Monday, July 27, 2026

सरकार की व्यवस्था कैसे सुधरे?

पिछले कुछ सालों से मीडिया दो खेमों में बटा हुआ है। एक तरफ़ है निजी टीवी चैनल और दूसरी तरफ़ है सोशल मीडिया। निजी टीवी चैनलों के मालिकों को सरकार विज्ञापन के नाम पर बहुत मोटी रकम देती है। इसलिए इन चैनलों के उन एंकरों को भी बहुत मोटी रकम मिलती है जो रात-दिन सरकार का इकतरफ़ा गुणगान करते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछली सरकारों में जब निजी चैनल और सोशल मीडिया दोनों ही नदारद थे तब भी ये बँटवारा इस तरह था कि सरकारी नियंत्रण वाला दूरदर्शन और सरकार से विज्ञापनों के नाम पर मोटा पैसा लेने वाले अख़बार, तत्कालीन सरकार का भौपूँ हुआ करते थे। जबकि दूसरे अख़बार विपक्षी दलों से समर्थन लेकर सरकार की आलोचना किया करते थे। हालांकि उस दौर में ये फ़र्क़ इतना प्रखर नहीं था कि आम आदमी उसकी गहराई समझ सके। पर आज जो देश में हो रहा है उसमें दोनों ही पक्ष इकतरफ़ा अभियान चलाते हैं। जिससे हकीकत पता नहीं चल पाती। उदाहरण के तौर पर, सोशल मीडिया में आए दिन वीडियो आते हैं कि भाजपा सरकारों के बनाए पुल ताश के पत्तों की तरह ढहते रहते हैं और भाजपा सरकारों के बनाए राजमार्गों पर जगह-जगह भारी गड्डे हो गए हैं। ऐसा ही एक वीडियो समाचार आया कि नवनिर्मित दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, बनते ही जगह-जगह टूट गया है। पिछले हफ़्ते जब मैं इस राजमार्ग पर पहली बार गया तो लगातार कार की खिड़की से बाहर देख रहा था कि वो गड्डे कहाँ हैं? पर मुझे ऐसा कोई गड्ढा नज़र नहीं आया। बल्कि ये राजमार्ग इतना बढ़िया बना है कि हम मात्र डेढ़ घंटे में दिल्ली से मुज़फ़्फ़रनगर पहुँच गए। 



सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार होना कोई नई बात नहीं है। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोग़ा’ 150 साल पहले भारत में चल रहे भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है। 2500 साल पहले राजनीति के महारथी चाणक्य पंडित ने कहा था, ‘शहद के गोदाम की रखवाली करने वाले के होठों पर शहद लगा मिलेगा’। आज़ादी के बाद से केंद्र और राज्यों की सभी सरकारों ने देश के संसाधनों को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्या वजह है कि नेता किसी भी दल का क्यों न हो, अगर वो पार्षद से लेकर मंत्री तक कभी भी किसी भी पद पर रहा होगा तो उसकी आर्थिक हैसियत उस दौर में कई गुना बढ़ी होगी। ये कोई छिपी बात नहीं है। अपवाद तो हमेशा और हर जगह होते हैं। पर आम धारणा तो यही है कि राजनीति कोयले की दलाली की तरह एक ऐसा पेशा है जिसमें हाथ काले होते ही हैं। इसलिए मौजूदा दौर में संघ और भाजपा पर जो तीव्र हमला हो रहा है वो क्या उन राजनेताओं द्वारा किया जा रहा है जिनका अपना दामन पाक साफ़ है? अगर नहीं तो फिर ग़ुलाम अली की ग़ज़ल की वो लाइन दोहराना अनुचित न होगा, हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है….



प्रधान मंत्री मोदी ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से लेकर, ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना’, ‘प्रधान मंत्री आवास योजना’, ‘आयुष्मान भारत’, ‘जल जीवन मिशन’, ‘स्किल इंडिया मिशन’, ‘नमामि गंगे’, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’, ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘अटल पेंशन योजना’, ‘प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना’, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’, ‘उजाला योजना’, ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’, ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ जैसी तमाम योजनाएं और अभियान चलाए। विपक्ष कहता है कि ये सब फ्लॉप हो गए, कहीं कुछ नहीं हुआ। जबकि इसका दूसरा पक्ष भी सामने आता है। हमारे घर और दफ्तर के स्टाफ़ में जो कर्मचारी हैं वे मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से हैं। उनका कहना है कि उन्हें घर बनाने के लिए सरकार से ख़ासा अनुदान मिला, आज़ादी के बाद उनके गाँव में पहली बार सड़क आई और पेयजल का संकट भी दूर हुआ। ये वो साधारण लोग हैं जिन्हें अकारण झूठ बोलने की कोई आवश्यकता नहीं। उन्हें लाभ मिला है इसलिए वे उसे बताने में संकोच नहीं करते। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि हर अभियान पूरी तरह से असफल हुआ है। कहीं सफलता और कहीं विफलता का होना असामान्य बात नहीं है।   



मुझे लगता है कि चाहे कोई भी दल सत्ता में हो जब तक उसका शासन और प्रशासन आम जनता के प्रति जवाबदेह न हो तब तक वो कितना भी ढोल पीटता रहे, जनता उसके दावों पर विश्वास नहीं करती। आम जनता को बड़े स्तर के बड़े घोटालों से इतना सरोकार नहीं होता जितना उनकी रोज़ की ज़िंदगी में पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार से होता है। इस स्तर का भ्रष्टाचार, हुक्मरानों का अहंकार और आम मतदाता की उपेक्षा का ख़ामियाज़ा सीधा मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री को भुगतना पड़ता है। ज़रूरत इस बात की है कि कोई ऐसी व्यवस्था बने जिसके अंतर्गत आम जनता की छोटी सी छोटी शिकायत पर तुरंत कारवाही हो और उसे राहत मिले। इस दिशा में तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय ने जो पहल की हैं उसका बहुत अच्छा संदेश आम जनता के बीच गया है। आगे चल कर वो कितने सफल होंगे ये तो समय ही बताएगा। पर तमिलनाडु तो एक राज्य है, आवश्यकता हर राज्य में ऐसे ही सुधार की है। डबल इंजन का दावा करने वाली प्रांतीय सरकारों में यह काम केंद्र सरकार की पहल पर अविलंब शुरू होना चाहिए। साथ ही महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां यदि भ्रष्टाचार में बदनाम हुए अफसरों और राजनेताओं की होती है तो उससे सरकार की छवि बहुत ख़राब होती है। भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के उसके दावे खोखले साबित होते हैं।  

एक बात और; इस देश में ईमानदार अफसरों और प्रतिष्ठित सामाजिक लोगों की संख्या इतनी कम नहीं है कि वे शासन और प्रशासन को जवाबदेह बनने के लिए मजबूर न कर सकें। आज के AI युग में किसी भी व्यक्ति के जीवन के विषय में पता लगाना कठिन कार्य नहीं है। आधुनिक तकीनिकी का इस्तेमाल करके देश के हर ज़िले में ऐसे लोगों की सूची बनाई जानी चाहिए और उन्हें कुछ अधिकार देकर स्थानीय शासन और प्रशासन पर निगरानी रखने के काम सौंपना चाहिए। अगर ऐसा हो सका तो ये जनता और सरकार के बीच की खाई को पाटने का एक महत्वपूर्ण कदम होगा।  

Monday, July 20, 2026

आयुर्वेदिक दवाओं पर गहन वैज्ञानिक शोध

बीस बरस पहले वामपंथी नेता वृंदा कारत ने बाबा रामदेव के पतंजलि योग संस्थान की औषधियों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे। तब ये बहस मीडिया में छाई रही थी। वृंदा कारत की मानसिकता जिस पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित रही है उसमें ऐसे विवाद खड़ा करना आम बात थी। आश्चर्य की बात यह है कि आयुर्वेद की विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर सवाल खड़े करने वाले लोग कभी एलोपैथिक दवाइयों के बारे में ऐसे शंकाएँ प्रदर्शित नहीं करते। जबकि हकीकत यह है कि विकासशील देशों को छोड़ विकसित देशों में भी बहुराष्ट्रीय फ़ार्मासिटिकल कंपनियों के मायाजाल पर अनेक घोटाले सामने आते रहे हैं, जिन्हें पैसे, मीडिया और सत्ता की ताक़त से दबा दिया जाता है। ये अंग्रेज़ी दवा कंपनिया हमारे जीवन में कितना ज़हर घोल रही हैं इस पर कभी कोई बहस नहीं होती। जबकि पुरानी कहावत है कि ‘हर जो चीज़ चमकती है उसे सोना नहीं कहते’। 

खैर ये बात तो पुरानी हो गई। नई बात तो यह है कि बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने पश्चिमी जगत की इस चुनौती को बड़ी मजबूती से स्वीकार कर लिया है। अब वे अपने शोध और शास्त्रीय ग्रंथों पर आधारित आयुर्वेदिक दवाओं को सीधे बाज़ार में नहीं उतार रहे। अब उन्होंने हरिद्वार में ही, ‘पतंजलि रिसर्च इंस्टिट्यूट’ की स्थापना की है। जहाँ दुनिया की आधुनिकतम मशीनों से दवाओं को बाज़ार में लाने से पहले उन पर वैज्ञानिक शोध किए जा रहे हैं। उनकी यह पहल उन लोगों को करारा जवाब है जो आयुर्वेदिक दवाओं की वैज्ञानिकता को चुनौती देते आए हैं। 



पिछले हफ़्ते हरिद्वार यात्रा के दौरान मुझे इस शोध संस्थान को देखने का अवसर मिला। वहाँ के एक वैज्ञानिक ने मुझे पूरे संस्थान का भ्रमण करवाया। इस संस्थान में कैंसर, डायबटीज़, सूजन, हृदय रोग, छूत के रोग और चर्म रोगों पर विशेष शोध किया जा रहा है। इस संस्थान की केमिस्ट्री लैब में आयुर्वेदिक दवाओं को ‘फाइटो केमिस्ट्री’ और ‘एनालिटिकल केमिस्ट्री’ की दृष्टि से परखा जा रहा है। इसी संस्थान के जीव विज्ञान विभाग में आयुर्वेदिक उत्पादनों को उनके स्रोत, औषधियों के पौधे और उनसे निकाले जाने वाले तत्वों को विभिन्न प्रजातियों पर प्रयोग करके उनका गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है। संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में आयुर्वेदिक दवाओं के माइक्रोबायोलॉजिकल प्रोफाइल का गहनता से अध्ययन किया जा रहा है। इन दवाओं के बैक्टीरिया या फंगस संबंधित गुण दोषों को आधुनिकतम मशीनों से परखा जा रहा है। इसी तरह संस्थान के नैनो-टेक्नोलॉजी विभाग में दवाओं की मात्रा को घटाने और उनके साइड-इफ़ेक्ट्स को कम करने जैसे विषयों पर भी काम किया जा रहा है। इस शोध की सफलता कैंसर जैसी घातक बीमारी को रोकने में प्रभावी हो सकती है ऐसा यहाँ शोध कर रहे वैज्ञानिकों का विश्वास है। 


इस तरह के प्रयोगों के लिए आमतौर पर प्रयोगशाला में रखे जाने वाले काफ़ी तादाद में जीव-जंतु जैसे चूहे, खरगोश, जूँ और ग्यूनापिग आदि को नियंत्रित वातावरण में रखें गए हैं। जिन पर दवाओं के प्रयोग कर उनके प्रभाव का  अनुसंधान किए जा रहे हैं। यह सब भारत सरकार के ‘वन एवम् पर्यावरण मंत्रालय’ द्वारा स्थापित मानदंडों के अंतर्गत किया जा रहा है। संस्थान के भ्रमण के दौरान मैंने अलग-अलग प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों से बहुत सारे ऐसे प्रश्न किये जो एक आम व्यक्ति के दिमाग में उठते हैं। क्योंकि आज देश का माहौल ऐसा है कि विज्ञापनों के सहारे तमाम हानिकारक पदार्थ और दवाएं बाज़ारों में धड़ल्ले से बिक रही हैं। इसलिए हर जागरूक उपभोक्ता गहन छान-बीन के बाद ही इन उत्पादनों पर भरोसा कर पता है। पतंजलि शोध संस्थान की यह पहल आम उपभोक्ता के विश्वास को सुदृढ़ करेगी। क्योंकि इस प्रक्रिया से गुज़रने के बाद जो दवा उसे प्राप्त होगी उसकी गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगेंगे। शोध संस्थान के भ्रमण के बाद मैंने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। आयुर्वेद की दवाओं के विषय में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जो ग़लत जानकारी प्रचारित की जाती है उनसे निपटने में इस संस्थान का शोध एक कारगर हथियार सिद्ध होगा। 


इसी चर्चा के दौरान मैंने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को एक सुझाव और दिया। इस सुझाव की पृष्ठभूमि में वो ग्रंथ था, ‘आहार शास्त्र’ जो मैंने ‘पुनर्त्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट’, अहमदाबाद से कुछ वर्ष पूर्व प्राप्त किया था। इस ग्रंथ में गहन शोध के बाद यह बताया गया है कि भारत के किस प्रांत में, किस मौसम में, किस धातु में और कैसे भोजन पकाया जाए जो वहाँ की भौगोलिक परिस्थिति के अनुकूल हो। इससे शरीर स्वस्थ रहेगा और बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता भी बढ़ेगी। मेरा सुझाव है कि ‘पतंजलि योग संस्थान’ ऐसे युवा तैयार करे जो गाँव-गाँव में घूम कर गृहणियों को स्वास्थ्य वर्धक पारंपरिक भोजन बनाने की शिक्षा दें। आज मोमो, नूडल्स, बर्गर, पिज़्ज़ा जैसे न जाने कितने उत्पाद हैं जो अब भारत की धमनियों में प्रवेश कर चुके हैं और सबके स्वास्थ्य का सत्यानाश कर रहे हैं। यही है बाज़ारू संस्कृति। पहले अखाद्य पदार्थ खाओ। फिर बीमार पड़ो और फिर महंगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करवाओ। इस विषम चक्र से बचने का एक ही तरीका है कि हम अपनी खानपान और दिनचर्या को बदलें। बाबा रामदेव ने पिछले दो दशकों में दुनिया के कोने-कोने में योग की उपयोगिता को स्थापित किया है। अब यह चुनौती उनके सामने है कि वे हम भारतीयों का खानपान पहले जैसा करने का व्यापक अभियान चलाएँ। उनके पास मीडिया की, संगठन की और आर्थिक शक्ति है कि वे व्यापक जनहित में इस अनूठे अभियान को दिशा दे सकते हैं। मुझे प्रसन्नता हुई कि मेरे इस सुझाव पर आचार्य बालकृष्ण ने तुरंत अपने लोगों को निर्देश दिया कि इस मॉडल की संभावना तलाशें। बाबा ने भी भारतीय संस्कृति, पुरातन धरोहरों और सनातन धर्मों के केंद्रों की सेवा में किए जा रहे ऐसे सभी सद्प्रयासों में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।  

मंदिरों का प्रबंधन कैसे हो?

जबसे अयोध्या के श्री राम मंदिर में भारी मात्रा में चढ़ावा चोरी की खबरें सामने आई हैं उसके बाद से देश के अन्य मंदिरों के भी ऐसे घोटाले रोज़ सामने आ रहे हैं। फिर वो चाहे जम्मू कश्मीर के माता वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड का मामला हो, उत्तराखंड के केदारनाथ व बद्रीनाथ धाम का हो या मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकाल का हो या आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम का हो, हर जगह से भारी मात्रा में रुपया व सोने-चाँदी के चोरी के समाचार आ रहे हैं। सनातन धर्म के मंदिरों की संपत्ति पर सैंकड़ों सालों से लुटेरों की गिद्ध-दृष्टि रही है। फिर वो चाहे यवन आक्रांता हों या देश के ही विभिन्न राज्यवंशों के हिंदू या बौद्ध राजा ही क्यों न हों या अंग्रेज़ हुक्मरान और आज़ादी के बाद विभिन्न दलों के राजनेता। सबने जब मौक़ा मिला मंदिरों की अरबों की संपत्ति को चुराया या लूटा है। करण स्पष्ट है कि धर्म-प्रधान देश होने के कारण सनातन धर्म के मंदिरों में हमेशा से भावुक भक्त उदारता से सोना-चाँदी, ज़मीन-जायदाद और हीरे जवाहरात दान करते आए हैं। इस संपत्ति के प्रबंधन की कोई सुव्यवस्थित पारदर्शी व्यवस्था स्थापित नहीं की गई है। हर मंदिर के संरक्षकों, सेवायतों और भक्तों द्वारा अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार प्रबंधन की व्यवस्थाएं की जाती हैं। 


इस दिशा में जो सबसे प्रभावशाली उदाहरण है वो दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य का है। चोल राजवंश ने तमिलनाडु और आसपास के भूभाग पर नवीं से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक शासन किया। इन शासकों के कार्यकाल में विदेशों से व्यापार और देश में अच्छे उत्पादन के कारण बहुत सम्पन्नता आई। चोल राजाओं ने अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मंदिरों पर केंद्रित रखा। हर गांव, कस्बे और नगर की सभी आर्थिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक, कलात्मक, शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र ये मंदिर हुआ करते थे। इन मंदिरों में लोकतांत्रिक प्रणाली से विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समितियों का चयन किया जाता था। जैसे सरोवरों का प्रबंधन, कर संग्रह, वनों का संरक्षण आदि, इन्हीं समितियों के दायित्व होते थे। इस तरह हर मंदिर स्थानीय समाज के नियंत्रण में काम करता था। इस आशय के जो शिलालेख मिले हैं उनमें इन मंदिरों की कार्यप्रणाली का विस्तृत ब्योरा है। 


आज उपरोक्त अनेक क्षेत्रों में विभिन्न सरकारी या ग़ैर-सरकारी एजेंसियां काम कर रही हैं। इसलिए मंदिर पूरे समाज की गतिविधियों का केंद्र नहीं हो सकते। पर मंदिरों का प्रबंधन समाज की ही ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन लोगों की होनी चाहिए जो उस मंदिर विशेष को नियमित रूप से उदारता से दान देते हैं। ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से अपने श्रम अर्जित धन को उदारता से उस मंदिर को दान देता है वह उस धन की चोरी भी करेगा। ये हमारे संस्कारों में नहीं है। जो दैविक द्रव्य की चोरी करते हैं वे चाहे आस्तिक होने का कितना ही आडम्बर क्यों न रचें, निरे नास्तिक होते हैं। फिर वे चाहें किसी संगठन से जुड़े हों या राजनैतिक दल से। ऐसे लोगों को मंदिरों के प्रबंधन से कोसों दूर रखना चाहिए। इनमें सरकारी अधिकारी और न्यायपालिका के सदस्य भी शामिल हैं। हर मंदिर के प्रबंधन में प्रभावी मार्ग निर्देशक की भूमिका उस सम्प्रदाय के प्रतिष्ठित संतों को सौंपी जानी चाहिए। इस पूरे तंत्र के ऊपर निगरानी रखने का दायित्व चारों मान्य शंकराचार्यों का होना चाहिए। उन आत्मघोषित फर्जी शंकराचार्यों या नए बनाए गए तथाकथित संतों का नहीं जो किसी न किसी राजनैतिक दल या नेता द्वारा प्रायोजित किए जाते हैं। 


इसके साथ ही केंद्र या प्रांतों की सरकारों को मंदिरों के प्रबंधन में या उनकी समितियों में अपने प्रतिनिधि नामित करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। क्योंकि ऐसे नामित व्यक्तियों की जवाबदेही विराजमान देव विग्रह, उस संप्रदाय या उसके प्रतिष्ठित संतों के प्रति नहीं होती। इन लोगों की जवाबदेही तो अपने प्रशासनिक और राजनैतिक आकाओं के प्रति ही होती है। इसलिए इनकी मौजूदगी के बावजूद सरकारी अधिकृत मंदिरों में बड़े-बड़े घोटाले होते हैं। जैसे तिरुमाला तिरुपति देवस्थानममें आईएएस सीईओ के बावजूद भगवान को लगने वाले भोग के लड्डुओं में जानवरों की चर्बी पाई गई या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के भंडार में रखी चाँदी गलाने पर 80 फ़ीसदी नक़ली निकली। कोई भक्त तो नक़ली चाँदी चढ़ाएगा नहीं, क्योंकि सोना या चाँदी चढ़ाने की उस पर कोई बाध्यता नहीं होती। जो भक्त चाँदी या सोना चढ़ाता है वो श्रद्धा से चढ़ाता है। ज़ाहिर है कि चढ़ी हुई चाँदी को बदल कर व्यवस्थापकों द्वारा नक़ली चाँदी रखी गई होगी। 


सरकार का काम तो बस इतना होना चाहिए कि देश के बड़े धर्माचार्यों, विशेषकर चारों शंकराचार्यों के निर्देश में मंदिरों के प्रबंधन की एक नियमावली बना दी जाए। जिसमें प्रबंधन की कार्यप्रणाली का विस्तृत ब्योरा हो, साथ ही यह भी स्पष्ट हो कि चढ़ावे की संपत्ति का निस्तारण किस फार्मूले के तहत होगा? कितना धन मंदिर के रख-रखाव पर खर्च होगा? कितना देव विग्रह की सेवा-पूजा और विग्रहों पर खर्च होगा? कितने धन को भविष्य निधि के रूप में बैंकों में जमा कराया जाएगा? कितने धन को मंदिरों के सेवायतों के रख-रखाव पर खर्च किया जाएगा? कितने धन को निर्धन श्रद्धालुओं के भोजन, शिक्षा और इलाज पर खर्च किया जाएगा? और कितने धन को जनसुविधाओं के विस्तार पर खर्च किया जाएगा? इस नियमावली का शब्दशः अनुपालन करने की बाध्यता हर मंदिर की प्रबंध समिति की होनी चाहिए। हर समिति को सालाना ऑडिट कराना और ऑडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक करना अनिवार्य होना चाहिए। 


इसी तरह का प्रारूप मस्जिदों, गुरुद्वारों, चर्चों और अन्य धर्मों के केंद्रों के प्रबंधन के लिए भी बनाया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा नहीं है कि चढ़ावे की चोरी सिर्फ मंदिरों में ही होती है। अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों पर भी ऐसी मानवीय दुर्बलता समय-समय पर सामने आती रहती हैं। अब देखना यह है कि नेता और अफसर व धनलोलुप, ऐश्वर्यशाली तथाकथित संत ऐसी पारदर्शिता को लागू होने देंगे या नहीं?    

Monday, July 13, 2026

डिजिटल डिटॉक्स: परिवारों के लिए एक अनिवार्य कदम

आधुनिक युग में स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, OTT और इंटरनेट आदि हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। सुबह उठते ही पहला काम स्क्रीन चेक करना, रात सोने से पहले आखिरी काम भी स्क्रीन देखना, यह एक सामान्य सी बात हो गई है। लेकिन इस डिजिटल निर्भरता ने हमारे मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक फिटनेस, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) यानी डिजिटल उपकरणों से कुछ समय के लिए पूरी तरह दूर रहना, आज हर परिवार के लिए आवश्यकता बन गया है। यह न सिर्फ व्यक्तिगत विकास के लिए बल्कि पूरे परिवार की खुशहाली के लिए महत्वपूर्ण है। आज हम डिजिटल लत के दुष्परिणामों तथा परिवारों द्वारा डिटॉक्स अपनाने की जरूरत पर चर्चा करेंगे।



गौरतलब है कि डिजिटल माध्यमों की लत अब एक महामारी का रूप ले चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, औसत व्यक्ति दिन में 7-8 घंटे से अधिक स्क्रीन पर बिताता है। बच्चों और किशोरों में यह आंकड़ा और भी अधिक है। इस लत के कई खतरनाक प्रभाव हैं। सबसे अहम है मानसिक स्वास्थ्य पर असर। हर समय नोटिफिकेशन्स, लाइक्स और कमेंट्स आदि की तलाश में हमारा मस्तिष्क डोपामाइन की लगातार खोज में रहता है। इससे चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आती है। ‘डिजिटल डिप्रेशन’ या ‘सोशल मीडिया एंग्जायटी’ अब आम शब्द बन गए हैं। युवा पीढ़ी में आत्म-सम्मान कम होना, दूसरों से तुलना करना और वास्तविक दुनिया से कटाव बढ़ रहा है।



इसके साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है। आंखों की थकान, गर्दन-पीठ दर्द, मोटापा, कमजोर इम्यूनिटी,ये सब भी अधिक स्क्रीन टाइम के सीधे परिणाम हैं। बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी से विकास प्रभावित हो रहा है। परिवारों में बातचीत कम हो गई है। खाने की मेज़ पर सभी अपना फोन देखते हैं, बच्चे माँ-बाप से कम और यूट्यूब आदि से ज्यादा सीखते हैं। ऐसे में रिश्तों में गहराई कम हो रही है।


इतना ही नहीं इस बुरी लत का सामाजिक स्तर पर भी नुकसान है। फेक न्यूज, साइबर बुलिंग, प्राइवेसी का हनन और समय की बर्बादी के आंकड़ों में भी बढ़ौतरी हो रही है। काम की उत्पादकता घट रही है क्योंकि मल्टी-टास्किंग के नाम पर हम एक काम पर भी ध्यान नहीं दे पाते। अध्ययनों से पता चलता है कि सोशल मीडिया यूजर्स की याददाश्त और गहरी सोचने की क्षमता कम हो रही है।



सोशल मीडिया क्रांति (लगभग 2004-2006 के बाद फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि) से पहले की दुनिया याद कीजिए। सूचना और मनोरंजन के साधन अलग थे, लेकिन उनके लाभ आज के डिजिटल माध्यमों से कहीं अधिक गहरे थे। लोग किताबें पढ़ते थे। एक उपन्यास पढ़ने में पूरा ध्यान लगता था। इससे शब्दावली बढ़ती थी, कल्पनाशक्ति विकसित होती थी और धैर्य आता था। समाचार पत्र पढ़ना परिवार का सामूहिक कार्य होता था। सुबह चाय के साथ अखबार पढ़ना, चर्चा करने से बौद्धिक विकास और पारिवारिक बंधन दोनों बढ़ते थे। आज की तुलना में उस समय जानकारी कम लेकिन गहरी और विश्वसनीय होती थी।


हर घर के बच्चे मैदान में खेलते थे। क्रिकेट, कबड्डी, फुटबाल आदि शारीरिक व्यायाम के साथ सामाजिक कौशल भी विकसित होते थे। पड़ोसियों से बातें होती थी, त्योहारों पर सामूहिक उत्सव मनाए जाते थे, बच्चों का बड़ो से कहानियां सुनना, ये सब भावनात्मक बुद्धिमत्ता बढ़ाते थे। लेकिन आज के बच्चों में ये कौशल कम हो रहे हैं।


वहीं रेडियो पर समाचार और गाने सुनना परिवार को एक साथ लाता था। दूरदर्शन पर सीरियल देखना साप्ताहिक कार्यक्रम होता था, न कि 24 घंटे स्क्रीन पर डेट रहना। इससे अपेक्षा और संतोष का संतुलन बना रहता था।


दादा-दादी से कहानियां सुनना, लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना, ये सब स्मृति और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते थे। जानकारी का प्रसार धीमा लेकिन प्रभावशाली होता था। लोग गहरी बातचीत करते थे, बहसें होती थीं और रिश्ते मजबूत होते थे। उस युग में ध्यान भटकाने वाले तत्व कम थे। परिणामस्वरूप लोग ज्यादा रचनात्मक, धैर्यवान और खुश रहते थे। अध्ययनों से साबित होता है कि स्क्रीन-फ्री पीढ़ी की याददाश्त, समस्या-समाधान क्षमता और रचनात्मकता आज की पीढ़ी से बेहतर थी।


परिवार समाज की मूल इकाई है। अगर परिवार डिजिटल लत से ग्रस्त है तो पूरा समाज प्रभावित होता है। ऐसे में डिजिटल डिटॉक्स अपनाने के कई लाभ हैं। बिना फोन के डिनर, बाहर घूमना, बोर्ड गेम्स खेलना, ये छोटी-छोटी आदतें रिश्तों में गर्माहट लाती हैं। इससे बच्चे अपने बड़ों से ज्यादा जुड़ते हैं। स्क्रीन से दूर रहने से नींद बेहतर होती है, चिंता कम होती है और खुशी बढ़ती है। जिससे मस्तिष्क को आराम मिलता है। पढ़ाई, खेलकूद, कलात्मक गतिविधियों में वृद्धि होती है। स्क्रीन टाइम सीमित करने से एकाग्रता और रचनात्मकता बढ़ती है। ज्यादा चलना-फिरना, व्यायाम, स्वस्थ भोजन की आदतें पड़ती हैं।


जानकर मानते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स एकदम से नहीं, धीरे-धीरे अपनाना चाहिए। इसके लिए हम अपने परिवार स्तर पर कुछ नियम बनाएं तो डिजिटल डिटॉक्स से कई लाभ होंगे। घर में स्क्रीन-फ्री जोन बनाए जाएँ। जैसे कि  भोजन कक्ष, बेडरूम में फोन प्रतिबंधित हो। डिटॉक्स टाइम तय किया जाए। मिसाल के तौर पर हर दिन कम से कम 2 घंटे और वीकेंड पर पूरा दिन स्क्रीन-फ्री बनाने की कोशिश करें। परिवारिक गतिविधियां बढ़ाएँ। जैसे कि किताब पढ़ना, पिकनिक पर जाना, खुले में खेलना, संगीत सुनना आदि। ऐसे में माता-पिता खुद उदाहरण पेश करें तो बच्चे उसका पालन करेंगे। इसके साथ ही स्कूलों, कार्यालयों और सरकार को भी इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।


यह सत्य है कि डिजिटल तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसका दुरुपयोग हमारी खुशहाली छीन रहा है। डिजिटल डिटॉक्स पीछे लौटना नहीं, बल्कि संतुलित जीवन की ओर बढ़ना है। हर परिवार को इसे अपनाना चाहिए ताकि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पारिवारिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बचाकर रख सकें। पहले का युग हमें याद दिलाता है कि खुशी स्क्रीन्स में नहीं, बल्कि रिश्तों, प्रकृति और सृजनशीलता में है। हमें प्रयास  करना चाहिए कि डिजिटल डिटॉक्स की डिश में छोटे-छोटे कदम उठाएं। फोन को थोड़ी देर दूर रखें, परिवार के साथ समय बिताएं और वास्तविक जीवन का आनंद लें। डिजिटल डिटॉक्स न सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। स्वस्थ परिवार ही स्वस्थ राष्ट्र की नींव है। 

Monday, July 6, 2026

यूरोप में बदलते मौसम: पर्यावरण कुप्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की मार!

आज विश्व मौसम की अनिश्चितता का सामना कर रहा है। पिछले महीने से यूरोप एक अभूतपूर्व गर्मी की लहर (हीटवेव) से जूझ रहा है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ब्रिटेन समेत कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। स्पेन और फ्रांस में 45 डिग्री के पार रिकॉर्ड टूटे, जबकि रातें भी असामान्य रूप से गर्म रहीं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (WWA) के अध्ययनों के अनुसार, यह हीटवेव मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के बिना लगभग असंभव होती। 1976 में ऐसी स्थिति कल्पना से परे थी, लेकिन आज यह सामान्य होती जा रही है।


यूरोप, जो एक बार ठंडे मौसम के लिए जाना जाता था, अब सबसे तेज गर्म हो रहा महाद्वीप बन गया है। 1980 के दशक से यहां तापमान वैश्विक औसत से दोगुना तेजी से बढ़ रहा है। 2024-2026 के वर्षों में रिकॉर्ड गर्मी, सूखा, जंगल की आग और बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया। जून 2026 की गर्मी में यूरोप में हजारों अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं। इस सब का अनुमानित आर्थिक नुकसान अरबों यूरो का है। 1980-2024 के बीच यूरोप में जलवायु से संबंधित घटनाओं से 822 बिलियन यूरो का नुकसान हुआ, जिसमें हाल के वर्षों में तेज वृद्धि देखी गई।



यह सिर्फ यूरोप की समस्या नहीं है। एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में भी मौसम के स्वरूप बदल रहे हैं। पाकिस्तान, भारत, चीन में बाढ़ और सूखे की घटनाएं बढ़ी हैं। अमेरिका में तूफान और जंगल की आग सामान्य हो गई हैं। ऑस्ट्रेलिया में लंबे सूखे और भारत में अनियमित मानसून ने कृषि और जल संसाधनों को प्रभावित किया। वैश्विक स्तर पर बेहद खराब मौसम की घटनाएं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। हीटवेव, भारी बारिश, सूखा, तूफान जैसी घटनाओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, 1.1-1.4 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक गर्मी ने इन घटनाओं को दसियों गुना अधिक संभावित बना दिया है।


देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन का मूल कारण मानवीय गतिविधियां हैं। जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का जलाना बिजली उत्पादन, परिवहन और उद्योगों में मुख्य जिम्मेदार है। यह कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है, जो पृथ्वी की गर्मी को फंसाता है। तेज़ी से हो रही बेतरतीब वनों की कटाई इसका दूसरा बड़ा कारण है। एक अनुमान के तहत हर साल लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर जंगल नष्ट होते हैं, जो न सिर्फ CO2 अवशोषित करने की क्षमता कम करते हैं बल्कि संग्रहीत कार्बन भी वायुमंडल में छोड़ते हैं। कृषि, पशुपालन, मिथेन गैस और भूमि उपयोग परिवर्तन कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग एक तिहाई जिम्मेदार हैं। एक शोध के अनुसार पिछले तीन वर्षों में भारत सरकार के सलिप्तता से देश भर में एक अनुमान के अनुसार 28 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं और ये क्रम अभी जारी है। ये आत्मघाती नीति वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए जानलेवा सिद्ध होगी।



पर्यावरण प्रबंधन की कमी इन समस्याओं को और बढ़ाती है। उल्लेखनीय है कि कई विकसित देशों में भी, जहां तकनीक और नीतियां उपलब्ध हैं, क्रियान्वयन कमजोर है वाहन भी ऐसे कुप्रबंधन के कारण पर्यावरण और मौसम पर असर पड़ रहा है। यूरोप में नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ रही है, लेकिन कोयला और गैस पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है। विकासशील देशों में वन संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और सतत विकास की उपेक्षा की जाती है। औद्योगिक प्रदूषण, अनियोजित शहरीकरण, प्लास्टिक और कचरे का गलत निपटान, नदियों का प्रदूषण, ये सभी कारक प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ रहे हैं।


जानकर मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के अन्य कारक भी हैं, जैसे प्राकृतिक चक्र (El Niño), लेकिन वैज्ञानिक सहमति है कि मानवीय कारक मुख्य हैं। 50 वर्षों में गर्मी की घटनाएं सैकड़ों गुना अधिक संभावित हो गई हैं। ग़लत  प्रबंधन का मतलब है कि अनुकूलन और शमन दोनों में कमी। यूरोप जैसे महाद्वीप में भी एयर कंडीशनिंग, स्वास्थ्य सेवाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर गर्मी के लिए तैयार नहीं थे, जिस करण वहाँ पर मौतें बढ़ीं। कुछ विकासशील देशों में तो स्थिति और बदतर है। वहाँ बाढ़ से फसलें नष्ट हो रही हैं, सूखे से जल संकट पैदा हो रहा है और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं।



यूरोप और अमरीका में गर्मी से जंगल की आग, सूखा और फसल नुकसान हो रहा है। आर्कटिक क्षेत्र तक गर्मी पहुंच रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र स्तर बढ़ रहा है, तटीय क्षेत्र खतरे में हैं। स्वास्थ्य प्रभाव गंभीर हैं। हीट स्ट्रोक, श्वसन रोग, पानी से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार, 2022 में यूरोप में 60,000 से ज्यादा मौतें गर्मी से हुईं; अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती हैं।


अन्य देशों में भी यही कहानी है। भारत जैसे देशों में अनियमित बारिश से कृषि प्रभावित हो रही है, ऐसे में गरीब किसान सबसे ज्यादा पीड़ित होता है। अफ्रीका में सूखा भुखमरी बढ़ा रहा है। वैश्विक स्तर पर जलवायु शरणार्थी बढ़ रहे हैं। ऐसे में कई देशों में आर्थिक नुकसान वहाँ के GDP का प्रतिशत बिगाड़ रहे हैं।


पर्यावरण प्रबंधन की विफलता राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, लॉबीइंग (फॉसिल फ्यूल कंपनियां) और अल्पकालिक लाभ की सोच से उपजी है। पेरिस समझौते के बावजूद उत्सर्जन कम नहीं हो रहा। ऐसे में विकसित देशों को पहल करनी चाहिए, लेकिन वे भी लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं।


जानकारों के अनुसार इस संकट का समाधान स्पष्ट हैं। जीवाश्म ईंधन से तेजी से संक्रमण नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) की ओर चला जाए। वनों की रक्षा और पुनर्स्थापना के लिए REDD+ जैसे कार्यक्रमों को मजबूत किया जाए। सतत कृषि, हरित परिवहन, अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए। अनुकूलन: मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, जल संरक्षण, स्वास्थ्य तैयारियां को सुचारू बनाया जाए। धनी देशों से विकासशील देशों को वित्त और तकनीक हस्तांतरण दिया जाए। भारत जैसे देशों को अपनी सांस्कृतिक विरासत (जैसे वृक्ष पूजा, संतुलित जीवन) को आधुनिक नीतियों से जोड़ना चाहिए।

यूरोप की गर्मी सिर्फ एक चेतावनी है। अगर हम खराब पर्यावरण प्रबंधन और लापरवाही जारी रखेंगे, तो भविष्य में 50 डिग्री तापमान, विनाशकारी बाढ़ और अपरिवर्तनीय क्षति सामान्य हो जाएंगी। समय कम है। 1.5 डिग्री लक्ष्य बचाना संभव है, लेकिन इसके लिए तत्काल, सामूहिक और निर्णायक कार्रवाई जरूरी है। ऐसे में सरकारें, उद्योग, नागरिक सभी को जिम्मेदारी लेनी होगी। प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है, अब अनदेखी करने का समय नहीं बचा। सतत विकास ही एकमात्र रास्ता है, वरना आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।