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Monday, August 10, 2026

विदेशी फंडिंग के नियमन में एक अहम मोड़!

संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 एक बार फिर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यह संशोधन विधेयक एफसीआरए 2010 में बड़े बदलाव ला सकता है। सरकार इसे विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और नागरिक समाज संगठन इसे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), ट्रस्ट और धार्मिक संस्थाओं पर राज्य के नियंत्रण का विस्तार मान रहे हैं। देखना यह है कि इसके प्रावधानों, पक्ष-विपक्ष, सरकारी तर्क, विपक्षी आलोचना और विशेषज्ञों राय के अनुसार, इस विधेयक में ऐसा क्या है?


एफसीआरए विदेशी दान को विनियमित करने वाला कानून है। इसके तहत एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण कराना पड़ता है, जो पांच साल के लिए वैध होता है और नवीनीकरण की जरूरत होती है। आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 तक करीब 14,449 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण थे, जबकि 22,498 रद्द हो चुके थे और 15,212 समाप्त माने गए। 2019-2022 के बीच पंजीकृत संगठनों को लगभग 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। कई रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन का स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं था। नया विधेयक इसी खामी को भरने का दावा करता है।


विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान एक ‘नामित प्राधिकरण’ (डेज़ीग्नेटेड अथॉरिटी) का निर्माण है। इसके अनुसार जब किसी संगठन का एफसीआरए प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियां अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण में निहित हो जाएंगी। यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो वे स्थायी रूप से निहित हो सकती हैं और सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल या बिक्री भी हो सकती है। बिक्री की राशि भारत की समेकित निधि में जाएगी। इसके साथ ही धार्मिक चरित्र वाली संपत्तियों के संरक्षण का प्रावधान भी है। प्राधिकरण पूजा स्थलों को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। प्रभावित संगठन 90 दिनों में पुनरीक्षण और जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील कर सकते हैं। इसके अलावा, नवीनीकरण के लिए पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी योगदान के उपयोग की शर्त लगाई गई है। कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम कारावास पांच साल से घटाकर एक साल किया गया है और जांच शुरू करने से पहले केंद्र की पूर्व अनुमति जरूरी होगी।


सरकार का तर्क है कि यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए आवश्यक है। सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो, वो विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना चाहेगी। सरकार का कहना है कि रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद हजारों करोड़ की संपत्तियां अधर में लटकी रह जाती थीं; राज्य सरकारें उन्हें न तो कब्जे में ले सकती थीं और न प्रबंधित कर सकती थीं। नया ढांचा इन संपत्तियों की सुरक्षा, प्रबंधन और उचित उपयोग सुनिश्चित करेगा। न्यूनतम उपयोग सीमा निष्क्रिय संगठनों को लाइसेंस धारण करने से रोकेगी। दंड का युक्तिकरण और जांच में केंद्र की अनुमति मनमाने कार्रवाई को सीमित करेगी। सरकार का तर्क है कि यह सिविल सोसायटी को कमजोर नहीं करता, बल्कि विदेशी योगदान को वैध प्रयोजनों तक सीमित रखता है और शासन को मजबूत बनाता है।


वहीं विपक्ष इसे ‘दमनकारी’ और सिविल सोसायटी पर हमला मानता है। उनका तर्क है कि नामित प्राधिकरण को व्यापक शक्तियां मिलने से सरकार एनजीओ की संपत्तियों पर कब्जा कर सकती है। पंजीकरण का स्वतः समापन प्रक्रियात्मक देरी से भी हो सकता है। नवीनीकरण आवेदन लंबित रहने या समय पर न लगाने पर संगठन पंगु हो जाएंगे। यह विशेष रूप से छोटे संगठनों, धार्मिक संस्थाओं (खासकर ईसाई चर्चों और अल्पसंख्यक समूहों से जुड़े ट्रस्ट) और आलोचनात्मक आवाजों को निशाना बना सकता है। अमेरिका के कुछ सांसदों ने भी इसे ईसाइयों के खिलाफ हमला बताया है और भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ने की चेतावनी दी है। विपक्ष का कहना है कि 2020 के संशोधनों के बाद पहले ही हजारों लाइसेंस रद्द हो चुके हैं; नया विधेयक कार्यपालिका की शक्ति को और बढ़ाता है, न्यायिक समीक्षा को कमजोर करता है और लोकतांत्रिक स्थान को संकुचित करता है। केरल जैसे राज्यों में विदेशी फंड पर निर्भर स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं।


इस विधेयक के फायदे देखे जाएँ तो इसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और संपत्ति प्रबंधन की स्पष्टता है। विदेशी फंड का दुरुपयोग (यदि कोई हो) रोका जा सकता है। निष्क्रिय संगठनों को फिल्टर करने से सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण काम करने वाले संगठनों को प्राथमिकता मिलेगी। इसके साथ ही दंड में नरमी और अपील का प्रावधान कुछ सुरक्षा देता है। यदि इस विधेयक के नुकसान की बात करें तो सरकार का अत्यधिक नियंत्रण, छोटी और स्थानीय संस्थाओं पर अनुपालन का बोझ, प्रक्रियात्मक जोखिम और संभावित चयनात्मक कार्रवाई शामिल हैं। उद्देश्य और भूगोल-विशिष्ट पंजीकरण लचीलापन कम कर सकता है। धार्मिक गतिविधियों पर स्पष्ट प्रतिबंध (धर्मांतरण) विवाद बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे मौजूदा खामियों को भरने वाला व्यावहारिक कदम मानता है, जबकि दूसरे वर्ग का कहना है कि यह एफसीआरए को विनियमन से आगे ले जाकर सिविल सोसायटी पर व्यापक राज्य नियंत्रण का औजार बना रहा है। कुछ कानूनी विश्लेषक कहते हैं कि संपत्तियों का निहित होना और स्थायी वेस्टिंग संवैधानिक सवाल उठा सकते हैं, खासकर बिना पर्याप्त न्यायिक निगरानी के।


कुल मिलाकर देखा जाए तो एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 विदेशी फंडिंग के नियमन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। सरकार की मंशा राष्ट्रीय हित और पारदर्शिता की है, लेकिन प्रावधानों में कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार विपक्ष और नागरिक समाज की चिंताओं को जायज ठहराता है। सच्चा लोकतंत्र पारदर्शिता और स्वतंत्र सिविल सोसायटी दोनों की मांग करता है। ऐसे में विधेयक पर विस्तृत संसदीय चर्चा, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और छोटे संगठनों के लिए राहत के बिना इसे पारित करना अनुचित होगा। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि अपील प्रक्रिया को मजबूत किया जाए, स्वतः समापन के प्रावधानों में सुरक्षा जोड़ी जाए और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों के लिए स्पष्ट, निष्पक्ष दिशानिर्देश हों। अंततः कानून का उद्देश्य विदेशी योगदान को नियंत्रित करना होना चाहिए, न कि वैध सामाजिक कार्यों को बाधित करना। संसद को इस संतुलन को साधना चाहिए, ताकि पारदर्शिता के नाम पर स्वतंत्रता का गला न घोंटा जाए। 

Monday, June 29, 2026

पासपोर्ट पर अनावश्यक विवाद !

24 जून 2026 को पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (ट्रैवल डॉक्युमेंट) है, न कि नागरिकता का निर्णायक प्रमाण। इस बयान ने सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया, विपक्षी दलों ने इसे सत्ता पक्ष की ‘नागरिकता राजनीति’ से जोड़ा। जिससे आम नागरिकों के मन में भ्रम और आशंका पैदा हो गई। लाखों पासपोर्ट धारकों ने पूछना शुरू कर दिया, क्या हमारी नागरिकता पर सवाल उठ सकता है? यह विवाद क्यों और कब उठा और क्या यह विवाद खड़ा करना आवश्यक था? इस विवाद की जड़ों को समझें। अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पासपोर्ट की भूमिका का विश्लेषण करेंगे और देखेंगे कि यह बयान वर्तमान भारतीय परिदृश्य में कितना प्रासंगिक या अप्रासंगिक है। साथ ही, यह कैसे अनावश्यक भ्रम पैदा कर रहा है और सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए।


गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज माना जाता है, जो धारक की राष्ट्रीयता (नेशनलिटी) की पुष्टि करता है। वियना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशंस और अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत, पासपोर्ट जारी करने वाला देश यह गारंटी देता है कि धारक उसके क्षेत्र में लौट सकता है। यह दस्तावेज सीमा पार यात्रा, वीजा प्राप्ति और विदेश में सुरक्षा के लिए आवश्यक होता है।


वहीं कई देशों में पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए, अमेरिका में भी पासपोर्ट नागरिकता का प्राथमिक प्रमाण है, लेकिन यह जन्म, वंशानुगतता या प्राकृतिकरण जैसे आधारों पर निर्भर करता है। भारत में भी पासपोर्ट एक्ट, 1967 के तहत पासपोर्ट यात्रा के लिए जारी किया जाता है। विदेश मंत्रालय का बयान इस कानूनी वास्तविकता को दोहराता है। पासपोर्ट नागरिकता नहीं बनाता, बल्कि सरकार की संतुष्टि पर आधारित होता है कि धारक भारतीय नागरिक है।



अंतरराष्ट्रीय रूप से, पासपोर्ट राष्ट्रीयता का प्रतीक है, लेकिन यदि किसी की नागरिकता पर विवाद हो (जैसे आप्रवासन, आतंकवाद या दोहरी नागरिकता के मामले में), तो कोर्ट या सक्षम प्राधिकरण मूल दस्तावेजों: जन्म प्रमाण-पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, प्राकृतिककरण प्रमाण आदि, की जांच करते हैं। भारत में यह स्थिति नई नहीं है; बॉम्बे हाईकोर्ट (2013) और सुप्रीम कोर्ट ने भी यही रुख अपनाया है कि पासपोर्ट अकेला निर्णायक साक्ष्य नहीं है।


भारतीय नागरिकता संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और नागरिकता अधिनियम, 1955 द्वारा निर्धारित होती है। नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिकरण या क्षेत्र समावेशन से प्राप्त होती है। 1987 और 2004 के संशोधनों ने जन्म-आधारित नागरिकता को माता-पिता की नागरिकता पर निर्भर कर दिया। कोई एकल दस्तावेज (पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी या पैन) नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं है।


वर्तमान विवाद का संदर्भ विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) है, जो 16 राज्यों में मतदाता सूचियों की सफाई के लिए चल रही है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट वोटर सूची से बाहर किए गए व्यक्ति के खिलाफ चुनौती के लिए पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि यह यात्रा दस्तावेज है। यह बयान ‘सीएए-एनआरसी’ बहस, ‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ नीति और सीमा सुरक्षा के संदर्भ में आया है।

 

वास्तव में, यह कानूनी रूप से सही है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अपर्याप्त। करोड़ों भारतीय पासपोर्ट धारक दैनिक जीवन में इसे अपनी भारतीयता का सबसे मजबूत प्रतीक मानते हैं। पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन, दस्तावेज जांच और जैवमितीय डेटा के बाद जारी होने वाला दस्तावेज है। सरकार के कई पोर्टल और फॉर्म्स में अक्सर पासपोर्ट को नागरिकता के सबूत के रूप में स्वीकार किया जाता है। विपरीत रूप से देखा जाए तो आम नागरिकों के पास कोई ‘नागरिकता प्रमाण-पत्र’ नहीं होता; यह मुख्य रूप से प्राकृतिककरण या विशेष मामलों में ही जारी किया जाता है।यह बयान इसलिए अप्रासंगिक लगता है क्योंकि भारत में अधिकांश नागरिक जन्म-आधारित हैं। पासपोर्ट जारी करने से पहले गहन जांच होती है। इसे अचानक केवल ‘यात्रा दस्तावेज’ कहकर सरकार ने जनता को यह महसूस कराया कि उनकी भारतीयता ‘कागजी’ है, जबकि वास्तव में यह संवैधानिक अधिकार है।


देख जाए तो यह विवाद अनावश्यक भ्रम का सबसे बड़ा उदाहरण है। आम आदमी सोच रहा है कि क्या उसका पासपोर्ट रद्द हो सकता है या ‘सीएए-एनआरसी’ जैसे अभियानों में इसे नजरअंदाज किया जाएगा? विपक्षी दल इसे मुस्लिम-विरोधी एजेंडे से जोड़ रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष इसे कानूनी स्पष्टीकरण बता रहा है। वहीं सोशल मीडिया की वायरल पोस्ट्स ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे अप्रवासी भारतीय और युवा पीढ़ी में भी आशंका फैली।सवाल उठता है कि आधार, वोटर आईडी आदि भी निर्णायक नहीं हैं, तो क्या सबकी नागरिकता संदिग्ध है? यह सवाल लाखों लोगों के मन में घूम रहा है। परिणामस्वरूप, विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया है। जो दस्तावेज विदेश यात्रा और पहचान के लिए सबसे मजबूत है, उसे ‘अपर्याप्त’ बताकर सरकार ने खुद को घेर लिया है।


पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, यह कानूनी सत्य है, लेकिन संदर्भ से बाहर कहे जाने पर यह भ्रम का कारण बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह यात्रा दस्तावेज है, जबकि भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह पहचान और गर्व का प्रतीक। वर्तमान विवाद अनावश्यक है क्योंकि यह मौजूदा कानूनी ढांचे को दोहराता है, लेकिन जनभावनाओं को नजरअंदाज करता है। सरकार को अब संवाद और स्पष्टता से इस संकट को दूर करना चाहिए। सरकार नागरिकों को आश्वस्त करें कि उनकी भारतीयता संवैधानिक है, न कि किसी दस्तावेज पर निर्भर। ऐसा करने से एक मजबूत, पारदर्शी नागरिकता ढांचा न केवल भ्रम दूर करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर और मजबूत बनाएगा।

Monday, June 22, 2026

पेपर लीक: सही कारण पकड़ें और सफल उदाहरण से सीखें!

भारत में प्रवेश परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में एनईईटी-यूजी 2026 परीक्षा को पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द कर दिया गया। इससे लाख से अधिक छात्र-छात्राओं का भविष्य प्रभावित हुआ। एक 'गेस पेपर' में सैकड़ों सवाल असली पेपर से मैच कर गए, जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। राजस्थान, बिहार, हरियाणा आदि राज्यों में कोचिंग माफिया और प्रिंटिंग एजेंसियों तक लीक का सिलसिला पहुंचा। पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 2024 में भी एनईईटी विवादों में घिरा था। वहीं, आईआईटी-जेईई जैसी परीक्षाओं का रिकॉर्ड आजतक लगभग बेदाग रहा है। एक बार 1997 में लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर से लीक की खबर आई थी, लेकिन उसके बाद सख्त प्रोटोकॉल ने इसे रोका। ऐसा क्यों है कि एक ही देश में कुछ परीक्षाएं दोष रहित रहती हैं और क्यों अन्य परीक्षाएं बार-बार पेपर लीक से निरस्त होती हैं?


एनईईटी जैसी परीक्षाओं में लीक का मुख्य कारण मानवीय हस्तक्षेप और कमजोर सुरक्षा है। पेपर सेटिंग, प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्टेशन और परीक्षा केंद्रों तक पहुंच, हर चरण में भ्रष्टाचार की गुंजाइश है। एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) पर बहुत अधिक बोझ है। ऐसे में कई परीक्षाएं आउटसोर्स की जाती हैं, जहां प्राइवेट प्रिंटिंग प्रेस और लॉजिस्टिक्स कंपनियां शामिल होती हैं। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में पेपर लीक की गुंजाइश को नकारा नहीं जा सकता।  


गौरतलब है कि एक पेपर लाखों रुपये में बिकता है। जिसके पीछे छात्रों का दबाव, कोचिंग उद्योग का सैकड़ों करोड़ का कारोबार और राजनीतिक संरक्षण पेपर लीक को बढ़ावा देते हैं। वहीं देश में इस अपराध की कानूनी सजा कमजोर है, आरोपी आसानी से ज़मानत पर बाहर आ जाते हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में 70-90 से अधिक पेपर लीक के मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन किसी भी मामले में किसी बड़े अधिकारी को कोई सज़ा नहीं सुनाई गई। 



वहीं एनटीए की ‘एड-हॉक’ व्यवस्था, संस्थागत स्मृति की कमी और पारदर्शिता की अनुपस्थिति इस समस्या को गहरा बनाती है। ओएमआर शीट्स का इस्तेमाल, डिजिटल ट्रांसिशन में देरी और चेन-ऑफ-कस्टडी की कमी लीक को आसान बनाती है।


गौरतलब है कि हमारे देश में ही आईआईटी-जेईई में लीक लगभग नहीं के बराबर होता। इसका कारण स्पष्ट हैं, बहु-स्तरीय सुरक्षा: पेपर सेटिंग आईआईटी प्रोफेसरों द्वारा कैंपस में होती है। कई सेट तैयार किए जाते हैं, जिसमें सीबीटी (कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट) फॉर्मेट से अंतिम मिनट तक बदलाव संभव होता है। कम आउटसोर्सिंग के कारण ये प्रक्रिया आईआईटी संस्थानों के सीधे नियंत्रण में ही रहती है। जेईई भारत की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा है। इसलिए इसमें शामिल लोग अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। इसके साथ ही तकनीकी का पूरा इस्तेमाल किया जाता है: जिससे  रैंडमाइज्ड प्रश्न, मजबूत एन्क्रिप्शन और सख्त निगरानी की जाती है। जेईई में लाखों छात्र शामिल होते हैं, फिर भी इस पर उनका विश्वास कायम है। यानी कि समस्या परीक्षा के आकार में नहीं, बल्कि प्रबंधन और इरादे में है।



भारत अकेला ही ऐसा देश नहीं है जहाँ बड़े पैमाने पर ऐसी परीक्षाएं होती हैं। चीन का गाओकाओ एक करोड़ तीस लाख छात्र जिसमें बैठते हैं वो दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक है । पर इसमें लीक की घटनाएं नगण्य हैं। पेपर को परमाणु हथियारों जैसा ‘टॉप सीक्रेट’ माना जाता है। पेपर सेटर्स एक महीने पहले से ही आइसोलेशन में भेजे जाते हैं। पर्चों की प्रिंटिंग जेलों या विशेष सरकारी सुविधाओं में की जाती है जहाँ फोन/संपर्क प्रतिबंधित रहता है। पर्चों का ट्रांसपोर्ट पुलिस और आर्म्ड फोर्सेस, द्वारा एयरटाइट सुरक्षा में किया जाता है। इसके बाद इन पर्चों को आर्म्ड गार्ड्स, 24x7 कैमरा निगरानी के साथ सुरक्षित रखा जाता है। जहाँ फेशियल रिकग्निशन, ड्रोन, सिग्नल जैमर्स द्वारा ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जाती है। इतना ही नहीं चीन में सख्त कानूनों के चलते लीक को देशद्रोह माना जाता है, जिसकी कड़ी सजा दी जाती है। समाज इसे राष्ट्रीय त्योहार की तरह देखता है। परिणाम: लगभग शून्य बड़े लीक।


2026 के नीट परीक्षाओं के ‘री-एग्जाम’ के लिए भारतीय वायुसेना को पेपर ट्रांसपोर्ट के लिए बुलाया गया है। सेना  भी लॉजिस्टिक्स में मदद देगी। ऐसा पहली बार हुआ है। जानकर मानते हैं कि सैन्य अनुशासन और निष्पक्षता से विद्यार्थियों और जनता का विश्वास बढ़ेगा। लेकिन वहीं कुछ लोग इसे सिस्टम की विफलता का स्वीकारोक्ति भी मानते हैं। सैन्य बल देश की सीमा की रक्षा करती है, ऐसे में इन्हें शिक्षा मंत्रालय/एनटीए की जिम्मेदारी नहीं संभालनी चाहिए। यह ‘फायरफाइटिंग’ तो अवश्य है, लेकिन समाधान नहीं। यदि प्रबंधन सही होते तो ऐसे संसाधनों का दुरुपयोग रोका जा सकता था। यह अच्छा अल्पकालिक कदम हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। चीन की तरह सिविलियन सिस्टम को मजबूत बनाना चाहिए, न कि सेना पर निर्भर होना।


लीक रोके बिना भारत का मानव संसाधन विकास असंभव है। ऐसे में सरकार को लीक रोकने और प्रभावी प्रबंधन के विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए। जैसे कि पूर्ण डिजिटलीकरण, रैंडम प्रश्न। केंद्रीकृत, आईआईटी/यूपीएससी जैसे मॉडल की तरह स्वायत्त प्राधिकरण। लीक से निपटने के लिए सख्त कानून बनें जहाँ लीक को राष्ट्रीय सुरक्षा अपराध माना जाए और ऐसे मामलों का समयबद्ध ट्रायल हो। इसके साथ ही कोचिंग जैसे बीडी उद्योग का रेगुलेशन किया जाए जो कि पारदर्शी हो।


एनईईटी विवाद छात्रों, परिवारों और राष्ट्र के लिए दर्दनाक है। आत्महत्याएं, आर्थिक नुकसान और विश्वास का ह्रास हो रहा है। आईआईटी-जेईई साबित करता है कि भारत में सक्षम सिस्टम संभव है। वहीं चीन दिखाता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति से बड़े पैमाने पर परीक्षाएं सुरक्षित हो सकती हैं। सशस्त्र बलों की मदद स्वागत योग्य है, लेकिन यह सिस्टम की नाकामी है। सरकार को एनटीए का पुनर्गठन, जवाबदेही और सुधारों पर फोकस करना चाहिए। युवाओं का भविष्य राजनीति या मुनाफे की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। शिक्षा राष्ट्र की नींव है इसे मजबूत बनाएं, वरना ‘विश्व गुरु’ का सपना अधूरा रहेगा।


Monday, June 1, 2026

गर्मियों में बिजली की आपूर्ति कैसे हो ?

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने जनता से बिजली की खपत कम करने की अपील की है। हालांकि उन्होंने यह भी आश्वासन दिया है कि बिजली की आपूर्ति में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी। उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली मिलेगी। उनका यह आश्वासन सराहनीय है। मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। इसी हफ़्ते टीवी पर एक शो में बहस के दौरान पत्रकारों ने बताया कि नोएडा में बिजली का भारी संकट चल रहा है। बहुमंजलीय इमारतों में रहने वाले लोग भी बेहाल हैं। क्योंकि उन्हें पॉवर बैक-अप नहीं मिल रहा। उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों में बिजली कमी को लेकर जगह-जगह जन-आंदोलन चल रहे हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश में बिजली के ‘स्मार्ट मीटर’ का बड़ा घोटाला भी सामने आया है। इन मीटरों को लगवाने का निर्णय योगी सरकार के पहले कार्यकाल में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के नेतृत्व में लिया गया था। इन मीटरों को लेकर जनता की शुरू से ही यह शिकायत रही है कि उनके बिल खपत से कई गुना ज़्यादा आ रहे हैं। अब जब पानी सर के ऊपर से गुज़र गया तो उत्तर प्रदेश की त्रस्त जनता ने ‘स्मार्ट मीटर’ उखाड़ कर फेंकने शुरू कर दिए और आक्रोशित जनता सड़कों पर उतर आई। योगी सरकार ने अब इन मीटरों को ना लगाने का फ़ैसला किया है।


वैसे तो हर साल गर्मियों में खास कर कर उत्तर भारत में बिजली का संकट बहुत बढ़ जाता है। क्योंकि बांधों में जल का स्तर तेज़ी से घटता है और नदियाँ भी सूखने लगती हैं। कारण पहाड़ों पर चल रहे सड़कों के विस्तार ने वृक्षों की अंधाधुंध कटाई की है। जिससे वर्षा की मात्रा तेज़ी से गिर गई है। पहाड़ ही क्यों मैदानों में भी जंगलों की अविवेकपूर्ण कटाई ने देश का हरित क्षेत्र  खतरनाक स्तर तक कम कर दिया है। जब ज़्यादा हरियाली होती है तो वातावरण में नमी पैदा होती है और उससे वर्षा होती है। 



उधर अमरीका-इसराइल-इराक़ युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो, इन युद्धों में जो गोला बारूद रात-दिन आग उगल रहा है, उससे भी ‘ग्लोबल वार्मिंग’ बढ़ रही है। इसका प्रमाण है, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर तेज़ी से घटते हिमखंड। कुछ वर्ष पहले तक यूरोप के लोग गर्मी का नाम ही नहीं जानते थे। वहाँ के घरों में पंखे या एसी नाम का उपकरण नहीं लगाया जाता था। आज यूरोप के इन देशों को भीषण गर्मी की मार झेलनी पड़ रही है। पर किसी भी देश की सरकार पर्यावरण के इस मुद्दे पर गंभीरता से कोई ठोस काम नहीं कर रही।


अगर बिजली की खपत पर लौट कर आएँ तो योगी जी की ये चिंता निर्मूल नहीं है। एक ज़माने में ख़स के पर्दे से ही भवन ठण्डे किए जाते थे। फिर कूलर का दौर आया और आज तो घर-घर ए सी लग गए हैं। पर ए सी की जितनी खपत आम नागरिक करते हैं उससे कई गुना ज़्यादा सरकारी और व्यवसायिक प्रतिष्ठान करते हैं। योगी जी अगर अपने मंत्रालयों के भवनों का औचक निरीक्षण करें तो पाएंगे कि जब अफ़सर और बाबू कमरों में नहीं होते तब भी वहाँ कई-कई ए सी फालतू चलते रहते हैं। यही हाल अन्य प्रांतों के सरकारी दफ्तरों का भी होता है। इसलिए बिजली की खपत कम करने की पहल जितनी नागरिकों की तरफ़ से ज़रूरी है, उतनी ही शासक वर्ग से भी है।



हाइड्रो पॉवर या थर्मल पॉवर की बिजली बनाने की अनेकों सीमाएँ हैं। इनसे उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। बिजली की आपूर्ति को सुनिश्चित करने का सबसे बढ़िया उपाय है, सोलर एनर्जी। भारत जैसे विशाल भूभाग वाले क्षेत्र में भवनों की छतों पर सोलर पैनल लगा कर प्रदूषण मुक्त बिजली पैदा की जा सकती है। चीन इस दिशा में बहुत आगे बढ़ गया है। वो अपनी आवश्यकता से कहीं ज़्यादा बिजली सोलर पैनलों से पैदा कर रहा है। कोचीन का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पूरी तरह सोलर एनर्जी पर निर्भर है। इसलिए शेष प्रांतों में भी इस दिशा में तीव्रता से काम करने की ज़रूरत है। 



उल्लेखनीय है कि मई 2026 में उत्तर प्रदेश ने 31,824 MW का रिकॉर्ड पीक डिमांड पूरा करने का दावा किया है। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे राष्ट्रीय रिकॉर्ड बताते हुए कहा कि शहरों में 24 घंटे और गांवों में 18-22 घंटे बिजली दी जा रही है। केंद्र सरकार भी पूरे देश में 270 GW से अधिक पीक डिमांड को सफलतापूर्वक पूरा करने का दावा कर रही है। 2012 के बड़े ब्लैकआउट की तुलना में यह प्रगति प्रभावित करती है, लेकिन इन आंकड़ों की चमक जमीनी हकीकत को छुपा नहीं पा रही।


वास्तविकता यह है कि यूपी में ललितपुर व घाटमपुर जैसे थर्मल प्लांटों के बंद पड़े रहने से बिजली का संकट गहराया है। कोयला आपूर्ति की कमी और ट्रांसमिशन-डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के पुरानेपन ने स्थिति और बिगाड़ दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 6-12 घंटे तक बिजली गुल रहने की शिकायतें आम हैं। लखनऊ, गोंडा, वाराणसी जैसे शहरों में भी रात के समय बिजली की कटौती हो रही है। यहां तक कि भाजपा के विधायक भी इस मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। 


सरकार का दावा है कि मांग बढ़ने के कारण समस्या है, न कि उत्पादन की कमी। लेकिन सवाल उठता है कि जब हर साल गर्मी आती है और मांग बढ़ती है, तो तैयारी क्यों नहीं होती? पिछले वर्षों में क्षमता में वृद्धि हुई है, लेकिन वितरण व्यवस्था में सुधार अपर्याप्त रहा। ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर, पुरानी लाइनें और शाम के समय सोलर जनरेशन घटने के बाद की कमी को प्रबंधित करने की ठोस योजना नजर नहीं आती। ऊर्जा एक्सचेंज से भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही । क्योंकि पूरे उत्तर भारत में बिजली की मांग समान रूप से बढ़ी हुई है।


यह संकट केवल गर्मी का नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का भी है। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद, बैटरी स्टोरेज और स्मार्ट ग्रिड पर पर्याप्त निवेश नहीं हुआ। किसान, छोटे उद्योग और आम घरेलू उपभोक्ता सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। गर्मी में बिजली न होने से स्वास्थ्य, पानी की आपूर्ति और आजीविका सब प्रभावित हो रही है।


सरकार को अब संख्याओं से आगे बढ़कर समाधान पर ध्यान देना चाहिए। थर्मल प्लांटों का तुरंत रखरखाव, नई ट्रांसमिशन लाइनों का तेजी से निर्माण, डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का आधुनिकीकरण और मांग प्रबंधन की बेहतर रणनीति जरूरी है। ‘24x7 बिजली’ के बड़े-बड़े दावे तब तक खोखले रहेंगे, जब तक जनता को राहत न मिले।


विद्युत क्षेत्र में प्रगति निश्चित रूप से हुई है, लेकिन संकट के समय यह प्रगति जनता तक नहीं पहुंच रही। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी भारी है। सरकार को अब दावों से हटकर वास्तविक सुधार पर ध्यान देना होगा, अन्यथा गर्मी के साथ-साथ जनाक्रोश भी बढ़ता रहेगा।

गौ-माता राष्ट्रीय पशु घोषित हो !

पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजों ने वो कर दिखाया जिसका दशकों से इंतज़ार था। पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने बक़रा ईद पर गौवंश की बलि न चढ़ाने का फ़ैसला किया है। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के मुसलमान संगठनों ने भारत सरकार से गौ-माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग की है। उन्होंने गौ हत्या करने वालों और गौ मांस का निर्यात करने वालों को सख्त सज़ा दिए जाने का क़ानून बनाने की भी माँग की है। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है तब से लगातार गौ हत्या को लेकर गौ रक्षकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आक्रोश व्यक्त किया जाता रहा है। इतना ही नहीं गौ मांस खाने व ले जाने के संदेह में कई बार मुसलमानों पर हिंसक हमले भी किए गए हैं। इस सबसे मुसलमानों के बीच ये संदेश गया है कि हिंदुस्तान में गौ वंश की हत्या को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए उनका ये ताज़ा फ़ैसला और गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग एक समझदारी भरा कदम माना जाना चाहिए। मुस्लिम समाज के नेताओं को यहीं माँग देश के अन्य प्रांतों से भी उठानी चाहिए।   

उल्लेखनीय है कि हमारे पूरे इतिहास में, इस देश के शासकों और आदर्श व्यक्तियों ने गाय की रक्षा और पोषण किया है। राजा पृथु, जिनके नाम पर पृथ्वी को पृथ्वीकहा जाता है, ने पृथ्वी के स्वरूप वाली गाय का दोहन कर पृथ्वी पर अकाल को समाप्त किया और मानवता की रक्षा की। भगवान श्रीकृष्ण एक गोपाल (गाय चराने वाले) थे। अर्जुन ने विराटनगर के युद्ध में गायों की रक्षा के लिए 14 वर्ष का और निर्वासन झेलने का जोखिम उठाना उचित समझा। राजा नहुष को ऋषि च्यवन के जीवन के बराबर पुरस्कार देकर मछुआरों को मुआवजा देना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने उन्हें एक गाय दान कर दी। चोल राजा मनु नीति चोलन ने अपने पुत्र वीधिविदंगन को मार डाला, क्योंकि उसके रथ के पहियों के नीचे एक गाय का बछड़ा कुचल गया था।


मुगल सम्राट अकबर (1556–1605), जहांगीर (1605–1627), और अहमद शाह (1748–1754) ने भी गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाए थे। मैसूर के सुल्तान हैदर अली (1761-82) ने गौ-हत्या को दंडनीय अपराध बनाया, जिसमें अपराधियों के हाथ काटे जाते थे। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में, सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पूरे राज्य में गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने 1857 में गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाया, गोमांस खाने पर रोक लगाई और गाय की हत्या करने वाले किसी भी व्यक्ति को तोप से उड़ाकर सजा देने की घोषणा की।


मराठा, जो सभी धर्मों के प्रति समावेशी और सहिष्णु माने जाते थे, उन्होंने गौ-हत्या को रोकने के लिए व्यापक कदम उठाए और गायों को मारने वालों से कठोरता से निपटा। कई मामलों में उन्हें फाँसी भी दी गई। उन्होंने 1790 के दशक के अंत में बसेन (वर्तमान वसई, महाराष्ट्र) के आसपास नाकेबंदी भी कर दी थी, ताकि गायों की लाशों को बॉम्बे और सलसेट के कसाइयों तक तस्करी से न पहुँचाया जा सके। हिंदू धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज से लेकर आज तक हर संत और सनातन धर्मी गौ वंश की हत्या रोकने की मांग करता आया है। फिर भी रोज़ाना भारत से हज़ारों ट्रक गौ वंश काटने के लिए अवैध रूप से बांग्लादेश भेजा जाता है। आश्चर्य है कि बीएसएफ उसे रोक क्यों नहीं पाती?   


दरअसल गौरक्षा का मुद्दा बिल्कुल धार्मिक नहीं है। यह तो शुद्धतम रूप में लोगों की कृषि, अर्थव्यवस्था और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है। हजारों साल पहले भारत के ऋषियो ने गौवंश के असीमित लाभ जान लिए थे। इसलिए उन्होंने भारतीय समाज में गौवंश को इतना महत्व दिया। अंग्रेज़ शासकों ने बाकायदा रणनीति बनाकर भारतीय गौवंश को पूरी तरह नष्ट करने का अभियान चलाया, जो आज तक चल रहा है। क्योंकि वह जानते थे कि हजारों साल से भारत की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत गौ आधारित कृषि रहा था। बिना गौवंश की हत्या किए भारत और भारतीयों को कमजोर नहीं किया जा सकता था। आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसमें बड़ी होशियारी से पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई। उन्होंने इस तरह की मानसिकता तैयार की कि घर-घर में पलने वाली गाय हमारी उपेक्षा और हीनभावना का शिकार हो गयी। जिससे गाय का दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ सेवन करके हर भारतीय परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान रहता था। आज आम भारतीयों को जीवन के लिए पोषक तत्व प्राप्त नहीं हैं। दूध, दही, घी के नाम पर जो बड़े ब्रांडो के नाम से बेचा जा रहा है, उसमें कितने कीटनाशक, रासायनिक खाद्य और नकली तत्व मिले हैं, इसका अब हिसाब रखना भी मुश्किल है। नतीजा सामने है कि मेडीकल का व्यवसाय हर गली व शहर में तेजी से पनप रहा है।


चिंता और दुख की बात ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन पर जीने वाले कैसे देश के हित में सोच सकते हैं ? वह तो वही लिखेंगे और बोलेंगे, जो उनके कॉरपोरेट आका उन्हें लिखने को कहेंगे। इस लॉबी के खिलाफ देशभक्तो को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। पर हिंसा से नहीं तर्क और प्रमाण के साथ। भारतीय गौवंश की श्रेष्ठता को भारतीय जनमानस के सामने लगातार हर मंच पर इस तरह रखना होगा कि एक बार फिर भारतीय परिवार गौवंश को अपने आंगन में स्थान दे।


गांवों में तो यह आसानी से संभव है, पर दुख की बात है कि वहां भी आज गौवंश की उपेक्षा हो रही है। हमने हमेशा कहा है कि गाय गौशाला में नहीं, बल्कि जब हर घर के आंगन में पलेंगी, तब गौवंश की रक्षा होगी। जिनके पास स्थान का अभाव है, उनकी तो मजबूरी है। पर वह भी भारतीय गौवंश के उत्पादों को सामूहिक रूप से प्रोत्साहन देकर अपने परिवार और समाज का भला कर सकते है। भूटान में हर व्यक्ति सुखी है, क्योंकि उनका जीवन गौ और कृषि आधारित है। उन्हें दुनिया के साथ दौड़ने की इच्छा नहीं है। क्योंकि वह तीव्र औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से परिचित हैं।

फिर भारत क्यों औद्योगीकरण की और ‘बीफ’ निर्यात की अंधी दौड़ में भागना चाहता है, जिसका फल भौतिक प्रगति तो हो सकता है, पर उससे समाज सुखी नहीं होता। बल्कि समाज और ज्यादा असुरक्षित होकर तनाव में आ जाता है। भारत की सनातन संस्कृति सादा जीवन और उच्च विचार को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देती है। इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज हजारों साल से निरंतर जिंदा रहा है। जबकि पश्चिमी समाज ने एक शताब्दी के अंदर ही औद्योगीकरण के नफे और नुकसान, दोनों का अनुभव कर लिया है। अब वह भारतीय जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में भारत को फिर से विश्वगुरू बनना होगा। जो गौ आधारित जीवन और वेद आधारित ज्ञान से ही संभव है। इसमें न तो कोई अतिश्योक्ति है और न ही कोई धर्मांधता। कहीं ऐसा न हो कि सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया। 

Monday, May 11, 2026

जनता की जान की क़ीमत पर वीआईपी सुरक्षा क्यों?

नर्मदा नदी के बरगी बाँध के दुखद हादसे के बाद सोशल मीडिया पर एक आम नागरिक की टिप्पणी ने मुझे कुछ सोचने पर मजबूर किया। उसका कहना था कि जब देश में ऊर्जा संकट बढ़ रहा है और अनावश्यक दुर्घटनाओं में कीमती जीवन समाप्त हो रहे हैं, तो वीआईपी सुरक्षा के नाम पर हज़ारों गाड़ियाँ और सुरक्षा कर्मी क्यों रात-दिन भागते रहते हैं? जबकि यही सुरक्षा कर्मी अगर यातायात, भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा नियमों के कड़े अनुपालन और  आपदा प्रबंधन के लिए तैनात रहे तो आम जनता को कितनी राहत मिलेगी? भारतीय मूल का 38 वर्षीय हिमांशु गुलाटी नॉर्वे का तीसरी बार सांसद है और वहाँ का उप-कानून मंत्री भी। उसे कोई वीआईपी सुरक्षा नहीं मिली हुई। उसने मुझे बताया कि नॉर्वे की पिछली प्रधान मंत्री एर्ना सोलबर्ग जब एक बार उसके घर रात्रि भोज पर आईं तो वे बिना किसी सुरक्षा बंदोबस्त के स्वयं कार चला कर आईं और सीधे रसोई में जा कर रसोइए से हाल चाल पूछने लगीं। सिडनी से मेरी मित्र विमला ने पिछला लेख पढ़ कर फ़ोन पर बताया कि कुछ दिन पहले वो सिनेमा घर में फ़िल्म देख रही थीं। अचानक उसकी निगाह पड़ी ऑस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री पर जो उसी पंक्ति में बिना किसी सुरक्षा के फ़िल्म देख रहे थे। अमरीका और यूरोप के देशों में अक्सर आपको वर्तमान व निवर्तमान राष्ट्राध्यक्ष आम आदमी की तरह बाज़ारों में घूमते हुए दिख जाते हैं। जिनके आगे पीछे कोई सुरक्षा घेरा नहीं होता। नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री बालेंद्र शाह ने नेपाल में वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने के लिए कई कड़े निर्णय लिए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपने फैसलों पर टिके रहेंगे। 


यहाँ मेरा आशय भारत के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री व प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों आदि की आवश्यक सुरक्षा को लेकर कोई टिप्पणी करने का नहीं है। पर इनके अलावा देश में लगभग 19,000 ऐसे लोग हैं जिन्हें सरकारी सुरक्षा प्रदान की गई है। जिस पर 66,000 सुरक्षा कर्मी तैनात हैं। अकेले दिल्ली में 500 लोगों को वीआईपी सुरक्षा मिली है जिस पर लगभग 750 करोड़ रुपया सालना खर्च होता है। अंदाज़ा लगाइए कि बाक़ी 18,500 लोगों की सुरक्षा पर कितने हज़ार करोड़ रुपया खर्च होता होगा? ये पैसा उस मतदाता की मेहनत की कमाई पर टैक्स लगाकर वसूला जाता है जिसे नर्मदा या वृंदावन की यमुना में सुरक्षा नियमों की लापरवाही के कारण बार-बार जान गवानी पड़ती है। 


मुझे याद है कि 2003-05 में जब मैं वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर का अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर था तो मैंने वहाँ वीआईपी गाड़ियों के प्रवेश को रोकने के लिए दो मुख्य रास्तों के शुरू में ही लोहे की चेन लगवा दी थी जो आजतक लगी हैं। ऐसा मैंने तब किया जब संकरे प्रवेश मार्ग में मंदिर तक जाने को आमदा एक एसडीएम की गाड़ी ने एक वृद्ध महिला को कुचल दिया। गली के बाहर मैंने एक बोर्ड भी टंगवा दिया था। जिस पर लिखा था, ‘बिहारी जी धनीनाथ या वीआईपीनाथ नहीं हैं - वे दीनबंधु दीनानाथ हैं। उनके द्वार पर दिन बनकर आओगे तभी उनकी कृपा पाओगे।’ मुझे खुशी है कि न सिर्फ़ केंद्रीय मंत्रियों ने बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक ने इस नियम का पालन किया।


पिछले कई दशकों से हालत यह है कि हर चंगू-मंगू, ऐरा-गैरा अपने राजनैतिक संपर्कों का लाभ उठा कर सरकारी सुरक्षा ले लेता है और फिर जनता के बीच दबंगई से घूमता है। इनमें से 99 फ़ीसदी लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कोई ख़तरा नहीं होता। पर अपनी ताक़त और रुतबे का प्रदर्शन करने के लिए उन्हें सरकारी सुरक्षा पाने की लालसा रहती है। अगर पाठकों को ये आत्मश्लाघा न लगे तो विनम्रता से यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि 1993-98 के बीच अलग-अलग जगहों पर मुझ पर कई बार जानलेवा हमले हुए। क्योंकि ‘जैन हवाला कांड’ को उजागर करके मैंने देश के सबसे ताकतवर लोगों और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों के विरुद्ध अकेले ही युद्ध छेड़ दिया था। पर प्रभु कृपा से मैं न तो डरा, न झुका और न बिका। उस दौर में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी एन शेषन और मैं देश भर में जनसभाओं को संबोधित करने जाते थे तो अक्सर मुझसे यह प्रश्न पूछा जाता था कि ‘आप इतना ख़तरनाक युद्ध लड़ रहे हैं, आपको डर नहीं लगता?’ मेरा श्रोताओं को उत्तर होता था, ‘मारे कृष्णा राखे के, राखे कृष्णा मारे के’, श्री चैतन्य महाप्रभु के उक्त वचन से मुझे नैतिक बल मिलता था। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि बड़े-बड़े मंचों से धार्मिक प्रवचन करने वाले केसरिया वेश धारी भी कमांडो और पुलिस के घेरे में रह कर गर्व का अनुभव करते हैं। माया मोह त्यागने का उपदेश देने वालों की कथनी और करनी में इस भेद के कारण ही देश की आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं हो पा रहा है। धर्म भी एक शान-शौकत की चीज़ बनता जा रहा है।  


समय की माँग है कि प्रधान मंत्री मोदी जी सभी राज्यों के मुख्य मंत्रियों के साथ इस विषय पर गंभीर चिंतन करें और एक ऐसी नीति बनाएँ जिसमें सरकार की ओर से केवल राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को छोड़ कर बाक़ी किसी को तब तक सुरक्षा न मिले जबतक की वास्तव में उनके जीवन को गंभीर ख़तरा न हो। इसमें उन राजनेताओं को भी अनावश्यक सुरक्षा न दी जाए जो इन पदों पर रह चुके हों, पर अब किसी पद पर न हों। इसके बावजूद अगर कुछ नेता, उद्योगपति या अन्य लोग सरकारी सुरक्षा पाने के लिए आवेदन करें तो उन्हें यह सुरक्षा इस शर्त पर दी जाए कि वे इसका खर्चा स्वयं वहन करेंगे। यहाँ कोई सवाल खड़ा कर सकता है कि इन लोगों को सुरक्षा देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। उसका उत्तर है कि जो लोग शासन प्रशासन की लापरवाही से आए दिन दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है?  

Monday, April 13, 2026

जनसेवा की नई मिसाल देता नेपाल का युवा मंत्रिमंडल !

नेपाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव आया जब 27 मार्च 2026 को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के नेतृत्व में बालेन शाह (बलेंद्र शाह) ने 36 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 15 सदस्यीय कैबिनेट का गठन किया। यह मंत्रिमंडल न सिर्फ नेपाल का सबसे युवा कैबिनेट है, बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी उच्च शैक्षणिक योग्यता के लिए वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन रहा है। इस मंत्रिमंडल के सदस्यों की औसत आयु मात्र 38.21 वर्ष है, दस मंत्री 40 वर्ष से कम उम्र के, पांच महिला मंत्री और 80 प्रतिशत से अधिक सदस्यों के पास स्नातकोत्तर या डॉक्टरेट की डिग्री। यह आंकड़े नेपाल की राजनीति के पारंपरिक चेहरे को पूरी तरह बदल रहे हैं। 


यह कैबिनेट 'जेन-ज़ी आंदोलन' के परिणामस्वरूप सत्ता में आई है। भ्रष्टाचार, पुरानी पार्टियों की नाकामी और युवाओं की मांगों को लेकर हुए आंदोलन ने आरएसपी को भारी बहुमत दिलाया। अब यह युवा टीम न सिर्फ नेपाल में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में 'दुनिया का सबसे युवा कैबिनेट' और 'सबसे शिक्षित मंत्रिमंडल' के रूप में प्रसिद्ध हो रही है। कई भारतीय अखबारों ने इसे 'जनरेशनल शिफ्ट' करार दिया है। विश्व स्तर पर इसकी सराहना हो रही है क्योंकि यह पारंपरिक राजनीति से हटकर योग्यता, तकनीकी विशेषज्ञता और समावेशिता पर आधारित है। यह दक्षिण एशिया का चमकता उदाहरण है, जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों के कैबिनेट अक्सर वरिष्ठ नेताओं पर निर्भर रहते हैं।


इस कैबिनेट की सबसे बड़ी ताकत इसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि है। प्रधानमंत्री बालेन शाह स्वयं सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक (पूर्वांचल विश्वविद्यालय) और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में एम.टेक (निट्टे मीनाक्षी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बेंगलुरु, भारत) हैं। वे काठमांडू के पूर्व मेयर और लोकप्रिय रैपर भी हैं। उनकी टीम में दो डॉक्टरेट धारक और दस स्नातकोत्तर सदस्य हैं। वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले (41 वर्ष, कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ) अर्थशास्त्र में पीएचडी (ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी), हार्वर्ड से एमपीए/आईडी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से स्नातक हैं। वे पूर्व में यूएनडीपी के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक सलाहकार और नेपाल की राष्ट्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी विशेषज्ञता आर्थिक सुधार, गरीबी उन्मूलन और सतत विकास में है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल (47 वर्ष) अमेरिका के विस्कॉन्सिन-मैडिसन से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिजपोर्ट से पॉलिटिकल इकोनॉमी में स्नातक हैं। वे 'टीच फॉर नेपाल' के सह-संस्थापक हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा सुधार का प्रमुख अभियान है।


शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा युवा एवं खेल मंत्री सस्मित पोखरेल (29 वर्ष) कैबिनेट के सबसे युवा सदस्य हैं। वे काठमांडू विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट एवं कानून में स्नातक हैं और पॉलिसी, गवर्नेंस एवं भ्रष्टाचार-निरोध पर मास्टर्स कर रहे हैं। वे बालेन के मेयर काल में शहरी नियोजन सलाहकार रह चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता (38 वर्ष) भारत के ग्वालियर से नर्सिंग में मास्टर्स और दिल्ली के एम्स से प्रशिक्षित हैं। सामान्य प्रशासन मंत्री प्रतिभा रावल (32 वर्ष) एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (चेन्नई) से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा रखती हैं। श्रम मंत्री दीपक कुमार साह (34 वर्ष) लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन से पीएचडी स्कॉलर, एलएसई से हेल्थ पॉलिसी में मास्टर्स और आईओएम से पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स रखते हैं।


महिला, बाल-बालिका एवं ज्येष्ठ नागरिक मंत्री सीता बादी (30 वर्ष) राजनीति विज्ञान में मास्टर्स हैं और बादी समुदाय की प्रतिनिधि के रूप में समावेशिता का प्रतीक हैं। कानून मंत्री सोबिता गौतम (30 वर्ष) राष्ट्रीय विधि महाविद्यालय से बीए एलएलबी हैं और संसदीय समितियों में सक्रिय रहीं हैं। भौतिक पूर्वाधार मंत्री सुनील लाम्सल (35 वर्ष) भी भारत से एम.टेक (स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग) हैं।


गौरतलब है कि ये योग्यताएं महज डिग्रियां नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव से जुड़ी हैं। यूएनडीपी, टीच फॉर नेपाल, आपदा राहत संगठन 'हामी नेपाल' और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में इन सभी की अहम भूमिका रही है। पांच महिला मंत्रियों का प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी (जैसे सीता बादी) समावेशिता को मजबूत करती है।


देखा जाए तो नेपाल का यह कैबिनेट अपने पड़ोसियों से अलग दिखता है। भारत के वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल में 71 सदस्य है, जिसमें 57 सदस्य स्नातक या उससे ऊपर हैं, लेकिन 11 सदस्य मात्र 12वीं पास हैं। कई मंत्री राजनीतिक अनुभव पर निर्भर हैं, जबकि युवा चेहरे कम हैं। वहीं चीन का मंत्रिमंडल अत्यधिक शिक्षित तकनीकी विशेषज्ञों (इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र) से भरा है, लेकिन उनकी औसत आयु 55-60 वर्ष के आसपास है और निर्णय प्रक्रिया केंद्रीकृत पार्टी संरचना पर आधारित है। बांग्लादेश के हालिया कैबिनेट में 46/50 सदस्य उच्च शिक्षा वाले हैं (तीन पीएचडी), लेकिन वहां भी वरिष्ठता और राजनीतिक वफादारी प्रमुख है।


नेपाल का कैबिनेट इन सभी से युवा, अधिक समावेशी और योग्यता-आधारित है। भारत और चीन की तुलना में यहां भ्रष्टाचार-विरोधी 'डिलीवरी बेस्ड गवर्नेंस' पर जोर है, जो पड़ोसियों में अक्सर कम देखा जाता है। हालांकि, कुछ विश्लेषक चेताते हैं कि इस मंत्रिमंडल के पास अनुभव की कमी एक चुनौती है। भारत की तरह बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था या चीन की तरह दीर्घकालिक नियोजन यहां अभी संभव नहीं, लेकिन पारदर्शिता और तेज निर्णय लेने की क्षमता नेपाल को लाभ दे सकती है।


केवल दो सप्ताह पुरानी यह सरकार पहले ही '100 सूत्री शासन सुधार एजेंडा' लागू कर चुकी है। पहली कैबिनेट बैठक में मंत्रालयों का पुनर्गठन, दक्षिण एशिया संघर्ष के प्रभाव से नेपाली प्रवासियों की सुरक्षा, ‘कार्की आयोग’ रिपोर्ट पर कार्रवाई और संविधान संशोधन पर चर्चा पत्र तैयार करने जैसे कदम उठाए गए। शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने पार्टी-आधारित छात्र संगठनों को समाप्त करने और स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता ने निजी अस्पतालों में 10 प्रतिशत मुफ्त बेड सुनिश्चित करने की घोषणा की है।


वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आर्थिक स्थिरता, पर्यटन विकास और बुनियादी ढांचे पर ध्यान दे रहे हैं। श्रम और स्वास्थ्य मंत्रियों की स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञता गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन में मदद करेगी। विदेश मंत्री शिशिर खनाल की पॉलिसी विशेषज्ञता नेपाल की कूटनीति को मजबूत करेगी। युवा बेरोजगारी घटाने, शिक्षा गुणवत्ता सुधारने, स्वास्थ्य पहुंच बढ़ाने और भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास पहले ही दिख रहे हैं। दैनिक प्रगति निगरानी प्रणाली लागू कर सरकार जवाबदेही सुनिश्चित कर रही है। हालांकि, चुनौतियां यहाँ भी हैं, जैसे कि पहाड़ी इलाकों में पहुंच, संसाधन सीमाएं और पुरानी पार्टियों का विरोध। फिर भी, यह कैबिनेट जनता की उम्मीदें पूरी करने की राह पर है।


कुल मिलाकर देखा जाए तो नेपाल का यह ‘जेन-ज़ी’ कैबिनेट न सिर्फ दक्षिण एशिया के लिए मिसाल है, बल्कि विकासशील देशों को सिखाता है कि योग्यता और युवा ऊर्जा राजनीति को बदल सकती है। यदि यह टीम अपने 100 सूत्री एजेंडा को ईमानदारी से लागू कर पाई, तो नेपाल आर्थिक समृद्धि, सामाजिक न्याय और सुशासन का नया मॉडल बन सकता है।