों का चयन करते समय लालच यह रहता है कि सम्बंधित विशेषज्ञ संसाधनों का प्रबंध करने में भी थोड़ा बहुत सक्षम हो। और होता यह है कि ऐसे समर्थ विशेषज्ञ पहले से चलती हुई यानी चालु योजना या परियोजना के आगे सोच ही नहीं पाते। जबकि जटिल समस्याओं के लिए हमें नवोन्मेषी मिज़ाज के लोगों की ज़रूरत पड़ती है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थानों, प्रबंधन प्रौद्योगिकी संस्थानों और चिंताशील स्वयंसेवी संस्थाओं के समन्वित प्रयासों से, अपने-अपने प्रभुत्व के आग्रह को छोड़ कर, एक दूसरे से मदद लेकर ही स्वच्छता जैसी बड़ी समस्या का समाधान खोजा जा सकता है। पर हर समस्या को समस्या बनाकर रखने की अभ्यस्त नौकरशाही इस समस्या को भी अपनी लालफ़ीताशाही की फ़ाइलों में क़ैद रखने में ही अपनी कामयाबी समझती है। इसलिये कोई हल नहीं निकल पाता। 


हिमाचल प्रदेश की मनोरम घाटी हों या सागर के रमणीक तट, तेज़ रफ़्तार से दौड़ती रेलगाड़ियों की खिड़की के दोनों ओर की रेल विभाग की ज़मीने, हर ओर कूड़े का विशाल साम्राज्य देख कर कलेजा मुँह को आता है। पश्चिमी देशों की नज़र में भारत सबसे गंदे देशों में से एक है। ये हम सबके लिये शर्म की बात है। हम सबको सोचना और कुछ ठोस करना चाहिये।

Monday, May 31, 2021

सुशील कुमार कांड: टूटना भरोसे का


भारत के ध्वज को अपने कंधे पर गर्व से लिए फ़ोटो में दिखाई देने वाले मशहूर पहलवान सुशील कुमार का नाम पिछले दिनों एक अन्य पहलवान सागर धंकड़ के हत्याकांड से जोड़ा गया और उसकी गिरफ़्तारी भी हुई। असलियत क्या है यह तो जाँच का विषय है। लेकिन यहाँ चाणक्य पंडित की एक बात याद आती है, उनके अनुसार विश्वासघात विष के समान होता है। इस बहुचर्चित हत्याकांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ। यहाँ एक व्यक्ति का दूसरे से नहीं बल्कि गुरु शिष्य परम्परा का विश्वासघात हुआ है।
 


कुश्ती जगत से सम्बंधित किसी भी युवा या वरिष्ठ पहलवान से पूछा जाए तो सुशील कुमार कुश्ती जगत के एक आदर्श के रूप में पूजे जाते रहे हैं। लेकिन इस हत्याकांड में सुशील का नाम आते ही मानो सभी का विश्वास टूट सा गया है। 2008 में ओलम्पिक विजेता बने सुशील कुमार उभरते हुए पहलवानों के आदर्श थे। तभी की बात है कि सागर धंकड़ नाम के दिल्ली के एक युवा पहलवान ने तय कर लिया कि वो भी कुश्ती की शिक्षा लेकर देश का नाम रोशन करेगा। दिल्ली पुलिस के सिपाही के इस बेटे ने सुशील कुमार को अपना गुरु मान लिया और उनसे इस खेल की ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया। 



कुश्ती जगत के लोगों के अनुसार सुशील कुमार जब एक युवा पहलवान था तब वह कुश्ती के प्रति बहुत समर्पित था। उन दिनों वह हर समय अखाड़े में रह कर खूब ट्रेनिंग करता था। उसकी नज़र भी अर्जुन की नज़र की तरह ओलम्पिक के पदक पर ही गढ़ी हुई थी। खूब मेहनत और मशक़्क़त का ही नतीजा है कि उसे 2008 और फिर उसके बाद लगातार कई पदक मिले जिससे कुश्ती के खेल में देश का नाम रोशन हुआ।


मीडिया में सागर की हत्या के पीछे एक मकान के किराए की बात का काफ़ी ज़िक्र हो रहा है। पुलिस के अनुसार सागर दिल्ली के जिस मकान में रह रहा था वह सुशील की पत्नी के नाम था। कुछ महीनों से किराया न दे पाने के कारण इस हत्या को अंजाम दिया गया। ग़ौरतलब है कि पिछले साल से लॉकडाउन के चलते कई ऐसे मकान मालिक हैं जो अपने किराएदारों से किराया देने पर ज़ोर नहीं दे रहे। सागर धंकड़ भी ‘बेरोज़गार’ था, तो वह किराया कहाँ से दे पाता? पर केवल किराया न दे पाने के कारण ही उसकी हत्या कर देना, यह बात गले नहीं उतरती। 


किसी ने ठीक ही कहा है कि शौहरत को पचा पाना बहुत कठिन होता है। सुशील के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। कुश्ती जगत में भारत का नाम कई बार रौशन करने के बाद, एक साधारण परिवार से आए सुशील कुमार एक बेहद ‘सुशील’ व्यक्ति थे। एक बार बाबा रामदेव के बिजवासन फार्म हाउस पर जब वो मुझ से मिला और बाबा ने मेरा परिचय करवाया तो सुशील ने तपाक से मेरे पैर छुए। वो चाहता तो प्रणाम करके भी काम चला लेता। पर ये उसकी विनम्रता ही थी । 


पर शायद उसे अपनी शौहरत बहुत समय तक रास नहीं आई। भारत सरकार के रेल मंत्रालय की नौकरी और फिर दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम के सह निदेशक पद की नौकरी के बावजूद सुना है कि सुशील कुमार ने खुद को कई और धंधों में शामिल कर लिया था। इन धंधों में सबसे ख़तरनाक धंधा था विवादित प्रॉपर्टी में फ़ैसले करवाना। 


यहाँ इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि दिल्ली के पहलवानों का बहुत कम प्रतिशत ऐसे पहलवानों का है जो पहलवानी करने के साथ-साथ दूसरे धंधों में भी शामिल हों। फिर वो चाहे अभिनेताओं के, व्यापारियों के या महंगे होटलों में ‘बाउंसर’ बनना ही क्यों न हो। वे यही करते हैं। ऐसे दूसरे धंधे केवल वही पहलवान करते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। ज़्यादातर पहलवान तो अपनी कुश्ती के अभ्यास में ही लगे रहते हैं और मस्त रहते हैं। वे न तो किसी प्रकार के नशे का सेवन करते हैं और न ही ग़लत संगत में रहते हैं। सुशील कुमार जैसे पहलवान जिसके पास करोड़ों रुपया और शोहरत थी उससे ऐसी उम्मीद शायद ही किसी को होगी ।         


दिल्ली जैसे बड़े शहरों में यह आम बात है कि जब किसी महंगे इलाक़े में कोई मकान, दुकान या फार्म इत्यादि विवादित हो जाते हैं। तो इन विवादों का समाधान या तो राजनैतिक बल या फिर बाहुबल से ही निकलता है। सुशील कुमार के पास ये दोनों बल थे। बस फिर क्या होना था? कुछ लोगों के बहकावे में आने के बाद पिछले कुछ सालों में सुशील ने भी अपने इसी काम का सेटअप चालू कर दिया। 


जानकारों की मानें तो दिल्ली के मॉडल टाउन के जिस मकान से सागर धंकड़ को हत्या वाली रात उठाया गया था, उस विवादित मकान पर पहले सुशील कुमार का ही क़ब्ज़ा था। लेकिन किसी दूसरे गैंग ने उस मकान को अपने क़ब्ज़े में लेकर सागर को उस मकान में रहने के लिए रख दिया था। यह दोनों गैंग के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई थी। जो सागर के लिए जानलेवा बन गई। जिसके बाद गर्व से भारत का ध्वज उठाने वाले सुशील कुमार को अपना मुँह छिपा कर रहने पर मजबूर होना पड़ा। अपनी गिरफ़्तारी से पहले वो कई हफ़्तों तक पुलिस को चकमा देता रहा।


सुशील की गिरफ़्तारी के बाद कई ऐसे तथ्य और सामने आए हैं जिनसे यह साबित होता है कि सुशील का कुख्यात अपराधियों के साथ भी उठना बैठना हो चुका था। वो इस ग़ैरक़ानूनी दुनिया, जिसे आम भाषा में अंडरवर्ल्ड कहा जाता है, का एक अहम हिस्सा बन चुका था। सच्चाई क्या है यह तो समय ही बताएगा। लेकिन जिस तरह से सुशील-सागर के बीच गुरु-शिष्य का भरोसे टूटा, वह सभी के मन में कई सवाल खड़े करता है। ऐसी क्या मजबूरी थी कि सुशील जैसे अंतराष्ट्रीय ख्याति के पहलवान को ये जोखिम भरा कदम उठाना पड़ा? कहावत है कि ‘फलदार पेड़ और गुणवान व्यक्ति ही झुकते हैं, सूखा पेड़ और मूर्ख व्यक्ति कभी नहीं झुकता’। कद्र तो किरदार की होती है, वरना तो कद में साया भी इंसान से बड़ा होता है।

Monday, August 31, 2020

कोरोना महामारी: आगे का सफ़र


पिछले कुछ हफ़्तों में सरकार ने कोरोना से सम्बंधित कई दिशा निर्देश दिए हैं। ख़ासतौर पे भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से दिए गए ‘अनलॉक’ के दिशा निर्देश जिनका पालन सभी राज्य सरकारों को करना अनिवार्य है। लेकिन इन दिशा निर्देशों में प्रत्येक राज्य को अपने राज्य की मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार इनमें संशोधन करने का भी प्रावधान है। अगर किसी राज्य में संक्रमण तेज़ी से बढ़ रहा है तो वहाँ सख़्ती की ज़रूरत है। इसी प्रकार अगर संक्रमण नियंत्रण में है तो छूट भी दी जा रही है। दिल्ली में तो अब मेट्रो रेल को भी सशर्त खोलने की तैयारी है। कारण स्पष्ट है जनता को हो रही असुविधा और मेट्रो को हो रहे करोड़ों के नुक़सान से बचना अनिवार्य हो चुका है। लेकिन सावधानी तो हम सबको ही बरतनी पड़ेगी।
 

पिछले दिनों मई 2020 की एक खबर पढ़ने में आई जिसका आधार अमरीका के मेरीलैंड विश्वविद्यालय के डा फाहिम यूनुस का शोध है। डा यूनुस मेरीलैंड विश्वविद्यालय के संक्रमण रोग विभाग के मुखिया हैं। उनके अनुसार कोरोना के वाइरस से जल्द छुटकारा पाना आसान नहीं है। हां रूस ने इसके इंजेक्शन के ईजाद का दावा ज़रूर किया है लेकिन चीन में जो लोग कोरोना से ठीक हुए थे उनमें से कुछ को कोरोना दोबारा होने की भी खबर है। डा फाहिम के अनुसार हमें इस बीमारी के साथ हंसी ख़ुशी रहने की आदत डाल लेनी चाहिए और नाहक परेशान या घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। 


उनके अनुसार अगर कोरोना का वाइरस हमारे शरीर में प्रवेश कर चुका है तो अत्यधिक पानी पीने से वो बाहर नहीं निकलेगा। हम बस बाथरूम ज़्यादा जाने लगेंगे। 


इस वाइरस पे किसी भी तरह के मौसम का भी असर नहीं होगा। उनकी इस बात पर यक़ीन इसलिए होता है क्योंकि गर्मियों के मौसम में भी कोरोना के मरीज़ों की संख्या विश्वभर में तेज़ी से बढ़ी ही है। 


लगातार हाथ धोने और उचित दूरी बनाए रखने से ही इससे बचा जा सकता है। यदि हमारे घर में कोई भी संक्रमित नहीं है तो हमें बार बार घर की वस्तुओं को डिसइन्फ़ेक्ट करने की भी आवश्यकता नहीं है। 


कोरोना के वाइरस आम फ़्लू की तरह ही होते हैं जो खाने कि वस्तुओं को मंगाने से नहीं फैलते। ठीक उसी तरह जैसे पेट्रोल पम्प और एटीएम आदि पे जाने से संक्रमण नहीं फैलता। बस हाथ धोना और दूरी बनाए रखना अहम है। 


डा यूनुस के अनुसार यदि कोई इससे संक्रमित है और वो स्टीम या सौना लेने के लिए जाता है तो उसके शरीर से वाइरस नहीं निकल सकता। ऐसी कई और एलेर्जी होती हैं जिनके कारण भी इंसान की सूंघने और स्वाद की शक्ति खो जाती है। अभी तक इस लक्षण को इसका एकमात्र कारण नहीं कहा जा सकता। 


कोरोना का वाइरस एक ड्रिप इंफ़ेक्शन है जो केवल निकटता और सम्पर्क में आने से ही फैलता है हवा में नहीं। इसलिए घर में घुसते ही तुरंत कपड़े बदलना और स्नान करना अनिवार्य नहीं है। लेकिन शुद्धि करना एक अच्छी आदत होती है जो हमारे देश में सदियों से चली आ रही है। 


इन दिनों देखा गया है कि जो लोग घर में खाना नहीं बना पाते थे, जैसे कि विद्यार्थी आदि, वो भी मजबूरन खाना बनाने लग गए हैं। लेकिन अगर आप बाज़ार से खाना मँगवाते हैं तो उसे एक बार दोबारा गर्म कर लेना बेहतर रहेगा। 


कोरोना का वाइरस किसी भी धर्म, जाती, लिंग या स्टेटस में भेद नहीं करता ये किसी को भी हो सकता है। यदि आप बाहर से आते हैं तो जूतों को उतारना एक अच्छी आदत है लेकिन वही जूते जो आपने दिन भर पहने हैं और उनसे आपको संक्रमण नहीं हुआ तो जूतों से संक्रमण का कोई लेना देना नहीं है। 


कुछ लोग जो अधिक सावधानी बरतने के लिए दस्ताने पहनते हैं उन्हें भी इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि दस्तानों पे यदि वाइरस आ भी जाता है तो आसानी से जाता नहीं। उन दस्तानों को फेंका ही जाता है। हाथ धोना ही एकमात्र उपाय है जो वाइरस को बहा देता है। इसलिए अपने मुह या आँख को छूने से पहले हाथ अवश्य धोएँ। हाथों को धोने के लिए आम साबुन का प्रयोग ही करें एंटी-बेक्टीरिया साबुन का नहीं क्योंकि कोरोना एक वाइरस है बेक्टीरिया नहीं। 


अपने 20 वर्षों से अधिक अनुभव के चलते डा फाहिम यूनुस ने ये सब हिदायतें दी हैं और कहा है कि हमें सतर्क रहने की ज़रूरत है परेशान रहने की नहीं। 


ये तो डा फाहिम यूनुस के विचार हैं पर जिस तरह अभी हाल में चंडीगढ़ में हरियाणा के मुख्य मंत्री और स्पीकर व अन्य लोगों को कोरोना हुआ है, जिस तरह भारत में कोरोना संक्रमण की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है, जिस तरह चीन में कोरोना से ठीक हो चुके लोगों को ये दोबारा हो रहा है, इस सबसे कोरोना के ख़तरे को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसलिए जो सावधानियाँ सुझाई गई हैं उन्हें गम्भीरता से लेना चाहिए। जहां तक सम्भव हो घर से बाहर न निकलें। किसी को भी स्पर्श करने से बचें। साबुन से हाथ लगातार धोते रहें। घर के बाहर नाक और मुँह को ढक कर रखें। तो काफ़ी हद तक अपनी व औरों की सुरक्षा की जा सकती है। जब तक कोरोना का कोई माकूल इलाज सामने नहीं आता तब तक सावधानी बरतना और भगवत कृपा के आसरे ही जीना होगा।