Monday, May 18, 2026

उपजाऊ भूमि का विनाश क्यों ?

एक तरफ तो हम बढ़ती आबादी का रोना रोते हैं। दूसरी तरफ हम अपनी खेती योग्य जमीन को दैत्यों की तरह बर्बाद कर रहे हैं। इस आत्मघाती विकास से हम अपने भविष्य के लिए भीषण खाद्य संकट पैदा होने के हालात बना रहे हैं। यूं तो आजादी के बाद देश में कृषि, ग्रामीण विकास व जल संसाधन जैसे मंत्रालय बने, जिनके मंत्री और अफसर विदेशों में ज्ञान लेने के बहाने भागते रहे। पर क्या वजह है कि इन सबके होते हुए भी देश में कुल 33 करोड़ हेक्टेयर की तिहाई भूमि बंजर है और लगातार बढ़ रही है। जैसे गोबी मरुस्थल से उड़ी धूल उत्तर चीन से लेकर कोरिया के उपजाऊ मैदानों को ढक रही है, उसी तरह थार मरुस्थल की रेत उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों को निगल रही है। अरावली पर्वत काफी हद तक धूल भरी आंधियों को रोकने का काम करता है, लेकिन अंधाधुंध खनन की वजह से इस पर्वतमाला को नुकसान पहुंच रहा है, जिससे यह धूल भरी आंधियों को पूरी तरह नहीं रोक पा रही है। उधर हर साल 84 लाख टन भूमि के पोषक तत्व बाढ़ आदि की वजह से बह जाते हैं। कीटनाशक भी हर साल 1.4 करोड़ वर्ग किमी भूमि की उर्वरकता खत्म कर रहे हैं। इसी तरह लवणीयता और क्षारपन भी हर साल 270 हजार वर्ग किमी क्षेत्र को बंजर बना रहे हैं। 



अणुबम से भी घातक कैमिकल्स, कीटनाशक दवाएं, रासायनिक खाद व जहरीली दवाओं के अमर्यादित प्रयोग से भूमि बंजर बन रही हैं। साथ ही साथ उद्योगों से निकला प्रदूषित जल वाष्पित होकर ऊपर जाता है। फिर प्रदूषित एवं क्षारीय जल की वर्षा से भूमि पूर्णतया बंजर बन रही है। इसी प्रकार इन दवाओं का प्रयोग होता रहा तो अगले 50 वर्षों में सारे देशवासी भयानक रोगों से ग्रस्त जाएंगे। 


हाल के वर्षों में औद्योगिक कचरे से भी भूमि और जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। उद्योगों से निकले कचरे और प्रदूषित जल को नदियों में छोड़े जाने से भूतलीय और भूमिगत जल प्रदूषित हो गया है। इस तरह के प्रदूषित जल का सिंचाई के लिए इस्तेमाल किए जाने से जमीन भी खराब हो गई है। ताजा अनुमानों के अनुसार इस सबसे 34,500 हेक्टेयर भूमि बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके साथ ही भारी मात्रा में पॉलीथिन और प्लास्टिक का कचरा पृथ्वी की उर्वरकता को तेजी से खत्म कर रहा है, क्योंकि यह कचरा गलता नहीं है। इसलिए यह जमीन के लिए बहुत ही घातक है। जिस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगना चाहिए, लेकिन न तो केंद्र सरकार ऐसा कर पा रही हैं और न राज्य सरकारें। 



जमीन में बोरिंग करके अंधाधुंध पानी खींचने से पृथ्वी के भीतर भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आई है। जिससे जमीन की नमी खत्म हुई है और रेगिस्तान बढ़ता जा रहा है। फिर भी हमें अकल नहीं आ रही। 1947 में देश में एक हजार ट्यूबवेल थे, जिनकी तादाद अब 2.10 करोड़ से भी अधिक है और हर पा बढ़ती जा रही है। इससे भूमिगत पानी की सतह तेजी से नीचे होती जा रही है। इसी तरह औद्योगीकरण के इस दौर में समुद्री तटों के आसपास मनुष्यों के रहने लायक स्थिति नहीं बची है। क्योंकि आए दिन समुद्री पानी से भूमि का कटाव होकर खारा पानी आबादी क्षेत्र में 30 से 100 किमी तक प्रवेश करने लगा है। गुजरात के जामनगर, द्वारिका, जूनागढ़, भावनगर और अमरैली के तटीय गांव उजड़ने की कगार पर हैं। जिसका एक मात्र कारण तटीय जमीन का अत्यधिक कटाव किया जाना है। इतना ही नहीं बल्कि देश में हो रहे बेरोकटोक अंधाधुंध खनन से जमीन पोली हो रही है। भूचाल के खतरे बढ़ रहे हैं और इससे होने वाले प्रदूषण से भूमि बंजर हो रही है। 



खानों का कचरा खुले में फैलने से व सीमेंट उद्योग के लिए चूना-पत्थर और चीनी मिट्टी उद्योग के लिए कैल्साइट और खडि़या पत्थर की पिसाई से जो धूल उड़ती है, वह आसपास की उपजाऊ जमीन को बर्बाद कर देती है। नब्बे फीसदी खान मालिकों द्वारा खुली खदान प्रणाली के जरिये खनन कार्य किया जा रहा है। खनन पूरा हो जाने के बाद उस क्षेत्र को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। इसे फिर सही करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाता। जिससे पूरा क्षेत्र हमेशा के लिए बर्बाद होकर रेगिस्तान बन जाता है। 


वनस्पतियों का विनाश भी जमीन को बंजर बनाने का कारण है। मरुस्थलीयकरण का सबसे पहला शिकार पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ होती हैं। जमीन पर बढ़ते दबाव से पेड़-पौधों और वनस्पतियों के हृास में खतरनाक वृद्धि हो रही है। गाँवों के आस-पास चरागाहों की जमीन बुरी तरह बर्बाद हुई है, क्योंकि उसकी सबसे अधिक उपेक्षा और सबसे ज्यादा दोहन हुआ है। इस प्रकार उपजाऊ भूमि भी रेगिस्तान बनती जा रहे है।  



हमारे देश के प्रधानमंत्रियों को भारत के किसानों और उनकी जमीनों की गिरती उर्वरकता की गहरी चिंता रही है। ऐसा वे अपने वक्तव्यों से संकेत देते रहे हैं, लेकिन अभी तक इस समस्या का कोई ठोस समाधान भारत की कोई भी सरकार आजादी के बाद से नहीं दे पाई है। नतीजतन, यह विनाश बेरोकटोक जारी है। खेतों में अंधाधुंध रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग भूजल में फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ा चुका है। जिसका मानवीय स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। सबको सबकुछ मालूम है। पर कोई कुछ ठोस नहीं करता। ऐसे में इस विकट समस्या पर प्रधानमंत्री और उनके संबंधित मंत्रालयों को गंभीरता से सोचना चाहिए और कृषि योग्य भूमि के संरक्षण को प्रोत्साहित करते हुए उसका विनाश करने वालों से कड़ाई से निपटना चाहिए।
 

Monday, May 11, 2026

जनता की जान की क़ीमत पर वीआईपी सुरक्षा क्यों?

नर्मदा नदी के बरगी बाँध के दुखद हादसे के बाद सोशल मीडिया पर एक आम नागरिक की टिप्पणी ने मुझे कुछ सोचने पर मजबूर किया। उसका कहना था कि जब देश में ऊर्जा संकट बढ़ रहा है और अनावश्यक दुर्घटनाओं में कीमती जीवन समाप्त हो रहे हैं, तो वीआईपी सुरक्षा के नाम पर हज़ारों गाड़ियाँ और सुरक्षा कर्मी क्यों रात-दिन भागते रहते हैं? जबकि यही सुरक्षा कर्मी अगर यातायात, भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा नियमों के कड़े अनुपालन और  आपदा प्रबंधन के लिए तैनात रहे तो आम जनता को कितनी राहत मिलेगी? भारतीय मूल का 38 वर्षीय हिमांशु गुलाटी नॉर्वे का तीसरी बार सांसद है और वहाँ का उप-कानून मंत्री भी। उसे कोई वीआईपी सुरक्षा नहीं मिली हुई। उसने मुझे बताया कि नॉर्वे की पिछली प्रधान मंत्री एर्ना सोलबर्ग जब एक बार उसके घर रात्रि भोज पर आईं तो वे बिना किसी सुरक्षा बंदोबस्त के स्वयं कार चला कर आईं और सीधे रसोई में जा कर रसोइए से हाल चाल पूछने लगीं। सिडनी से मेरी मित्र विमला ने पिछला लेख पढ़ कर फ़ोन पर बताया कि कुछ दिन पहले वो सिनेमा घर में फ़िल्म देख रही थीं। अचानक उसकी निगाह पड़ी ऑस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री पर जो उसी पंक्ति में बिना किसी सुरक्षा के फ़िल्म देख रहे थे। अमरीका और यूरोप के देशों में अक्सर आपको वर्तमान व निवर्तमान राष्ट्राध्यक्ष आम आदमी की तरह बाज़ारों में घूमते हुए दिख जाते हैं। जिनके आगे पीछे कोई सुरक्षा घेरा नहीं होता। नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री बालेंद्र शाह ने नेपाल में वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने के लिए कई कड़े निर्णय लिए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपने फैसलों पर टिके रहेंगे। 


यहाँ मेरा आशय भारत के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री व प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों आदि की आवश्यक सुरक्षा को लेकर कोई टिप्पणी करने का नहीं है। पर इनके अलावा देश में लगभग 19,000 ऐसे लोग हैं जिन्हें सरकारी सुरक्षा प्रदान की गई है। जिस पर 66,000 सुरक्षा कर्मी तैनात हैं। अकेले दिल्ली में 500 लोगों को वीआईपी सुरक्षा मिली है जिस पर लगभग 750 करोड़ रुपया सालना खर्च होता है। अंदाज़ा लगाइए कि बाक़ी 18,500 लोगों की सुरक्षा पर कितने हज़ार करोड़ रुपया खर्च होता होगा? ये पैसा उस मतदाता की मेहनत की कमाई पर टैक्स लगाकर वसूला जाता है जिसे नर्मदा या वृंदावन की यमुना में सुरक्षा नियमों की लापरवाही के कारण बार-बार जान गवानी पड़ती है। 


मुझे याद है कि 2003-05 में जब मैं वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर का अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर था तो मैंने वहाँ वीआईपी गाड़ियों के प्रवेश को रोकने के लिए दो मुख्य रास्तों के शुरू में ही लोहे की चेन लगवा दी थी जो आजतक लगी हैं। ऐसा मैंने तब किया जब संकरे प्रवेश मार्ग में मंदिर तक जाने को आमदा एक एसडीएम की गाड़ी ने एक वृद्ध महिला को कुचल दिया। गली के बाहर मैंने एक बोर्ड भी टंगवा दिया था। जिस पर लिखा था, ‘बिहारी जी धनीनाथ या वीआईपीनाथ नहीं हैं - वे दीनबंधु दीनानाथ हैं। उनके द्वार पर दिन बनकर आओगे तभी उनकी कृपा पाओगे।’ मुझे खुशी है कि न सिर्फ़ केंद्रीय मंत्रियों ने बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक ने इस नियम का पालन किया।


पिछले कई दशकों से हालत यह है कि हर चंगू-मंगू, ऐरा-गैरा अपने राजनैतिक संपर्कों का लाभ उठा कर सरकारी सुरक्षा ले लेता है और फिर जनता के बीच दबंगई से घूमता है। इनमें से 99 फ़ीसदी लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कोई ख़तरा नहीं होता। पर अपनी ताक़त और रुतबे का प्रदर्शन करने के लिए उन्हें सरकारी सुरक्षा पाने की लालसा रहती है। अगर पाठकों को ये आत्मश्लाघा न लगे तो विनम्रता से यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि 1993-98 के बीच अलग-अलग जगहों पर मुझ पर कई बार जानलेवा हमले हुए। क्योंकि ‘जैन हवाला कांड’ को उजागर करके मैंने देश के सबसे ताकतवर लोगों और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों के विरुद्ध अकेले ही युद्ध छेड़ दिया था। पर प्रभु कृपा से मैं न तो डरा, न झुका और न बिका। उस दौर में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी एन शेषन और मैं देश भर में जनसभाओं को संबोधित करने जाते थे तो अक्सर मुझसे यह प्रश्न पूछा जाता था कि ‘आप इतना ख़तरनाक युद्ध लड़ रहे हैं, आपको डर नहीं लगता?’ मेरा श्रोताओं को उत्तर होता था, ‘मारे कृष्णा राखे के, राखे कृष्णा मारे के’, श्री चैतन्य महाप्रभु के उक्त वचन से मुझे नैतिक बल मिलता था। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि बड़े-बड़े मंचों से धार्मिक प्रवचन करने वाले केसरिया वेश धारी भी कमांडो और पुलिस के घेरे में रह कर गर्व का अनुभव करते हैं। माया मोह त्यागने का उपदेश देने वालों की कथनी और करनी में इस भेद के कारण ही देश की आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं हो पा रहा है। धर्म भी एक शान-शौकत की चीज़ बनता जा रहा है।  


समय की माँग है कि प्रधान मंत्री मोदी जी सभी राज्यों के मुख्य मंत्रियों के साथ इस विषय पर गंभीर चिंतन करें और एक ऐसी नीति बनाएँ जिसमें सरकार की ओर से केवल राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को छोड़ कर बाक़ी किसी को तब तक सुरक्षा न मिले जबतक की वास्तव में उनके जीवन को गंभीर ख़तरा न हो। इसमें उन राजनेताओं को भी अनावश्यक सुरक्षा न दी जाए जो इन पदों पर रह चुके हों, पर अब किसी पद पर न हों। इसके बावजूद अगर कुछ नेता, उद्योगपति या अन्य लोग सरकारी सुरक्षा पाने के लिए आवेदन करें तो उन्हें यह सुरक्षा इस शर्त पर दी जाए कि वे इसका खर्चा स्वयं वहन करेंगे। यहाँ कोई सवाल खड़ा कर सकता है कि इन लोगों को सुरक्षा देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। उसका उत्तर है कि जो लोग शासन प्रशासन की लापरवाही से आए दिन दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है?  

Monday, May 4, 2026

पर्यटन का विस्फोट : खतरे की घंटी !

इस हफ़्ते जबलपुर में नर्मदा नदी के बरगी बाँध पर मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग की क्रूज बोट के अंधड़ में पलट जाने से नौ लोगों की डूब कर दर्दनाक मौत हो गई। दो हफ़्ते पहले उत्तर प्रदेश के वृंदावन में यमुना में भी नाव पलटने से दस लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। सुरक्षा नियमों का लागू न होना और बिना लाइफ जैकेट के पर्यटकों को नावों, स्टीमरों या क्रूज़ बोट्स में सैर सपाटा कराना, इन हादसों का मुख्य कारण है। ऐसे हादसे देश में आए दिन हो रहे हैं। पर उन से किसी भी राज्य की सरकार या प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया। ऐसा लगता भी नहीं कि आने वाले दिनों में इस दिशा में कोई कड़ी पहल की जाएगी। लोग अपनी मस्ती में जान जोखिम में डालते रहेंगे, चाहे उनकी ज़िंदगी को कितना ही ख़तरा क्यों न हो। 


पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों, तीर्थ नगरियों और कुंभ जैसे धार्मिक उत्सवों में लगातार बढ़ती दर्शनार्थियों की भीड़ अब इतनी बेकाबू हो गई है कि उसमें कुचल कर सैंकड़ों जानें चली जाती हैं। जैसे जनवरी 2025 में प्रयाग के कुंभ में हुआ, जहाँ बहुत लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए। और यही हाल कई बार वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में हुआ। मार्च 2026 में शीतला मंदिर (नालंदा, बिहार) में पूजा के दौरान भगदड़ में 8 लोग मारे गए, कई घायल हुए। 2025 में भारत में कुल 8 से ज़्यादा भगदड़ हादसों में 129 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें ज्यादातर धार्मिक स्थलों पर हुईं। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ बेक़सूर लोगों ने भीड़ के कारण अपनी जान गवाई।  


राज्यों के मुख्य मंत्री बड़े गर्व से घोषणा करते हैं कि उनके यहाँ पर्यटकों की संख्या कितनी तेज़ी से बढ़ रही है। पर वो ये नहीं बताते कि पर्यटकों की इस बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के काम में वे कितना असफल हो रहे हैं। इसी हफ़्ते केदारनाथ में इतनी भीड़ बड़ गई कि बहुत से दर्शनार्थियों को बिना दर्शन के बैरंग लौटना पड़ा। क्या वजह है कि तिरुपति बालाजी जैसे कुछ अपवादों को छोड़ कर किसी भी राज्य की सरकार पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की भीड़ को व्यवस्थित तरीके से संचालित या नियंत्रित नहीं करना चाहती? जबकि ऐसा करना बिल्कुल असंभव नहीं है। मुझे याद है कि 1984 में मैं स्विट्जरलैंड के माउंट ब्लांक के सर्वोच्च शिखर पर जाने लिए जब उस पर्यटन स्थल से 50 मील दूर था, तो स्थानीय पुलिस ने हमारी जैसी सैंकड़ों गाड़ियों को वहीं रोक दिया और हमें तब तक इंतज़ार करने को कहा जब तक की एक निर्धारित संख्या की गाड़ियाँ सामने की तरफ़ से लौट नहीं आईं। इस तरह उन्होंने पहाड़ की तलहटी में अनियंत्रित भीड़ होने की संभावना को ख़ारिज कर दिया। क्या ऐसी नीतियाँ हमारी प्रदेश सरकारें नहीं अपना सकती? पुलिस का जितना अमला हर राज्य में छोटे से बड़े तथाकथित वीआईपीयों की सुरक्षा व्यवस्था में रोज़ाना खपा रहता है, वो अगर हर तीर्थस्थल या पर्यटन स्थल के भीड़ नियंत्रण पर तैनात किया जाए तो न तो दुर्घटनाएं होंगी और न ही यात्रियों व स्थानीय नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। 


हमारी प्रदेश सरकारें इस बात में बहुत गर्व महसूस करती हैं कि उनकी नीतियों के कारण उनके प्रदेश में पर्यटन दिन दुगना और रात चौगुना बढ़ रहा है। पर इस पर्यटन विस्फोट से जो अव्यवस्था फैलती जा रही है, उसका उल्लेख कोई मुख्य मंत्री नहीं करता। भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर हर महत्वपूर्ण शहर में प्लास्टिक और कूड़े के अंबार लगते जा रहे हैं। जिनसे निपटने की कोई योजना किसी भी सरकार के पास नहीं है। कूड़े के ये पहाड़ न सिर्फ़ आँख की किरकिरी हैं बल्कि जनता के स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा भी पैदा कर रहे हैं। मोदी जी की पहल पर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का कोई असर इन तीर्थ नगरियों और पर्यटन क्षेत्रों में दिखाई नहीं देता। फिर वो चाहे पहाड़ों की घाटियाँ हों, समुद्र और नदियों के तट हों या हरे भरे जंगल, हर ओर कूड़े के अंबार लगते जा रहे हैं। इसलिए पश्चिमी देश भारत को दुनिया का सबसे गंदा देश अगर कहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है? 


पर्यटन विस्फोट की इस आपाधापी में प्रांतीय सरकारों को इस बात की चिंता नहीं है कि देश के नागरिकों को खाने के सामानों या प्रसाधन की वस्तुओं में कितना ज़हर परोसा जा रहा है। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भारी मात्रा में मरे हुए जानवरों की चर्बी से बनाए जा रहे नकली घी के भारी भंडार छापों में पकड़े गए हैं। पर ये कारवाई प्रतीकात्मक ज़्यादा है, प्रभावी कम। क्योंकि ऐसे नक़ली घी का कारोबार बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से चल रहा है। इसी तरह उत्तर भारत में रसायनों से बने नकली दूध और पनीर को सरेआम बेचा जा रहा है। फल और सब्जियों की तो बात ही छोड़ दीजिए, उन पर हानिकारक कीटनाशक और खतरनाक रसायन छिड़क कर नक़ली रंगों से तरो-ताज़ा दिखा कर हर मंडी में बेचा जा रहा है। आम आदमी असहाय है, वो कुछ कर नहीं सकता इसलिए न चाह कर भी अपने परिवार को ये ज़हरीले पदार्थ खिलाने पर मजबूर है। पर्यटन और तीर्थ क्षेत्रों में तो मिलावट का धंधा कई गुना ज़्यादा हो रहा है। क्योंकि विक्रेता के सामने जो ग्राहक खड़ा है वो एक बार ही उसके होटल आया है और अगले दिन लौट जाएगा तो दूसरा ग्राहक आ जाएगा। इसलिए उसे शिकायत नहीं झेलनी पड़ती। 


इस तरह हो रहे पर्यटन विस्फोट ने इन क्षेत्रों के आधारभूत ढांचों की कमर तोड़ दी है। जिसका समाधान शहरीकरण के नए-नए मेगा प्रोजेक्ट बनाना नहीं है। क्योंकि उनसे उस तीर्थाटन या पर्यटन क्षेत्र का नैसर्गिक स्वरूप और आध्यात्मिक चेतना, दोनों का तेज़ी से विनाश होता है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में भारत के ये क्षेत्र एक नासूर बन कर रह जाएँगे। जबकि दुनिया के तमाम देशों ने अपने पर्यटन उद्योग को नियमों के तहत बांधकर रखा है और अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को बिगाड़ने नहीं दिया। अमरीका के पश्चिमी तट पर एक तरफ़ घने पहाड़ और जंगल और दूसरी तरफ़ लहराते समुद्र के बीच हमारी कार तेज़ी से दौड़ रही थी, मुझे भूख लगी तो मेरे मेजबान ने जंगल के भीतर जा रही एक छोटी सड़क पर कार मोड़ दी। कुछ किलोमीटर जंगल पार करने के बाद मुझे ये देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहाँ स्थित खाने-पीने और मनोरंजन का एक बड़ा केंद्र मौजूद था। पर वो समुद्र तट और जंगल के बाद था। इसलिए समुद्र तट का प्राकृतिक सौंदर्य इससे प्रभावित नहीं हुआ था। जबकि केरल में त्रिवेंद्रम का कोवलम बीच या गोवा के समुद्र तट बेतरतीब विकसित हुए होटलों के कारण अपनी प्राकृतिक पहचान खो चुके हैं। आख़िर हम कब जागेंगे?  

किन्नरों को जबरन वसूली का अधिकार नहीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक किन्नर की याचिका पर नेग के नाम पर जबरन वसूली को ग़ैर क़ानूनी करार दिया है। अदालत ने इस तरह की वसूली को भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत अपराध बताया है। यह केस उत्तर प्रदेश के गौंडा ज़िले के किन्नर रेखा देवी की याचिका पर सुना जा रहा था। जिसमें रेखा देवी ने अपनी जजमानी का इलाक़ा निर्धारित करने की अदालत से माँग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि इलाक़ों की भौगोलिक सीमा स्पष्ट ना होने के कारण, प्रायः किनारों के अलग-अलग समूहों के बीच झड़पें व हिंसा तक होती है। पर अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए उक्त निर्णय सुनाया। 



यह सही है कि घर में ख़ुशी के मौक़े पर, जैसे पुत्र या पुत्री का जन्म, विवाह या नए घर में गृह-प्रवेश के अवसर पर किन्नर बधाई देने आते हैं और नाच गा कर अपना नेग माँगते हैं। भारत में यह अनूठी प्रथा हज़ारों सालों से चली आ रही है। इसकी जड़ें पौराणिक काल में हैं।


सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से स्वीकृत कथा रामायण से जुड़ी है। जब भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या से जाते हैं, तो वे लोगों (पुरुषों और स्त्रियों) को वापस लौट जाने को कहते हैं। किन्नर (जो न पुरुष हैं न स्त्री) इस आदेश से खुद को बंधा नहीं मानते और राम की प्रतीक्षा में वहीं रह जाते हैं। 14 वर्ष बाद राम लौटते हैं तो उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर राम उन्हें वरदान देते हैं कि शुभ अवसरों पर उनका आशीर्वाद विशेष रूप से फलीभूत होगा। इसी वरदान को बधाई की परंपरा का मूल माना जाता है। किन्नर समुदाय गाते-बजाते, तालियां बजाते हुए आशीर्वाद देते हैं और बदले में नेग (दक्षिणा या उपहार) लेते हैं। यह मान्यता है कि उनकी उपस्थिति और आशीर्वाद नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है और सौभाग्य लाती है। यह कथा वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस दोनों में मिलते हैं।



इसी तरह महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप (तीसरे लिंग वाला) और शिखंडी जैसे पात्र तीसरे लिंग की मान्यता दिखाते हैं। लगभग 400 ईसा पूर्व लिखे गए कामसूत्र में किन्नरों का स्पष्ट उल्लेख है। वेदों, पुराणों और अन्य शास्त्रों में भी किन्नरों का जिक्र मिलता है। किन्नरों को गायन, नृत्य और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा माना जाता था। कई विद्वान और स्रोत इस समुदाय की उपस्थिति को 4000 वर्ष से अधिक पुरानी बताते हैं।


मुगल काल में हिजड़ों की भूमिका और संगठित हुई। वे हरम की रखवाली, दरबारी सेवाएं और प्रशासन में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। बधाई की परंपरा इस काल में अधिक प्रचलित और संरचित रूप में चली, जहां वे शुभ अवसरों पर नृत्य-गान करके आशीर्वाद देते और नेग प्राप्त करते थे। दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य में उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति मजबूत थी।



अंग्रेज़ों ने 1871 के ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के तहत किन्नरों को अपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनकी पारंपरिक आजीविका और सम्मान प्रभावित हुआ। आज़ादी के बाद यह क़ानून समाप्त कर दिया गया। इस तरह बधाई-नेग की परंपरा उत्तर भारत, खासकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में आज भी जीवित है। कुछ राज्यों में सरकार ने नेग की दरें तय करने की कोशिश भी की है। पर उसमें विशेष कामयाबी नहीं मिली। 



इसी अस्पष्टता का लाभ उठा कर किन्नर समुदाय प्रायः अपने जजमानों से जबरन वसूली करता है। कभी-कभी तो वसूली का तरीका बहुत अभद्र होता है। जिसमें जजमान के परिवार के सामने निर्वस्त्र हो जाना, भद्दी गालियाँ देना, बद्दुआएँ देना और डराना धमकाना। कभी-कभी यह सब नाटक इस सीमा तक हो जाता है कि भयभीत जजमान अपनी आर्थिक हैसियत से कई गुना ज़्यादा दे कर पिंड छुड़ाता है। ऐसी वसूली को ‘नेग’ कतई नहीं कहा जा सकता। ये सरासर गुंडई और अवैध वसूली का तरीका है, जिस पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन को लगाम लगानी चाहिए। इसके साथ ही कई बार ऐसी घटनाएँ भी सामने आती हैं जब बाकायदा सम्पूर्ण पुरुष होते हुए भी मर्द, स्त्री का रूप धारण कर किन्नर होने का दावा करते हैं और इस वसूली में अपनी ताक़त दिखाते हैं। 


हमारी सामाजिक मान्यताओं के अनुसार किन्नरों का शुभ अवसरों पर आकर गाना बजाना और बधाई देना शुभ माना जाता है। समाज इनका ख़ुशी से स्वागत करता है और ऐसे अवसरों पर अड़ोसी-पड़ोसी जुट कर इनके साथ हास-परिहास भी करते हैं। ये एक स्वस्थ परंपरा है। प्रायः छोटे शहरों और कस्बों में किन्नरों के समूह कई पीढ़ियों तक अपने जजमान परिवारों से जुड़े रहते हैं और उनकी सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद देते हैं। देखा जाए तो सभी किन्नर संपन्न नहीं होते। वे अभावों में पलते हैं। उनकी आर्थिक, शैक्षिक या स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का उचित इंतज़ाम नहीं होता। फिर भी वे पारस्परिक सहयोग से अपना जीवन यापन कर लेते हैं। ऐसे में किन्नरों को नाचने गाने या भीख मांगने से हटा कर छोटे व्यवसायों या नौकरियों में लगाने की ज़िम्मेदारी, सरकार और समाज दोनों की है। जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। पर आपराधिक तरीके से जबरन वसूली करने वाले किन्नरों से परिवारों को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी स्थानीय पुलिस को तत्परता से निभानी चाहिए, जबकि ऐसा नहीं होता। इस समस्या को भी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है।