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Monday, December 29, 2025

बढ़ता धार्मिक पर्यटन और धार्मिक नगरों की चुनौती 

भारत में धार्मिक पर्यटन सदैव से हमारी सांस्कृतिक और आस्था परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रहा है। किंतु पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जिस तीव्र गति से वृद्धि हुई है, उसने धार्मिक नगरों की तस्वीर ही बदल दी है। अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, वृंदावन, उज्जैन, द्वारका, तिरुपति जैसे नगर आज विश्व स्तरीय धार्मिक पर्यटन केंद्रों में बदल चुके हैं। सरकारें भी इसे ‘आस्था से अर्थव्यवस्था’ के सूत्र में जोड़कर पर्यटन को प्रोत्साहन देने के प्रयास में लगी हैं। लेकिन इन प्रयासों के समानांतर कुछ ऐसे प्रश्न भी हैं, जिनसे आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। क्या इस विकास की गति निभाई जा रही है? क्या स्थानीय निवासियों और तीर्थ स्थलों के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखा जा सका है? क्या प्रशासन इतना सक्षम है कि वो त्योहारों और छुट्टियों के समय अतिरिक्त पर्यटकों को संभाल सके?


अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण के बाद देश भर में धार्मिक पर्यटन में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यहाँ प्रतिवर्ष करोड़ों पर्यटक पहुंचेंगे। इसी तरह काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने बनारस की ऐतिहासिक गलियों को व्यवसायिक जीवन दिया है; होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन और हस्तशिल्प उद्योगों को भी नई सांस मिली है। वृंदावन और मथुरा में हर त्योहार अब अंतरराष्ट्रीय आयोजन का रूप ले चुका है। आर्थिक दृष्टि से यह परिवर्तन शुभ संकेत है, रोजगार बढ़े हैं, स्थानीय व्यापार में तेजी आई है और बुनियादी ढाँचे पर निवेश भी हुआ है।

लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इस तेज़ी ने धार्मिक नगरीय संतुलन को डगमगा दिया है। छोटे नगरों की सीमित सड़कों, आवासों और संसाधनों पर अचानक लाखों की भीड़ का दबाव प्रशासन के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। पर्यावरणीय दबाव, कचरा प्रबंधन और जल संकट जैसी समस्याएँ अब इन नगरों के स्थायी साथी बन चुके हैं।


उल्लेखनीय है कि भारत में भीड़ प्रबंधन का ढाँचा अभी भी विकासशील स्तर पर है। चाहे कुंभ मेले का आयोजन हो या अयोध्या में दीपोत्सव, प्रशासनिक तैयारियाँ अक्सर अनुमान से कम पड़ ही जाती हैं। पश्चिमी देशों जैसे इटली, फ्रांस या स्पेन में धार्मिक पर्यटन अत्यधिक संगठित ढंग से संचालित होता है। वेटिकन सिटी या लूर्ड जैसे स्थानों पर पर्यटकों की संख्या भले लाखों में हो, लेकिन वहाँ डिजिटल टिकटिंग, समय-वार प्रवेश प्रणाली, स्पष्ट दिशानिर्देश और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों का जाल पूरी व्यवस्था को सुचारु बनाए रखता है। इन्हीं से प्रेरित हो कर हमारे देश में भी कुछ स्वघोषित गुरुओं के स्थानों पर भी व्यवस्था काफ़ी हद तक सुचारू दिखाई देती है।  


वहीं इसके विपरीत भारत के धार्मिक नगरों में तीर्थयात्रियों का आगमन प्रायः अनियोजित होता है। ट्रेन, बस, सड़कों पर भीड़ एक साथ उमड़ती है जिससे जाम, दुर्घटनाएँ और अव्यवस्था आम हो जाती है। सुरक्षा बलों और प्रशासनिक कर्मचारियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, और अक्सर स्थानीय निवासियों का सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

धार्मिक पर्यटन का यह उभार स्थानीय नागरिकों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। अयोध्या या वाराणसी की गलियों में रहने वाले निवासियों को अब अपने ही घरों तक पहुंचने में कठिनाई होती है। सड़कों पर निरंतर भीड़, बढ़ते वाहन और लगातार चल रहे निर्माण कार्यों ने जीवन-स्तर को प्रभावित किया है। किराए आसमान छू गए हैं, स्थानीय दुकानों की जगह बड़े ब्रांडों ने ले ली है और धार्मिक शांति की जगह अब व्यावसायिक कोलाहल ने ले ली है। धार्मिक नगरों का जो आत्मिक वातावरण कभी लोगों को भीतर तक आस्था से जोड़ता था, वह अब सजावटी प्रकाशों और सेल्फ़ी प्वाइंट्स में खोता जा रहा है। श्रद्धा के स्थलों का ‘पर्यटन स्थल’ में बदल जाना विकास के नाम पर एक सांस्कृतिक ह्रास भी है।


अयोध्या, वाराणसी या वृंदावन जैसे नगरों की आत्मा उनकी प्राचीनता, उनकी पवित्रता और उनके पारंपरिक जीवन में बसती है। लेकिन आज ये नगर तेजी से ‘आधुनिक तीर्थ’ में तब्दील किए जा रहे हैं। चौड़ी सड़कों, चमकीले कॉरिडोर, आधुनिक गेस्टहाउस और मॉल जैसी परियोजनाएं विकास के प्रतीक मानी जा रही हैं। निःसंदेह इनसे सुविधा बढ़ी है, लेकिन इसके साथ-साथ धार्मिक अनुभव का मूल स्वरूप भी धीरे-धीरे बदल गया है।

वह आध्यात्मिक संवेदना, वह साधु-संतों के भजनों की सुगंध और घाटों पर बहती शांति, ये सब अब पर्यटक आकर्षण के दृश्य में सिमट गए हैं। भवनों के रंग, पारंपरिक स्थापत्य और स्थानीय शिल्प को आधुनिक डिज़ाइन ने विस्थापित कर दिया है। यह भीड़ केंद्रित विकास कहीं न कहीं नगरों की ‘आस्था आधारित पहचान’ को बाज़ारीकरण में बदल रहा है।

धार्मिक पर्यटन का बढ़ना अपने आप में बुरा नहीं है। यह सांस्कृतिक एकता, लोक व्यवसाय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब तीर्थस्थलों का विकास केवल संरचनात्मक दृष्टि से किया जाए और उसमें सांस्कृतिक संरक्षण की भावना गायब हो। भारत को पश्चिमी देशों से यह सीखने की जरूरत है कि आध्यात्मिक धरोहर को आधुनिक सुविधाओं के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है।

इसके लिए तीन स्तरों पर ठोस पहल जरूरी है: स्मार्ट प्लानिंग: पर्यटन की पूर्वानुमानित योजना बनाई जाए। डिजिटल टिकटिंग, भीड़ नियंत्रण एप्स और समयबद्ध दर्शनों की व्यवस्था लागू की जाए। स्थानीय सहभागिता: नगर के विकास में स्थानीय निवासियों की राय और सहभागिता सुनिश्चित हो, ताकि विकास उनके जीवन को प्रभावित न करे। सांस्कृतिक संरक्षण: निर्माण कार्यों में पारंपरिक स्थापत्य, स्थानीय कला और जीवन शैली को प्राथमिकता दी जाए, ताकि नगर की आत्मा जीवित रहे।

भारतीय धार्मिक पर्यटन आज देश की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान का नया प्रतीक बन गया है। अयोध्या, काशी, मथुरा, वृंदावन जैसे नगर आस्था की ऊर्जा से भरे हुए हैं, लेकिन उसी आस्था के संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही व्यापक है। यदि हम केवल पर्यटक बढ़ाने पर ध्यान देंगे और तीर्थ के मूल भाव को नजरअंदाज करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन नगरों में केवल चमक देख पाएंगी, वह अनुभूति नहीं, जिसके लिए हमारे पूर्वज तीर्थ यात्रा करते थे। विकास का अर्थ केवल इमारतों का निर्माण नहीं, बल्कि उस भावना को सहेजना है जो हमें भीतर से जोड़ती है। अगर आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच यह संतुलन साध लिया गया, तभी धार्मिक पर्यटन भारत की सांस्कृतिक आत्मा को मजबूत करेगा, न कि उसकी मूल पहचान को मिटाएगा। 

Monday, October 6, 2025

भगदड़: भारत क्यों बार-बार विफल हो रहा है ?

भारत, दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश, जहां धार्मिक उत्सव, राजनीतिक रैलियां और सांस्कृतिक आयोजन में लाखों-करोड़ों लोग एकत्रित होते हैं। वहां भीड़ प्रबंधन की विफलता एक बार फिर से राष्ट्रीय शर्म का कारण बन रही है। हाल के वर्षों में हुई कई भयानक घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि प्रशासनिक लापरवाही, अपर्याप्त योजना और बुनियादी ढांचे की कमी कैसे निर्दोष लोगों की जान ले रही है। सितंबर 2025 में तमिलनाडु के करूर में अभिनेता-नेता विजय की राजनीतिक रैली में 41 लोगों की मौत हो गई, जब देरी से पहुंचे काफिले को देखने के लिए लोग सड़क पर उमड़ पड़े। भगदड़ के हादसों की सूची बहुत लंबी है लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि एक के बाद एक हादसों से हमने क्या सीखा? क्या ऐसे हादसे कभी कम होंगे? 



2024 में उत्तर प्रदेश के हाथरस में भोले बाबा के सत्संग के दौरान हुई भगदड़ में 121 लोगों की मौत हो गई, ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे। यह घटना कार्यक्रम समाप्ति के समय भीड़ के बहाव के कारण हुई, जब लोग बाबा के चरण छूने या उनकी चरण रज लेने के लिए उमड़ पड़े। इसी तरह, 2025 में प्रयागराज के महाकुंभ मेला में 'मौनी अमावस्या' के दिन पवित्र नदी में स्नान के दौरान हुई भगदड़ ने 30 लोगों की जान ले ली और 60 से अधिक घायल हो गए। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि भारत अपनी जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बार-बार असफल हो रहा है। इन घटनाओं पर शासन और प्रशासन इतना गंभीर क्यों नहीं दिखाई देता?


हाल के वर्षों में भारत में भगदड़ की घटनाएं एक चक्रव्यूह की तरह घूम रही हैं। 2024 के दिसंबर में हैदराबाद के संध्या थिएटर में 'पुष्पा 2' फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान हुई भगदड़ में एक महिला की मौत हो गई। 2025 की शुरुआत में आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर में वैकुंठ द्वार दर्शन के टोकन वितरण के समय छह भक्तों की मौत हो गई, जब हजारों लोग टोकन के लिए उमड़ पड़े। फरवरी 2025 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर फुट ओवर ब्रिज पर हुई भगदड़ ने कई जानें लीं। बेंगलुरु में क्रिकेट टीम रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (आरसीबी) की आईपीएल विजय परेड के दौरान 11 लोगों की मौत हुई, जहां प्रशासन ने भीड़ का अनुमान लगाने में चूक की। बिहार के बाबा सिद्धनाथ मंदिर में अगस्त 2024 की भगदड़ में सात मौतें हुईं। ये घटनाएं धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयोजनों में ही नहीं, बल्कि रेलवे स्टेशनों और सिनेमा घरों जैसे सार्वजनिक स्थानों पर भी हो रही हैं। 1954 से 2012 तक भारत में 79% भगदड़ें धार्मिक आयोजनों के दौरान हुईं, जो आज भी जारी है।  


इन विफलताओं के पीछे कई गहरे कारण हैं। सबसे प्रमुख है आमंत्रित भीड़ का होना और अपर्याप्त प्रबंधन। आयोजक अक्सर अनुमानित संख्या से अधिक लोगों को आने की अनुमति माँग करते हैं, जबकि निकास मार्ग संकरे और अपर्याप्त होते हैं। अनुमति देने वाले विभाग भी, किन्हीं कारणों के चलते, सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतज़ामों पर ज़ोर नहीं देते। हाथरस में अस्थायी टेंट में पर्याप्त निकास न होने से भगदड़ बढ़ी। अफवाहें, जैसे आग लगने या ढांचा गिरने की, घबराहट और भगदड़ पैदा करती हैं। बुनियादी ढांचे की कमी, पुरानी इमारतों, संकरी सड़कों और पहाड़ी इलाकों में तो समझी जा सकती है। वहीं सुरक्षा कर्मियों की कमी और अप्रशिक्षित होना एक और समस्या है। महाकुंभ में वीआईपी व्यवस्थाओं पर फोकस से आम भक्तों की उपेक्षा हो जाती है। राजनीतिक और धार्मिक आयोजनों में भावनाओं का उफान भीड़ को अनियंत्रित बनाता है। इसके अलावा, आपदा प्रबंधन में पुलिस, आयोजकों और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय की कमी घटनाओं को बढ़ावा देती है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के दिशानिर्देशों का पालन न होना एक बड़ी लापरवाही है। ये सभी कारक मिलकर भारत को बार-बार विफल कर रहे हैं, जहां जनता की जानें सस्ती साबित हो रही हैं।


ये भगदड़ें केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, इनका मानवीय और सामाजिक प्रभाव बहुत गहरा है। परिवार टूट जाते हैं, बच्चे अनाथ हो जाते हैं और परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। हाथरस में ज्यादातर महिलाओं की मौत ने लिंग असमानता को भी उजागर किया। मनोवैज्ञानिक आघात पीड़ितों और गवाहों को वर्षों तक सताता है। सामाजिक विश्वास कम होता है और अंतरराष्ट्रीय छवि खराब होती है। भारत जैसे विकासशील देश में ये घटनाएं प्रगति की राह में बाधा हैं।


फिर सवाल उठता है कि इनसे कैसे बचा जाए? प्रबंधन के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। सबसे पहले, पूर्व नियोजन जरूरी है। आयोजकों को अनुमति देते समय क्षमता का सख्त आकलन हो और अधिकतम संख्या तय की जाए। बुनियादी ढांचे में सुधार लाएं, चौड़े निकास, आपातकालीन मार्ग और मजबूत संरचनाएं। एनडीएमए के अनुसार, सीसीटीवी, ड्रोन और एआई का उपयोग भीड़ निगरानी के लिए किया जाए, जैसा कुंभ में प्रयास हुआ।   सुरक्षा कर्मियों की संख्या बढ़ाएं और उन्हें विशेष प्रशिक्षण दें। अफवाहों पर नियंत्रण के लिए ‘रियल टाइम’ संचार प्रणाली लगाएं। अंतर-एजेंसी समन्वय मजबूत करें—पुलिस, आयोजक और नागरिक प्रशासन एक साथ काम करें।   कानूनी सख्ती लाएं, लापरवाह आयोजकों पर कड़ी सजा और मुआवजा सुनिश्चित करें। जन जागरूकता अभियान चलाएं, जहां लोग भीड़ में धैर्य रखें और सहयोग करें। शासन और प्रशासन की ज़िम्मेदारी है कि नियमित रूप से देश भर में ‘मॉक ड्रिल’ का आयोजन किया जाए, जिससे जागरूकता बढ़ेगी। अंतरराष्ट्रीय उदाहरण लें, जैसे दुनिया भर के कई देशों में स्कूलों में भी आपात स्थिति से निपटने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है।  

भारत को एक बाद एक हुई इन विफलताओं से सबक लेना होगा। सरकार, आयोजक और नागरिकों की संयुक्त जिम्मेदारी से ही भविष्य की त्रासदियां रोकी जा सकती हैं। अन्यथा, ये घटनाएं जारी रहेंगी और देश अपनी जनता को बचाने में असमर्थ साबित होगा। समय आ गया है कि प्रोएक्टिव अप्रोच अपनाया जाए, जैसा कि कहा जाता है  कि, ‘प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर’। केवल तभी हम एक सुरक्षित भारत का निर्माण कर पाएंगे। 

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Monday, September 8, 2025

प्राकृतिक आपदाओं का बढ़ता कहर

भारत, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और विविध भौगोलिक संरचना के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। लेकिन हर साल मानसून के आगमन के साथ यह देश प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आ जाता है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से हिमालयी राज्यों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में बादल फटने, भूस्खलन और भारी बारिश के कारण होने वाली तबाही ने न केवल जन-धन की हानि की है, बल्कि सरकारी तंत्र की नाकामी और भ्रष्टाचार को भी उजागर किया है।



भारत में मानसून का मौसम जून से सितंबर तक रहता है और इस दौरान देश के कई हिस्सों में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं अब आम हैं। हाल के महीनों में, उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में बादल फटने से भारी तबाही मची, जिसमें कम से कम पांच लोगों की मौत हुई और 50 से अधिक लोग लापता हो गए। हिमाचल प्रदेश में भी अगस्त 2025 में भारी बारिश के कारण दर्जनों सड़कें बंद हो गईं और कई लोगों की जान चली गई। इन घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि सरकारी तंत्र इन आपदाओं को रोकने और उनके प्रभाव को कम करने में क्यों असफल हो रहा है?



बादल फटने की घटनाएं, जिन्हें भारत मौसम विज्ञान विभाग 100 मिमी प्रति घंटे से अधिक बारिश के रूप में परिभाषित करता है, विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में आम हैं। ये घटनाएं न केवल प्राकृतिक हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों जैसे अनियोजित निर्माण, जंगलों की कटाई और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप के कारण और भी घातक हो गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश की तीव्रता बढ़ रही है, जिससे बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं अधिक बार और अधिक विनाशकारी हो रही हैं।


केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में अपने बयान में कहा कि पहाड़ी राज्यों में होने वाले निर्माण और नुक़सान के लिए घर में बैठकर तैयार की गई फर्जी डीपीआर बनाने वाले दोषी (कल्प्रिट) हैं। ये लोग बिना ज़मीनी हकीकत जाने हुए डीपीआर बना देते हैं जिससे ऐसे हादसे होते हैं। यह बयान न केवल सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी कितनी घातक हो सकती है। 



डीपीआर, जो किसी भी योजना का बुनियादी ढांचा व आधार होती है, में अगर भ्रष्टाचार और लापरवाही बरती जाती है, तो इसका परिणाम ऐसी हादसों व त्रासदियों के रूप में सामने आता है। इसे ‘करप्शन ऑफ़ डिज़ाइन’ कहा जाता है। 


पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण करते समय भूगर्भीय और पर्यावरणीय कारकों को नजरअंदाज करना आम बात हो गई है। गडकरी का यह बयान इस ओर इशारा करता है कि कई परियोजनाओं के लिए डीपीआर बिना स्थानीय भूगोल और जलवायु की गहन जांच के तैयार की जाती हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में, जहां भूस्खलन और बाढ़ का खतरा हमेशा बना रहता है, सड़क निर्माण के लिए अक्सर पहाड़ों को अंधाधुंध काटा जाता है, जिससे ढलान अस्थिर हो जाते हैं। यह न केवल भूस्खलन को बढ़ावा देता है, बल्कि नदियों में मलबे का प्रवाह भी बढ़ाता है, जिससे बाढ़ की स्थिति और गंभीर हो जाती है।


भारत में बाढ़ और जलभराव की स्थिति को नियंत्रित करने में सरकारी तंत्र की विफलता कई स्तरों पर दिखाई देती है। सबसे पहले तो हमारी आपदा प्रबंधन की तैयारी ही अपर्याप्त है। उत्तराखंड में 2013 की केदारनाथ त्रासदी, जिसमें 6,000 से अधिक लोग मारे गए थे। 2021 की चमोली आपदा, जिसमें 200 से अधिक लोग हिमस्खलन और बाढ़ की चपेट में आए। इन हादसों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार को पहले से चेतावनी और तैयारी की जरूरत है। फिर भी, हर साल न सिर्फ़ एक जैसी आपदाएं दोहराई जाती हैं बल्कि राहत और बचाव कार्यों में देरी और अव्यवस्था भी दिखाई देती है।


दूसरा, जल निकासी प्रणालियों की कमी और रखरखाव की अनदेखी भी एक बड़ा मुद्दा है। दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरी क्षेत्रों में, जहां 2024 में 108 मिमी बारिश ने भारी जलभराव पैदा किया, नालों की सफाई और उचित जल निकासी की कमी साफ दिखाई दी। पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों के किनारे अनियोजित निर्माण और अतिक्रमण ने प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित किया है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।


तीसरा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जागरूकता की कमी भी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में स्थानीय ज्ञान का उपयोग करके सड़क निर्माण हो तो शायद भूस्खलन में रोकथाम हो सके। लेकिन वास्तव में, स्थानीय लोगों की सलाह को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है और परियोजनाएं केवल ठेकेदारों और अधिकारियों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।


इन समस्याओं का समाधान तभी संभव है जब सरकार और समाज मिलकर एक समग्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं। सबसे पहले, डीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया को पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाना होगा। भूगर्भीय सर्वेक्षण, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन, और स्थानीय विशेषज्ञों की राय को शामिल करना अनिवार्य होना चाहिए। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए स्वतंत्र ऑडिट और निगरानी तंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।


दूसरा, आपदा प्रबंधन के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार करना होगा। इसमें न केवल राहत और बचाव की तैयारी शामिल होनी चाहिए, बल्कि प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, जैसे कि बादल फटने की निगरानी, को भी मजबूत करना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग भूस्खलन और जलभराव की संभावना वाले स्थानों की पहचान के लिए किया जाना चाहिए।


इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास को प्राथमिकता देनी होगी। जंगलों की कटाई को रोकना, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करना और अंधाधुंध निर्माण पर रोक लगाना जरूरी है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में इको-सेंसिटिव जोन में निर्माण को सख्ती से विनियमित करना होगा।


भारत में बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ की त्रासदियां केवल प्राकृतिक नहीं हैं, बल्कि मानवीय लापरवाही और भ्रष्टाचार का भी परिणाम हैं। नितिन गडकरी का बयान इस दिशा में एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। सरकारी तंत्र की नाकामी, चाहे वह जलभराव को नियंत्रित करने में हो या आपदा प्रबंधन में, ने आम लोगों का जीवन खतरे में डाल दिया है। अब समय है कि सरकार, समाज और विशेषज्ञ मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाएं जो न केवल आपदाओं को रोके, बल्कि उनके प्रभाव को कम करने में भी सक्षम हो। टिकाऊ विकास, पारदर्शी प्रशासन, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही इस दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता है। 

Monday, August 21, 2023

तीर्थों की भीड़ संभालें !

प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी व उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री योगी जी ने हिन्दू तीर्थों के विकास की तरफ जितना ध्यान पिछले सालों में दिया है उतना पिछली दो सदी में किसी ने नही दिया था। ये बात दूसरी है कि उनकी कार्यशैली को लेकर संतों के बीच कुछ मतभेद है। पर आज जिस विषय पर मैं अपनी बात रखना चाहता हूँ उससे हर उस हिन्दू का सरोकार है जो तीर्थाटन में रुचि रखता है। जब से काशी, अयोध्या, उज्जैन व केदारनाथ जैसे तीर्थ स्थलों पर मोदी जी ने विशाल मंदिरों का निर्माण करवाया है, तब से इन सभी तीर्थों पर तीर्थयात्रियों का सागर उमड़ पड़ा है। इतनी भीड़ आ रही है कि कहीं भी तिल रखने को जगह नही मिल रही।

इस परिवर्तन का एक सकारात्मक पहलू ये है कि इससे स्थानीय नागरिकों की आय तेज़ी से बढ़ी है और बड़े स्तर पर रोजगार का सृजन भी हुआ है। स्थानीय नागरिक ही नहीं बाहर से आकार भी लोगों ने इन तीर्थ नगरियों में भारी निवेश किया है। इससे यह भी पता चला है कि अगर देश के अन्य तीर्थ स्थलों का भी विकास किया जाए तो तीर्थाटन व पर्यटन उद्योग में भारी उछाल आ जायेगा। इस विषय में प्रांतीय सरकारों को भी सोचना चाहिए। जहाँ एक तरफ इस तरह के विकास के आर्थिक लाभ हैं वहीं इससे अनेक समस्याएँ भी पैदा हो रही हैं।



उदाहरण के तौर पर अगर मथुरा को ही लें तो बात साफ़ हो जाएगी। आज से 2 वर्ष पहले तक मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन व बरसाना आना-जाना काफ़ी सुगम था। जो आज असंभव जैसा हो गया है। कोविड के बाद से तीर्थाटन के प्रति भी एक नया ज्वार पैदा हो गया है। आज मथुरा के इन तीनों तीर्थ स्थलों पर प्रवेश से पहले वाहनों की इतनी लम्बी कतारें खड़ी रहती हैं कि कभी-कभी तो लोगों को चार-चार घंटे इंतज़ार करना पड़ता है। यही हाल इन कस्बों की सड़कों व गलियों का भी हो गया है। जन सुविधाओं के अभाव में, भारी भीड़ के दबाव में वृन्दावन में बिहारी जी मंदिर के आस-पास आए दिन लोगों के कुचलकर मरने या बेहोश होने की ख़बरें आ रही हैं। भीड़ के दबाव को देखते हुए आधारभूत संरचना में सुधार न हो पाने के कारण आए दिन दुर्घटनाएँ हो रही हैं। जैसे हाल ही में वृंदावन के एक पुराने मकान का छज्जा गिरने से पांच लोगों की मौत और पांच लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। अब नगर निगम ने वृन्दावन के ऐसे सभी जर्जर भवनों की पहचान करना शुरू किया है जिनसे जान-माल का खतरा हो सकता है। ऐसे सभी भवनों को प्रशासन निकट भविष्य में मकान-मालिकों से या स्वयं ही गिरवा देगा, ऐसे संकेत मिल रहे हैं। ये एक सही कदम होगा। पर इसमें एक सावधानी बरतनी होगी कि जो भवन पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं या जिनकी वास्तुकला ब्रज की संस्कृति को प्रदर्शित करती है, उन्हें गिराने की बजाय उनका जीर्णोद्धार किया जाना चाहिए।



इस सन्दर्भ में यह बात भी महत्वपूर्ण है कि जो नए निर्माण हो रहे हैं या भविष्य में होंगे उनमें भवन निर्माण के नियमों का पालन नही हो रहा। जिससे अनेक समस्याएँ पैदा हो रही हैं। इस पर कड़ाई से नियंत्रण होना चाहिए। पिछले दिनों यमुना जी की बाढ़ ने जिस तरह वृन्दावन में अपना रौद्र रूप दिखाया उससे स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने यमुना डूब क्षेत्र में हुए सभी अवैध निर्माण गिराने के आदेश दिए हैं। फिर वो चाहें घर हों, आश्रम हों या मंदिर हों। स्थानीय नागरिकों का प्रश्न है कि यमुना के इसी डूब क्षेत्र में हाल के वर्षों जो निर्माण सरकारी संस्थाओं ने बिना दूर-दृष्टि के करवा दिए क्या उनको भी ध्वस्त किया जायेगा?


जहाँ तक तीर्थ नगरियों में भीड़ और यातायात को नियंत्रित करने का प्रश्न है इस दिशा में प्रधान मंत्री मोदी जी को विशेष ध्यान देना चाहिए। हालांकि यह विषय राज्य का होता है लेकिन समस्या सब जगह एक सी है। इसलिए इस पर एक व्यापक सोच और नीति की ज़रूरत है, जिससे प्रांतीय सरकारों को हल ढूँढने में मदद मिल सके। वैसे आन्ध्र प्रदेश के तीर्थ स्थल तिरुपति बालाजी का उदाहरण सामने है जहाँ लाखों तीर्थयात्री बिना किसी असुविधा के दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं। जबकि मुख्य मंदिर का प्रांगण बहुत छोटा है और उसका विस्तार करने की बात कभी सोची नही गई। इसी तरह अगर काशी, मथुरा व उज्जैन जैसे तीर्थ नगरों की यातायात व्यवस्था पर इस विषय के जानकारों और विशेषज्ञों की मदद ली जाए तो विकराल होती इस समस्या का हल निकल सकता है।


तीर्थ स्थलों के विकास की इतनी व्यापक योजनाएँ चलाकर प्रधान मंत्री मोदी जी ने आज सारी दुनिया का ध्यान सनातन हिन्दू धर्म की ओर आकर्षित किया है। स्वाभाविक है कि इससे आकर्षित होकर देशी पर्यटक ही नही बल्कि विदेशों से भी भारी मात्रा में पर्यटक इन तीर्थ नगरों को देखने आ रहे हैं। अगर उन्हें इन नगरों में बुनियादी सुविधाएँ भी नही मिलीं या भारी भीड़ के कारण परेशानियों का सामना करना पड़ा, तो इससे एक ग़लत संदेश जायेगा। इसलिए तीर्थों के विकास के साथ आधारभूत ढांचे के विकास पर भी ध्यान देना चाहिए। केंद्र और राज्य की सरकारें हमारे धर्मक्षेत्रों को सजाएं-संवारें तो सबसे ज्यादा हर्ष हम जैसे करोड़ों धर्म प्रेमियों को होगा, पर धाम सेवा के नाम पर, अगर छलावा, ढोंग और घोटाले होंगे तो भगवान तो रुष्ट होंगे ही, भाजपा की भी छवि खराब होगी।


2008 से मैं, अपने साप्ताहिक लेखों में मोदी जी के कुछ अभूतपूर्व प्रयोगों की चर्चा करता रहा हूँ जो उन्होंने गुजरात का मुख्य मंत्री रहते हुए किये थे। जैसे हर समस्या के हल के लिए उसके विशेषज्ञों को बुलाना और उनकी सलाह को नौकरशाही से ज्यादा वरीयता देना। ऐसा ही प्रयोग इन तीर्थ नगरों के लिए किया जाना चाहिए क्योंकि कानून-व्यवस्था की दैनिक जिम्मेदारी में उलझा हुआ जिला-प्रशासन इस तरह की नई जिम्मेदारियों को सँभालने के लिए न तो सक्षम होता है और न उसके पास इतनी ऊर्जा और समय होता है। इसलिए समाधान गैर-पारंपरिक तरीकों से निकला जाना चाहिए।