Tuesday, February 10, 2026

सनातन धर्म, चारों शंकराचार्य और हम!

आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः। तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः॥


हमारी सनातन सभ्यता संस्कृति में आचरण को प्रथम स्थान दिया है। आचरण के अभाव में बड़े नाम वाले व्यक्ति या संस्थाएं ही नहीं देवराज इंद्र से लेकर रावण की भी सत्ता चली गई। सनातन-सनातन के नाम का नारा लगाने से हिंदू धर्म को कितना लाभ हुआ है इसका सर्वमान्य निष्कर्ष अभी नहीं निकला है। विशेष रूप से जब हम सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को ही न जानते हों और सनातन-सनातन के नारे लगते रहें पर हमारा व्यक्ति, व्यवस्था व सत्ता के आचरण से कोई लेना-देना नहीं हो तो ये थोथी नारेबाजी ही होगी। इसका सनातन धर्म से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होगा।  


सनातन धर्म ही हिंदू धर्म है। इसके मूल सिद्धांत गहन और सार्वभौमिक हैं। ये सिद्धांत वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, मनुस्मृति और अन्य शास्त्रों से निकले हैं। सनातन धर्म कोई एक किताब या संस्थापक पर आधारित नहीं है, बल्कि यह शाश्वत सत्य की खोज के लिए समर्पित वैयक्तिक और सामाजिक उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए जीवन जीने की व्यवस्था है। ये जाति, वर्ण, भौगोलिक परिस्थिति और देशकाल के आधार पर किसी से भेद नहीं करता।  


सनातन धर्म के सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत मुख्य मूल पहला सिद्धांत हैं: ब्रह्म सत्यं यानि केवल एक परम सत्य है – ब्रह्म या परमात्मा जो निराकार रूप में सर्वव्यापी चेतना है और जीवात्मा से अभिन्न है। ये अद्वैत दर्शन है और द्वैतवाद में परमात्मा साकार रूप में है और वह जीव से एक होकर भी भिन्न हैं। जैसे नमी वायु में सर्वत्र व्याप्त है पर दिखायी नहीं देती। ये उसका निराकार स्वरूप है। जब तापक्रम बहुत गिर जाता है तो यही नमी सघन हो कर ओस, वर्षा, धुंध या बर्फ बनकर दिखने लगती है। ये उसका साकार रूप है। भक्त की भावना जब इतनी प्रबल हो जाती है कि उसे अपने आराध्य को देखे बिना चैन नहीं पड़ता, तब निराकार ब्रह्म साकार रूप धारण करके अपने भक्त को दर्शन देते हैं।  


सनातन धर्म का दूसरा सिद्धांत है: आत्मा अजर-अमर अविनाशी, शाश्वत और जन्म-मृत्यु से परे है। शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं। नैनं छिन्दंति शस्त्राणि… (गीता 2.20) 


तीसरा कर्म का सिद्धांत है: जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा (कारण-कार्य का नियम) अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा जीवन-दर-जीवन चलता है। 


चौथा है पुनर्जन्म का सिद्धांत यानि संसार चक्र। आत्मा कर्मों के अनुसार बार-बार नए शरीरों में आती रहती है। जन्म-मरण का ये चक्र तब तक चलता है जब तक मोक्ष न मिले। 


पाँचवाँ है मोक्ष या मुक्ति का सिद्धांत: जन्म-मृत्यु के चक्र से पूर्ण मुक्ति, ब्रह्म में लीन होना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। चार पुरुषार्थों में सबसे ऊँचा लक्ष्य: है मोक्ष, शेष हैं धर्म, अर्थ व काम। 


छठा सिद्धांत है अहिंसा परमो धर्म: अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। मन, वचन, कर्म से सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखना और किसी के प्रति हिंसा न करना। 


सातवां है: सत्यं वद, धर्मं चर यानि सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। ये महावाक्य ‘तैत्तिरीय उपनिषद’ से लिया गया है। 


आठवाँ सिद्धांत है अपने-अपने धर्म का आचरण करना। धर्म क्या है? कर्तव्य, नैतिकता, न्याय सामाजिक व्यवस्था का आधार है: व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व। 


नवाँ है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानि समस्त विश्व एक परिवार है इसलिए सर्व प्राणियों में एकत्व की भावना।  


दसवाँ सिद्धांत है: ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। इसलिए शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, सौर अथवा स्मार्त आदि एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।

 

सनातन धर्म के अन्य महत्वपूर्ण सहायक सिद्धांत हैं: पंच महायज्ञ– देव, पितृ, भूत, मनुष्य और ब्रह्म यज्ञ ये दैनिक जीवन में कर्तव्य हैं। यम-नियम से जो पतंजलि योग सूत्र के अनुसार हैं: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि। फिर हैं त्रिगुण यानि: सत्व, रज, तम। प्रकृति के ये तीन गुण जो जीवन को प्रभावित करते संक्षेप में कहें तो सनातन धर्म का सार है: एक परम सत्य की खोज, आत्मा की अमरता को समझना, कर्मों के अनुसार जीवन जीना और अंत में उस सत्य में लीन हो जाना या मोक्ष प्राप्त करना।


यह कोई कठोर नियमावली नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है जो व्यक्ति को स्वतंत्रता देता है कि वह अपने स्वभाव, समय और परिस्थिति के अनुसार अपना मार्ग चुन सके। भक्ति, ज्ञान, कर्म या योग कोई भी रास्ता चुना जा सकता है।


सनातन धर्म को मानने वालों को मार्गदर्शन देने के लिए आदि शंकराचार्य जी ने भारत में चार पीठों की स्थापना की थी। यही चारों शंकराचार्य सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य हैं। इन्हें हज़ारों वर्षों से भगवान शंकर के रूप में पूजा जाता है। सभी संप्रदाय के आचार्य व अनुयायी सदियों से इन्हें अपने गुरु के रूप में पूजते हैं। किंतु आज देश में अनेक छ्द्म अराजक तत्व अपने नाम के पहले स्वघोषित शंकराचार्य नाम लगा कर घूम रहे हैं, जिन्हें कोई शास्त्रीय मान्यता प्राप्त नहीं है। आज सनातन धर्म का दुर्भाग्य देखिए कि स्वयं को उसके ध्वजवाहक होने का भ्रम पालने वाले ही आज अपने सर्वोच्च धर्माचार्यों पर सोशल मीडिया में या सार्वजनिक रूप से मर्यादा विहीन अभद्र टीका टिप्पणी करने की धृष्टता करते हैं। अब जरा सोचिए कि जो लोग सनातन धर्म का नारा लगाते हैं क्या वो इन सिद्धांतों पर चल रहे हैं या इनके विरुद्ध आचरण कर रहे हैं?


भारत की जनता ने सदैव आचरण को ही स्वीकार किया है। मुखौटा अधिक समय तक नहीं रहता है। कितना ही कुशल कलाकार या अभिनेता हो, जनता सब देखती-समझती है।  

Monday, February 9, 2026

शहरी विकास: पुरातन और आधुनिक में संघर्ष

काशी के मणिकर्णिका घाट को लेकर उपजे विवाद ने एक बार फिर इस प्रश्न को देश के सामने खड़ा कर दिया है कि हमारी प्राचीन धरोहरों को हानि पहुँचाए बिना शहरों का आधुनिकरण कैसे किया जाए? यह प्रश्न भारत के धार्मिक नगरों में चल रहे शहरी विकास कार्यों के संदर्भ में और भी ज्वलंत हो गया है।

धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतिृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।



इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़जे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पाते होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे भवन खड़े कर दिये हैं। नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।


माना कि विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि भारत में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन पुरातन नगरों का स्वरूप?



विकास की प्रक्रिया में जहाँ एक तरफ़ रचनात्मक सोच और कलात्मक दृष्टि का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है वहीं भ्रष्टाचार भी अन्य क्षेत्रों की तरह स्थिति को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाता है। शहरी विकास की प्रक्रिया में दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, करप्शन ऑफ डिजाईनकरप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश  होगा, विकास नहीं।



पिछले तीन दशकों में, इस तरह कितना व्यापक विनाश धर्मक्षेत्रों का किया गया है कि उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? पिछले 24 वर्षों से मैं ब्रज में धरोहरों के जीर्णोद्धार और संरक्षण में जुटा हूँ और इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें?


जबसे केंद्र में भाजपा की सरकार आई है, तब से धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उद्देश्य रहा है, इसलिए संघ नेतृत्व को चाहिए कि धर्मक्षेत्रों के विकास पर स्पष्ट नीति निधार्रित करने के लिए अनुभवी और चुने हुए लोगों की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय गोष्ठी बुलाए और उनकी राय लेकर नीति निर्धारण में सकारात्मक योगदान करे। पर इस विषय को राजनीति से अलग रखा जाए। क्योंकि धरोहर किसी एक दल के सत्ता में रहने या न रहने से अपना स्वरूप नहीं बदलती। उनका अस्तित्व सदियों से है और सदियों तक रहेगा। इसलिए धरोहरों के संरक्षण में जुटे  लोगों और विशेषज्ञों के प्रति राग द्वेष की भावना से अलग हटकर केवल धरोहरों के हित में ही निर्णय लिए जाएँ। 


नीतियों में क्रांतिकारी परिवर्तन किये बिना, वांछित सुधार आना असंभव है। फिर तो वही होगा कि चौबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनके लौटे। पर इसमें भी एक खतरा है। क्योंकि जब कभी सरकारी स्तर पर ऐसा विचार-विमर्श करना होना होता है, तो निहित स्वार्थ सार्थक विचारों को दबवाने के लिए या उनका विरोध करवाने के लिए, सत्ता के दलालनुमा लोगों को विशेषज्ञ या समाजसेवी बताकर इन बैठकों में बुला लेते हैं और सही बात को आगे नहीं बढ़ने देते। इसलिए ऐसी गोष्ठी में केवल वे लोग ही आऐ, जो स्वयंसिद्ध हैं, ढपोरशंखी नहीं। क्या केंद्र या प्रांतीय सरकारें  इतनी उदारता दिखा पायेंगी? अगर नहीं तो संरक्षण और विकास के नाम पर विनाश ही होगा। ये नहीं भूलना चाहिए कि प्राचीन धरोहरें किसी एक धर्म, समाज या देश की संपत्ति नहीं होती बल्कि पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण  विरासत होती हैं। इसका प्रमाण है कि जब 2001 में बामियान (अफ़ग़ानिस्तान) में गौतम बुद्ध की हज़ारों साल पुरानी विशाल प्रतिमा को तालिबानियों ने तोप के गोलों से उड़ाया था तो पूरी दुनिया ने इसका शोक मनाया था।

Monday, February 2, 2026

‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ को कैसे प्रभावी बनाए सरकार?

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के रूप में जाना जा रहा है, 27 जनवरी 2026 को संपन्न हुआ है। यह समझौता लगभग दो दशकों की लंबी वार्ताओं का परिणाम है और इसमें 2 अरब से अधिक की आबादी तथा 27 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था शामिल है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 25 प्रतिशत है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे वैश्विक व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा कवर करने वाला ऐतिहासिक कदम बताया।  यह समझौता भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का अवसर प्रदान करता है, विशेषकर ऐसे समय में जब अमेरिकी टैरिफ के कारण निर्यात प्रभावित हो रहा है। हालांकि, इसे प्रभावी बनाने के लिए सरकार को रणनीतिक कदम उठाने होंगे, जिसमें अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। 


इस समझौते के तहत यूरोपीय संघ भारत में निर्यात होने वाले 96.6 प्रतिशत सामानों पर टैरिफ को समाप्त या कम करेगा, जिससे यूरोपीय कंपनियों को सालाना लगभग 4 बिलियन यूरो (लगभग 4.7 बिलियन डॉलर) की बचत होगी। भारत ने यूरोपीय संघ को 102 सेवा उप-क्षेत्रों में पहुंच प्रदान की है, जबकि यूरोपीय संघ ने भारत को 144 उप-क्षेत्रों में अवसर दिए हैं, जिसमें वित्तीय, समुद्री और दूरसंचार सेवाएं शामिल हैं। ऑटोमोटिव क्षेत्र में यूरोपीय कारों पर वर्तमान 110 प्रतिशत टैरिफ को धीरे-धीरे 10 प्रतिशत तक कम किया जाएगा। भारत के लिए यह समझौता टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाओं और इंजीनियरिंग निर्यात को बढ़ावा देगा। अनुमान है कि यह समझौता 2032 तक यूरोपीय संघ के भारत में निर्यात को दोगुना कर देगा।  साथ ही, यह अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा, जहां भारत के श्रम-गहन निर्यात प्रभावित हो रहे हैं।


माना जा रहा है कि यह समझौता ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ योजनाओं के साथ तालमेल बैठाता है। यह न केवल निर्यात को बढ़ाएगा बल्कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निवेश और रोजगार सृजन को भी प्रोत्साहित करेगा। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ के साथ समझौता भारतीय एमएसएमई को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने का अवसर देगा। हालांकि, इसके लाभों को अधिकतम करने के लिए चुनौतियों का सामना करना होगा। यहां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियां प्रासंगिक हैं। प्रोफेसर कुमार, जो काले धन और आर्थिक नीतियों के विशेषज्ञ हैं, ने भारत-यूरोपीय संघ एफटीए को ‘अमेरिका जैसा एक और जाल’ बताया है। उन्होंने असमान शर्तों, घरेलू उद्योगों विशेषकर कृषि और डेयरी पर जोखिम, व्यापार घाटे में वृद्धि, नीति स्थान की हानि और दीर्घकालिक आर्थिक निर्भरता की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि पिछले एफटीए में भागीदारों को अधिक लाभ हुआ है, और निवेश नियमों, नियामक संरेखण तथा बाजार बाढ़ से आत्मनिर्भरता कमजोर हो सकती है। उन्होंने अमेरिकी व्यापार समझौतों से सबक लेने की सलाह दी है, जहां कृषि बाजार खोलने की मांग भारत के लिए कठिन है। 



इन चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए, सरकार को रचनात्मक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले, संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। समझौते में डेयरी और कुछ कृषि उत्पादों को बाहर रखा गया है, लेकिन कुमार की चेतावनी के अनुसार, बाजार बाढ़ से बचने के लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित करें। सरकार कृषि क्षेत्र में सब्सिडी और समर्थन को मजबूत करे, जैसे कि फसल बीमा और बाजार लिंकेज को बढ़ावा देकर। साथ ही, एग्रीस्टैक जैसी डिजिटल पहलों को तेज करें ताकि किसान वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन कर सकें। 


दूसरा, एमएसएमई और छोटे उद्योगों की तैयारी पर फोकस करें। प्रोफ़ेसर कुमार की निर्भरता की चेतावनी को संबोधित करने के लिए, उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम को विस्तार दें, विशेषकर टेक्सटाइल, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स में। एमएसएमई को क्रेडिट पहुंच, कौशल विकास और निर्यात प्रशिक्षण प्रदान करें। यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त निवेश कोष स्थापित करें जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित हो, ताकि ‘मेक इन इंडिया’ मजबूत हो सके।


तीसरा, पर्यावरण और सस्टेनेबिलिटी मानकों का अनुपालन। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम), जो 1 जनवरी 2026 से पूर्ण रूप से लागू है, भारतीय स्टील और एल्यूमिनियम पर कार्बन टैक्स लगा सकता है, जिससे निर्यातकों को 22 प्रतिशत तक कीमत कम करनी पड़ सकती है। सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाकर, जैसे कि 500 जीडब्ल्यू सौर लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़कर, इस चुनौती का सामना करना चाहिए। सीबीएएम-अनुपालन प्रमाणन प्रणाली विकसित करें और यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त हरित प्रौद्योगिकी परियोजनाएं शुरू करें।


चौथा, व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए विविधीकरण। प्रोफ़ेसर कुमार की व्यापार घाटे की चेतावनी को देखते हुए, सरकार निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नए बाजारों की तलाश करे, जैसे कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका। साथ ही, समझौते के तहत निवेश नियमों को मजबूत करें ताकि नीति स्थान सुरक्षित रहे। राष्ट्रीय निवेश बोर्ड को सक्रिय करें जो विदेशी निवेश की समीक्षा करे और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे।


पांचवां, मानव संसाधन और प्रवासन पर फोकस। समझौता प्रवासन और मोबिलिटी फ्रेमवर्क से जुड़ा है, जो ‘टैलेंट एंड सिक्योरिटी’ पर केंद्रित है। सरकार को कौशल विकास कार्यक्रमों को यूरोपीय मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए, जैसे कि आईटी और इंजीनियरिंग में। इससे युवा रोजगार बढ़ेगा और ब्रेन ड्रेन को रोका जा सकेगा।


इन सुझावों से, सरकार यदि चाहे तो प्रोफ़ेसर कुमार की चेतावनियों को अवसर में बदल सकती है। समझौता वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे कि अमेरिकी टैरिफ और चीन से व्यापार विचलन के बीच, भारत को रणनीतिक लाभ देगा। अनुमान है कि यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार को 41-65 प्रतिशत बढ़ाएगा और जीडीपी में 0.12-0.13 प्रतिशत की वृद्धि करेगा।  यह चीन से व्यापार विचलन (5-9 प्रतिशत) को बढ़ावा देगा, जो यूरोपीय संघ की डी-रिस्किंग और भारत की विविधीकरण रणनीति से मेल खाता है। 


‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ भारत को विकसित राष्ट्र की दिशा में ले जाने का माध्यम बन सकता है। कबीरदास के दोहे, ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।’ को ध्यान में रखते हुए  सरकार को प्रोफेसर कुमार की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए और संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इससे न केवल आर्थिक विकास होगा बल्कि आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। 2047 तक ‘विकसित भारत’ का सपना साकार करने के लिए यह समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। 

Monday, January 26, 2026

बुजुर्गों की सेवा में ‘समय बैंक’

भारत जैसे देश में, जहां बुजुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और पारंपरिक परिवार संरचना कमजोर पड़ रही है, बुजुर्गों की देखभाल एक बड़ी चुनौती बन गई है। सरकारी पेंशन योजनाएं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम तो हैं, लेकिन वे अक्सर अपर्याप्त साबित होते हैं। ऐसे में, स्विट्जरलैंड की ‘समय बैंक’ अवधारणा एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत करती है, जो न केवल बुजुर्गों की देखभाल को सुनिश्चित करती है बल्कि समाज में सहानुभूति और सामुदायिक भावना को भी मजबूत करती है। यह अवधारणा, जो स्विट्जरलैंड के संघीय सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित की गई है, युवाओं को बुजुर्गों की सेवा करने का अवसर देती है और बदले में उन्हें भविष्य में खुद की देखभाल के लिए ‘समय’ जमा करने की अनुमति देती है। भारत सरकार को इस मॉडल को अपनाने पर विचार करना चाहिए, क्योंकि यह हमारी सांस्कृतिक मूल्यों से मेल खाता है और आर्थिक बोझ को कम कर सकता है।


स्विट्जरलैंड में इस कार्यक्रम की शुरुआत बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और उनकी देखभाल की जरूरतों को ध्यान में रखकर की गई थी। कार्यक्रम के अनुसार, स्वस्थ और संवाद करने में कुशल व्यक्ति बुजुर्गों की मदद करते हैं, जैसे खरीदारी करना, कमरा साफ करना, सूरज की रोशनी में बाहर ले जाना या बस बातचीत करना। प्रत्येक घंटे की सेवा को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के व्यक्तिगत ‘समय खाते’ में जमा किया जाता है। जब व्यक्ति खुद बुजुर्ग हो जाता है या बीमार पड़ता है, तो वह इस जमा समय को निकाल सकता है और अन्य स्वयंसेवक उसकी देखभाल करेंगे। यह प्रणाली न केवल पैसे की बचत करती है बल्कि मानवीय संबंधों को भी मजबूत करती है।


कल्पना कीजिए, एक युवा व्यक्ति जो सप्ताह में दो बार दो घंटे बुजुर्गों की सेवा करता है। एक साल बाद, ‘समय बैंक’ उसके कुल सेवा समय की गणना करता है और उसे एक ‘समय बैंक कार्ड’ जारी करता है। इस कार्ड से वह भविष्य में ‘समय और समय ब्याज’ निकाल सकता है। यानी, जमा समय पर ब्याज भी मिलता है, जो प्रोत्साहन का काम करता है। स्विट्जरलैंड में यह प्रथा अब सामान्य हो गई है और सरकार ने इसे समर्थन देने के लिए कानून भी पारित किया है। यह मॉडल पेंशन व्यय को कम करता है और समाज को अधिक सहयोगी बनाता है।


भारत में इस अवधारणा को लागू करने की संभावनाएं अपार हैं। एक अनुमान के तहत, 2030 तक हमारे देश में बुजुर्गों की आबादी 19 करोड़ से अधिक हो जाएगी और कई परिवारों में बच्चे शहरों में बस जाते हैं, जिससे बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। पारंपरिक रूप से, भारत में बुजुर्गों की देखभाल परिवार की जिम्मेदारी रही है, लेकिन आधुनिकीकरण ने इस संरचना को प्रभावित किया है। ‘समय बैंक’ जैसा कार्यक्रम युवाओं को प्रोत्साहित कर सकता है कि वे बुजुर्गों की सेवा करें और बदले में उन्हें सुरक्षा का आश्वासन मिले। यह न केवल सरकारी संसाधनों पर दबाव कम करेगा बल्कि बेरोजगार युवाओं को सार्थक कार्य प्रदान करेगा।


उदाहरण के लिए, स्विट्जरलैंड की एक कहानी से प्रेरणा लें। वहां एक 67 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षिका क्रिस्टीना एक 87 वर्षीय बुजुर्ग की देखभाल करती थीं। उन्होंने कहा कि वह पैसे के लिए नहीं, बल्कि ‘समय बैंक’ में समय जमा करने के लिए ऐसा कर रही थीं। जब वे खुद घायल हुईं, तो ‘समय बैंक’ ने तुरंत एक नर्सिंग कार्यकर्ता भेजा, जो उनकी देखभाल करने लगा। कुछ दिनों में वे स्वस्थ हो गईं और फिर से सेवा में लग गईं। यह कहानी दर्शाती है कि कैसे यह प्रणाली व्यावहारिक और प्रभावी है। भारत में भी, यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ऐसा कार्यक्रम शुरू करें, तो लाखों बुजुर्गों का जीवन बेहतर हो सकता है।


हालांकि, भारत में इसे लागू करने से पहले कुछ चुनौतियों पर विचार करना जरूरी है। सबसे पहले, कार्यक्रम की निगरानी के लिए एक मजबूत डिजिटल प्लेटफार्म की जरूरत होगी, जहां सेवा घंटों को रिकॉर्ड किया जा सके। आधार कार्ड और डिजिटल इंडिया जैसे मौजूदा सिस्टम इसमें मदद कर सकते हैं। दूसरा, स्वयंसेवकों की ट्रेनिंग जरूरी है, ताकि वे बुजुर्गों की भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों को समझ सकें। तीसरा, दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त सत्यापन प्रक्रिया होनी चाहिए, जैसे कि समय निकासी के समय पहचान जांच। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की कमी एक समस्या हो सकती है, इसलिए ऑफलाइन मोड भी विकसित किया जाना चाहिए।


सरकार को दिल्ली या मुंबई जैसे शहरों में इसे पायलट प्रोजेक्ट की तरह से शुरुआत करनी चाहिए। यदि सफल रहा, तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया जा सकता है। यह आयुष्मान भारत या राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम के साथ एकीकृत किया जा सकता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होगी। कॉर्पोरेट घराने एनजीओ को अपने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड्स और स्थानीय समुदायों द्वारा इसे सहयोग करें। इससे न केवल बुजुर्गों की देखभाल सुनिश्चित होगी बल्कि युवाओं में सामाजिक जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी।


इस अवधारणा के सामाजिक लाभ भी कम नहीं हैं। आज के दौर में, जहां अकेलापन एक महामारी बन गया है, ‘समय बैंक’ लोगों को जोड़ सकता है। बुजुर्गों से बातचीत करने से युवाओं को जीवन के अनुभव मिलेंगे, और बुजुर्गों को भावनात्मक समर्थन। यह भारतीय मूल्यों—जैसे ‘सेवा परमो धर्म:’ से मेल खाता है। स्विट्जरलैंड में यह प्रणाली पेंशन को पूरक बनाती है, जहां पेंशन इतनी अच्छी है कि भोजन और आवास की चिंता नहीं होती, लेकिन भारत में जहां पेंशन सीमित है, यह एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है।


आर्थिक दृष्टि से भी यह फायदेमंद है। भारत में बुजुर्ग देखभाल पर खर्च बढ़ रहा है नर्सिंग होम और अस्पताल महंगे हैं। ‘समय बैंक’ से स्वयंसेवी देखभाल बढ़ेगी, जिससे सरकारी व्यय कम होगा। विश्व बैंक की रिपोर्ट्स बताती हैं कि एजिंग पॉपुलेशन विकासशील देशों के लिए चुनौती है, लेकिन ऐसे नवाचारी मॉडल से इसे अवसर में बदला जा सकता है। स्विट्जरलैंड में यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक चल रहा है और अब दुनिया के अन्य देशों को इसे अपनाना चाहिए।


भारत सरकार केंद्र और राज्य स्तर पर को इस ‘समय बैंक’ अवधारणा पर विचार करना चाहिए। इसे लागू करने के लिए एक टास्क फोर्स गठित की जाए, जो स्विट्जरलैंड के मॉडल का अध्ययन करे और भारतीय संदर्भ में अनुकूलित करे। यदि हम आज कदम उठाएं, तो कल के बुजुर्ग—जो आज के युवा हैं—एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे। यह न केवल एक नीति है, बल्कि मानवता का निवेश है। समय सबसे मूल्यवान मुद्रा है और इसे बैंक में जमा करने का विचार दुनिया को बदल सकता है। आइए, हम इसे अपनाएं और एक बेहतर समाज बनाएं। 

Monday, January 19, 2026

योग और स्वस्थ जीवनशैली के लाभ

भारत की प्राचीन सभ्यता में योग को जीवन का आधार माना गया है। आज की तेज़-रफ़्तार और तनावपूर्ण दुनिया में, जहां जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और मानसिक विकार तेज़ी से बढ़ रहे हैं, योग एक प्राचीन लेकिन अत्यंत प्रासंगिक समाधान के रूप में उभर रहा है। भारत की यह अमूल्य धरोहर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाती है, बल्कि मन की शांति और आध्यात्मिक संतुलन भी प्रदान करती है। बीते वर्ष, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम ‘एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग’ ने इसे और अधिक प्रासंगिक बना दिया है, क्योंकि योग व्यक्तिगत स्वास्थ्य से लेकर पर्यावरणीय संतुलन तक सब कुछ जोड़ता है। आज का विषय योग को दैनिक जीवन में अपनाने के व्यावहारिक लाभों पर केंद्रित है, ताकि हम एक स्वस्थ, सकारात्मक और संतुलित जीवन जी सकें। 



योग का अर्थ है ‘जोड़ना’ या ‘मिलन’। यह शरीर, मन और आत्मा का मिलन है। महर्षि पतंजलि के योग सूत्रों में योग को ‘चित्त वृत्ति निरोधः’ कहा गया है, अर्थात मन की वृत्तियों का निरोध। लेकिन योग सिर्फ ध्यान या समाधि तक सीमित नहीं; यह हठ योग, राज योग, भक्ति योग और कर्म योग जैसे विभिन्न रूपों में जीवन को संतुलित करता है। आज के संदर्भ में, हठ योग के आसन और प्राणायाम सबसे अधिक प्रचलित हैं, क्योंकि ये व्यावहारिक और तुरंत लाभ देने वाले हैं।



शारीरिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग के लाभ अनेक हैं। नियमित योगाभ्यास से शरीर लचीला, मजबूत और संतुलित होता है। सूर्य नमस्कार जैसे गतिशील आसन पूरे शरीर की मांसपेशियों को सक्रिय करते हैं, रक्त संचार बढ़ाते हैं और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) को तेज़ करते हैं। इससे वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। कई अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि योग से मोटापा कम होता है, खासकर पेट की चर्बी। धनुरासन, भुजंगासन और नौकासन जैसे आसन पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं, कब्ज और एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत देते हैं। महिलाओं के लिए योग मासिक धर्म चक्र को नियमित करता है, प्रसव के बाद रिकवरी में सहायक होता है और हड्डियों की मजबूती बढ़ाता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी वृद्धावस्था की बीमारियों से बचाव होता है।



हृदय स्वास्थ्य के लिए योग एक वरदान है। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम रक्तचाप को नियंत्रित करते हैं, कोलेस्ट्रॉल स्तर कम करते हैं और हृदय की धड़कन को संतुलित रखते हैं। भारत में हृदय रोग मौत का प्रमुख कारण है, और योग जैसे प्राकृतिक तरीके से इसे रोका जा सकता है। योग इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाता है। नियमित अभ्यास से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कोविड महामारी के बाद यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है।


मानसिक स्वास्थ्य योग का सबसे बड़ा योगदान है। आज की युवा पीढ़ी चिंता, अवसाद और तनाव से ग्रस्त है। योग में ध्यान और प्राणायाम मन को शांत करते हैं। विपश्यना या mindfulness ध्यान से स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल कम होता है, नींद बेहतर आती है और एकाग्रता बढ़ती है। छात्रों के लिए यह परीक्षा तनाव कम करने का बेहतरीन माध्यम है। कार्यरत लोगों के लिए योग वर्क-लाइफ बैलेंस बनाए रखता है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। योग से आत्मविश्वास बढ़ता है, जो व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता की कुंजी है।



योग को स्वस्थ जीवनशैली का आधार बनाना चाहिए। योग सिर्फ आसन नहीं, बल्कि आहार, नींद और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है। आयुर्वेद के अनुसार, सात्विक भोजन – फल, सब्जियाँ, दालें, अनाज और दूध – योग के लाभों को बढ़ाता है। जंक फूड, ज्यादा तेल-मसाले और रात में भारी भोजन से दूर रहना चाहिए। सुबह जल्दी उठना, सूर्योदय के साथ योग करना और रात को 7-8 घंटे की नींद लेना आदर्श है। डिजिटल डिटॉक्स भी योग का हिस्सा बन सकता है – स्क्रीन टाइम कम करके ध्यान बढ़ाना।


योग नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और संतुलन सुधारता है, जिससे गिरने का खतरा कम होता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से सिद्ध है कि यह तनाव कम करता है, कोर्टिसोल स्तर घटाता है और चिंता को 40% तक कम कर सकता है। हृदय स्वास्थ्य में सुधार, बेहतर नींद, आत्मसम्मान में वृद्धि और समग्र जीवन गुणवत्ता में वृद्धि जैसे लाभ भी प्रमाणित हैं। योग कैंसर रोगियों में थकान कम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है, जिससे दैनिक जीवन अधिक संतुलित और ऊर्जावान बनता है।


समाजिक स्तर पर योग समुदाय को जोड़ता है। गांवों में योग शिविर, शहरों में पार्कों में सामूहिक सत्र और स्कूलों में योग शिक्षा से लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं। महिलाओं के लिए यह सशक्तिकरण का साधन है – घरेलू कामों के साथ स्वास्थ्य बनाए रखना। बुजुर्गों के लिए योग गतिशीलता बनाए रखता है और अकेलेपन को कम करता है। पर्यावरणीय दृष्टि से, योग हमें प्रकृति से जोड़ता है। योग हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य और पृथ्वी का स्वास्थ्य जुड़े हुए हैं। कम खपत, अधिक जागरूकता और संतुलित जीवन से हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं।


आर्थिक रूप से भी योग फायदेमंद है। अस्पतालों के खर्च कम होते हैं, दवाओं पर निर्भरता घटती है। एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक उत्पादक होता है, जिससे परिवार और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है। भारत में योग पर्यटन बढ़ रहा है – ऋषिकेश, हरिद्वार जैसे स्थान विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिससे रोजगार भी बढ़ता है।

योग अपनाना आसान है। शुरुआत में 15-20 मिनट रोज़ काफी हैं। घर पर ऑनलाइन वीडियो या ऐप्स से सीख सकते हैं। वहीं सरकारी योजनाएँ जैसे आयुष मंत्रालय के योग कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के शिविर मुफ्त प्रशिक्षण देते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण है निरंतरता। योग कोई जादू नहीं, बल्कि अभ्यास है। योग को धीरे-धीरे बढ़ाएँ, शरीर की सुनें और धैर्य रखें। याद रहे कि योग हमें सिखाता है कि सच्चा स्वास्थ्य बाहर नहीं, भीतर है। जब हम योग अपनाते हैं, तो न केवल हम स्वस्थ होते हैं, बल्कि समाज और पर्यावरण भी लाभान्वित होता है। इसलिए कोशिश करें कि हम योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।  

Friday, January 16, 2026

भ्रष्टाचार के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का विभाजित फैसला!

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसी एक्ट) की धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर एक विभाजित फैसला सुनाया है। 13 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय व्यक्त की, जिसके परिणामस्वरूप मामला मुख्य न्यायाधीश को बड़ी पीठ के गठन के लिए संदर्भित कर दिया गया। यह फैसला सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की मंजूरी देने से संबंधित है, जो देश में भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण है। धारा 17ए, जो 2018 के संशोधन के माध्यम से अधिनियम में जोड़ी गई थी, जांच एजेंसियों को किसी भी लोक सेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच, पूछताछ या अन्वेषण शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति प्राप्त करने का आदेश देती है। इस प्रावधान का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक प्रतिशोध या अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह भ्रष्ट तत्वों को संरक्षण प्रदान करता है।

भारत में भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है और ऐसे प्रावधान जो जांच प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं, लोकतंत्र की नींव को प्रभावित कर सकते हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह जांच एजेंसियों के हाथ बांधती है और भ्रष्टाचारियों को पूर्व चेतावनी देकर सबूत नष्ट करने का अवसर प्रदान करती है। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रावधान ने जांच की 'आकस्मिकता' (element of surprise) को समाप्त कर दिया है, जो भ्रष्टाचार के मामलों में आवश्यक है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने इसे वैध ठहराते हुए कहा कि यह लोक सेवकों को अनावश्यक जांच से बचाता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। इस विभाजन ने एक बार फिर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की आवश्यकता पर बहस छेड़ दी है।

2018 से पहले, पीसी एक्ट में जांच के लिए पूर्व अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं थी, केवल अभियोजन के लिए धारा 19 के तहत मंजूरी जरूरी थी। लेकिन 1990 के दशक में, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर सवाल उठे। ऐतिहासिक रूप से, ‘विनीत नारायण बनाम भारत संघ’ (1998) का फैसला एक मील का पत्थर है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए निर्देश दिया कि उच्च अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने ‘सिंगल डायरेक्टिव’ को असंवैधानिक घोषित किया, जो कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए सरकारी अनुमति मांगता था। इस फैसले ने भ्रष्टाचार विरोधी जांच को मजबूत किया और राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने का प्रयास किया।

हालांकि, 2003 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (डीएसपीई एक्ट) में धारा 6ए जोड़ी गई, जो संयुक्त सचिव स्तर से ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य करती थी। यह प्रावधान भी विवादास्पद रहा। 2014 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 6ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि यह अधिकारियों के बीच भेदभाव करता था और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करता था। कोर्ट ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार जांच में सभी को समान रूप से जवाबदेह होना चाहिए, चाहे उनका पद कितना भी ऊंचा हो। इस फैसले ने जांच एजेंसियों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की, लेकिन सरकार ने 2018 में पीसी एक्ट में संशोधन कर धारा 17ए पुनः पेश की, जो सभी लोक सेवकों पर लागू होती है और पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाती है।

हालिया विभाजित फैसले से पहले भी धारा 17ए पर विवाद हुए हैं। 2023 में ‘सीबीआई बनाम आरआर किशोर’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2018 के संशोधन पूर्वव्यापी नहीं हैं, अर्थात 2018 से पहले के अपराधों पर धारा 17ए लागू नहीं होती। लेकिन 2024 में चंद्रबाबू नायडू मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ विभाजित हुई, जहां न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने धारा 17ए को प्रक्रियात्मक मानकर पूर्वव्यापी प्रभाव दिया, जबकि न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने इसे मूलभूत मानकर अस्वीकार किया। यह मामला भी बड़ी पीठ को संदर्भित किया गया। इन फैसलों से स्पष्ट है कि धारा 17ए ने जांच प्रक्रिया को जटिल बनाया है, जिससे कई भ्रष्टाचार मामले लंबित हो गए हैं। उदाहरणस्वरूप, लोकपाल और सीबीआई जैसी संस्थाओं ने शिकायत की है कि पूर्व अनुमति की प्रक्रिया में देरी से भ्रष्टाचारियों को फायदा होता है।

इस प्रावधान के पक्ष में तर्क केवल यही है कि यह ईमानदार अधिकारियों को बचाता है। भारत में राजनीतिक प्रतिशोध के कई उदाहरण हैं, जहां जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया है। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने अपने फैसले में कहा कि धारा 17ए निर्णय लेने की प्रक्रिया में साहस प्रदान करती है और अनावश्यक जांच से बचाती है। लेकिन वहीं इसके विपक्ष में, न्यायमूर्ति नागरत्ना का मत मजबूत है। यह प्रावधान भ्रष्टाचारियों को पूर्व सूचना देकर सबूत मिटाने का मौका देता है, जो ‘विनीत नारायण’ फैसले के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। अतीत के मामलों से सीखते हुए, हम देखते हैं कि पूर्व अनुमति जैसे प्रावधान अक्सर राजनीतिक संरक्षण का माध्यम बन जाते हैं। उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक के हवाला कांड में, जांच में देरी ने कई आरोपी को बचा लिया था।

इस विभाजित फैसले के गहरे प्रभाव भी हैं। यदि बड़ी पीठ धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करती है, तो भ्रष्टाचार जांच तेज होगी, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल जैसे संगठनों की मांग के अनुरूप है। लेकिन इससे राजनीतिक दुरुपयोग का खतरा बढ़ सकता है, जैसा कि हाल के ईडी और सीबीआई मामलों में देखा गया। यदि इसे बरकरार रखा जाता है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर होगी, क्योंकि अनुमति प्रक्रिया में महीनों लग सकते हैं। भारत, जहां भ्रष्टाचार सूचकांक में 85वें स्थान पर है, को ऐसे कानूनों की जरूरत है जो जांच को सुगम बनाएं, न कि बाधित।

गौरतलब है कि यह मुद्दा भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की मांग करता है। ‘विनीत नारायण’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों ने जांच की स्वतंत्रता पर जोर दिया है और हालिया विभाजित फैसला इसी दिशा में एक कदम है। सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ को इस पर विचार करते हुए ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा और भ्रष्टाचार की रोकथाम दोनों को सुनिश्चित करना चाहिए। भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए, जांच प्रक्रिया पारदर्शी और त्वरित होनी चाहिए, ताकि न्याय की जीत हो।