Monday, August 10, 2026

विदेशी फंडिंग के नियमन में एक अहम मोड़!

संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 एक बार फिर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यह संशोधन विधेयक एफसीआरए 2010 में बड़े बदलाव ला सकता है। सरकार इसे विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और नागरिक समाज संगठन इसे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), ट्रस्ट और धार्मिक संस्थाओं पर राज्य के नियंत्रण का विस्तार मान रहे हैं। देखना यह है कि इसके प्रावधानों, पक्ष-विपक्ष, सरकारी तर्क, विपक्षी आलोचना और विशेषज्ञों राय के अनुसार, इस विधेयक में ऐसा क्या है?


एफसीआरए विदेशी दान को विनियमित करने वाला कानून है। इसके तहत एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण कराना पड़ता है, जो पांच साल के लिए वैध होता है और नवीनीकरण की जरूरत होती है। आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 तक करीब 14,449 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण थे, जबकि 22,498 रद्द हो चुके थे और 15,212 समाप्त माने गए। 2019-2022 के बीच पंजीकृत संगठनों को लगभग 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। कई रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन का स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं था। नया विधेयक इसी खामी को भरने का दावा करता है।


विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान एक ‘नामित प्राधिकरण’ (डेज़ीग्नेटेड अथॉरिटी) का निर्माण है। इसके अनुसार जब किसी संगठन का एफसीआरए प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियां अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण में निहित हो जाएंगी। यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो वे स्थायी रूप से निहित हो सकती हैं और सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल या बिक्री भी हो सकती है। बिक्री की राशि भारत की समेकित निधि में जाएगी। इसके साथ ही धार्मिक चरित्र वाली संपत्तियों के संरक्षण का प्रावधान भी है। प्राधिकरण पूजा स्थलों को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। प्रभावित संगठन 90 दिनों में पुनरीक्षण और जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील कर सकते हैं। इसके अलावा, नवीनीकरण के लिए पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी योगदान के उपयोग की शर्त लगाई गई है। कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम कारावास पांच साल से घटाकर एक साल किया गया है और जांच शुरू करने से पहले केंद्र की पूर्व अनुमति जरूरी होगी।


सरकार का तर्क है कि यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए आवश्यक है। सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो, वो विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना चाहेगी। सरकार का कहना है कि रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद हजारों करोड़ की संपत्तियां अधर में लटकी रह जाती थीं; राज्य सरकारें उन्हें न तो कब्जे में ले सकती थीं और न प्रबंधित कर सकती थीं। नया ढांचा इन संपत्तियों की सुरक्षा, प्रबंधन और उचित उपयोग सुनिश्चित करेगा। न्यूनतम उपयोग सीमा निष्क्रिय संगठनों को लाइसेंस धारण करने से रोकेगी। दंड का युक्तिकरण और जांच में केंद्र की अनुमति मनमाने कार्रवाई को सीमित करेगी। सरकार का तर्क है कि यह सिविल सोसायटी को कमजोर नहीं करता, बल्कि विदेशी योगदान को वैध प्रयोजनों तक सीमित रखता है और शासन को मजबूत बनाता है।


वहीं विपक्ष इसे ‘दमनकारी’ और सिविल सोसायटी पर हमला मानता है। उनका तर्क है कि नामित प्राधिकरण को व्यापक शक्तियां मिलने से सरकार एनजीओ की संपत्तियों पर कब्जा कर सकती है। पंजीकरण का स्वतः समापन प्रक्रियात्मक देरी से भी हो सकता है। नवीनीकरण आवेदन लंबित रहने या समय पर न लगाने पर संगठन पंगु हो जाएंगे। यह विशेष रूप से छोटे संगठनों, धार्मिक संस्थाओं (खासकर ईसाई चर्चों और अल्पसंख्यक समूहों से जुड़े ट्रस्ट) और आलोचनात्मक आवाजों को निशाना बना सकता है। अमेरिका के कुछ सांसदों ने भी इसे ईसाइयों के खिलाफ हमला बताया है और भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ने की चेतावनी दी है। विपक्ष का कहना है कि 2020 के संशोधनों के बाद पहले ही हजारों लाइसेंस रद्द हो चुके हैं; नया विधेयक कार्यपालिका की शक्ति को और बढ़ाता है, न्यायिक समीक्षा को कमजोर करता है और लोकतांत्रिक स्थान को संकुचित करता है। केरल जैसे राज्यों में विदेशी फंड पर निर्भर स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं।


इस विधेयक के फायदे देखे जाएँ तो इसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और संपत्ति प्रबंधन की स्पष्टता है। विदेशी फंड का दुरुपयोग (यदि कोई हो) रोका जा सकता है। निष्क्रिय संगठनों को फिल्टर करने से सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण काम करने वाले संगठनों को प्राथमिकता मिलेगी। इसके साथ ही दंड में नरमी और अपील का प्रावधान कुछ सुरक्षा देता है। यदि इस विधेयक के नुकसान की बात करें तो सरकार का अत्यधिक नियंत्रण, छोटी और स्थानीय संस्थाओं पर अनुपालन का बोझ, प्रक्रियात्मक जोखिम और संभावित चयनात्मक कार्रवाई शामिल हैं। उद्देश्य और भूगोल-विशिष्ट पंजीकरण लचीलापन कम कर सकता है। धार्मिक गतिविधियों पर स्पष्ट प्रतिबंध (धर्मांतरण) विवाद बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे मौजूदा खामियों को भरने वाला व्यावहारिक कदम मानता है, जबकि दूसरे वर्ग का कहना है कि यह एफसीआरए को विनियमन से आगे ले जाकर सिविल सोसायटी पर व्यापक राज्य नियंत्रण का औजार बना रहा है। कुछ कानूनी विश्लेषक कहते हैं कि संपत्तियों का निहित होना और स्थायी वेस्टिंग संवैधानिक सवाल उठा सकते हैं, खासकर बिना पर्याप्त न्यायिक निगरानी के।


कुल मिलाकर देखा जाए तो एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 विदेशी फंडिंग के नियमन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। सरकार की मंशा राष्ट्रीय हित और पारदर्शिता की है, लेकिन प्रावधानों में कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार विपक्ष और नागरिक समाज की चिंताओं को जायज ठहराता है। सच्चा लोकतंत्र पारदर्शिता और स्वतंत्र सिविल सोसायटी दोनों की मांग करता है। ऐसे में विधेयक पर विस्तृत संसदीय चर्चा, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और छोटे संगठनों के लिए राहत के बिना इसे पारित करना अनुचित होगा। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि अपील प्रक्रिया को मजबूत किया जाए, स्वतः समापन के प्रावधानों में सुरक्षा जोड़ी जाए और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों के लिए स्पष्ट, निष्पक्ष दिशानिर्देश हों। अंततः कानून का उद्देश्य विदेशी योगदान को नियंत्रित करना होना चाहिए, न कि वैध सामाजिक कार्यों को बाधित करना। संसद को इस संतुलन को साधना चाहिए, ताकि पारदर्शिता के नाम पर स्वतंत्रता का गला न घोंटा जाए। 

No comments:

Post a Comment