Monday, October 26, 2026

कचरा प्रबंधन और सर्कुलर इकोनॉमी

भारत हर दिन लाखों टन कचरा पैदा करता है। शहरी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट की मात्रा लगातार बढ़ रही है, जबकि ग्रामीण इलाकों में भी प्लास्टिक और अन्य कचरे का ढेर लग रहा है। 2014 में सरकार के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ ने स्वच्छता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव लेन की पहल की, लेकिन ठोस कचरा प्रबंधन में इसकी सफलता अधूरी रही है। पर्यावरण और जनहित की दृष्टि से अब जरूरत इस बात की है कि हम रैखिक मॉडल (उत्पादन-उपयोग-फेंकना) से आगे बढ़कर सर्कुलर इकोनॉमी (वृत्ताकार अर्थव्यवस्था) को अपनाएं, जिसमें कचरे को संसाधन बनाया जाए।


उल्लेखनीय है कि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का सबसे बड़ा


योगदान शौचालय निर्माण और खुले में शौच कम करने में रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में करोड़ों शौचालय बने और कई राज्यों को ओपन डिफेकेशन फ्री घोषित किया गया। शहरी क्षेत्रों में भी डोर-टू-डोर कलेक्शन और सफाई में सुधार देखा गया। लेकिन जब बात ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की आती है तो तस्वीर अलग है। अभियान का शुरुआती जोर शौचालयों और दिखाऊ स्वच्छता पर रहा। कचरे को स्रोत पर अलग करना, प्रोसेस करना और लैंडफिल में कम भेजना, ये चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। कई जगहों पर अपशिष्ट प्रबंधन केंद्र बने, लेकिन रखरखाव और संचालन के अभाव में वे बेकार पड़े हैं। सोर्स सेग्रीगेशन का दावा ज्यादा है, लेकिन जमीन पर मिश्रित कचरा ही पहुंचता है। इससे प्रोसेसिंग प्लांट्स की क्षमता प्रभावित होती है और लैंडफिल पर बोझ बना रहता है। नगरपालिकाओं में कर्मचारियों, धन और तकनीकी क्षमता की कमी भी एक बड़ा कारण है। जागरूकता की कमी के चलते व्यवहारगत बदलाव धीमा रहा है, लोग कचरा अलग नहीं करते या खुले में फेंक देते हैं। सत्यापन की कमजोरी के कारण ओडीएफ प्लस जैसी उपलब्धियां भी पूरी तरह टिकाऊ नहीं हो पाई हैं।



यहीं सर्कुलर इकोनॉमी का महत्व सामने आता है। यह मॉडल कचरे को शून्य करने या न्यूनतम करने पर जोर देता है। रिड्यूस, रियूज, रिसाइकिल और रिकवर, ये इसके मुख्य सिद्धांत हैं। भारत में ठोस अपशिष्ट का बड़ा हिस्सा जैविक है। इसे खाद या बायोगैस में बदला जा सकता है। प्लास्टिक, ई-कचरा, बैटरी और अन्य सामग्री को रीसाइक्लिंग के जरिए वापस आर्थिक चक्र में लाया जा सकता है। इससे लैंडफिल का दबाव कम होगा, प्रदूषण घटेगा, रोजगार बढ़ेंगे और आयात पर निर्भरता भी कम हो सकती है। सरकार ने प्लास्टिक, ई-कचरा, बैटरी, टायर समेत कई कचरा धाराओं के लिए नियम बनाए हैं और विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (ईपीआर) लागू की है। इसके तहत उत्पादकों को अपने उत्पादों के जीवनकाल के अंत में जिम्मेदारी लेनी होती है। कई लाख टन कचरा प्रोसेस भी हो चुका है, लेकिन अभी भी स्रोत पर पृथक्करण, रीसाइक्लिंग क्षमता और अनौपचारिक क्षेत्र के एकीकरण में बड़ी कमी है।



समस्या का मूल कारण सिस्टम की कमजोरी है। कचरा अलग न होने से रीसाइक्लिंग महंगी और मुश्किल हो जाती है। अनौपचारिक कबाड़ी और कचरा उठाने वाले महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उन्हें औपचारिक सिस्टम में शामिल करने की व्यवस्था अपर्याप्त है। नगरपालिकाएं अक्सर बड़े प्लांट्स पर निर्भर रहती हैं, जबकि विकेंद्रीकृत समाधान, जैसे सामुदायिक कंपोस्टिंग ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं। वहीं निगरानी और प्रवर्तन भी कमजोर है। नागरिकों को जागरूक करने के प्रयास हुए, लेकिन निरंतरता और जवाबदेही की कमी रही। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ ने कुछ हद तक जागरूकता पैदा की, लेकिन टिकाऊ आदतें और बुनियादी ढांचा दोनों अधूरे रहे।



आगे का रास्ता स्पष्ट है। सबसे पहले स्रोत पर कचरा पृथक्करण को अनिवार्य और व्यावहारिक बनाना होगा। इसके लिए नगरपालिकाओं को अलग-अलग वाहन और प्रोसेसिंग सुविधाएं देनी होंगी। ईपीआर को और सख्ती से लागू किया जाए और उत्पादकों-रीसाइक्लर्स के बीच समन्वय बेहतर हो। जैविक कचरे के लिए गोबरधन जैसी योजनाओं को विस्तार देना चाहिए। अनौपचारिक क्षेत्र को प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण और उचित मूल्य देकर औपचारिक बनाया जाए। स्कूलों, आवासीय समितियों और सार्वजनिक अभियानों के जरिए नागरिकों की भागीदारी भी बढ़ाई जाए। ऐसे में सबसे अहम कारण यह है कि नागरिकों में स्रोत पर कचरा अलग करने की आदत अभी भी कमजोर है। जब घरेलू स्तर पर ही गीला और सूखा कचरा मिला रहता है तो रीसाइक्लिंग और कंपोस्टिंग दोनों मुश्किल हो जाते हैं। साथ ही, नगरपालिकाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए फंडिंग, स्टाफ और तकनीकी सहायता जरूरी है। लीगेसी डंपसाइट्स की सफाई जारी रखनी होगी, लेकिन नया कचरा वहां न पहुंचे, यह भी सुनिश्चित करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।


सर्कुलर इकोनॉमी केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक अवसर भी है। यह रोजगार पैदा करता है, संसाधन बचाता है और स्वास्थ्य सुधारता है। सर्कुलर इकोनॉमी तभी सफल होगी जब हम कचरे को केवल साफ करने का साधन न मानें, बल्कि उसे आर्थिक मूल्य वाला संसाधन बनाएं। प्लास्टिक, ई-कचरा और जैविक कचरे से रोजगार और आय पैदा हो सकती है, लेकिन इसके लिए अनौपचारिक क्षेत्र को सम्मानजनक तरीके से जोड़ना और उत्पादकों पर ईपीआर को सख्ती से लागू करना जरूरी है। यदि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ ने नींव रखी, लेकिन अब उस नींव पर वृत्ताकार मॉडल खड़ा करना होगा। इस अभियान के अनुभवों से सीख लेकर विकेंद्रीकृत समाधानों और नागरिक जिम्मेदारी को मजबूत किया जाए, तो कचरा प्रबंधन टिकाऊ और लाभकारी बन सकता है। जनहित की दृष्टि से यह जरूरी है कि सरकार, उद्योग, नगरपालिका और नागरिक मिलकर काम करें। जब तक कचरा ‘कचरा’ माना जाएगा, समस्या बनी रहेगी। जब उसे संसाधन माना जाएगा, तभी असली स्वच्छता और टिकाऊ विकास संभव होगा। समय आ गया है कि हम इस दिशा में ठोस और निरंतर कदम उठाएं। 

Monday, October 19, 2026

बच्चों का इंटरनेट अधिकार: प्रतिबंध नहीं, जिम्मेदारी की ज़रूरत

सुप्रीम कोर्ट का हालिया आदेश भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसमें बच्चे भी शामिल हैं। यह अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) से जुड़ा है। कोर्ट ने बच्चों पर इंटरनेट के पूर्ण प्रतिबंध को असंगत और अनुपातहीन माना, जबकि बाल यौन शोषण संबंधी सामग्री की पहचान, रिपोर्टिंग और हटाने के लिए सख्त व्यवस्था करने का निर्देश दिया। साथ ही ‘चाइल्ड मोड’, अभिभावकीय सहमति और लक्षित सुरक्षा उपायों का सुझाव भी दिया। यह फैसला ‘डिजिटल इंडिया’ में सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक आवश्यक कदम है।



भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन अब जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। लाखों बच्चे शिक्षा, मनोरंजन, सामाजिक संपर्क और जानकारी के लिए ऑनलाइन दुनिया पर निर्भर हैं। कोविड काल के बाद डिजिटल शिक्षा का विस्तार हुआ, लेकिन इसके साथ ही इसके जोखिम भी बढ़े। सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री, साइबर बुलिंग, गेमिंग की लत और बाल शोषण के मामले बार-बार सामने आते रहे हैं। कुछ राज्यों में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं चिंताओं के बीच यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पूर्ण प्रतिबंध न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह बच्चों को डिजिटल साक्षरता और अभिव्यक्ति के अवसर से भी वंचित कर सकता है।



फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया। उसने बाल यौन शोषण सामग्री के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर हैश और यूआरएल डेटाबेस बनाने, प्लेटफॉर्म्स के लिए त्वरित रिपोर्टिंग की समय-सीमा तय करने और मजबूत मॉडरेशन तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया। देखा जाए तो यह कदम आवश्यक था, क्योंकि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या हल नहीं होती। इंटरनेट पर हानिकारक सामग्री तेजी से फैलती है और तकनीकी समाधान के बिना उसे नियंत्रित करना मुश्किल है। कोर्ट ने ‘चाइल्ड मोड’ जैसी व्यवस्था का सुझाव देकर एक मध्यम मार्ग अपनाया है, जिसमें खाते डिफॉल्ट रूप से निजी हों, अजनबियों से संपर्क सीमित हो और विज्ञापन तथा सामग्री का उचित मॉडरेशन हो। यह व्यावहारिक दृष्टिकोण है, जो पूर्ण प्रतिबंध की जगह जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देता है।



भारत में इस फैसले का महत्व और भी अधिक है क्योंकि यहां डिजिटल डिवाइड अभी भी मौजूद है। शहरी और शिक्षित परिवारों में बच्चे आसानी से स्मार्टफोन और इंटरनेट का उपयोग करते हैं, जबकि कई ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में इसकी पहुंच सीमित है। पूर्ण प्रतिबंध लगाने से जो बच्चे पहले से ही डिजिटल अवसरों से वंचित हैं, वे और पीछे रह जाएंगे। दूसरी ओर, जिनके पास पहुंच है, उनके लिए बिना उचित मार्गदर्शन के सोशल मीडिया मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अध्ययनों और रिपोर्टों में किशोरों में चिंता, अवसाद और नींद की कमी जैसी समस्याएं बढ़ने के संकेत मिले हैं। ऐसे में कोर्ट का यह रुख सही है कि समाधान प्रतिबंध में नहीं, बल्कि जागरूकता, शिक्षा और तकनीकी सुरक्षा में है।


इस फैसले से सरकार, टेक कंपनियों और अभिभावकों तीनों की जिम्मेदारी स्पष्ट होती है। सरकार को अब मजबूत नियामक ढांचा तैयार करना होगा, जिसमें प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही सुनिश्चित हो, लेकिन बच्चों के अधिकारों का हनन न हो। टेक कंपनियों को अपने एल्गोरिदम और मॉडरेशन सिस्टम को और पारदर्शी तथा प्रभावी बनाना होगा। भारत जैसे देश में, जहां लाखों बच्चे पहली बार इंटरनेट से जुड़ रहे हैं, कंपनियों को स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखकर सुरक्षा उपाय विकसित करने चाहिए। ऐसे में अभिभावकों की भूमिका भी अहम है। डिजिटल साक्षरता केवल बच्चों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। माता-पिता को भी समझना होगा कि पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है, लेकिन नियमित संवाद, समय-सीमा और सकारात्मक उपयोग की आदत डालना जरूरी है।


स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था को भी इस दिशा में सक्रिय होना होगा। डिजिटल नागरिकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि बच्चे ऑनलाइन जोखिमों को पहचान सकें और इंटरनेट के सुरक्षित व्यवहार सीख सकें। साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता को भी मजबूत करने की जरूरत है, क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है।


सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक चेतावनी भी है। यदि सरकार और प्लेटफॉर्म्स प्रभावी कदम नहीं उठाते, तो भविष्य में और अधिक सख्त हस्तक्षेप की मांग उठ सकती है। दूसरी ओर, अगर सुरक्षा के नाम पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो यह बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा और डिजिटल असमानता को बढ़ाएगा। संतुलित दृष्टिकोण ही भारत के लिए सही है। हमें एक ऐसा डिजिटल वातावरण चाहिए जहां बच्चे सीख सकें, सृजन कर सकें और सुरक्षित रह सकें। इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है। समाज, परिवार, स्कूल और तकनीक कंपनियों को मिलकर काम करना होगा।


कुल मिलाकर, यह फैसला हमें याद दिलाता है कि डिजिटल युग में अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं। इंटरनेट एक शक्तिशाली साधन है, जो ज्ञान और अवसर देता है, लेकिन बिना सावधानी के यह नुकसान भी पहुंचा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सही दिशा दिखाई है। अब जरूरत है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भारत के बच्चे डिजिटल युग का लाभ उठा सकें और उसकी चुनौतियों से सुरक्षित रह सकें। यह संतुलन ही भविष्य की पीढ़ी के लिए एक मजबूत और जिम्मेदार डिजिटल समाज की नींव रखेगा। 

Monday, October 12, 2026

युवा आंदोलन और सत्ता का दायित्व !

एक बार फिर से देश में युवाओं ने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा दी है। यह कोई नई बात नहीं है, जब-जब छात्र राजनैतिक व्यवस्था के विरूद्ध सड़क पर उतरते हैं, तब-तब ये सवाल उठता है कि क्या छात्रों को राजनीति करनी चाहिए? इस सवाल के उत्तर अपनी-अपनी दृष्टि से हर समुदाय देता है। जो राजनैतिक दल सत्ता में होते हैं, वे छात्र आन्दोलन की भर्त्सना करते हैं। उसे हतोत्साहित करते हैं और जब छात्र काबू में नहीं आते, तो उनका दमन भी करते हैं। फिर वो चाहे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों या 70 के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन से शुरू होकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्णं क्रांति के आव्हान पर कूंदने वाले छात्र हों, जिन्होने इंदिरा गांधी की सत्ता पलट दी थी या फिर अन्ना हजारे के आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों। लेकिन देश में कॉक्रोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन और देश भर में चल रहे ताज़ा आंदोलन ने इस सवाल को दोबारा जगा दिया है युवा और सरकार के आंदोलन का हल कैसे निकले?   



रोचक बात ये है कि जो दल सत्ता में आकर छात्रों का दमन करते हैं, वही दल जब विपक्ष में होते हैं, तो छात्र आन्दोलनों को हवा देकर ही अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं। इसमें कोई दल अपवाद नहीं हैं। अगर शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की दृष्टि से देखा जाऐ, तो भी दो मत हैं। जो संस्थान या अभिभावक चाहते हैं कि उनके निर्देशन में युवा केवल पढ़ाई पर ध्यान दें, डिग्री हासिल करें और नौकरी करे, वे नहीं चाहते कि उनके छात्र किसी भी तरह की राजनीति में हिस्सा ले। 


मगर एक दूसरा वर्ग उन शिक्षकों और अभिभावकों का है, जो अपने छात्रों में पूर्णं विश्वास रखते हैं और जानते हैं कि चाहे वे छात्र राजनीति में कितना ही हिस्सा क्यों न लें, उन्हें अपने भविष्य को लेकर पूरी स्पष्टता है। इसलिए वे पढ़ाई की कीमत पर आन्दोलन नहीं करेंगे। ऐसे संस्थान और अभिभावक छात्रों को रचनात्मक राजनीति करने से नहीं रोकते।



अगर निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो हम पाऐंगे कि जो छात्र केवल पढ़ाई पर ध्यान देते हैं और रट्टू तोते की तरह इम्तेहान पास करते जाते हैं, उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं होता। प्रायः ऐसे नौजवानों में समाजिक सारोकार भी नहीं होते। उनका व्यक्तित्व एकांगी हो जाता है और जीवन के संघर्षों में वे उतनी मजबूती से नहीं खड़े हो पाते, जितना कि वे छात्र खड़े होते हैं, जिन्होंने शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार को बनाऐ रखा हो। जो छात्र विज्ञान, शोध या तकनीकी के क्षेत्र में जाते हैं, उनकी बात दूसरी है। उनका ध्यान अपने विषय पर ही केंद्रित रहता है और वे अपने संपूर्णं अंगों को कछुऐ की तरह समेटकर एक ही दिशा में लगातार काम करते जाते हैं।



अपने जीवन में मैंने भी अलग-अलग तरह माहौल में अनुभव प्राप्त किये हैं। जब तक मैं कॉलेज में पढ़तो था, तो मेरा व्यक्तित्व दो धुरियों में बटां था। मेरे पिता जो एक बड़े शिक्षाविद् थे, उनके विचार यही थे कि मैं पढ़ू और नौकरी करूं। जबकि मेरी मां जो कि संस्कृत की विद्वान थी और मथुरा के रमणरेती वाले महाराज श्रद्धेय गुरू शरणनानंद जी की लखनऊ विश्विद्यालय की सहपाठी थीं, वे छात्र जीवन से ही गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक सरोकारों को लेकर बहुत सक्रिय रहीं थीं। उनका ही प्रभाव मुझ पर ज्यादा पड़ा और 18 वर्ष की आयु में एक स्वयंसेवक के रूप में पिछड़े गाँवों में सेवा कार्य करने घर छोड़कर चला गया। 1974 के उस दौर में मैंने गाँव की गरीबी और बदहाली में जीवन के अनूठे अनुभव प्राप्त किये। उसका ही परिणाम है कि आजतक मैं धन कमाने की दौड़ में न पड़कर समाज, राष्ट्र या सनातन धर्म के विषयों पर अपनी ऊर्जा पूरी निष्ठा से लगाता रहा हूं। अगर इसे अपने मुंह मियाँ मिट्ठू न माना जाऐ, तो देश में जो लोग मुझे जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मैंने प्रभु कृपा भारत में कई बार इतिहास रचा है। ये निर्भीकता और समाज के प्रति समर्पण का ये भाव इसीलिए आया क्योंकि मैंने पढ़ाई के साथ समाज का भी अध्ययन जारी रखा। अन्यथा मैं आज किसी तंत्र की नौकरी में जीवन बिताकर खाली बैठा होता। जैसा आईसीएस रहे श्री जेसी माथुर ने सेवानिवृत्त होने के बाद एक सुप्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका ‘दिनमान’ में एक श्रृंखला लिखी थी। जिसका मूल था कि ‘मैं आईसीएस में रहते हुए, एक मशीन का पुर्जा था, जिसका न दिल था, न दिमाग था’। 


कल का आईसीएस ही आज का आईएएस है। पिछले 40 वर्षों में मैं सैंकड़ों आईएएस अधिकारियों से संपर्क रहा है और मैं दावे से कह सकता हूं कि, वही आईएसएस अधिकारी जीवन में कुछ ठोस और रचनात्मक कार्य कर पाते हैं, जो अपनी नौकरी के मायाजाल के बाहर, समाज से जुड़कर सहज जीवन जीते हैं और अपनी संवेदनशीलता को मरने नहीं देते। बाकी तो पूरी जिंदगी अच्छी पोस्टिंग और प्रमोशन के चक्कर में ही काट देते हैं। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। पर आमतौर पर यही अनुभव रहा है। 


इसलिए मैं इस बात का समर्थक हूं कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। फिर वो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य हों, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य हों या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्में सीजेपी के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। प्रांतीय और केंद्र सरकार का ये दायित्व है कि वे छात्र राजनीति पर तब तक अंकुश न लगायें, जब तक कि वह हिंसात्मक या विध्वंसात्मक न हो। ऐसी छात्र राजनीति समाज की घुटन को ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में बाहर निकालती है और ये राज सत्ता के हित में ही होता है। इसलिए जब कभी देश का युवा सड़कों पर उतरे तो उसे गंभीरता से लिया जाए न कि दमनकारी रवैये से।  

Monday, October 5, 2026

प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना का विश्लेषण

वृंदावन के विश्विख्यात संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक नौजवान भक्त की ऐसी रहस्यमय मृत्यु समाज और पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण घटना है, जिसकी गहराई से जाँच की जा रही है। पर इससे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि कुछ सनातन धर्म विरोधी लोग इस दुर्घटना के लिए प्रेमानंद महाराज को ज़िम्मेदार ठहराकर उनपर कीचड़ उछाल रहे हैं। इस विषय में जो बात मैं आगे कहने जा रहा हूँ वो ऐसे आलोचकों को मेरा निष्पक्ष जवाब है। पर इसके साथ ही मैं उन बातों को भी यहाँ रखूँगा जिनको लेकर प्रेमानंद महाराज के चाहने वालों में भी लंबे समय से मंथन चल रहा है। उन्हें लगता है कि महाराज अपने चेलों के जाल में उलझ गए हैं। वे चेले जो महाराज की तपस्या को सोशल मीडिया पर वायरल करवाने की धुन में ब्रज के रसिक संतों की रहनी और आचरण को भूल बैठे हैं। आरोप है कि ऐसे चेले संपत्ति बनाने, कालोनियाँ बनाने और अपने-अपने साम्राज्य स्थापित करने में जुटे हैं। इन्हीं सब बातों पर आगे चर्चा होगी। 


प्रेमानंद महाराज एक लंबे अरसे से वृंदावन में रहकर तपस्वी का जीवन जी रहे थे। वे भीषण गर्मी के दिनों में भी घंटों यमुना जी की तपती रेत में पड़े रहकर भजन किया करते थे। प्रायः वे वृन्दावन की कँटीली झाड़ियों के बीच बैठ कर भी भजन करते थे। उन्होंने बरसों तक न भला खाया, न भला पहना। हम वृंदावनवासी जानते हैं कि वे वृन्दावन की गलियों में भिक्षा माँगकर रोटी खाते थे। 7-8 बरस पहले तक उनका नाम भी कोई नहीं जानता था। उनके दैन्य और तपस्या की प्रशंसा हर ब्रजवासी आजतक करता आया है। वे भी ब्रजवासियों के प्रति भारी श्रद्धा का भाव रखते हैं। 



अब से कुछ वर्ष पहले तक यमुना किनारे एक बगीची में, अपने चंद शिष्यों के बीच वे प्रवचन किया करते थे। धीरे-धीरे उनके प्रवचन की लोकप्रियता बढ़ने लगी और देखते ही देखते लगभग 1000 भक्त हर प्रातः उनका प्रवचन सुनने आने लगे। उस दौर में मैं भी प्रायः उनका प्रवचन सुनने उस बगीची में जाता था। धीरे-धीरे इस भीड़ में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ने लगी जो आईआईटी - आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ कर देश विदेश में अपनी लाखों की नौकरी छोड़ कर आ गए और प्रेमानंद महाराज के शिष्य बन कर पीली चादर ओढ़ ली। 


इन्हीं शिष्यों में कुछ ऐसे शिष्य भी थे जिन्होंने महाराज के प्रति अपने गहरे प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना शुरू किया और पूरी दुनिया में उन्हें इतना प्रचारित कर दिया कि विराट कोहली से लेकर तमाम जानी-मानी हस्तियां  उनके दर्शन को आने लगी। महाराज की मार्किटिंग इस कदर की गई कि उनके दर्शन के लिए आधी रात से हज़ारों की भीड़ जमा होने लगी। इस भीड़ के कारण वृंदावन की यातायात व्यवस्था भी बाधित हुई। महाराज जब रात में सड़क पर पैदल निकलते तो हज़ारों लोग उनके दर्शन को खड़े रहते। 


फिर तो वहाँ पैसे की वर्षा होने लगी। अब संपत्तियां खरीदने व बड़े-बड़े आश्रम बनाने की होड़ लग गई। यमुना की खादर में अवैध रूप से कॉलोनी बनाने के आरोप भी इन्हीं शिष्यों पर लगे। महाराज के दर्शन के लिए एडवांस टोकन मिलने लगे और भारी तामझाम का एक सुनियोजित आडंबर रच दिया गया। 


इतना ही नहीं प्रेमानंद महाराज के कुछ वर्ष पहले ही बने शिष्य भी अब सोशल मीडिया पर अपनी मार्केटिंग करवाने लगे। किसी को शिव का स्वरूप बताया जाने लगा तो किसी को ब्रह्म ऋषि। सैंकड़ों सालों से ब्रज के संत घर-घर रोटी माँग कर प्रसाद पाते थे। इसे माधुकरी कहते हैं। ब्रज में ये संतों का सामान्य शिष्टाचार है। पर किसी ने भी कभी इसे प्रचारित कर सेलिब्रिटी बनने की कोशिश नहीं की। प्रेमानंद महाराज के शिष्यों का माधुकरी माँगना भी सोशल मीडिया का ग्लैमर बन गया। पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता  को बढ़ाने और उनकी मार्केटिंग करने के जितने प्रयास हुए वैसा ब्रज में पहले कभी नहीं देखा गया। यह ब्रज की भक्ति परंपरा के अनुकूल नहीं था। परिणामतः केलि कुंज की आलोचनाएं भी होने लगी। इसी सबके बीच महाराज के शिष्यों में सत्ता और संपत्ति को लेकर गुटबाजी और झगड़े शुरू हो गए। 


इस सब से विचलित हो कर प्रेमानंद महाराज वृंदावन के अपने नए बने भव्य आश्रमों को छोड़ कर यमुना के उस पार बेल वन में चले गए।वहाँ जो बृजवासी गांव वाले रहते हैं वे परेशान हैं क्योंकि रात भर महाराज के दर्शनार्थी आते हैं। ब्रजवासी बच्चे घर से निकल जाए तो भीड़ में खो जाते हैं। सारे रास्ते जाम हो जाते हैं। अब वहाँ भी चेलों द्वारा कालोनियां बनाने का खेल चालू हो गया है। प्रेमानंद जी महाराज के प्रति श्रद्धा रखने वाले हम जैसे लाखों भक्त हैं। उनके शिष्य रसिक दुलारी शरण की मृत्यु से उस श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है। पर इतना अवश्य है कि अब समय आ गया है कि जब प्रेमानंद महाराज शिष्यों के बनाये इस आडंबर के जाल से निकल कर अपने मूल स्वरूप में लौट आएँ। 


जहाँ तक रसिक दुलारी शरण की मृत्यु का प्रश्न है तो सच्चाई तो पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी। पर इतना अवश्य है कि युवा साधकों के बीच ऐसी दुर्घटना होना कोई नई बात नहीं है। साधना की प्रारंभिक अवस्था में अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न रख पाने के कारण कई युवा साधक अपने लिंग को हानि पहुँचा देते हैं। ये उनकी नासमझी या उत्साह के अतिरेक में उठाया गया एक मूर्खतापूर्ण कदम होता है। इन्द्रियों पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण होने के बाद होता है। अगर मन वास्तव में भगवत भक्ति में रम जाए तो हमारी सभी इंद्रियाँ स्वयं ही शांत हो जाती हैं। इस तरह के जबरन किए गए प्रयासों से इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता ये हर साधक को जानना चाहिए। इस घटना का जो भी परिणाम हो इससे प्रेमानंद महाराज की प्रतिष्ठा में कोई आंच नहीं आएगी। पर उनके इर्द-गिर्द जमा शिष्यों को इससे सबक लेकर आत्मवालोकन करना चाहिए।   

Monday, September 28, 2026

भारत में सच्चे संतों की कमी नहीं!

बाबा नीब करौरी के जीवन के पूर्वार्ध पर बनी फ़िल्म ‘हनुमान अंश’ ने देश-विदेश के सनातनधर्मियों के हृदय को स्पर्श किया है। पिछले हफ़्ते जब थिएटर में मैं ये फ़िल्म देख रहा था तो अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाया और आँखे कई बार छलछला गईं। कारण ये कि नीब करौरी बाबा का तो नहीं पर उन जैसे कुछ संतों का सानिध्य पिछले 28 वर्षों में मुझे निरंतर प्राप्त हुआ है। इन संतों की सहजता, दरिद्र नारायण के प्रति करुणा और अमीर-ग़रीब के बीच कोई फ़र्क़ न करने की प्रवृत्ति ने मुझे बहुत प्रभावित किया। 1998 में जब बरसाना के विरक्त संत श्री रमेश बाबा से मिला तो वे मानगढ़ की पहाड़ी पर एक खण्डहर-नुमा कमरे में रहते थे। जिसमें जून की गर्म दोपहरी में आती गर्म हवा के थपेड़ों को रोकने के लिए खिड़कियों पर फटी बोरियों को भिगो कर टांगा हुआ था। जब बाबा ने मुझे ब्रज की सांस्कृतिक धरोहरों को सजाने संवारने का आदेश दिया तो उन्होंने यह भी कहा कि,
“भगवान दीनबंधु दीनानाथ हैं, धनीबंधु वीआईपीनाथ नहीं। पहले फ़क़ीर बनो, तब ब्रज की सेवा करना।” बाबा के सानिध्य में 2002-05 के बीच मैंने भी ऐसा जीवन जीने का प्रयास किया। बोरी बिछा कर सोना, भिक्षा माँग कर रोटी खाना और बेहद साधारण कपड़े पहनना। पर इतना ही काफ़ी नहीं था। अपने स्वभाव में दीनता लाने का भी अभ्यास करना था। इस तरह बाबा ने अनेक प्रकार से ब्रज सेवा के लिए प्रशिक्षित किया। उनके प्रताप से जो कुछ ब्रज में धरोहरों के जीर्णोद्धार के कार्य हुए वो जग-जाहिर हैं।



इसी तरह बरसाना की पीली पोखर पर रहने वाले विरक्त संत विनोद बाबा भी हैं। जिनके तप, सादगी, करुणा और हृदय की विशालता को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मेरी मित्र मीरा बोरवाँकर जो महाराष्ट्र की चर्चित पुलिस अधिकारी रही और जिसके जीवन पर बॉलीवुड की फ़िल्म ‘मर्दानी’ बनी, वो श्री विनोद बाबा के दर्शन को तैयार नहीं थी। पर मैं उसे ले गया। बाबा को देखते ही वो ऐसी स्तब्ध हुई कि वहाँ उनके सामने घंटों बैठने की इच्छा व्यक्त करने लगी। ‘हनुमान अंश’ के अनेक प्रसंग ऐसे हैं जैसे मैंने उपरोक्त दोनों संतों के जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव किए हैं। ‘संत हृदय नवनीत समाना’। जिस तरह बदल रात में चुपचाप किसान के खेत पर बिना बताए वर्षा करके चले जाते हैं, वैसे ही संत भी हमारे जीवन में अपनी कृपा की वृष्टि अनायास ही करते रहते हैं। गोवर्धन के सियाराम बाबा, वृंदावन के कृपाविलास वाले महाराज, पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद जी महाराज और केरल की संत माता अमृतानंदमयी ‘अम्मा’ के सानिध्य में मुझे ऐसे ही अनेक अनुभव हुए हैं। इन सभी संतों ने मुझ पर अपना वात्सल्य खूब उड़ेला है। इसीलिए ‘हनुमान अंश’ फ़िल्म देखते समय मुझे बार-बार ऐसे प्रसंग याद आ रहे थे और आँसूँ थम नहीं रहे थे। 



सच्चे संत हमारी पात्रता को नहीं देखते, वे तो अहैतुकि कृपा करते हैं। नीब करौरी बाबा का जीवन भी ऐसा ही था।  उन्होंने आडंबर और वैभव रहित सादगी भरा जीवन आम जनमानस के लिए समर्पित किया था। उनके क्रियाकलाप ये सिद्ध करने के लिए काफ़ी हैं कि संत को आपके पद, धन, रुतबे और हैसियत से कुछ लेना-देना नहीं होता। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज देश में सनातन धर्म के नाम पर शोर मचाने वाले ऐसे हज़ारों धर्मध्वजी, आत्मघोषित ‘संत’ गुरु, कथावाचक आदि सोशल मीडिया और समाज में छा गए हैं, जिनका आचरण दूर-दूर तक संतों जैसा नहीं है। रंगमंच के कलाकारों के जैसे रंगबिरंगे चमकीले-भड़कीले डिज़ाइनर वस्त्र पहन कर सरकारी सुरक्षाकर्मियों के साये में विशाल पंडालों में श्रोताओं के सम्मुख स्वयं को किसी राजाधिराज की तरह प्रस्तुत करना आम हो गया है। मोह-माया त्यागने का उपदेश देना और स्वयं वैभव युक्त जीवन जीना, सत्ताधीशों के आगे-पीछे मंडराना या उनके सानिध्य में गर्वित होना, अपने ही संसाधनों से मीडिया में स्वयं को ‘परम श्रद्धेय गुरुदेव’ जैसे अलंकारों से प्रचारित करवाना और खुलेआम धर्म का व्यापार करना इनके लिए आम बात है। आम जनता अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए धर्म की शरण लेती है। पर उन्हें मिलता है ‘ऊँची दुकान और फीका पकवान’। पिछले तीस वर्षों में मैंने इस कॉलम में कई बार लिखा है कि जिसके सम्मुख बैठ कर आपकी भौतिक कामनाएँ समाप्त हो जाएँ और आध्यात्मिक जिज्ञासा का वेग प्रबल हो जाए, वही सच्चा संत है। बाक़ी तो सब धार्मिक मनोरंजन हैं। हमें भगवान या सच्चे संत से कुछ कह कर माँगना नहीं होता। नीब करौरी बाबा की तरह वे स्वयं ही जान लेते हैं कि हमें क्या चाहिए या हमारा भला किसमें है। भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 61वें श्लोक में कहते हैं कि, ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥’ अर्थात् हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। तो उनसे कुछ बोल कर मांगने की क्या ज़रूरत है? 

देश के कोने-कोने में ऐसे सच्चे संतों की कमी नहीं है जो हमें तत्वज्ञान भी करा सकते हैं और हमारी व्यग्रता को भी शांत कर सकते हैं। ऐसे संतों को हमसे धन या संसाधन पाने की अपेक्षा नहीं होती। उन्हें जबरन शिष्य बनाने की इच्छा भी नहीं होती। ऐसे संत तो हमारे लाख बार नाक रगड़ने के बाद भी हमारी पात्रता को देख कर अपना शिष्य स्वीकार करते हैं। आजकल तो देश में थोक में शिष्य बनाने का व्यापार चल रहा है। ‘जैसा गुरु वैसा चेला, दोनों मिलकर ठेलमठेला’। लगभग 500 वर्ष पूर्व महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ब्रज चौरासी कोस यात्रा के दौरान एक जंगल में पड़े विशालकाय अजगर को देख कर ठिठक गए। उस अजगर को हज़ारों चींटियां खा रही थीं। वो दर्द से छटपटा रहा था। महाप्रभु ने वहीं ठहर कर श्रीमद् भगवद् के 108 पाठ करने के निर्णय किया। उनके अचंभित शिष्यों ने इसका कारण पूछा। महाप्रभु ने कहा कि ये अजगर पिछले जन्म में आत्मघोषित गुरु था। इसने हज़ारों लोगों को दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया। पर न तो वो अपना उद्धार कर सका और न ही अपने हज़ारों शिष्यों का। वही शिष्य इस जन्म में ये हज़ारों चींटियाँ बन कर उसका शरीर खा रही हैं। इसलिए कहावत है कि, ‘पानी पीजिए छान कर, गुरु कीजिए जान कर।’
 

Monday, September 21, 2026

व्यवस्था को चुभने वाले अधिकारी

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषध प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे इन दिनों एक बार फिर उन अधिकारियों की पंक्ति में खड़े दिखते हैं, जिनकी उपस्थिति व्यवस्था को असहज कर देती है। होटल-रेस्तरां की रसोइयों से शुरू हुआ उनका अभियान अब अस्पतालों के बिलों तक पहुँच गया है। सवाल केवल एक अधिकारी के तेवर का नहीं है। सवाल यह है कि जनता के स्वास्थ्य और जेब के बीच खड़ी लूट को रोकने वाले अधिकारी भारत में इतने दुर्लभ क्यों हैं? और जब वे दिखते हैं तो उनकी पदावधि इतनी छोटी क्यों रह जाती है?


मुंढे मई 2026 में एफडीए आयुक्त बने। कुछ ही महीनों में विभाग ने हजारों निरीक्षण किए, सैकड़ों लाइसेंस निलंबित किए, करोड़ों रुपये का मिलावटी या असुरक्षित माल जब्त किया और गुटखा-पान मसाला के अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई की। बड़े ब्रांड, पुराने होटल, क्विक-कॉमर्स गोदाम, यहाँ तक कि मुंबई हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहे। संदेश साफ था, नियम छोटे-बड़े के भेद से नहीं चलेंगे। अब वही सख्ती निजी अस्पतालों के उपभोग्य सामान पर दिख रही है। एक सर्वे में सामने आया कि अस्पताल ने आईवी इन्फ्यूजन सेट 11.05 रुपये में खरीदा, पर मरीज के बिल में उसकी कीमत 325 रुपये लिखी गई। यह करीब 2,841 प्रतिशत का अंतर है। सिरिंज 6.75 रुपये में खरीदी गई, बिल में 57.20 रुपये। कैथेटर 29.41 रुपये में लिया गया, मरीज से 310 रुपये वसूले गए। मुंढे ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और केंद्रीय औषध विभाग को पत्र लिखकर ट्रेड मार्जिन पर लगाम लगाने की माँग की है।


यह महज मूल्य का खेल नहीं है। अस्पताल के बिल का सबसे मोटा हिस्सा अक्सर वह होता है जिसका उपचार से सीधा संबंध कम और खरीद-बिक्री की श्रृंखला से ज्यादा होता है। उल्लेखनीय है कि जब मरीज सरकारी योजना या निजी बीमा के दायरे में होता है, तो यह लूट और निर्लज्ज हो जाती है। मरीज सोचता है कि खर्च कंपनी या सरकार उठाएगी। अस्पताल जानता है कि क्लेम पास होने की प्रक्रिया जटिल है, मरीज कमजोर है और पूछताछ कम होती है। नतीजा यह कि खपत की वस्तुएँ मनमाने मार्जिन पर चढ़ जाती हैं, कमरे-जांच-उपकरण के पैकेज फुला दिए जाते हैं और बीमा का पैसा अंततः समाज के उसी वर्ग से वसूला जाता है जो प्रीमियम चुकाता है। सरकारी योजनाओं में भी यही तर्क काम करता है और सार्वजनिक धन निजी लाभ में बदल जाता है।


भारत को तुकाराम जैसे अधिकारियों की जरूरत है क्योंकि हमारे नियामक ढांचे में कानून पर्याप्त हैं, पर प्रवर्तन चयनात्मक है। खाद्य सुरक्षा, औषधि नियंत्रण और अस्पताल शुल्क, तीनों क्षेत्र उन जगहों पर हैं जहाँ आम आदमी सबसे असहाय होता है। वह मेनू नहीं पढ़ सकता कि पनीर असली है या नहीं; वह बिल नहीं काट सकता कि सेट ग्यारह का है या तीन सौ पच्चीस का; वह बीमा कंपनी से नहीं लड़ सकता जब अस्पताल कहता है कि पैकेज में सब शामिल है। ऐसे में यदि कोई अधिकारी बिना चेतावनी निरीक्षण करता है, लाइसेंस निलंबित करता है और आंकड़े सार्वजनिक करता है, तो वह केवल विभाग नहीं चला रहा होता, वह बाजार की नैतिक सीमा खींच रहा होता है। गौरतलब है कि तुकाराम मुंढे प्रभाव तेज़ी से फैल रहा है। रसोई साफ होने लगीं, मेनू पर एनालॉग पनीर लिखा जाने लगा और अस्पताल अब कम से कम कीमतों की चर्चा से बच नहीं सकते। यह डर सुधार का पहला कदम है। स्थायी सुधार तभी आएगा जब एक व्यक्ति का अभियान संस्था की आदत बनेगी।


सवाल उठता है कि ऐसे अधिकारी बार-बार तबादले का शिकार क्यों होते हैं? मुंढे 2005 बैच के महाराष्ट्र काडर के आईएएस हैं। करीब इक्कीस वर्ष की सेवा में उनके पच्चीस के आसपास तबादले हुए हैं। सोलापुर में रेत माफिया, नवी मुंबई में अनावश्यक परियोजनाओं का विरोध, पुणे परिवहन में अनुपस्थित ड्राइवरों की छँटनी, स्वास्थ्य आयुक्त रहते सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक, हर जगह उन्होंने स्वार्थी हितों से टकराव चुना। तबादला सजा नहीं कहा जाता, पर व्यवहार में वह सजा ही है। ईमानदार अधिकारी को बार-बार हटाकर व्यवस्था यह संकेत देती है कि स्थिरता सुविधा के पक्ष में है, असुविधा के नहीं। राजनेता, स्थानीय व्यापारिक लॉबी, कभी विभाग के भीतर के कर्मचारी, सभी को एक ही शिकायत होती है: काम का दबाव, अचानक छापे, छवि खराब होना। जनसमर्थन सोशल मीडिया पर दिखता है, पर फाइलें सचिवालय में चलती हैं। जब तक तबादले की शक्ति बिना पारदर्शी कारण के बनी रहेगी, मुंढे जैसे अधिकारी अपवाद रहेंगे, आदर्श नहीं।

ऐसे में आलोचना भी जरूरी है। व्यवसाय जगत कहता है कि बिना सुधार का समय दिए लाइसेंस काटना अति है। अदालत ने कभी कहा कि मच्छर मारने के लिए तलवार न चलाई जाए। विभाग के कुछ कर्मचारियों ने कार्यभार की शिकायत की। ये बातें अनसुनी नहीं की जानी चाहिए। प्रवर्तन कठोर हो, पर पूर्वानुमान योग्य और समान भी हो। छोटे ढाबे और बड़े अस्पताल दोनों पर एक ही पैमाना लगे। मूल्य नियंत्रण ऐसा हो कि गुणवत्ता न गिरे और इनोवेटर का मार्जिन भी पूरी तरह न मिटे। बीमा कंपनियों और सरकारी योजनाओं को अस्पताल के खरीद मूल्य से बिल का मिलान अनिवार्य बनाना चाहिए। मरीज को बाहरी फार्मेसी से दवा लेने की स्वतंत्रता कागज पर नहीं, व्यवहार में मिलनी चाहिए।

आखिरकार प्रश्न व्यक्ति का नहीं, संस्कृति का है। भारत में सेवा भाव वाले अधिकारी भी पैदा होते हैं, गाँव के किसान परिवार से आईएएस बनने वाले मुंढे इसका जीवंत उदाहरण हैं। कमी यह है कि व्यवस्था उन्हें टिकाए नहीं रखती। जब तक ईमानदारी को करियर का जोखिम माना जाएगा, रसोई में कीड़े और बिल में दो हजार प्रतिशत मुनाफा सामान्य बने रहेंगे। देश को मुंढे जैसे और अधिकारियों की जरूरत है। उससे भी ज्यादा जरूरत है ऐसी प्रशासनिक सुरक्षा की, जिसमें वे एक पद पर पूरा कार्यकाल काट सकें, आंकड़े सुधार सकें और लॉबी के दबाव में विस्थापित न हों। स्वास्थ्य और भोजन मौलिक जरूरतें हैं। इन पर लूट को सहना शासन की विफलता है। एक अधिकारी का अभियान चेतावनी है। चेतावनी को नीति बनाना अब बाकी है। 

Monday, September 7, 2026

जनता की जागरूकता लोकतंत्र के लिए ज़रूरी

जब से ‘जेन-ज़ी’ ने जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ सफल धरने का आयोजन किया है, तब से पूरे देश के विद्यार्थियों में अभूतपूर्व नवचेतना का उदय हुआ है। आज देश भर के ग्रामीण अंचलों के खस्ता हाल सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी अपने स्कूलों की अव्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाने लगे हैं। उनमें स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल पूछने की हिम्मत आ गई है। प्रसन्नता तो इस बात की है कि अब ऐसी चेतना प्राथमिक पाठशालाओं के बच्चों तक में पैदा हो गई है। वे अपने स्कूल की जरजर या नदारद इमारत, शौचालयों का अभाव, शिक्षकों की संख्या में भारी कमी, स्कूल से मिलने वाले भोजन की खराब क्वालिटी, स्कूल तक पहुँचने वाले मार्गों की दुर्दशा, जैसे गंभीर मुद्दों पर खुलकर और संगठित होकर सवाल पूछने लगे हैं। राजस्थान के एक माध्यमिक विद्यालय की छात्राओं ने तो विद्यालय के गेट पर ताला ही डाल दिया और धरने पर बैठ गईं। उनका कहना था कि जबतक उनकी मांगे पूरी नहीं हो जाती, स्कूल का ताला नहीं खुलेगा। 



देश भर में पनप रही इस नई प्रवृत्ति से प्रशासन और सत्तारूढ़ दल हक्के-बक्के हो गए हैं। उन्हें जवाब देते नहीं बन रहा। सोशल मीडिया पर ऐसे दर्जनों वीडियो रोज़ वायरल हो रहे हैं जिनमें ये घटनाक्रम प्रमुखता से दिखाए जा रहे हैं। सबसे रोचक बात यह है कि इस तरह विरोध के स्वर उठाने वाले छात्र किसी राजनैतिक दल के बहकावे में आ कर ये कदम नहीं उठा रहे। राजनैतिक दल और उनके कार्यकर्ता तो ख़ुद इस नई परिस्थिति से बेचैन हैं। क्योंकि आजतक जनता और शासन के बीच बिचौलिये की उनकी आत्मघोषित भूमिका अब निरर्थक होती जा रही है। यही हाल मीडिया का भी है। जो मीडिया सरकारों की चाटुकारिता या उनका प्रचारक बन कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहा था वो अचानक यह महसूस कर रहा है कि आम जनता की दृष्टि में अब उनकी कोई अहमियत नहीं बची। एक और रोचक तथ्य यह है कि ऐसी जागृति केवल भाजपा शासित राज्यों में आई हो, ये बात नहीं है। जिन राज्यों में कांग्रेस या अन्य दलों की सरकारें हैं वहाँ के छात्र भी शिक्षा व्यवस्था की खामियों को लेकर अब मुखर हो गए हैं। 



कुछ पत्रकार तो हमेशा ही अपना कर्तव्य निष्ठा से निभाते आए हैं। इस माहौल से उत्साहित हो कर जब उन्होंने कुछ राज्यों में विद्यालयों की दुर्दशा पर रिपोर्टिंग की तो उससे घबराकर वहाँ के मुख्यमंत्रियों ने ऐसे पत्रकारों के विरुद्ध पुलिस की दंडात्मक कार्यवाही शुरू करवा दी। मज़े की बात यह है कि ऐसा करने वालों में वो मुख्यमंत्री भी हैं जो दिन-रात सैंकड़ों करोड़ रुपया अपने प्रचार-प्रसार पर खर्च करके अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते हैं। दरअसल ऐसे मुख्यमंत्री, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों, इस मुग़ालते में थे कि उनका आक्रामक प्रचार, उनके शासन की कमज़ोरियों को ढक लेगा। जब मीडिया ही मैनेज हो गया तो उनकी सरकारों की कमज़ोरियाँ आम जनता तक कौन पहुँचाएगा? 



लेकिन अब पासा पलट गया। मीडिया तो मैनेज हो गया, लेकिन टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठा कर अब हर छात्र एक रिपोर्टर बन चुका है। वो एक स्मार्ट फ़ोन से ज़मीनी हक़ीक़त दिखाकर, सरकार के झूठे दावों की पोल खोल रहा है। ये तो एक तरह का ऐसा सैलाब है जिसे काबू कर पाना अब किसी भी दल की सरकार के लिए नामुमकिन होगा। दो-चार पत्रकारों पर तो दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है लेकिन जब विद्यालयों के सैंकड़ों छात्र हकीकत बयान करने लगें तो उन पर दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा सकती। अगर किसी मूर्ख नेता ने अहंकारवश ऐसा करने का दुस्साहस किया तो वो वोट बैंक को खो देगा। क्योंकि बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य को लेकर हर माता-पिता चिंतित रहता है। जब वो देखेंगे कि उनके बच्चों को स्कूलों में बुनियादी सुविधा मिलना तो दूर उल्टा उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने पर पुलिस की दंडात्मक कार्यवाही को झेलना पड़ रहा है तो उनका पारा भी सातवें आसमान पर चढ़ेगा। ऐसे हालातों को क़ाबू कर पाना किसी भी मंत्री या सरकार के लिए असंभव होगा। 



ये तो एक शुरुआत है, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है। लेकिन इसका दायरा अब और बढ़ना चाहिए। हर आम नागरिक को अपने परिवेश पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए। अगर उनके घर के सामने सड़क टूटी पड़ी है या उसमें पानी भर रहा है, या उनके इर्दगिर्द कूड़े के अम्बार लगे हैं तो उन्हें उसकी फ़ोटो खींच कर फ़ौरन सोशल मीडिया पर वायरल कर देना चाहिए। जिससे स्थानीय प्रशासन हरकत में आए और जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करे। जब हर नागरिक ऐसा करना शुरू कर देगा तो भ्रष्ट अधिकारियों या राजनेताओं पर भारी दबाव पड़ेगा। उन्हें मजबूरन जनता की परेशानियों का निदान करना होगा। जब एक ही इलाक़े के दर्जनों या सैंकड़ों लोग एक सी समस्याओं का खुलासा करेंगे तो फिर उन सबका सामूहिक दमन करना किसी भी प्रांतीय सरकार या स्थानीय निकायों को करना मुश्किल होगा। इससे अपना लोकतंत्र मजबूत बनेगा और नेताओं और अधिकारियों में ज़िम्मेदारियों की भावना विकसित होगी। जो आज़ादी मिलने के दो दशक बाद से ही लुप्त होना शुरू हो गई थी। आज तो हालत ये हो गई है कि जो नेता या अफसर जितना ज़्यादा भ्रष्ट होता है वो उतनी ही दबंगई दिखाता है। उसे अभी तक ये गलतफहमी है कि उससे कोई सवाल नहीं कर सकता। 

जो राजनेता, मुख्यमंत्री, मंत्री, सच्चे और ईमानदार हैं और यह चाहते हैं कि विकास कार्यों के लिए आवंटित धन का सदुपयोग हो वो जनता की इस पहल का स्वागत करेंगे, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपने प्रांत के बारे में ज़मीनी हकीकत बिना किसी लाग-लपेट के नियमित मिलने लगेगी। ऐसे में वे अपने प्रशासन को कड़े निर्देश देकर जनता की समस्याओं का हल करवा पाएंगे।