Monday, April 12, 2021

कोरोना की दूसरी लहरः सरकार और जनता


पिछले साल हम अति उत्साह में अपना सीना तान रहे थे कि कोरोना को नियंत्रित करने में भारत दुनिया में सबसे आगे निकल गया है। लेकिन आज हम फिर भयाक्रांत हैं। कोरोना से लड़ने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अपने अपने तरीके से भिन्न-भिन्न कदम उठा रही हैं। जहां असम, बंगाल और केरल जैसे चुनावी राज्यों में कोई प्रतिबंध नहीं है, वहीं दूसरे कई राज्यों में मास्क न पहनने पर पुलिस पिटाई भी कर रही है और चालान भी। ये बात लोगों की समझ में नहीं आ रही कि जिन राज्यों में चुनाव होता है वहाँ घुसने से कोरोना क्यों डरता है? इसका जवाब न तो किसी सरकार के पास है न तो किसी वैज्ञानिक के पास है।  


जिस तरह कुछ राज्यों में कोरोना की रोकथाम के लिए रात का कर्फ्यू लगाया गया है, उससे लोगों को भय सता रहा है कि कहीं चुनावों के बाद फिर से लॉकडाउन न लगा दिया जाए। पिछले लॉकडाउन का उद्योग और व्यापार पर भारी विपरीत प्रभाव पड़ा था, जिससे देश की अर्थव्यवस्था अभी उबर नहीं पाई है। सबसे ज्यादा मार तो छोटे व्यापारियों और कामगारों ने झेली। इसलिए आज कोई भी लॉकडाउन के पक्ष में नहीं है।  



छोटे व्यापारी की तो समझ में आती है लेकिन उद्योगपति अनिल अम्बानी के बेटे अनमोल अम्बानी तक ने ट्वीट की एक श्रृंखला पोस्ट कर पूछा है कि, ‘जब फिल्म अभिनेता शूटिंग कर सकते हैं, क्रिकेटर देर रात तक क्रिकेट खेल सकते हैं, नेता भारी जनसमूह के साथ रैलियां कर सकते हैं, तो व्यापार पर ही रोक क्यों? हर किसी का काम उनके लिए महत्वपूर्ण है।’ अनमोल ने इसके साथ ही अपने ट्वीट में कोरोना श्पैनडेमिकश् के प्रसार को रोकने के लिए लगाए जाने वाले लॉकडाउन को श्स्कैमडेमिकश् तक कह दिया। 


उधर भारत के वैज्ञानिकों ने दिन रात शोध और कड़ी मेहनत के बाद कोरोना का वैक्सीन बनाया है। पर बहुत कम लोगों को यह पता है कि कोरोना महामारी को वैक्सीन की ढाल देकर भारतीय कम्पनी भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोरोना की वैक्सीन ‘कोवैक्सिन’ की सफलता के पीछे हैदराबाद के समीप ‘जिनोम वैली’ का हाथ है। ‘जिनोम वैली’ असल में एक जीव विज्ञान के शोध का केंद्र है। इस समय यह दुनिया में तीसरे दर्जे पर है, जहां लाखों की तादाद में वैक्सीन की ईजाद और निर्माण होता है। 1996 में जब एक प्रवासी भारतीय वैज्ञानिक डा कृष्णा इला ने भारत बायोटेक कम्पनी की स्थापना ‘जिनोम वैली’ में की थी तो उन्हें इस बात की जरा भी कल्पना नहीं होगी कि एक दिन श्जिनोम वैली’ ही दुनिया को कोरोना महामारी से लड़ने वाली वैक्सीन प्रदान करेगी।


‘जिनोम वैली’ को विकसित करने में तेलंगाना काडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी बी पी आचार्य और उनकी टीम महत्वपूर्ण योगदान रहा। जिन्होंने रात-दिन एक कर के इसे कामयाबी को हासिल किया है। आज ‘जिनोम वैली’ जीव विज्ञान का एक ऐसा केंद्र बन चुका है जहां 300 से अधिक दवा कम्पनियाँ हैं। जो न सिर्फ कोरोना व अन्य बीमारियों के वैक्सीन का निर्माण कर रही हैं, बल्कि 20 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दे रही है। यह देश के लिए एक गर्व की बात है। कई दशकों पहले उठाए गए इस कदम की बदौलत आज हम कोरोना जैसी महामारी से लड़ने में सक्षम हुए हैं। यह डा कृष्णा इला की दूरदर्शिता और बी पी आचार्य जैसे कर्मठ अधिकारियों की वजह से ही संभव हुआ है।

 

बावजूद इस सबके कोरोना की दूसरी लहर के साथ कोरोना पूरे दम से लौट आया है। कुछ ही महीनों पहले जब इसका असर कम होता दिखा तो लोगों ने इस विषय में सावधानी बरतना कम कर दिया था। चोटिल अर्थव्यवस्था, राज्यों में चुनाव और अन्य मुद्दों पर जनता का ध्यान ज्यादा जा रहा था। लेकिन हाल की कुछ हफ्तों में कोरोना ने जो तेजी पकड़ी है उससे आम आदमी और सरकारी तंत्र एक बार फिर से चिंता में है।


उधर दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस फैसले के अनुसार यदि आप अपनी बंद गाड़ी में अकेले भी सफर कर रहे हैं तो भी मास्क लगाना अनिवार्य है। यह बात समझ से परे है इसलिए सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर काफी बहस छिड़ गई है। लोग प्रश्न पूछ रहे हैं कि बंद गाड़ी में अकेले सफर करने वाले को कोरोना के संक्रमण का खतरा अधिक है या राजनैतिक रैलियों और कार्यक्रमों में बिना मास्क आने वाली भीड़ को? उधर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का एक वीडियो वायरल हो रहा है जहां कुछ अधिकारी एक दुकानदार को ठीक से मास्क न पहनने पर धमकाते हुए नजर आ रहे हैं। गर्मागर्मी  के बाद मामला शांत तो हो जाता है लेकिन उस वीडियो में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जो अधिकारी उस व्यापारी को धमका रहा है उसने स्वयं मास्क ठीक से नहीं लगा रखा। ऐसे दोहरे मापदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं? कई शहरों में पुलिस वाले मास्क न पहनने पर आम लोगों की बेरहमी से पिटाई भी कर रहे हैं जिससे भड़की जनता ने भी पुलिसवालों की पिटाई की है। सरकारों को पुलिसवालों को ये निर्देश देना होगा कि वे नियमों के पालन में कड़ाई तो बरतें पर मानवीय संवेदनशीलता के साथ। अन्यथा समाज में अराजकता फैल जाएगी। पर साथ ही कोरोना की दूसरी लहर में बढ़ते हुए मरीजों और मौतों को भी हमें गम्भीरता से लेना होगा और सभी सावधानियाँ बरतनी होगी। लॉकडाउन की स्थित न आए इसके लिए हम सबको भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।


संतोष की बात यह है कि कोरोना की दूसरी लहर भारत में तब आई है जब हमारे पास इससे लड़ने के लिए वैक्सीन के रूप में एक नहीं बल्कि दो-दो हथियार हैं। पर अभी तो देश के कुछ ही लोगों को वैक्सीन मिली है। फिर भी भारत ने कोरोना वैक्सीन को दूसरे देशों में भेज दिया है। यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दृष्टि से सराहनीय कदम हो सकता है, पर देशवासियों की सेहत और जिंदगी बचाने की दृष्टि से सही कदम नहीं था। सरकारों को वैक्सीन लगाने की मुहिम को और तेज करना होगा, जिससे इस महामारी के कहर से बचा जा सके।

Monday, April 5, 2021

पुलिसवालों में इंसानियत अभी ज़िंदा है


आम तौर पर माना जाता है कि पुलिसवालों में इंसानियत नहीं होती। पुलिसवालों का जनता के प्रति कड़ा रुख़ प्रायः निंदा के घेरे में आता रहता है। पिछले दिनों सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत के बाद बॉलीवुड के मशहूर सितारों का नशीले पदार्थों के साथ नारकोटिक विभाग द्वारा पकड़े जाना राजनैतिक घटना बताया जा रहा था। आरोप था कि ये सब बिहार के चुनाव के मद्देनज़र किया जा रहा है जबकि ये सब नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के महानिदेशक राकेश अस्थाना की मुस्तैदी के कारण हो रहा था। अस्थाना के बारे में यह मशहूर है जब कभी उन्हें कोई संगीन मामला सौंपा जाता है तो वे अपनी पूरी क़ाबलियत और शिद्दत से उसे सुलझाने में जुट जाते हैं। सीबीआई में रहते हुए अस्थाना ने कुख्यात भगोड़े विजय माल्या के प्रत्यर्पण में जो भूमिका निभाई है उसकी जानकारी सीबीआई में उन सभी अफ़सरों को है जो इनकी टीम में रहे थे।
 


लेकिन आज हम एक अनोखे केस की बात करेंगे। पुलिस हो या कोई अन्य जाँच एजेंसी, वो हमेशा बेगुनाहों को झूठे केस में फँसा कर प्रताड़ित करने जैसे आरोपों से घिरी रहती है। लेकिन इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है जब विदेश में एक बेगुनाह जोड़े को बेगुनाह साबित कर भारत वापिस लाने में नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो कामयाब रहा है। इससे दोनो देशों के बीच द्विपक्षीय सम्बन्धों को और मज़बूती मिली है। मामला 2019 का है जब उसी साल 6 जुलाई को कतर के हवाई अड्डे पर मुंबई के एक जोड़े को 4 किलो चरस के साथ पकड़ा गया था। मामला कतर की अदालत में पहुँचा और मुंबई के ओनिबा और शरीक को वहाँ की अदालत में 10 साल की सज़ा सुना दी गई। ओनिबा और शरीक ने अपनी सज़ा के दौरान अपनी बेटी को जेल में ही जन्म दिया। इन दोनों ने आनेवाले 10 सालों के लिए ख़ुद को जेल में ही बंद मान लिया था। लेकिन कतर से दूर मुम्बई में इन दोनों के रिश्तेदारों को इन दोनों की बेगुनाही का पूरा यक़ीन था। लिहाज़ा उन्होंने मुम्बई पुलिस और नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का दरवाज़ा खटखटाया। वे यहीं तक नहीं रुके उन्होंने प्रधान मंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय की मदद भी माँगी। हालाँकि ओनिबा और शरीक को रंगे हाथों पकड़ा गया था लेकिन उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि इतनी बड़ी मात्रा में नशीले प्रदार्थ इनके बैग में कैसे आए। 


किसी ने ख़ूब ही कहा है सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं हो सकता। एक ओर जहां ओनिबा और शरीक हिम्मत हार चुके थे वहीं शरीक की फ़ोन रिकॉर्डिंग में से एक ऐसा सुबूत निकला जिसने इस मामले का सच उजागर कर दिया। दरअसल शरीक की फूफी तबस्सुम ने शरीक के मना करने पर भी शरीक और ओनिबा को एक हनीमून पैकेज तोहफ़े में दिया। इस तोहफ़े में कतर की टिकट और वहाँ रहने और घूमने का पूरा पैकेज था। इस पैकेज के साथ ही तबस्सुम ने शरीक को एक पैकेट भी दिया जिसमें तबस्सुम ने अपने रिश्तेदारों के लिए ‘पान मसाला’ भेजा था। असल में वो पान मसाला नहीं बल्कि चरस थी। 


इतने गम्भीर मामले के बावजूद नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के महानिदेशक राकेश अस्थाना को लगा कि यह मामला इतना सपाट नहीं है जितना दिखाई दे रहा है। उन्हें इसमें कुछ पेच नज़र आए इसलिए अस्थाना ने एक विशेष टीम गठित करी। इस टीम का नेतृत्व नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के डिप्टी डायरेक्टर के पी एस मल्होत्रा ने किया। जाँच हुई और पता चला कि शरीक की फूफी तबस्सुम एक कुख्यात गैंग का हिस्सा हैं जो नशीले पदार्थों की तस्करी करता है। इस गैंग का सरग़ना मुंबई का निज़ाम कारा है जिसे मुम्बई में गिरफ़्तार किया गया। मुम्बई के नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की जाँच में ही यह सामने आया कि ओनिबा और शरीक दोनों बेगुनाह हैं। 


चूँकि मामला विदेश का था जहां ये बेगुनाह जोड़ा जेल में बंद था और असली गुनहगार भारत में नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की हिरासत में। तभी नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के महानिदेशक ने ये तय किया कि ओनिबा और शरीक को बाइज़्ज़त वापिस भारत लाया जाए। अस्थाना ने प्रधान मंत्री कार्यालय, विदेश मंत्रालय की मदद से कतर में भारतीय दूतावास के ज़रिए कतर के अधिकारियों को इस मामले सभी सुबूत भिजवाए। कतर की कोर्ट में इन सभी सुबूतों पर फिर सुनवाई हुई और इस साल जनवरी में इस मामले में पुनः विचार किया गया। 29 मार्च 2021 को आख़िरकार कतर की अदालत ने ओनिबा और शरीक को बेगुनाह मान लिया और बाइज़्ज़त रिहा कर दिया। अब बस उस दिन का इंतेज़ार है जब सभी क़ानूनी औपचारिकताओं के बाद ओनिबा और शरीक को वापिस भारत भेजा जाएगा। इस खबर को सुन कर ओनिबा और शरीक के रिश्तेदारों में एक ख़ुशी की लहर दौड़ गई। उनका यह कहना है कि इस मामले में प्रधान मंत्री कार्यालय, विदेश मंत्रालय और ख़ासतौर पर नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने उनकी इस बात पर विश्वास किया कि ओनिबा और शरीक बेगुनाह हैं और इसलिए इस केस में आगे बढ़ कर हमारी मदद की। वरना ये जोड़ा दस बरस तक कतर की जेल में सड़ता रहता।  


इस पूरे हादसे से यह साबित होता है कि अगर कोई उच्च अधिकारी निशपक्षता, पारदर्शिता और मानवीय संवेदना से काम करे तो वह जनता के लिए किसी मसीहा से कम नहीं होता। इस मामले में सक्रियता दिखा कर नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की टीम ने अपनी छवि को काफ़ी सुधार है। यह उदाहरण केंद्र और राज्यों की अन्य जाँच एजेंसीयों के लिए अनुकरणीय है। उन्हें इस बात से सतर्क रहना चाहिए की कोई भी उनका दुरुपयोग निज हित में या अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को परेशान करने के लिए न करे बल्कि सभी जाँच एजेंसियाँ अपने नियमों के अनुसार क़ानूनन कार्यवाही करें और राग द्वेष से मुक्त रहें। इससे उनकी छवि जनता के दिमाग़ में बेहतर बनेगी और ये जाँच एजेंसियाँ गुनहगारों को सज़ा दिलवाने में और बेगुनाहों को बचाने में नए मानदंड स्थापित करेंगी। इसके लिए आवश्यक है कि इन जाँच एजेंसियों की टीम में तैनात अधिकारी अपने वेतन और भत्तों से संतुष्ट रह कर, बिना किसी प्रलोभन में फँसे, अपने कर्तव्य को पूरा करें तो उससे हमारे समाज और देश को लाभ होगा और इन कर्मचारियों को भी आत्मिक संतोष प्राप्त होगा।

Monday, March 29, 2021

सीएसआर का धंधा सबसे चंगा


भारत के आयकर विभाग के सर्वोच्च अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर बताया की सीएसआर (निगमित सामाजिक दायित्व) के नाम पर बरसों से इस देश में बड़े घोटाले हो रहे हैं। उन्होंने मेरे सहयोगी रजनीश कपूर से पूछा कि आपने ब्रज में इतने सारे जीर्णोद्धार के, इतने प्रभावशाली तरीक़े से कार्य किए हैं, इसमें अब तक कितने करोड़ रुपया खर्च कर चुके हैं? रजनीश ने कहा कि 18 वर्षों में लगभग 23 करोड़ रुपए। यह सुनकर वे अधिकारी उछल पड़े और बोले,
इतना सारा काम केवल 23 करोड़ में। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। तब बोले कि मेरे पास ऐसी स्वयंसेवी संस्थाओं की एक लम्बी सूची है जिनका सालाना बजट कई सौ करोड़ रुपए से लेकर हज़ार करोड़ रुपय तक है। लेकिन इनमें से ज़्यादातर एनजीओ ऐसी हैं जिनके पास ज़मीन पर दिखाने को कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है। ये सारा गोलमाल देश के बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा टैक्स बचाने के लिए किया जाता है। लेकिन अब मोदी सरकार ने निर्देश दिए हैं कि ऐसा फ़र्जीवाड़ा करने वालों पर लगाम कसी जाए। 


दरअसल जब से यह क़ानून बना कि एक सीमा से ऊपर उद्योग या व्यापार करने वालों को अपने मुनाफ़े का कम से कम 2 फ़ीसदी सामाजिक कार्यों पर खर्च करना अनिवार्य होगा। तबसे ज़्यादातर औद्योगिक घरानों ने धर्मार्थ ट्रस्ट या एनजीओ बना लिए और सीएसआर का अपना फंड इनमें ट्रांसफ़र करके टैक्स बचा लिया। इनमें से कुछ ने इस फंड से सामुदायिक सेवा के अनेक तरह के कार्य किए और आज भी कर रहे हैं। पर ज़्यादातर ने इस फंड का उपयोग अपने फ़ायदे के लिए ही किया। मसलन अगर किसी उच्च अधिकारी या मंत्री से कोई बड़ा फ़ायदा लेना था तो उसकी पत्नी या बच्चों के बनाए एनजीओ को बिना जाँचे परखे उदारता से दान दिया और कभी उस पैसे के इस्तेमाल का हिसाब नहीं माँगा। न यह जा कर देखा कि क्या ये पैसा वाक़ई उस काम में खर्च हुआ जिसके लिए ये दिया गया था? स्पष्ट है कि जब उद्देश्य दान की शक्ल में रिश्वत देने का था तो उनकी बला से वो एनजीओ उस पैसे से कुछ भी करे। नतीजतन इन मंत्रियों और अधिकारियों के परिवारों ने सेमिनार, शोध, सर्वेक्षण, वृक्षारोपण, शिक्षा प्रसार, स्वास्थ्य सेवाएँ, पेयजल व महिला सशक्तिकरण जैसे लोकप्रिय मदों के तहत झूठे खर्चे दिखाए और उस पैसे से खुद मोटा वेतन और तमाम भत्ते लिए और गुलछर्रे उड़ाए। 


यह क्रम जैसा यूपीए सरकार में चल रहा था वैसा ही आज भी चल रहा है। जो एनजीओ निष्ठा से, समर्पण से, पारदर्शिता से और गंभीरता से अपने उद्देश्यों के लिए रात दिन ज़मीनी स्तर पर ठोस काम करतीं हैं उन्हें सीएसआर का अनुदान लेने में चप्पलें घिसनी पड़ती हैं। तब जा कर उन्हें चूरन चटनी की मात्रा में अनुदान मिलता हैं। पर जो एनजीओ अनुदान के पैसे पर गुलछर्रे उड़ती है और ज़मीन पर फ़र्जीवाड़ा करती है उन्हें करोड़ों रुपए के अनुदान बिना प्रयास के मिल जाते हैं। इनसे कोई नहीं पूछता की तुमने इतने पैसे का क्या किया? इसकी अगर आज ईमानदारी से जाँच हो जाए तो सब घोटाला सामने आ जाएगा। सीएसआर फंड को खर्च करने का तरीक़ा बड़ा व्यवस्थित है। हर कम्पनी में, चाहे निजी हो, चाहे सार्वजनिक - सीएसआर का काम देखने के लिए एक अलग विभाग होता है। जिसके अधिकारियों का यह दायित्व होता है की वे किसी एनजीओ से आनेवाले प्रस्तावों का, उनकी गुणवत्ता और उपयोगिता का गम्भीरता से मूल्यांकन करें। यदि वे संतुष्ट हो तभी अनुदान स्वीकृत करें। अनुदान देने के बाद उस एनजीओ के काम पर तब तक निगरानी करें जब तक कि वह अपना उद्देश्य पूरा ना कर ले। 25 लाख तक के अनुदान के मामलों में प्रायः यह सावधानी बरती जाती है। पर जो बड़ी मात्रा में मोटे अनुदान दिए जाते हैं, उसमें प्रस्ताव की गुणवत्ता का मूल्यांकन गौण हो जाता है क्योंकि उनकी स्वीकृति के निर्देश मंत्री, मंत्रालय के उच्च अधिकारी या प्रतिष्ठान के अध्यक्ष से सीधे आते हैं और मूल्यांकन की कार्यवाही तो महज़ ख़ानापूर्ति होती हैं। 


सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में सीएसआर के लिए एक सलाहकार समिति बनाने का भी प्रावधान होता है, जिसमें नियमानुसार ऐसे अनुभवी और योग्य सदस्य मनोनीत किए जाने चाहिए जिनका सामाजिक सेवा कार्यों का गहरा अनुभव हो। पर अधिकतर मामलों में ऐसा नहीं होता। केंद्र और राज्यों में सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ता या उनसे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ता इन समितियों में नामित कर दिए जाते रहे हैं और आज भी किए जाते हैं। इनका उद्देश्य ईमानदारी से समाज सेवा करना नहीं बल्कि अपने चहेतों की स्वयंसेवी संस्थाओं को अनुदान दिलवाकर अपना उल्लू सीधा करना होता है। यही कारण है कि सी एस आर का बजट तो बहुत खर्च होता है पर उसकी तुलना में ज़मीन पर काम बहुत कम दिखाई देता है। 


जब राजनेताओं से इस विषय पर बात करो तो उनका कहना होता है कि हमारे कार्यकर्ता बरसों हमारे पीछे झंडा लेकर दौड़ते हैं। इस उम्मीद में कि जब हम सत्ता में आएँगे तो उन्हें कुछ आर्थिक लाभ होगा। इसलिए हमारी मजबूरी है कि हम इन कार्यकर्ताओं को ऐसी कम्पनियों में पद देकर उपकृत करें। ये तर्क राजनैतिक दृष्टि से ठीक हो सकता है पर समाज की दृष्टि से ठीक नहीं है। इस देश का यह दुर्भाग्य है कि आम आदमी को लक्ष्य करके उसका दुःख दर्द दूर करने के लिए तमाम योजनाएँ और कार्यक्रम चलाए जाते हैं। पर उनका एक अंश ही उस आम आदमी तक पहुँचता है। बाक़ी रास्ते में ही सोख लिया जाता है। सीएसआर की भी यही कहानी है। जब सारे कुएँ में ही भांग पड़ी हो वहाँ कुछ समझौता करके चलना पड़ेगा। भारत सरकार को चाहिए कि सीएसआर फंड का एक हिस्सा, जो एक तिहाई भी हो सकता है, ‘सामाजिक जागरूकता’ जैसे मद में खर्च करने के लिए निर्धारित कर दे। इस मद में जो आवंटन हो वो राजनैतिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता के लिए उपलब्ध करा दिया जाए। पर बाक़ी का 70 फ़ीसदी किसे और किस काम के लिए दिया जाता है इस पर सख़्त नियम बनें और निजी और सार्वजनिक कम्पनियों को पारदर्शिता के साथ इन नियमों का पालन करने की बाध्यता कर दी जाए। इससे ईमानदार और समाज के प्रति समर्पित लोगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा और समाज सेवा के नाम पर खर्च किये जा रहे धन का सदुपयोग होगा।        

Monday, March 22, 2021

केवल नारों से नहीं सजते धर्मक्षेत्र


चार बरस पहले जब योगी सरकार बनी तो हर हिंदू को लगा कि अब हमारे धर्मक्षेत्रों को बड़े स्तर पर सजाया -संवारा जाएगा। तब अपने इसी कॉलम में मैने लिखा था कि, ‘अगर धाम सेवा के नाम पर, छलावा, ढोंग और घोटाले होंगे, तो भगवान तो रूष्ट होंगे ही, सरकार की भी छवि खराब होगी। इसलिए हमारी बात को ‘निंदक नियरे राखिए’ वाली भावना से अगर उ.प्र. के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी सुनेंगे, तो उन्हें लोक और परलोक में यश मिलेगा। यदि वे निहित स्वार्थों की हमारे विरूद्ध की जा रही लगाई-बुझाई को गंभीरता से लेंगे तो न सिर्फ ब्रजवासियों और ब्रज धाम के कोप भाजन बनेंगे बल्कि परलोक में भी अपयश ही कमायेंगे।’ हमें विश्वास था कि योगी सरकार उ.प्र. की धर्मनगरियों को सजाना-संवारना चाहती है। स्वयं मुख्यमंत्री इस मामले में गहरी रूचि रखते हैं। उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके शासनकाल में मथुरा, वाराणसी, अयोध्या और चित्रकूट का विकास इस तरह हो कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सुख मिले। इसके लिए वे सब कुछ करने को तैयार हैं।’


तब इस लेख में मैंने उन्हें आगाह किया था कि, ‘धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।’


इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खडंजे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पात होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे अवैध बहुमंजले भवन खड़े कर दिये हैं? नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।


माना कि शहरी विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि उ.प्र. में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन नगरों का स्वरूप?


2017 में जब मैंने उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को उनके कार्यालय में तत्कालीन पर्यटन सचिव अवनीश अवस्थी की मौजूदगी में ब्रज के बारे में पावर पाइंट प्रस्तुति दी थी, तो मैंने योगी जी से स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाराज! दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, ‘करप्शन ऑफ डिजाईन’ व ‘करप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन’। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश होगा, विकास नहीं। जैसे अयोध्या के दर्जनों पौराणिक कुंडों की दुर्दशा सुधारने के बजाय अकेले सूर्य कुंड के सौंदरीयकरण पर शायद 140 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे। जबकि यह कुंड सबसे सुंदर और दुरुस्त दशा में है और दो करोड़ में ही इसका स्वरूप निखारा जा सकता है।  


बहुत पीड़ा के साथ कहना पड़ रहा है कि योगी राज में ब्रज सजाने के नाम पर प्रचार तो बहुत हुआ, धन का आवंटन भी खुलकर हुआ, पर कोई भी उल्लेखनीय काम ऐसा नहीं हुआ जिससे ब्रज की संस्कृति और धरोहरों का संरक्षण या जीर्णोद्धार इस तरह हुआ हो जैसा विश्व स्तर पर विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है। सबसे पहली गलती तो यह हुई है कि जिस, ‘उ प्र ब्रज तीर्थ विकास परिषद’ को ब्रज विकास के सारे निर्णय लेने के असीमित अधिकार दिए गए हैं, उसमें एक भी व्यक्ति इस विधा का विशेषज्ञ नहीं है। परिषद का आज तक क़ानूनी गठन ही नहीं हुआ। जबकि इसके अधिनियम 2015 की धारा 3 (त) के अनुसार, कानूनन इस परिषद में ब्रज की धरोहरों के संरक्षण के लिए किए गए प्रयत्नों के सम्बंध में ज्ञान, अभिज्ञता और ट्रैक रिकॉर्ड रखने वाले पाँच सुविख्यात व्यक्तियों को लिया जाना था। उनकी सलाह से ही प्रोजेक्ट और प्राथमिकताओं का निर्धारण होना था, अन्यथा नहीं। जबकि अब तक परिषद में सारे निर्णय, उन दो व्यक्तियों ने लिए हैं, जिन्हें इस काम कोई अनुभव ही नहीं है। इसीलिए ब्रज के प्रति सच्ची आस्था रखने वाले संत और भक्त परिषद के कार्यकलापों से और जनता के कर से जमा धन के भारी बर्बादी से बेहद क्षुब्ध हैं। अगर इन दो अधिकारियों को ही सारे निर्णय लेने थे तो फिर परिषद का इतना तामझाम खड़ा करने की ज़रूरत क्या थी? ज़िला पर्यटन अधिकारी ही इस काम के लिए काफ़ी था। 


इसी प्रकार इसके अधिनियम 2015 की धारा 6 (2) के अनुसार परिषद का काम मथुरा स्तर पर करने के लिए एक ज़िला स्तरीय समिति के गठन का भी प्रावधान है। जिसमें 6 मशहूर विशेषज्ञों की नियुक्ति की जानी थी। (1) अनुभवी लैंडस्केप डिज़ाइनर व इंटर्प्रेटिव प्लानर (2) ब्रज क्षेत्र का अनुभव रखने वाले पर्यावरणविद् (3) ब्रज के सांस्कृतिक और पौराणिक इतिहास के सुविख्यात विशेषज्ञ (4) ब्रज साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान (5) ब्रज कला के सुविख्यात मर्मज्ञ (6) ब्रज का कोई सुविख्यात वकील, सामाजिक कार्यकर्ता या जनप्रतिनिधि जिसने ब्रज के सांस्कृतिक विकास में कुछ उल्लेखनीय योगदान दिया हो। इन सबके मंथन के बाद ही विकास की परियोजनाएँ स्वीकृत होनी थी। पर जानबूझकर ऐसा नहीं किया गया ताकि मनमानी तरीक़े से निरर्थक योजनाओं पर पैसा बर्बाद किया जा सके। जिसकी लम्बी सूची प्रमाण सहित योगी जी को दी जा सकती है, यदि वे इन चार वर्षों में परिषद की उपलब्धियों का निष्पक्ष मूल्यांकन करवाना चाहें तो।        


अज्ञान और अनुभवहीनता के चलते ब्रज का जैसा विनाश इन चार वर्षों में हुआ है वैसा ही पिछले तीन दशकों में, हर धर्मक्षेत्रों का किया गया है। उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? मैं तो इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें?

Monday, March 15, 2021

कुंभ का बदलता स्वरूप


हरिद्वार में कुम्भ शुरू हो चुका है। वृंदावन में कुम्भ पूर्व वैष्णव बैठक पूरा महीना चली पर आज कुम्भ का स्वरूप कितना बदल गया है इस पर मंथन करने की ज़रूरत है। भगवत गीता में भगवान अर्जुन को बताते हैं कि उनकी शरण में 4 तरह के लोग आते हैं, आर्त, अर्थारतु, जिज्ञासु व ज्ञानी। यह सिद्धांत हर कुम्भ में लागू होता है। एक तरफ उन लोगों का समूह उमड़ता है, जो अपने जीवन में कुछ भौतिक उपलब्धि हासिल करना चाहते हैं। कुंभ में आकर उन्हें लगता है कि उनके पुण्य की मात्रा इतनी बढ़ जाएगी कि उनके कष्ट स्वतः दूर हो जाएंगे।


दूसरी भीड़ उन साधन संपन्न सेठ और व्यापारियों की होती है, जो अपने व्यापार की वृद्धि की कामना लेकर कुंभ में विराजे हुए संतों के अखाड़ों में नतमस्तक होते हैं। तीसरी भीड़ उन लोगों की होती है, जो वहां इस उद्देश्य से आते हैं  कि उन्हें संतों का सानिध्य मिले और वे भगवान के विषय में कुछ जानें और अंतिम श्रेणी में वे लोग होते हैं, जिन्हें संसार से कुछ खास लेना-देना नहीं। उनको तो धुन लगी है, केवल भगवत् प्राप्ति की। स्पष्ट है कि चारों श्रेणी के लोगों को अपनी मनोकामना पूर्ण होती दिखाई देती  होगी, तभी तो वे ऐसे हर कुंभ या उत्सव में कष्ट उठाकर भी शामिल होते हैं।



पर जो बात आजकल होने वाले कुंभ के आयोजनों में दिखाई देती है उससे तो यह लगता है कि हमारी सनातन परम्परा के सशक्त स्तंभ कुंभ अपने मूल उद्देश्य से भटक गये हैं। पहले कुंभ एक अवसर होता था, जहां सारे देश के संत-महात्मा और विद्वतजन बैठकर उन प्रश्नों के समाधान खोजते थे, जिनमें प्रांतीय स्तर पर हिंदू समाज उद्वेलित रहता था। कुंभ से जो समाधान मिलता था, वह सारा देश अपना लेता था। अब शायद ऐसा कुछ नहीं होता और अगर होता भी है, तो उसका स्वरूप आध्यात्मिक कम और राजनैतिक ज्यादा होता है। यही बात अखाड़ों पर भी लागू होती है। शुद्ध मन से कुंभ आने वाले संत अपनी साधना में जुटे रहते हैं, उनके अखाड़ों में वैभव की छाया भी नहीं रहती। पर दूसरी तरफ इतने विशाल और वैभवशाली अखाड़े बनते हैं कि पांच सितारा होटल के निर्माता भी शरमा जाएं। इस प्रकार की आर्थिक असमानता कुंभ के सामाजिक ताने-बाने को असंतुलित कर देती है, जिसकी टीस कई संतों के मन में देखी जाती है।


कलियुग का प्रभाव कहकर हम भले ही अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लें, पर हकीकत यह है कि अपने सभी तीज-त्यौहारों का स्वरूप अब व्यवसायिक होता जा रहा है। कुंभ में इसका प्रभाव व्यापक रूप से देखने को मिलता है। यह स्वस्थ लक्षण नहीं है। इस पर सरकार को या धर्माचार्यों को विचार करके पूरे कुंभ का स्वरूप आध्यात्मिक बनाना चाहिए। अन्यथा कुंभ और शहरों में लगने वाली आम नुमाइशों में कोई भेद नहीं रह जाएगा। जैसे नुमाइशों में तरह-तरह के विशाल बिजली के झूले, अनेक तरह के उत्पादों की दुकानें और दूसरे मनोरंजन के साधन उपलब्ध होते हैं वही सब अब कुम्भ में भी होने लगा है। इसके कारण कुम्भ में आने वाली भीड़ का अधिकतर हिस्सा वहाँ केवल मौज मस्ती और चाट पकौड़ी के लिए आता है। सरकारें कह सकती हैं कि जनता का मनोरंजन करना कोई अपराध नहीं है। पर सोचने वाली बात यह है कि आज मनोरंजन के संसाधन इतनी भारी मात्रा में हर जगह उपलब्ध हैं कि जनता के पास काफ़ी विकल्प मौजूद हैं। इसलिए इस मानसिकता से बचना चाहिए। कुम्भ में इन सबके प्रवेश से उसका उद्देश्य और आध्यात्मिक स्वरूप दोनों नष्ट हो रहे हैं। इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पहले कुम्भ में सरकार के कुछ मंत्रालयों के प्रचार के लिए कुछ पंडाल लगते थे। जैसे स्वास्थ्य मंत्रालय, कृषि मंत्रालय या सूचना विभाग वहाँ तक तो ठीक था। पर अब तो हर कुम्भ में हर तीसरा होर्डिंग सरकार की योजनाओं को प्रचारित करने वाला लगाया जाने लगा है। जिसमें सत्तारूढ दल के नेताओं के बड़े-बड़े चित्र भी लगे होते हैं। ज़रा सोचिए जिन चेहरों को रात दिन टीवी पे देखते हैं उन्हें ही अगर कुम्भ में आकर भी देखना पड़े तो इसका मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? वहाँ तो संतों की वाणी, वैदिक साहित्य, भारत के तीर्थ स्थलों और विभिन सम्प्रदायों की सूचना देने वाले होर्डिंग होने चाहिए जिससे वहाँ आने वालों की आध्यात्मिक चेतना बढ़े। राजनैतिक होर्डिंग तो कुम्भ को चुनावी माहौल में रंग देते हैं। इसलिए सरकारों और नेताओं को इस लोभ से बचना चाहिए।   


यह सही है कि हम सब इतने सुविधाभोगी हो गए हैं कि सरलता का जीवन अब हमसे कोसों दूर हो गया है। जबकि तीर्थ जाना या कुंभ में जाना तपश्चर्या का एक भाग होना चाहिए, तभी हमारी आध्यात्मिकता चेतना और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह पाएगी।


हमेशा से कुंभ के बारे में अंतिम निर्णय अखाड़ा परिषद् का रहता है। यह बात सही है कि सरकारें हजारों करोड़ रूपया कुंभ के आयोजन में खर्च करती हैं, पर वह तो उनका कर्तव्य है।


यही बात व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को भी सोचनी चाहिए कि हर चीज बिकाऊ माल नहीं होती। कम से कम धर्म का क्षेत्र तो व्यापार से अलग रखें। कुंभ ही क्या, आज तो हर तीर्थस्थल पर भवन निर्माताओं से लेकर अनेक उपभोक्ता सामिग्री बेचने वालों ने कब्जा कर लिया है। जो अपने विशाल होर्डिंग लगाकर उस स्थान की गरिमा को ही समाप्त कर देते हैं। इसका विरोध समाज की तरफ से भी होना चाहिए। तीर्थस्थलों व कुंभ-स्थलों पर जो भी विज्ञापन हों, वो धर्म से जुड़े हों। उसके प्रायोजक के रूप में कोई कंपनी अपना नाम भले ही दे दे, पर अपने उत्पादनों के प्रचार का काम बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इससे आने वाले श्रद्धालुओं का मन भटकता है और उनके आने का उद्देश्य कमजोर पड़ता है।


दरअसल धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कार हमारी चेतना का अभिन्न अंग हैं। समाज कितना भी बदल जाए, राजनैतिक उठापटक कितनी भी हो ले, व्यक्तिगत जीवन में भी उतार-चढ़ाव क्यों न आ जाएं, पर यह चेतना मरती नहीं, जीवित रहती है। यही कारण है कि तमाम विसंगतियों के बावजूद मानव सागर सा ऐसे अवसरों पर उमड़ पड़ता है, जो भारत की सनातन संस्कृति की जीवंतता को सिद्ध करता है।


आवश्यकता इस बात की है कि सभी धर्मप्रेमी और हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले राजनैतिक लोग अपने उत्सवों, पर्वों और तीर्थस्थलों के परिवेश के विषय में सामूहिक सहमति से ऐसे मापदंड स्थापित करें कि इन स्थलों का आध्यात्मिक वैभव उभरकर आए। क्योंकि भारत का तो वही सच्चा खजाना है। अगर भारत को फिर से विश्वगुरू बनना है, तो उपभोक्तावाद के शिकंजे से अपनी धार्मिक विरासत को बचाना होगा। वरना हम अगली पीढ़ियों को कुछ भी शुद्ध देकर नहीं जाएंगे। वह एक हृदयविदारक स्थिति होगी।

Monday, March 8, 2021

गाय के गोबर से पर्यावरण का संरक्षण


बीते शुक्रवार को वैश्विक ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में भारत की ओर से किए गए प्रयासों के मद्देनज़र प्रधान मंत्री नरेंद्र  मोदी को ‘कैम्ब्रिज एनर्जी रिसर्च एसोसिएट्स वीक (सेरावीक) वैश्विक ऊर्जा एवं पर्यावरण नेतृत्व’ पुरस्कार प्रदान किया गया। मोदी जी को यह सम्मान ऊर्जा और पर्यावरण में स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता के लिए दिया गया। गौरतलब है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को इससे पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। यह देश के लिए गर्व की बात है।

देश के प्राकृतिक ऊर्जा और पर्यावरण का ध्यान रखना देशवासियों की ज़िम्मेदारी है। इस महीने होली का त्योहार आने वाला है। होली से एक रात पूर्व होलिका दहन की प्रथा है। इस वर्ष हमें होलिका दहन में वृक्ष बचाने की पहल करनी चाहिए। जो लोग सनातन धर्म के मानने वाले है, उन्हें यह भली भाँति पता होगा कि सनातन धर्म में हर जीवात्मा का सम्मान होता है। हम वृक्षों की पूजा करते हैं। भूमंडल के बढ़ते तापक्रम के ख़तरों से हम अनजान नहीं हैं। हिमखंडों का अचानक गिरना, बेमौसम तूफ़ानी बरसात, समुद्र स्तर बढ़ना तीव्र ठंड या गर्मी  होना इसके कुछ दुष्परिणाम हैं। पेड़ बचाकर इसका कुछ समाधान हो सकता है । 


क्यों न हम संकल्प लें कि इस बार से होलिका दहन हम गोबर से बने उपलों/कंडों से ही करेंगे। लकड़ी का प्रयोग बिल्कुल नहीं करेंगे। सूखी लकड़ी का भी नहीं। तभी ये चेतना विकसित होगी। अब तो गोबर काष्ठ भी मिलने लगी है। जो गोबर को एक मशीन में दबाव डालकर लकड़ी के रूप में तैयार की जाती है। वैसे ये तो हम सब जानते हैं कि गाय के गोबर के कंडों से धुआं करने से कीटाणु, मच्छर आदि भाग जाते हैं। 

सनातन धर्म में यज्ञ रूपी आराधना करने का भी प्रचलन है। ऐसे में गाय के गोबर के कंडों के प्रयोग से न सिर्फ़ वातावरण की शुद्धि होती है बल्कि सात्विकता का अहसास भी होता है। इसलिए यज्ञ के उपरांत हवन कुंड को पूरे घर में घुमाया भी जाता है। जिससे कि हवन के धुएँ का असर पूरे घर में फैलाया जा सके।    

सिर्फ़ होलिका दहन ही क्यों हम शवों का दाह संस्कार भी इन्हीं कंडों या गोबर काष्ठ से क्यों न करें? हमारे ब्रज के गावों में तो पहले से ही ये प्रथा है। हर शव कंडों पर ही जलाया जाता है। इससे गोधन का भी महत्व बढ़ेगा और पर्यावरण भी बचेगा।

गाय के गोबर से न सिर्फ़ कंडे बनते हैं बल्कि आजकल गैस और बिजली संकट के दौर में गांवों में गोबर गैस के प्लांट भी लगाए जा रहे हैं। कोयला, एलपीजी, पेट्रोल व डीजल, जहां मेंहगे और प्रदूषणकारी स्रोत हैं, वहीं गाय के गोबर से बनी ‘बायो गैस’ कभी न समाप्त होने वाला स्रोत है। क्योंकि जब तक गौवंश रहेगा, तब तक हमें यह ऊर्जा मिलती रहेगी। 

आँकड़ों की माने तो सिर्फ एक गाय के गोबर से प्रतिवर्ष 45000 लीटर बायो गैस मिलती है। बायो गैस के उपयोग करने से 6 करोड़ 80 लाख टन लकड़ी बच सकती है, जो आज जलाई जाती है। जिससे 14 करोड़ वृक्ष कटने से बचेंगे ओर देश के पर्यावरण का संरक्षण होगा। इससे करीब 3 करोड़ टन उत्सर्जित कार्बन डाई ऑक्साइड को भी रोका जा सकता है। 

इतना ही नहीं गोबर गैस संयंत्र में गैस प्राप्ति के बाद बचे पदार्थों का उपयोग खेती के लिए जैविक खाद बनाने में किया जाता सकता है। सभी जानते हैं गोबर की खाद खेती के लिए अमृत का काम करती है। गोबर की खाद सर्वोत्तम खाद है। जबकि फर्टिलाइजर से पैदा अनाज हमारी प्रतिरोधक क्षमता को लगातार कम करता जा रहा है। कृषि में रासायनिक खाद्य और कीटनाशक पदार्थ की जगह गाय का गोबर इस्तेमाल करने से जहां भूमि की उर्वरता बनी रहती है, वहीं उत्पादन भी अधिक होता है। दूसरी ओर पैदा की जा रही सब्जी, फल या अनाज की फसल की गुणवत्ता भी बनी रहती है।

वैज्ञानिकों की माने तो गाय के गोबर में विटामिन बी-12 अच्छी मात्रा में पाया जाता है। यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है। आज मोबाइल फ़ोन से निकलने वाली रेडियेशन से भी बचा जा सकता है। हमारे दिल्ली दफ़्तर और वृंदावन के घर की दीवारों पर गाय के गोबर और मिट्टी का लेप कई वर्षों से हुआ है। इन दीवारों पर बीते कई वर्षों में न तो कोई मकड़ी का जाल दिखा है और न ही कभी छिपकली दिखी है। घर और दफ़्तर की गोबर मिट्टी लिपि दीवारों के बीच रह कर एक सात्विक अहसास महसूस किया जाता है। इन दीवारों का रख रखाव भी बहुत आसान होता है। 

इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. जी. ई. बीगेड ने गोबर के अनेक प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया है कि गाय के ताजे गोबर से टी बी तथा मलेरिया के कीटाणु मर जाते हैं। आणविक विकरण से मुक्ति पाने के लिये जापान के लोगों ने गोबर को अपनाया है। गोबर हमारी त्वचा के दाद, खाज, एक्जिमा और घाव आदि के लिये लाभदायक होता है। 

ऐसी तमाम जानकारियों का संचय कर उसके व्यापक प्रचार प्रसार में जुटे वैज्ञानिक श्री सत्यनारायण दास बताते हैं कि विदेशी इतिहासकारों और माक्र्सवादी चिंतकों ने वैदिक शास्त्रों में प्रयुक्त संस्कृत का सतही अर्थ निकाल कर बहुत भ्रांति फैलाई है। इन इतिहासकारों ने यह बताने की कोशिश की है कि वैदिक काल में आर्य गोमांस का भक्षण करते थे। यह वाहियात बात है। ‘गौधन’ जैसे शब्द का अर्थ अनर्थ कर दिया गया। श्री दास के अनुसार वैदिक संस्कृत में एक ही शब्द के कई अर्थ प्रयुक्त होते हैं जिन्हें उनके सांस्कृतिक परिवेश में समझना होता है। इन विदेशी इतिहासकारों ने वैदिंक संस्कृत की समझ न होने के कारण ऐसी भूल की। आईआईटी से बी.टेक. और अमरीका से एम.टेक. करने वाले बाबा श्री दास गोसेवा को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। 

उधर गुजरात में धर्म बंधु स्वामी 80 हजार गायों की व्यवस्था में जुटे रहते हैं। बरसाना में विरक्त संत श्री रमेश बाबा की छत्रछाया में 55,000 गोवंश पल रहा है। 

ऐसे तमाम संत, समाजसेवी और भारत के करोड़ों आम लोग गोमाता की तन, मन और धन से सेवा करते हैं। अब समय आ गया है कि जब भारत सरकार और प्रांतीय सरकारें गौवंश की हत्या पर कड़ा प्रतिबंध लगायें और इनके संवर्धन के लिये उत्साह से ठोस प्रयास करें। शहरी जनता को भी अपनी बुद्धि शुद्ध करनी चाहिये। गौवंश की सेवा हमारी परंपरा तो है ही आज के प्रदूषित वातावरण में स्वस्थ रहने के लिये हमारी आवश्यकता भी है। हम जितना गोमाता के निकट रहेंगे उतने ही स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगे। इसलिए आगामी होलिका दहन में हमें अधिक से अधिक गोबर के कंडों या गोबर काष्ठ का प्रयोग करना चाहिए और देश के पर्यावरण को संरक्षित रखने में अपना योगदान देना चाहिए।


हमारे वृंदावन आवास के भोजन कक्ष की गोबर से लिपी दीवार पर बालकृष्ण के वन भोज का चित्र


Monday, March 1, 2021

भ्रष्टाचार क्या सिर्फ भाषण का विषय है?


पश्चिम बंगाल के चुनाव सिर पर हैं। राजनैतिक गतिविधियाँ ज़ोर पकड़ने लग चुकी हैं। राजनैतिक पार्टियाँ एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर जनता के बीच एक दूसरी की छवि ख़राब करने पर जुटे हुए हैं। राजनीति में छवि का महत्त्व बहुत ज्यादा होता है। एक बार जो छवि बन जाये उसे बदलना सरल नहीं होता। चुनाव किसी भी राज्य में हों या फिर लोक सभा के चुनाव हों हर दल अपने विरोधियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं और खूब शोर मचाते हैं। पर इससे निकलता कुछ भी नहीं है। न तो भ्रष्ट राजनैतिक व्यवस्था सुधरती और न ही देश की जनता को राहत मिलती है। 


दरअसल राजनीति से जुड़ा कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता कि किसी भी घोटाले की ईमानदारी से जांच हो और दोषियों को सजा मिलें। क्योंकि वो जानते हैं कि आज जो आरोप उनके विरोधी पर लग रहा है कल वो उन पर भी लग सकता है। हर दल की यही मंशा होती है कि वे अपने विरोधी दल के भ्रष्टाचार के काण्ड को जनता के बीच उछाल कर ज्यादा से ज्यादा वोटों को बटोर लें। इस प्रक्रिया में मूर्ख जनता ही बनती है। आज नैतिकता पर शोर मचाने वाले हर दल से पूछना चाहिए कि जिस काण्ड में सबूत न के बराबर हैं उसपर तो आप इतने उत्तेजित हैं पर जिस जैन  हवाला काण्ड में हजारों सबूत मौजूद थे उसकी जांच की मांग के नाम पर हर दल क्यों चुप रहा ? आपको भ्रष्टाचार पर शोर मचाने की हकीकत खुद ब खुद पता चल जाएगी।



कोई भी पार्टी हो या कोई भी सरकार, सभी भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने का दावा समय-समय पर करते रहते हैं। देश के कई प्रधानमंत्रियों ने भी घोषणा की हैं कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए कटिबद्ध है। भ्रष्टाचार के मामले में कुछ रोचक तथ्यों को ध्यान में रखना जरूरी है। सभी घोटाले प्रायः चुनाव के पहले ही उछाले जाते हैं। चुनाव के दौरान जनसभाओं में उत्तेजक भाषण देकर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर करारे हमले किए जाते हैं। दोषियों को गिरफ्तार करने और सजा देने की मांग की जाती है। ये सारा तूफान चुनाव समाप्त होते ही ठंडा पड़ जाता है। फिर कोई उन घोटालों पर ध्यान नहीं देता। अगले चुनाव तक उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण बोफोर्स कांड है। पिछले कई सालों से हर लोकसभा चुनाव के पहले इस कांड को उछाला जाता है और फिर भूल जाया जाता है। आज तक इसमें एक चूहा भी नहीं पकड़ा गया। दूसरी तरफ जैन हवाला कांड था जिसे किसी भी चुनाव में कोई मुद्दा नहीं बनाया गया  क्योंकि इस कांड में हर बड़े दल के प्रमुख नेता फंसे धा तो शोर कौन मचाए?


अगर किसी नेता ने रिश्वत लेता है तो इसमें कोई नई बात नहीं। देश में रिश्वत लेना इतना आम हो चुका है कि ऐसी खबरों पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग तो मान ही चुके हैं कि राजनीतिक भ्रष्टाचार का पर्याय है। यहां तक कि भारत के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए श्री इंद्र कुमार गुजराल ने कहा था कि वे भ्रष्टाचार को रोकने में असहाय हैं। उधर भारत के मुख्य न्यायाधीश पद पर रहते हुए न्यायमूर्ति एस.पी.भरूचा ने भी स्वीकारा था कि उच्च न्यायपालिका में 20 फीसदी भ्रष्टाचार है। विधायिका और न्यायपालिका के शिखर पुरुष अगर ऐसी बात कहते हैं तो कार्यपालिका के बारे में तो किसी को कोई संदेह ही नही कि वहां ऊपर से नीचे तक भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। 


लोकतंत्र के तीन खम्भे इस बुरी तरह भ्रष्टाचार के कैंसर से ग्रस्त हैं कि किसी को कोई रास्ता नहीं सूझता। ऐसे माहौल में जब कभी कोई घोटाला उछलता है तो दो-चार दिन के लिए चर्चा में रहता है और फिर लोग उसे भूल जाते हैं।


अगर केंद्र सरकार वाकई भ्रष्टाचार को दूर करना चाहती है तो क्या वह यह बताएगी कि जिन आला अफसरों के खिलाफ सीबीआई ने मामले दर्ज कर रखे हैं उसके खिलाफ सीबीआई को कार्यवाही करने की अनुमति आज तक क्यों नहीं दी गई? सरकार के प्रमुख नेता क्या ये बताएंगे कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में सीबीआई के जिन अफसरों ने अपराधियों की मदद की, उन्हें सजा के बदले पदोन्नति या विदेशों में तैनाती देकर पुरस्कृत क्यों किया गया? क्या वे बताएंगे कि उनके दल के सभी नेता पद संभालते समय अपनी अपनी संपत्ति का पूरा ब्यौरा जनता को क्यों नहीं देते? क्या वे बताएंगे कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद केन्द्रीय सतर्कता आयोग को यह अधिकार क्यों नहीं दिया गया कि आयोग उच्च पदासीन अफसरों और नेताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले में जांच करने के लिए स्वतंत्र हों? क्या वे बताएंगे कि उन्होंने अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपित व्यक्तियों को महत्वपूर्ण पदों पर तैनात क्यों किया? क्या देश में उसी अनुभव और योग्यता के ईमानदार अफसरों की कमी हो गई है? क्या सरकार बताएगी कि सीबीआई के पास भ्रष्टाचार के जो बड़े मामले ठंडे बस्ते में पड़े हैं, उनकी जांच में तेजी लाने के लिए उन्होंने क्या प्रयास किए? अगर नहीं तो क्यांें नहीं?

 

दरअसल कोई राजनेता देश को भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं करना चाहता। केवल इसे दूर करने का ढिंढोरा पीटकर जनता को मूर्ख बनाना चाहता हैं और उसके वोट बटोरना चाहता है। यही वजह है कि चुनाव के ठीक पहले बड़े-बड़े घोटाले उछलते हैं। जब भारत के मुख्य न्यायाधीश ही मान चुके कि उच्च न्यायपालिका में बीस फीसदी लोग भ्रष्ट हैं, तो कैसे माना जाए कि सैकड़ों करोड़ों रुपये के घोटाले करने वाले राजनेताओं को सजा मिलेगी। दिवंगत हास्य कवि काका हाथरसी कहा करते थे -क्यों डरता है बेटा रिश्वत लेकर, छूट जाएगा तू भी रिश्वत देकर।


चुनाव में धन चाहिए। धन बड़े धनाढ्य ही दे सकते हैं। बड़ा धनाढ्य बैंकों के बड़े कर्जे मारकर और भारी मात्रा में कर चोरी करके ही बना जाता है। ऐसे सभी बड़े धनाढ्य चाहते हैं कि सरकार में वो लोग महत्वपूर्ण पदों पर रहें जो उनके हित साधने वाले हों। ऐसे लोग वही होंगे जो भ्रष्ट होंगे। यह एक विषमचक्र है, जिसमें हर राजनेता फँसा है। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए व्यक्तिगत रूप से व्यक्ति को परमत्यागी होना पड़ेगा। आज के राजनेता भोग के मामले में राज परिवारों को पीछे छोड़ चुके हैं। न तो वे त्याग करने को तैयार हैं और न ही अपने सुख पर कोई आंच आने देना चाहते हैं इसलिए उनमें जोखिम उठाने की क्षमता भी नहीं हैं। बिना जोखिम उठाए ये लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। इसलिए भ्रष्टाचार का प्रत्येक मामला पानी के बुलबुले की तरह उठता है और फूट जाता है। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

Monday, February 22, 2021

क्या ट्विटर की जगह ले पाएगा भारत का ‘कू’?


पिछले कुछ हफ़्तों से भारत सरकार और ट्विटर में जो विवाद चल रहा है वह जग ज़ाहिर है। यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि ट्विटर सरकार की आँख की किरकिरी क्यों बना हुआ है। दरअसल सरकार काफ़ी समय से ट्विटर पर दबिश डाले हुए है कि अगर भारत में ट्विटर चलाना है तो उसे सरकार के हिसाब से ही चलाना होगा। लेकिन अमेरिकी कम्पनी ट्विटर पर इस दबिश का कुछ ख़ास असर पड़ता हुआ नहीं दिख रहा था। उधर दूसरी ओर भारत सरकार ने एक मुहिम के तहत ट्विटर के मुक़ाबले एक देसी ऐप ‘कू’ को खड़ा कर दिया है। जहां ट्विटर पर अपनी बात कहने को ‘ट्वीट’ कहा जाता है वहीं ‘कू’ पर अपनी बात को कहने को क्या कहा जाएगा यह अभी स्पष्ट नहीं है।



देखा जाए तो दस महीने पहले शुरू हुए ‘कू’ ने अचानक कुछ हफ़्तों से रफ़्तार पकड़ ली है। बस इसी रफ़्तार के कारण कोतूहल पैदा हो रहा है कि आख़िर यह हुआ कैसे? दरअसल सरकार ने ट्विटर पर दबाव बनाया था कि लगभग एक हज़ार से अधिक ट्विटर के अकाउंटों को बंद कर दिया जाए क्योंकि इन अकाउंट्स को इस्तेमाल करने वाले लोग माहौल ख़राब कर रहे हैं। लेकिन इस ग्लोबल माइक्रोब्लॉग साइट के मालिकों के जवाब दिया कि ट्विटर पर आपत्तिजनक सामग्री को पहचानने और रोकने की हमारे पास एक पुख़्ता प्रणाली है और ऐसी सामग्री को हम पहले ही हटा देते हैं। इस तरह ट्विटर ने सरकार इस माँग को पूरा करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही अमरीकी कम्पनी ट्विटर ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उनका काम स्वस्थ सार्वजनिक संवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रखना ही है।



ट्विटर के ऐसे जवाब के बाद सरकार ने एक ओर ट्विटर पर कड़ाई बरतने के संकेत दिए और साथ ही दूसरी ओर देसी ऐप ‘कू’ को बढ़ावा देने में लग गई। ‘कू’ पर एकाएक मंत्रालयों, मंत्रियों, नेताओं, अभिनेता और सेलेब्रिटियों, के जाने की होड़ सी लग गई है। माना यह जा रहा है कि इससे ट्विटर पर अप्रत्यक्ष दबाव बनेगा। दबाव पड़ने की अटकलें फ़िज़ूल भी नहीं है क्योंकि अमरीका और जापान के बाद भारत में ही ट्विटर के सबसे ज़्यादा यूज़र्ज़ हैं। या यूँ कहें कि एक कम्पनी के रूप में ट्विटर का बहुत कुछ दांव पर लगा है। जहां दुनिया में ट्विटर के 130 करोड़ खाते हैं जिसमें से ऐक्टिव यूज़र्ज़ लगभग 34 करोड़ हैं। भारत में इन ऐक्टिव खातों की संख्या लगभग 2 करोड़ है। जबकि एक नए ऐप ‘कू’ के एक्टिव यूज़र्ज़ केवल 10 लाख तक ही पहुँच पाए हैं। जहां ‘कू’ केवल दस महीने पुराना है वहीं ट्विटर 2006 में शुरू हुआ था। इसलिए 15 साल पुराने और लोकप्रिय ट्विटर के प्रतिद्वंदी के रूप में ‘कू’ का आँकलन करना अभी जल्दबाज़ी माना जाएगा।


अगर ‘कू’ की कामयाबी की गुंजाइश देखना चाहें तो चीन का उदाहरण सबके सामने है। वहाँ बहुत पहले से ही ट्विटर, फ़ेसबुक, यूट्यूब जैसे सभी सोशल मीडिया प्लैट्फ़ोर्म सालों से बंद हैं। वहाँ ट्विटर की जगह उनका देसी ऐप ‘वीबो’ है और वाट्सएप की जगह ‘वी-चैट’ चलता है। चीन की जनता कई सालों से इन्हीं का इस्तेमाल कर रही है। 


इस विवाद से हमें सेंसर बोर्ड की याद आती है। जिसे बनाने का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि समाज के हित के विरूद्ध कोई फिल्म जन प्रदर्शन के लिए न जाए। माना जाता था कि जिन फिल्मों में हिंसा या कामुकता दिखाई जाती है या जिनसे साम्प्रदायिक उन्माद फैलता हो या देश की सुरक्षा को खतरा पैदा होता हो या समाज के किसी वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचती हो तो ऐसी फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति न दी जाए। जिस दौर में सेटैलाईट चैनलों का अवतरण नहीं हुआ था तब सेंसर बोर्ड का काफी महत्व होता था। पर सेटैलाईट चैनलों और सोशल मीडिया के आने के बाद से सेंसर बोर्ड की सार्थकता ख़त्म हो गई है। 


आरोप लागत रहा है कि सेंसर बोर्ड को आज तक आए सभी सत्तारूढ़ दलों ने अपने विरोधियों की कलाई मरोड़ने के लिए इस्तेमाल किया है। आपात काल में ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म को इसी तरह रोका गया। बाद में उस पर काफी विवाद हुआ। उन दिनों ऐसा लगता था मानो कांग्रेस ही मीडिया की स्वतंत्रता का हनन करती है बाकी विपक्षी दल तो मीडिया की स्वतंत्रता के हामी है, खासकर भाजपा के नेता खुद को बहुत उदारवादी बताते थे। पर यह सही नहीं है। 


एक तरफ तो हम मुक्त बाजार और मुक्त आकाश की हिमायत करते हैं और दूसरी तरफ देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी को सरकार की कैंची से पकड़कर रखना चाहते हैं, यह कहां तक सही है ? यही आज विवाद का विषय है। अब देखना यह है कि ट्विटर और ‘कू’ को लेकर देश की जनता का रवैया क्या रहता है। यानी पुरानी और लोकप्रिय ट्विटर और एक नई देसी ऐप ‘कू’ के सामने टिके रहने के लिए चुनौती कम नहीं रहने वाली है इतना तो तय है।             

Monday, February 15, 2021

भारत कैसे फिर बने गणराज्य


दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र, अमरीका नहीं भारत है। 600 ई॰पू॰ भारत में सैंकड़ों गणराज्य थे। जहां बिना लिंग और जाति भेद के समाज के हर वर्ग के प्रतिनिधि खुली चर्चाओं के बाद शासन के नियम और क़ानून तय करते थे। फिर राजतंत्र की स्थापना हुई और दो हज़ार से ज़्यादा वर्षों तक चली। माना यह जाता है कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान पश्चिमी विचारों से प्रभावित हो कर समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व का भारत में प्रचार हुआ और उसी से जन्मा हमारा आज का लोकतंत्र। जिसे आज पूरी दुनिया में  इसलिए सराहा जाता है क्योंकि इसमें बिना रक्त क्रांतियों के चुनाव के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीक़े से सरकारें बदल जाती हैं। जबकि हमारे साथ ही आज़ाद हुए पड़ोसी देशों में आए दिन सैनिक तख्ता पलट होते रहते हैं। आज पूरी दुनिया मानती है कि शासन का सबसे बढ़िया प्रारूप लोकतंत्र है। क्योंकि इसमें किसी के अधिनायकवादी बनने की संभावना नहीं रहती। एक चाय बेचने वाला भी देश का प्रधान मंत्री बन सकता है या एक दलित भारत का राष्ट्रपति या मुख्य न्यायाधीश बन सकता है। अपनी इस खूबी के बावजूद भारत के लोकतंत्र की ख़ामियों पर सवाल उठते रहे हैं। 


सातवें दशक में गुजरात के छात्र आंदोलन और फिर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संघर्षवाहिनी के माध्यम से पैदा हुए जनआक्रोश की परिणिति पहले आपातकाल की घोषणा और फिर केंद्र में सत्ता पलटने से हुई। तब से आजतक अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों और क्षेत्रीय आंदोलनों के कारण प्रांतों और केंद्र में सरकारें चुनावों के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीक़े से बदलती रही हैं। लेकिन हमारे लोकतंत्र की गुणवत्ता नहीं सुधरी। इसके विपरीत राजनीति में जवाबदेही और पारदर्शिता का तेज़ी से पतन हुआ है। आज राजनीति में न तो विचारधारा का कोई महत्व बचा है और न ही ईमानदारी का। हर दल में समाज के लिए जीवन खपाने वाले कार्यकर्ता कभी भी अपना उचित स्थान नहीं पाते। उनका जीवन दरी बिछाने और नारे लगाने में ही समाप्त हो जाता है। हर दल चुनाव के समय टिकट उसी को देता है जो करोड़ों रुपया खर्च करने को तैयार हो या उसके समर्थन में उसकी जाति का विशाल वोट बैंक हो। फिर चाहे उसका आपराधिक इतिहास रहा हो या उसने बार-बार दल बदले हों, इसका कोई विचार नहीं किया जाता। 


यही कारण है कि आज भारत में भी लोकतंत्र सही मायने में जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर रहा। हर दल और हर सरकार में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अधिनायकवादी प्रवृतियाँ ही देखी जाती हैं। परिणामतः भारत हमेशा एक चुनावी माहौल में उलझा रहता है। चुनाव जीतने के सफल नुस्ख़ों को हरदम हर दल द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। नतीजतन देश में साम्प्रदायिक, जातिगत हिंसा या तनाव और जनसंसाधनों की खुली लूट का तांडव चलता रहता है। जिसके कारण समाज का हर वर्ग हमेशा असुरक्षित और अशांत रहता है। ऐसे में आम जन के सम्पूर्ण विकास की कल्पना करना भी बेमानी है। मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आज भी हमारा बहुसंख्यक समाज रात दिन संघर्षरत रहता है।

पिछले कुछ हफ़्तों से चल रहे किसान आंदोलन को मोदी जी किसानों का पवित्र आंदोलन बताते हैं और आंदोलनजीवियों पर प्रहार करते हैं। अपनी निशपक्षता खो चुका मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आंदोलनकारियों को आतंकवादी, खलिस्तानी या नकसलवादी बताता है। विपक्षी दल सरकार को पूँजीपतियों का दलाल और किसान विरोधी बता रहे हैं। पर सच्चाई क्या है? कौनसा दल है जो पूँजीपतियों का दलाल नहीं है? कौनसा दल है जिसने सत्ता में आकर किसान मज़दूरों की आर्थिक प्रगति को अपनी प्राथमिकता माना हो? धनधान्य से भरपूर भारत का मेहनतकश आम आदमी आज अपने दुर्भाग्य के कारण नहीं बल्कि शासनतंत्र में लगातार चले आ रहे भ्रष्टाचार के कारण गरीब है। इन सब समस्याओं के मूल में है संवाद की कमी। 

आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच जो परिस्थिति आज पैदा हुई है वह भी संवाद की कमी के कारण हुई है। अगर ये कृषि क़ानून समुचित संवाद के बाद लागू किए जाते तो शायद यह नौबत नहीं आती। आज दिल्ली बोर्डर से निकल कर किसानों की महा-पंचायतों का एक क्रम चारों ओर फैलता जा रहा है और ये सिलसिला आसानी से रुकने वाला नहीं लगता। क्योंकि अब इसमें विपक्षी दल भी खुल कर कूद पड़े हैं। हो सकता है कि इन महा-पंचायतों के दबावों में सरकार इन क़ानूनों को वापिस ले ले। पर उससे देश के किसान मज़दूर और आम आदमी को क्या उसका वाजिब हक़ मिल पाएगा? ऐसा होना असंभव है। इसलिए लगता है कि अब वो समय आ गया है कि जब दलों की दलदल से बाहर निकल कर लोकतंत्र को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत किया जाए। जिसके लिए हमें 600 ई॰पू॰ भारतीय गणराज्यों से प्रेरणा लेनी होगी। जहां संवाद ही लोकतंत्र की सफलता की कुंजी था। 

सत्तारूढ़ दलों सहित देश के हर दल को इसमें पहल करनी होगी और साथ ही समाज के हर वर्ग के जागरूक लोगों आगे आना होगा। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी महा-पंचायत हर तीन महीने में हर ज़िले के स्तर पर आयोजित की जाए जिनमें स्थानीय, प्रांतीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर जनता के बीच संवाद हो। इन महा-पंचायतों में कोई भी राजनैतिक दल या संगठन अपना झंडा या बैनर न लगाए, केवल तिरंगा झंडा ही लगाया जाए और न ही कोई नारेबाज़ी हो। महा-पंचायतों का आयोजन एक समन्वय समिति करे। जिसमें चर्चा के लिए तय किए हुए मुद्दे मीडिया के माध्यम से क्षेत्र में पहले ही प्रचारित कर दिए जाएँ और उन पर अपनी बात रखने के लिए क्षेत्र के लोगों को खुला निमंत्रण दिया जाए। इन महा-पंचायतों में उस क्षेत्र के सांसद और विधायकों की केवल श्रोता के रूप में उपस्थिति अनिवार्य हो, वक्ता के रूप में नहीं। क्योंकि विधान सभा और संसद में हर मुद्दे के लिए बहस का समय नहीं मिलता। इस तरह जनता की बात शासन तक पहुँचेगी और फिर धरने, प्रदर्शनों और हड़तालों की सार्थकता क्रमशः घटती जाएगी। अगर ईमानदारी से यह प्रयास किया जाए तो निश्चित रूप से हमारा लोकतंत्र सुदृढ़ होगा और हर भारतवासी लगातार सक्रिय रहकर अपने हक़ को पाने के लिए सचेत रहेगा। फिर उसकी बात सुनना सरकारों की मजबूरी होगी।      

Monday, February 8, 2021

जो धर्मपाल जी को नहीं जानते वो भारत को नहीं जानते


यह सोशल मीडिया का कमाल है कि जो लोग राजीव दीक्षित के भाषणों को सराहते हैं वे भी धर्मपाल जी को नहीं जानते। जबकि दिवंगत राजीव दीक्षित ने जो कुछ बोला वो सब धर्मपाल जी के ही शोध पर आधारित था, जिनके राजीव सहायक थे। धर्मपाल जी भारत के ऐसे विचारक, इतिहासकार, दार्शनिक और लेखक थे, जिन्होंने वर्षों लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ीयम में भारत के गौरवमयी इतिहास पर अभूतपूर्व शोध किया। अंग्रेजों से पहले भारत कैसा था - इस बात की खोज में उन्होंने भारत से लेकर ब्रिटेन तक 30 साल लगाए। हिन्दुस्तान में विज्ञान के इतिहास, पुराने समाज और लोगों के बारे में उन्होंने काफी लिखा है। उनकी कुछ किताबें हैं - इंडियन साइंस एण्ड टेक्नालॉजी इन एट्टीन्थ सेंचुरी (1971), द ब्यूटीफुल ट्री: इंडिजीनस इंडियन एजुकेशन इन द एट्टीन्थ सेंचुरी (1971), सिविल डिसओबिडियंस एंड इंडियन ट्रेडिशन (1971) आदि। भारतीय संस्कृति के पुरोधा, धर्मपाल जी का यह जन्मशती वर्ष है। 1922 में जन्मे धर्मपाल जी का 2006 में निधन हो गया। हर्ष की बात है की दशकों से आरएसएस से जुड़े रहे व महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, (मोतिहारी) के कुलाधिपति डॉ. महेश शर्मा उनकी जन्मशती वर्ष पर विशेष आयोजन कर रहे हैं।

धर्मपाल जी दिल्ली रहे हों या वर्धा सेवा ग्राम की कुटी में, हमेंशा दस्तावेजों के मकड़जाल में उलझे रहते थे। अपने समय की मशहूर साप्ताहिक पत्रिका, ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ में उनपर मुख्य आलेख प्रकाशित हुआ था। वे पंचायती राज से लेकर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर भी राय रखते थे और ढेरों विषयों पर  उनकी मजबूत पकड़ थी। इसलिए उस समय का बौद्धिक जगत उनके आगे नतमस्तक था। आईआईटी, दिल्ली में आयोजित एक चर्चा में उन्होंने 10वीं शताब्दी में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विषय पर आँखें खोलने वाली प्रस्तुति की थी । वे लोहा और इस्पात बनाने की देशज तकनीक के भी अच्छे जानकार थे। आज भी लोहे की ढलाई का वैसा काम छोटे-छोटे कारखानों में होता है जो देश भर में फैले हुए हैं। 



धर्मपाल जी ने 1982 में एक व्याख्यान में  कहा था कि अभी तक भारत में एक प्रतिशत लोग भी यूरोप के प्रभाव से मुक्त नहीं हुए हैं और बाकी के लोग जाने-अनजाने इन एक प्रतिशत लोगों के माया जाल में फंसे हुए हैं। उनका मानना था कि इन लोगों को उस समय के तंत्र का समर्थन हासिल था। धर्मपाल जी ने पहली बार सरकारी पशु आयोग का अध्यक्ष बनना स्वीकार किया था। गोवंश संरक्षण की भावना से प्रेरित इस आयोग में उनकी लिखी रिपोर्ट कई मायने में ऐतिहासिक है। अद्भुत तथ्यों के आधार पर तैयार की गई ये रिपोर्ट सांप्रदायिक सद्भाव की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह उनका तैयार किया गया अंतिम दस्तावेज है। इसके बाद वे ज्यादा समय तक हमारे बीच नहीं रह पाए। उनका मानना था कि भारत में गोमांस की नियमित आपूर्ति अंग्रेज सैनिकों की जरूरत थी। इसीलिए गोहत्या शुरू हुई और कत्लखाने बढ़ते गए। अंग्रेजों ने अपनी चाल में इसके लिए मुस्लिम व्यापारियों को प्रेरित किया। धर्मपाल जी ने कई सरकारी आदेशों का विवरण देकर बताया कि ज्यादातर मुस्लिम शासकों ने अपने साम्राज्य की स्थिरता के लिए गोहत्या रोकने पर जोर दिया। डॉ. महेश शर्मा का मानना है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव बढ़ाने का यह काम धर्मपाल जी ही कर सकते थे। अंग्रेजों के राज से संबंधित इतने  सारे दस्तावेज किसी और के पास नहीं थे। उनके अनुसार इस रिपोर्ट की सराहना होनी चाहिए। ग़लतफ़हमी यह है कि देश में अंग्रेजों के आने से गोहत्या कम हुई। जबकि सच्चाई यह है कि मुस्लिम समाज के पास पहले से ही मांसाहार के अन्य विकल्प मौजूद थे। तब बकरों का मांस प्रचलित था। अन्य पशु भी थे। वैसे भी अरब से आए लोगों में गोमांस का आमतौर पर प्रचलन नहीं था। 

 

अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस पर आयोजित एक परिचर्चा को सम्बोधित करते हुए धर्मपाल जी ने कहा था कि भारत की स्थिति अराजकता और अव्यवस्था की है। यह ऐसी स्थिति है जब कुछ काम नहीं होता। अयोध्या का मामला लंबे समय से भारतीय समाज के ध्यान में है। राम-राज्य की संकल्पना समूचे भारतवासियों और पूरी दुनिया में बसे हिन्दू समाज के लिए गहरी आस्था का विषय है। राम-राज्य की अवधारणा में धर्माधिष्ठित समाज-केंद्रित राज्य व्यवस्था है। यह गांधी के पंचायती-राज, लोहिया के चौखंबाराज, दीनदयाल उपाध्याय के पंचवलयी शासन के अनुकूल शासन और जेपी के सामुदायिक–प्रबंधन से पूरा मेल खाती है। लेकिन भारत की मौजूदा व्यवस्था विदेशी संकल्पना पर आधारित है। आज नहीं तो कल, देश को इस बेमेल ढांचे को भी ध्वस्त करना होगा। पर ये आसान नहीं है, क्योंकि वर्तमान नेताओं और अमीरों का इसे ही जारी रखने में स्वार्थ है।


धर्मपाल जी देशज तकनीकी अपनाने और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थापना के पक्षधर थे। देश में आज फैली भयंकर बेरोज़गारी व आर्थिक समस्याओं का समाधान उनकी इसी सोच से निकलेगा, ऐसा देश में बहुत से विचारवान लोगों का विश्वास है। उनकी जन्म शताब्दी मनाकर डाक्टर महेश शर्मा एक बार फिर उस पुरोधा की याद ताज़ा करवा रहे हैं। धर्मपाल जी का हमारे घर कई बार आना हुआ। लंदन में बीबीसी संवाददाता उनकी पुत्री को आज से तीन दशक पहले दिल्ली में मैंने अपने सहयोगी पत्रकारों से मिलवाया था। धर्मपाल जी की लिखी और अब हिंदी में अनुवादित पुस्तकों का अध्ययन हर बुद्धिजीवी, पत्रकार, वकील, अफ़सर, नेता, किसान व व्यापारी को करना चाहिए। जिससे हमारी समझ साफ़ होगी और भारत की क्षमता के प्रति सम्मान व सच्चा स्वाभिमान जागृत होगा। जिससे बनेगा भारत एक आत्मनिर्भर सशक्त राष्ट्र।

Monday, February 1, 2021

पधारो म्हारे देस


पूरा साल कोविड के चक्कर में कहीं घूमने जाना नहीं हुआ। इस हफ़्ते हिम्मत करके जैसलमेर, जोधपुर में छुट्टी बिताने का सोचा। थार के रेगिस्तान में बसा जैसलमेर, आमतौर पर इन दिनों हज़ारों विदेशी सैलानियों से पटा रहता है। लेकिन इस बार एक साल से कोई विदेशी पर्यटक नहीं आया, जिससे पर्यटन पर आधारित यहाँ की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बैठ चुकी है। तमाम छोटे बड़े होटल बंद पड़े थे या बंद होने की कगार पे थे। पिछले तीन महीनों में जैसे ही कोविड का डर लोगों के मन से दूर हुआ तो गुजरात, राजस्थान और दिल्ली आदि के पर्यटकों का सैलाब टूट पड़ा। उससे यहाँ के पर्यटन उद्योग को कुछ आक्सीजन मिली है। स्थानीय लोगों का कहना था कि पूरे कोविड काल में जैसलमेर और आसपास के इलाक़े में इस महामारी का कोई ख़ास असर नहीं था। न तो लोगों ने मास्क पहने और न सामाजिक दूरी बनाई। कमोबेश यही हालत सारे देश की रही है। कोविड का जो भी घातक असर देखने को मिला वो केवल मुंबई, इंदौर, दिल्ली जैसे नगरों और मध्यमवर्गीय या उच्चवर्गीय परिवारों में ही देखा गया। हमारे मथुरा ज़िले के किसी भी गाँव में कोविड महामारी के रूप में नहीं आया। पर कोविड के आतंक से जिस तरह के अप्रत्याशित कदम उठाए गए उससे अर्थव्यवस्था की रीढ़ पूरी तरह टूट गई। यही कारण है कि गरीब आदमी, मजदूर, किसान और छोटे दुकानदार और कारख़ानेदार हर शहर में ये प्रश्न करते हैं कि क्या वह सब ज़रूरी था? अगर यह माना जाए कि ऐसी कड़ी रोकथाम से ही भारत में कोविड पर क़ाबू पाया जा सका तो यह भी सही नहीं होगा। क्योंकि जब देश की बहुसंख्यक आबादी ने कोविड के प्रतिबंधों का पालन ही नहीं किया और फिर भी इस महामारी के प्रकोप से ईश्वर ने भारतवासियों की रक्षा की तो यह स्पष्ट है कि भारत के लोगों में प्रतिरोधी क्षमता, पश्चिमी देशों के लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा है। क्योंकि हम बचपन से विपरीत परिस्थितियों से जूझ कर बड़े होते हैं और वे बहुत ज़्यादा सावधानियों के साथ। 



इस इलाक़े में आने से पहले, एक कल्पना थी कि चारों ओर रेत के टीले ही टीले होंगे। पर राजमार्ग के दोनों तरफ़ हरयाली और खेत देख कर आश्चर्य हुआ। पता चला ये कमाल है इंदिरा नहर का। जिसके आने के बाद से अब यहाँ बारिश भी साल में 10-12 बार हो जाती है। जबकि पहले बारिश सालों में एक बार होती थी। इससे ये सिद्ध होता है कि समुचित जल प्रबंधन से देश का कायाकल्प हो सकता था। आज़ादी के बाद खर्बों रुपया बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं पर खर्च हुआ। बावजूद इसके आज भी हम वर्षा के मात्र 10 फ़ीसदी जल का ही संचयन कर पाते हैं। जबकि 90 फ़ीसदी जल बह कर नदियों के रास्ते समुद्र में चला जाता है। जल संचयन के राजस्थान के इतिहास को सराहना पड़ेगा। जहां पानी की एक एक बूँद को सोने से भी ज़्यादा क़ीमती मानकर सहेजने की स्थानीय तकनीकी विकसित की गई जो आजतक कारगर हैं। जबकि पाइपलाइन से जल आपूर्ति की ज़्यादातर योजनाएँ समय से पहले ही अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गई। जल के विषय में इतना शोर मच रहा है पर हम अनुभव से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं। कुंडों, सरोवरों और तालाबों के जीर्णोद्धार के नाम पर कैसे काग़ज़ी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं इस पर हम पहले भी काफ़ी लिख चुके हैं। आधुनिक जीवन शैली में हमारे बाथरूम पानी की आपराधिक बर्बादी करते हैं। जबकि जैसलमेर की सबसे धनी सेठों की ‘पटवों की हवेली’ में जिस पानी से नहाया जाता था, उसी को एकत्र करके कपड़े धुलते थे और कपड़े धुलने के बाद उसी पानी से फिर फ़र्श और गली धोए जाते थे। आज हम ऐसा नहीं कर सकते पर पानी की बर्बादी पर रोक लगाने की मानसिकता भी विकसित करने को तैयार नहीं हैं। जबकि हर शहर का भूजल स्तर तेज़ी से गिरता जा रहा है और जल संकट गहराता जा रहा है। 


पर्यटन की दृष्टि से अब भारत के मध्यमवर्गीय परिवारों ने एक बड़ा बाज़ार खड़ा कर दिया है। इसलिए इस वर्ग को भी पर्यटन के शिष्टाचार सीखने की ज़रूरत है। आप दुबई के रेगिस्तान में बने ‘डेज़र्ट सफ़ारी’ में जाएं तो आपको प्लास्टिक छोड़ ऊँटों की लीद भी देखने को नहीं मिलेगी। जबकि जैसलमेर के पास मशहूर ‘डेज़र्ट रिज़ॉर्ट’ सम नाम के क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय हो गया है। हज़ारों टेंटों में पर्यटक यहाँ रात बिताते हैं पर पूरे क्षेत्र को प्लास्टिक की बोतलों, थैलों, शराब की बोतलों व दूसरे कचरों से पाट कर चले जाते हैं। ऊँट की लीद तो सारे इलाक़े में फैली पड़ी है। इस पर राजस्थान सरकार के पर्यटन विभाग को ध्यान देना चाहिए। 


हमारी इस यात्रा का ‘हाई पोईंट’ था भारत पाकिस्तान के बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल की पोस्ट पर जा कर उनके जीवन को देखना। जिस गलवान घाटी में बर्फ़ की तहों के अंदर खड़े हो कर हमारे सैनिक सीमा की रक्षा करते हैं। उससे कम नहीं है थार के रेगिस्तान में 55 डिग्री सेल्सियस की तपती लू और कई दिनों चलने वाली काली आँधी में बीएसएफ़ के जवानों का पाकिस्तान के विरुद्ध मोर्चा लेना। इन जवानों और अफ़सरों के हौसले को सलाम हैं। रोचक बात यह पता चली कि जहां भारत ने 1751 किलोमीटर की पूरी सीमा पर कटीले तारों की मज़बूत बाड़, हर 100 मीटर पर सर्च लाइट के खम्बे और निरीक्षण कक्ष बना रखे हैं, वहीं अपनी आर्थिक तंगी के चलते पाकिस्तान ऐसा कुछ भी नहीं किया। इससे साफ़ ज़ाहिर है कि पाकिस्तान गुरिल्ला युद्ध या आतंकवाद पनपाने का काम तो कर सकता है पर कोई बड़ा युद्ध लड़ने की उसकी औक़ात नहीं है। यह हमारे लिए संतोष की बात है। कुल मिलाकर ‘पधारो म्हारे देस’ का ये अनुभव बहुत रोचक रहा और उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले महीनों में देश की हालत और सुधरेगी और फिर हम सब भारतवासी आनंद और उमंग से वैसे ही जिएँगे जैसा सदियों से जीते आए हैं।        

Monday, January 25, 2021

भंगेड़ी नहीं, सरकार समझे भांग के फायदे


आम शहरी भांग को नशा मान कर हिकारत से देखता है। पर भोलेनाथ शंकर और भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ जी के भक्त भांग का भोग लगा कर उसका प्रसाद पाते हैं। भांग से हमारे देश की गरीब जनता और अर्थव्यवस्था को कितना लाभ हो सकता है इसका नीति-निर्धारकों को शायद एहसास ही नहीं है। भांग एक अकेला ऐसा दैवीय पौधा है जिससे हमे भोज्य पदार्थ, कपड़ा, भवन और औषधि प्राप्त होती है। इसके औषधीय गुण वेदों से लेकर चरक संहिता तक में वर्णित है। भारत में भांग की खेती पर अंग्रेजी हुकूमत ने जो कुठाराघात किया था, उसकी मार हम आजतक झेल रहे हैं। जबकि चीन भांग पर आधारित उत्पादनों का निर्यात कर अरबों रुपए कमा रहा है। इजराइल, अमेरिका और कनाडा में भांग से बनी औषधि पर मोटा मुनाफा कमाया जा रहा है। आज इजराइल की भांग से सर्वश्रेष्ठ औषधीय कैनाबिस निकल रहा है जबकि हम इन दवाओं का 5000 साल से उपयोग कर रहे हैं। भांग के पौधे से 25000 तरह के उत्पाद बनते है जिसमें कपड़े से लेकर ईंट, दवा, प्रोटीन, एमिनो एसिड्स, कागज, प्लाईवुड, बायो फ्यूल और प्लास्टिक तक शामिल है। इसलिए भांग बिलियन डॉलर फसल है।

शिवप्रिया भांग, समुद्र मंथन के बाद शिव जी द्वारा विश्व को दिया गया प्रसाद है। भारत की शिवालिक पर्वतमालाओं से ही भांग पूरे विश्व मे फैली और भांग जिस-जिस देश मे गयी उस देश के हिसाब से उसने पिछली सदियों में अपने डीएनए में परिवर्तन किया। जिससे उसके औषधीय गुण बदलते चले गए, पर भारत मे उपलब्ध भांग आज भी अपने मूल वैदिक रूप में ही है। इससे औषधियां बनती हैं। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय ही भांग से 400 तरह की औषधियां बनाने का लाइसेंस देता है।


उत्तराखंड राज्य की भांग नीति और एफ.एस.एस.ए.आई की भांग उत्पाद की लाइसेंस नीति में औपनिशिक मानसिकता से ग्रस्त अधिकारियों की गलती से हमारी देशी शिवप्रिया भांग, जिसे यजुर्वेद में विजया कहा गया है, उसे नष्ट करने की साजिश रची गयी है। जो राष्ट्रहित और हमारी सनातनी विचारधारा के खिलाफ है। यह नीति जीएम (आनुवंशिक परिवर्तित) बीज को प्रोत्साहित कर रही है, जो देश के लिए अति घातक है।

भारतीय भांग की कोई भी प्रजाति, उत्तराखंड सरकार और एफ.एस.एस.ए.आई की भांग नीति के मानकों को पूरा नहीं करती। जिससे भारत के भांग उत्पादक विदेशी भांग के बीज आयात आयात कर के बोने के लिए बाध्य हैं। मजबूरी में उन्हें जीएम बीज लगाने पड़ रहे हैं। अगर यह बीज भारत आया तो परागण करके हमारी सदियों पुरानी शुद्ध देशी भांग को नष्ट कर देगा। ऐसे ही बीजों से हमारी देसी भांग क्रॉस पोलिनेट हो रही है। अगले तीन वर्षों में हमारी औषधि युक्त भांग नष्ट हो जाएगी और खरपतवार रूपी विदेशी भांग भारत की नियति होगी।

प्रश्न है कि देशी भांग नष्ट क्यों होगी? अन्य पौधों की तरह भांग भी परागण करती है। दस  किलोमीटर तक नर पौधे का पराग हवा में उड़ कर मादा पौधे को निषेचित करता है। इस तरह भारत अपनी सर्वश्रेष्ठ भांग को अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार कर नष्ट कर देगा। जैसे हमने अपनी देशी गाय को कृत्रिम गर्भाधान करवा कर उसकी शुद्ध नस्लों को खत्म कर दिया वैसे ही भांग का ये विदेशी पौधा हमारी देशी भांग को बर्बाद कर देगा।

गाय की पीढ़ी तो कम से कम चार साल में बदलती है। एक गाय के गर्भाधान के लिए एक इंजेक्शन जरूरी है, मतलब जितने इंजेक्शन उतनी गाय की अगली पीढ़ी वर्ण संकर होगी। पर भांग का एक पौधा दस किलोमीटर की भांग को निषेचित कर सकता है। भांग की एक पीढ़ी सिर्फ तीन महीने में बदल जाती है और भांग साल में तीन बार उगती है। जबकि गेंहू या चावल साल में एक बार ही पैदा होते हैं।


चूँकि गुणवत्ता की दृष्टि से हमारी भांग दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भांग है, जिसको विदेशी कम्पनिया नष्ट कर अपने जीएम बीज बेच कर मोटा फायदा कमाना चाहती हैं। आयुर्वेद की फार्मोकोपिया में जिस भांग से दवा बनाने की विधियां है, वह देसी भांग है। विदेशी भांग से वही दवा बनाने पर हमारी आयुर्वेदिक दवाएं प्रभावी नहीं रहेगी जिससे हमारे आयुर्वेद को भी बहुत नुकसान होगा। जबकि देशी भांग को बचाने से हमारी जैव विविधता बचेगी। बेहतरीन भांग के उत्पादों के निर्माण से लघु व मध्यम उद्योग क्षेत्र, निर्यात, रोजगार और राजस्व बढ़ेंगे। हमारे उत्पाद के लाभ को विदेशी कम्पनियां प्रभावित नहीं कर पाएंगी।

जबकि भांग की देशी प्रजाति को बचा कर और विदेशी प्रजाति को भारत में आने से रोक कर ही सरकार की ‘किसानों की आय दो गुना’ करने की नीति, ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लघु व मध्यम उद्योग क्षेत्र संवर्धन’ की नीति को साकार हो पाएगी। 

इसलिए सरकार को इस विषय पर देशी विशेषज्ञों का पैनल बना कर इस समस्या का तुरंत हल करना चाहिए। जिससे न सिर्फ देश में रोजगार बढ़ेगा बल्कि गाँवों से शहरों की ओर पलायन भी रुकेगा और केंद्र व राज्य सरकार के राजस्व में भारी वृद्धि होगी। हम भारत की श्रेष्ठ भांग का संरक्षण कर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीन के एकाधिकार को भी समाप्त कर सकते हैं। भारत के नीति-निर्धारकों को ये नहीं भूलना चाहिए कि पिछले 74 सालों में हमने कृषि, बागवानी व दुग्ध उत्पादन के क्षेत्रों में भारत की समृद्ध वैदिक ज्ञान परम्परा की उपेक्षा की है। ज्यादा उत्पादन के लालच में हम बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रभाव में अपनी गुणवत्ता और जीवनी शक्ति को लगातार खोते जा रहे हैं। आज कोरोना से जहां  यूरोप और अमरीका में लाखों मौत हो रही हैं वहीं भारत जीतने में इसलिए सफल रहा है क्योंकि हमारा भोजन और जीवन आज भी मूलतः वैदिक परम्पराओं से ही संचालित होता है। इसलिए शिवप्रिय भांग को बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। 

Monday, January 18, 2021

देवदूत थे कमल मोरारका



74 वर्ष की आयु में सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश करते ही एक दीर्घ श्वास छोड़ कर इस नश्वर संसार से परलोक गमन कर गए कमल मोरारका। देश भर में हज़ारों साहित्यकार, कलाकार, समाजसेवी, पत्रकार, राजनेता व अन्य सैकड़ों लोग हैं, जो उन्हें इंसान नहीं फरिश्ता मानते हैं। आज उनके यूँ अचानक चले जाने से वे सब गमगीन हैं। भारत का कोई तीर्थ स्थल नहीं जहां उन्होंने सनातन धर्म की सेवा में उदारता से दान न दिया हो।


वे चंद्रशेखर सरकार के प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री भी रहे और लम्बे समय तक क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष भी रहे। ब्रज क्षेत्र में कुंडों के जीर्णोद्धार में, राजस्थान, हिमाचल व अन्य राज्यों  में जैविक कृषि के प्रसार में, दिल्ली में अनेक साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के संरक्षण में, समाजवादी विचारधारा के लोगों को उनकी गतिविधियाँ चलाने में, नवलगढ़ में हवेलियों के संरक्षण में, वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़ी में, कई मीडिया प्रकाशनों को चलाने में और समकालीन राजनीति पर बेबाक़ी से अपने विचारों को व्यक्त करने में उनकी पूरे देश में अलग ही पहचान थी। 


‘देनहार कोई और है, देत रहत दिन रैन। लोग भरम मो पे करें, या सों नीचे नैन।।’ इस भावना को पूरी तरह चरितार्थ करने वाले कमल मोरारका की जिंदगी से जुडे़ ऐसे सैकड़ों किस्से हैं, जिन्हें उन्होंने कभी नहीं सुनाया, पर वो लोग सुनाते हैं, जिनकी इन्होंने मदद की। ये किस्सा सुनकर शायद आप यकीन न करें। पर है सच। मुंबई के मशहूर उद्योगपति कमल मोरारका अपने मित्रों के सहित स्वीट्जरलैंड के शहर जेनेवा के पांच सितारा होटल से चैक आउट कर चुके थे। सीधे एयरर्पोट जाने की तैयारी थी। तीन घंटे बाद मुंबई की फ्लाइट से लौटना था। तभी उनके निजी सचिव का मुंबई दफ्तर से फोन आया। जिसे सुनकर ये सज्जन अचानक अपनी पत्नी और मित्रों की ओर मुड़े और बोले, ‘आप सब लोग जाईए। मैं देर रात की फ्लाइट से आउंगा’। इस तरह अचानक उनका ये फैसला सुनकर सब चैंक गये। उनसे इसकी वजह पूछी, तो उन्होंने बताया कि, ‘अभी मेरे दफ्तर में कोई महिला आई है, जिसका पति कैंसर से पीड़ित है। उसे एक मंहगे इंजैक्शन की जरूरत है। जो यहीं जेनेवा में मिलता है। मैं वो इंजैक्शन लेकर कल सुबह तक मुबई आ जाउंगा। परिवार और साथी असमंजस्य में पड़ गये, बोले इंजेक्शन कोरियर से आ जायेगा, आप तो साथ चलिए। उनका जबाव था, ‘उस आदमी की जान बचाना मेरे वक्त से ज्यादा कीमती है’।


मोरारका जी का गोवा में भी एक बड़ा बंगला है। जिसके सामने एक स्थानीय नौजवान चाय का ढाबा चलाता था। वे हर क्रिसमस की छुट्ट्यिों में गोवा जाते थे। जितनी बार ये कोठी में घुसते और निकलते, वो ढाबे वाला दूर से इन्हें हाथ हिलाकर अभिवादन करता। दोनों का बस इतना ही परिचय था। एक साल बाद जब ये छुट्ट्यिों में गोवा पहंचे तो दूर से देखा कि ढाबा बंद है। इनके बंगले के चैकीदार ने बताया कि ढाबे वाला कई महीनों से बीमार है और अस्पताल में पड़ा है। इन्होंने फौरन उसकी खैर-खबर ली और मुंबई में उसके पुख्ता और बढ़िया इलाज का इंतेजाम किया।


भगवान की इच्छा, पहले मामले में उस आदमी की जान बच गई। वो दोनों पति-पत्नी एक दिन इनका धन्यवाद करने इनके दफ्तर पहुंचे। स्वागत अधिकारी ने इन्हें फोन पर बताया कि ये दो पति-पत्नी आपको धन्यवाद करने आये हैं। इनका जबाव था कि, ‘उनसे कहो कि मेरा नहीं, ईश्वर का धन्यवाद करें‘ और ये उनसे नहीं मिले। गोवा वाले मामले में, ढाबे वाला आदमी, बढ़िया इलाज के बावजूद मर गया। जब इन्हें पता चला, तो उसकी विधवा से पुछवाया कि हम तुम्हारी क्या मदद कर सकते हैं। उसने बताया कि मेरे पति दो लाख रूपये का कर्जा छोड़ गये हैं। अगर कर्जा पट जाये, तो मैं ढाबा चलाकर अपनी गुजर-बसर कर लूंगी। उसकी ये मुराद पूरी हुई। वो भी बंगले में आकर धन्यवाद करना चाहती थी। इन्होंने उसे भी वही जबाव भिजवा दिया कि मेरा नहीं भगवान का धन्यवाद करो। इसे कहते हैं, ‘नेकी कर, दरिया में डाल’।


दरअसल भारत के पूंजीवाद और पश्चिम के पूंजीवाद में यही बुनियादी अंतर है। पश्चिमी सभ्यता में धन कमाया जाता है, मौज-मस्ती, सैर-सपाटे और ऐश्वर्य प्रदर्शन के लिए। जबकि भारत का पारंपरिक वैश्य समाज ‘सादा जीवन, उच्च विचार के सिद्धांत को मानता आया है। वो दिन-रात मेहनत करता रहा और धन जोड़ता रहा है। पर उसका रहन-सहन और खान-पान बिलकुल साधारण होता था। वो खर्च करता तो सम्पत्ति खरीदने में या सोने-चांदी में। इसीलिए भारत हमेशा से सोने की चिड़िया रहा है। दुनिया की आर्थिक मंदी के दौर भी भारत की अर्थव्यवस्था को झकझोर नहीं पाये। जबकि उपभोक्तावादी पश्चिमी संस्कृति में क्रेडिट कार्ड की डिजिटल इकॉनौमी ने कई बार अपने समाजों को भारी आर्थिक संकट में डाला है। 


अमरिका सहित ये तमाम देश आज खरबों रूपये के विदेशी कर्ज में डूबे हैं। वे सही मायने में चार्वाक के अनुयायी हैं, ‘जब तक जियो सुख से जियो, ऋण मांगकर भी पीना पड़े तो भी घी पियो‘। यही कारण है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की नीतियों को भारत का पारंपरिक समाज स्वीकार करने में अभी हिचक रहा है। उसे डर है कि अगर हमारी हजारों साल की परंपरा को तोड़कर हम इस नई व्यवस्था को अपना लेंगे, तो हम अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक माफियाओं के जाल में फंस जायेंगे। अब ये तो वक्त ही बतायेगा कि लोग बदलते हैं, कि नीतियां।


हम बात कर रहे थे, इंसानी फरिश्तों की। आधुनिकता के दौर में मानवीय संवेदनशीलता भी छिन्न-भिन्न हो जाती है। ऐसे में किसी साधन संपन्न व्यक्ति से मानवीय संवेदनाओं की अपेक्षा करना, काफी मुश्किल हो जाता है। जबकि नई व्यवस्था में सामाजिक सारोकार के हर मुद्दे पर बिना बड़ी कीमत के राहत मुहैया नहीं होती। इससे समाज में हताशा फैलती है। संरक्षण की पुरानी व्यवस्था रही नहीं और नई उनकी हैसियत के बाहर है। ऐसे में इंसानी फरिश्ते ही लोगों के काम आते हैं, पर उनकी तादाद अब उंगलियों पर गिनी जा सकती है। कमल मोरारका एक ऐसी शख्सियत थे, जिनकी जितनी तारीफ की जाये कम है। बहुत याद आएँगे वे।