Monday, April 12, 2021

कोरोना की दूसरी लहरः सरकार और जनता


पिछले साल हम अति उत्साह में अपना सीना तान रहे थे कि कोरोना को नियंत्रित करने में भारत दुनिया में सबसे आगे निकल गया है। लेकिन आज हम फिर भयाक्रांत हैं। कोरोना से लड़ने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अपने अपने तरीके से भिन्न-भिन्न कदम उठा रही हैं। जहां असम, बंगाल और केरल जैसे चुनावी राज्यों में कोई प्रतिबंध नहीं है, वहीं दूसरे कई राज्यों में मास्क न पहनने पर पुलिस पिटाई भी कर रही है और चालान भी। ये बात लोगों की समझ में नहीं आ रही कि जिन राज्यों में चुनाव होता है वहाँ घुसने से कोरोना क्यों डरता है? इसका जवाब न तो किसी सरकार के पास है न तो किसी वैज्ञानिक के पास है।  


जिस तरह कुछ राज्यों में कोरोना की रोकथाम के लिए रात का कर्फ्यू लगाया गया है, उससे लोगों को भय सता रहा है कि कहीं चुनावों के बाद फिर से लॉकडाउन न लगा दिया जाए। पिछले लॉकडाउन का उद्योग और व्यापार पर भारी विपरीत प्रभाव पड़ा था, जिससे देश की अर्थव्यवस्था अभी उबर नहीं पाई है। सबसे ज्यादा मार तो छोटे व्यापारियों और कामगारों ने झेली। इसलिए आज कोई भी लॉकडाउन के पक्ष में नहीं है।  



छोटे व्यापारी की तो समझ में आती है लेकिन उद्योगपति अनिल अम्बानी के बेटे अनमोल अम्बानी तक ने ट्वीट की एक श्रृंखला पोस्ट कर पूछा है कि, ‘जब फिल्म अभिनेता शूटिंग कर सकते हैं, क्रिकेटर देर रात तक क्रिकेट खेल सकते हैं, नेता भारी जनसमूह के साथ रैलियां कर सकते हैं, तो व्यापार पर ही रोक क्यों? हर किसी का काम उनके लिए महत्वपूर्ण है।’ अनमोल ने इसके साथ ही अपने ट्वीट में कोरोना श्पैनडेमिकश् के प्रसार को रोकने के लिए लगाए जाने वाले लॉकडाउन को श्स्कैमडेमिकश् तक कह दिया। 


उधर भारत के वैज्ञानिकों ने दिन रात शोध और कड़ी मेहनत के बाद कोरोना का वैक्सीन बनाया है। पर बहुत कम लोगों को यह पता है कि कोरोना महामारी को वैक्सीन की ढाल देकर भारतीय कम्पनी भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोरोना की वैक्सीन ‘कोवैक्सिन’ की सफलता के पीछे हैदराबाद के समीप ‘जिनोम वैली’ का हाथ है। ‘जिनोम वैली’ असल में एक जीव विज्ञान के शोध का केंद्र है। इस समय यह दुनिया में तीसरे दर्जे पर है, जहां लाखों की तादाद में वैक्सीन की ईजाद और निर्माण होता है। 1996 में जब एक प्रवासी भारतीय वैज्ञानिक डा कृष्णा इला ने भारत बायोटेक कम्पनी की स्थापना ‘जिनोम वैली’ में की थी तो उन्हें इस बात की जरा भी कल्पना नहीं होगी कि एक दिन श्जिनोम वैली’ ही दुनिया को कोरोना महामारी से लड़ने वाली वैक्सीन प्रदान करेगी।


‘जिनोम वैली’ को विकसित करने में तेलंगाना काडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी बी पी आचार्य और उनकी टीम महत्वपूर्ण योगदान रहा। जिन्होंने रात-दिन एक कर के इसे कामयाबी को हासिल किया है। आज ‘जिनोम वैली’ जीव विज्ञान का एक ऐसा केंद्र बन चुका है जहां 300 से अधिक दवा कम्पनियाँ हैं। जो न सिर्फ कोरोना व अन्य बीमारियों के वैक्सीन का निर्माण कर रही हैं, बल्कि 20 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दे रही है। यह देश के लिए एक गर्व की बात है। कई दशकों पहले उठाए गए इस कदम की बदौलत आज हम कोरोना जैसी महामारी से लड़ने में सक्षम हुए हैं। यह डा कृष्णा इला की दूरदर्शिता और बी पी आचार्य जैसे कर्मठ अधिकारियों की वजह से ही संभव हुआ है।

 

बावजूद इस सबके कोरोना की दूसरी लहर के साथ कोरोना पूरे दम से लौट आया है। कुछ ही महीनों पहले जब इसका असर कम होता दिखा तो लोगों ने इस विषय में सावधानी बरतना कम कर दिया था। चोटिल अर्थव्यवस्था, राज्यों में चुनाव और अन्य मुद्दों पर जनता का ध्यान ज्यादा जा रहा था। लेकिन हाल की कुछ हफ्तों में कोरोना ने जो तेजी पकड़ी है उससे आम आदमी और सरकारी तंत्र एक बार फिर से चिंता में है।


उधर दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस फैसले के अनुसार यदि आप अपनी बंद गाड़ी में अकेले भी सफर कर रहे हैं तो भी मास्क लगाना अनिवार्य है। यह बात समझ से परे है इसलिए सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर काफी बहस छिड़ गई है। लोग प्रश्न पूछ रहे हैं कि बंद गाड़ी में अकेले सफर करने वाले को कोरोना के संक्रमण का खतरा अधिक है या राजनैतिक रैलियों और कार्यक्रमों में बिना मास्क आने वाली भीड़ को? उधर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का एक वीडियो वायरल हो रहा है जहां कुछ अधिकारी एक दुकानदार को ठीक से मास्क न पहनने पर धमकाते हुए नजर आ रहे हैं। गर्मागर्मी  के बाद मामला शांत तो हो जाता है लेकिन उस वीडियो में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जो अधिकारी उस व्यापारी को धमका रहा है उसने स्वयं मास्क ठीक से नहीं लगा रखा। ऐसे दोहरे मापदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं? कई शहरों में पुलिस वाले मास्क न पहनने पर आम लोगों की बेरहमी से पिटाई भी कर रहे हैं जिससे भड़की जनता ने भी पुलिसवालों की पिटाई की है। सरकारों को पुलिसवालों को ये निर्देश देना होगा कि वे नियमों के पालन में कड़ाई तो बरतें पर मानवीय संवेदनशीलता के साथ। अन्यथा समाज में अराजकता फैल जाएगी। पर साथ ही कोरोना की दूसरी लहर में बढ़ते हुए मरीजों और मौतों को भी हमें गम्भीरता से लेना होगा और सभी सावधानियाँ बरतनी होगी। लॉकडाउन की स्थित न आए इसके लिए हम सबको भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।


संतोष की बात यह है कि कोरोना की दूसरी लहर भारत में तब आई है जब हमारे पास इससे लड़ने के लिए वैक्सीन के रूप में एक नहीं बल्कि दो-दो हथियार हैं। पर अभी तो देश के कुछ ही लोगों को वैक्सीन मिली है। फिर भी भारत ने कोरोना वैक्सीन को दूसरे देशों में भेज दिया है। यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दृष्टि से सराहनीय कदम हो सकता है, पर देशवासियों की सेहत और जिंदगी बचाने की दृष्टि से सही कदम नहीं था। सरकारों को वैक्सीन लगाने की मुहिम को और तेज करना होगा, जिससे इस महामारी के कहर से बचा जा सके।

Monday, April 5, 2021

पुलिसवालों में इंसानियत अभी ज़िंदा है


आम तौर पर माना जाता है कि पुलिसवालों में इंसानियत नहीं होती। पुलिसवालों का जनता के प्रति कड़ा रुख़ प्रायः निंदा के घेरे में आता रहता है। पिछले दिनों सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत के बाद बॉलीवुड के मशहूर सितारों का नशीले पदार्थों के साथ नारकोटिक विभाग द्वारा पकड़े जाना राजनैतिक घटना बताया जा रहा था। आरोप था कि ये सब बिहार के चुनाव के मद्देनज़र किया जा रहा है जबकि ये सब नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के महानिदेशक राकेश अस्थाना की मुस्तैदी के कारण हो रहा था। अस्थाना के बारे में यह मशहूर है जब कभी उन्हें कोई संगीन मामला सौंपा जाता है तो वे अपनी पूरी क़ाबलियत और शिद्दत से उसे सुलझाने में जुट जाते हैं। सीबीआई में रहते हुए अस्थाना ने कुख्यात भगोड़े विजय माल्या के प्रत्यर्पण में जो भूमिका निभाई है उसकी जानकारी सीबीआई में उन सभी अफ़सरों को है जो इनकी टीम में रहे थे।
 


लेकिन आज हम एक अनोखे केस की बात करेंगे। पुलिस हो या कोई अन्य जाँच एजेंसी, वो हमेशा बेगुनाहों को झूठे केस में फँसा कर प्रताड़ित करने जैसे आरोपों से घिरी रहती है। लेकिन इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है जब विदेश में एक बेगुनाह जोड़े को बेगुनाह साबित कर भारत वापिस लाने में नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो कामयाब रहा है। इससे दोनो देशों के बीच द्विपक्षीय सम्बन्धों को और मज़बूती मिली है। मामला 2019 का है जब उसी साल 6 जुलाई को कतर के हवाई अड्डे पर मुंबई के एक जोड़े को 4 किलो चरस के साथ पकड़ा गया था। मामला कतर की अदालत में पहुँचा और मुंबई के ओनिबा और शरीक को वहाँ की अदालत में 10 साल की सज़ा सुना दी गई। ओनिबा और शरीक ने अपनी सज़ा के दौरान अपनी बेटी को जेल में ही जन्म दिया। इन दोनों ने आनेवाले 10 सालों के लिए ख़ुद को जेल में ही बंद मान लिया था। लेकिन कतर से दूर मुम्बई में इन दोनों के रिश्तेदारों को इन दोनों की बेगुनाही का पूरा यक़ीन था। लिहाज़ा उन्होंने मुम्बई पुलिस और नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का दरवाज़ा खटखटाया। वे यहीं तक नहीं रुके उन्होंने प्रधान मंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय की मदद भी माँगी। हालाँकि ओनिबा और शरीक को रंगे हाथों पकड़ा गया था लेकिन उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि इतनी बड़ी मात्रा में नशीले प्रदार्थ इनके बैग में कैसे आए। 


किसी ने ख़ूब ही कहा है सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं हो सकता। एक ओर जहां ओनिबा और शरीक हिम्मत हार चुके थे वहीं शरीक की फ़ोन रिकॉर्डिंग में से एक ऐसा सुबूत निकला जिसने इस मामले का सच उजागर कर दिया। दरअसल शरीक की फूफी तबस्सुम ने शरीक के मना करने पर भी शरीक और ओनिबा को एक हनीमून पैकेज तोहफ़े में दिया। इस तोहफ़े में कतर की टिकट और वहाँ रहने और घूमने का पूरा पैकेज था। इस पैकेज के साथ ही तबस्सुम ने शरीक को एक पैकेट भी दिया जिसमें तबस्सुम ने अपने रिश्तेदारों के लिए ‘पान मसाला’ भेजा था। असल में वो पान मसाला नहीं बल्कि चरस थी। 


इतने गम्भीर मामले के बावजूद नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के महानिदेशक राकेश अस्थाना को लगा कि यह मामला इतना सपाट नहीं है जितना दिखाई दे रहा है। उन्हें इसमें कुछ पेच नज़र आए इसलिए अस्थाना ने एक विशेष टीम गठित करी। इस टीम का नेतृत्व नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के डिप्टी डायरेक्टर के पी एस मल्होत्रा ने किया। जाँच हुई और पता चला कि शरीक की फूफी तबस्सुम एक कुख्यात गैंग का हिस्सा हैं जो नशीले पदार्थों की तस्करी करता है। इस गैंग का सरग़ना मुंबई का निज़ाम कारा है जिसे मुम्बई में गिरफ़्तार किया गया। मुम्बई के नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की जाँच में ही यह सामने आया कि ओनिबा और शरीक दोनों बेगुनाह हैं। 


चूँकि मामला विदेश का था जहां ये बेगुनाह जोड़ा जेल में बंद था और असली गुनहगार भारत में नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की हिरासत में। तभी नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के महानिदेशक ने ये तय किया कि ओनिबा और शरीक को बाइज़्ज़त वापिस भारत लाया जाए। अस्थाना ने प्रधान मंत्री कार्यालय, विदेश मंत्रालय की मदद से कतर में भारतीय दूतावास के ज़रिए कतर के अधिकारियों को इस मामले सभी सुबूत भिजवाए। कतर की कोर्ट में इन सभी सुबूतों पर फिर सुनवाई हुई और इस साल जनवरी में इस मामले में पुनः विचार किया गया। 29 मार्च 2021 को आख़िरकार कतर की अदालत ने ओनिबा और शरीक को बेगुनाह मान लिया और बाइज़्ज़त रिहा कर दिया। अब बस उस दिन का इंतेज़ार है जब सभी क़ानूनी औपचारिकताओं के बाद ओनिबा और शरीक को वापिस भारत भेजा जाएगा। इस खबर को सुन कर ओनिबा और शरीक के रिश्तेदारों में एक ख़ुशी की लहर दौड़ गई। उनका यह कहना है कि इस मामले में प्रधान मंत्री कार्यालय, विदेश मंत्रालय और ख़ासतौर पर नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने उनकी इस बात पर विश्वास किया कि ओनिबा और शरीक बेगुनाह हैं और इसलिए इस केस में आगे बढ़ कर हमारी मदद की। वरना ये जोड़ा दस बरस तक कतर की जेल में सड़ता रहता।  


इस पूरे हादसे से यह साबित होता है कि अगर कोई उच्च अधिकारी निशपक्षता, पारदर्शिता और मानवीय संवेदना से काम करे तो वह जनता के लिए किसी मसीहा से कम नहीं होता। इस मामले में सक्रियता दिखा कर नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की टीम ने अपनी छवि को काफ़ी सुधार है। यह उदाहरण केंद्र और राज्यों की अन्य जाँच एजेंसीयों के लिए अनुकरणीय है। उन्हें इस बात से सतर्क रहना चाहिए की कोई भी उनका दुरुपयोग निज हित में या अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को परेशान करने के लिए न करे बल्कि सभी जाँच एजेंसियाँ अपने नियमों के अनुसार क़ानूनन कार्यवाही करें और राग द्वेष से मुक्त रहें। इससे उनकी छवि जनता के दिमाग़ में बेहतर बनेगी और ये जाँच एजेंसियाँ गुनहगारों को सज़ा दिलवाने में और बेगुनाहों को बचाने में नए मानदंड स्थापित करेंगी। इसके लिए आवश्यक है कि इन जाँच एजेंसियों की टीम में तैनात अधिकारी अपने वेतन और भत्तों से संतुष्ट रह कर, बिना किसी प्रलोभन में फँसे, अपने कर्तव्य को पूरा करें तो उससे हमारे समाज और देश को लाभ होगा और इन कर्मचारियों को भी आत्मिक संतोष प्राप्त होगा।