बावजूद इसके इस आंदोलन को जो कुछ सफलता मिली, उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अब तक इस मुद्दे पर काफ़ी कुछ लिखा और कहा जा चुका है। संसद में भी इस पर तीखी झड़पें हो रही हैं। अब तो सरकार ने पेपर लीक के खिलाफ संशोधन बिल भी पेश कर दिया है। इसलिए आंदोलन के उन पक्षों पर नया कुछ नहीं लिख रहा। पर इस आंदोलन की जिस बात ने मुझे बहुत विचलित किया है, वो है भाषा की अभद्रता। जिसने शालीनता की सारी हदें पार कर लीं। अगर मुझ पर लिंगभेद का आरोप न लगे तो मैं ये खुल कर कहना चाहूँगा कि जिस तरह की गंदी गालियाँ, अश्लील भंगिमाएँ और नारेबाजी आंदोलन में शामिल कुछ लड़कियों ने की वो एक सभ्य समाज में क़तई स्वीकार नहीं की जा सकती। लड़कियों का मैं खासतौर पर इसलिए उल्लेख कर रहा हूँ क्योंकि अब तक भारतीय समाज में लड़कियों को कभी ऐसी अश्लील भाषा का प्रयोग करते नहीं देखा गया था। लड़के तो प्रायः गाली-गलौज की भाषा में बात करते ही हैं। पर सब लड़के ऐसे नहीं होते। ज़्यादातर मर्यादित भाषा का ही प्रयोग करते हैं। चूँकि मैं पिछले 50 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूँ इसलिए अक्सर मेरे मुंह से ‘साला’ गाली निकल जाती है। मेरे बेटे जो अब 40 वर्ष के आस-पास हैं, बचपन से ही मुझे इस पर टोकते आए हैं, “आप कैसी भाषा बोलते हैं?” इसलिए मैं ये सावधानी बरतता हूँ कि अपने परिवार के सामने, ‘साला’ जैसी गाली का भी प्रयोग न करूँ।
हमारा परिवार कोई अनूठा नहीं हैं। भारत के करोड़ों परिवारों में भाषा की मर्यादा और व्यवहार में शालीनता का पाठ बचपन से ही पढ़ाया जाता है। यही हमारे सनातन संस्कार हैं। जंतर-मंतर के प्रदर्शन में कुछ छात्रों ने जिस अभद्र भाषा का प्रयोग किया वो सोशल मीडिया के माध्यम से घर-घर और गाँव-गाँव तक पहुँचा। जरा सोचिए कि शालीनता के दायरे में रहने वाले करोड़ों युवक-युवतियों पर इसका क्या असर पड़ा होगा? अभिजात्य वर्ग के या पढ़े-लिखे समाज के युवाओं के इस निकृष्ट व्यवहार को देख कर हो सकता है कि गाँवों में रहने वाले लड़के-लड़कियां भी आधुनिक दिखने की ललक में इस तरह की अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने लगें। दूसरी तरफ़ दिल्ली की झुग्गियों में पला बढ़ा एक निर्धन नौजवान मोहम्मद इरफान इसी आंदोलन में रातों-रात पूरे देश के युवाओं के लिए एक मिसाल बन कर सामने आया है। ग़रीब परिवार में पैदा हुए इरफ़ान के पास औपचारिक शिक्षा की डिग्रियाँ नहीं हैं। पर जिस संयत भाषा में उसने इस आंदोलन के मुद्दों को मीडिया के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया, वो क़ाबिले तारीफ़ है। संविधान से लेकर, देश के राजनैतिक इतिहास, सामाजिक आर्थिक बदहाली और सनातन धर्म की गहराइयों तक जिस ज्ञान का प्रदर्शन उसने किया वो आश्चर्यचकित करने वाला है। इरफान का व्यक्तित्व इस आंदोलन के उन उद्दंड और संस्कारहीन युवाओं के गाल पर सीधा तमाचा है।
इसी क्रम में यहाँ मैं एक और चिंतनीय प्रवृत्ति की ओर इशारा करना चाहूँगा। पिछले कुछ वर्षों से महानगरों में ‘स्टैंड-अप कॉमेडी’ का एक नया चलन शुरू हुआ है। लोकतंत्र में समाज और सरकार पर कटाक्ष करने के अनेक माध्यम होते हैं। प्राचीन काल से ये कार्य विदूषक करते आए हैं। आज के दौर में वही ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन हैं। तनाव भरे जीवन में हँसना-हँसना सबको राहत देता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो कॉर्पोरेट जगत में कम उम्र में ही बुलंदियों को छूने वाले युवा, आज सबसे ज़्यादा तनाव ग्रस्त हैं। चाहे उनकी आमदनी शेष युवाओं की तुलना में कई गुना ज़्यादा हो, पर कॉर्पोरेट जगत की संस्कृति ही ऐसी है कि ये युवा लगातार मानसिक तनाव में जीते हैं। इसलिए बेंगलुरु, मुंबई, गुरुग्राम जैसे शहरों में अचानक ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन की बाढ़ आ गई है। इनमें अधिकतर कॉमेडियन ऐसे हैं जो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, सामाजिक-राजनैतिक समझ और अपने इर्द-गिर्द की दुनिया पर पैनी नज़र रख कर जो कुछ प्रस्तुत करते हैं वो न सिर्फ़ श्रोताओं को हँसी से लोटपोट कर देता है, बल्कि सरकार और समाज की कमज़ोरियों को सहज ही उजागर कर देता है।
इन्हीं ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियनों में कुछ पुरुष और महिला ऐसे भी हैं जो अत्यंत निम्न कोटि की भाषा का प्रयोग करके कामुकता और अश्लीलता का ‘फूहड़ मनोरंजन’ प्रस्तुत करते हैं। जिस श्रोता समूह के सामने ये लोग इस तरह की प्रस्तुतियां करते हैं वो पढ़ा-लिखा, संपन्न और कैरियर में सफल व्यक्ति होता है। इसलिए उसमें इतना विवेक होता है कि वो ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडी हॉल के बाहर निकल कर उस माहौल को भूल जाता है और अपने कार्य-क्षेत्र, समाज और परिवार में अनुशासित जीवन जीता है। पर सोशल मीडिया के माध्यम से जब ऐसे ‘शो’ घर-घर पहुँच जाते हैं तो उन युवाओं के दिमाग पर ग़लत असर डालते हैं जो अपने परिवार की कमज़ोर आर्थिक स्थिति में रहकर अपने कैरियर को बनाने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। ऐसी भाषा प्रयोग करने वाले ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन को सरकार कानून की मदद से अनुशासित या दंडित करे तो यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला माना जाएगा। पर अभिव्यक्त की आज़ादी का अधिकार हमें समाज में गंदगी फैलाने की छूट नहीं देता। इसके लिए आत्मसंयम बहुत ज़रूरी है। फिर वो चाहे कॉमेडियन हों या किसी राजनैतिक दल के कार्यकर्ता।






