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Monday, January 26, 2026

बुजुर्गों की सेवा में ‘समय बैंक’

भारत जैसे देश में, जहां बुजुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और पारंपरिक परिवार संरचना कमजोर पड़ रही है, बुजुर्गों की देखभाल एक बड़ी चुनौती बन गई है। सरकारी पेंशन योजनाएं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम तो हैं, लेकिन वे अक्सर अपर्याप्त साबित होते हैं। ऐसे में, स्विट्जरलैंड की ‘समय बैंक’ अवधारणा एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत करती है, जो न केवल बुजुर्गों की देखभाल को सुनिश्चित करती है बल्कि समाज में सहानुभूति और सामुदायिक भावना को भी मजबूत करती है। यह अवधारणा, जो स्विट्जरलैंड के संघीय सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित की गई है, युवाओं को बुजुर्गों की सेवा करने का अवसर देती है और बदले में उन्हें भविष्य में खुद की देखभाल के लिए ‘समय’ जमा करने की अनुमति देती है। भारत सरकार को इस मॉडल को अपनाने पर विचार करना चाहिए, क्योंकि यह हमारी सांस्कृतिक मूल्यों से मेल खाता है और आर्थिक बोझ को कम कर सकता है।


स्विट्जरलैंड में इस कार्यक्रम की शुरुआत बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और उनकी देखभाल की जरूरतों को ध्यान में रखकर की गई थी। कार्यक्रम के अनुसार, स्वस्थ और संवाद करने में कुशल व्यक्ति बुजुर्गों की मदद करते हैं, जैसे खरीदारी करना, कमरा साफ करना, सूरज की रोशनी में बाहर ले जाना या बस बातचीत करना। प्रत्येक घंटे की सेवा को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के व्यक्तिगत ‘समय खाते’ में जमा किया जाता है। जब व्यक्ति खुद बुजुर्ग हो जाता है या बीमार पड़ता है, तो वह इस जमा समय को निकाल सकता है और अन्य स्वयंसेवक उसकी देखभाल करेंगे। यह प्रणाली न केवल पैसे की बचत करती है बल्कि मानवीय संबंधों को भी मजबूत करती है।


कल्पना कीजिए, एक युवा व्यक्ति जो सप्ताह में दो बार दो घंटे बुजुर्गों की सेवा करता है। एक साल बाद, ‘समय बैंक’ उसके कुल सेवा समय की गणना करता है और उसे एक ‘समय बैंक कार्ड’ जारी करता है। इस कार्ड से वह भविष्य में ‘समय और समय ब्याज’ निकाल सकता है। यानी, जमा समय पर ब्याज भी मिलता है, जो प्रोत्साहन का काम करता है। स्विट्जरलैंड में यह प्रथा अब सामान्य हो गई है और सरकार ने इसे समर्थन देने के लिए कानून भी पारित किया है। यह मॉडल पेंशन व्यय को कम करता है और समाज को अधिक सहयोगी बनाता है।


भारत में इस अवधारणा को लागू करने की संभावनाएं अपार हैं। एक अनुमान के तहत, 2030 तक हमारे देश में बुजुर्गों की आबादी 19 करोड़ से अधिक हो जाएगी और कई परिवारों में बच्चे शहरों में बस जाते हैं, जिससे बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। पारंपरिक रूप से, भारत में बुजुर्गों की देखभाल परिवार की जिम्मेदारी रही है, लेकिन आधुनिकीकरण ने इस संरचना को प्रभावित किया है। ‘समय बैंक’ जैसा कार्यक्रम युवाओं को प्रोत्साहित कर सकता है कि वे बुजुर्गों की सेवा करें और बदले में उन्हें सुरक्षा का आश्वासन मिले। यह न केवल सरकारी संसाधनों पर दबाव कम करेगा बल्कि बेरोजगार युवाओं को सार्थक कार्य प्रदान करेगा।


उदाहरण के लिए, स्विट्जरलैंड की एक कहानी से प्रेरणा लें। वहां एक 67 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षिका क्रिस्टीना एक 87 वर्षीय बुजुर्ग की देखभाल करती थीं। उन्होंने कहा कि वह पैसे के लिए नहीं, बल्कि ‘समय बैंक’ में समय जमा करने के लिए ऐसा कर रही थीं। जब वे खुद घायल हुईं, तो ‘समय बैंक’ ने तुरंत एक नर्सिंग कार्यकर्ता भेजा, जो उनकी देखभाल करने लगा। कुछ दिनों में वे स्वस्थ हो गईं और फिर से सेवा में लग गईं। यह कहानी दर्शाती है कि कैसे यह प्रणाली व्यावहारिक और प्रभावी है। भारत में भी, यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ऐसा कार्यक्रम शुरू करें, तो लाखों बुजुर्गों का जीवन बेहतर हो सकता है।


हालांकि, भारत में इसे लागू करने से पहले कुछ चुनौतियों पर विचार करना जरूरी है। सबसे पहले, कार्यक्रम की निगरानी के लिए एक मजबूत डिजिटल प्लेटफार्म की जरूरत होगी, जहां सेवा घंटों को रिकॉर्ड किया जा सके। आधार कार्ड और डिजिटल इंडिया जैसे मौजूदा सिस्टम इसमें मदद कर सकते हैं। दूसरा, स्वयंसेवकों की ट्रेनिंग जरूरी है, ताकि वे बुजुर्गों की भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों को समझ सकें। तीसरा, दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त सत्यापन प्रक्रिया होनी चाहिए, जैसे कि समय निकासी के समय पहचान जांच। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की कमी एक समस्या हो सकती है, इसलिए ऑफलाइन मोड भी विकसित किया जाना चाहिए।


सरकार को दिल्ली या मुंबई जैसे शहरों में इसे पायलट प्रोजेक्ट की तरह से शुरुआत करनी चाहिए। यदि सफल रहा, तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया जा सकता है। यह आयुष्मान भारत या राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम के साथ एकीकृत किया जा सकता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होगी। कॉर्पोरेट घराने एनजीओ को अपने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड्स और स्थानीय समुदायों द्वारा इसे सहयोग करें। इससे न केवल बुजुर्गों की देखभाल सुनिश्चित होगी बल्कि युवाओं में सामाजिक जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी।


इस अवधारणा के सामाजिक लाभ भी कम नहीं हैं। आज के दौर में, जहां अकेलापन एक महामारी बन गया है, ‘समय बैंक’ लोगों को जोड़ सकता है। बुजुर्गों से बातचीत करने से युवाओं को जीवन के अनुभव मिलेंगे, और बुजुर्गों को भावनात्मक समर्थन। यह भारतीय मूल्यों—जैसे ‘सेवा परमो धर्म:’ से मेल खाता है। स्विट्जरलैंड में यह प्रणाली पेंशन को पूरक बनाती है, जहां पेंशन इतनी अच्छी है कि भोजन और आवास की चिंता नहीं होती, लेकिन भारत में जहां पेंशन सीमित है, यह एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है।


आर्थिक दृष्टि से भी यह फायदेमंद है। भारत में बुजुर्ग देखभाल पर खर्च बढ़ रहा है नर्सिंग होम और अस्पताल महंगे हैं। ‘समय बैंक’ से स्वयंसेवी देखभाल बढ़ेगी, जिससे सरकारी व्यय कम होगा। विश्व बैंक की रिपोर्ट्स बताती हैं कि एजिंग पॉपुलेशन विकासशील देशों के लिए चुनौती है, लेकिन ऐसे नवाचारी मॉडल से इसे अवसर में बदला जा सकता है। स्विट्जरलैंड में यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक चल रहा है और अब दुनिया के अन्य देशों को इसे अपनाना चाहिए।


भारत सरकार केंद्र और राज्य स्तर पर को इस ‘समय बैंक’ अवधारणा पर विचार करना चाहिए। इसे लागू करने के लिए एक टास्क फोर्स गठित की जाए, जो स्विट्जरलैंड के मॉडल का अध्ययन करे और भारतीय संदर्भ में अनुकूलित करे। यदि हम आज कदम उठाएं, तो कल के बुजुर्ग—जो आज के युवा हैं—एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे। यह न केवल एक नीति है, बल्कि मानवता का निवेश है। समय सबसे मूल्यवान मुद्रा है और इसे बैंक में जमा करने का विचार दुनिया को बदल सकता है। आइए, हम इसे अपनाएं और एक बेहतर समाज बनाएं। 

Monday, November 1, 2021

केरल में जीने का ये नायाब तरीक़ा


केरल के वायनाड का नाम चर्चा में तब आया था जब राहुल गांधी वहाँ से लोक सभा चुनाव लड़ने गए। इससे पहले मुझे वायनाड के बारे में कुछ पता नहीं था। इत्तेफ़ाक देखिए कि पिछला हफ़्ता हम दोनों ने वायनाड की पहाड़ियों पर बिताया। यूँ तो दुनिया के तमाम देशों में यात्रा करने या छुट्टियाँ बिताने का मौक़ा मिला है। पर वायनाड का यह अनुभव बिल्कुल अनूठा था। ख़ासकर इसलिए कि इस यात्रा ने ज़िंदगी जीने का एक नया तरीक़ा दिखाया। वायनाड की अलौकिक खबसूरती की चर्चा बाद में करूँगा, पहले इस नए अनुभव को साझा कर लूँ।

   

दिल्ली के प्रतिष्ठित मॉडर्न स्कूल में मेरी जीवन साथी मीता नारायण की एक सहपाठी रहीं सुजाता गुप्ता और उनके कुछ साथियों ने वायनाड के एक पहाड़ पर अपने आशियाने बनाए हैं। इसका नाम ‘इलामाला इस्टेट’ है। समुद्र तल से 3000 फूट ऊँचे पहाड़ पर सघन वन में रहने का यह अनूठा अन्दाज़ हर किसी को आह्लादित करता है। सात मित्रों की सात कौटेज बहुत कलात्मक रुचि से बनाई और सजाई गई है जिनके हर ओर सुंदर फूल और घने वृक्ष दिखाई देते हैं। किसी भी घर में भोजन नहीं पकता केवल चाय - कॉफ़ी बनाने की व्यवस्था है। सातों मित्रों ने पहाड़ की चोटी पर एक ‘लोंग हाउस’ बनाया है। जिसकी रसोई में पारम्परिक से लेकर आधुनिक तरीक़े तक से खाना पकाने की अनेक व्यवस्थाएँ हैं।

 


इस रसोई में 10-12 जने एक साथ भोजन पका सकते हैं। वहाँ का नियम यह है कि हर दिन भोजन पकवाने और खिलवाने का ज़िम्मा एक साथी का होता है। जिसके निर्देशन में रोज़ तीनों वक्त नाश्ता और खाना बनाया जाता है। चूँकि ये सातों सदस्य अलग-अलग प्रांतों से हैं इसलिए ‘इलामाला इस्टेट’ के भोजन कक्ष में हर दिन विविध व्यंजनों का स्वाद मिलता है। जहां सातों कौटेज के लोग दिन में तीन बार जमा होते हैं और भोजन के साथ विविध विषयों पर गम्भीर चर्चा या ‘इंडोर गेम्स’ का आनंद लेते हैं। इस ‘लोंग हाउस’ की बाल्कनी से चारों तरफ़ जहां भी निगाह जाती है 50-50 मील दूर तक घना जंगल और सुंदर पहाड़ हैं, जिनमें दिन भर बादल, बारिश, इंद्रधनुष अटखेलियाँ करते रहते हैं।

 

यहाँ चंदन, रोज़वुड, सुपारी, नारियल जैसे अनेक बहुमूल्य उत्पादों के हज़ारों वृक्ष हैं। यहाँ का वन्य जीवन भी कम रोमांचक नहीं। अक्सर हिरन आपके वरांडे में आकर खड़े हो जाते हैं। हिंसक पशु, कोबरा और जंगली हाथी भी यदा-कदा चक्कर लगा लेते हैं, जिनसे सावधानी बरतनी होती है। ‘लोंग हाउस’ में परिवार के मित्रों के ठहरने के लिए चार आधुनिक कक्ष भी हैं, जिनकी साज-सज्जा ‘ताज रिज़ॉर्टस’ से कम नहीं। पर यह व्यवस्था व्यावसायिक नहीं है, जहां किराया देकर ठहरा जा सके। सात दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं लगा। प्रकृति के इतना निकट इस अलौकिक वातावरण में शेष दुनिया से सम्पर्क रखने की इच्छा ही नहीं होती। हमारी उम्र के वरिष्ठ नागरिकों के लिए जीवन जीने का ये तरीक़ा बहुत सुखद और अदभुत है। जब आप एक दूसरे के साथ अपना जीवन इस तरह साझा कर लेते हैं कि फिर किसी और की ज़रूरत ही नहीं होती।

 

अनजाने प्रदेश में जहां बोली जाने वाली मलयालम भाषा कोई न जानता हो और स्थानीय लोग अंग्रेज़ी भी टूटी-फूटी बोलते हों, वहाँ उत्तर भारतीय लोगों का रहना कितना मुश्किल होगा? पर ऐसा नहीं है। ‘इलामाला इस्टेट’ के सभी कर्मचारी बेहद शालीन और काम के प्रति समर्पित हैं। हां केरल में व्याप्त कर्मचारी यूनियनों की संस्कृति के कारण कर्मचारियों से काम करवाने की शर्तें बिल्कुल साफ़ हैं। उनमें कोई ढील बर्दाश्त नहीं की जाती। पर जो बात सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है वो ये, कि पूरा केरल बेहद अनुशासित राज्य है। जहां के लोग नियम और क़ानूनों का पूरी ज़िम्मेदारी से पालन करते हैं। जैसे शेष भारत में आपको शायद ही कोई दुकान ऐसी मिले जिसका सामान दुकान के बाहर फुटपाथ या सड़क पर फैला न हो। जबकी केरल में कैसी भी दुकान क्यों न हो, सड़क पर आपको कुछ भी रखा नहीं मिलेगा। सब कुछ दुकान के शटर के अंदर तक ही सीमित रहता है।

 

इसी तरह सड़क पर आप यह देख कर हैरान रह जाएँगे कि लोगों के घर के बाहर सड़क के किनारे एलपीजी के लाल सिलेंडर 24 घंटे पड़े रहते हैं और कोई उनकी चोरी नहीं करता। गैस की आपूर्ति वाली गाड़ी भरा सिलेंडर रख जाती है और ख़ाली सिलेंडर उठा कर ले जाती है। इसी तरह दूध के बड़े-बड़े कैन सड़क के किनारे रखे रहते हैं और दूधिया उन्हें उठा कर घर-घर दूध बाँट कर फिर सड़क पर रख देता है और दूध की गाड़ी ख़ाली कैन उठा लेती है और भरे छोड़ देती है। अड़ोस-पड़ोस के बीच विश्वास का रिश्ता इस कदर है कि दो घरों के बीच कोई बाउंड्री वॉल नहीं बनती। हर घर के चारों तरफ़ सुपारी या नारियल आदि के बड़े-बड़े पेड़ होते हैं। केरल में ज़्यादातर सड़कें घुमावदार हैं और केवल दो लेन की ही होती हैं। एक जाने की और एक आने की। पर उत्तर भारत की तरह कभी ट्रैफ़िक जाम की समस्या नहीं होती। क्योंकि सभी वाहन चालक एक सीधी क़तार में चलते हैं। कोई भी जल्दीबाज़ी में ओवरटेक करके सामने से आ रहे वाहनों का रास्ता नहीं रोकता। वायनाड में हिंदूओँ की आबादी आधी है, शेष मुसलमान और ईसाई हैं और सभी एक दूसरे के साथ हिल-मिल कर रहते हैं। इसलिए ‘इलामाला इस्टेट’ के हमारे इन मित्रों को अपने इलाक़े से 2000 मील दूर रहकर भी कोई दिक्कत नहीं होती।

 

वायनाड में बाणासुर बांध, प्राग ऐतिहासिक गुफाएँ, पहाड़ों पर सुंदर जल प्रपात, प्राचीन मंदिर और वाइल्ड लाइफ़ सेंचुरी जैसे अनेक पर्यटक स्थल भी हैं। पर यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण है यहाँ होने वाली चाय, कॉफ़ी और मसालों की खेती। जहां तक आपकी निगाह जाती है वहाँ तक आपको यही हरा-भरा दृश्य दिखाई देता है। पर इन बाग़ानों में काम करने के लिए श्रमिक बिहार, बंगाल और आसाम से बड़ी तादाद में यहाँ आते हैं। दक्षिणी केरल की तरह यहाँ गर्मी और मच्छरों का प्रकोप नहीं होता। बल्कि एक पहाड़ी ज़िला होने के कारण अप्रैल-मई छोड़ कर यहाँ का मौसम सुहावना ही रहता है। पर अभी तक वायनाड में पर्यटकों का आना सीमित मात्रा में ही होता है। क्योंकि इस ज़िले का विकास पर्यटन की दृष्टि से नहीं किया गया है। ऐसी जगह में जाकर वरिष्ठ नागरिकों का रहना और सामूहिक जीवन जीने के प्रयोग करना रोमांचक ही नहीं सुखद है। शेष भारत में भी जहां वरिष्ठ नागरिकों को अकेलापन लगता हो या उनके बच्चे उनका ध्यान रखने के लिए हर समय उपलब्ध न हों वहाँ भी इस तरह मिलजुलकर साथ रहने के प्रयोग किए जाने चाहिए, जिससे बुढ़ापा आनन्द से कट सके।