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Monday, August 25, 2025

निसंदेह गुमनामी बाबा ही थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस

बचपन से हमें पढ़ाया गया की हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को ताइपे (ताइवान) में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। पर उनकी मौत के विवाद को सुलझाने के लिए बने ‘मुखर्जी आयोग’ ने ताइपे (ताइवान) जाकर उनकी सरकार से संपर्क किया तो पता चला कि उस तारीख को ही नहीं बल्कि उस पूरे महीने ही वहाँ कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था। यानी नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी। ये झूठी कहानी गढ़ी गई। तो प्रश्न उठता है कि फिर नेताजी गए कहाँ? इस पर बाद में चर्चा करेंगे।


बाद के कई दशकों तक देश में चर्चा चलती रही कि नेताजी अचानक प्रगट होंगे। बाबा जयगुरुदेव ने देश भर की दीवारों पर बड़ा-बड़ा लिखवाया कि नेता जी सुभाष चंद्र बोस जल्दी ही देश के सामने प्रगट होंगे। पर वे नहीं हुए। मेरी माँ बहुत राष्ट्रभक्त थीं और बड़े राजनैतिक परिवारों के बच्चे उनके साथ पढ़ते थे, सो उनकी शुरू से राजनीति में रुचि थी। उन्होंने मुझे 1967 में कहा था कि ‘नेता जी अभी ज़िंदा हैं और गुमनाम रूप से कहीं संत भेष में पूर्वी उत्तर प्रदेश में रहते है।’



पर्दे वाले बाबा नाम से एक संत पचास के दशक में नेपाल के रास्ते भारत आए और गोपनीय रूप से बस्ती, लखनऊ, नैमिषारण्य, फैजाबाद व अयोध्या के मंदिरों या घरों में रहे। इस दौरान उनसे मिलने बहुत से लोग आते थे। पर सबको हिदायत थी कि उनके सामने कोई सुभाष नाम नहीं लेगा। इनमें 13 लोग जो वहीं के थे, जो उनके अंतरंग थे। उनमें से दो परिवारों ने तो उन्हें परदे के पीछे जाकर भी देखा था। बाक़ी अनेक लोग बंगाल से लगातार उनसे मिलने आते थे। उनमें दो लोग नेता जी की ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ की ‘इंटेलिजेंस विंग’ के सदस्य थे। ये लोग हर 23 जनवरी को आते थे और बड़े हर्षोल्लास से पर्दे वाले बाबा का जन्मदिन मना कर लौट जाते थे। गौरतलब है कि 23 जनवरी ही नेताजी का जन्मदिन होता है।जिसे मोदी जी ने ‘शौर्य दिवस’ घोषित किया है। यही लोग हर वर्ष दोबारा दुर्गा पूजा के समय उनके पास आते थे। इसके अलावा बाबा की जरूरत के हिसाब से बीच-बीच में भी लोग आते जाते रहते थे। देश के कई बड़े नामी राजनेता व बड़े सैन्य अधिकारी भी लगातार उनसे मिलने आते थे। पर सब उनसे पर्दे के सामने से ही बात करते और सलाह लेते थे। 


पत्रकार अनुज धर और पर्यावरणवादी चंद्रचूड़ घोष, इन दो लोगों ने अपनी जवानी के बीस वर्ष इसे सिद्ध करने में लगा दिए कि ‘पर्दे वाले बाबा’ जिन्हें बाद में लोग ‘गुमनामी बाबा’कहने लगे, जिन्हें उनके निकट के लोग ‘भगवन जी’ कहते थे, वही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। पिछले हफ़्ते ये दोनों मेरे दिल्ली कार्यालय आए और विस्तार से मुझे इस विषय में जानकारी दी। उन्होंने अपनी लिखी हिंदी व अंग्रेज़ी की कई पुस्तकें भी दीं। जिनमे वो सारे तथ्य, दस्तावेज़ और उन सामानों के चित्र थे जो ‘गुमनामी बाबा’ के कमरे से 16 सितंबर 1985 को उनकी मृत्यु के बाद, उनके दो दर्जन से ज़्यादा बक्सों में से निकले थे । ये सब सामान देखकर कोलकाता से बुलाई गयीं नेताजी की भतीजी ललिता बोस रोने लगी और बेहोश हो गई। क्योंकि उसमें नेता जी और ललिता जी के माता-पिता के बीच हुए पत्राचार के हस्त लिखित प्रमाण भी थे। उनके परिवार के तमाम फोटो थे। जिनमें नेताजी के माता पिता का फ्रेम किया फोटो भी है। तब ललिता बोस ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर के इन सामानों को सरकार की ट्रेज़री में जमा करवाने की माँग की। अदालत ने भी ये माना कि ‘गुमनामी बाबा’ के ये सब सामान राष्ट्रीय महत्व के है। तब फैजाबाद के जिलाधिकारी ने उन 2760 सामानों की सूची बनवाकर ट्रेज़री में जमा करवा दिया। बरसों बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने इन सामानों को ‘राम कथा संग्रहालय’ अयोध्या में जन प्रदर्शन के लिए रखवा दिया। पता नहीं क्यों अब ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ उन्हें वहाँ से हटाने की प्रक्रिया चला रहा है?



इन सामानों में गुमनामी बाबा (नेताजी) के तीन चश्मे, जापानी क्रॉकरी, बहुत मंहगी जर्मन दूरबीन, ब्रिटिश टाइपराइटर, आईएनए की वर्दी जो नेता जी के साइज़ की हैं। लगभग एक हज़ार पुस्तकें जो राजनीति, साहित्य, इतिहास, युद्ध नीति, होम्योपैथी, धार्मिक विषयों आदि पर हैं व मुख्यतः अंग्रेज़ी में हैं। तीन विदेशी सिगार पाइप, पाँच बोरों में देश विदेश के अख़बारों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में छपी ख़बरों की कतरने, आईएनए के वरिष्ठ अधिकारियों से उनका नियमित पत्राचार व आरएसएस प्रमुख श्री गुरु गोलवलकर का गुमनामी बाबा के नाम लिखा एक पत्र भी मिला है। इसके अलावा एक बड़े गत्ते पर गुमनामी बाबा के रूस से चीन, तिब्बत और नेपाल के रास्ते बस्ती (ऊ प्र) आने के मार्ग का हाथ से बना विस्तृत नक़्शा भी है।



अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष के शोध से पता चलता है कि नेता जी विमान दुर्घटना की झूठी कहानी के आवरण में रूस पहुँच गए। जहाँ रूस की सरकार ने उन्हें गुलाग में एक बंगला, दो अंगरक्षक, एक कार और ड्राइवर की सुविधा के साथ महफ़ूज़ रखा। तीन साल गुमनाम रूप से रूस में रहने के बाद वे चीन, तिब्बत और नेपाल के रास्ते एक संत के वेश में भारत आए और 16 सितंबर 1985 को अपनी मृत्यु तक पर्दे के पीछे ही छिप कर रहे। पर्दे के भीतर जा कर उन्हें केवल फैजाबाद का डॉ बनर्जी व मिश्रा जी का परिवार ही देख सकता था। उनकी दबंग आवाज़, बंगाली उच्चारण में हिंदी और फर्राटेदार अंग्रेजी सुन कर पर्दे के सामने बैठा हर व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। फिर भी सबको यह हिदायत थी कि उनके सामने ‘सुभाष’ नाम नहीं लिया जाएगा। सब उन्हें ‘भगवन जी’ कह कर ही बुलाते थे। जिस व्यक्ति की मृत्यु पर 13 लाख लोग जमा होने चाहिए थे, उनके अंतिम संस्कार में मात्र यही 13 लोग थे। उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी के किनारे अयोध्या के ‘गुप्तार घाट’ पर किया गया, जहाँ उनकी समाधि है। गुप्तार घाट वही स्थल है, जहाँ भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने जल समाधि ली थी। हज़ारों साल में उस पवित्र स्थल पर आजतक केवल गुमनामी बाबा का ही अंतिम संस्कार हुआ है। सारा ज़िला प्रशासन और पुलिस दूर खड़े उनका अंतिम संस्कार देखते रहे।



इतना कुछ प्रमाण उपलब्ध है फिर भी आज तक केंद्र की कोई सरकार गुमनामी बाबा की सही पहचान को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने को तैयार नहीं है। मोदी सरकार तक भी नहीं। जबकि मोदी जी ने इंडिया गेट के सामने की छतरी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की खड़ी प्रतिमा स्थापित करने का पुण्य कार्य किया है। आरएसएस के दिवंगत सर संघ चालक के एस सुदर्शन जी का एक सार्वजनिक वीडियो वक्तव्य है, जो यूट्यूब पर भी उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने साफ़ कहा है कि गुमनामी बाबा ही नेता जी सुभाष चंद्र बोस थे। अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष बताते हैं कि पंडित नेहरू से लेकर मोदी जी तक हर प्रधान मंत्री को इसकी जानकारी है और नेताजी से 1945 तक जुड़े रहे उनके सहयोगी नेता उनसे मिलने जाते रहे। पर साधना में लीन गुमनामी बाबा ये नहीं चाहते थे कि कोई उनकी असलियत जाने।  

Monday, August 4, 2025

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत को तोहफ़ा?

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयात होने वाले सामानों पर 25% टैरिफ और रूस से तेल और हथियारों की खरीद के लिए अतिरिक्त दंड की घोषणा की। यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से तब जब दोनों देश एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। ट्रम्प ने भारत और रूस को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ (डेड इकॉनमी) कहकर निशाना बनाया और भारत के उच्च टैरिफ और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं को इसका कारण बताया।


डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने वाली आक्रामक टैरिफ नीतियों को अपनाया है। 7 अगस्त 2025 से लागू होने वाले 25% टैरिफ का ऐलान करते हुए, ट्रम्प ने भारत के रूस से तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद को प्रमुख कारण बताया। उनके अनुसार, भारत रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है, जो यूक्रेन में रूस के सैन्य अभियान के समय में अस्वीकार्य है। इसके अतिरिक्त, ट्रम्प ने भारत के उच्च टैरिफ (जिसे उन्होंने दुनिया में सबसे अधिक बताया) और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं की भी आलोचना की।



यह टैरिफ अचानक भारत के लिए एक झटके के रूप में आया है, क्योंकि भारत और अमेरिका पिछले कुछ महीनों से एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे थे। ट्रम्प ने पहले 20-25% टैरिफ की संभावना जताई थी, लेकिन अंतिम घोषणा में अतिरिक्त दंड भी शामिल किया गया। यह कदम भारत के फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, रत्न और आभूषण, और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है, जो अमेरिका के साथ भारत के व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।


कांग्रेस के नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ट्रम्प के ‘मृत अर्थव्यवस्था’ वाले बयान का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, हां, ट्रम्प सही हैं। हर कोई जानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मृत है, सिवाय प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के। मुझे खुशी है कि ट्रम्प ने यह तथ्य सामने रखा। पूरी दुनिया जानती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था खत्म हो चुकी है। भाजपा ने अडानी को मदद करने के लिए अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया।



राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए, विशेष रूप से नोटबंदी और ‘त्रुटिपूर्ण’ जीएसटी को अर्थव्यवस्था के पतन का कारण बताया। उन्होंने यह भी पूछा कि ट्रम्प के भारत-पाकिस्तान सीजफायर को लेकर बार बार किए जा रहे दावों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी क्यों है?



कांग्रेस पार्टी ने इस टैरिफ को भारत की विदेश नीति की विफलता के रूप में चित्रित किया। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, राहुल गांधी ने पहले ही इस बारे में चेतावनी दी थी। यह टैरिफ हमारी अर्थव्यवस्था, निर्यात, उत्पादन और रोजगार पर असर डालेगा। हम अमेरिका को फार्मास्यूटिकल्स निर्यात करते हैं और 25% टैरिफ से ये महंगे हो जाएंगे, जिससे मांग कम होगी और उत्पादन व रोजगार पर असर पड़ेगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए और टैरिफ को भारत के व्यापार, एमएसएमई और किसानों के लिए हानिकारक बताया।


अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना की। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बुरे दिनों की शुरुआत बताया, जबकि असदुद्दीन ओवैसी ने ट्रम्प को व्हाइट हाउस का जोकर कहकर उनकी आलोचना की। हालांकि, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी के रुख से अलग हटकर अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। शशि थरूर ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत-अमेरिका व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं और भारत को अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता है।


वहीं अर्थशास्त्रियों ने इस टैरिफ के भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को लेकर मिश्रित राय व्यक्त की है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रभाव सीमित होगा, जबकि अन्य ने दीर्घकालिक नुकसान की चेतावनी दी है। ईन्वेस्टमेंट इनफार्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया (आईसीआरए) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, प्रस्तावित टैरिफ और दंड हमारी अपेक्षा से अधिक हैं और इससे भारत की जीडीपी वृद्धि पर असर पड़ सकता है। प्रभाव की गंभीरता दंड के आकार पर निर्भर करेगी। अर्नेस्ट एंड यंग इंडिया (ई वाई) के व्यापार नीति विशेषज्ञ अग्नेश्वर सेन ने बताया कि टैरिफ से समुद्री उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, चमड़ा और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होंगे। ये क्षेत्र भारत-अमेरिका व्यापार में मजबूत हैं, और टैरिफ से इनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।


फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट के राहुल अहलूवालिया ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत को वियतनाम और चीन जैसे अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कमजोर स्थिति में ला सकता है। उनके अनुसार, निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं का भारत की ओर स्थानांतरण अब संभावना नहीं है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने आशावादी रुख अपनाया। फिक्की के अध्यक्ष हर्षवर्धन अग्रवाल ने कहा, हालांकि यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण है और हमारे निर्यात पर असर डालेगा, हमें उम्मीद है कि यह एक अल्पकालिक घटना होगी और दोनों पक्ष जल्द ही एक स्थायी व्यापार समझौते पर पहुंच जाएंगे।


भारत सरकार ने इस मुद्दे पर सतर्क और संयमित रुख अपनाया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा, हम राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएंगे। भारत ने एक दशक में ‘फ्रैजाइल फाइव’ से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का सफर तय किया है। सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि भारत तत्काल जवाबी टैरिफ लगाने के बजाय बातचीत के रास्ते को अपनाएगा। एक सूत्र ने कहा, चुप्पी सबसे अच्छा जवाब है। हम बातचीत की मेज पर इस मुद्दे को हल करेंगे। 

कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ और अतिरिक्त दंड ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। राहुल गांधी और विपक्ष ने इसे सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की विफलता के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि अर्थशास्त्रियों ने इसके मिश्रित प्रभावों की ओर इशारा किया है। जहां कुछ क्षेत्रों पर तत्काल असर पड़ सकता है, वहीं भारत के पास अन्य बाजारों में विविधता लाने और बातचीत के जरिए समाधान खोजने का अवसर है। यह स्थिति न केवल आर्थिक बल्कि भूराजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों को संतुलित करना होगा। देखना यह है कि आनेवाले दिनों में सरकार इस समस्या से कैसे निपटती है।  

Monday, July 21, 2025

बढ़ती बेरोज़गारी एक विकट समस्या

पिछले दिनों खबर छपी कि उत्तर प्रदेश में 2 हज़ार पदों के लिए 29 लाख आवेदन प्राप्त हुए। इसी तरह एक बार ऐसी भी खबर आई थी कि आईआईटी से पास हुए 38 फ़ीसदी युवाओं को रोज़गार नहीं मिला। अक्सर यह देखा जाता है कि जब भी कभी कोई सरकारी पद पर भर्ती खुलती है तो कुछ हज़ार पदों के लिए लाखों आवेदन आ जाते हैं। फिर वो पद छोटा हो या बड़ा, उस पद की योग्यता से अधिक योग्य आवेदक अपना आवेदन देते हैं। बात बिहार की हो उत्तर प्रदेश की या देश में किसी अन्य राज्य की, जब भी एक पद पर उम्मीद से ज़्यादा आवेदन आते हैं तो स्थिति अनियंत्रित हो जाती है। 



आज के दौर में अगर ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ किन्ही कारणों से ऐसे सवालों को जनता तक नहीं पहुँचाता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि जनता तक वह सवाल पहुँच नहीं पाएँगे। सोशल मीडिया पर ऐसे सैंकड़ों इंटरव्यू देखें जा सकते हैं जो बेरोज़गारी की भयावय समस्या से जूझते युवाओं की हताशा दर्शाते हैं। जब ये युवा रोज़गार की माँग लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो इनके राज्यों की सरकारें पुलिस से इन पर डंडे बरसाती हैं। अगर युवाओं को सरकारी नौकरी मिलने की भी उम्मीद नहीं होगी तो हार कर उन्हें निजी क्षेत्र में जाना पड़ेगा और निजी क्षेत्र की मनमानी का सामना करना पड़ेगा। दिक्कत यह है कि निजी क्षेत्र में भी रोज़गार की संभावनाएँ बहुत तेज़ी से घटती जा रही हैं। इससे और हताशा फ़ैल रही है। नौकरी नहीं मिलती तो युवाओं की शादी नहीं होती और उनकी उम्र बढ़ती जाती है। समाज शास्त्रीय शोधकर्ताओं को इस विषय पर शोध करना चाहिए कि इन करोड़ों बेरोज़गार युवाओं की इस हताशा का समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? 



देश के आर्थिक और सामाजिक ढाँचे को देखते हुए शहरों में अनौपचारिक रोज़गार की मात्रा को क्रमशः घटा कर औपचारिक रोज़गार के अवसर को बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। देश की सिकुड़ती हुई अर्थव्यवस्था के कारण बेरोज़गारी ख़तरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है। एक शोध के अनुसार भवन निर्माण क्षेत्र में 50%, व्यापार, होटेल व अन्य सेवाओं में 47%, औद्योगिक उत्पादन क्षेत्र में 39% और खनन क्षेत्र में 23% बेरोज़गारी फैल चुकी है। 



चिंता की बात यह है कि ये वो क्षेत्र हैं जो देश को सबसे ज़्यादा रोज़गार देते हैं। इसलिए उपरोक्त आँकड़ों का प्रभाव भयावह है। जिस तीव्र गति से ये क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं उससे तो और भी तेज़ी से बेरोज़गारी बढ़ने की स्थितियाँ पैदा हो रही हैं। दो वक्त की रोटी का भी जुगाड़ न कर पाने की हालत में लाखों मज़दूर व अन्य लोग जिस तरह लॉकडाउन शुरू होते ही पैदल ही अपने गाँवों की ओर चल पड़े उससे इस स्थिति की भयावयता का पता चलता है।



उल्लेखनीय है कि दक्षिण एशिया के देशों में अनौपचारिक रोज़गार के मामले में भारत सबसे ऊपर है। जिसका मतलब हुआ कि हमारे देश में करोड़ों मज़दूर कम मज़दूरी पर, बेहद मुश्किल हालातों में काम करने पर मजबूर हैं, जहां इन्हें अपने बुनियादी हक़ भी प्राप्त नहीं हैं। इन्हें नौकरी देने वाले जब चाहे रखें, जब चाहें निकाल दें। क्योंकि इनका ट्रेड यूनीयनों में भी कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार भारत में 53.5 करोड़ मज़दूरों में से 39.8 करोड़ मज़दूर अत्यंत दयनीय अवस्था में काम करते हैं। जिनकी दैनिक आमदनी 200 रुपय से भी कम होती है। इसलिए मोदी सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियाँ हैं। पहली; शहरों में रोज़गार के अवसर कैसे बढ़ाए जाएं? क्योंकि पिछले 7 वर्षों में बेरोज़गारी का फ़ीसदी लगातार बढ़ता गया है। दूसरा; शहरी मज़दूरों की आमदनी कैसे बढ़ाएँ, जिससे उन्हें अमानवीय स्थित से बाहर निकाला जा सके।


इसके लिए तीन काम करने होंगे। भारत में शहरीकरण का विस्तार देखते हुए, शहरी रोज़गार बढ़ाने के लिए स्थानीय सरकारों के साथ समन्वय करके नीतियाँ बनानी होंगी। इससे यह लाभ भी होगा कि शहरीकरण से जो बेतरतीब विकास और गंदी बस्तियों का सृजन होता है उसको रोका जा सकेगा। इसके लिए स्थानीय शासन को अधिक संसाधन देने होंगे। दूसरा; स्थानीय स्तर पर रोज़गार सृजन वाली विकासात्मक नीतियाँ लागू करनी होंगी। तीसरा; शहरी मूलभूत ढाँचे पर ध्यान देना होगा जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था भी सुधरे। चौथा; देखा यह गया है, कि विकास के लिए आवंटित धन का लाभ शहरी मज़दूरों तक कभी नहीं पहुँच पाता और ऊपर के लोगों में अटक कर रह जाता है। इसलिए नगर पालिकाओं में विकास के नाम पर ख़रीदी जा रही भारी मशीनों की जगह अगर मानव श्रम आधारित शहरीकरण को प्रोत्साहित किया जाएगा तो शहरों में रोज़गार बढ़ेगा। पाँचवाँ; शहरी रोज़गार योजनाओं को स्वास्थ्य और सफ़ाई जैसे क्षेत्र में तेज़ी से विकास करके बढ़ाया जा सकता है। क्योंकि हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आज यह हालत नहीं है कि वो प्रवासी मज़दूरों को रोज़गार दे सके। अगर होती तो वे गाँव छोड़ कर शहर नहीं गए होते। 


मौजूदा हालात में यह सोचना कि पढ़े-लिखे युवाओं के लिए एक ऐसी योजना लानी पड़ेगी जिससे इनको भी रोज़गार मिल जाए। पर ऐसा करने से करोड़ों बेरोज़गारों का एक छोटा सा अंश ही संभल पाएगा। जबकि बेरोज़गारों में ज़्यादा तादाद उन नौजवानों की है जो आज देश में बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेकर भी बेरोज़गार हैं। उनका आक्रोश इतना बढ़ चुका है और सरकारी तंत्र द्वारा नौकरी के बजाए लाठियों ने आग में घी का काम किया है। कुछ वर्ष पहले सोशल मीडिया पर एक व्यापक अभियान चला कर देश के बेरोज़गार नौजवानों ने प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस को ही ‘बेरोज़गारी दिवस’ के रूप में मनाया था। उस समय इसी कॉलम में मैंने कहा था कि ये एक ख़तरनाक शुरुआत है जिसे केवल वायदों से नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में शिक्षित रोज़गार उपलब्ध कराकर ही रोका जा सकता है। मोदी जी ने 2014 के अपने चुनावी अभियान के दौरान प्रतिवर्ष 2 करोड़ नए रोज़गार सृजन का अपना वायदा अगर निभाया होता तो आज ये हालात पैदा न होते।

यहाँ ये उल्लेख करना भी ज़रूरी है कि कोई भी राजनैतिक दल जो अपने चुनावी अभियान में बेरोजगारी दूर करने का सपना दिखता है, वो सत्ता में आने के बाद अपना वायदा पूरा नहीं करता। इसलिए सभी राजनैतिक दलों को मिल बैठ कर इस भयावय समस्या के निदान के लिए एक नई आर्थिक नीति पर सहमत होना पड़ेगा। जिसके माध्यम से देश की सम्पदा, चंद हाथों तक सीमित होने के बजाय उसका विवेकपूर्ण बँटवारा हो। छोटे और मंझले उद्योगों के तेज़ी से बंद होने की मजबूरी को दूर करना होगा और इन उद्योगों को अविलंब पुनः स्थापित करने की दिशा में ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे। 

Monday, July 14, 2025

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना: पर्यावरण से खिलवाड़

ग्रेट निकोबार द्वीप, जो भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का हिस्सा है, अपनी अनूठी जैव विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यह द्वीप भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु, इंदिरा पॉइंट, होने के साथ-साथ यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व भी है। कुछ समय पहले नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित 72,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना ने इस क्षेत्र को वैश्विक व्यापार, पर्यटन और सामरिक महत्व का केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है। इस परियोजना में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और एक गैस और सौर ऊर्जा आधारित पावर प्लांट का निर्माण शामिल है। इस परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं।



ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को नीति आयोग ने 2021 में शुरू किया था, जिसका उद्देश्य इस द्वीप को एक आर्थिक और सामरिक केंद्र के रूप में विकसित करना है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जो विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। परियोजना के तहत 16,610 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया जाएगा, जिसमें से 130.75 वर्ग किलोमीटर प्राचीन वन क्षेत्र शामिल है। इस परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों ने इसे विवादों के केंद्र में ला खड़ा किया है।


ग्रेट निकोबार द्वीप 1989 में बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया था और 2013 में यूनेस्को के मैन एंड बायोस्फीयर प्रोग्राम में शामिल किया गया। यह द्वीप 1,767 प्रजातियों के साथ एक समृद्ध जैव विविधता का घर है, जिसमें 11 स्तनधारी, 32 पक्षी, 7 सरीसृप और 4 उभयचर प्रजातियां शामिल हैं, जो इस क्षेत्र में स्थानिक हैं। परियोजना के लिए लगभग 9.6 लाख से 10 लाख पेड़ों की कटाई की जाएगी, जो द्वीप के प्राचीन वर्षावनों को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगी। यह न केवल स्थानीय वनस्पतियों और जीवों को प्रभावित करेगा, बल्कि प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ्स) और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचाएगा।



गलाथिया खाड़ी, जहां ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल प्रस्तावित है, लेदरबैक कछुओं और निकोबार मेगापोड पक्षियों का प्रमुख प्रजनन स्थल है। 2021 में गलाथिया खाड़ी वन्यजीव अभयारण्य को डिनोटिफाई कर दिया गया, जो भारत के राष्ट्रीय समुद्री कछुआ संरक्षण योजना (2021) के विपरीत है। यह कछुओं और अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है, क्योंकि बंदरगाह निर्माण से होने वाला प्रदूषण, ड्रेजिंग, और जहाजों की आवाजाही उनके प्रजनन और अस्तित्व को प्रभावित करेगी।



द्वीप पर शोम्पेन और निकोबारी आदिवासी समुदाय रहते हैं, जो विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत हैं। ये समुदाय अपनी आजीविका और संस्कृति के लिए जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। परियोजना से इनके पारंपरिक क्षेत्रों का 10% हिस्सा प्रभावित होगा, जिससे उनकी सामाजिक संरचना और जीविका पर खतरा मंडराएगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बाहरी लोगों के संपर्क से इन जनजातियों में रोगों का खतरा बढ़ सकता है, जिससे उनकी आबादी विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकती है।


ग्रेट निकोबार द्वीप अंडमान-सुमात्रा फॉल्ट लाइन पर स्थित है, जो भूकंप और सुनामी के लिए अत्यधिक संवेदनशील है। 2004 की सुनामी ने इस क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया था। पर्यावरण प्रभाव आकलन में भूकंपीय जोखिमों को कम करके आंका गया है और विशेषज्ञों का कहना है कि परि

योजना के लिए साइट-विशिष्ट भूकंपीय अध्ययन नहीं किए गए। यह एक बड़े पैमाने पर आपदा का कारण बन सकता है।


परियोजना के लिए काटे गए जंगलों की भरपाई के लिए हरियाणा और मध्य प्रदेश में प्रतिपूरक वनीकरण का प्रस्ताव है। लेकिन ये क्षेत्र निकोबार की जैव विविधता से कोई समानता नहीं रखते। यह पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करने में असमर्थ है।


पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया और मूल्यांकन दस्तावेजों को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर गोपनीय रखा गया है। विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल हवाई अड्डे का सामरिक महत्व हो सकता है, न कि पूरी परियोजना का। पारदर्शिता की यह कमी परियोजना की वैधता पर सवाल उठाती है।


विपक्षी दलों, विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ने परियोजना को "पारिस्थितिक और मानवीय आपदा" करार दिया है। पर्यावरणविदों और नागरिक समाज संगठनों ने इसे जैव विविधता और आदिवासी अधिकारों के लिए खतरा बताया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2023 में परियोजना की पर्यावरण और वन मंजूरी की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी, लेकिन इसके बावजूद परियोजना को आगे बढ़ाने में जल्दबाजी दिखाई दे रही है।


ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पारदर्शी और व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन, आदिवासी समुदायों के साथ उचित परामर्श और भूकंपीय जोखिमों का सटीक मूल्यांकन आवश्यक है। इसके साथ ही, परियोजना के आर्थिक व्यवहार्यता की पुन: समीक्षा होनी चाहिए, क्योंकि भारत में हाल ही में शुरू हुआ विशाखापत्तनम का ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल पहले से ही वैश्विक व्यापार में योगदान दे रहा है।


पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। जैसे कि परियोजना क्षेत्र को CRZ 1A क्षेत्रों से बाहर रखा जाए। आदिवासी समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। भूकंपीय जोखिमों के लिए साइट-विशिष्ट अध्ययन किए जाएं। निकोबार के भीतर ही प्रतिपूरक वनीकरण पर ध्यान दिया जाए।


ग्रेट निकोबार द्वीप भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। इसे बचाने के लिए विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना होगा। भ्रामक तथ्यों के आधार पर जल्दबाजी में लिए गए निर्णय न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएंगे, बल्कि भारत की वैश्विक पर्यावरण संरक्षण प्रतिबद्धताओं को भी कमजोर करेंगे। 

Monday, July 7, 2025

महाराष्ट्र में भाषा विवाद

मला ही भाषा येत नाही। भाषा संवाद के लिए होती है, झगड़े उपद्रव के लिए नहीं। झगड़े उपद्रव के लिए लट्ठबाजी, गोलीबारी होती है। गले लगा लो तो बिना भाषा के भी संवाद हो जाता है।


राष्ट्र में महाराष्ट्र का होना गौरव और गरिमा की बात है। महाराष्ट्र की उत्कृष्ट सभ्यता संस्कृति है। इसे क्षुद्र स्तर पर न ले आने के लिए हम सजग सावधान रहें तो इसकी सभ्यता-संस्कृति पूरे विश्व में जगमगाती रहेगी। मराठी-गुजराती-हिंदी-अंग्रेज़ी की यहाँ सब नदियां एक ही महासागर से जुडी हैं। इसलिए यहाँ संकीर्णता नहीं, उदारता ही प्रवाहमान होती है। सभ्यता-संस्कृति का दीप-स्तम्भ बनती है। यह कहना है स्वामी चैतन्य कीर्ति का। 


इस विषय में ओशो क्या कहते हैं: एक मित्र ने पूछा है कि क्या भारत में कोई राष्ट्रभाषा होनी चाहिए? यदि हां, तो कौन सी?



राष्ट्रभाषा का सवाल ही भारत में बुनियादी रूप से गलत है। भारत में इतनी भाषाएं हैं कि राष्ट्रभाषा सिर्फ लादी जा सकती है और जिन भाषाओं पर लादी जाएगी उनके साथ अन्याय होगा। भारत में राष्ट्रभाषा की कोई भी जरूरत नहीं है। भारत में बहुत सी राष्ट्रभाषाएं ही होंगी और आज कोई कठिनाई भी नहीं है कि राष्ट्रभाषा जरूरी हो। रूस बिना राष्ट्रभाषा के काम चलाता है तो हम क्यों नहीं चला सकते? आज तो यांत्रिक व्यवस्था हो सकती है संसद में, बहुत थोड़े खर्च से, जिसके द्वारा एक भाषा सभी भाषाओं में अनुवादित हो जाए।


लेकिन राष्ट्रभाषा का मोह बहुत महंगा पड़ रहा है। भारत की प्रत्येक भाषा राष्ट्रभाषा होने में समर्थ है इसलिए कोई भी भाषा अपना अधिकार छोड़ने को राजी नहीं होगी, होना भी नहीं चाहिए। लेकिन यदि हमने जबरदस्ती किसी भाषा को राष्ट्रभाषा बना कर थोपने की कोशिश की तो देश खंड-खंड हो जाएगा। आज देश के बीच विभाजन के जो बुनियादी कारण हैं उनमें भाषा एक है। राष्ट्रभाषा बनाने का खयाल ही राष्ट्र को खंड-खंड में तोड़ने का कारण बनेगा। अगर राष्ट्र को बचाना हो तो राष्ट्रभाषा से बचना पड़ेगा और अगर राष्ट्र को मिटाना हो तो राष्ट्रभाषा की बात आगे भी जारी रखी जा सकती है।



मेरी दृष्टि में भारत में जितनी भाषाएं बोली जाती हैं, सब राष्ट्रभाषाएं हैं। उनको समान आदर उपलब्ध होना चाहिए। किसी एक भाषा का साम्राज्य दूसरी भाषाओं पर बरदाश्त नहीं किया जाएगा, वह भाषा चाहे हिंदी हो और चाहे कोई और हो। कोई कारण नहीं है कि तमिल, तेलगू, बंगाली या गुजराती को हिंदी दबाए। लेकिन गांधी जी के कारण कुछ बीमारियां इस देश में छूटीं, उनमें एक बीमारी हिंदी को राष्ट्रभाषा का वहम देने की भी है। हिंदी को यह अहंकार गांधी जी दे गए कि वह राष्ट्रभाषा है। तो हिंदी प्रांत उस अहंकार से परेशान हैं और वह अपनी भाषा को पूरे देश पर थोपने की कोशिश में लगे हुए हैं। हिंदी का साम्राज्य भी बरदाश्त नहीं किया जा सकता है, तो किसी भाषा का नहीं किया जा सकता हैं। सिर्फ संसद में हमें यांत्रिक व्यवस्था करनी चाहिए कि सारी भाषाएं अनुवादित हो सकें। और वैसे भी संसद कोई काम तो कोई करती नहीं है कि कोई अड़चन हो जाएगी। सालों तक एक-एक बात पर चर्चा चलती है, थोड़ी देर और चल लेगी तो कोई फर्क नहीं होने वाला है। संसद कुछ करती हो तो भी विचार होता कि कहीं कार्य में बाधा न पड़ जाए। कार्य में कोई बाधा पड़ने वाली नहीं मालूम होती हैं।



फिर मेरी दृष्टि यह भी है कि यदि हम राष्ट्रभाषा को थोपने का उपाय न करें तो शायद बीस पच्चीस वर्षोंं में कोई एक भाषा विकसित हो और धीरे-धीरे राष्ट्र के प्राणों को घेर ले। वह भाषा हिंदी नहीं होगी, वह भाषा हिंदुस्तानी होगी। उसमें तमिल के शब्द भी होंगे, तेलगू के भी, अंग्रेजी के भी, गुजराती के भी, मराठी के भी। वह एक मिश्रित नई भाषा होगी जो धीरे-धीरे भारत के जीवन में से विकसित हो जाएगी। लेकिन, अगर कोई शुद्धतावादी चाहता हो कि शुद्ध हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना है तो यह सब पागलपन की बातें है। इससे कुछ हित नहीं हो सकता है। यह तो थी ओशो की सोच। 


महाराष्ट्र, एक ऐसा राज्य है जो अपनी सांस्कृतिक समृद्धि और मराठी भाषा के लिए जाना जाता है, आज भाषा विवाद के कारण चर्चा में है। मराठी, जो इस राज्य की आत्मा है, न केवल एक भाषा है, बल्कि महाराष्ट्र की पहचान, इतिहास और गौरव का प्रतीक भी है। हाल के वर्षों में, मराठी भाषा के उपयोग और सम्मान को लेकर कई विवाद सामने आए हैं, जो सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर तनाव का कारण बन रहे हैं।


महाराष्ट्र में मराठी को प्राथमिकता देने की मांग लंबे समय से चली आ रही है। विशेष रूप से मुंबई जैसे महानगरों में, जहां विविधता अपनी चरम सीमा पर है, मराठी भाषा को कई बार उपेक्षित महसूस किया जाता है। गैर-मराठी भाषी समुदायों की उपस्थिति और वैश्वीकरण के प्रभाव ने मराठी के उपयोग को कुछ हद तक सीमित किया है। यह स्थिति स्थानीय लोगों में असंतोष को जन्म देती है, जो अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, साहित्य और परंपराओं का वाहक भी है। मराठी साहित्य, जिसमें संत ज्ञानेश्वर से लेकर आधुनिक लेखकों तक का योगदान शामिल है, जो विश्व स्तर पर अपनी गहराई के लिए जाना जाता है। फिर भी, सरकारी कार्यालयों, शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों पर मराठी के उपयोग में कमी देखी जा रही है। यह स्थिति मराठी भाषी समुदाय के लिए चिंता का विषय है।


राज्य सरकार ने मराठी को अनिवार्य करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं, जैसे स्कूलों में मराठी पढ़ाई को बढ़ावा देना और सरकारी कार्यों में इसका उपयोग सुनिश्चित करना। लेकिन इन प्रयासों को और प्रभावी करने की आवश्यकता है। साथ ही, मराठी के प्रति सम्मान को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है। गैर-मराठी भाषी लोगों को भी मराठी सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि सामाजिक एकता मजबूत हो।


मराठी भाषा या देश की अन्य भाषा का संरक्षण केवल एक राज्य की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह हमारी साझा सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। विवादों को सुलझाने के लिए संवाद और सहयोग जरूरी है। मराठी व अन्य भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाने के लिए हमें एकजुट होकर प्रयास करना होगा, ताकि सभी भाषाएँ अपनी गरिमा और गौरव के साथ फलती-फूलती रहें। 

Monday, June 30, 2025

अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव: एक अनोखी दुनिया

41 साल बाद, भारत ने एक बार फिर अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति को मजबूत किया है। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने नासा के केनेडी स्पेस सेंटर से एक्सिओम-4 मिशन के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की यात्रा शुरू की, जिसने न केवल भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि 1.4 अरब भारतीयों के सपनों को भी पंख दिए। 


अंतरिक्ष स्टेशन की यात्रा एक ऐसा अनुभव है जो सामान्य मानवीय अनुभवों से परे है। यह न केवल वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि एक गहन व्यक्तिगत और दार्शनिक अनुभव भी है। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अपनी पहली अंतरिक्ष यात्रा के दौरान कहा, क्या कमाल की सवारी थी! यह उत्साह और आश्चर्य उनकी भावनाओं का प्रतीक है, जो हर उस व्यक्ति के मन में कौतूहल जगाता है जो अंतरिक्ष की सैर का सपना देखता है। 



अंतरिक्ष स्टेशन में प्रवेश करने पर सबसे पहला अनुभव शून्य गुरुत्वाकर्षण (माइक्रोग्रैविटी) का होता है। शुभांशु ने इसे शिशु की तरह चलना सीखने जैसा बताया। अंतरिक्ष यात्री को अपने शरीर को नियंत्रित करने, खाने, पढ़ने और यहां तक कि सोने के लिए भी नए तरीके सीखने पड़ते हैं। यह अनुभव चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ रोमांचक भी है। अंतरिक्ष में तैरना, जहां हर वस्तु हवा में लंगरहीन होती है, एक ऐसी अनुभूति है जो पृथ्वी पर असंभव है। 


इसके साथ ही अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखना एक गहन अनुभव है। नीले ग्रह की सुंदरता, बादलों की नाजुक परतें और महासागरों की विशालता अंतरिक्ष यात्रियों को प्रकृति और मानवता के प्रति गहरी जिम्मेदारी का एहसास कराती है। शुभांशु ने अपनी यात्रा के दौरान कहा, मैं दृश्यों का आनंद ले रहा हूं। यह दृश्य न केवल मनमोहक है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि हमारा ग्रह कितना नाजुक और अनमोल है।



अंतरिक्ष यात्रा शारीरिक और मानसिक रूप से कठिन होती है। लॉन्च के दौरान तीव्र जी-फोर्स का अनुभव, अंतरिक्ष में प्रारंभिक असुविधा और माइक्रोग्रैविटी में अनुकूलन की प्रक्रिया हर अंतरिक्ष यात्री के लिए एक कठिन परीक्षा होती है। शुभांशु ने हंसते हुए बताया कि उन्होंने अंतरिक्ष में काफी सोया जो उनके अनुकूलन का हिस्सा था। इसके अलावा, अंतरिक्ष स्टेशन पर लंबे समय तक रहने से मांसपेशियों का क्षय और हड्डियों की कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जिनका अध्ययन इस मिशन का एक हिस्सा था।


अंतरिक्ष स्टेशन पर समय केवल दृश्यों का आनंद लेने तक सीमित नहीं है। एक्सिओम-4 मिशन के दौरान शुभांशु और उनकी टीम ने 60 से अधिक वैज्ञानिक प्रयोग किए, जिनमें से सात भारत के थे। इन प्रयोगों में माइक्रोग्रैविटी में फसल बीजों का प्रभाव, मांसपेशियों के क्षय का अध्ययन और डीएनए मरम्मत जैसे विषय शामिल थे। यह कार्य न केवल वैज्ञानिक खोजों को बढ़ावा देता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी मजबूत करता है।



41 साल पहले, 1984 में, विंग कमांडर राकेश शर्मा ने सोवियत यूनियन के सोयुज टी-11 मिशन के तहत अंतरिक्ष में कदम रखा था। तब से, भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन मानव अंतरिक्ष उड़ान में यह दूसरा बड़ा कदम है। शुभांशु शुक्ला की अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यात्रा भारत के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है।


शुभांशु की एक्सिओम-4 मिशन में भागीदारी भारत के पहले मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन, गगनयान (2027), के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इसरो ने इस मिशन के लिए 5 अरब रुपये ($59 मिलियन) का निवेश किया, ताकि शुभांशु को प्रशिक्षण और अंतरिक्ष अनुभव प्राप्त हो सके। इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने कहा, इस मिशन से प्राप्त अनुभव और प्रशिक्षण भारत के लिए अभूतपूर्व लाभकारी होगा। शुभांशु का यह अनुभव गगनयान के लिए लॉन्च प्रोटोकॉल, माइक्रोग्रैविटी अनुकूलन, और आपातकालीन तैयारी में मदद करेगा।


एक्सिओम-4 मिशन नासा, इसरो, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और निजी कंपनी एक्सिओम स्पेस के बीच सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मिशन भारत की बढ़ती वैश्विक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष समुदाय में इसके योगदान को दर्शाता है। पोलैंड और हंगरी के अंतरिक्ष यात्रियों के साथ, यह मिशन वैश्विक एकता और साझा वैज्ञानिक लक्ष्यों का प्रतीक है।


शुभांशु की यात्रा ने भारत के युवाओं में अंतरिक्ष अनुसंधान के प्रति उत्साह जगाया है। लखनऊ में उनके स्कूल, सिटी मॉन्टेसरी स्कूल, में आयोजित वॉच पार्टी में सैकड़ों छात्रों ने उनके प्रक्षेपण को देखा और उत्साह के साथ तालियां बजाईं। इसरो ने शुभांशु के लिए भारतीय छात्रों के साथ बातचीत के आयोजन की योजना बनाई है, जो नई पीढ़ी को विज्ञान और प्रौद्योगिकी में करियर बनाने के लिए प्रेरित करेगा।


भारत ने 2035 तक अपनी अंतरिक्ष स्टेशन, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने और 2040 तक चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्री भेजने की महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाई हैं। शुभांशु की अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यात्रा इन लक्ष्यों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भारत को न केवल तकनीकी रूप से सक्षम बनाता है, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष अनुसंधान में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करता है।


शुभांशु ने अपनी कक्ष से संदेश में कहा, मेरे कंधे पर तिरंगा मुझे बताता है कि मैं अकेला नहीं हूं, मैं आप सभी के साथ हूं। यह भावना 1.4 अरब भारतीयों के गर्व और एकता को दर्शाती है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि को 1.4 अरब भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतीक बताया। यह मिशन भारत की प्रगति और आत्मनिर्भरता का एक और प्रमाण है।


अंतरिक्ष स्टेशन की यात्रा एक ऐसी यात्रा है जो न केवल वैज्ञानिक खोजों को बढ़ावा देती है, बल्कि मानवता को अपनी सीमाओं से परे सोचने के लिए प्रेरित करती है। शुभांशु शुक्ला की एक्सिओम-4 मिशन में भागीदारी भारत के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है, जो 41 साल बाद अंतरिक्ष में देश की वापसी को चिह्नित करता है। यह मिशन न केवल गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसे भविष्य के मिशनों के लिए आधार तैयार करता है, बल्कि भारत के युवाओं को सपने देखने और उन्हें हासिल करने की प्रेरणा भी देता है। जैसा कि शुभांशु ने कहा, यह मेरी उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे देश की सामूहिक जीत है। यह यात्रा भारत के अंतरिक्ष युग के नए अध्याय की शुरुआत है।