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Monday, March 2, 2026

काठमांडू बनाम दिल्ली !

काठमांडू उस देश की राजधानी है जो आर्थिक प्रगति में भारत से कहीं पीछे है। पर हर मायने में भारत की राजधानी दिल्ली से कहीं आगे है। सारे शहर की सड़के और फुटपाथ बिल्कुल साफ़ हैं, जहाँ हर वक्त सफ़ाईकर्मी मुस्तैदी से डटे रहते हैं। ऐसा लगता है कि मोदी जी का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ भारत के लिए नहीं बल्कि नेपाल के लिए था। क्योंकि भारत की राजधानी दिल्ली में तो जहाँ निगाह डालिये वहीं कूड़े के अंबार लगे पड़े हैं। 


यही हाल काठमांडू शहर के सार्वजनिक शौचालयों का भी है। जो इतने साफ़ रहते हैं कि आश्चर्य होता है कि मानो किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के शौचालय हों। दूसरी ओर दिल्ली के ज़्यादातर सार्वजनिक शौचालयों की हालत इतनी खराब है कि आसानी से घुसने की हिम्मत नहीं पड़ती। काठमांडू की एक और ख़ासियत ने पिछले तीन दिनों में मेरा ध्यान आकर्षित किया। वो है यहाँ की ट्रैफ़िक व्यवस्था। सभी व्यस्त सड़कों पर महिला और पुरुष पुलिसकर्मी सतर्क और सक्रिय रह कर ट्रैफ़िक नियंत्रित करते हैं। इतना ही नहीं यहाँ के नागरिक भी ट्रैफ़िक नियमों का ज़िम्मेदारी से पालन करते हैं। सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली बात तो यह थी कि काठमांडू की सड़कों पर गाड़ियों के हॉर्न का कर्कश शोर बिल्कुल भी सुनाई नहीं देता। यहाँ के ट्रैफ़िक नियमों के अनुसार आपातकालीन स्थिति को छोड़ कर, सामान्य स्थिति में हॉर्न बजाना वर्जित है और इस नियम को न मानने पर जुर्माना ठोक दिया जाता है। इससे काठमांडू में ध्वनि प्रदूषण की कोई समस्या नहीं है। इसके साथ ही वायु प्रदूषण की तो यहाँ कोई समस्या ही नहीं है। जहाँ दिल्ली में AQI की मात्रा 400 तक पहुँच जाती है वहाँ काठमांडू का AQI नगण्य है। हालांकि इसके कई कारण हैं, एक तो कठमाड़ू एक घाटी में बसा है और चारों ओर पहाड़ों से घिरा है। दूसरा यहाँ की आबादी बहुत कम है और कारख़ानों की संख्या भी उतनी ज़्यादा नहीं। इसलिए वायु प्रदूषण की दिल्ली के साथ तुलना को छोड़ा भी जा सकता है। 



परंतु ऐसे कई अन्य कारण भी हैं जो काठमांडू को दिल्ली से बेहतर बनाते हैं। मिसाल के तौर पर यहाँ क़ानून व्यवस्था, दिल्ली की तुलना में काफ़ी व्यवस्थित है। यहाँ के नागरिक बताते हैं कि आधी रात को भी यहाँ महिलाएँ बेझिझक अकेली निकल सकती हैं। किसी भी तरह की छीना-झपटी नहीं होती। न ही महिलाओं के साथ किसी भी तरह की छेड़-छाड़ होती है। काठमांडू और नेपाल में कई विश्व प्रसिद्ध मंदिर भी हैं और पर्यटन की भी अनेकों जगह हैं। यहाँ जाने पर भी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के साथ किसी भी तरह का छल-कपट और नाजायज़ उगाही नहीं की जाती। प्रशासन की तरफ़ से जो भी कर्मचारी तैनात किए जाते हैं वो पर्यटकों की हर संभव सहायता करते दिखाई देते हैं। 



‘स्वच्छ भारत अभियान’ हो या कोई अन्य अभियान, किसी भी अभियान को प्रचारित करना आसान होता है, जो कि अखबारों और टीवी विज्ञापनों के ज़रिए किया जा सकता है। पर उस अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देश की जनता ने उसे किस सीमा तक आत्मसात किया। अब मोदी जी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को ही ले लीजिए। जितना इस अभियान का शोर मचा और प्रचार हुआ उसका 5 फ़ीसदी भी धरातल पर नहीं उतरा। भारत के किसी भी छोटे बड़े शहर, गांव या कस्बे में चले जाइए तो आपको गंदगी के अंबार पड़े दिखाई देंगे। इसलिए इस अभियान का निकट भविष्य में भी सफल होना संभव नहीं लगता। क्योंकि जमीनी चुनौतियां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। स्वदेशी अभियान की सफलता भी जन-जागरण, सतत् निगरानी और व्यवहार परिवर्तन पर निर्भर करती है। अगर आम नागरिक इसमें सक्रिय भूमिका निभाएँ तभी यह आंदोलन सफल होगा। 



निसंदेह ‘स्वच्छ भारत अभियान’ मोदी जी की एक प्रशंसनीय पहल थी। पहली बार किसी प्रधान मंत्री ने हमारे चारों ओर दिनों-दिन जमा होते जा रहे कूड़े के ढेरों की बढ़ती समस्या के निस्तारण का एक देश व्यापी अभियान छेड़ा था। उस समय बहुत से नेताओं, फिल्मी सितारों, मशहूर खिलाड़ियों व उद्योगपतियों तक ने हाथ में झाड़ू पकड़ कर फ़ोटो खिंचवा कर इस अभियान का श्रीगणेश किया था। पर सोचें आज हम कहाँ खड़े हैं? 


शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी सफाई व्यवस्था बनाना अब भी एक बड़ी चुनौती है। कचरा पृथक्करण, पुनः उपयोग और रीसायक्लिंग की जागरूकता में अपेक्षाकृत कमी दिखती है। कुछ जगहों पर शौचालयों के रख-रखाव, जल आपूर्ति और व्यवहार परिवर्तन को लेकर समस्याएं बनी हुई हैं। इसलिए अभियान के उद्देश्य और जमीनी सच्चाई में अंतर बना हुआ है और अनेक स्थानों पर पुराने तरीकों का पालन अब भी हो रहा है।


दिल्ली हो या देश का कोई अन्य शहर यदि कहीं भी एक औचक निरीक्षण किया जाए तो स्वच्छ भारत अभियान की सफलता का पता चल जाएगा। यदि इतने बड़े स्तर शुरू किए गए अभियान की सफलता अगर काफ़ी कम पाई जाती है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? निसंदेह स्थानीय निकाय जिम्मेदार हैं। किंतु हम सब नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं है। उल्लेखनीय है कि यदि हम नागरिक किसी साफ़ सुथरे मॉल या अन्य स्थान पर जाते हैं तो सभी नियमों का पालन करते हैं। कचरे को केवल कूड़ेदान में ही डालते हैं। इस तरह हम एक साफ़ सुथरी जगह को साफ़ रखने में सहयोग अवश्य देते हैं। लेकिन ऐसा क्या कारण है कि जहाँ किसी नियम को सख़्ती से लागू किया जाता है तो हम पूरा सहयोग देते हैं। परंतु जहाँ कहीं भी किसी नियम को लागू करने में एजेंसियां ढिलाई बरतती हैं या हमारे विवेक पर छोड़ देती हैं तो आम नागरिक भी उसे हल्के में ले लेता है। भाजपा या अन्य दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं, स्थानीय निकायों और हम सब आम नागरिकों को भी भारत को कचरा मुक्त देश बनाने के लिए अब कमर कसनी होगी। क्योंकि ये कार्य केवल नारों और विज्ञापनों से नहीं हो पाएगा।


आश्चर्य की बात तो यह है कि हम सब जानते हैं कि लगातार कचरे के ढेरों का, हमारे परिवेश में चारों तरफ़ बढ़ते जाना, हमारे व हमारी आनेवाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए कितना ख़तरनाक है? फिर भी हम सब निष्क्रिय बैठे हैं। हमें जागना होगा और इस समस्या से निपटने के लिए सक्रिय होना होगा। इसलिए नारे चाहे ‘स्वच्छता’ के लगें या ‘स्वदेशी’ के, जनता की भागीदारी के बिना, नारे नारे ही रहेंगे।  

Monday, February 16, 2026

एचबीए1सी टेस्ट पर नया अध्ययन: डायबिटीज की चुनौतियाँ

डायबिटीज, जिसे आधुनिक युग की महामारी कहा जा रहा है, भारत में करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत दुनिया का डायबिटीज कैपिटल है, जहां 10 करोड़ से अधिक लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं। डायबिटीज के निदान और नियंत्रण के लिए एचबीए1सी (ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट को ‘सोने का मानक’ माना जाता रहा है। यह टेस्ट पिछले दो-तीन महीनों की औसत ब्लड शुगर लेवल को मापता है, जो आसान, गैर-आक्रामक और विश्वसनीय लगता है। लेकिन फरवरी 2026 में ‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ - साउथईस्ट एशिया’ जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। यह अध्ययन, जो विशेष रूप से भारतीय और दक्षिण एशियाई आबादी पर केंद्रित है, चेतावनी देता है कि एनीमिया, हीमोग्लोबिन विकृतियों और अन्य कारकों के कारण एचबीए1सी टेस्ट गलत निदान कर सकता है, जिससे डायबिटीज का पता चार साल तक देरी से चल सकता है।


यह अध्ययन, प्रोफेसर अनूप मिश्रा और उनके सहयोगियों द्वारा लिखित, एचबीए1सी की सीमाओं पर गहन समीक्षा करता है। भारत में एनीमिया एक महामारी है – राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, 50% से अधिक वयस्क महिलाएं और 25% पुरुष एनीमिया से प्रभावित हैं। एनीमिया आयरन की कमी से लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या घटाता है, जिससे एचबीए1सी का स्तर कृत्रिम रूप से ऊंचा हो जाता है। परिणामस्वरूप, जो व्यक्ति डायबिटीज से ग्रस्त नहीं है, उसे गलत तरीके से डायबिटीज का मरीज घोषित कर दिया जा सकता है। इसके विपरीत, हीमोग्लोबिनोपैथी (जैसे थैलेसीमिया, जो भारत में 4% आबादी को प्रभावित करता है) या जी6पीडी की कमी एचबीए1सी को कम दिखा सकती है, जिससे वास्तविक डायबिटीज वाले मरीजों का निदान देरी से होता है।



अध्ययन के अनुसार, दक्षिण एशियाई लोगों में एचबीए1सी और वास्तविक ब्लड ग्लूकोज के बीच सहसंबंध कमजोर है। उदाहरण के लिए, एनीमिया वाले क्षेत्रों में एचबीए1सी पर निर्भरता से डायबिटीज का निदान 20-30% मामलों में गलत हो सकता है। यह न केवल निदान को प्रभावित करता है, बल्कि उपचार को भी, अनावश्यक दवाएं या देरी से उपचार से जटिलताएं जैसे हृदय रोग, किडनी फेलियर बढ़ सकती हैं। अध्ययन की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत जैसे विकासशील देशों में जहां एनीमिया और आनुवंशिक विकार आम हैं, एचबीए1सी को अकेले इस्तेमाल करना जोखिमपूर्ण है। यह पश्चिमी आबादी पर आधारित मानकों को सीधे लागू करने की भूल को उजागर करता है।



भारत में डायबिटीज का बोझ पहले से ही भारी है। आईसीएमआर के अनुसार, 2030 तक यह 13.5 करोड़ तक पहुंच सकता है। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि लाखों लोग अनदेखे डायबिटीज से पीड़ित हो सकते हैं, क्योंकि एचबीए1सी पर अंधविश्वास ने अन्य टेस्ट जैसे ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) या फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज (एफपीजी) को पीछे धकेल दिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत और महिलाओं के लिए यह खतरा अधिक है, जहां एनीमिया दर 60% से ऊपर है। देरी से निदान से न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य बिगड़ता है, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ भी बढ़ता है।


चिंता का मतलब घबराहट नहीं होना चाहिए। यह अध्ययन एक जागृति का संकेत है। भारतीयों की आनुवंशिक संरचना – जैसे ‘थ्रिफ्टी जीन’ हाइपोथेसिस, जो दक्षिण एशियाई लोगों में इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है – पहले से ही डायबिटीज को जन्मभूमि बनाती है। लेकिन एचबीए1सी की सीमाएं जानकर हम बेहतर रणनीति बना सकते हैं। अगर हम इसे नजरअंदाज करेंगे, तो ‘साइलेंट किलर’ जाने जाने वाली डायबिटीज और घातक हो जाएगी।


गौरतलब है कि फार्मा उद्योग, जो डायबिटीज मार्केट से सालाना अरबों-खरबों कमाता है, इस अध्ययन से हलचल में आ सकता है। भारत में एचबीए1सी टेस्ट किट्स का बाजार 500 करोड़ रुपये से अधिक का है। इस अध्ययन से बड़ी कमानियों की बिक्री प्रभावित हो सकती है, क्योंकि डॉक्टर अब कॉम्बिनेशन टेस्ट की सिफारिश करेंगे।  


संभावना है कि फार्मा कंपनियां वैकल्पिक डायग्नोस्टिक टूल्स पर निवेश बढ़ाएंगी। दवाओं के मामले में भी सदियों से चली आ रही दवाओं पर सीधा असर कम होगा, क्योंकि निदान गलत होने से उपचार की शुरुआत प्रभावित होगी, लेकिन एक बार निदान हो जाए तो दवाओं को उसी मुताबिक दिया जाएगा। हालांकि, फार्मा इंडस्ट्री की लॉबी इस  अध्ययन को चुनौती दे सकती है, यह दावा करते हुए कि एचबीए1सी अभी भी उपयोगी है। वहीं वैश्विक स्तर पर, कुछ कंपनियां, जो अलग तरह के जांच उपकरण व दवाएँ बेचती हैं, इस नए अध्ययन को मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं। कुल मिलाकर, यह उद्योग के लिए एक अवसर भी साबित हो सकता है, जो बाजार को नया आयाम देगा। लेकिन अगर प्रतिक्रिया नकारात्मक हुई, तो नियामक दबाव बढ़ सकता है।


भारतीय डॉक्टर इस अध्ययन से सहमत हैं, लेकिन घबराहट की बजाय सतर्कता की वकालत करते हैं। प्रोफेसर अनूप मिश्रा, अध्ययन के मुख्य लेखक और फोर्टिस सीकेडी हॉस्पिटल के चेयरमैन, कहते हैं, एचबीए1सी पर पूर्ण निर्भरता से डायबिटीज की स्थिति का गलत वर्गीकरण हो सकता है। कुछ लोग अनुचित रूप से देरी से निदान हो सकते हैं। एंडोक्राइन सोसाइटी ऑफ इंडिया के एक सर्वे में 70% डॉक्टरों ने कहा कि एनीमिया वाले मरीजों में ओजीटीटी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस अध्ययन के बाद, डॉक्टरों का मत है कि एचबीए1सी उपयोगी है, लेकिन अकेला नहीं। वो मानते हैं कि मिलीजुली प्रकिया के तहत डायबटीज जैसी बीमारी का निदान किया जा सकता है।


यह अध्ययन हमें निष्क्रियता से हटाकर सक्रियता की ओर ले जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर आप एचबीए1सी टेस्ट करवा रहे हैं, तो सीबीसी (कम्प्लीट ब्लड काउंट) से एनीमिया भी चेक जरूर करवाएं। अगर एनीमिया है, तो ओजीटीटी या एफपीजी पर स्विच करें। इसके साथ ही 30 वर्ष से ऊपर वाले व्यक्तियों को हर साल कम से कम दो टेस्ट – एफपीजी और एचबीए1सी करवाने चाहिए। डायबिटीज का 80% जोखिम रोकथाम योग्य है। दैनिक 30 मिनट व्यायाम, फाइबर-युक्त आहार (दालें, सब्जियां) और वजन नियंत्रण अपनाएं। अध्ययन दिखाता है कि भारतीयों में वजन बढ़ने से इंसुलिन रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ता है। एनीमिया रोकने के लिए आहार में पालक, गुड़ और पौष्टिक आहार शामिल करें, लेकिन अपने डॉक्टर की सलाह से। अस्पतालों और सामाजिक संस्थाओं को सामुदायिक स्तर पर कैंप लगाने चाहिए, जिससे कि जागरूकता बढ़े। सस्ते व आसानी से उपलब्ध ग्लूकोमीटर या ऐप्स से घर पर मॉनिटरिंग करें। ये कदम न केवल डायबिटीज को नियंत्रित करेंगे, बल्कि समग्र स्वास्थ्य भी सुधारेंगे।

यह लैंसेट अध्ययन एचबीए1सी को खारिज नहीं करता, बल्कि इसकी सीमाओं को उजागर करता है। भारतीयों के लिए यह एक जागृति का क्षण है, चिंता करें, लेकिन उचित कार्रवाई भी करें। डायबिटीज से लड़ाई में सटीक निदान पहला कदम है। अगर हम इसे अपनाएं, तो भारत न केवल डायबिटीज कैपिटल से उबर सकता है, बल्कि हेल्थकेयर का वैश्विक मॉडल भी बन सकता है। समय है सोच बदलने का – स्वास्थ्य के लिए, भविष्य के लिए। 

Monday, February 2, 2026

‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ को कैसे प्रभावी बनाए सरकार?

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के रूप में जाना जा रहा है, 27 जनवरी 2026 को संपन्न हुआ है। यह समझौता लगभग दो दशकों की लंबी वार्ताओं का परिणाम है और इसमें 2 अरब से अधिक की आबादी तथा 27 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था शामिल है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 25 प्रतिशत है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे वैश्विक व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा कवर करने वाला ऐतिहासिक कदम बताया।  यह समझौता भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का अवसर प्रदान करता है, विशेषकर ऐसे समय में जब अमेरिकी टैरिफ के कारण निर्यात प्रभावित हो रहा है। हालांकि, इसे प्रभावी बनाने के लिए सरकार को रणनीतिक कदम उठाने होंगे, जिसमें अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। 


इस समझौते के तहत यूरोपीय संघ भारत में निर्यात होने वाले 96.6 प्रतिशत सामानों पर टैरिफ को समाप्त या कम करेगा, जिससे यूरोपीय कंपनियों को सालाना लगभग 4 बिलियन यूरो (लगभग 4.7 बिलियन डॉलर) की बचत होगी। भारत ने यूरोपीय संघ को 102 सेवा उप-क्षेत्रों में पहुंच प्रदान की है, जबकि यूरोपीय संघ ने भारत को 144 उप-क्षेत्रों में अवसर दिए हैं, जिसमें वित्तीय, समुद्री और दूरसंचार सेवाएं शामिल हैं। ऑटोमोटिव क्षेत्र में यूरोपीय कारों पर वर्तमान 110 प्रतिशत टैरिफ को धीरे-धीरे 10 प्रतिशत तक कम किया जाएगा। भारत के लिए यह समझौता टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाओं और इंजीनियरिंग निर्यात को बढ़ावा देगा। अनुमान है कि यह समझौता 2032 तक यूरोपीय संघ के भारत में निर्यात को दोगुना कर देगा।  साथ ही, यह अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा, जहां भारत के श्रम-गहन निर्यात प्रभावित हो रहे हैं।


माना जा रहा है कि यह समझौता ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ योजनाओं के साथ तालमेल बैठाता है। यह न केवल निर्यात को बढ़ाएगा बल्कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निवेश और रोजगार सृजन को भी प्रोत्साहित करेगा। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ के साथ समझौता भारतीय एमएसएमई को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने का अवसर देगा। हालांकि, इसके लाभों को अधिकतम करने के लिए चुनौतियों का सामना करना होगा। यहां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियां प्रासंगिक हैं। प्रोफेसर कुमार, जो काले धन और आर्थिक नीतियों के विशेषज्ञ हैं, ने भारत-यूरोपीय संघ एफटीए को ‘अमेरिका जैसा एक और जाल’ बताया है। उन्होंने असमान शर्तों, घरेलू उद्योगों विशेषकर कृषि और डेयरी पर जोखिम, व्यापार घाटे में वृद्धि, नीति स्थान की हानि और दीर्घकालिक आर्थिक निर्भरता की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि पिछले एफटीए में भागीदारों को अधिक लाभ हुआ है, और निवेश नियमों, नियामक संरेखण तथा बाजार बाढ़ से आत्मनिर्भरता कमजोर हो सकती है। उन्होंने अमेरिकी व्यापार समझौतों से सबक लेने की सलाह दी है, जहां कृषि बाजार खोलने की मांग भारत के लिए कठिन है। 



इन चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए, सरकार को रचनात्मक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले, संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। समझौते में डेयरी और कुछ कृषि उत्पादों को बाहर रखा गया है, लेकिन कुमार की चेतावनी के अनुसार, बाजार बाढ़ से बचने के लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित करें। सरकार कृषि क्षेत्र में सब्सिडी और समर्थन को मजबूत करे, जैसे कि फसल बीमा और बाजार लिंकेज को बढ़ावा देकर। साथ ही, एग्रीस्टैक जैसी डिजिटल पहलों को तेज करें ताकि किसान वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन कर सकें। 


दूसरा, एमएसएमई और छोटे उद्योगों की तैयारी पर फोकस करें। प्रोफ़ेसर कुमार की निर्भरता की चेतावनी को संबोधित करने के लिए, उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम को विस्तार दें, विशेषकर टेक्सटाइल, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स में। एमएसएमई को क्रेडिट पहुंच, कौशल विकास और निर्यात प्रशिक्षण प्रदान करें। यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त निवेश कोष स्थापित करें जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित हो, ताकि ‘मेक इन इंडिया’ मजबूत हो सके।


तीसरा, पर्यावरण और सस्टेनेबिलिटी मानकों का अनुपालन। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम), जो 1 जनवरी 2026 से पूर्ण रूप से लागू है, भारतीय स्टील और एल्यूमिनियम पर कार्बन टैक्स लगा सकता है, जिससे निर्यातकों को 22 प्रतिशत तक कीमत कम करनी पड़ सकती है। सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाकर, जैसे कि 500 जीडब्ल्यू सौर लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़कर, इस चुनौती का सामना करना चाहिए। सीबीएएम-अनुपालन प्रमाणन प्रणाली विकसित करें और यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त हरित प्रौद्योगिकी परियोजनाएं शुरू करें।


चौथा, व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए विविधीकरण। प्रोफ़ेसर कुमार की व्यापार घाटे की चेतावनी को देखते हुए, सरकार निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नए बाजारों की तलाश करे, जैसे कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका। साथ ही, समझौते के तहत निवेश नियमों को मजबूत करें ताकि नीति स्थान सुरक्षित रहे। राष्ट्रीय निवेश बोर्ड को सक्रिय करें जो विदेशी निवेश की समीक्षा करे और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे।


पांचवां, मानव संसाधन और प्रवासन पर फोकस। समझौता प्रवासन और मोबिलिटी फ्रेमवर्क से जुड़ा है, जो ‘टैलेंट एंड सिक्योरिटी’ पर केंद्रित है। सरकार को कौशल विकास कार्यक्रमों को यूरोपीय मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए, जैसे कि आईटी और इंजीनियरिंग में। इससे युवा रोजगार बढ़ेगा और ब्रेन ड्रेन को रोका जा सकेगा।


इन सुझावों से, सरकार यदि चाहे तो प्रोफ़ेसर कुमार की चेतावनियों को अवसर में बदल सकती है। समझौता वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे कि अमेरिकी टैरिफ और चीन से व्यापार विचलन के बीच, भारत को रणनीतिक लाभ देगा। अनुमान है कि यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार को 41-65 प्रतिशत बढ़ाएगा और जीडीपी में 0.12-0.13 प्रतिशत की वृद्धि करेगा।  यह चीन से व्यापार विचलन (5-9 प्रतिशत) को बढ़ावा देगा, जो यूरोपीय संघ की डी-रिस्किंग और भारत की विविधीकरण रणनीति से मेल खाता है। 


‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ भारत को विकसित राष्ट्र की दिशा में ले जाने का माध्यम बन सकता है। कबीरदास के दोहे, ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।’ को ध्यान में रखते हुए  सरकार को प्रोफेसर कुमार की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए और संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इससे न केवल आर्थिक विकास होगा बल्कि आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। 2047 तक ‘विकसित भारत’ का सपना साकार करने के लिए यह समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। 

Friday, January 16, 2026

भ्रष्टाचार के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का विभाजित फैसला!

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसी एक्ट) की धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर एक विभाजित फैसला सुनाया है। 13 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय व्यक्त की, जिसके परिणामस्वरूप मामला मुख्य न्यायाधीश को बड़ी पीठ के गठन के लिए संदर्भित कर दिया गया। यह फैसला सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की मंजूरी देने से संबंधित है, जो देश में भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण है। धारा 17ए, जो 2018 के संशोधन के माध्यम से अधिनियम में जोड़ी गई थी, जांच एजेंसियों को किसी भी लोक सेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच, पूछताछ या अन्वेषण शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति प्राप्त करने का आदेश देती है। इस प्रावधान का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक प्रतिशोध या अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह भ्रष्ट तत्वों को संरक्षण प्रदान करता है।

भारत में भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है और ऐसे प्रावधान जो जांच प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं, लोकतंत्र की नींव को प्रभावित कर सकते हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह जांच एजेंसियों के हाथ बांधती है और भ्रष्टाचारियों को पूर्व चेतावनी देकर सबूत नष्ट करने का अवसर प्रदान करती है। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रावधान ने जांच की 'आकस्मिकता' (element of surprise) को समाप्त कर दिया है, जो भ्रष्टाचार के मामलों में आवश्यक है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने इसे वैध ठहराते हुए कहा कि यह लोक सेवकों को अनावश्यक जांच से बचाता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। इस विभाजन ने एक बार फिर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की आवश्यकता पर बहस छेड़ दी है।

2018 से पहले, पीसी एक्ट में जांच के लिए पूर्व अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं थी, केवल अभियोजन के लिए धारा 19 के तहत मंजूरी जरूरी थी। लेकिन 1990 के दशक में, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर सवाल उठे। ऐतिहासिक रूप से, ‘विनीत नारायण बनाम भारत संघ’ (1998) का फैसला एक मील का पत्थर है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए निर्देश दिया कि उच्च अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने ‘सिंगल डायरेक्टिव’ को असंवैधानिक घोषित किया, जो कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए सरकारी अनुमति मांगता था। इस फैसले ने भ्रष्टाचार विरोधी जांच को मजबूत किया और राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने का प्रयास किया।

हालांकि, 2003 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (डीएसपीई एक्ट) में धारा 6ए जोड़ी गई, जो संयुक्त सचिव स्तर से ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य करती थी। यह प्रावधान भी विवादास्पद रहा। 2014 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 6ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि यह अधिकारियों के बीच भेदभाव करता था और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करता था। कोर्ट ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार जांच में सभी को समान रूप से जवाबदेह होना चाहिए, चाहे उनका पद कितना भी ऊंचा हो। इस फैसले ने जांच एजेंसियों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की, लेकिन सरकार ने 2018 में पीसी एक्ट में संशोधन कर धारा 17ए पुनः पेश की, जो सभी लोक सेवकों पर लागू होती है और पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाती है।

हालिया विभाजित फैसले से पहले भी धारा 17ए पर विवाद हुए हैं। 2023 में ‘सीबीआई बनाम आरआर किशोर’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2018 के संशोधन पूर्वव्यापी नहीं हैं, अर्थात 2018 से पहले के अपराधों पर धारा 17ए लागू नहीं होती। लेकिन 2024 में चंद्रबाबू नायडू मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ विभाजित हुई, जहां न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने धारा 17ए को प्रक्रियात्मक मानकर पूर्वव्यापी प्रभाव दिया, जबकि न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने इसे मूलभूत मानकर अस्वीकार किया। यह मामला भी बड़ी पीठ को संदर्भित किया गया। इन फैसलों से स्पष्ट है कि धारा 17ए ने जांच प्रक्रिया को जटिल बनाया है, जिससे कई भ्रष्टाचार मामले लंबित हो गए हैं। उदाहरणस्वरूप, लोकपाल और सीबीआई जैसी संस्थाओं ने शिकायत की है कि पूर्व अनुमति की प्रक्रिया में देरी से भ्रष्टाचारियों को फायदा होता है।

इस प्रावधान के पक्ष में तर्क केवल यही है कि यह ईमानदार अधिकारियों को बचाता है। भारत में राजनीतिक प्रतिशोध के कई उदाहरण हैं, जहां जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया है। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने अपने फैसले में कहा कि धारा 17ए निर्णय लेने की प्रक्रिया में साहस प्रदान करती है और अनावश्यक जांच से बचाती है। लेकिन वहीं इसके विपक्ष में, न्यायमूर्ति नागरत्ना का मत मजबूत है। यह प्रावधान भ्रष्टाचारियों को पूर्व सूचना देकर सबूत मिटाने का मौका देता है, जो ‘विनीत नारायण’ फैसले के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। अतीत के मामलों से सीखते हुए, हम देखते हैं कि पूर्व अनुमति जैसे प्रावधान अक्सर राजनीतिक संरक्षण का माध्यम बन जाते हैं। उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक के हवाला कांड में, जांच में देरी ने कई आरोपी को बचा लिया था।

इस विभाजित फैसले के गहरे प्रभाव भी हैं। यदि बड़ी पीठ धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करती है, तो भ्रष्टाचार जांच तेज होगी, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल जैसे संगठनों की मांग के अनुरूप है। लेकिन इससे राजनीतिक दुरुपयोग का खतरा बढ़ सकता है, जैसा कि हाल के ईडी और सीबीआई मामलों में देखा गया। यदि इसे बरकरार रखा जाता है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर होगी, क्योंकि अनुमति प्रक्रिया में महीनों लग सकते हैं। भारत, जहां भ्रष्टाचार सूचकांक में 85वें स्थान पर है, को ऐसे कानूनों की जरूरत है जो जांच को सुगम बनाएं, न कि बाधित।

गौरतलब है कि यह मुद्दा भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की मांग करता है। ‘विनीत नारायण’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों ने जांच की स्वतंत्रता पर जोर दिया है और हालिया विभाजित फैसला इसी दिशा में एक कदम है। सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ को इस पर विचार करते हुए ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा और भ्रष्टाचार की रोकथाम दोनों को सुनिश्चित करना चाहिए। भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए, जांच प्रक्रिया पारदर्शी और त्वरित होनी चाहिए, ताकि न्याय की जीत हो। 

Monday, January 12, 2026

कैसे हल हो भारत में दूषित जल की समस्या? 

भारत, जो दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, आज दूषित जल के एक गंभीर संकट से जूझ रहा है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2025-2026 में, दूषित नल के पानी से 5,500 से अधिक लोग बीमार हुए और 34 मौतें हुईं, जो 26 शहरों में फैली हुई हैं। यह आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि वे एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या की ओर इशारा करते हैं। भारत की प्रमुख नदियां, जैसे गंगा और यमुना, औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज और कृषि अपवाह से बुरी तरह प्रदूषित हैं। विश्व जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में से 120वें स्थान पर है और लगभग 70% भूजल स्रोत दूषित हैं। 

दूषित जल की समस्या भारत में बहुआयामी है। मुख्य कारणों में अनुपचारित सीवेज सबसे बड़ा है, जो नदियों और भूजल को प्रदूषित करता है। इसके अलावा, कृषि से निकलने वाले कीटनाशक और उर्वरक, तथा उद्योगों से निकलने वाले रसायन जैसे भारी धातु और विषाक्त पदार्थ जल स्रोतों को नष्ट कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, कपड़ा और चमड़ा उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट कई नदियों को प्रभावित कर रहा है। 163 मिलियन भारतीयों के पास सुरक्षित पेयजल की पहुंच नहीं है और 21% संक्रामक रोग जल से संबंधित हैं। 


हाल ही में इंदौर और अन्य शहरों के घटनाक्रमों ने इस समस्या को और उजागर किया है। इंदौर में दूषित पानी से कम से कम 8 मौतें हुईं, लेकिन रिकॉर्ड दिखाते हैं कि 18 परिवारों को मुआवजा दिया गया। यह असंगति सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाती है। पूरे देश में टाइफाइड जैसे रोग फैल रहे हैं, जो दूषित पानी से जुड़े हैं। आर्थिक रूप से, यह संकट उत्पादकता को प्रभावित करता है, क्योंकि बीमारियां कार्यबल को कमजोर करती हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से, यह जैव विविधता को भी नुकसान पहुंचाता है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बढ़ाता है। 2025-2027 में जल की कमी भारत के लिए सबसे बड़ा पर्यावरणीय जोखिम साबित हो सकती है। यदि इसे नजरअंदाज किया गया, तो ‘डे जीरो’ की स्थिति कई राज्यों में आ सकती है।



सरकार की उदासीनता इस समस्या का एक प्रमुख कारण है। केंद्र सरकार पर आरोप है कि वह स्वच्छ जल और स्वच्छ हवा प्रदान करने में विफल रही है। विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधान मंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष के अनुसार मुख्य कारणों में कमी नियमों की है, अत्यधिक निजीकरण, सरकारी भ्रष्टाचार और सामान्य उपेक्षा शामिल हैं। मध्य प्रदेश में इंदौर घटना के बाद नगर आयुक्त को हटाया गया और दो अधिकारियों को निलंबित किया गया, लेकिन विपक्ष इसे केवल प्रतिक्रियात्मक कदम मानता है। 


राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार चुनावी वादे जैसे ‘हर घर जल’ योजना लागू तो हुई, लेकिन गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया। दिल्ली जल बोर्ड को सख्त जांच के निर्देश दिए गए, लेकिन शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की कमी पाई गई है। भ्रष्टाचार के कारण फंड का दुरुपयोग होता है और स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचा अभी भी पुराना है। सीवेज और पेयजल लाइनों की मिश्रण जैसी समस्याएं आम हैं। राष्ट्रीय स्तर पर, जल गुणवत्ता 2025-26 में एक प्रमुख चुनौती है, लेकिन इस गंभीर चुनौती को कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) को स्थानांतरित करने के बजाय सरकार को अधिक सक्रिय होना चाहिए। यह उदासीनता न केवल स्वास्थ्य संकट पैदा करती है, बल्कि सामाजिक असमानता को भी बढ़ाती है, क्योंकि इससे गरीब तबके के लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।


दूषित जल की समस्या का समाधान संभव है, यदि बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया जाए। सबसे पहले, स्रोत पर प्रदूषण को रोकना जरूरी है। उद्योगों को अपशिष्ट उपचार संयंत्र स्थापित करने के लिए बाध्य किया जाए। कृषि में जैविक खेती को प्रोत्साहित करें ताकि रसायनों का अपवाह कम हो। सीवेज उपचार को 100% बनाना चाहिए, जो वर्तमान में अपर्याप्त है।


आंकड़े बताते है कि पश्चिमी देशों के अनुभव काफ़ी उपयोगी साबित हुए हैं। स्विट्जरलैंड में शहरी जल उपचार की गुणवत्ता सर्वोच्च है और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वहां का नल का पानी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। वे अपशिष्ट जल को पुनर्चक्रित करते हैं, जो कई देशों में अपनाया जाता है। यूरोप में ‘ब्लू रिवोल्यूशन’ रणनीति कुशल उपयोग, अपशिष्ट कमी और पारिस्थितिक संतुलन पर जोर देती है। प्रबंधित एक्विफर रिचार्ज (एमएआर) जैसी विधियां अपनाई जाती हैं, जिसमें नदी तलों को समायोजित करना, बैंक फिल्ट्रेशन, सतही पानी का वितरण और रिचार्ज कुओं का उपयोग शामिल है। 


वहीं अमेरिका और यूरोप में मेम्ब्रेन सेपरेशन टेक्नोलॉजी, सोलर वाटर डिसइंफेक्शन (एसओडीआईएस) और सिरेमिक फिल्ट्रेशन जैसी तकनीकें आम हैं। यूरोपीय संघ में जल बचत पर जोर है, विभिन्न क्षेत्रों में दक्षता बढ़ाने के लिए। काउंसिल ऑफ यूरोपियन बैंक ने 16 देशों में जल और स्वच्छता परियोजनाओं में 1.8 बिलियन यूरो का निवेश किया है। प्रकृति-आधारित समाधान (एनबीएस) यूरोप में जल प्रबंधन में उपयोगी हैं, जैसे वेटलैंड्स और वन क्षेत्रों का उपयोग फिल्टर के रूप में किया जाना। 


भारत को पश्चिमी अनुभवों से सीखते हुए उनके सफल उपाय को अपनाना चाहिए। अमेरिका की तरह, पर्यावरण संरक्षण एजेंसी जैसी स्वतंत्र संस्था बनाएं जो प्रदूषण पर नजर रखे। जुर्माने और जेल की सजा लागू करें। यूरोप की तरह, जल उपचार संयंत्रों में बड़े निवेश करें। डिसेलिनेशन प्लांट्स लगाएं, हालांकि उनके नुकसानों को ध्यान में रखें।  हर घर में फिल्टर सिस्टम अनिवार्य करें। स्विट्जरलैंड मॉडल अपनाएं, अपशिष्ट जल को पुन: उपयोग योग्य बनाएं। एमएआर तकनीक से भूजल रिचार्ज करें। स्थानीय समुदायों को शामिल करने पर भी ज़ोर दिया जाए, जैसे यूरोप में एनबीएस परियोजनाओं के तहत शिक्षा अभियान चलाए जाते हैं जिससे कि लोग जल संरक्षण करते हैं। नवीनतम तकनीकी का नवाचार करने पर भी ज़ोर देने की आवश्यकता है। 


इसके साथ ही सरकारी तंत्र के पारदर्शिता को बढ़ाए जाने की भी ज़रूरत है। इंदौर के उदाहरण को देखते हुए दूषित पानी के कारण हुई मौतों के आंकड़ों में असंगति न पैदा हो। सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो राष्ट्रीय जल नीति को मजबूत करें, जिसमें जलवायु परिवर्तन को भी शामिल किया जाए। ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि दूषित जल भारत की प्रगति में बाधा है, लेकिन पश्चिमी देशों के सफल मॉडल से प्रेरणा लेकर हम इसे हल कर सकते हैं। सरकार को उदासीनता छोड़कर सक्रिय होना चाहिए, अन्यथा यह संकट और गहराएगा। स्वच्छ जल हर नागरिक का अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। 

Monday, November 17, 2025

क्यों नहीं रुकते आतंकी हमले ?

एक बार फिर आतंकवादी हमलों ने देश की राजधानी दिल्ली को दहला दिया। लाल क़िले के भीड़ भरे इलाक़े में ये जानलेवा विस्फोट उस साज़िश से कहीं कम थे जो पूरी दिल्ली को दहलाने के लिए रची गई थी। इन आतंकी हमलों के पीछे पढ़े लिखे ऐसे लोग शामिल हैं जिनसे ऐसी वैशियाना हरकत की उम्मीद नहीं की जा सकती। प्रश्न है कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियां हर समय अपने पंजों पर रहती हैं उसके बावजूद भी देश की राजधानी जो कि सुरक्षा के लिहाज़ से काफ़ी मुस्तैद मानी जाती है, वहाँ पर इतनी भारी मात्रा विस्फोटक सामग्री लेकर एक आतंकी कैसे घूम रहा था? कैसे इन विस्फोटक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पहुंचा? हमारी रक्षा और गृह मंत्रालय की खुफिया एजेंसियां  क्या कर रही थी?

इन हमलों से सारा देश हतप्रभ है पहलगाम में हुई आतंकवादी वारदात के छह महीने बाद ही ये दूसरा बड़ा झटका लगा है। सवाल उठता है कि देश में आतंकवाद पर कैसे काबू पाया जाए? हमारा देश ही नहीं दुनिया के तमाम देशों का आतंकवाद के विरुद्ध इकतरफा साझा जनमत है। ऐसे में सरकार अगर कोई ठोस कदम उठाती है, तो देश उसके साथ खड़ा होगा। उधर तो हम सीमा पर लड़ने और जीतने की तैयारी में जुटे रहें और देश के भीतर आईएसआई के एजेंट आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहें तो यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती। मैं पिछले 30 वर्षों से अपने लेखों में लिखता रहा हूं कि देश की खुफिया एजेंसियों को इस बात की पुख्ता जानकारी है कि देश के 350 से ज्यादा शहरों और कस्बों की सघन बस्तियों में आरडीएक्स, मादक द्रव्यों और अवैध हथियारों का जखीरा जमा हुआ है जो आतंकवादियों के लिए रसद पहुँचाने का काम करता है। प्रधान मंत्री को चाहिए कि इसके खिलाफ एक ‘आपरेशन क्लीन स्टार’ या ‘अपराधमुक्त भारत अभियान’ की शुरुआत करें और पुलिस व अर्धसैनिक बलों को इस बात की खुली छूट दें जिससे वे इन बस्तियों में जाकर व्यापक तलाशी अभियान चलाएं और ऐसे सारे जखीरों को बाहर निकालें।



गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में हुए धमाके के बाद अपने बयान में यह साफ कहा कि आतंकियों को ऐसा सबक सिखाया जाएगा कि पूरी दुनिया देखेगी। उल्लेखनीय है कि कश्मीर के खतरनाक आतंकवादी संगठन ‘हिजबुल मुजाईदीन’ को दुबई और लंदन से आ रही अवैध आर्थिक मदद का खुलासा 1993 में मैंने ही अपनी विडियो समाचार पत्रिका ‘कालचक्र’ के 10वें अंक में किया था। इस घोटाले की खास बात यह थी कि आतंकवादियों को मदद देने वाले स्रोत देश के लगभग सभी प्रमुख दलों के बड़े नेताओं और बड़े अफसरों को भी यह अवैध धन मुहैया करा रहे थे। इसलिए सीबीआई ने इस कांड को दबा रखा था। घोटाला उजागर करने के बाद मैंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और आतंकवादियों को आ रही आर्थिक मदद के इस कांड की जांच करवाने को कहा।



सर्वोच्च अदालत ने मेरी मांग का सम्मान किया और भारत के इतिहास में पहली बार अपनी निगरानी में इस कांड की जांच करवाई। बाद में यही कांड ‘जैन हवाला कांड’ के नाम से मशहूर हुआ। जिसने भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया। पर मेरी चिंता का विषय यह है कि इतना सब होने पर भी इस कांड की ईमानदारी से जांच आज तक नहीं हुई और यही कारण है कि आतंकवादियों को हवाला के जरिये, पैसा आना जारी रहा और आतंकवाद पनपता रहा।



उन दिनों हॉंगकॉंग से ‘फार ईस्र्टन इकोनोमिक रिव्यू’ के संवाददाता ने ‘हवाला कांड’ पर मेरा इंटरव्यू लेकर कश्मीर में तहकीकात की और फिर जो रिर्पोट छपी, उसका निचोड़ यह था कि आतंकवाद को पनपाए रखने में बहुत से प्रभावशाली लोगों के हित जुड़े हैं। उस पत्रकार ने तो यहां तक लिखा कि कश्मीर में आतंकवाद एक उद्योग की तरह है। जिसमें बहुतों को मुनाफा हो रहा है।


उसके दो वर्ष बाद जम्मू के राजभवन में मेरी वहाँ के तत्कालीन राज्यपाल गिरीश सक्सैना से चाय पर वार्ता हो रही थी। मैंने उनसे आतंकवाद के बारे में पूछा, तो उन्होंने अंग्रेजी में एक व्यग्यात्मक टिप्पणी की जिसका अर्थ था कि मुझे ‘घाटी के आतंकवादियों’ की चिंता नहीं है, मुझे ‘दिल्ली के आतंकवादियों’ से परेशानी है। अब इसके क्या मायने लगाए जाए?



आतंकवाद को रसद पहुंचाने का मुख्य जरिया है हवाला कारोबार। अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के तालिबानी हमले के बाद से अमरीका ने इस तथ्य को समझा और हवाला कारोबार पर कड़ा नियन्त्रण कर लिया। नतीजतन तब से आज तक वहां आतंकवाद की कोई घटना नहीं हुइ। जबकि भारत में हवाला कारोबार बेरोकटोक जारी है। इस पर नियन्त्रण किये बिना आतंकवाद की श्वासनली को काटा नहीं जा सकता। एक कदम संसद को उठाना है, ऐसे कानून बनाकर जिनके तहत आतंकवाद के आरोपित मुजरिमों पर विशेष अदालतों में मुकदमे चला कर 6 महीनों में सजा सुनाई जा सके। जिस दिन मोदी सरकार ये 3 कदम उठा लेगी उस दिन से भारत में आतंकवाद का बहुत हद तक सफाया हो जाएगा।


ये चिंता का विषय है कि तमाम दावों और आश्वासनों के बावजूद पिछले चार दशक में कोई भी सरकार आतंकवाद के खिलाफ कोई कारगर उपाय कर नहीं पायी है। हर देश के नेता आतंकवाद को व्यवस्था के खिलाफ एक अलोकतांत्रिक हमला मानते रहे हैं और बेगुनाह नागरिकों की हत्याओं के बाद यही कहते रहे हैं कि आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। पर कई दशक बीत जाने के बाद भी विश्व में आतंकवाद के कम होने या थमने का कोई लक्षण हमें दिखाई नहीं देता।


नए हालात में जरूरी हो गया है कि आतंकवाद के बदलते स्वरुप पर नए सिरे से समझना शुरू किया जाए। हो सकता है कि आतंकवाद से निपटने के लिए बल प्रयोग ही अकेला उपाय न हो। क्या उपाय हो सकते हैं उनके लिए हमें शोधपरख अध्ययनों की जरूरत पड़ेगी। अगर सिर्फ 70 के दशक से अब तक यानी पिछले 40 साल के अपने सोच विचारदृष्टि अपनी कार्यपद्धति पर नजर डालें तो हमें हमेशा तदर्थ उपायों से ही काम चलाना पड़ा है। इसका उदाहरण कंधार विमान अपहरण के समय का है जब विशेषज्ञों ने हाथ खड़े कर दिए थे कि आतंकवाद से निपटने के लिए हमारे पास कोई सुनियोजित व्यवस्था ही नहीं है।

यदि विश्वभर के शीर्ष नेतृत्त्व एकजुट होकर कुछ ठोस कदम उठाऐं, तो उम्मीद है कि हम आतंकवाद के साथ भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, शोषण और बेरोजगारी जैसी समस्याओं का भी समाधान पा लें। देश इस समय गंभीर हालत से गुजर रहा है। मातम की इस घड़ी में रोने के बजाए सीमा सुरक्षा पर गिद्धदृष्टि और दोषियों को कड़ा जबाब देने की कार्यवाही की जानी चाहिए। पर ये भी याद रहे कि हम जो भी करें, वो दिलों में आग और दिमाग में बर्फ रखकर करें। 

Monday, November 10, 2025

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और आवारा कुत्तों की समस्या!

भारत में आवारा कुत्तों की समस्या एक जटिल सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा रही है। बीते शुक्रवार को  सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी किया है जिसमें रेलवे स्टेशनों, अस्पतालों, स्कूलों सहित अन्य सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को तुरंत हटाने और उन्हें नसबंदी, टीकाकरण के बाद निश्चित आश्रमों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही कोर्ट ने साफ किया है कि इन कुत्तों को उनकी मूल जगह वापस नहीं छोड़ा जाएगा, ताकि इन सार्वजनिक स्थलों से उनकी उपस्थिति खत्म हो सके। यह फैसला भारत में आवारा कुत्तों से जुड़ी बढ़ती समस्या, जैसे कि कुत्ते के काटने की घटनाओं में वृद्धि को देखते हुए लिया गया है। 

सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की बेंच ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय दो सप्ताह के अंदर सभी सरकारी और निजी स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंड आदि की पहचान करें जहां आवारा कुत्ते उपस्थित हैं। इसके बाद स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी होगी कि वे इन कुत्तों को पकड़कर सुरक्षित आश्रमों में स्थानांतरित करें, जहां उन्हें न सिर्फ नसबंदी और टीकाकरण दिया जाएगा, बल्कि उनकी देखभाल भी सुनिश्चित की जाएगी। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि कोई व्यक्ति या संगठन इस कार्रवाई में बाधा डालता है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह आदेश 13 जनवरी 2026 को समीक्षा के लिए पुनः लाया जाएगा।


जानवर प्रेमियों और पशु अधिकार संगठनों ने इस आदेश पर व्यापक असंतोष जताया है। उनका कहना है कि इस तरह के आदेश से कुत्तों के प्रति चिंता और संरक्षण कम हो सकता है। कई संगठन इस बात पर जोर देते हैं कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उनके मूल क्षेत्र में ही जारी रखना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से इलाके में कुत्तों की आबादी नियंत्रित रहती है और कुत्तों के व्यवहार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वे पशु कल्याण बोर्ड के पुराने सुझावों का हवाला देते हैं, जिनमें कहा गया है कि आवारा कुत्तों का पुनः उनके क्षेत्र में छोड़ना बेहतर तरीका है न कि उन्हें जोर जबरदस्ती आश्रमों में बंद करना। कई जानवर प्रेमी और समाजसेवी समूह आशंकित हैं कि इस कदम से आवारा कुत्तों की संख्या और व्यवहार संबंधी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

पशु प्रेमी, जो जानवरों के कल्याण के प्रति संवेदनशील होते हैं, उन्हें इस निर्णय को एक सकारात्मक कदम के रूप में देखना चाहिए। यह आदेश केवल कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाने की बात नहीं करता, बल्कि उनके लिए एक सुरक्षित और मानवीय वातावरण प्रदान करने पर भी जोर देता है। नसबंदी और टीकाकरण जैसे कदम न केवल कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करेंगे, बल्कि उनके स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाएंगे। सड़कों पर रहने वाले कुत्ते अक्सर भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधाओं की कमी से जूझते हैं, जिसके कारण वे आक्रामक हो सकते हैं। आश्रय स्थलों में उन्हें नियमित भोजन, चिकित्सा देखभाल और सुरक्षित स्थान मिलेगा, जो उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाएगा।


वहीं सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार को कई महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। यदि इसे सही ढंग से अमल में लाया जाए तो यह पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है। केवल दिल्ली में अनुमानित 10 लाख आवारा कुत्तों को देखते हुए, इसे अमल करना एक चुनौती हो सकती है। सरकार को बड़े पैमाने पर आधुनिक आश्रय स्थल बनाने होंगे, जो स्वच्छता, भोजन और चिकित्सा सुविधाओं से सुसज्जित हों। इन आश्रय स्थलों में पशु चिकित्सकों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति आवश्यक है।

पशु प्रेमियों की मानें तो इस आदेश जारी करते समय कुछ सावधानियों और वैकल्पिक उपायों पर विचार किया जाना आवश्यक था जैसे: स्थानीय आश्रमों की संख्या, संसाधन और देखभाल क्षमता का आकलन, कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए आम लोगों में जागरूकता और सामाजिक समन्वय, नसबंदी और टीकाकरण के बाद ही कुत्तों को उनके इलाके में छोड़ने की नीति, कुत्तों के प्रति मानवीय व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक शिक्षा, पशु अधिकार समूहों, नगर निगम और प्रशासन के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा।

भारत में आवारा कुत्तों की संख्या बहुत अधिक है, और प्रबंधन के लिए अलग-अलग राज्यों में ABC (Animal Birth Control) नियम चलाए जाते हैं, जिसमें नसबंदी, टीकाकरण और पुनः छोड़ना शामिल है। उदाहरण स्वरूप, जयपुर और गोवा जैसे शहरों ने इस विधि से कुत्तों से होने वाली बीमारियों को काफी हद तक नियंत्रण में रखा है।

दूसरी ओर, विश्व के कई देशों ने भी अपनी-अपनी रणनीतियाँ अपनायी हैं: सिंगापुर में सरकारी निकाय द्वारा कुत्तों को पकड़कर नसबंदी और टीकाकरण के बाद या तो पुनः छोड़ दिया जाता है या फिर उनका पुनर्वास किया जाता है, तुर्की के इस्तांबुल में मोबाइल वेटरनरी क्लीनिक और सार्वजनिक फीडिंग स्टेशन बनाए गए हैं, जिससे कुत्तों का प्रबंधन प्रभावी ढंग से हो रहा है, भूटान में 2023 में 100% आवारा कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य हासिल किया गया, रोमानिया में कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए नसबंदी पर जोर दिया गया है, साथ ही सार्वजनिक प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए कुत्तों की हत्या से बचा गया है। 

उल्लेखनीय है कि दुनिया भर में केवल नीदरलैंड ही एक ऐसा देश है जहां पर आपको आवारा कुत्ते नहीं मिलेंगे। नीदरलैंड सरकार ने एक अनूठा नियम लागू किया। किसी भी पालतू पशु की दुकान से ख़रीदे गये महेंगी नसल के कुत्तों पर वहाँ की सरकार भारी मात्रा में टैक्स लगती है। वहीं दूसरी ओर यदि कोई भी नागरिक इन बेघर पशुओं को गोद लेकर अपनाता है तो उसे आयकर में छूट मिलती है। इस नियम के लागू होते ही लोगों ने अधिक से अधिक बेघर कुत्तों को अपनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे नीदरलैंड की सड़कों व मोहल्लों से आवारा कुत्तों की संख्या घटते-घटते बिलकुल शून्य हो गई।

ये मॉडल भारत के लिए भी प्रासंगिक हैं, जहाँ मानवीय और वैज्ञानिक तरीके से आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश आवारा कुत्तों की समस्या पर कड़ा कदम है, लेकिन इसके अमल में स्थानीय प्रशासन, जानवर प्रेमी और स्थानीय समुदाय के बीच सामंजस्य और समझ जरूरी है। आवारा कुत्तों को हटाने के बजाय उन्हें स्थायी और मानवीय तरीके से नियंत्रित करने के लिए बेहतर नीतियों और जागरूकता की आवश्यकता है, ताकि न सिर्फ इंसानी सुरक्षा सुनिश्चित हो बल्कि पशु कल्याण भी बना रहे। भारत जैसे बहु-आयामी सामाजिक परिवेश में आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान सामूहिक और संवेदनशील दृष्टिकोण से ही संभव है। इस लिहाज से यह आवश्यक होगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ पशु अधिकार संगठनों और स्थानीय निकायों की मदद से ऐसे उपाय किए जाएं, जो दोनों पक्षों के हित में हों और आवारा कुत्तों का हानिरहित प्रबंधन सुनिश्चित करें।