Showing posts with label Social media. Show all posts
Showing posts with label Social media. Show all posts

Monday, August 3, 2026

आंदोलन के नाम पर हद की बेशर्मी !

नीट पेपर लीक पर ‘जेन-ज़ी’ का जंतर मंतर पर हुआ धरना पिछले हफ्तों में पूरी दुनिया के मीडिया में चर्चा में रहा। धरने का उद्देश्य ग़लत नहीं था। इतनी बड़ी परीक्षा का पेपर लीक होना मामूली बात नहीं है। लाखों छात्रों के जीवन और सपनों से खिलवाड़ करने वाले चाहे जो भी हों उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए। आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस की जो दमनकारी लाठियां चलीं उसकी कतई ज़रूरत नहीं थी। दिल्ली के पुलिस आयुक्त लोकतांत्रिक मर्यादा की सीमाओं में रह कर कूट नीति से भी समस्या का समाधान कर सकते थे। कहीं ऐसा तो नहीं है कि क़ानून और व्यवस्था संभालने की अनुभव शून्यता के कारण उन्होंने ऐसा कदम उठाया? कोई पुलिस अधिकारी हो या प्रशासनिक अधिकारी, छात्र जीवन में सभी क्रांतिकारी होते हैं। इसलिए हताश छात्रों पर हिंसक हमला करने से पहले उन्हें दस बार सोचना चाहिए। आख़िर उनके घर में भी तो युवा विद्यार्थी होंगे। 



बावजूद इसके इस आंदोलन को जो कुछ सफलता मिली, उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अब तक इस मुद्दे पर काफ़ी कुछ लिखा और कहा जा चुका है। संसद में भी इस पर तीखी झड़पें हो रही हैं। अब तो सरकार ने पेपर लीक के खिलाफ संशोधन बिल भी पेश कर दिया है। इसलिए आंदोलन के उन पक्षों पर नया कुछ नहीं लिख रहा। पर इस आंदोलन की जिस बात ने मुझे बहुत विचलित किया है, वो है भाषा की अभद्रता। जिसने शालीनता की सारी हदें पार कर लीं। अगर मुझ पर लिंगभेद का आरोप न लगे तो मैं ये खुल कर कहना चाहूँगा कि जिस तरह की गंदी गालियाँ, अश्लील भंगिमाएँ और नारेबाजी आंदोलन में शामिल कुछ लड़कियों ने की वो एक सभ्य समाज में क़तई स्वीकार नहीं की जा सकती। लड़कियों का मैं खासतौर पर इसलिए उल्लेख कर रहा हूँ क्योंकि अब तक भारतीय समाज में लड़कियों को कभी ऐसी अश्लील भाषा का प्रयोग करते नहीं देखा गया था। लड़के तो प्रायः गाली-गलौज की भाषा में बात करते ही हैं। पर सब लड़के ऐसे नहीं होते। ज़्यादातर मर्यादित भाषा का ही प्रयोग करते हैं। चूँकि मैं पिछले 50 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूँ इसलिए अक्सर मेरे मुंह से ‘साला’ गाली निकल जाती है। मेरे बेटे जो अब 40 वर्ष के आस-पास हैं, बचपन से ही मुझे इस पर टोकते आए हैं, आप कैसी भाषा बोलते हैं? इसलिए मैं ये सावधानी बरतता हूँ कि अपने परिवार के सामने, ‘साला’ जैसी गाली का भी प्रयोग न करूँ। 



हमारा परिवार कोई अनूठा नहीं हैं। भारत के करोड़ों परिवारों में भाषा की मर्यादा और व्यवहार में शालीनता का पाठ बचपन से ही पढ़ाया जाता है। यही हमारे सनातन संस्कार हैं। जंतर-मंतर के प्रदर्शन में कुछ छात्रों ने जिस अभद्र भाषा का प्रयोग किया वो सोशल मीडिया के माध्यम से घर-घर और गाँव-गाँव तक पहुँचा। जरा सोचिए कि शालीनता के दायरे में रहने वाले करोड़ों युवक-युवतियों पर इसका क्या असर पड़ा होगा? अभिजात्य वर्ग के या पढ़े-लिखे समाज के युवाओं के इस निकृष्ट व्यवहार को देख कर हो सकता है कि गाँवों में रहने वाले लड़के-लड़कियां भी आधुनिक दिखने की ललक में इस तरह की अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने लगें। दूसरी तरफ़ दिल्ली की झुग्गियों में पला बढ़ा एक निर्धन नौजवान मोहम्मद इरफान इसी आंदोलन में रातों-रात पूरे देश के युवाओं के लिए एक मिसाल बन कर सामने आया है। ग़रीब परिवार में पैदा हुए इरफ़ान के पास औपचारिक शिक्षा की डिग्रियाँ नहीं हैं। पर जिस संयत भाषा में उसने इस आंदोलन के मुद्दों को मीडिया के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया, वो क़ाबिले तारीफ़ है। संविधान से लेकर, देश के राजनैतिक इतिहास, सामाजिक आर्थिक बदहाली और सनातन धर्म की गहराइयों तक जिस ज्ञान का प्रदर्शन उसने किया वो आश्चर्यचकित करने वाला है। इरफान का व्यक्तित्व इस आंदोलन के उन उद्दंड और संस्कारहीन युवाओं के गाल पर सीधा तमाचा है।      



इसी क्रम में यहाँ मैं एक और चिंतनीय प्रवृत्ति की ओर इशारा करना चाहूँगा। पिछले कुछ वर्षों से महानगरों में ‘स्टैंड-अप कॉमेडी’ का एक नया चलन शुरू हुआ है। लोकतंत्र में समाज और सरकार पर कटाक्ष करने के अनेक माध्यम होते हैं। प्राचीन काल से ये कार्य विदूषक करते आए हैं। आज के दौर में वही ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन हैं। तनाव भरे जीवन में हँसना-हँसना सबको राहत देता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो कॉर्पोरेट जगत में कम उम्र में ही बुलंदियों को छूने वाले युवा, आज सबसे ज़्यादा तनाव ग्रस्त हैं। चाहे उनकी आमदनी शेष युवाओं की तुलना में कई गुना ज़्यादा हो, पर कॉर्पोरेट जगत की संस्कृति ही ऐसी है कि ये युवा लगातार मानसिक तनाव में जीते हैं। इसलिए बेंगलुरु, मुंबई, गुरुग्राम जैसे शहरों में अचानक ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन की बाढ़ आ गई है। इनमें अधिकतर कॉमेडियन ऐसे हैं जो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, सामाजिक-राजनैतिक समझ और अपने इर्द-गिर्द की दुनिया पर पैनी नज़र रख कर जो कुछ प्रस्तुत करते हैं वो न सिर्फ़ श्रोताओं को हँसी से लोटपोट कर देता है, बल्कि सरकार और समाज की कमज़ोरियों को सहज ही उजागर कर देता है। 


इन्हीं ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियनों में कुछ पुरुष और महिला ऐसे भी हैं जो अत्यंत निम्न कोटि की भाषा का प्रयोग करके कामुकता और अश्लीलता का ‘फूहड़ मनोरंजन’ प्रस्तुत करते हैं। जिस श्रोता समूह के सामने ये लोग इस तरह की प्रस्तुतियां करते हैं वो पढ़ा-लिखा, संपन्न और कैरियर में सफल व्यक्ति होता है। इसलिए उसमें इतना विवेक होता है कि वो ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडी हॉल के बाहर निकल कर उस माहौल को भूल जाता है और अपने कार्य-क्षेत्र, समाज और परिवार में अनुशासित जीवन जीता है। पर सोशल मीडिया के माध्यम से जब ऐसे ‘शो’ घर-घर पहुँच जाते हैं तो उन युवाओं के दिमाग पर ग़लत असर डालते हैं जो अपने परिवार की कमज़ोर आर्थिक स्थिति में रहकर अपने कैरियर को बनाने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। ऐसी भाषा प्रयोग करने वाले ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन को सरकार कानून की मदद से अनुशासित या दंडित करे तो यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला माना जाएगा। पर अभिव्यक्त की आज़ादी का अधिकार हमें समाज में गंदगी फैलाने की छूट नहीं देता। इसके लिए आत्मसंयम बहुत ज़रूरी है। फिर वो चाहे कॉमेडियन हों या किसी राजनैतिक दल के कार्यकर्ता।  

Monday, July 27, 2026

सरकार की व्यवस्था कैसे सुधरे?

पिछले कुछ सालों से मीडिया दो खेमों में बटा हुआ है। एक तरफ़ है निजी टीवी चैनल और दूसरी तरफ़ है सोशल मीडिया। निजी टीवी चैनलों के मालिकों को सरकार विज्ञापन के नाम पर बहुत मोटी रकम देती है। इसलिए इन चैनलों के उन एंकरों को भी बहुत मोटी रकम मिलती है जो रात-दिन सरकार का इकतरफ़ा गुणगान करते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछली सरकारों में जब निजी चैनल और सोशल मीडिया दोनों ही नदारद थे तब भी ये बँटवारा इस तरह था कि सरकारी नियंत्रण वाला दूरदर्शन और सरकार से विज्ञापनों के नाम पर मोटा पैसा लेने वाले अख़बार, तत्कालीन सरकार का भौपूँ हुआ करते थे। जबकि दूसरे अख़बार विपक्षी दलों से समर्थन लेकर सरकार की आलोचना किया करते थे। हालांकि उस दौर में ये फ़र्क़ इतना प्रखर नहीं था कि आम आदमी उसकी गहराई समझ सके। पर आज जो देश में हो रहा है उसमें दोनों ही पक्ष इकतरफ़ा अभियान चलाते हैं। जिससे हकीकत पता नहीं चल पाती। उदाहरण के तौर पर, सोशल मीडिया में आए दिन वीडियो आते हैं कि भाजपा सरकारों के बनाए पुल ताश के पत्तों की तरह ढहते रहते हैं और भाजपा सरकारों के बनाए राजमार्गों पर जगह-जगह भारी गड्डे हो गए हैं। ऐसा ही एक वीडियो समाचार आया कि नवनिर्मित दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, बनते ही जगह-जगह टूट गया है। पिछले हफ़्ते जब मैं इस राजमार्ग पर पहली बार गया तो लगातार कार की खिड़की से बाहर देख रहा था कि वो गड्डे कहाँ हैं? पर मुझे ऐसा कोई गड्ढा नज़र नहीं आया। बल्कि ये राजमार्ग इतना बढ़िया बना है कि हम मात्र डेढ़ घंटे में दिल्ली से मुज़फ़्फ़रनगर पहुँच गए। 



सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार होना कोई नई बात नहीं है। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोग़ा’ 150 साल पहले भारत में चल रहे भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है। 2500 साल पहले राजनीति के महारथी चाणक्य पंडित ने कहा था, ‘शहद के गोदाम की रखवाली करने वाले के होठों पर शहद लगा मिलेगा’। आज़ादी के बाद से केंद्र और राज्यों की सभी सरकारों ने देश के संसाधनों को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्या वजह है कि नेता किसी भी दल का क्यों न हो, अगर वो पार्षद से लेकर मंत्री तक कभी भी किसी भी पद पर रहा होगा तो उसकी आर्थिक हैसियत उस दौर में कई गुना बढ़ी होगी। ये कोई छिपी बात नहीं है। अपवाद तो हमेशा और हर जगह होते हैं। पर आम धारणा तो यही है कि राजनीति कोयले की दलाली की तरह एक ऐसा पेशा है जिसमें हाथ काले होते ही हैं। इसलिए मौजूदा दौर में संघ और भाजपा पर जो तीव्र हमला हो रहा है वो क्या उन राजनेताओं द्वारा किया जा रहा है जिनका अपना दामन पाक साफ़ है? अगर नहीं तो फिर ग़ुलाम अली की ग़ज़ल की वो लाइन दोहराना अनुचित न होगा, हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है….



प्रधान मंत्री मोदी ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से लेकर, ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना’, ‘प्रधान मंत्री आवास योजना’, ‘आयुष्मान भारत’, ‘जल जीवन मिशन’, ‘स्किल इंडिया मिशन’, ‘नमामि गंगे’, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’, ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘अटल पेंशन योजना’, ‘प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना’, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’, ‘उजाला योजना’, ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’, ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ जैसी तमाम योजनाएं और अभियान चलाए। विपक्ष कहता है कि ये सब फ्लॉप हो गए, कहीं कुछ नहीं हुआ। जबकि इसका दूसरा पक्ष भी सामने आता है। हमारे घर और दफ्तर के स्टाफ़ में जो कर्मचारी हैं वे मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से हैं। उनका कहना है कि उन्हें घर बनाने के लिए सरकार से ख़ासा अनुदान मिला, आज़ादी के बाद उनके गाँव में पहली बार सड़क आई और पेयजल का संकट भी दूर हुआ। ये वो साधारण लोग हैं जिन्हें अकारण झूठ बोलने की कोई आवश्यकता नहीं। उन्हें लाभ मिला है इसलिए वे उसे बताने में संकोच नहीं करते। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि हर अभियान पूरी तरह से असफल हुआ है। कहीं सफलता और कहीं विफलता का होना असामान्य बात नहीं है।   



मुझे लगता है कि चाहे कोई भी दल सत्ता में हो जब तक उसका शासन और प्रशासन आम जनता के प्रति जवाबदेह न हो तब तक वो कितना भी ढोल पीटता रहे, जनता उसके दावों पर विश्वास नहीं करती। आम जनता को बड़े स्तर के बड़े घोटालों से इतना सरोकार नहीं होता जितना उनकी रोज़ की ज़िंदगी में पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार से होता है। इस स्तर का भ्रष्टाचार, हुक्मरानों का अहंकार और आम मतदाता की उपेक्षा का ख़ामियाज़ा सीधा मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री को भुगतना पड़ता है। ज़रूरत इस बात की है कि कोई ऐसी व्यवस्था बने जिसके अंतर्गत आम जनता की छोटी सी छोटी शिकायत पर तुरंत कारवाही हो और उसे राहत मिले। इस दिशा में तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय ने जो पहल की हैं उसका बहुत अच्छा संदेश आम जनता के बीच गया है। आगे चल कर वो कितने सफल होंगे ये तो समय ही बताएगा। पर तमिलनाडु तो एक राज्य है, आवश्यकता हर राज्य में ऐसे ही सुधार की है। डबल इंजन का दावा करने वाली प्रांतीय सरकारों में यह काम केंद्र सरकार की पहल पर अविलंब शुरू होना चाहिए। साथ ही महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां यदि भ्रष्टाचार में बदनाम हुए अफसरों और राजनेताओं की होती है तो उससे सरकार की छवि बहुत ख़राब होती है। भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के उसके दावे खोखले साबित होते हैं।  

एक बात और; इस देश में ईमानदार अफसरों और प्रतिष्ठित सामाजिक लोगों की संख्या इतनी कम नहीं है कि वे शासन और प्रशासन को जवाबदेह बनने के लिए मजबूर न कर सकें। आज के AI युग में किसी भी व्यक्ति के जीवन के विषय में पता लगाना कठिन कार्य नहीं है। आधुनिक तकीनिकी का इस्तेमाल करके देश के हर ज़िले में ऐसे लोगों की सूची बनाई जानी चाहिए और उन्हें कुछ अधिकार देकर स्थानीय शासन और प्रशासन पर निगरानी रखने के काम सौंपना चाहिए। अगर ऐसा हो सका तो ये जनता और सरकार के बीच की खाई को पाटने का एक महत्वपूर्ण कदम होगा।  

Monday, April 28, 2025

डिजिटल युग में बच्चे गुस्सैल और आक्रामक क्यों?

आज के डिजिटल युग में, बच्चों का व्यवहार और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। माता-पिता और शिक्षक अक्सर यह शिकायत करते हैं कि बच्चे पहले की तुलना में अधिक गुस्सैल, चिड़चिड़े और आक्रामक हो गए हैं। इसका एक प्रमुख कारण बच्चों का कम उम्र में मोबाइल फोन और इंटरनेट का अत्यधिक उपयोग है। प्रारंभिक स्क्रीन टाइम और डिजिटल दुनिया बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है, जिसके परिणामस्वरूप उनमें गुस्सा और आक्रामकता बढ़ रही है। 


आज के बच्चे ‘डिजिटल नेटिव्स’ हैं, यानी वे उस दुनिया में पैदा हुए हैं जहां स्मार्टफोन, टैबलेट और इंटरनेट रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। पहले जहां बच्चे खेल के मैदान में दोस्तों के साथ समय बिताते थे, वहीं अब वे मोबाइल स्क्रीन पर गेम खेलने, वीडियो देखने और सोशल मीडिया पर समय बिताने में व्यस्त रहते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 6-12 वर्ष की आयु के बच्चे औसतन प्रतिदिन 2-4 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं। ये आंकड़ा किशोरों में और भी अधिक है। 


हालांकि तकनीक ने शिक्षा और मनोरंजन के नए द्वार खोले हैं, लेकिन इसका अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग बच्चों के मस्तिष्क के विकास, भावनात्मक नियंत्रण और सामाजिक कौशलों को प्रभावित करता है।


गुस्सा और आक्रामकता के कारण बच्चों का मस्तिष्क विकास के महत्वपूर्ण चरण में होता है और इस दौरान स्क्रीन टाइम का अत्यधिक उपयोग उनके मस्तिष्क के ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ को प्रभावित करता है, जो भावनाओं को नियंत्रित करने और निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया में तेजी से बदलते दृश्य और तत्काल पुरस्कार (जैसे गेम में जीत या लाइक्स का मिलना) बच्चों के मस्तिष्क में ‘डोपामाइन’ का स्तर बढ़ाते हैं। इससे वे तुरंत संतुष्टि की उम्मीद करने लगते हैं और जब वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता, तो वे निराश, चिड़चिड़े और गुस्सैल हो जाते हैं। 



इंटरनेट पर उपलब्ध कई गेम्स और वीडियो में हिंसा, आक्रामकता और अनुचित व्यवहार को दर्शाया जाता है। बच्चे, जिनका दिमाग अभी परिपक्व नहीं हुआ है, इन सामग्रियों को देखकर हिंसक व्यवहार को सामान्य मानने लगते हैं। उदाहरण के लिए कई लोकप्रिय मोबाइल गेम्स में युद्ध, लड़ाई और विनाश को बढ़ावा दिया जाता है, जो बच्चों में आक्रामक प्रवृत्तियों को बढ़ा सकता है। 


मोबाइल और इंटरनेट के अत्यधिक उपयोग से बच्चे वास्तविक दुनिया में अपने दोस्तों और परिवार से कट जाते हैं। वे सोशल मीडिया पर तो सक्रिय रहते हैं, लेकिन वास्तविक सामाजिक संपर्क की कमी उन्हें अकेला और उदास बनाती है। यह अकेलापन और भावनात्मक खालीपन अक्सर गुस्से और आक्रामकता के रूप में व्यक्त होता है।



देर रात तक मोबाइल फोन का उपयोग, विशेष रूप से नीली रोशनी का संपर्क, बच्चों की नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। अपर्याप्त नींद बच्चों में चिड़चिड़ापन, तनाव और गुस्से को बढ़ाती है। एक शोध के अनुसार, जो बच्चे रात में अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं, उनमें भावनात्मक अस्थिरता और आक्रामक व्यवहार की संभावना अधिक होती है।



सोशल मीडिया बच्चों में प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ाता है। वे दूसरों की ‘परफेक्ट’ जिंदगी, लुक्स या उपलब्धियों को देखकर खुद को कमतर महसूस करते हैं। यह आत्मसम्मान में कमी और असंतोष का कारण बनता है, जो गुस्से और आक्रामकता के रूप में सामने आता है।


प्रारंभिक उम्र में मोबाइल और इंटरनेट का अत्यधिक उपयोग केवल गुस्सा और आक्रामकता तक सीमित नहीं है। इसके दीर्घकालिक प्रभाव भी चिंताजनक हैं। बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो रही है, उनकी रचनात्मकता प्रभावित हो रही है और वे भावनात्मक रूप से कमजोर हो रहे हैं। इसके अलावा, लगातार स्क्रीन टाइम के कारण शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है, जैसे कि मोटापा, आंखों की समस्याएं और खराब मुद्रा।


इस समस्या से निपटने के लिए माता-पिता, शिक्षकों और समाज को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है। निम्नलिखित कुछ सुझाव हैं जो बच्चों में गुस्सा और आक्रामकता को कम करने में मदद कर सकते हैं। माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2-5 वर्ष की आयु के बच्चों को प्रतिदिन 1 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम नहीं देना चाहिए। बड़े बच्चों के लिए भी उम्र के अनुसार समय सीमा निर्धारित करें। बच्चों को खेल, कला, संगीत और पढ़ने जैसी गतिविधियों में शामिल करें। ये न केवल उनकी रचनात्मकता को बढ़ाते हैं, बल्कि उन्हें भावनात्मक रूप से स्थिर भी बनाते हैं। 


माता-पिता को बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना चाहिए। साथ में भोजन करना, कहानियां सुनाना या बाहर घूमने जाना बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। बच्चों को ऐसी सामग्री देखने के लिए प्रोत्साहित करें जो शिक्षाप्रद और सकारात्मक हो। माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे हिंसक गेम्स या वीडियो से दूर रहें। बच्चों को इंटरनेट के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करें। उन्हें सोशल मीडिया के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों के बारे में बताएं। यदि बच्चा लगातार गुस्सा या आक्रामक व्यवहार दिखा रहा है, तो मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की मदद लें। प्रारंभिक हस्तक्षेप से समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है।


बच्चों के लिए ही नहीं हम सबके लिए भी ये चेतावनी है कि लगातार डिजिटल उपकरणों का उपयोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है। इसके लिए ‘डिजिटल डिटॉक्स’ करने के जरूरत होती है। जो  तनाव कम करने, नींद सुधारने और वास्तविक रिश्तों को मजबूत करने में मदद करता है। यह एकाग्रता बढ़ाता है और बच्चों को स्क्रीन से दूर प्रकृति व खेलों से जोड़ता है। समय-समय पर ‘डिजिटल डिटॉक्स’ अपनाकर हम और हमारे बच्चे संतुलित और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग आधुनिक जीवन का एक अभिन्न अंग है, लेकिन इसका बच्चों पर होने वाला प्रभाव गंभीर है। यह माता-पिता और समाज की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को डिजिटल दुनिया के नकारात्मक प्रभावों से बचाएं और उनके समग्र विकास को प्रोत्साहित करें। संतुलित जीवनशैली, सकारात्मक वातावरण और प्रेमपूर्ण देखभाल के साथ, हम बच्चों को न केवल गुस्से और आक्रामकता से मुक्त कर सकते हैं, बल्कि उन्हें एक स्वस्थ और खुशहाल भविष्य भी दे सकते हैं। 

Tuesday, July 2, 2024

धर्मगुरुओं के बीच यूट्यूब संग्राम


जब से सोशल मीडिया का प्रभाव तेज़ी से व्यापक हुआ है तब से समाज का हर वर्ग, यहाँ तक कि ग्रहणियाँ भी 24 घंटे सोशल मीडिया पर हर समय छाए रहते हैं। इसके दुष्परिणामों पर काफ़ी ज्ञान उपलब्ध है। सलाह दी जाती है कि यदि आपको अपने परिवार या मित्रों से संबंध बनाए रखना है, अपना बौद्धिक विकास करना है और स्वस्थ और शांत जीवन जीना है तो आप सोशल मीडिया से दूर रहें या इसका प्रयोग सीमित मात्रा में करें। पर विडंबना देखिए कि समाज को संयत और सुखी जीवन जीने का और माया मोह से दूर रहने का दिन रात उपदेश देने वाले संत और भागवताचार्य आजकल स्वयं ही सोशल मीडिया के जंजाल में कूद पड़े हैं। विशेषकर ब्रज में ये प्रवृत्ति तेज़ी से फैलती जा रही है। 


अभी पिछले ही दिनों वृंदावन के विरक्त संत प्रेमानंद महाराज और प्रदीप मिश्रा के बीच सोशल मीडिया पर श्री राधा तत्व को लेकर भयंकर विवाद चला। ऐसे ही पिछले दिनों वृंदावन में नये स्थापित हुए भगवताचार्य अनिरुद्धाचार्य के भी वक्तव्य विवादों में रहे। 



इसी बीच बरसाना के विरक्त संत श्री रमेश बाबा द्वारा लीला के मंचन में राधा स्वरूप धारण कर बालाकृष्ण से पैर दबवाने पर विवाद हुआ। ये सब ब्रज की विभूतियाँ हैं। हर एक के चाहने वाले भक्त लाखों करोड़ों की संख्या में हैं। जैसे ही कोई विवाद पैदा होता है इनका चेला समुदाय भी सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय हो जाता है। ठीक वैसे ही राजनैतिक दलों की ट्रोल आर्मी, जो बात का बतंगड़ बनाने में मशहूर है, सक्रिय हो जाती है। ये सब सोशल मीडिया में अपनी पहचान बनाने का एक तरीक़ा बन गया है। अब प्रेमानंद जी वाले विवाद को ही लीजिए, कितने  ही कम मशहूर भागवताचार्य भी इस विवाद में कूद पड़े। जिनके फ़ॉलोवर्स चार-पाँच सौ ही थे पर जैसे ही वे इस विवाद में कूदे तो उनकी संख्या 20 हज़ार पार कर गई। यानी बयानबाज़ी भी फ़ायदे का सौदा है। 


परंपरा से शास्त्र ज्ञान का आदान-प्रदान गुरुओं द्वारा निर्जन स्थलों पर किया जाता था। जहां जिज्ञासु अपने प्रश्न लेकर जाता था और गुरु की सेवा कर ज्ञान प्राप्त करता था। यही पद्धति भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को बताई थी। भगवद् गीता के चौथे अध्याय का चौंतीसवाँ श्लोक इसी बात को स्पष्ट करता है। तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।



परंतु सोशल मीडिया ने आकर ऐसी सारी सीमाओं को तोड़ दिया है। अब धर्म गुरु चाहें न चाहें पर उनके शिष्य, उनके प्रवचनों का सोशल मीडिया पर प्रसारण करने को बेताब रहते हैं और फिर अलग-अलग गुरुओं के शिष्य समूहों में आपसी प्रतिद्वंदता चलती है कि किस गुरु के कितने चेले या श्रोता हैं। जिस संत के फ़ॉलोवर्स की संख्या लाखों में होती है उन पर टिप्पणी करना या उन्हें विवाद में घसीटना लाभ का सौदा माना जाता है। क्योंकि वैसे तो ऐसा विवाद खड़ा करने वालों की कोई फॉलोइंग होती नहीं है। पर इस तरह उन्हें बहुत बड़ी तादाद में फॉलोवर और लोक प्रियता मिल जाती है। मतलब ये कि आप में योग्यता है कि नहीं, पात्रता है कि नहीं, आपको उस विषय का ज्ञान है कि नहीं, इसका कोई संकोच नहीं किया जाता। केवल सस्ती लोकप्रियता पाने के लालच में बड़े बड़े संतों के साथ नाहक विवाद खड़ा किया जाता है। आजकल ऐसे विवादों की भरमार हो गई है। 


वैसे तो तकनीकी के हमले को कोई चाह कर भी नहीं रोक सकता। पर कभी-कभी इंसान को लगता है कि उसने भयंकर भूल कर दी। 2003 की बात है जब मैंने बरसाना (मथुरा) के विरक्त संत श्री रमेश बाबा के प्रवचन नियमित रूप से हर सप्ताह बरसाना जा कर सुनना शुरू किया, बाबा की भक्ति और सरलता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। और मुझे लगा कि बाबा के प्रवचन पूरी दुनिया के कृष्ण भक्तों तक पहुँचने चाहिए। तब ऐसा होना केवल टीवी चैनल के माध्यम से ही संभव था। क्योंकि तब तक सोशल मीडिया इतना लोकप्रिय नहीं हुआ था। मैंने इसके लिए प्रयास करके श्री मान मंदिर में टीवी रिकॉर्डिंग स्टूडियो की स्थापना कर दी। उस दौर में मान मंदिर के विरक्त साधुओं ने मेरा कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि बाबा की बात अगर इस तरह प्रसारित की जाएगी तो बरसाना में कलियुग का प्रवेश कोई रोक नहीं पाएगा। पर बाबा ने मुझे अनुमति दी तो काम शुरू हो गया। इसका लाभ मान मंदिर को यह हुआ कि उसके भक्तों की संख्या में देश विदेशों में तेज़ी से बढ़ौतरी हुई और वहाँ धन की वर्षा होने लगी। तब मुझे विरोध करने वाले अव्यवहारिक प्रतीत होते थे। पर आज जब मैं पलट कर देखता हूँ तो मुझे लगता है कि वाक़ई इस प्रयोग में मान मंदिर के पवित्र, शांत और निर्मल वातावरण को बहुत सारे झमेलों में फँसा दिया। अगर वहाँ टीवी का प्रवेश न हुआ होता तो वहाँ का अनुभव पारलौकिक होता था। जिसे अनुभव करने मेरे साथ नीतीश कुमार, अर्जुन सिंह, सुषमा स्वराज, लालू यादव, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तक उस दौर में वहाँ गए और गदगद हो कर लौटे। 


हमने बात शुरू की थी सोशल मीडिया पर बाबाओं के संग्राम से और बात पहुँच गई अध्यात्म की एकांतिक अनुभूति से शुरू होकर उसके व्यवसायी करण तक। इस आधुनिक तकनीकी ने जहां श्री राधा-कृष्ण की भक्ति का और ब्रज की संस्कृति का दुनिया के कोने कोने में प्रचार किया वहीं इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज वृंदावन, गोकुल, गोवर्धन, बरसाना व मथुरा आदि अपना सदियों से संचित आध्यात्मिक वैभव व नैसर्गिक सौंदर्य तेज़ी से समेटते जा रहे हैं। हर ओर बाज़ार की शक्तियों ने हमला बोल दिया है। कहते हैं कि विज्ञान अगर हमारा सेवक बना रहे तो उससे बहुत लाभ होता है। पर अगर वो हमारा स्वामी बन जाए तो उसके घातक परिणाम होते हैं। एक ब्रजवासी होने के नाते और संतों के प्रति श्रद्धा होने के नाते मेरा देश भर के संतों से विनम्र निवेदन है कि वे सोशल मीडिया के संग्राम से बचें और अपने अनुयायियों को होड़ में आगे आकर अपना बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार करने से रोकें। जिससे वे अपना ध्यान भजन साधन के अलावा तीर्थ स्थलों के सौंदर्यकरण और रख-रखाव में लगा सकें। ताकि तीर्थ यात्रियों को ब्रज जैसे तीर्थों में जाने पर सांस्कृतिक आघात न लगे।जो आज उन्हें लगने लगा है।        

Monday, January 8, 2024

रियुमोटाइड आर्थराइटिस: इलाज संभव है?

सोशल मीडिया के दुरुपयोग के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। पिछले तीन वर्षों से फ़ेसबुक पर एक विज्ञापन चल रहा है जिसमें दावा किया जाता है कि, चर्चित पत्रकार विनीत नारायण के घुटनों के दर्द का सफल इलाज। विज्ञापन देने वाले ने मेरे घुटनों के दर्द की कहानी बता कर अपनी दवा और इलाज का प्रमोशन किया है। मैं कितना चर्चित हूँ या गुमनाम हूँ यह विषय नहीं है। पर इस हिन्दी विज्ञापन के कारण आए दिन हिन्दी भाषी राज्यों के मेरे परिचितों के फ़ोन मुझे आते रहते हैं जो यह जानना चाहते हैं कि क्या वाक़ई इस इलाज से मेरे घुटने ठीक हो गये? मेरा जवाब सुन कर उन्हें धक्का लगता है क्योंकि वे इस विज्ञापन पर यक़ीन कर बैठे थे और कुछ ने तो इलाज भी शुरू कर दिया था। मेरा उनको जवाब होता है कि मैं ख़ुद हैरान हूँ इस विज्ञापन से। क्योंकि मैंने ऐसी किसी व्यक्ति से अपना इलाज कभी नहीं कराया। ये नितांत झूठा विज्ञापन है। अगर मुझे उस व्यक्ति का पता मिल जाए तो मैं उसके विरुद्ध क़ानूनी करवाई अवश्य करूँगा। 


ये सही है कि पिछले तीन वर्षों से मुझे घुटनों में दर्द की शिकायत है। जो कभी बढ़ जाता है तो कभी ग़ायब हो जाता है। ऐसा दर्द शरीर के अन्य जोड़ो में भी कभी-कभी होता रहता है। यह दर्द घुटनों के कार्टिलेज के घिसने वाला दर्द नहीं है, जो प्रायः हमारी उम्र के लोगों को हो जाता है। इस बीमारी का नाम है ‘रियुमोटाइड आर्थराइटिस’ जिसे आयुर्वेद में आमवात रोग कहते हैं। यह एक क़िस्म का गठिया रोग है। ये क्यों, किसे और कब होता है इसका कोई स्पष्ट कारण पता नहीं हैं। पर चिंता की बात यह है कि ये काफ़ी लोगों को होने लगा है। यहाँ तक कि किशोरों में भी अब यह रोग काफ़ी पाया जाने लगा है। इसमें अक्सर जोड़ो में सूजन आ जाती है। जो दो दिन से लेकर दस दिन तक चलती है और भयंकर पीड़ा देती है। रात में यह दर्द और बढ़ जाता है। कभी-कभी सारी रात जाग कर काटनी पड़ती है। 


मरता क्या न करता। इस रोग के शिकार दर-दर भटकते हैं। अगर आप यूट्यूब पर जाएँ तो रियुमोटाइड आर्थराइटिस का इलाज बताने वाले दर्जनों शो मिल जाएँगे, जो प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपैथी, आयुर्वेद और एलोपैथी में इसका अचूक इलाज होने का दावा करते हैं। 



ये लेख मैं अपनी राम कहानी बताने के लिए नहीं लिख रहा बल्कि अपना अनुभव साझा करने के लिए लिख रहा हूँ जिससे, जिन्हें ये रोग है उन्हें कुछ दिशा मिल सके। पारंपरिक रूप से मेरा एलोपैथी में विश्वास नहीं रहा है। हालाँकि हर बीमारी के एलोपैथी के उत्तर भारत के मशहूर डॉक्टरों से मेरे व्यक्तिगत संपर्क रहे हैं, फिर भी मैं उनसे इलाज कराने से बचता रहा हूँ। 


इसलिए तीन वर्ष पहले जब मुझे पहली बार इस रोग ने हमला किया तो मैं भाग कर वृंदावन के मशहूर होमियोपैथिक डॉक्टर प्रमोद कुमार सिंह को दिखाने हवाई जहाज़ से पूना गया। क्योंकि उन दिनों वे निजी कारणों से पूना में थे। उन्होंने एक घंटे मुझ से सवाल-जवाब किए और एक पुड़िया होम्योपैथी की मीठी गोलियों की दी। जिसको खाने के चौबीस घंटों में मेरी सारी सूजन और दर्द चला गया। मैंने बड़ी श्रद्धा और विश्वास से छह महीने उनसे इलाज करवाया। हाँ उनके बताए दो काम मैं नहीं कर सका। एक तो नियमित प्राणायाम करना और दूसरा एक घंटे रोज़ धूप में बैठना। 



इन छह महीनों में स्थिति काफ़ी नियंत्रण में रही। लेकिन फिर भी कभी-कभी जोड़ों की सूजन बढ़ जाती थी। तो मैंने आयुर्वेद का इलाज कराने का निश्चय किया। हालाँकि डॉ प्रमोद कुमार सिंह पर मेरा विश्वास आज भी क़ायम है और वो पिछले हफ़्ते ही मुझसे कह रहे थे कि अगर मैं एक डेढ़ साल लग कर उनका इलाज कर लूँ तो वे मुझे पूरी तरह से ठीक कर देंगे। 


आयुर्वेद का इलाज कराने मैं जयपुर जा पहुँचा। वहाँ आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य रहे डॉ महेश शर्मा ने मेरा इलाज शुरू किया। छह महीने तक मैंने उनकी सभी दवाएँ नियम से लीं। साथ ही उनके बताए परहेज़ भी काफ़ी निष्ठा से किए। जिसका मतलब था कि खाने में गेहूं, चावल, मैदा, चीनी और दूध के पदार्थों का निषेध और दालों में केवल मूँग और मसूर की दाल। ग़ज़ब का फ़ायदा हुआ। मैं इतना ठीक हो गया कि चाट-पकौड़ी और दही बड़े तक खाने लगा। जब डॉक्टर साहब को उनकी प्रशंसा में यह बताया तो उनका कहना था कि, आम वात रोग राख में दबी चिंगारी की तरह होता है, आप ज़रा सी लापरवाही करेंगे तो फिर बढ़ जाएगा। छह महीने बाद उन्होंने मुझे दवा देना बंद कर दिया यह कह कर कि मेरी तरफ़ से इलाज पूरा हुआ। उसके बाद मैं काफ़ी समय तक ठीक रहा। परंतु शाकाहारी होते हुए कई बार ख़ान-पान का अनुशासन तोड़ देता था। परिणाम वही हुआ जो उन्होंने कहा था। बीमारी फिर बढ़ गई। 



मेरे परिवेश में जितने भी लोग हैं वे मेरी मान्यताओं से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते। उनका कहना है कि आज के युग में जब हवा-पानी, ख़ान-पान सब अशुद्ध हैं और खाद्य पदार्थों पर कीटनाशक दवाओं और रासायनिक उर्वरकों का भारी दुष्प्रभाव है तो होम्योपैथी, आयुर्वेद या प्राकृतिक चिकित्सा के कड़े नियमों का पालन करना लगभग असंभव है। इन पद्धतियाँ में कोई कमी नहीं है। किंतु हमारी परिस्थिति, दिनचर्या और ख़ान-पान हमें इनके नियमों का पालन नहीं करने देते। इसलिए इनका पूरा व सही लाभ नहीं मिल पाता। इन सब मित्रों और परिवारजनों का आग्रह था कि मैं एलोपैथी डॉक्टर से इलाज करवाऊँ, तो मैंने दिल्ली के ‘इंडियन स्पाइनल इंजरिज़ अस्पताल’ के मशहूर डॉक्टर संजीव कपूर को दिखाया। जिन्हें मैं दो बरस पहले दिखा चुका था, पर इलाज नहीं किया था। ये उन्हें याद था। वे बोले, आप देश के प्रबुद्ध व्यक्ति हैं। आपके विचारों और लेखों का आमजन पर प्रभाव पड़ता है। फिर आप हमारी पद्धति पर शक क्यों करते हैं? हमारे पास दुनिया का सर्वश्रेष्ठ इलाज है और रियुमोटाइड आर्थराइटिस की हर अवस्था का हम इलाज कर सकते हैं। आप आश्वस्त रहिए हम आपका कष्ट दूर कर देंगे। अब मैंने उनका इलाज शुरू कर दिया है। उम्मीद है उनका दावा सही निकलेगा और मैं शेष जीवन इस कष्ट के बिना जी पाऊँगा जो मेरी भाग-दौड़ की सामाजिक ज़िंदगी के लिए बहुत ज़रूरी है।   

Monday, January 1, 2024

ऑनलाइन शादी के ख़तरे


जब से सोशल मीडिया का नेटवर्क पूरी दुनिया में बढ़ा है तब से इसका प्रयोग करने वालों की संख्या भी करोड़ों में पहुँच गई है। इसका एक लाभ तो यह है कि दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति दूसरे छोर पर बैठे व्यक्ति से 24 घंटे संपर्क में रह सकता है। फिर वो चाहे आपसी चित्रों का आदान-प्रदान हो, टेलीफोन वार्ता हो या कई लोगों की मिलकर ऑनलाइन मीटिंग हो। इसका एक लाभ उन लोगों को भी हुआ है जो जीवन साथी की तलाश में रहते हैं। फिर वो चाहे पुरुष हों या महिलाएँ। हम सबकी जानकारी में ऐसे बहुत से लोग होंगे जिन्होंने इस माध्यम का लाभ उठा कर अपना जीवन साथी चुना है और सुखी वैवाहिक जीवन बिता रहे हैं। पर हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। अगर एक पहलू यह है तो दूसरा पहलू ये भी है जहां सोशल मीडिया का दुरुपयोग करके बहुत सारे लोगों को धोखा मिला है और आर्थिक व मानसिक यातना भी झेलनी पड़ी है। 



भारत में किसी अविवाहित महिला का जीवन जीना आसान नहीं होता। उस पर समाज और परिवार का भारी दबाव रहता है कि वो समय रहते शादी करे। चूँकि आजकल शहरों की लड़कियाँ काफ़ी पढ़-लिख रही हैं और अच्छी आमदनी वाली नौकरियाँ भी कर रही हैं इसलिए प्रायः ऐसी महिलाएँ केवल माता-पिता के सुझाव को मान कर पुराने ढर्रे पर शादी नहीं करना चाहती। वे अपने कार्य क्षेत्र में या फिर सोशल मीडिया पर अपनी पसंद का जीवन साथी ढूँढती रहती हैं। इसके साथ ही ऐसी महिलाओं की संख्या कम नहीं है जो कम उम्र में तलाकशुदा हो गईं या विधवा हो गईं। इन महिलाओं के पास भी अपने गुज़ारे के लिए आर्थिक सुरक्षा तो ज़रूर होती है परन्तु भावनात्मक असुरक्षा के कारण इन्हें भी फिर से जीवन साथी की तलाश रहती है। इन दोनों ही क़िस्म की महिलाओं को दुनिया भर में बैठे ठग अक्सर मूर्ख बना कर मोटी रक़म ऐंठ लेते हैं। बिना शादी किए ही इनकी ज़िंदगी बर्बाद कर देते हैं। ऐसी ही कुछ सत्य घटनाओं पर आधारित बीबीसी की एक वेब सीरीज ‘वेडिंग.कॉन’ इसी हफ़्ते ओटीटी प्लेटफार्म आमेजन प्राइम पर जारी हुई है। यह सीरीज इतनी प्रभावशाली है कि इसे हर उस महिला को देखना चाहिए जो सोशल मीडिया पर जीवन साथी की तलाश में जुटी हैं। बॉलीवुड की मशहूर निर्माता-निर्देशक तनुजा चंद्रा ने बड़े अनुभवी और योग्य फ़िल्मकारों की मदद से इसे बनाया है। 



इस सिरीज़ में जिन महिलाओं के साथ हुए हादसे दिखाए गए हैं उनमें से एक विधवा महिला तो अपनी मेहनत की कमाई का लगभग डेढ़ करोड़ रुपया उस व्यक्ति पर लुटा बैठी जिसे उसने कभी देखा तक न था। इसी तरह एक दूसरी महिला ने पचास लाख रुपये गवाए तो तीसरी महिला ने बाईस लाख रुपये। चिंता की बात यह है कि ये सभी महिलाएँ खूब पढ़ी-लिखी, संपन्न परिवारों से और प्रोफेशनल नौकरियों में जमी हुई थीं। शादी की चाहत में सोशल मीडिया पर ये ऐसे लोगों के जाल में फँस गईं जिन्होंने अपनी असलियत छिपा कर शादी की वेब साइटों पर नक़ली प्रोफाइल बना रखे थे। ये ठग इस हुनर में इतने माहिर थे कि उनकी भाषा और बातचीत से इन महिलाओं को रत्ती भर भी शक नहीं हुआ। वे बिना मिले ही उनके जाल में फँसती गईं और उनकी भावुक कहानियाँ सुन कर अपने खून-पसीने की कमाई उनके खातों में ट्रांसफ़र करती चली गई। इन महिलाओं को कभी यह लगा ही नहीं कि सामने वाला व्यक्ति कोई बहरूपिया या ठग है और वो बनावटी प्यार जता कर इन्हें अपने जाल में फँसा रहा है। इनमें से दो व्यक्ति तो ऐसे निकले जो तीस से लेकर पचास महिलाओं को धोखा दे चुके थे। तब कहीं जा कर पुलिस उन्हें पकड़ पाई। 


आश्चर्य की बात यह है कि सभ्रांत परिवार की यह पढ़ी-लिखी महिलाएँ इस तरह ठगों के झाँसे में आ गईं कि पूरी तरह लुट जाने के पहले उन्होंने कभी अपने माता-पिता तक से इस विषय में सलाह नहीं ली और न ही उन्हें अपने आर्थिक लेन-देन के बारे में कभी कुछ बताया।


जब इन्हें यह अहसास हुआ कि वे किसी आधुनिक ठग के जाल में फँस चुकी हैं तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। इस अप्रत्याशित परिस्थिति ने उन्हें ऐसा सदमा दिया कि कुछ तो अपने होशोहवास ही गँवा बैठी। उनके माता-पिता को जो आघात लगा वो तो बयान ही नहीं किया जा सकता। फिर भी इनमें से कुछ महिलाओं ने हिम्मत जुटाई और पुलिस में शिकायत लिखवाने का साहस दिखाया। फिर भी ये ज़्यादातर ठगों को पकड़वा नहीं सकीं। साइबर क्राइम से जुड़े पुलिस के बड़े अधिकारी और साइबर क्राइम के विशेषज्ञ वकील ये कहते हैं कि मौजूदा क़ानून और संसाधन ऐसे ठगों से निपटने के लिए नाकाफ़ी हैं। इनमें से भी जो ठग विदेशों में रहते हैं उन तक पहुँचना तो नामुमकिन है। क्योंकि ऐसे ठगों का प्रत्यर्पण करवाने के लिए भारत की दूसरे देशों से द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि नहीं है। देसी ठगों को भी पकड़ना इतना आसान नहीं होता क्योंकि वह फ़र्ज़ी पहचान, फ़र्ज़ी आधार कार्ड, फ़र्ज़ी पैन कार्ड, फ़र्ज़ी टेलीफोन नंबर का प्रयोग करते हैं और अपने मक़सद को हासिल करने के बाद इन सबको नष्ट कर देते हैं। 

इस सिरीज़ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह करोड़ों भारतीय महिलाओं को बहुत गहराई से ये समझाने में सफल रही है कि शादी के मामले में सोशल मीडिया की सूचनाओं को और इसके माध्यम से संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को तब तक सही न माने जब तक उनकी और उनके परिवार की पृष्ठभूमि की किसी समानांतर प्रक्रिया से जाँच न करवा लें। कोई कितना भी प्रेम क्यों न प्रदर्शित करे, अपने वैभव का कितना भी प्रदर्शन क्यों न करे उसे एक पैसा भी शादी से पहले किसी क़ीमत पर न दें। शादी के बाद भी अपने धन और बैंक अकाउंट को अपने ही नियंत्रण में रखें, उसे नये रिश्ते के व्यक्ति के हाथों में न सौंप दें वरना जीवन भर पछताना पड़ेगा। जिन महिलाओं के पास ओटीटी प्लेटफार्म की सुविधा नहीं है अपने मित्रों या रिश्तेदारों के घर जा कर इस सिरीज़ को अवश्य देखें और अपने साथियों को इसके बारे में बताएँ। ताकि भविष्य में कोई महिला इन ठगों के जाल में न फँसे।  

Monday, May 15, 2023

बचाओ - बचाओ भेड़िया आया !


भारत की सनातन वैदिक संस्कृति अनेक अर्थों में विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है। क्योंकि ये व्यक्ति, पर्यावरण व समाज के बीच संतुलन पर आधारित जीवन मूल्यों की स्थापना करती है। भारत विश्व गुरु था इसके तमाम ऐतिहासिक प्रमाण हैं जिन्हें हज़ारों वर्षों से भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों ने अपने लेखन में उल्लेख किया है। विसंगतियां भी हर समाज में होती हैं। भारत इसका अपवाद नहीं है। यह भी सही है कि अंग्रेज इतिहासकारों और आज़ादी के बाद वामपंथी इतिहासकारों ने ऐतिहासिक तथ्यों को अपनी विचारधारा के अनुरूप तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया। इसलिए सनातनी मानसिकता के लोगों के मन में ये बात हमेशा से बैठी रही कि उनके इतिहास के साथ न्याय नहीं हुआ। अचानक 2014 से ये दबी भावनाएँ अब मुखर हो गईं हैं।



अपने धर्म, संस्कृति और इतिहास की श्रेष्ठता को बताना और स्थापित करने में कोई बुराई नहीं है। ये किया ही जाना चाहिए। पर ऐसा करते समय उत्साह के अतिरेक में अगर हम तथ्यों से छेड़छाड़ करेंगे, अपने विपक्षियों के ऊपर हमला करते समय उनकी उपलब्धियों को वैसे ही छिपाएँगे जैसे वे करते आए हैं और उन पर झूठे आरोप मढ़ कर या उन्हें बदनाम करने की दृष्टि से उन पर हमला करेंगे, तो हमारी ये क़वायद सफल नहीं होगी। हम उपहास के पात्र बनेंगे। हमारे दावों की पुष्टि न हो पाने पर हम झूठे सिद्ध हो जाएँगे और फिर हमारी सही बात भी ग़लत कही जाएगी। आज के दौर में सूचना तकनीकी का इतना विस्तार हो गया है कि दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति किसी भी दावे की वैधता को क्षणों में चुनौती दे सकता है, अगर वो दावा सत्य नहीं है। 


ट्विटर पर पोस्टों को खंगालते समय मेरी निगाह ‘सनातनी पूर्णिमा’ की इस पोस्ट पर अटक गई, जिसमें लिखा था, वियतनाम विश्व का एक छोटा सा देश है जिसने अमेरिका जैसे बड़े बलशाली देश को झुका दिया। लगभग बीस वर्षों तक चले युद्ध में अमेरिका पराजित हुआ। अमेरिका पर विजय के बाद वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष से एक पत्रकार ने एक सवाल पूछा... आप युद्ध कैसे जीते या अमेरिका को कैसे झुका दिया? उत्तर सुनकर आप हैरान रह जायेंगे और आपका सीना भी गर्व से भर जायेगा। उत्तर था, सभी देशों में सबसे शक्ति शाली देश अमेरिका को हराने के लिए मैंने एक महान व श्रेष्ठ भारतीय राजा का चरित्र पढ़ा और उस जीवनी से मिली प्रेरणा व युद्धनीति का प्रयोग कर हमने सरलता से विजय प्राप्त की। आगे पत्रकार ने पूछा, कौन थे वो महान राजा? वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष ने खड़े होकर जवाब दिया, वो थे भारत के राजस्थान में मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप सिंह (ये सिंह कबसे जुड़ गया?)। महाराणा प्रताप का नाम लेते समय उनकी आँखों में एक वीरता भरी चमक थी, आगे उन्होंने कहा, अगर ऐसे राजा ने हमारे देश में जन्म लिया होता तो हमने सारे विश्व पर राज किया होता। कुछ वर्षों के बाद उस राष्ट्राध्यक्ष की मृत्यु हुई तो जानिए उसने अपनी समाधि पर क्या लिखवाया, यह महाराणा प्रताप के एक शिष्य की समाधि है। कालांतर में वियतनाम के विदेशमंत्री भारत के दौरे पर आए थे। पूर्व नियोजित कार्य क्रमानुसार उन्हें पहले लाल किला व बाद में गांधीजी की समाधि दिखलाई गई। ये सब दिखलाते हुए उन्होंने पूछा मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप की समाधि कहाँ है? तब भारत सरकार के अधिकारी चकित रह गए, और उन्होंने वहाँ उदयपुर का उल्लेख किया। वियतनाम के विदेशमंत्री उदयपुर गये, वहाँ उन्होंने महाराणा प्रताप की समाधि के दर्शन किये। समाधि के दर्शन करने के बाद उन्होंने समाधि के पास की मिट्टी उठाई और उसे अपने बैग में भर लिया। इस पर पत्रकार ने मिट्टी रखने का कारण पूछा। उन विदेशमंत्री महोदय ने कहा ये मिट्टी शूरवीरों की है इस मिट्टी में एक महान् राजा ने जन्म लिया ये मिट्टी मैं अपने देश की मिट्टी में मिला दूंगा ताकि मेरे देश में भी ऐसे ही वीर पैदा हों। मेरा यह राजा केवल भारत का गर्व न होकर सम्पूर्ण विश्व का गर्व होना चाहिए। 



इस पोस्ट को पढ़ कर उत्साही लोगों ने बढ़-चढ़ कर हर्ष और गर्व अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया। उत्सुकतावश मैंने भी गूगल पर जा कर जब खोज की तो पता चला कि जो सूचना दी गयी है उसमें वियतनाम के ऐसे किसी राष्ट्रपति का ज़िक्र नहीं है जो महाराणा प्रताप से प्रेरित रहा हो या उनका विदेश मंत्री उदयपुर गया हो। तब मैंने इस दावे के प्रमाण की माँग करते हुए अपनी प्रतिक्रिया लिखी। कुछ और खोज करने पर पता चला कि पिछले वर्ष ऐसा ही दावा छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में भी किया गया था। उसमें भी प्रमाण माँगने पर दावा करने वाला प्रमाण नहीं दे पाया। वियतनाम घूम कर आए एक व्यक्ति ने तो साफ़ लिखा कि वियतनाम में ऐसी किसी घटना की कोई जानकारी नहीं है। एक और व्यक्ति ने लिखा की वियतनाम के संघर्ष के नेता और लंबे समय तक वहाँ के प्रधान मंत्री रहे हो चि मिन्ह धुर वामपंथी थे और उनके किसी लेख या भाषण में महाराणा प्रताप या शिवाजी का कोई उल्लेख नहीं है। इससे तो यही सिद्ध होता है कि ये ‘ह्वाट्सऐप विश्वविद्यालय’ की ही खोज है जिसका तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं है।



वियतनाम का तो ये एक उदाहरण है। अपने राजनैतिक विरोधियों की छवि नष्ट करने के लिए और उनकी उपलब्धियों को नकारने के लिए ऐसी पोस्ट सारा दिन दर्जनों की तादाद में आती रहती हैं। बिना उनकी सत्यता परखे समाज का एक हिस्सा उन्हें फॉरवर्ड करने में जुट जाता है। जिससे कुछ समय बाद झूठ सच लगने लगता है। पर जब कोई ऐसे मूर्खतापूर्ण व द्वेषपूर्ण दावों की पड़ताल करता है और उन्हें झूठा सिद्ध कर देता है तो सामने की तरफ़ सन्नाटा छ जाता है। न उत्तर दिया जाता है और न ही अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी जाती है। ये सिलसिला यूँ ही चलता जा रहा है। समझ में नहीं आता कि सैंकड़ों करोड़ रुपये खर्च करके आईटी सेल चलाने वाले राजनैतिक संगठन या दल ऐसा झूठ फैला कर क्या हासिल करना चाहते हैं? इससे उनकी विश्वसनीयता तेज़ी से घटती जा रही है। वो दिन दूर नहीं जब ऐसा भ्रम फैलाने वालों की भी वही गति होगी जो उस भेड़ चराने वाले लड़के की हुई थी जो बार-बार झूठा शोर मचाता था, बचाओ-बचाओ भेड़िया आया