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Monday, August 31, 2026

आधुनिक महिलाएँ भोजन बनाने का विज्ञान और कला नहीं जानतीं

आप भारत के किसी भी शहर या कस्बे में घूम कर देखिए तो सबसे ज़्यादा दुकानें अंग्रेज़ी दवाओं की मिलेंगी या पैथोलॉजी टेस्ट और एमआरआई आदि करने वाले सेंटर मिलेंगे या पचासों नर्सिंग होम व अस्पताल मिलेंगे। ज़ाहिर है कि हम तेज़ी से एक बीमार देश बनते जा रहे हैं। हम बीमारी को डाक्टरी इलाज से ठीक करने में लाखों रुपया गवां देते हैं लेकिन बीमारी के कारणों को समझ कर जड़ से खत्म करने की कवायद नहीं करते। जबकि सच्चाई यह है कि अगर हम अपने धर्मशास्त्रों के अनुसार अपने भोजन और दिनचर्या को संचालित करें तो आधुनिक जीवन की चकाचौंध के बीच भी हम पूरी तरह स्वस्थ रह सकते हैं। 



हज़ारों सालों से ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर इन धर्मशास्त्रों की रचना की थी जो कलयुग के प्रारंभ में छिन्न-भिन्न हो गए। इसलिए नेमिशारण्य में शौनक ऋषि के नेतृत्व में देश भर के कोने-कोने से अट्ठासी हज़ार ऋषि वहाँ ज्ञान चर्चा के लिए एकत्र हुए और लंबे व गहरे चिंतन व संवाद के बाद उस ज्ञान को लेकर पुनः भारत के कोने-कोने में पहुँच गए। उनके द्वारा दिए गए ज्ञान का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा और ये पद्धतियाँ समाज में स्वीकृत और प्रतिष्ठित हो गई, जिनके अनुसार हम आज भी कुछ सीमा तक आचरण कर रहे हैं। 


उदाहरण के लिए फागुन पूर्णिमा को होलिकोत्सव करना, मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ के लड्डू खाना और दान करना। सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय खाना-पीना नहीं या फिर गणेश जी के पूजन के लिए दूर्वा का, शंकर जी के पूजन के लिए बेलपत्र का और विष्णु पूजन के लिए तुलसी पत्र का प्रयोग करना उसी परंपरा का प्रभाव है। इसी तरह विजयदशमी को शस्त्र पूजन करना, पाटी पूजन करना या विद्वानों को दक्षिणा देना, दीपावली के पहले अपने आवास की लिपाई-पुताई करना और लक्ष्मी पूजन के बाद दीपोत्सव करना। ये सब शास्त्र शुद्ध पद्धतियों का समावेश कर, जिन ग्रंथों की रचना की गई उन्हें धर्मशास्त्र कहते हैं। धर्म वही है जिसे प्रजा धारण करे यानी उसके अनुसार आचरण करे तो समाज को स्थिरता प्राप्त होती है। 



यही बात हमारे दैनिक आहार और पाक-क्रिया पर भी लागू होती है। हमारा आहार शास्त्र और पाक शास्त्र धर्मशास्त्रों का ही एक महत्वपूर्ण अंग है। जरा सोचें कि अधिकांश लोगों का भोजन, दाल-चावल, रोटी-सब्ज़ी होगा, यह किसने तय किया? दाल-सब्ज़ी को छौंकने का आविष्कार किसने किया होगा? श्राद्ध में उड़द की दाल की पकौड़ी, कचौड़ी, इमरती खाना और होली के दिनों में खजूर और ज्वार खाना और चैत्र के महीने में कड़वे नीम का रस पीना ये किसने और कब तय किया होगा? इन परंपराओं को हम केवल अंधविश्वास से नहीं बल्कि अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के उद्देश्य से आज भी निभाते आ रहे हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में इडली डोसा, महाराष्ट्र में वरण और भात, राजस्थान में दाल-बाटी और सैंगरी, गुजरात में भकड़ी और सुखड़ी, पंजाब में परांठे और लस्सी, उड़ीसा में पखालभात, बंगाल में माछ-भात, ये कैसे और कब हमारी दिनचर्या में आए और आज भी हम इनका पालन करते हैं। 



इसी तरह, भोजन बनाने की विभिन्न पद्धतियां, विभिन्न मसालों का प्रयोग, शुद्ध घी या फिर सरसों, तिल या नारियल के तेल का प्रयोग, भोजन परोसने की विभिन्न पद्धतियां, उनको पकाने और खाने के लिए विभिन्न धातुओं के पात्रों का प्रयोग किसने और कब सिखाया होगा? युगों से जो हम करते आए हैं वह हमें बहुत ही सहज और स्वाभाविक लगता है। पर विचार करने पर आश्चर्य होता है कि उन ऋषियों की समग्र बुद्धि और सूक्ष्मता पर, जिन्होंने इस विज्ञान को स्थापित किया। भोजन बनाना, परोसना और उसका आस्वादन करना, यह तत्वज्ञान है, यह यज्ञ है, शास्त्र है, कौशल है, कला है, रसास्वादन है, प्राणों की पुष्टि है, इन्द्रियों और मन का सुख है और यह हमारा संस्कार है। एक साथ पोषण, तोषण, संस्कार, आनंद और आत्म दर्शन है। 



अपनी संस्कृति के इन मूल तत्वों के कारण, भारत चिरंजीव बना है। इस वास्तविकता को अब पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है। परंतु हम स्वयं ही आज इन बातों से विमुख हो गए हैं। मैकॉले की आजतक लागू शिक्षा पद्धति ने हमारी सोच को पूरी तरह बदल दिया है। अपने रीति-रिवाज़ों, परंपराओं, पद्धतियों और ख़ान-पान व पहनावे का सम्मान करने की बजाए हम उनका उपहास करना, आलोचना करना और उपेक्षा करना अपने आधुनिक होने का प्रमाण मानते हैं। हम अन्न को पवित्र मानने के स्थान पर उसे बाज़ार में बिकने वाला एक सामान्य पदार्थ मानने लगे हैं। अन्न का आरोग्य और संस्कार के साथ सीधा संबंध है, इस बात को भूल कर केवल स्वाद की संतुष्टि के लिए ही उसे ग्रहण करते हैं। इसलिए देश में अन्न का संकट और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का संकट बढ़ गया है। जैस कोई हीरे को पत्थर समझ कर फेंक दे, वैसे ही हमने अपने शास्त्रों को फेंक दिया है और पश्चिम की बाज़ारू संस्कृति के ग़ुलाम बन गए हैं। हमारे दैनिक जीवन में ऑनलाइन आनेवाला भोजन इसका प्रमाण है। जिसका परिणाम है आधुनिक चिकित्सा का दिन-दूना और रात-चौगुना बढ़ता कारोबार। उपरोक्त ज्ञान का आधार पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, कांकरिया, अहमदाबाद से प्रकाशित एक अत्यंत मूल्यवान ग्रंथ ‘आहारशास्त्र’ है जो आज हर घर में होना चाहिए। मात्र पाँच सौ रुपए का यह ग्रंथ पढ़कर हर महिला अपने घर को निरोगी, सुखी व संपन्न बना सकती है।


इसी क्रम में याद आया कि कई बरस पहले अमरीका के कई बड़े शहरों में अपनी व्याख्यान माला के दौरान, लॉस एंजलेस से सैनहोज़े की फ्लाइट में एक वृद्ध अमरीकी महिला, जो मेरे साथ बैठी थीं, उनसे मैंने पूछा कि वे कहाँ जा रही हैं? वे बोलीं अपनी नातिन के पास। क्योंकि वो फ़ोन पर कहती है, नानी आपका बनाया खाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। मम्मी जो पका-पकाया खाना बाज़ार से लाती हैं उसमें कोई स्वाद नहीं है। इसलिए मैं कुछ दिनों के लिए उसके पास जा रही हूँ। उनकी ये बात सुनकर मुझे अपनी माँ और नानी के बनाए खाने का स्वाद मुंह में आ गया। वो स्वाद जिससे आज की युवा पीढ़ी और हमारे नाती-पोते बहुत तेज़ी से वंचित होते जा रहे हैं। 

Monday, December 15, 2025

खाद्य मिलावट का गहराता संकट! 

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक चेतावनी दी जा रही है कि 15 साल में देश का हर व्यक्ति कैंसर का शिकार हो जाएगा…! वीडियो में यह दावा किया गया है कि मिलावटी खाने से पूरे समाज को धीरे-धीरे मार दिया जा रहा है। इसी तरह, एक और वीडियो में चीन के किसी लैब में फल-सब्ज़ियों पर रसायन और रंग छिड़कते हुए दिखाया गया है, जो तुरंत पक जाते हैं। ये वीडियो भय पैदा कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है: क्या ये सिर्फ अतिशयोक्ति हैं, या वास्तविकता का आईना? भारत में खाद्य मिलावट की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे ‘धीमी हत्या’ कह रहे हैं। कैंसर, हृदय रोग और किडनी फेलियर जैसी बीमारियों का बढ़ता ग्राफ इसी का नतीजा है। लेकिन हम कितने प्रभावित होंगे? समस्या कितनी गंभीर है? और सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए?



खाद्य मिलावट कोई नई समस्या नहीं है। प्राचीन काल से ही व्यापारी लाभ के लिए अनाज में पत्थर, दूध में यूरिया और मसालों में कृत्रिम रंग मिलाते आए हैं। लेकिन 2025 में यह महामारी का रूप ले चुकी है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अनुसार, त्योहारों के मौसम में मिलावट के मामले 30 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं। दूध, घी, पनीर, मावा, तेल और मसाले – ये रोज़मर्रा के सामान अब ज़हर की तरह बन चुके हैं। हाल ही में गुजरात में 198 दूध और पनीर के नमूने असुरक्षित पाए गए, जिनमें स्टार्च और सिंथेटिक फैट मिले थे। आगरा में 2 क्विंटल मिलावटी खोआ नष्ट किया गया, जबकि सूरत के पास 745 किलो नकली पनीर जब्त हुआ। तिरुपति के प्रसिद्ध लड्डू के घी मिलावट कांड में सीबीआई ने 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जहां वनस्पति तेल, बीटा कैरोटीन और एसिड एस्टर जैसे रसायनों से घी बनाया जा रहा था। पतंजलि का घी भी गुणवत्ता परीक्षण में फेल हो गया, जिसमें मिलावट की पुष्टि हुई। 



ये मामले सिर्फ़ तो सिर्फ़ संकेत हैं। जम्मू-कश्मीर में 2025 में 13,944 निरीक्षण हुए, जिनमें 21 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। लखनऊ में केएफसी, मैकडॉनल्ड्स और हल्दीराम जैसे ब्रांडों के 36 नमूने फेल हुए, जहां बैक्टीरिया और बासी सामग्री मिली। सोशल मीडिया पर हाल के पोस्ट्स में गोरखपुर की फैक्ट्री से 40 क्विंटल नकली पनीर (पोस्टर कलर, डिटर्जेंट और सल्फ्यूरिक एसिड से बना) जब्त होने की बात है, जो सड़क किनारे के ठेलों पर बिकता था। पाली में 4660 किलो मिलावटी मावा, देवली में मूंगफली तेल के नमूने – ये उदाहरण बताते हैं कि मिलावट अब छोटे-बड़े सभी स्तरों पर फैल चुकी है। 



अब सवाल है कि हम कितने प्रभावित होंगे? मिलावट का असर तत्काल और दीर्घकालिक दोनों है। तत्काल प्रभाव में उल्टी, दस्त, फूड पॉइज़निंग शामिल हैं, जैसा कि हाल के कफ सिरप कांड में 14 बच्चों की मौत हुई। लेकिन दीर्घकालिक खतरा और भी भयानक है। कैडमियम, पेस्टीसाइड्स और मेटानिल येलो जैसे रसायन कैंसर, लीवर-किडनी डैमेज और हृदय रोग का कारण बनते हैं।  यूरोपीय संघ ने 2019-2024 के बीच 400 से ज़्यादा भारतीय उत्पादों को कैंसरकारी पदार्थों से दूषित पाया, जिनमें मसाले, मछली और फल शामिल थे। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अनुसार, मिलावट से जुड़े गैर-संक्रामक रोगों में 20 प्रतिशत वृद्धि हुई है। दक्षिण भारत में दूध और फलों में मिले रसायन गॉलब्लैडर कैंसर और ड्रॉप्सी के मामलों को बढ़ा रहे हैं। बैकरी आइटम्स में कृत्रिम रंगों से कैंसर का जोखिम दोगुना हो गया है। 


वायरल पोस्ट में दावा किया गया कि 15 साल में सबको कैंसर होगा – यह अतिशयोक्ति है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कभी ऐसा नहीं कहा कि 87 प्रतिशत भारतीयों को मिलावटी दूध से कैंसर होगा। लेकिन समस्या गंभीर है। फ्रंटलाइन पत्रिका के अनुसार, मिलावट से क्रॉनिक डिज़ीज़ेज़ में उछाल आया है, खासकर कैंसर और कार्डियोवस्कुलर डिसऑर्डर में।  भारत पहले से ही एशिया में कैंसर के मामलों में तीसरा सबसे बड़ा देश है, और मिलावट इसे और बढ़ावा दे रही है। ग्रामीण इलाकों में जहां जैविक खेती कम है, प्रभाव ज़्यादा पड़ता है। शहरीकरण और प्रोसेस्ड फूड के बढ़ते उपयोग से मध्यम वर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहा है।


चीन वाले वीडियो पर बात करें तो वह एआई-जनरेटेड फेक है। टिकटॉक पर मूल वीडियो को एआई कंटेंट के रूप में चिह्नित किया गया था और फैक्ट-चेकर्स ने असंगतताओं (जैसे अस्वाभाविक रंग परिवर्तन) की पुष्टि की। लेकिन यह वीडियो वास्तविक समस्या को उजागर करता है। चीन में अंगूरों पर 24 बार पेस्टीसाइड स्प्रे और चेरीज़ से आईसीयू के मामले सामने आए हैं। वैश्विक व्यापार में भारतीय निर्यात भी प्रभावित हो रहा है। लेकिन घरेलू स्तर पर समस्या ज़्यादा चिंताजनक है, जहां नियमन कमज़ोर है।


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मिलावट को ‘सामाजिक अपराध’ कहा और तीन नई माइक्रोबायोलॉजी लैब्स शुरू कीं।  एफएसएसएआई ने त्योहारों पर विशेष अभियान चलाए, लेकिन सज़ाएं कमज़ोर हैं। रामेश्वरम कैफे मामले में कीड़े मिलने पर एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन मालिकों को सज़ा मिलना मुश्किल।  हज़ारीबाग में डेयरी सील हुई, लेकिन दोबारा खुलने का डर रहता है।  समस्या यह है कि दंड अपर्याप्त हैं – अधिकतम 10 लाख का जुर्माना या 7 साल की सज़ा, लेकिन लागू नहीं होता। लैब्स की कमी से टेस्टिंग देरी से होती है।


ऐसे में सरकार को क्या करना चाहिए? सबसे पहले, सख्त कानून: मिलावट पर न्यूनतम 20 साल की सज़ा और संपत्ति जब्ती। एफएसएसएआई को स्वायत्त बनाएं, न कि स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन। हर जिले में मोबाइल टेस्टिंग वैन और एआई-आधारित निगरानी शुरू करें। जैविक खेती को सब्सिडी दें – गोबर से उर्वरक बनाने पर प्रोत्साहन।  जन जागरूकता अभियान चलाएं: स्कूलों में मिलावट की पहचान सिखाएं। आयातित फलों पर सख्त जांच। और सबसे ज़रूरी, भ्रष्टाचार पर प्रहार – निरीक्षक जो रिश्वत लेते हैं, उन्हें बर्खास्त करें।


वायरल पोस्ट्स भय पैदा करते हैं, लेकिन वे सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। मिलावट सिर्फ़ व्यापारिक लालच नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य पर हमला है। अगर 15 साल में कैंसर न फैले, तो इसके लिए सरकार, उद्योग और उपभोक्ता सबको जागना होगा। घर पर टेस्ट किट्स इस्तेमाल करें, ब्रांडेड उत्पाद चुनें और शिकायत दर्ज कराएं। अन्यथा, हमारा भोजन ही हमारी कब्र बन जाएगा। समय आ गया है – मिलावट रोकें, जीवन बचाएं!