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Monday, August 24, 2026

विलासिता नहीं, उद्देश्य चाहिए घर के बुजुर्गों को

आधुनिक समाज में सुख की परिभाषा बदल गई है। हम सोचते हैं कि आराम, नौकर-चाकर, ऑनलाइन डिलीवरी और सुविधाओं का ढेर ही जीवन को खुशहाल बना देता है। लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया में एक सच्ची घटना शेयर की गई। जिसने इस धारणा को पूरी तरह झूठा साबित कर दिया। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि आज के पूरे समाज का आईना है, जहाँ हम बुजुर्गों को आराम देकर उनसे उनके जीवन का उद्देश्य छीन लेते हैं, और फिर हैरान होते हैं कि घर में शांति क्यों नहीं बची?


सोशल मीडिया की पोस्ट के अनुसार कहानी पुणे की है। एक बेटा और बहू लंबे समय तक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते रहे। जिनकी मीटिंग्स, डेडलाइन और भागदौड़ भरी व्यस्त जिंदगी थी। घर का लगभग सारा काम उन्होंने आउटसोर्स कर रखा था। कुछ समय बाद में वे दिल्ली लौटे, अपना व्यवसाय शुरू किया और कई वर्षों के अंतराल के बाद पति के 80 वर्षीय माता-पिता उनके साथ रहने लगे।



घर आकर उन्होंने देखा कि बुजुर्ग दंपति का पूरा जीवन छोटी-छोटी जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द घूमता था। सुबह चाय बनाना, अखबार पढ़ना, बाजार जाना, सब्जियों पर मोल-भाव करना, मसालों की चर्चा, रोटियाँ बनाना, कपड़े व्यवस्थित करना आदि, ये सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा थे। यह देख बेटा-बहू भावुक हो गए। उन्होंने सोचा, माता-पिता ने जीवनभर हमारे लिए संघर्ष किया। हमें हर सुख सुविधा दी है। अब हमारी बारी है उन्हें आराम देने की।



उन्होंने पूरी व्यवस्था बदल दी। एक फुल-टाइम रसोइया रख लिया। ई-कॉमर्स कंपनियों से किराना और अन्य ज़रूरी सामान आने लगा। माँ-बाप के लिए अलग-अलग अटेंडेंट और कार व ड्राइवर का इंतज़ाम किया। अटेंडेंट उनके पैर दबाता, जिस्म पर तेल लगाता, चाय-पानी देता, सैर के लिए ले जाता। बच्चों को लगा कि अब माता-पिता सचमुच सुख का जीवन जिएँगे।


लेकिन कुछ ही महीनों में सब बिखर गया। माँ ने चलना-फिरना और काम करना बंद कर दिया। दिन भर सोती रहतीं, सहायकों की हर बात की शिकायतें करतीं, उन पर पूरी तरह निर्भर हो गईं। फिर अवसाद आया और डिमेंशिया के लक्षण शुरू हो गए। पिता चिड़चिड़े और गुस्सैल हो गए। डिलीवरी वालों से झगड़ते, नौकरों को गालियाँ देते, रसोइए को डाँटते, अटेंडेंट पर चीखते चिल्लाते और दिनभर बेमकसद घूमते और गुस्से में घर लौटते। धीरे-धीरे घर का माहौल जहरीला हो गया। बेटा-बहू हैरान हुए कि उनकी इतनी कोशिशों के बावजूद माँ-बाप का जीवन ऐसा खराब क्यों हो गया?



यहीं छिपा था जीवन का गहरा सबक। बुजुर्ग दुखी इसलिए नहीं थे कि उनके जीवन में आराम नहीं था। वे दुखी इसलिए हुए कि उनके जीवन का उद्देश्य ही गायब हो गया था। पहले पिता हर सुबह एक उद्देश्य के साथ उठते थे, पत्नी के लिए चाय बनाते, साथ में अखबार पढ़ते, थैला लेकर बाजार जाते, सब्जियों पर चर्चा करते, मोल-भाव करते। माँ खाने की योजना बनातीं, मसाले जाँचतीं, सबके कपड़े सँभालतीं। ये सिर्फ साधारण घरेलू काम नहीं थे। ये वे अदृश्य भावनात्मक धागे थे जो दो बुजुर्गों को मानसिक रूप से जीवित रखते थे और एक-दूसरे से जोड़ते थे। रसोई सिर्फ रसोई नहीं थी, वह संगति थी। बाजार सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं था, वह उपयोगिता का भाव देता था। धनिया-मिर्च पर छोटी-छोटी बहसें सिर्फ बहसें नहीं थीं, वे संवाद थे।


आधुनिक समाज में युवा बुढ़ापे के मायने गलत समझते हैं। वे सोचते हैं कि बुजुर्गों को सिर्फ आराम चाहिए। मनुष्य को सिर्फ आराम नहीं चाहिए। उसे चाहिए उपयोगी होने का भाव, मन को व्यस्त रखने वाला काम, शरीर के लिए गतिविधि और सबसे महत्वपूर्ण, दिल में यह एहसास कि ‘मैं अभी भी जरूरी हूँ। मेरा अभी भी घर में कुछ योगदान है।’



किसी ने उस युवा दंपति को असामान्य सलाह दी, ‘अपने माता-पिता की कुछ सुविधाएँ कम करो।’ ये उनके प्रति क्रूरता या उपेक्षा नहीं होगी। इससे उनकी स्टाफ पर अत्यधिक निर्भरता नहीं रहेगी। फुल-टाइम अटेंडेंट हटाओ। कुछ पार्ट टाइम सहायता रखो, लेकिन जिम्मेदारी वापस बुजुर्गों को ही दो। उनके अंदर अपने महत्व का भाव लौटाओ। बेटा माँ से कहने लगा, आप जैसी सब्जी कोई नहीं बना सकता। रोज कम से कम एक सब्जी जरूर बनाइए। बहू ससुर से कहने लगी, आप जो सब्जियाँ लाते हैं, वे हमेशा ताजी होती हैं। धीरे-धीरे पुरानी लय लौटी। बातें शुरू हुईं। अगले दिन की योजनाएँ बनने लगीं। छोटी-छोटी बहसें वापस आईं। चलना-फिरना शुरू हुआ। उद्देश्य लौटा और धीरे-धीरे... खुशी भी लौट आई।


यह कहानी आज के भारत के लिए चेतावनी है। हाल के महीनों में वृद्धाश्रमों से आने वाली खबरें दिल दहला देने वाली हैं। मऊ में एक पिता ने मजदूरी करके बेटे को सरकारी नौकरी दिलवाई, लेकिन आराम की बारी आने पर बेटे ने उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। भोपाल के ‘अपना घर’ में 70 वर्षीय व्यवसायी की मौत हुई, चार बच्चों में से कोई अंतिम संस्कार के लिए नहीं आया। इंदौर में 85 वर्षीय सरिता नारायण ने साढ़े चार साल तक बेटे का इंतजार किया। बेटा दो दिन में लौटूंगा कहकर गया और फिर कभी नहीं आया। उनकी मृत्यु पर भी कोई नहीं पहुँचा। हरियाणा के सोनीपत में एक पिता की मृत्यु पर तीन बेटियों ने वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देखा। भोपाल, महाराजगंज, पूर्णिया, हर जगह ऐसी कहानियाँ हैं जहाँ भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद बुजुर्ग वृद्धाश्रम में अंतिम दिन काट रहे हैं।


ये सिर्फ उपेक्षा की घटनाएँ नहीं हैं। ये उस मानसिकता की देन हैं जहाँ हम बुजुर्गों को ‘बोझ’ समझ लेते हैं। हम उनकी सक्रियता, उनकी छोटी-छोटी जिम्मेदारियों और उनके ‘जरूरी होने’ के भाव को छीन लेते हैं। फिर या तो घर में जहर घुल जाता है, या वे वृद्धाश्रम की चारदीवारी में दम तोड़ देते हैं।


सुख विलासिता में नहीं, जीने के उद्देश्य में है। छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ ही व्यक्ति को अंदर से जीवित रखती हैं। हर व्यक्ति को सुबह उठकर यह महसूस करना चाहिए कि ‘आज किसी को और घर के कुछ कामों में मेरी जरूरत है।’ बुजुर्गों को आराम देने का मतलब यह नहीं कि उन्हें निष्क्रिय बना दो। मतलब यह है कि उनके अनुभव, उनकी क्षमता और उनकी उपस्थिति को सम्मान दो। उन्हें घर का हिस्सा बनाओ, सिर्फ मेहमान नहीं।

माता-पिता ने हमें बड़ा किया, संघर्ष किया, सपने देखे। अब हमारी जिम्मेदारी है कि उनकी अंतिम साँस तक उन्हें यह अहसास दिलाएँ कि वे अभी भी जरूरी हैं। वे बोझ नहीं, बल्कि प्यार, सम्मान और उद्देश्य का सहारा हैं। तभी घर में शांति लौटेगी और समाज में वह संस्कृति बचेगी जिसे हम सदियों से संजोए हुए हैं—जहाँ बुजुर्ग भगवान के समान माने जाते थे। बुजुर्गों को आराम दो, लेकिन जिम्मेदारी लौटाओ। तभी आधुनिक समाज सचमुच सुखी और संतुलित बनेगा। 

Monday, April 28, 2025

डिजिटल युग में बच्चे गुस्सैल और आक्रामक क्यों?

आज के डिजिटल युग में, बच्चों का व्यवहार और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। माता-पिता और शिक्षक अक्सर यह शिकायत करते हैं कि बच्चे पहले की तुलना में अधिक गुस्सैल, चिड़चिड़े और आक्रामक हो गए हैं। इसका एक प्रमुख कारण बच्चों का कम उम्र में मोबाइल फोन और इंटरनेट का अत्यधिक उपयोग है। प्रारंभिक स्क्रीन टाइम और डिजिटल दुनिया बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है, जिसके परिणामस्वरूप उनमें गुस्सा और आक्रामकता बढ़ रही है। 


आज के बच्चे ‘डिजिटल नेटिव्स’ हैं, यानी वे उस दुनिया में पैदा हुए हैं जहां स्मार्टफोन, टैबलेट और इंटरनेट रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। पहले जहां बच्चे खेल के मैदान में दोस्तों के साथ समय बिताते थे, वहीं अब वे मोबाइल स्क्रीन पर गेम खेलने, वीडियो देखने और सोशल मीडिया पर समय बिताने में व्यस्त रहते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 6-12 वर्ष की आयु के बच्चे औसतन प्रतिदिन 2-4 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं। ये आंकड़ा किशोरों में और भी अधिक है। 


हालांकि तकनीक ने शिक्षा और मनोरंजन के नए द्वार खोले हैं, लेकिन इसका अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग बच्चों के मस्तिष्क के विकास, भावनात्मक नियंत्रण और सामाजिक कौशलों को प्रभावित करता है।


गुस्सा और आक्रामकता के कारण बच्चों का मस्तिष्क विकास के महत्वपूर्ण चरण में होता है और इस दौरान स्क्रीन टाइम का अत्यधिक उपयोग उनके मस्तिष्क के ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ को प्रभावित करता है, जो भावनाओं को नियंत्रित करने और निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया में तेजी से बदलते दृश्य और तत्काल पुरस्कार (जैसे गेम में जीत या लाइक्स का मिलना) बच्चों के मस्तिष्क में ‘डोपामाइन’ का स्तर बढ़ाते हैं। इससे वे तुरंत संतुष्टि की उम्मीद करने लगते हैं और जब वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता, तो वे निराश, चिड़चिड़े और गुस्सैल हो जाते हैं। 



इंटरनेट पर उपलब्ध कई गेम्स और वीडियो में हिंसा, आक्रामकता और अनुचित व्यवहार को दर्शाया जाता है। बच्चे, जिनका दिमाग अभी परिपक्व नहीं हुआ है, इन सामग्रियों को देखकर हिंसक व्यवहार को सामान्य मानने लगते हैं। उदाहरण के लिए कई लोकप्रिय मोबाइल गेम्स में युद्ध, लड़ाई और विनाश को बढ़ावा दिया जाता है, जो बच्चों में आक्रामक प्रवृत्तियों को बढ़ा सकता है। 


मोबाइल और इंटरनेट के अत्यधिक उपयोग से बच्चे वास्तविक दुनिया में अपने दोस्तों और परिवार से कट जाते हैं। वे सोशल मीडिया पर तो सक्रिय रहते हैं, लेकिन वास्तविक सामाजिक संपर्क की कमी उन्हें अकेला और उदास बनाती है। यह अकेलापन और भावनात्मक खालीपन अक्सर गुस्से और आक्रामकता के रूप में व्यक्त होता है।



देर रात तक मोबाइल फोन का उपयोग, विशेष रूप से नीली रोशनी का संपर्क, बच्चों की नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। अपर्याप्त नींद बच्चों में चिड़चिड़ापन, तनाव और गुस्से को बढ़ाती है। एक शोध के अनुसार, जो बच्चे रात में अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं, उनमें भावनात्मक अस्थिरता और आक्रामक व्यवहार की संभावना अधिक होती है।



सोशल मीडिया बच्चों में प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ाता है। वे दूसरों की ‘परफेक्ट’ जिंदगी, लुक्स या उपलब्धियों को देखकर खुद को कमतर महसूस करते हैं। यह आत्मसम्मान में कमी और असंतोष का कारण बनता है, जो गुस्से और आक्रामकता के रूप में सामने आता है।


प्रारंभिक उम्र में मोबाइल और इंटरनेट का अत्यधिक उपयोग केवल गुस्सा और आक्रामकता तक सीमित नहीं है। इसके दीर्घकालिक प्रभाव भी चिंताजनक हैं। बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो रही है, उनकी रचनात्मकता प्रभावित हो रही है और वे भावनात्मक रूप से कमजोर हो रहे हैं। इसके अलावा, लगातार स्क्रीन टाइम के कारण शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है, जैसे कि मोटापा, आंखों की समस्याएं और खराब मुद्रा।


इस समस्या से निपटने के लिए माता-पिता, शिक्षकों और समाज को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है। निम्नलिखित कुछ सुझाव हैं जो बच्चों में गुस्सा और आक्रामकता को कम करने में मदद कर सकते हैं। माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2-5 वर्ष की आयु के बच्चों को प्रतिदिन 1 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम नहीं देना चाहिए। बड़े बच्चों के लिए भी उम्र के अनुसार समय सीमा निर्धारित करें। बच्चों को खेल, कला, संगीत और पढ़ने जैसी गतिविधियों में शामिल करें। ये न केवल उनकी रचनात्मकता को बढ़ाते हैं, बल्कि उन्हें भावनात्मक रूप से स्थिर भी बनाते हैं। 


माता-पिता को बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना चाहिए। साथ में भोजन करना, कहानियां सुनाना या बाहर घूमने जाना बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। बच्चों को ऐसी सामग्री देखने के लिए प्रोत्साहित करें जो शिक्षाप्रद और सकारात्मक हो। माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे हिंसक गेम्स या वीडियो से दूर रहें। बच्चों को इंटरनेट के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करें। उन्हें सोशल मीडिया के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों के बारे में बताएं। यदि बच्चा लगातार गुस्सा या आक्रामक व्यवहार दिखा रहा है, तो मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की मदद लें। प्रारंभिक हस्तक्षेप से समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है।


बच्चों के लिए ही नहीं हम सबके लिए भी ये चेतावनी है कि लगातार डिजिटल उपकरणों का उपयोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है। इसके लिए ‘डिजिटल डिटॉक्स’ करने के जरूरत होती है। जो  तनाव कम करने, नींद सुधारने और वास्तविक रिश्तों को मजबूत करने में मदद करता है। यह एकाग्रता बढ़ाता है और बच्चों को स्क्रीन से दूर प्रकृति व खेलों से जोड़ता है। समय-समय पर ‘डिजिटल डिटॉक्स’ अपनाकर हम और हमारे बच्चे संतुलित और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग आधुनिक जीवन का एक अभिन्न अंग है, लेकिन इसका बच्चों पर होने वाला प्रभाव गंभीर है। यह माता-पिता और समाज की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को डिजिटल दुनिया के नकारात्मक प्रभावों से बचाएं और उनके समग्र विकास को प्रोत्साहित करें। संतुलित जीवनशैली, सकारात्मक वातावरण और प्रेमपूर्ण देखभाल के साथ, हम बच्चों को न केवल गुस्से और आक्रामकता से मुक्त कर सकते हैं, बल्कि उन्हें एक स्वस्थ और खुशहाल भविष्य भी दे सकते हैं। 

Monday, May 20, 2024

‘लापता लेडीज़’ से महिलाओं को सबक़


बचपन से पढ़ते आए हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। पिछले सौ वर्षों से फ़िल्मों को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है। ख़ासकर उन फ़िल्मों को जिनके कथानक में सामाजिक सरोकार के मुद्दे उठाए जाते हैं। इसी क्रम में एक नई फ़िल्म आई है ‘लापता लेडीज़’ जो काफ़ी चर्चा में है। मध्य प्रदेश की ग्रामीण पृष्ठभूमि में बनाई गई ये फ़िल्म महिलाओं के लिए बहुत उपयोगी है। विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के लिए।


फ़िल्म की शुरुआत एक रोचक परिदृश्य से होती है जिसमें दो नवविवाहित दुल्हनें लंबे घूँघट के कारण रेल गाड़ी के डिब्बे में एक दूसरे के पति के साथ चली जाती हैं। उसके बाद की कहानी इन दो महिलाओं के संघर्ष की कहानी है जो अंत में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेती हैं। इस कहानी का सबसे बड़ा सबक़ तो यह है कि नवविवाहिताओं को इतना लंबा घूँघट निकालने के लिए मजबूर न किया जाए। उनका सिर ज़रूर ढका हो पर चेहरा खुला हो। दूसरा सबक़ यह है कि ग्रामीण परिवेश में पाली-बढ़ी, अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी लड़कियों को विदा करते समय उनके घर वालों को उस लड़की के ससुराल और मायके का पूरा नाम पता और फोन नंबर लिख कर देना चाहिए। जैसा प्रायः मेलों और पर्यटन स्थलों में जाते समय शहरी माता-पिता अपने बच्चों की जेब में नाम पता लिख कर पर्ची रख देते हैं। अगर भीड़ में बच्चा खो भी जाए तो यह पर्ची उसकी मददगार होती है। 



इस फ़िल्म का तीसरा संदेश यह है कि शहरी लड़कियों की तरह अब ग्रामीण लड़कियाँ भी पढ़ना और आगे बढ़ना चाहती हैं। जबकि उनके माँ-बाप इस मामले में उनको प्रोत्साहित नहीं करते और कम उम्र में ही अपनी लड़कियों का ब्याह कर देना चाहते हैं। ऐसा करने से उस लड़की की आकांक्षाओं पर कुठाराघात हो जाता है और उसका शेष जीवन हताशा में गुज़रता है। आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में शायद ही कोई गाँव होगा जो इनके प्रभाव से अछूता हो। हर क़िस्म की जानकारी, युवक-युवतियों को स्मार्ट फ़ोन पर घर बैठे ही मिल रही है। ज़रूरी नहीं कि सारी जानकारी सही ही हो, इसलिए उसकी विश्वसनीयता जाँचना, परखना ज़रूरी होता है। अगर जानकारी सही है और ग्रामीण परिवेश में पाल रही कोई युवती उसके आधार पर आगे पढ़ना और अपना करियर बनाना चाहती है तो उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इस फ़िल्म में दिखाया है कि कैसे एक युवती को उसके घरवालों ने उसकी मर्ज़ी के विरुद्ध उसकी शादी एक बिगड़ैल आदमी से कर दी और जैविक खेती को पढ़ने, सीखने की उसकी अभिलाषा कुचल दी गई। पर परिस्थितियों ने ऐसा पलटा खाया कि ये जुझारू युवती विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए अपने गंतव्य तक पहुँच गई। पर ऐसा जीवट और क़िस्मत हर किसी की नहीं होती। 



बचपन में सरकार प्रचार करवाती थी कि ‘लड़कियाँ हो या लड़के, बच्चे दो ही अच्छे’ पिछले 75 सालों में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा तमाम योजनाएँ चलाई गईं, जिनमें लड़कियों को पढ़ाने, आगे बढ़ाने और आत्मनिर्भर बनाने के अनेकों कार्यक्रम चलाए गए और इसका असर भी हुआ। आज कोई भी कार्य क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां महिलाएँ सक्रिय नहीं हैं। पिछले दिनों संघ लोक सेवा आयोग के परिणामों में ऐसे कई सुखद समाचार मिले जब निर्धन, अशिक्षित और मज़दूरी पेशा परिवारों की लड़कियाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो कर पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी बन गईं। बावजूद इसके देश में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है। हाल ही में कर्नाटक की हसन लोकसभा से उम्मीदवार प्रज्वल रेवन्ना के तथाकथित लगभग 3000 वीडियो सोशल मीडिया पर जारी हुए जिसमें आरोपी पर हर उम्र की सैकड़ों महिलाओं के साथ जबरन यौनाचार करने के दिल दहलाने वाले दृश्य हैं। आरोपी अब देश छोड़ कर भाग चुका है। कर्नाटक सरकार की ‘एस आई टी’ जाँच में जुटी है। पर क्या ऐसे प्रभावशाली लोगों का क़ानून कुछ बिगाड़ पाता है? 



पिछले वर्ष मणिपुर में युवतियों को निर्वस्त्र करके जिस तरह भीड़ ने उन्हें अपमानित किया उसने दुनिया भर के लोगों की आत्मा को झकझोर दिया। पश्चिमी एशिया में तालिबानियों और आतंकवादियों के हाथों प्रताड़ित की जा रही नाबालिग बच्चियों और महिलाओं के रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में छाए रहते हैं। भारत में दलित महिलाओं को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र करने, प्रताड़ित करने, उनसे बलात्कार करने और उनकी हत्या कर देने के मामले आय दिन हर राज्य से सामने आते रहते हैं। पुलिस और क़ानून बहुत कम मामलों में प्रभावी हो पाता है और वो काफ़ी देर से। 


महिलाओं पर पुरुषों के अत्याचार का इतिहास सदियों पुराना है। क़बीलाई समाज से लेकर सामंती समाज और सामंती समाज से लेकर के आधुनिक समाज तक के सैंकड़ों वर्षों के सफ़र में हमेशा महिलाएँ ही पुरुषों की हैवानियत का शिकार हुई हैं। कैसी विडंबना है कि माँ दुर्गा, माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी की उपासना करने वाले भारतीय समाज में भी महिलाओं को वो सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल पाई है जिसकी वो हक़दार हैं। ऐसे में ‘लापता लेडीज़’ जैसी दर्जनों फ़िल्मों की ज़रूरत है जो पूरे समाज को जागरूक कर सके। महिलाओं के प्रति संवेदनशील बना सकें और उनके लिए आगे बढ़ने के लिए अवसर भी प्रदान कर सकें। 


एक महिला जब सक्षम हो जाती है तो वो तीन पीढ़ियों को सम्भालती है। अपने सास-ससुर की पीढ़ी, अपनी पीढ़ी और अपने बच्चों की पीढ़ी। पर यह बात बार-बार सुनकर भी पुरुष प्रधान समाज अपना रवैया बदलने को तैयार नहीं है। इस दिशा में समाज सुधारकों, धर्म गुरुओं और सरकार को और भी ज़्यादा गंभीर प्रयास करने चाहिए। बेटियों को मिलने वाली चुनौतियों से घबराकर कुछ विकृत मानसिकता के परिवार कन्या भ्रूण हत्या जैसे अमानवीय कृत्य करने लग जाते हैं। इस दिशा में कुछ वर्ष पहले एक विज्ञापन जारी हुआ था जिसमें हरियाणा के गाँव में एक नौजवान अपने घर की छत पर थाली पीट रहा था। प्रायः पुत्र जन्म की ख़ुशी में वहाँ ऐसा करने का रिवाज है। पर इस नौजवान की थाली की आवाज़ सुन कर वहाँ जमा हुए पचासों ग्रामवासियों को जब यह पता चला कि ये नौजवान अपने घर जन्मीं बेटी की ख़ुशी में इतना उत्साहित है तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। काश हम ऐसा समाज बना सकें।  

Monday, April 24, 2023

सोशल मीडिया के खतरों से कैसे बचें ?


जब देश में सोशल मीडिया का इतना प्रचलन नही था तब जीवन ज्यादा सुखमय था। तकनीकी की उन्नति ने हमारे जीवन को जटिल और तानवग्रस्त बना दिया है। आज हर व्यक्ति चाहे वो फुटपाथ पर सब्जी बेचता हो या मुंबई के कॉर्पोरेट मुख्यालय में बैठकर अरबों रूपये के कारोबारी निर्णय लेता हो, चौबीस घंटे मोबाइल फ़ोन और सोशल मीडिया के मकड़जाल में उलझा रहता है। जिसका बेहद ख़राब असर हमारे शरीर, दिमाग और सामाजिक संबंधों पर पड़ रहा है।

नई तकनीकी के आगमन से समाज में उथल पुथल का होना कोई नई बात नही है। सामंती युग से जब विश्व औद्योगिक क्रांति की और बड़ा तब भी समाज में भरी उथल पुथल हुई थी। पुरानी पीढ़ी के लोग जीवन में आए इस अचानक बदलाव से बहुत विचलित हो गए थे। गाँव से शहरों की और पलायन करना पड़ा, कारखाने खुले और शहरों की गन्दी बस्तियों में मजदूर नारकीय जीवन जीने पर विवश हो गये। ये सिलसिला आज तक रुका नही है। भारत जैसे देश में तो अभी भी बहुसंख्यक समाज, अभावों में ही सही, प्रकृति की गोद में जीवन यापन कर रहा है। अगर गाँवों में रोजगार के अवसर सुलभ हो जाएँ तो बहुत बड़ी आबादी शहर की तरफ नही जाएगी। इससे सरकारों पर भी शहरों में आधारभूत ढांचे के विस्तार का भार नही पड़ेगा। पर ऐसा हो नही रहा। आज़ादी के पिझत्तर वर्षों में जनता के कर का खरबों रुपया ग्रामीण विकास के नाम पर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया। 


पाठकों को लगेगा कि सोशल मीडिया की बात करते-करते अचानक विकास की बात क्यों ले आया। दोनों का सीधा नाता है। जापान और अमरीका जैसे अत्याधुनिक देशों से लेकर गरीब देशों तक इस नाते को देखा जा सकता है। इसलिए चुनौती इस बात की है कि भौतिकता की चकाचौंध में बहक कर क्या हम हमारे नेता और हमारे नीति निर्धारक, देश को आत्मघाती स्थिति में धकेलते रहेंगे या कुछ क्षण ठहरकर सोचेंगे कि हम किस रस्ते पर जा रहे हैं? 

इस तरह सोचने की ज़रूरत हमें अपने स्तर पर भी है और राष्ट्र के स्तर पर भी। याद कीजिये कोरोना की पहली लहर जब आई थी और पूरी दुनिया में अचानक अभूतपूर्व लॉकडाउन लगा दिया गया था। तब एक हफ्ते के भीतर ही नदियाँ, आकाश और वायु इतने निर्मल हो गये थे कि हमें अपनी आँखों पर यकीन तक नही हुआ। कोरोना के कहर से दुनिया जैसे ही बाहर आई फिर वही ढाक के तीन पात। आज देश में अभूतपूर्व गर्मी पड़ रही है, अभी तो यह शुरुआत है। अगर हम इसी तरह लापरवाह बने रहे तो क्रमश निरंतर बढ़ती गर्मी कृषि, पर्यावरण, जल और जीवन के लिए बहुत बड़ा खतरा बन जायेगी। अकेले भारत में आज कम से कम दस करोड़ पेड़ लगाने और उन्हें संरक्षित करने की ज़रूरत है। अगर हम सक्रिय न हों तो कोई भी सरकार अकेले यह कार्य नही कर सकती। 


चलिए वापस सोशल मीडिया की बात करते हैं जो आज हमारे जीवन में नासूर बन गया है। राजनैतिक उद्देश्य से चौबीस घंटे झूठ परोसा जा रहा है। जिससे समाज में भ्रम, वैमनस्य और हिंसा बढ़ गई है। किसी के प्रति कोई सम्मान शेष नही बचा। ट्रॉल आर्मी के मूर्ख युवा देश के वरिष्ठ नागरिकों के प्रति जिस अपमानजनक भाषा का प्रयोग सोशल मीडिया पर करते हैं उससे हमारा समाज बहुत तेज़ी से गर्त में गिरता जा रहा है। सोशल मीडिया के बढ़ते हस्तक्षेप ने हमारी दिनचर्या से पठन-पाठन, नियम-संयम, आचार-विचार और भजन-ध्यान सब छीन लिया है। हम सब इसके गुलाम बन चुके हैं। तकनीकी अगर हमारी सेवक हो तो सुख देती है और अगर मालिक बन जाये तो हमें तबाह कर देती है। कुछ जानकार अभिभावक इस बात के प्रति सचेत हैं और वे अपने बच्चों को एक सीमा से ज्यादा इन चीजों का प्रयोग नही करने देते हैं। पर उन परिवारों के बच्चे जिनमें माता-पिता को काम से फुर्सत नही है उन पर इसका बहुत ज्यादा विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। आये दिन समाचार आते रहते हैं कि स्मार्ट फोन की चाहत में युवा वर्ग चोरी, हिंसा और आत्महत्या तक के कदम उठा रहा हैं। समाज ऐसा विकृत हो जाये तो डिजिटल इंडिया बनने का क्या लाभ? समाज के व्यवहार को कानून बनाकर नियंत्रित नही किया जा सकता और इस मामले में तो बिल्कुल नही किया जा सकता। इसलिये ज़रूरत इस बात की है कि हम खुद से शुरू करके अपने परिवेश में कुछ प्राथमिकताओं को फिर से वरीयता दें। 

अपनी और अपने परिवार की एक अनुशासित दिनचर्या निर्धारित करें जिसमें भोजन, भजन, पठन-पठान, व्यायाम, मनोरंजन, सामाजिक सम्बन्ध अदि के लिए अलग से समय निर्धारित हो। इसी तरह स्मार्ट फ़ोन, इन्टरनेट व टीवी के लिए भी एक समय सीमा निर्धारित की जाए जिससे हम अपने परिवार को तकनीकी के इस मकड़जाल से बाहर निकाल कर स्वस्थ जीवन चर्या दे पायें। जहाँ तक संभव हो हम अपने घर और परिवेश को हरे भरे पेड़ पौधों से सुसज्जित करने का गंभीर प्रयास करें। विश्वभर में मंडरा रहे गहरे जल संकट को ध्यान में रखकर जल की एक-एक बूँद का किफ़ायत से  प्रयोग करें और भूजल स्तर बढ़ाने के लिए हर सम्भव कार्य करें। आधुनिक फास्टफूड के नाम पर कृत्रिम, हानिकारक रसायनों से बने खाद्य पदार्थों की मात्रा तेज़ी से घटाते हुए घर के बने ताज़े पौष्टिक व पारंपरिक भोजन को प्रसन्न मन से अपनाएं। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो हम, हमारा परिवार और हमारा समाज सुखी, संपन्न और स्वस्थ बन जायेगा। अगर हम ऐसा नही करते तो बिना विषपान  किये ही हम आत्महत्या की और बढ़ते जाएँगे।

अच्छा जीवन जीने का सबसे बढ़िया उदाहरण उज्जैन के एक उद्योगपति स्वर्गीय अरुण ऋषि हैं जिनके भाषण और साक्षात्कार देश के अखबारों में चर्चा का विषय बने रहे हैं। हमेशा खुश रहने वाले गुलाबी चेहरे के अरुण ऋषि का दावा है कि उन्होंने आज तक न तो कोई दवा का सेवन किया है और न ही किसी सौन्दर्य प्रसाधन का प्रयोग किया है इसीलिये वे आज तक बीमार नहीं पड़े। पिछले दिनों दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के डाक्टरों को ‘सैल्फ मैनेजमेंट’ (अपने शरीर का प्रबंध) विषय पर व्याख्यान देते हुए श्री ऋषि ने डाक्टरों से पूछा कि क्या वे स्वस्थ है? उत्तर में जब श्रोता डाक्टरों की निगाहें नीचे हो गयीं तो उन्होंने फिर पूछा कि जब आप खुद ही स्वस्थ नहीं हैं तो अपने मरीजों को स्वस्थ कैसे कर पाते हैं? मतलब ये कि अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करके ही हम स्वस्थ और दीर्घआयु हो सकते हैं।  

Monday, August 31, 2015

इन्द्राणी मुखर्जी: हमारी रोल मॉडल नहीं

ऐसी शोहरत, ग्लैमर व ताकत की चमक-दमक वाली दुनिया के सितारे भारतीय समाज के आदर्श नहीं हो सकते। क्योंकि इन्होंने जिस उपभोक्तावादी पाश्चात्य संस्कृति का रास्ता अपनाया है उससे भारतीय समाज की हजारों साल पुरानी परंपरांओं को भारी खतरा पैदा हो गया है। खासकर उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग उन्हें अपना आदर्श मानकर फुहड़पन की भौडी संस्कृति को तेजी से अपनाता जा रहा है। फिर चाहे वो ताश के पत्तों की तरह पति या पत्नियां को बदलना हो, चाहे लिव-इन-रिश्ते में रहना हो या फिर मुक्त सैक्स का आनंद लेना हो। घर टूट रहे हैं। रिश्ते टूट रहें हैं। तनाव और घुटन बढ़ रही है। हत्याएं और आत्महत्याएं हो रही हैं। नशीली दवाओं का सेवन बढ़ रहा है। यह सब देन है टीवी सीरियलों, फिल्मों और पेज-3 संस्कृति की। जो जबरदस्ती हमारे घरों में घुसती जा रही है।

आधुनिक और मुक्त विचारों का हामी बुद्धिजीवी वर्ग इस संस्कृति पर किसी भी तरह के नियंत्रण को मानवाधिकारों का हनन मानता है। ऐसे प्रयासों को कट्टरवादी कह कर उसके विरोध में उठ खड़ा होता है। चूंकि इस वर्ग की पकड़ और पहुंच मीडिया में गहरी और व्यापक हैए इसलिए इनकी ही बात सुनी जाती है। जबकि बहुसंख्यक समाज आज भी इस संस्कृति से बचा हुआ है और इसे पसंद नहीं करता। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि यह बुद्धिजीवी वर्ग आज हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक वर्ग पर हावी होता जा रहा है। जिसका दुष्परिणाम हम सबके सामने इस रूप में आ रहा है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा।

मुक्त विचारों के समर्थक इन बुद्धिजीवियों से कोई पूछे कि इंद्राणी जैसी औरत को क्या कहेंगे ? जो अपनी बेटी की हत्या करती है, अपने पुराने पति के सहयोग से। नए पति से यह राज छुपाती है कि शीना उसकी बेटी थी और हत्या करके भी नए पति के साथ आराम से सामान्य जिंदगी जीती हैं। अपनी पिछली शादी से पैदा लड़की को, उसके बाप से अलग रखकर नए पति की दत्तक पुत्री बनवा देती है ताकि उसकी दौलत इस दत्तक पुत्री को मिल सके। इन्द्राणी अकेली नहीं हैं। ऐसी ताकतवर, मशहूर और हाई सोसायटी वाली महिलाएं देश की राजधानी दिल्ली से लेकर हर बड़े शहर के कुलीन माने जाने वाले समाज की ‘शोभा’ बढ़ाती हैं और तब तक गुलछर्रे उड़ाती हैं जब तक कोई हिम्मती उनका भांड़ा न फोड़ दे। पर हमारे कुलीन समाज को क्या हो गया है? ये समाज किस रास्ते पर बढ़ चला है ? कहां इस प्रकार के घिनौने कृत्यों पर विराम लगेगा, यह चिंतनीय है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज में अवैध संबंधों का इतिहास न रहा हो। वैदिक काल से आज तक ऐसे संबंधों के अनेक उदाहरण पुराणों तक में उल्लेखित हैं द्य पर उनका समाज में आदर्श की तरह यशगान नहीं किया जाता था। उन्हें सह लिया जाता थाए  महिमामंडित नहीं किया जाता था। अगर कड़ी शासन व्यवस्था हुई तो उन पर नियंत्रण भी किया जाता था।

लेकिन आज जो यह संस्कृति निर्लज्जता से साजिशन पनपाई जा रही है, इसके पीछे हैं वो बाजारू ताकतें जो अपने उत्पादनों को हमारे बाजारों में थोपने के लिए हमारी सामाजिक परिस्थिति को बदल देना चाहती हैं। जिसे हम आज आधुनिक मान रहे हैं द्य दरअसल यह संस्कृति पश्चिमी देशों में अपना खोखलापन सिद्ध कर चुकी है। इसलिए वहां के समाजों ने अब इस संस्कृतिक से काफी हद तक मुंह मोड़ लिया हैं और पारिवारिक बंधनों की ओर फिर से लौटने लगे हैं ।

जबकि हम हर आयातित चीज को अपनाने की भूख में अपने अस्तित्व की जड़ों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं। छोटे-छोटे काम ही हमें आगे चलकर बड़े पतन की ओर ले जाएंगे। आज भारत के किसी भी गांव, कस्बें में चले जाइएए फेरों बिना शादी हो जाएगी पर डीजे बिना नहीं होगी। डीजे में फटता कानफाडू शोर, अभद्र गानें और उनपर थिरकतें हमारे परिवारिजन शादी का सारा मजा किरकिरा कर देते हैं। न कोई बात सुनपाता है और न मंत्रों का उच्चारण। जबकि शादी जैसे पवित्र समारोह भारतीय संस्कृति और परंपरा के उन उच्च आदर्शों का नमूना है जिन्हें अपनाने आज बड़े-बड़े मशहूर गोरे लोग तक भारत आ रहे हैं।

पारंपरिक त्यौहार जिनका संबंध हमारे मौसम और कृषि से था उन्हें भूलकर हम वेलेनटाइन-डे जैसे वाहियात नए त्यौहारों को अपना कर अपनी जड़ों से कट रहे हैं। इकबाल ने कहा था, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।‘ हजारों साल भारत ने विदेशी हमलों को झेला मगर हमारी संस्कृति की जड़े इतनी गहरी थी कि कोई उन्हें हिला नहीं पाया। पर बाजार की इस संस्कृति ने जो हमला किया है, उसने हमारे गांवों तक अपनी पकड़ बना ली है। इसे रोकना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विरोधी लाख तानाशाह कहें, पर उन्हें ऐसी तानाशाही दिखानी होगी ताकि टीवी और इंटरनेट से ऐसी संस्कृति को रोकने का माहौल बन सके। इसलिए इस तरह के तथाकथित ग्लैमर, शोहरत और ताकत के बल पर अति महत्वाकांक्षी आधुनिक संस्कृति का पटाक्षेप हो सके द्य जो आने वाली हमारी पीढ़ियों के लिए जरूरी है।