Monday, May 4, 2026

पर्यटन का विस्फोट : खतरे की घंटी !

इस हफ़्ते जबलपुर में नर्मदा नदी के बरगी बाँध पर मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग की क्रूज बोट के अंधड़ में पलट जाने से नौ लोगों की डूब कर दर्दनाक मौत हो गई। दो हफ़्ते पहले उत्तर प्रदेश के वृंदावन में यमुना में भी नाव पलटने से दस लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। सुरक्षा नियमों का लागू न होना और बिना लाइफ जैकेट के पर्यटकों को नावों, स्टीमरों या क्रूज़ बोट्स में सैर सपाटा कराना, इन हादसों का मुख्य कारण है। ऐसे हादसे देश में आए दिन हो रहे हैं। पर उन से किसी भी राज्य की सरकार या प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया। ऐसा लगता भी नहीं कि आने वाले दिनों में इस दिशा में कोई कड़ी पहल की जाएगी। लोग अपनी मस्ती में जान जोखिम में डालते रहेंगे, चाहे उनकी ज़िंदगी को कितना ही ख़तरा क्यों न हो। 


पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों, तीर्थ नगरियों और कुंभ जैसे धार्मिक उत्सवों में लगातार बढ़ती दर्शनार्थियों की भीड़ अब इतनी बेकाबू हो गई है कि उसमें कुचल कर सैंकड़ों जानें चली जाती हैं। जैसे जनवरी 2025 में प्रयाग के कुंभ में हुआ, जहाँ बहुत लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए। और यही हाल कई बार वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में हुआ। मार्च 2026 में शीतला मंदिर (नालंदा, बिहार) में पूजा के दौरान भगदड़ में 8 लोग मारे गए, कई घायल हुए। 2025 में भारत में कुल 8 से ज़्यादा भगदड़ हादसों में 129 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें ज्यादातर धार्मिक स्थलों पर हुईं। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ बेक़सूर लोगों ने भीड़ के कारण अपनी जान गवाई।  


राज्यों के मुख्य मंत्री बड़े गर्व से घोषणा करते हैं कि उनके यहाँ पर्यटकों की संख्या कितनी तेज़ी से बढ़ रही है। पर वो ये नहीं बताते कि पर्यटकों की इस बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के काम में वे कितना असफल हो रहे हैं। इसी हफ़्ते केदारनाथ में इतनी भीड़ बड़ गई कि बहुत से दर्शनार्थियों को बिना दर्शन के बैरंग लौटना पड़ा। क्या वजह है कि तिरुपति बालाजी जैसे कुछ अपवादों को छोड़ कर किसी भी राज्य की सरकार पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की भीड़ को व्यवस्थित तरीके से संचालित या नियंत्रित नहीं करना चाहती? जबकि ऐसा करना बिल्कुल असंभव नहीं है। मुझे याद है कि 1984 में मैं स्विट्जरलैंड के माउंट ब्लांक के सर्वोच्च शिखर पर जाने लिए जब उस पर्यटन स्थल से 50 मील दूर था, तो स्थानीय पुलिस ने हमारी जैसी सैंकड़ों गाड़ियों को वहीं रोक दिया और हमें तब तक इंतज़ार करने को कहा जब तक की एक निर्धारित संख्या की गाड़ियाँ सामने की तरफ़ से लौट नहीं आईं। इस तरह उन्होंने पहाड़ की तलहटी में अनियंत्रित भीड़ होने की संभावना को ख़ारिज कर दिया। क्या ऐसी नीतियाँ हमारी प्रदेश सरकारें नहीं अपना सकती? पुलिस का जितना अमला हर राज्य में छोटे से बड़े तथाकथित वीआईपीयों की सुरक्षा व्यवस्था में रोज़ाना खपा रहता है, वो अगर हर तीर्थस्थल या पर्यटन स्थल के भीड़ नियंत्रण पर तैनात किया जाए तो न तो दुर्घटनाएं होंगी और न ही यात्रियों व स्थानीय नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। 


हमारी प्रदेश सरकारें इस बात में बहुत गर्व महसूस करती हैं कि उनकी नीतियों के कारण उनके प्रदेश में पर्यटन दिन दुगना और रात चौगुना बढ़ रहा है। पर इस पर्यटन विस्फोट से जो अव्यवस्था फैलती जा रही है, उसका उल्लेख कोई मुख्य मंत्री नहीं करता। भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर हर महत्वपूर्ण शहर में प्लास्टिक और कूड़े के अंबार लगते जा रहे हैं। जिनसे निपटने की कोई योजना किसी भी सरकार के पास नहीं है। कूड़े के ये पहाड़ न सिर्फ़ आँख की किरकिरी हैं बल्कि जनता के स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा भी पैदा कर रहे हैं। मोदी जी की पहल पर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का कोई असर इन तीर्थ नगरियों और पर्यटन क्षेत्रों में दिखाई नहीं देता। फिर वो चाहे पहाड़ों की घाटियाँ हों, समुद्र और नदियों के तट हों या हरे भरे जंगल, हर ओर कूड़े के अंबार लगते जा रहे हैं। इसलिए पश्चिमी देश भारत को दुनिया का सबसे गंदा देश अगर कहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है? 


पर्यटन विस्फोट की इस आपाधापी में प्रांतीय सरकारों को इस बात की चिंता नहीं है कि देश के नागरिकों को खाने के सामानों या प्रसाधन की वस्तुओं में कितना ज़हर परोसा जा रहा है। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भारी मात्रा में मरे हुए जानवरों की चर्बी से बनाए जा रहे नकली घी के भारी भंडार छापों में पकड़े गए हैं। पर ये कारवाई प्रतीकात्मक ज़्यादा है, प्रभावी कम। क्योंकि ऐसे नक़ली घी का कारोबार बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से चल रहा है। इसी तरह उत्तर भारत में रसायनों से बने नकली दूध और पनीर को सरेआम बेचा जा रहा है। फल और सब्जियों की तो बात ही छोड़ दीजिए, उन पर हानिकारक कीटनाशक और खतरनाक रसायन छिड़क कर नक़ली रंगों से तरो-ताज़ा दिखा कर हर मंडी में बेचा जा रहा है। आम आदमी असहाय है, वो कुछ कर नहीं सकता इसलिए न चाह कर भी अपने परिवार को ये ज़हरीले पदार्थ खिलाने पर मजबूर है। पर्यटन और तीर्थ क्षेत्रों में तो मिलावट का धंधा कई गुना ज़्यादा हो रहा है। क्योंकि विक्रेता के सामने जो ग्राहक खड़ा है वो एक बार ही उसके होटल आया है और अगले दिन लौट जाएगा तो दूसरा ग्राहक आ जाएगा। इसलिए उसे शिकायत नहीं झेलनी पड़ती। 


इस तरह हो रहे पर्यटन विस्फोट ने इन क्षेत्रों के आधारभूत ढांचों की कमर तोड़ दी है। जिसका समाधान शहरीकरण के नए-नए मेगा प्रोजेक्ट बनाना नहीं है। क्योंकि उनसे उस तीर्थाटन या पर्यटन क्षेत्र का नैसर्गिक स्वरूप और आध्यात्मिक चेतना, दोनों का तेज़ी से विनाश होता है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में भारत के ये क्षेत्र एक नासूर बन कर रह जाएँगे। जबकि दुनिया के तमाम देशों ने अपने पर्यटन उद्योग को नियमों के तहत बांधकर रखा है और अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को बिगाड़ने नहीं दिया। अमरीका के पश्चिमी तट पर एक तरफ़ घने पहाड़ और जंगल और दूसरी तरफ़ लहराते समुद्र के बीच हमारी कार तेज़ी से दौड़ रही थी, मुझे भूख लगी तो मेरे मेजबान ने जंगल के भीतर जा रही एक छोटी सड़क पर कार मोड़ दी। कुछ किलोमीटर जंगल पार करने के बाद मुझे ये देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहाँ स्थित खाने-पीने और मनोरंजन का एक बड़ा केंद्र मौजूद था। पर वो समुद्र तट और जंगल के बाद था। इसलिए समुद्र तट का प्राकृतिक सौंदर्य इससे प्रभावित नहीं हुआ था। जबकि केरल में त्रिवेंद्रम का कोवलम बीच या गोवा के समुद्र तट बेतरतीब विकसित हुए होटलों के कारण अपनी प्राकृतिक पहचान खो चुके हैं। आख़िर हम कब जागेंगे?  

किन्नरों को जबरन वसूली का अधिकार नहीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक किन्नर की याचिका पर नेग के नाम पर जबरन वसूली को ग़ैर क़ानूनी करार दिया है। अदालत ने इस तरह की वसूली को भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत अपराध बताया है। यह केस उत्तर प्रदेश के गौंडा ज़िले के किन्नर रेखा देवी की याचिका पर सुना जा रहा था। जिसमें रेखा देवी ने अपनी जजमानी का इलाक़ा निर्धारित करने की अदालत से माँग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि इलाक़ों की भौगोलिक सीमा स्पष्ट ना होने के कारण, प्रायः किनारों के अलग-अलग समूहों के बीच झड़पें व हिंसा तक होती है। पर अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए उक्त निर्णय सुनाया। 



यह सही है कि घर में ख़ुशी के मौक़े पर, जैसे पुत्र या पुत्री का जन्म, विवाह या नए घर में गृह-प्रवेश के अवसर पर किन्नर बधाई देने आते हैं और नाच गा कर अपना नेग माँगते हैं। भारत में यह अनूठी प्रथा हज़ारों सालों से चली आ रही है। इसकी जड़ें पौराणिक काल में हैं।


सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से स्वीकृत कथा रामायण से जुड़ी है। जब भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या से जाते हैं, तो वे लोगों (पुरुषों और स्त्रियों) को वापस लौट जाने को कहते हैं। किन्नर (जो न पुरुष हैं न स्त्री) इस आदेश से खुद को बंधा नहीं मानते और राम की प्रतीक्षा में वहीं रह जाते हैं। 14 वर्ष बाद राम लौटते हैं तो उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर राम उन्हें वरदान देते हैं कि शुभ अवसरों पर उनका आशीर्वाद विशेष रूप से फलीभूत होगा। इसी वरदान को बधाई की परंपरा का मूल माना जाता है। किन्नर समुदाय गाते-बजाते, तालियां बजाते हुए आशीर्वाद देते हैं और बदले में नेग (दक्षिणा या उपहार) लेते हैं। यह मान्यता है कि उनकी उपस्थिति और आशीर्वाद नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है और सौभाग्य लाती है। यह कथा वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस दोनों में मिलते हैं।



इसी तरह महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप (तीसरे लिंग वाला) और शिखंडी जैसे पात्र तीसरे लिंग की मान्यता दिखाते हैं। लगभग 400 ईसा पूर्व लिखे गए कामसूत्र में किन्नरों का स्पष्ट उल्लेख है। वेदों, पुराणों और अन्य शास्त्रों में भी किन्नरों का जिक्र मिलता है। किन्नरों को गायन, नृत्य और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा माना जाता था। कई विद्वान और स्रोत इस समुदाय की उपस्थिति को 4000 वर्ष से अधिक पुरानी बताते हैं।


मुगल काल में हिजड़ों की भूमिका और संगठित हुई। वे हरम की रखवाली, दरबारी सेवाएं और प्रशासन में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। बधाई की परंपरा इस काल में अधिक प्रचलित और संरचित रूप में चली, जहां वे शुभ अवसरों पर नृत्य-गान करके आशीर्वाद देते और नेग प्राप्त करते थे। दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य में उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति मजबूत थी।



अंग्रेज़ों ने 1871 के ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के तहत किन्नरों को अपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनकी पारंपरिक आजीविका और सम्मान प्रभावित हुआ। आज़ादी के बाद यह क़ानून समाप्त कर दिया गया। इस तरह बधाई-नेग की परंपरा उत्तर भारत, खासकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में आज भी जीवित है। कुछ राज्यों में सरकार ने नेग की दरें तय करने की कोशिश भी की है। पर उसमें विशेष कामयाबी नहीं मिली। 



इसी अस्पष्टता का लाभ उठा कर किन्नर समुदाय प्रायः अपने जजमानों से जबरन वसूली करता है। कभी-कभी तो वसूली का तरीका बहुत अभद्र होता है। जिसमें जजमान के परिवार के सामने निर्वस्त्र हो जाना, भद्दी गालियाँ देना, बद्दुआएँ देना और डराना धमकाना। कभी-कभी यह सब नाटक इस सीमा तक हो जाता है कि भयभीत जजमान अपनी आर्थिक हैसियत से कई गुना ज़्यादा दे कर पिंड छुड़ाता है। ऐसी वसूली को ‘नेग’ कतई नहीं कहा जा सकता। ये सरासर गुंडई और अवैध वसूली का तरीका है, जिस पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन को लगाम लगानी चाहिए। इसके साथ ही कई बार ऐसी घटनाएँ भी सामने आती हैं जब बाकायदा सम्पूर्ण पुरुष होते हुए भी मर्द, स्त्री का रूप धारण कर किन्नर होने का दावा करते हैं और इस वसूली में अपनी ताक़त दिखाते हैं। 


हमारी सामाजिक मान्यताओं के अनुसार किन्नरों का शुभ अवसरों पर आकर गाना बजाना और बधाई देना शुभ माना जाता है। समाज इनका ख़ुशी से स्वागत करता है और ऐसे अवसरों पर अड़ोसी-पड़ोसी जुट कर इनके साथ हास-परिहास भी करते हैं। ये एक स्वस्थ परंपरा है। प्रायः छोटे शहरों और कस्बों में किन्नरों के समूह कई पीढ़ियों तक अपने जजमान परिवारों से जुड़े रहते हैं और उनकी सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद देते हैं। देखा जाए तो सभी किन्नर संपन्न नहीं होते। वे अभावों में पलते हैं। उनकी आर्थिक, शैक्षिक या स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का उचित इंतज़ाम नहीं होता। फिर भी वे पारस्परिक सहयोग से अपना जीवन यापन कर लेते हैं। ऐसे में किन्नरों को नाचने गाने या भीख मांगने से हटा कर छोटे व्यवसायों या नौकरियों में लगाने की ज़िम्मेदारी, सरकार और समाज दोनों की है। जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। पर आपराधिक तरीके से जबरन वसूली करने वाले किन्नरों से परिवारों को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी स्थानीय पुलिस को तत्परता से निभानी चाहिए, जबकि ऐसा नहीं होता। इस समस्या को भी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है।   

Monday, April 27, 2026

सांसदों का सामूहिक पलायन: लोकतंत्र के लिए चेतावनी !

पिछले सप्ताह आम आदमी पार्टी के सात राजसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भाजपा में स्वतः विलय कर लिया। पार्टी की कुल 10 राजसभा सीटों में से दो-तिहाई से अधिक सांसदों का यह कदम संवैधानिक प्रावधान के तहत लिया गया, जिससे उन्हें अयोग्यता से बचने का रास्ता मिल गया। इनमें से छह पंजाब से चुने गए थे, जबकि एक  दिल्ली से। यह घटना न केवल आम आदमी पार्टी के लिए करारा झटका है, बल्कि पंजाब की सत्तासीन पार्टी के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रही है।


राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि आम आदमी पार्टी अब अपनी मूल विचारधारा से भटक गई है। लेकिन विपक्षी दलों और आम आदमी पार्टी ने इसे भाजपा का ‘ऑपरेशन लोटस’ करार दिया। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘पंजाब के साथ धोखा’ बताया। सवाल यह है कि क्या यह महज व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम है या पंजाब की राजनीति में बड़े बदलाव की शुरुआत?



पंजाब में आम आदमी पार्टी 2022 के विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से सत्ता में आई थी। भगवंत मान सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और रोजगार जैसे क्षेत्रों में कुछ उपलब्धियां गिनाती रही है। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक एक साल पहले यह सामूहिक पलायन पार्टी की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। इन सात सांसदों में चार प्रमुख पंजाबी चेहरे, हरभजन सिंह (क्रिकेटर), अशोक मित्तल (एलपीयू चांसलर), विक्रम साहनी और संदीप पाठक, का जाना न केवल संसदीय ताकत कम करता है बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी कमजोर करता है।



पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वॉरिंग ने पहले ही चेतावनी दी है कि केजरीवाल की पार्टी के 50 विधायकों तक का पलायन हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो पंजाब में सरकार अल्पमत में आ सकती है। भाजपा, जो पंजाब में अभी कमजोर है, को यह घटना बड़ा नैतिक और संगठनात्मक बल प्रदान करेगी। पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्वनी कुमार के अनुसार, यह भाजपा को अकाली दल के साथ गठबंधन की मेज पर मजबूत स्थिति देगा। पंजाब की राजनीति में ‘ऑपरेशन लोटस’ की सफलता से भाजपा की छवि मजबूत होगी और मतदाताओं में यह धारणा बनेगी कि केजरीवाल की पार्टी का ‘अंत’ शुरू हो चुका है।


दूसरी ओर, यह घटना पंजाब के किसान-मजदूर वोट बैंक को भी प्रभावित करेगी। उल्लेखनीय है कि आंदोलन से जन्मीं आम आदमी पार्टी की छवि को भ्रष्टाचार-मुक्त और आम आदमी की पार्टी के रूप में बनाया गया था। अब जब उसके प्रमुख चेहरे भाजपा में शामिल हो रहे हैं, तो जनता में निराशा फैल सकती है। पंजाब की राजनीति पहले से ही कांग्रेस, अकाली दल और आप पार्टी के त्रिकोणीय संघर्ष में फंसी है। इस पलायन से कांग्रेस को भी फायदा हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर विपक्षी एकता टूटने का खतरा बढ़ गया है।


इस घटना ने अन्य विपक्षी दलों, कांग्रेस, टीएमसी, सपा, बसपा आदि को स्पष्ट संदेश दिया है कि भाजपा केंद्र की एजेंसियों का इस्तेमाल कर विपक्ष को तोड़ने की रणनीति पर अडिग है। ‘ऑपरेशन लोटस’ अब सिर्फ कर्नाटक, महाराष्ट्र या हरियाणा तक सीमित नहीं रहा; यह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की जड़ों को हिला रहा है। दलों को समझना होगा कि बिना आंतरिक लोकतंत्र, मजबूत संगठन और वैचारिक स्पष्टता के वे टिक नहीं सकते। आम आदमी पार्टी जैसी युवा पार्टी का टूटना साबित करता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और संसाधनों की कमी पार्टियों को कमजोर बनाती है।


वहीं आम जनता के लिए संदेश और भी गंभीर है। जब भी कोई नेता ईडी/सीबीआई छापे के ठीक बाद पार्टी बदल लेता है, तो लोकतंत्र में विश्वास डगमगाता है। जनता सोचती है कि क्या ये नेता सच्चे सुधारक थे या सत्ता के लालची? पंजाब की जनता, जो पहले ही महंगाई, बेरोजगारी और ड्रग समस्या से जूझ रही है, अब राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो रही है। यह घटना राजनीति को एक ‘धंधा’ साबित करती है, जहां सिद्धांतों की जगह स्वार्थ हावी है। लेकिन एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि जनता अब ज्यादा सजग हो रही है। 2027 के चुनाव में मतदाता इन ‘ट्रैक्टरों’ को याद रखेंगे और वोट से जवाब देंगे।


यह घटना आम आदमी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में सत्ता संभाली, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर संगठन अभी भी कमजोर है। राघव चड्ढा जैसे चेहरे, जो पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता थे, का जाना आंतरिक कलह को उजागर करता है। केजरीवाल की ‘सुप्रीमो’ शैली पर सवाल उठ रहे हैं। अशोक मित्तल पर ईडी के छापे के महज 10 दिन बाद उनका पलायन संदेहास्पद है। यदि पार्टी में सुधार नहीं हुआ, तो दिल्ली में भी ‘डोमिनो इफेक्ट’ शुरू हो सकता है। 


वहीं अन्य दलों के लिए भी यह एक संकेत है। भारतीय राजनीति में ‘माइग्रेशन’ की संस्कृति बढ़ रही है। भाजपा की मजबूत केंद्रीय शक्ति का फायदा उठाकर छोटी पार्टियां टूट रही हैं। यह लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है। जब विपक्ष कमजोर होता है, तो सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता है। यह प्रवृत्ति ‘एक पार्टी प्रभुत्व’ की ओर ले जा रही है, जो बहुलवाद को नुकसान पहुंचाएगी।


चिंता की बात यह है कि यह प्रवृत्ति ईडी/सीबीआई जैसी एजेंसियों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाती है। जब ये संस्थाएं केवल विपक्ष पर सक्रिय नजर आती हैं और सत्ता पक्ष पर चुप रहती हैं, तो जनता में भरोसा कम होता है। यह लोकतंत्र की नींव, ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ को हिला देता है। कुछ मामलों में भ्रष्टाचार सच्चा हो सकता है, लेकिन टाइमिंग संदिग्ध है। इससे राजनीति में ‘कोऑर्शन’ (दबाव) की संस्कृति बढ़ती है। जनता के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सत्ता हासिल करने का यही तरीका है? यह ट्रेंड छोटे दलों को खत्म करने और राष्ट्रपति शासन जैसी स्थितियां पैदा करने का खतरा बढ़ाता है।


आम आदमी पार्टी के सांसदों का भाजपा में विलय स्वस्थ राजनीति को खतरे में डालता है। यह पार्टी की कमजोरियों को उजागर करता है। लेकिन इससे बड़ा सबक यह है कि भारतीय राजनीति में वैचारिक स्थिरता, आंतरिक लोकतंत्र और संस्थागत निष्पक्षता की जरूरत है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब पार्टियां सिद्धांतों पर टिकी रहें, न कि सत्ता के लालच में। यदि यह ट्रेंड जारी रहा, तो ‘आम आदमी’ की पार्टी का सपना ही टूट जाएगा। समय है कि सभी दल, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, आत्मचिंतन करें। अन्यथा, राजनीति सिर्फ ‘ऑपरेशन’ का खेल बनकर रह जाएगी। 

Monday, April 20, 2026

केंद्रीय सतर्कता आयोग: दंतहीन शेर या आशा की किरण?

सभी जानते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। सरकारी मशीनरी में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए 1964 में स्थापित केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) आज भी भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई का प्रमुख हथियार माना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में सीवीसी के पास लंबित मामलों की संख्या ने चिंता का विषय बना दिया है। सीवीसी की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट (जो 31 अगस्त 2025 को जारी की गई और 31 दिसंबर 2024 तक के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, सीबीआई द्वारा जांचे गए 7,072 भ्रष्टाचार के मामले अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से 379 मामले 20 वर्ष से अधिक पुराने हैं। 2,660 मामले 10 वर्ष से ज्यादा लंबित हैं। यह आंकड़ा न केवल न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति को दर्शाता है, बल्कि सीवीसी की निगरानी वाली पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करता है। विभागीय जांच, अनुशासनिक कार्यवाही और अभियोजन स्वीकृति में देरी के कारण आम नागरिक का भ्रष्टाचार विरोधी संस्थानों में विश्वास डगमगाता जा रहा है।



गौरतलब है कि सीवीसी स्वयं जांच एजेंसी नहीं है। यह शिकायतों की समीक्षा करता है, विभागीय मुख्य सतर्कता अधिकारियों (सीवीओ) को निर्देश देता है और सीबीआई को जांच सौंपता है। लेकिन वास्तविक कार्यवाही अन्य एजेंसियों पर निर्भर है। पहला कारण है मानव संसाधनों की कमी। सीवीसी के पास सीमित स्टाफ है, जबकि केंद्रीय मंत्रालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और बैंकों में हजारों मामले आते हैं। सीवीओ अक्सर अंशकालिक होते हैं और उनके पास अन्य जिम्मेदारियां भी होती हैं। दूसरा, प्रक्रियागत देरी। प्रारंभिक जांच से लेकर प्रमुख दंड की अनुशंसा तक कई चरण हैं। सीवीसी ने 2020 में समय-सीमा निर्धारित की थी, लेकिन मंत्रालय अक्सर अभियोजन स्वीकृति में देरी करते हैं। 2024 रिपोर्ट में ही 46 संगठनों से 200 मामले अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित बताए गए। 



तीसरा, अदालती लंबितता। भारत में कुल 5.5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। भ्रष्टाचार के मामले जटिल होते हैं। साक्ष्य इकट्ठा करना, गवाहों की उपलब्धता और राजनीतिक दबाव, आदि इन सबके कारण ट्रायल सालों तक खिंच जाते हैं। चौथा कारण संस्थागत। सीवीसी की सिफारिशें सलाहकारी होती हैं, बाध्यकारी नहीं। 2024 में 23 महत्वपूर्ण मामलों में विभागों ने सीवीसी की सलाह को कमजोर कर दिया या नजरअंदाज कर दिया। यह स्थिति ‘विनीत नारायण’ मामले (1998) में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद बनी हुई है, जिसके परिणामस्वरूप मौजूदा सीवीसी एक्ट, 2003 बना। कोर्ट ने सीवीसी को स्वायत्तता देने के लिए कहा था, लेकिन कानून में इसे पर्याप्त दांत नहीं दिए गए। नतीजा—सीवीसी को ‘दंतहीन शेर’ कहा जाने लगा।



सुप्रीम कोर्ट के ‘विनीत नारायण’ फैसले ने सीवीसी को ‘वैधानिक निकाय’ का दर्जा दिलाया। चयन समिति में प्रधान मंत्री, गृह मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल हैं, ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप रोका जा सके। लेकिन पी जे थॉमस मामले (2011) में कोर्ट ने ‘संस्थागत अखंडता’ पर जोर दिया। फिर भी आज सीवीसी को दंतहीन क्यों माना जाता है? क्योंकि कानून में सीवीसी को स्वतंत्र जांच का अधिकार नहीं दिया गया। यह सीबीआई पर निर्भर है, जो स्वयं राजनीतिक दबाव में आ सकती है। सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं, इसलिए विभाग अनुशासनिक कार्यवाही में अपनी मर्जी चला सकते हैं। सीवीसी की सीमा ‘ग्रुप ए’ अधिकारियों और पीएसयू तक सीमित है। मंत्रियों और सांसदों पर इसका अधिकार नहीं। संसाधनों की कमी, स्टाफ की अपर्याप्तता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इसे कमजोर बना दिया। ऐसे में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इरादे को कानून ने पूरा नहीं किया, नया गठन स्वायत्तता का दिखावा भर है।


सवाल उठता है कि समस्या जटिल है, लेकिन क्या समाधान संभव है? जहाँ चाह वहाँ राह, सीवीसी ने पहले ही ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया है। इसमें सभी विभागीय जांचों को सीवीसी पोर्टल पर अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाए और AI आधारित ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाए, ताकि हर चरण की समय-सीमा की निगरानी हो। सीवीसी की 2020 की गाइडलाइंस को कानूनी रूप दें, अभियोजन स्वीकृति 3 महीने में अनिवार्य हो। देरी पर विभागीय अधिकारियों पर दंड का प्रावधान हो। भ्रष्टाचार के मामलों के लिए विशेष अदालतें बढ़ाई जाएं और सीबीआई-सीवीसी मामलों को प्राथमिकता दी जाए। सीवीसी को अधिक टेक्निकल एग्जामिनर्स और जांच अधिकारियों की नियुक्ति की जाए। सीवीसी सिफारिशों को आंशिक रूप से बाध्यकारी बनाया जाए, जैसे प्रमुख दंड की अनुशंसा को केवल उच्च स्तरीय समिति ही बदल सके।


उल्लेखनीय है कि जब भी किसी विभाग से कुछ उम्मीद की जाती है तो वो हमेशा मानव संसाधनों की कमी का  बहन बनाते हैं। परंतु शायद सीवीसी जैसे बड़े संगठनों को इस बात की जानकारी नहीं है कि देश भर में सेवानिवृत अधिकारियों की एक अनूठी ताकत है जो अक्सर अनदेखी रह जाती है। गौरतलब है कि इन रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस, आईआरएस या इंजीनियरिंग व बैंकिंग सेवाओं के अधिकारियों के पास 30-40 वर्ष की सेवा का अमूल्य अनुभव है। वे विभागीय प्रक्रियाओं की बारीकियां जानते हैं। कौन सा नियम किस तरह का ‘लूपहोल’ पैदा करता है, फाइल कैसे घुमाई जाती है, टेंडर में घोटाला कैसे होता है। वे दस्तावेजों को देखकर तुरंत अनियमितताएं पकड़ लेते हैं, जो युवा अधिकारियों को मुश्किल लगती हैं। सेवानिवृत्त अधिकारी सीवीओ के रूप में या सलाहकार के रूप में काम कर सकते हैं। वे प्रशासनिक कार्यप्रणाली को खूब समझते हैं, इसलिए अनुशासनिक कार्यवाही में उचित सलाह दे सकते हैं। जो कि न्यायसंगत लेकिन सख्त साबित हो सकती है। सीवीसी को एक ‘रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स एडवाइजरी पैनल’ बनाना चाहिए, जहां अनुभवी अधिकारी पार्ट टाइम आधार पर जटिल मामलों की समीक्षा करें। इससे न केवल लंबितता कम होगी, बल्कि युवा स्टाफ को मेंटरशिप भी मिलेगी। उनकी निष्पक्षता और अनुभव सीवीसी को विश्वसनीय बनाएगा।


सीवीसी में लंबितता सिर्फ आंकड़ों की समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता की समस्या है। सुप्रीम कोर्ट के ‘विनीत नारायण’ के फैसले ने जो सपना देखा था, उसे पूरा करने के लिए सीवीसी एक्ट में संशोधन जरूरी है। सेवानिवृत्त नौकरशाहों को सक्रिय रूप से जोड़कर, डिजिटल ट्रैकिंग और बाध्यकारी सिफारिशों से सीवीसी को मजबूत बनाया जा सकता है। तभी भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और ‘दंतहीन शेर’ सच्चा शिकारी बनेगा। सरकार, न्यायपालिका और नागरिक समाज को मिलकर इस दिशा में कदम उठाने होंगे। अन्यथा, भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना अधूरा रह जाएगा। 

Monday, April 13, 2026

जनसेवा की नई मिसाल देता नेपाल का युवा मंत्रिमंडल !

नेपाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव आया जब 27 मार्च 2026 को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के नेतृत्व में बालेन शाह (बलेंद्र शाह) ने 36 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 15 सदस्यीय कैबिनेट का गठन किया। यह मंत्रिमंडल न सिर्फ नेपाल का सबसे युवा कैबिनेट है, बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी उच्च शैक्षणिक योग्यता के लिए वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन रहा है। इस मंत्रिमंडल के सदस्यों की औसत आयु मात्र 38.21 वर्ष है, दस मंत्री 40 वर्ष से कम उम्र के, पांच महिला मंत्री और 80 प्रतिशत से अधिक सदस्यों के पास स्नातकोत्तर या डॉक्टरेट की डिग्री। यह आंकड़े नेपाल की राजनीति के पारंपरिक चेहरे को पूरी तरह बदल रहे हैं। 


यह कैबिनेट 'जेन-ज़ी आंदोलन' के परिणामस्वरूप सत्ता में आई है। भ्रष्टाचार, पुरानी पार्टियों की नाकामी और युवाओं की मांगों को लेकर हुए आंदोलन ने आरएसपी को भारी बहुमत दिलाया। अब यह युवा टीम न सिर्फ नेपाल में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में 'दुनिया का सबसे युवा कैबिनेट' और 'सबसे शिक्षित मंत्रिमंडल' के रूप में प्रसिद्ध हो रही है। कई भारतीय अखबारों ने इसे 'जनरेशनल शिफ्ट' करार दिया है। विश्व स्तर पर इसकी सराहना हो रही है क्योंकि यह पारंपरिक राजनीति से हटकर योग्यता, तकनीकी विशेषज्ञता और समावेशिता पर आधारित है। यह दक्षिण एशिया का चमकता उदाहरण है, जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों के कैबिनेट अक्सर वरिष्ठ नेताओं पर निर्भर रहते हैं।


इस कैबिनेट की सबसे बड़ी ताकत इसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि है। प्रधानमंत्री बालेन शाह स्वयं सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक (पूर्वांचल विश्वविद्यालय) और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में एम.टेक (निट्टे मीनाक्षी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बेंगलुरु, भारत) हैं। वे काठमांडू के पूर्व मेयर और लोकप्रिय रैपर भी हैं। उनकी टीम में दो डॉक्टरेट धारक और दस स्नातकोत्तर सदस्य हैं। वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले (41 वर्ष, कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ) अर्थशास्त्र में पीएचडी (ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी), हार्वर्ड से एमपीए/आईडी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से स्नातक हैं। वे पूर्व में यूएनडीपी के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक सलाहकार और नेपाल की राष्ट्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी विशेषज्ञता आर्थिक सुधार, गरीबी उन्मूलन और सतत विकास में है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल (47 वर्ष) अमेरिका के विस्कॉन्सिन-मैडिसन से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिजपोर्ट से पॉलिटिकल इकोनॉमी में स्नातक हैं। वे 'टीच फॉर नेपाल' के सह-संस्थापक हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा सुधार का प्रमुख अभियान है।


शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा युवा एवं खेल मंत्री सस्मित पोखरेल (29 वर्ष) कैबिनेट के सबसे युवा सदस्य हैं। वे काठमांडू विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट एवं कानून में स्नातक हैं और पॉलिसी, गवर्नेंस एवं भ्रष्टाचार-निरोध पर मास्टर्स कर रहे हैं। वे बालेन के मेयर काल में शहरी नियोजन सलाहकार रह चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता (38 वर्ष) भारत के ग्वालियर से नर्सिंग में मास्टर्स और दिल्ली के एम्स से प्रशिक्षित हैं। सामान्य प्रशासन मंत्री प्रतिभा रावल (32 वर्ष) एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (चेन्नई) से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा रखती हैं। श्रम मंत्री दीपक कुमार साह (34 वर्ष) लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन से पीएचडी स्कॉलर, एलएसई से हेल्थ पॉलिसी में मास्टर्स और आईओएम से पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स रखते हैं।


महिला, बाल-बालिका एवं ज्येष्ठ नागरिक मंत्री सीता बादी (30 वर्ष) राजनीति विज्ञान में मास्टर्स हैं और बादी समुदाय की प्रतिनिधि के रूप में समावेशिता का प्रतीक हैं। कानून मंत्री सोबिता गौतम (30 वर्ष) राष्ट्रीय विधि महाविद्यालय से बीए एलएलबी हैं और संसदीय समितियों में सक्रिय रहीं हैं। भौतिक पूर्वाधार मंत्री सुनील लाम्सल (35 वर्ष) भी भारत से एम.टेक (स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग) हैं।


गौरतलब है कि ये योग्यताएं महज डिग्रियां नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव से जुड़ी हैं। यूएनडीपी, टीच फॉर नेपाल, आपदा राहत संगठन 'हामी नेपाल' और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में इन सभी की अहम भूमिका रही है। पांच महिला मंत्रियों का प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी (जैसे सीता बादी) समावेशिता को मजबूत करती है।


देखा जाए तो नेपाल का यह कैबिनेट अपने पड़ोसियों से अलग दिखता है। भारत के वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल में 71 सदस्य है, जिसमें 57 सदस्य स्नातक या उससे ऊपर हैं, लेकिन 11 सदस्य मात्र 12वीं पास हैं। कई मंत्री राजनीतिक अनुभव पर निर्भर हैं, जबकि युवा चेहरे कम हैं। वहीं चीन का मंत्रिमंडल अत्यधिक शिक्षित तकनीकी विशेषज्ञों (इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र) से भरा है, लेकिन उनकी औसत आयु 55-60 वर्ष के आसपास है और निर्णय प्रक्रिया केंद्रीकृत पार्टी संरचना पर आधारित है। बांग्लादेश के हालिया कैबिनेट में 46/50 सदस्य उच्च शिक्षा वाले हैं (तीन पीएचडी), लेकिन वहां भी वरिष्ठता और राजनीतिक वफादारी प्रमुख है।


नेपाल का कैबिनेट इन सभी से युवा, अधिक समावेशी और योग्यता-आधारित है। भारत और चीन की तुलना में यहां भ्रष्टाचार-विरोधी 'डिलीवरी बेस्ड गवर्नेंस' पर जोर है, जो पड़ोसियों में अक्सर कम देखा जाता है। हालांकि, कुछ विश्लेषक चेताते हैं कि इस मंत्रिमंडल के पास अनुभव की कमी एक चुनौती है। भारत की तरह बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था या चीन की तरह दीर्घकालिक नियोजन यहां अभी संभव नहीं, लेकिन पारदर्शिता और तेज निर्णय लेने की क्षमता नेपाल को लाभ दे सकती है।


केवल दो सप्ताह पुरानी यह सरकार पहले ही '100 सूत्री शासन सुधार एजेंडा' लागू कर चुकी है। पहली कैबिनेट बैठक में मंत्रालयों का पुनर्गठन, दक्षिण एशिया संघर्ष के प्रभाव से नेपाली प्रवासियों की सुरक्षा, ‘कार्की आयोग’ रिपोर्ट पर कार्रवाई और संविधान संशोधन पर चर्चा पत्र तैयार करने जैसे कदम उठाए गए। शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने पार्टी-आधारित छात्र संगठनों को समाप्त करने और स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता ने निजी अस्पतालों में 10 प्रतिशत मुफ्त बेड सुनिश्चित करने की घोषणा की है।


वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आर्थिक स्थिरता, पर्यटन विकास और बुनियादी ढांचे पर ध्यान दे रहे हैं। श्रम और स्वास्थ्य मंत्रियों की स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञता गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन में मदद करेगी। विदेश मंत्री शिशिर खनाल की पॉलिसी विशेषज्ञता नेपाल की कूटनीति को मजबूत करेगी। युवा बेरोजगारी घटाने, शिक्षा गुणवत्ता सुधारने, स्वास्थ्य पहुंच बढ़ाने और भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास पहले ही दिख रहे हैं। दैनिक प्रगति निगरानी प्रणाली लागू कर सरकार जवाबदेही सुनिश्चित कर रही है। हालांकि, चुनौतियां यहाँ भी हैं, जैसे कि पहाड़ी इलाकों में पहुंच, संसाधन सीमाएं और पुरानी पार्टियों का विरोध। फिर भी, यह कैबिनेट जनता की उम्मीदें पूरी करने की राह पर है।


कुल मिलाकर देखा जाए तो नेपाल का यह ‘जेन-ज़ी’ कैबिनेट न सिर्फ दक्षिण एशिया के लिए मिसाल है, बल्कि विकासशील देशों को सिखाता है कि योग्यता और युवा ऊर्जा राजनीति को बदल सकती है। यदि यह टीम अपने 100 सूत्री एजेंडा को ईमानदारी से लागू कर पाई, तो नेपाल आर्थिक समृद्धि, सामाजिक न्याय और सुशासन का नया मॉडल बन सकता है। 

Monday, April 6, 2026

राघव चड्ढा विवाद: लोकतंत्र की परीक्षा या आंतरिक अनुशासन?

हाल ही में आम आदमी पार्टी (आप) के राजसभा सांसद राघव चड्ढा और पार्टी नेतृत्व के बीच खुला विवाद सामने आया। 2 अप्रैल को पार्टी ने राजसभा सचिवालय को पत्र लिखकर चड्ढा को पार्टी के उपनेता पद से हटाने और उनकी जगह पंजाब के सांसद अशोक मित्तल को नियुक्त करने की सूचना दी। साथ ही, पार्टी ने अनुरोध किया कि चड्ढा को पार्टी की ओर से बोलने का समय न दिया जाए। अगले दिन चड्ढा ने ‘साइलेंस्ड, नॉट डिफीटेड’ शीर्षक से एक वीडियो जारी कर जवाब दिया। उन्होंने दावा किया कि वे हमेशा आम आदमी के मुद्दे उठाते रहे, लेकिन पार्टी उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। यह घटना पार्टी के आंतरिक मतभेदों को सार्वजनिक रूप से उजागर करती है और सवाल उठाती है कि क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या सख्त अनुशासन का मामला। 



राघव चड्ढा अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाते थे। लेकिन पिछले एक साल से रिश्तों में दरार दिखने लगी थी। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान चड्ढा विदेश में आंखों की सर्जरी करा रहे थे और पार्टी के कार्यक्रमों में अनुपस्थित रहे। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को हालिया छूट मिलने पर भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई बड़ा बयान नहीं दिया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह अनुशासनहीनता और पार्टी लाइन से विचलन माना गया। वहीं चड्ढा ने संसद में हवाई अड्डों पर महंगे खाने, डिलीवरी पार्टनर्स की समस्याएं, टोल प्लाजा और बैंक चार्जेस, गिग वर्कर्स के अधिकार जैसे मुद्दे उठाए, जिन्हें उन्होंने ‘आम आदमी’ के हितों से जोड़ा। लेकिन पार्टी ने इन्हें ‘सॉफ्ट पीआर’ करार दिया।



आम आदमी पार्टी के नेताओं ने इस विवाद पर बयान भी दिए। सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि चड्ढा बीजेपी से डरते हैं, विरोधी दलों के वॉकआउट में शामिल नहीं होते और पंजाब के मुद्दों पर चुप रहते हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने उन्हें ‘कम्प्रोमाइज्ड’ बताया और कहा कि जब पार्टी एमएसपी या केंद्र से फंडिंग जैसे बड़े मुद्दे उठाती है, तब चड्ढा छोटे-छोटे मुद्दों पर फोकस करते हैं। आतिशी और अनुराग धंडा ने भी यही स्वर दोहराया कि संसद में सीमित समय में ‘समोसे सस्ते’ जैसे विषयों पर बोलना राष्ट्रहित से दूर है। पार्टी का तर्क है कि एक छोटी पार्टी के पास संसद में बोलने का सीमित कोटा होता है, इसलिए उसे केंद्र सरकार के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए, न कि ‘सॉफ्ट’ मुद्दों पर।



इस पर चड्ढा ने अपने वीडियो में इन आरोपों का सीधा जवाब दिया। उन्होंने पूछा, क्या आम आदमी के मुद्दे उठाना अपराध है? मैंने हवाई अड्डे के खाने की महंगाई, गिग वर्कर्स की दुर्दशा, अशुद्ध भोजन और लूटखसोट के मुद्दे उठाए, जिससे आम आदमी को फायदा हुआ। पार्टी को इससे क्या नुकसान हुआ? उन्होंने पार्टी को चेतावनी दी, मेरे मौन को हार मत समझिए। मैं वह नदी हूं जो समय आने पर बाढ़ बन जाती है। यह बयान न केवल व्यक्तिगत दर्द जाहिर करता है, बल्कि पार्टी में असहमति के अधिकार पर भी सवाल खड़ा करता है।



वहीं अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया ने इस विवाद को और भी रंग दिया है। भाजपा ने इसे आम आदमी पार्टी का आंतरिक मामला बताया, लेकिन चड्ढा को बोलने से रोकने को ‘अत्यधिक आपत्तिजनक और तानाशाही’ करार दिया। कांग्रेस ने इसे पार्टी में दरार का सबूत माना। पंजाब कांग्रेस प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारींग ने कहा कि चड्ढा पहले से ही पार्टी से ‘अलग’ दिखते थे, खासकर केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय उनकी अनुपस्थिति को देखते हुए। कुछ कांग्रेस नेताओं का अनुमान है कि चड्ढा पार्टी छोड़कर कहीं और जा सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी पार्टी की एकता पर सवाल उठाए हैं। कुल मिलाकर, विपक्षी दलों ने इस घटना को पार्टी की कमजोरी के रूप में पेश किया है।


कुछ विश्लेषक मानते हैं कि चड्ढा पार्टी की आक्रामक एंटी-बीजेपी रणनीति से सहमत नहीं हैं। वे ज्यादा मुद्दा-आधारित और कम व्यक्तिगत हमले वाले रुख अपनाते रहे, जो आम आदमी पार्टी की मौजूदा जरूरत (केंद्र सरकार पर सीधा हमला) से मेल नहीं खाता। दूसरी अटकल यह है कि चड्ढा की बढ़ती लोकप्रियता और मीडिया कवरेज केजरीवाल के लिए खतरा बन गई। स्वाती मालीवाल जैसी पिछली घटनाओं की घटना की याद दिलाते हुए कुछ राजनैतिक पंडित कहते हैं कि आम आदमी पार्टी में ‘केजरीवाल से ज्यादा चमक’ बर्दाश्त नहीं की जाती। अनुशासन और पंजाब-केंद्रित रणनीति भी एक कारण हो सकता है, क्योंकि चड्ढा पंजाब से सांसद हैं लेकिन पंजाब के बड़े मुद्दों (जैसे एमएसपी) पर कम सक्रिय रहे। कुछ स्रोतों का दावा है कि चड्ढा को बीजेपी ‘प्रमोट’ कर रही है या वे स्वतंत्र रूप से राजनीति करने की सोच रहे हैं। हालांकि, इनमें से कोई भी पुष्टि नहीं हुई है। पार्टी ने इसे ‘रूटीन संगठनात्मक बदलाव’ बताया है, लेकिन टाइमिंग और बोलने पर रोक ने संदेह बढ़ा दिया है।


देखा जाए तो यह एक संसदीय लोकतंत्र में पार्टी अनुशासन बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल है। क्या एक सांसद को पार्टी कोटा से बोलने का अधिकार पार्टी नेतृत्व के विवेक पर निर्भर होना चाहिए? संविधान और संसदीय परंपरा में सांसद पार्टी से कहीं ज़्यादा जनता का प्रतिनिधि है। लेकिन वास्तविकता में व्हिप और पार्टी लाइन बाध्यकारी हैं। आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी जो स्वयं ‘स्वराज’ और पारदर्शिता का नारा देती रही, में यह घटना उसके सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। इसके साथ ही पार्टी की आंतरिक संरचना पर भी कई सवाल उठते हैं। केजरीवाल-केंद्रित पार्टी में असहमति को कैसे हैंडल किया जाता है? पार्टी बनने के समय जो-जो बड़े व चर्चित चेहरे केजरीवाल के साथ थे वे एक-एक करके अलग हुए। अब राघव चड्ढा जैसी घटनाएं पार्टी की ‘एकता’ की छवि को धक्का पहुंचाती हैं।


आम आदमी पार्टी जैसे दलों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत रहने के लिए आंतरिक एकता जरूरी है। चड्ढा जैसे युवा, शिक्षित और मीडिया-सेवी नेता पार्टी की छवि को आधुनिक बनाते थे। उनका साइडलाइन होना युवा नेताओं को निरुत्साहित कर सकता है। चड्ढा ने जो मुद्दे उठाए वे वाकई आम आदमी से जुड़े थे, महंगाई, श्रमिक अधिकार, उपभोक्ता शोषण। लेकिन राजनीति में संसद सीमित समय में प्राथमिकता ‘बड़े राजनीतिक हमले’ को दी जाती है। क्या यह ‘सॉफ्ट’ बनाम ‘हार्ड’ पॉलिटिक्स का टकराव है? दोनों पक्षों में सच्चाई तो है, एक तरफ पार्टी की रणनीतिक जरूरत, दूसरी तरफ संसद को जन-समस्याओं का मंच बनाने का प्रयास।


इस विवाद से भारतीय राजनीति को दो सबक मिलते हैं। पहला, कोई भी पार्टी कितनी भी लोकप्रिय क्यों न हो, आंतरिक लोकतंत्र के बिना टिक नहीं सकती। दूसरा, संसद में सांसदों की आवाज को पार्टी हित से ऊपर रखने की जरूरत है। राघव चड्ढा का भविष्य अनिश्चित है। वे पार्टी में रहकर संघर्ष कर सकते हैं, इस्तीफा दे सकते हैं या स्वतंत्र रूप से जन-मुद्दों पर बोलते रह सकते हैं। पार्टी के लिए यह आत्म-चिंतन का अवसर है। अगर पार्टी अपनी छवि ‘आम आदमी’ की रखना चाहती है, तो उसे अपने सांसदों की जन-केन्द्रित आवाज को दबाने के बजाय मजबूत करना चाहिए। दोनों पक्षों को संयम बरतना चाहिए। जनता देख रही है कि क्या आम आदमी पार्टी अपनी स्थापना के सिद्धांतों पर खरी उतरती है या सत्ता के खेल में फंस जाती है। भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी घटनाएं परीक्षा हैं। उम्मीद है कि यह विवाद संवाद का रास्ता खोलेगा, न कि और विभाजन का। 

Monday, March 30, 2026

आ अब लौट चलें !

जो लोग एक्स (ट्विटर) पर गंभीर विषयों को तलाशते रहते हैं उन्हें पता है कि किस तरह बाजारू शक्तियां हमारे दैनिक जीवन पर शिकंजा कसती जा रही हैं। हमारे खाद्यान, सब्ज़ियाँ, फल व दूध ही नहीं, हमारी दवाईयां और वैक्सीन तक सब पर इन ताकतों का क़ब्ज़ा है। इनका उद्देश्य ना तो हमें स्वस्थ रखना है और ना ही सुखी। अरबों खरबों रुपये का मुनाफा कमाना ही इनका उद्देश्य होता है। इनके लिए हम सब प्रयोगशाला के जानवर हैं, जिनपर ये लगातार खतरनाक परीक्षण करते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ताना-बना इस तरह बुना जाता है कि दुनिया के तमाम देशों का नेतृत्व इन ताकतों के चंगुल में फसा रहे और अपनी प्रजा के हितों का बलिदान करके भी इनके मुनाफ़े बढ़ाने में मदद करे। इन ताकतों का मुख्य केंद्र है अमरीका। ये सर्वविदित है कि अमरीका की शस्त्र उद्योग लॉबी अमरीकी शासकों को मोहरा बना कर दुनिया भर में युद्ध करवाती रहती है। जिससे उसका माल बिकता रहे। इन ताकतों के आगे अमरीका का सभ्य और सुसंस्कृत समाज भी लाचार है। ‘एपस्टीन फाइल्स’ में जिस क्रूर, पाशविक प्रवृत्तियों का खुलासा हुआ है उसके बाद अमरीका के तमाम मशहूर बड़े लोग जेल के सीखचों के पीछे होने चाहिए थे, पर वहाँ ऐसा नहीं हो रहा। गोस्वामी तुलसीदास जी लिख गए हैं कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं। 



जिस तरह के संकट और महामारियां अब लगातार हमारे जनजीवन पर बार-बार हमला करने लगी हैं, उससे यह स्पष्ट है कि हमारा और हमारी अगली पीढ़ियों का भविष्य अंधकार मय है। राष्ट्र का ‘सकल घरेलू उत्पादन’ या आर्थिक वृद्धि की दर उस राष्ट्र के लोगों के सुखी और स्वस्थ होने का पैमाना नहीं होते। ये आंकड़े उन्हें मुट्ठी भर लोगों को हर्षित करते हैं जो देश के तीन चौथाई संसाधनों पर क़ब्ज़ा किए बैठे हैं। अगर लोगों की खुशहाली देखना है तो हमें पड़ोसी देश भूटान की ओर रूख करना पड़ेगा। जो अपनी प्रगति को ‘सकल घरेलू उत्पादन’ के पैमाने पर नहीं बल्कि ‘सकल घरेलू उल्लास’ (हैप्पीनेस इंडेक्स) के पैमाने पर नापता है। हमें अपने विकास की दिशा और दशा बदलनी चाहिए। देश के 5.5 लाख गांवों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। जिससे आम भारतीय बाजारू शक्तियों के मकड़ जाल से बच कर सुखी और स्वस्थ जीवन जी सके।  



खाड़ी के देशों में चल रहा भयानक युद्ध, उससे निरंतर बढ़ता ऊर्जा संकट और वायु में घुलता ज़हर पूरी दुनिया के लिए हर दिन चिंता बढ़ा रहा है। इसका बुरा असर अर्थव्यवस्था और रोज़गार पर भी पड़ रहा है। समस्या भयावय होती जा रही है। हर घर में अनिश्चितता और हताशा बढ़ने लगी है। कुकिंग गैस पर से निर्भरता हटा कर गोबर के कंडों और लकड़ी पर लौटना पड़ सकता है। क्यों न इस दिशा में एक नई पहल की जाए। सनातन हिन्दू संस्कृति में गाय को माँ माना जाता है। धर्म शास्त्र कहते हैं कि गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है। गाय का दूध, उससे बना दही, छाछ, पनीर व घी स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। देशी गाय के गोबर और मूत्र के गुण वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो चुके हैं। सदियों से हर सनातनी के घर गौ पालन की प्रथा थी। पर शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को बहुत तेज़ी से नष्ट किया है। गौ वंश और कृषि आधारित जीवन आम भारतीय को स्वस्थ और सुखी रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ है। गत 79 वर्षों में हमारी सरकारों ने अगर इस अनुभव का लाभ उठाया होता और आर्थिक विकास के मॉडल को इस तरह दिशा दी होती की गाँव का जीवन आत्मनिर्भर बनता तो शहरीकरण और उससे पैदा हुई हज़ारों चुनौतियाँ आज हमारे सामने मुँह बाय न खड़ी होती। गाँव की लक्ष्मी गाँव में रहती और गाँव का युवा गाँव में ही रोज़गार पाता तो करोड़ों भारतवासियों को गंदी बस्तियों में नारकीय जीवन न जीना पड़ता। 



मुझे लगता है कि अगर गौ रक्षा के मामले में एक नई और समेकित सोच को केंद्र में रखते हुए विकास का मॉडल तैयार किया जाए तो गौ वंश और भूमिहीन परिवारों का बहुत कल्याण हो सकता है। ये कोरी कल्पना नहीं है। इस दिशा में हमने एक छोटा सा प्रयोग 20 बरस पहले मथुरा में करके देखा था। जिसके सकारात्मक परिणाम आए। हम इसे आगे इसलिए नहीं चला पाए क्योंकि हमारी प्राथमिकता ब्रज के कृष्ण कालीन सरोवरों और वनों को बचाने की थी। ये मॉडल बहुत सरल है। देश के हर गांव में चरागाह की काफ़ी भूमि हुआ करती थी। वोटों की राजनीति ने उसकी बंदरबाँट कर दी। फिर भी देश में 10,210,000 हेक्टर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है। जो देश के कुल भौगौलिक क्षेत्र की 3-4 फ़ीसद है। हर गाँव में अनेक भूमिहीन परिवार होते हैं। जिन्हें ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं चला कर, साल के कुछ दिन सरकार रोज़गार देती है। हर ज़िले में और उसके गाँवों में ऐसे तमाम पढ़े-लिखे सक्षम नौजवान हैं जो सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं। होना यह चाहिए कि गाँव के भूमिहीन परिवारों की समिति बना कर उन्हें चरागाहों की भूमि पर चारा उगाने के काम में लगाया जाए। ये चारा फिर हर उस भूमिहीन परिवार को दिया जाए जिसे दानदाता और सरकार नक़द दान की जगह स्वस्थ देशी नस्ल की गाय निशुल्क उपलब्ध कराए। ये परिवार चरागाह में मेहनत करके आय प्राप्त करे और मुफ्त के चारे से अपने गौ वंश की सेवा करके उसके दुग्ध उत्पादन से अपने परिवार का पालन-पोषण करे और स्वस्थ जीवन जी सके। आज गाँव बच्चों के मुँह में दूध नहीं जाता। गाँव की छोड़िये देश के महानगरों तक में नकली दूध, घी, पनीर आदि का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। हम शहरी लोग ही दूध के नाम पर अपने बच्चों को ज़हर पिला रहे हैं। आज देश में जितना दूध पैदा हो रहा है उससे कई गुना उसकी खपत है। ऐसे में ये बकाया दूध कहाँ से आ रहा है? 



दूध के नाम पर क्या पिलाया जा रहा है, इसकी चिंता किसी भी सरकार को नहीं है। छापे पड़ते हैं, नक़ली माल पकड़ा जाता है, खबर छपती है और मामले दबा दिए जाते हैं। इसलिए इस पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। हमने जब ये प्रयोग मथुरा में किया तो हमने दानदाताओं से कहा कि वे एक गाँव की चरागाह पर चारा उगाने में आर्थिक मदद करें और किसी को गौ सेवा के नाम पर धन का दान न करें। अपेक्षा के विपरीत हमें ऐसे अनेक उदारमना दानदाता मिल गए और उस गाँव के समर्पित नौजवान भी। जिन्होंने इस प्रयोग को सफल बनाने में सहयोग किया। हमारा प्रयोग तो बहुत छोटे स्तर का था। पर आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर और अमरीका में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोटे वेतन की नौकरियां छोड़ कर कुछ नौजवान मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने हज़ारों ग़रीबों की ज़िंदगी खुशहाल बना दी और इस प्रक्रिया से उत्पन्न गोबर की खाद से बंजर पड़ी ज़मीनों में फलों के बड़े-बड़े बगीचे लगा दिए हैं। शुरू में उनका उपहास करने वाले और उनके रास्ते में रोड़े अटकाने वाले ताक़तवर लोग, नेता और अफसर अब उनके सामने हथियार डाल चुके हैं और उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। आवश्यकता है एक ईमानदार और उदार सोच की।