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Monday, August 17, 2026

अपना शहर स्वच्छ रखने की ज़िम्मेदारी हमारी!

बरसात शुरू होते ही शहरों की गलियों-मोहल्लों में पानी जमा होना शुरू हो जाता है। मौसम विभाग अगर सही अनुमान लगाता है तो मूसलाधार बारिश के अनुमान के बावजूद देश के हर शहर में बरसात के गंदे पानी के तालाबों के बीच नारकीय जिंदगी जीने को मजबूर क्यों हो जाते हैं? हर साल यही कहानी दोहराई जाती है। लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी क्या केवल सरकार की है? क्या नागरिकों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं? क्या कारण हैं कि हर साल मानसून में देश के कई शहर नदी नालों में तब्दील हो जाते हैं?  

सरकार की बात करें तो इसके तीन बड़े कारण हैं। पहला, बिना योजना के बसी कॉलोनियाँ और प्रशासन की आँख मूँदकर दी गई अनुमति। सड़क, नाली, सीवर... कुछ भी सही न हो तो भी कॉलोनी पास। दूसरा, नालियों और सीवर में ठोस कचरा जमा होना, क्योंकि स्थानीय निकाय अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाते। तीसरा और सबसे खतरनाक, हर दो-तीन साल में सड़कों की ऊँचाई बढ़ा देना। जिससे आसपास के मकानों का तल हमेशा नीचे होता जाता है और पानी भराव की मुख्य वजह बन जाता है।



पहले दो कारणों पर तो हर साल मीडिया में शोर मचता रहता है। लेकिन सड़क का बार-बार ऊँचा होना कोई नहीं पूछता। क्यों? क्योंकि जितनी मोटी सड़क बिछाई जाएगी, ठेकेदार और इंजीनियरों का मुनाफा उतना ही बढ़ेगा। पहली बार अच्छी गुणवत्ता की सड़क बना दी जाए तो बार-बार बनाने की जरूरत ही न पड़े। थोड़े-बहुत पैचवर्क से काम चल सकता है, वहाँ भी पूरी नई सड़क डाल दी जाती है। बिना इस बात का लिहाज किए कि सड़क के दोनों तरफ रहने वाले आम लोगों की इतनी हैसियत नहीं होती कि वे हर दो साल में अपने घर का फर्श ऊँचा करा लें।



यदि विदेशों से तुलना की जाए तो एक बार भी ऐसा नहीं देखा कि विदेशों की किसी कॉलोनी की सड़क अचानक ऊँची हो गई हो या किसी मकान का फर्श सड़क से नीचे हो गया हो। सौ साल पुराने मकानों में भी यह समस्या नहीं है। न सड़क का स्तर बढ़ा, न घर का फर्श नीचा हुआ। तो हमारे इंजीनियरों की अक्ल पर क्या पत्थर पड़ गए हैं? या समझते तो हैं, लेकिन रिश्वत की हवस में करोड़ों लोगों की जिंदगी में हर दो-चार साल मुसीबत खड़ी कर देते हैं।


लेकिन सिर्फ सरकार को कोसना काफी नहीं। हमें खुद को भी आईना दिखाना होगा। अवैध निर्माण, मानकों से ज्यादा मंजिलें, नालियों में कचरा फेंकना, ये सब हम खुद करते हैं। ग्रामीण जीवन में जो सामूहिक जिम्मेदारी की भावना थी, शहर आकर हम भूल गए। कहने को शहरी हैं, लेकिन व्यवहार जंगली जैसा।



आजकल सोशल मीडिया पर कुछ रील्स वायरल हो रही हैं। उनमें आम नागरिक दिखते हैं जो हाथ में फावड़ा-झाड़ू लेकर सड़क पर खड़े हैं। ये लोग जल भराव वाली सड़कों पर नालियों से प्लास्टिक, पॉलीथीन, गंदगी निकालते हुए देखें जाते हैं। कोई सरकारी विभाग का इंतजार नहीं कर रहा। खुद अपना इलाका साफ कर रहे हैं ताकि बारिश का पानी रुक न जाए। ये छोटी-छोटी कोशिशें ही असल बदलाव ला सकती हैं।


ज़रूरत है तो संगठित होने की। हम संबंधित अधिकारियों से सवाल पूछें। उनसे पूछें कि सड़क का स्तर हर दो साल में क्यों बढ़ाया जाता है। और अगर वे जवाब न दे पाएँ तो दबाव बनाएँ कि सड़क को उसके मूल स्तर पर लाया जाए।



आज जरूरत है कि हम उन वायरल रील्स वाले नागरिकों से सीखें। ज़रूरत पड़ने पर खुद निकलकर नालियाँ साफ करें, कचरा न फेंकें, और साथ मिलकर प्रशासन पर दबाव बनाएँ। समस्या तभी घटेगी, जब हम अपनी उदासीनता छोड़कर खुद आगे बढ़ेंगे।


सोचिए, अगर हर मोहल्ले में सिर्फ दस-बारह लोग नियमित रूप से नालियों की सफाई करें या सरकारी विभाग पर साफ़-सफ़ाई का दबाव बनाएं तो क्या होगा? पानी का बहाव खुला रहेगा, मच्छर कम पैदा होंगे, बीमारियाँ घटेंगी और सबसे बड़ा फायदा, घरों में पानी घुसने का खतरा काफी हद तक कम हो जाएगा। वायरल रील्स में जो लोग दिख रहे हैं, वे कोई सुपरहीरो नहीं हैं। वे सामान्य नौकरीपेशा, दुकानदार, छात्र हैं। उन्होंने सिर्फ यह तय किया कि इंतजार करने से बेहतर है खुद काम करना। यही रवैया हमें अपनाना होगा।


एक और महत्वपूर्ण बात। सड़क की ऊँचाई बढ़ाने की समस्या सिर्फ पानी भराव तक सीमित नहीं है। जब सड़क ऊँची हो जाती है तो घर के दरवाजे-खिड़कियाँ सड़क के स्तर से नीचे आ जाते हैं। इससे घर में नमी बढ़ती है, दीवारें गीली रहती हैं, बिजली के तार खतरे में पड़ जाते हैं और बच्चों-बुजुर्गों के लिए घर से निकलना भी मुश्किल हो जाता है। कई परिवारों को मजबूरन घर का फर्श ऊँचा करवाना पड़ता है, जिसमें लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। यह खर्च आम आदमी की जेब पर भारी पड़ता है, जबकि जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारी मजे से मुनाफा कमाते रहते हैं।


सोशल मीडिया आज सबसे ताकतवर हथियार है। अपने इलाके की सड़क की ऊँचाई का फोटो-वीडियो लें, पुराने और नए स्तर की तुलना दिखाएँ, और पोस्ट करें। स्थानीय विधायक, पार्षद और नगर निगम के अधिकारियों को टैग करें। जब सैकड़ों लोग एक साथ आवाज उठाएँगे तो प्रशासन को जवाब देना ही पड़ेगा। साथ ही, मोहल्ला स्तर पर सफाई अभियान शुरू करें। रविवार की सुबह दो घंटे निकालकर नालियाँ साफ करना कोई बड़ी बात नहीं। यह छोटी सी मेहनत साल भर की परेशानी बचा सकती है।


याद रखें, सरकार और प्रशासन तभी जागते हैं जब नागरिक जाग जाते हैं। अगर हम सिर्फ कोसते रहे और खुद कुछ न किया, तो अगले साल फिर वही पानी, वही गंदगी और वही शिकायतें होंगी। लेकिन अगर हमने उन वायरल रील्स वाले नागरिकों की तरह जिम्मेदारी संभाली, तो बदलाव जरूर आएगा। नाली साफ करना शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व की बात है। क्योंकि यही असली देशभक्ति है, अपने आसपास को साफ और सुरक्षित रखना। समय आ गया है कि हम सिर्फ शिकायत न करें, बल्कि समाधान का हिस्सा बनें।

Monday, October 20, 2025

धरातल पर कैसे उतरे ‘स्वदेशी’ आंदोलन?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधनों में ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘हर घर स्वदेशी’ की अपील के जरिए आम जनता से भारतीय वस्तुओं को अपनाने का आग्रह किया है। इसका उद्देश्य आर्थिक आत्मनिर्भरता, देशी उद्योगों व रोजगार बढ़ाना और भारत के आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में एक मजबूत कदम उठाना है। इस अभियान के ज़रिए  देशभर में युवाओं, महिलाओं, व्यापारियों सहित सभी वर्गों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। जिसमें 20,000 से अधिक ‘आत्मनिर्भर भारत संकल्प अभियान’, 1,000 से ज्यादा मेले और 500 ‘संकल्प रथ’ यात्राएँ आयोजित  करने का भाजपा का कार्यक्रम है। 

भाजपा और संघ के कार्यकर्ता इन दिनों इस ‘स्वदेशी’ अभियान को मजबूती से आगे बढ़ाने में जुटे हैं। अगले तीन महीने में वे लोगों को भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करेंगे। जिससे आज़ादी के आंदोलन में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए स्वदेशी व स्वावलंबन के ऐतिहासिक अभियान को फिर से स्थापित किया जा सके।


इसी क्रम में पिछले दिनों एक दिवाली मेले के दौरान दक्षिण दिल्ली के महरौली और वसंत कुंज क्षेत्र के बीजेपी विधायक गजेंद्र यादव ने उपस्थित जन समुदाय से स्वदेशी को अपनाने की अपील की। विडंबना देखिए कि जिस मंच से श्री यादव पूरी गंभीरता से ये अपील कर रहे थे उसी मंच के सामने, मेले के आयोजकों ने, चीन के बने खिलौनों की दुकानें सजा रखी थीं और विदेशी कारों के दो मॉडलों को इस मेले में बिक्री के लिए रखवाया हुआ था। आम जीवन में ऐसा विरोधाभास हर जगह देखने को मिलेगा। क्योंकि पिछले चार दशकों में शहरी भारतवासी अपने दैनिक जीवन में ढेरों विदेशी उत्पाद प्रयोग करने का आदि हो चुका है। फिर भी बीजेपी का हर सांसद, विधायक और कार्यकर्ता इस अभियान को उत्साह से चला रहा है। उनका ये प्रयास सही भी है क्योंकि दीपावली पर देश भर के हिंदुओं द्वारा भारी मात्र में खरीदारी की जाती है। पिछले दो दशकों से क्रमशः चीनी माल ने भारत के बाजारों को अपने उत्पादनों से पाट दिया है। 


दीवाली पर लक्ष्मी पूजन के लिए गणेश-लक्ष्मी जी के विग्रह अब चीन से ही बन कर आते हैं। पटाखे और बिजली की लड़ियाँ भी अब चीन से ही आती हैं। इसी तरह राखियां, होली के रंग पिचकारी, जन्माष्टमी के लड्डू गोपाल व अन्य देवताओं के विग्रह भी वामपंथी चीन बना कर भेज रहा है, जो भगवान के अस्तित्व को ही नकारता हैं। ये कितनी शर्म और दुर्भाग्य की बात है। इससे हमारे कारीगरों और दुकानदारों के पेट पर गहरी लात पड़ती है। उधर अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लागू की गयीं बेहूदा आयात शुल्क दरों को देखकर भी हमें जागना होगा । हमें अपने उपभोग के तरीकों को बदलना होगा। इसलिए जहाँ तक संभव हो हम भारत में निर्मित वस्तुओं का ही प्रयोग करें। 

किसी भी अभियान को प्रचारित करना आसान होता है, जो कि अखबारों और टीवी विज्ञापनों के ज़रिए किया जा सकता है। पर उस अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देश की जनता ने उसे किस सीमा तक आत्मसात किया। अब मोदी जी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को ही ले लीजिए। जितना इस अभियान का शोर मचा और प्रचार हुआ उसका 5 फ़ीसदी भी धरातल पर नहीं उतरा। भारत के किसी भी छोटे बड़े शहर, गांव या कस्बे में चले जाइए तो आपको गंदगी के अंबार पड़े दिखाई देंगे। इसलिए इस अभियान का निकट भविष्य में भी सफल होना संभव नहीं लगता। क्योंकि जमीनी चुनौतियां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। स्वदेशी अभियान की सफलता भी जन-जागरण, सतत् निगरानी और व्यवहार परिवर्तन पर निर्भर करती है। अगर आम नागरिक इसमें सक्रिय भूमिका निभाएँ तभी यह आंदोलन सफल होगा।

निसंदेह ‘स्वच्छ भारत अभियान’ मोदी जी की एक प्रशंसनीय पहल थी। पहली बार किसी प्रधान मंत्री ने हमारे चारों ओर दिनों-दिन जमा होते जा रहे कूड़े के ढेरों की बढ़ती समस्या के निस्तारण का एक देश व्यापी अभियान छेड़ा था। उस समय बहुत से नेताओं, फिल्मी सितारों, मशहूर खिलाड़ियों व उद्योगपतियों तक ने हाथ में झाड़ू पकड़ कर फ़ोटो खिंचवा कर इस अभियान का श्रीगणेश किया था। पर सोचें आज हम कहाँ खड़े हैं?

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी सफाई व्यवस्था बनाना अब भी एक बड़ी चुनौती है। कचरा पृथक्करण, पुनः उपयोग और रीसायक्लिंग की जागरूकता में अपेक्षाकृत कमी दिखती है। कुछ जगहों पर शौचालयों के रख-रखाव, जल आपूर्ति और व्यवहार परिवर्तन को लेकर समस्याएं बनी हुई हैं। इसलिए अभियान के उद्देश्य और जमीनी सच्चाई में अंतर बना हुआ है और अनेक स्थानों पर पुराने तरीकों का पालन अब भी हो रहा है।

दिल्ली हो या देश का कोई अन्य शहर यदि कहीं भी एक औचक निरीक्षण किया जाए तो स्वच्छ भारत अभियान की सफलता का पता चल जाएगा। यदि इतने बड़े स्तर शुरू किए गए अभियान की सफलता अगर काफ़ी कम पाई जाती है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? निसंदेह स्थानीय निकाय जिम्मेदार हैं। किंतु हम सब नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं है। उल्लेखनीय है कि यदि हम नागरिक किसी साफ़ सुथरे मॉल या अन्य स्थान पर जाते हैं तो सभी नियमों का पालन करते हैं। कचरे को केवल कूड़ेदान में ही डालते हैं। इस तरह हम एक साफ़ सुथरी जगह को साफ़ रखने में सहयोग अवश्य देते हैं। लेकिन ऐसा क्या कारण है कि जहाँ किसी नियम को सख़्ती से लागू किया जाता है तो हम पूरा सहयोग देते हैं। परंतु जहाँ कहीं भी किसी नियम को लागू करने में एजेंसियां ढिलाई बरतती हैं या हमारे विवेक पर छोड़ देती हैं तो आम नागरिक भी उसे हल्के में ले लेता है। भाजपा या अन्य दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं, स्थानीय निकायों और हम सब आम नागरिकों को भी भारत को कचरा मुक्त देश बनाने के लिए अब कमर कसनी होगी। क्योंकि ये कार्य केवल नारों और विज्ञापनों से नहीं हो पाएगा।

आश्चर्य की बात तो यह है कि हम सब जानते हैं कि लगातार कचरे के ढेरों का, हमारे परिवेश में चारों तरफ़ बढ़ते जाना, हमारे व हमारी आनेवाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए कितना ख़तरनाक है? फिर भी हम सब निष्क्रिय बैठे हैं। हमें जागना होगा और इस समस्या से निपटने के लिए सक्रिय होना होगा। इसलिए नारे चाहे ‘स्वच्छता’ के लगें या ‘स्वदेशी’ के, जनता की भागीदारी के बिना, नारे नारे ही रहेंगे।