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Monday, February 9, 2026

शहरी विकास: पुरातन और आधुनिक में संघर्ष

काशी के मणिकर्णिका घाट को लेकर उपजे विवाद ने एक बार फिर इस प्रश्न को देश के सामने खड़ा कर दिया है कि हमारी प्राचीन धरोहरों को हानि पहुँचाए बिना शहरों का आधुनिकरण कैसे किया जाए? यह प्रश्न भारत के धार्मिक नगरों में चल रहे शहरी विकास कार्यों के संदर्भ में और भी ज्वलंत हो गया है।

धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतिृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।



इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़जे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पाते होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे भवन खड़े कर दिये हैं। नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।


माना कि विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि भारत में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन पुरातन नगरों का स्वरूप?



विकास की प्रक्रिया में जहाँ एक तरफ़ रचनात्मक सोच और कलात्मक दृष्टि का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है वहीं भ्रष्टाचार भी अन्य क्षेत्रों की तरह स्थिति को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाता है। शहरी विकास की प्रक्रिया में दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, करप्शन ऑफ डिजाईनकरप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश  होगा, विकास नहीं।



पिछले तीन दशकों में, इस तरह कितना व्यापक विनाश धर्मक्षेत्रों का किया गया है कि उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? पिछले 24 वर्षों से मैं ब्रज में धरोहरों के जीर्णोद्धार और संरक्षण में जुटा हूँ और इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें?


जबसे केंद्र में भाजपा की सरकार आई है, तब से धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उद्देश्य रहा है, इसलिए संघ नेतृत्व को चाहिए कि धर्मक्षेत्रों के विकास पर स्पष्ट नीति निधार्रित करने के लिए अनुभवी और चुने हुए लोगों की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय गोष्ठी बुलाए और उनकी राय लेकर नीति निर्धारण में सकारात्मक योगदान करे। पर इस विषय को राजनीति से अलग रखा जाए। क्योंकि धरोहर किसी एक दल के सत्ता में रहने या न रहने से अपना स्वरूप नहीं बदलती। उनका अस्तित्व सदियों से है और सदियों तक रहेगा। इसलिए धरोहरों के संरक्षण में जुटे  लोगों और विशेषज्ञों के प्रति राग द्वेष की भावना से अलग हटकर केवल धरोहरों के हित में ही निर्णय लिए जाएँ। 


नीतियों में क्रांतिकारी परिवर्तन किये बिना, वांछित सुधार आना असंभव है। फिर तो वही होगा कि चौबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनके लौटे। पर इसमें भी एक खतरा है। क्योंकि जब कभी सरकारी स्तर पर ऐसा विचार-विमर्श करना होना होता है, तो निहित स्वार्थ सार्थक विचारों को दबवाने के लिए या उनका विरोध करवाने के लिए, सत्ता के दलालनुमा लोगों को विशेषज्ञ या समाजसेवी बताकर इन बैठकों में बुला लेते हैं और सही बात को आगे नहीं बढ़ने देते। इसलिए ऐसी गोष्ठी में केवल वे लोग ही आऐ, जो स्वयंसिद्ध हैं, ढपोरशंखी नहीं। क्या केंद्र या प्रांतीय सरकारें  इतनी उदारता दिखा पायेंगी? अगर नहीं तो संरक्षण और विकास के नाम पर विनाश ही होगा। ये नहीं भूलना चाहिए कि प्राचीन धरोहरें किसी एक धर्म, समाज या देश की संपत्ति नहीं होती बल्कि पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण  विरासत होती हैं। इसका प्रमाण है कि जब 2001 में बामियान (अफ़ग़ानिस्तान) में गौतम बुद्ध की हज़ारों साल पुरानी विशाल प्रतिमा को तालिबानियों ने तोप के गोलों से उड़ाया था तो पूरी दुनिया ने इसका शोक मनाया था।

Monday, December 27, 2021

काशी : गंगा तेरा पानी अमृत


काशी विश्वनाथ मंदिर कोरिडोर बन जाने से विदेशों में रहने वाले भारतीय और देश में रहने वाले कुछ लोग बहुत उत्साहित हैं। वे मानते हैं कि इस निर्माण से मोदी जी ने मुसलमान आक्रांताओं से हिसाब चुकता कर दिया। नए कोरिडोर का भव्य द्वार और तंग गलियों को तोड़कर बना विशाल प्रांगण अब पर्यटकों के लिए बहुत आकर्षक व सुविधाजनक हो गया है। वे इस प्रोजेक्ट को मोदी जी की ऐतिहासिक उपलब्धि मान रहे हैं । 


वहीं काशीवासी गंगा मैया की दशा नहीं सुधारने से बहुत आहत हैं। जिस तरह गंगा मैया में मलबा पाटकर गंगा के घाटों का विस्तार काशी कोरिडोर परियोजना में किया गया है उससे गंगा के अस्तित्व को ही ख़तरा उत्पन्न हो गया है। हज़ारों करोड़ रुपया ‘नमामी गंगे’ के नाम पर खर्च करके भी गंगा आज भी मैली है। मल-मूत्र से युक्त ‘अस्सी नाला’ आज भी गंगा में बदबदा कर गिर रहा है। लोगों का कहना है कि मोदी जी के डुबकी लगा लेने से गंगा निर्मल नहीं हो गयी। पिछली भाजपा सरकार में गंगा शुद्धि के लिये मंत्री बनी उमा भारती ने कहा था कि अगर मैं गंगा की धारा को अविरल और इसे प्रदूषण मुक्त नहीं कर पायी तो जल समाधि के लूँगी। आज वे कहाँ हैं ?



पिछले दो दशकों में गंगा की देखरेख की बात तो हुई, लेकिन कर कोई कुछ खास नहीं पाया। यह बात अलग है कि इतना बड़ा अभियान शुरू करने से पहले जिस तरह के सोच-विचार और शोध की जरूरत पड़ती है, उसे तो कभी किया ही नहीं जा सका। विज्ञान और टैक्नोलॉजी के इस्तेमाल की जितनी ज्यादा चर्चा होती रही, उसे ऐसे काम में बड़ी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता था। जबकि जो कुछ भी हुआ, वो ऊपरी तौर पर और फौरीतौर पर हुआ। नारेबाजी ज्यादा हुई और काम कम हुआ। इससे यह पता चलता है कि देश की धमनियां मानी जाने वाली गंगा-यमुना जैसे जीवनदायक संसाधनों की हम किस हद तक उपेक्षा कर रहे हैं। इससे हमारे नजरिये का भी पता चलता है।


यहां यह दर्ज कराना महत्वपूर्ण होगा कि बिना यमुना का पुनरोद्धार करे गंगा का पुनरोद्धार नहीं होगा। क्योंकि अंततोगत्वाः प्रयाग पहुंचकर यमुना का जल गंगा में ही तो गिरने वाला है। इसलिए अगर हम अपना लक्ष्य ऐसा बनाए, जो सुसाध्य हो, तो बड़ी आसनी से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यमुना शुद्धीकरण को ही गंगा शुद्धि अभियान का प्रस्थान बिंदु माना जाए। यहां से होने वाली शुरूआत देश के जल संसाधनों के पुनर्नियोजन में बड़ी भूमिका निभा सकती है। अब देश के सामने समस्या यह है कि एक हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी यमुना के शुद्धीकरण के लिए कोई व्यवस्थित योजना हमारे सामने नहीं है। मतलब साफ है कि यमुना के लिए हमें गंभीरता से सोच विचार के बाद एक विश्वसनीय योजना चाहिए। ऐसी योजना बनाने के लिए मंत्रालयों के अधिकारियों को गंगा और यमुना को प्रदूषित करने वाले कारणों और उनके निदान के अनुभवजन्य समाधानों का ज्ञान होना चाहिए। ज्ञान की छोड़ो कम से कम तथ्यों की जानकारी तो होनी चाहिए। समस्या जटिल तो है ही लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर दे दें। अगर यह दावा किया जा रहा है कि आज हमारे पास संसाधनों का इतना टोटा नहीं है कि हम अपने न्यूनतम कार्यक्रम के लिए संसाधनों का प्रबंध न कर सकें, तो गंगा-यमुना के पुनरोद्धार के लिए किसी भी अड़चन का बहाना नहीं बनाया जा सकता।


एक ओर गंगोत्री के पास विकास के नाम पर हिमालय का जिस तरह नृशंस विनाश हुआ है, जिस तरह वृक्षों को काटकर पर्वतों को नंगा किया गया है, जिस तरह डाइनामाइट लगाकर पर्वतों को तोड़ा गया है और बड़े-बड़े निर्माण किये गये हैं, उससे नदियों का जल संग्रहण क्षेत्र लगातार संकुचित होता गया। इसलिए स्रोत से ही नदियों में जल की भारी कमी हो चुकी है। नदियों में जल की मांग करने से पहले हमें हिमालय को फिर से हराभरा बनाना होगा। 


वहीं दूसरी ओर मैदान में आते ही गंगा कई राज्यों के शहरीकरण की चपेट में आ जाती है। जो इसके जल को बेदर्दी से प्रयोग ही नहीं करते, बल्कि भारी क्रूरता से इसमें पूरे नगर का रासायनिक व सीवर जल प्रवाहित करते हैं। इस सबके बावजूद गंगा इन राज्यों को इनके नैतिक और कानूनी अधिकार से अधिक जल प्रदान कर उन्हें जीवनदान कर रही है। पर काशी तक आते-आते उसकी कमर टूट जाती है। गंगा में प्रदूषण का काफ़ी बड़ा हिस्सा केवल कानपुर व काशी वासियों की देन है। जब तक गंगा जल के प्रयोग में कंजूसी नहीं बरती जायेगी और जब तक उसमें गिरने वाली गन्दगी को रोका नहीं जायेगा, तब तक उसमें निर्मल जल प्रवाहित नहीं होगा।  


आज हर सरकार की विश्वसनीयता, चाहें वो केन्द्र की हो या प्रान्तों की, जनता की निगाह में काफी गिर चुकी है। अगर यही हाल रहे तो हालत और भी बिगड़ जायेगी। देश और प्रान्त की सरकारों को अपनी पूरी सोच और समझ बदलनी पड़ेगी। देशभर में जिस भी अधिकारी, विशेषज्ञ, प्रोफेशनल या स्वयंसेवी संगठन ने जिस क्षेत्र में भी अनुकरणीय कार्य किया हो, उसकी सूचना जनता के बीच, सरकारी पहल पर, बार-बार, प्रसारित की जाए। इससे देश के बाकी हिस्सों को भी प्रेरणा और ज्ञान मिलेगा। फिर सात्विक शक्तियां बढेंगी और लुटेरे अपने बिलों में जा छुपेंगे। अगर राजनेताओं को जनता के बढ़ते आक्रोश को समय रहते शांत करना है तो ऐसी पहल यथाशीघ्र करनी चाहिए। 


वैसे सारा दोष प्रशासन का ही नहीं, उत्तर प्रदेश की जनता का भी है। यहाँ की जनता जाति और धर्म के खेमों में बंटकर इतनी अदूरदृष्टि वाली हो गयी है कि उसे फौरी फायदा तो दिखाई देता है, पर दूरगामी फायदे या नुकसान को वह नहीं देख पाती। इसलिए सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। पर पिछले चुनाव प्रचार में जिस तरह उन्होंने मतदाताओं को उत्साहित किया, अगर इसी तरह अपने प्रशासनिक तंत्र को पारदर्शी और जनता के प्रति जबावदेह बनाते, विकास योजनाओं को वास्तविकता के धरातल पर परखने के बाद ही लागू होने के लिए अनुमति देते और प्रदेश के युवाओं को दलाली से बचकर शासन को जबावदेह बनाने के लिए सक्रिय करते , तो जरूर इस धारा को मोड़ा जा सकता। पर उसके लिए प्रबल इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है । जिसके बिना न प्रदेश आगे बढ़ता है और ना बन सकेगा गंगा का पानी अमृत। 


Monday, September 19, 2016

वाराणसी के घाटों को बचाने की मुहिम

    कभी-कभी पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता दिखाने वाले अतिउत्साह में कुछ ऐसे कदम उठा लेते हैं, जिससे लाभ की जगह नुकसान हो जाता है। वाराणसी में गंगा के किनारे दर्जनों ऐतिहासिक घाट हैं, जिन्हें कई सदियों पूर्व देश के विभिन्न अंचलों के राजा-महाराजाओं ने बनवाया था। इन घाटों की शोभा देखते ही बनती है, ये वाराणसी की पहचान हैं। दुनियाभर से पर्यटक 12 महीने वाराणसी आते हैं और इन घाटों को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। दुनिया का कोई देश या नगर ऐसा नहीं, जहां किसी नदी के किनारे इतने भव्य, महलनुमा घाट बने हों। काल के प्रभाव से अब इन घाटों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। जिसके लिए एक तो उच्च न्यायालय का स्थगन आदेश और एक ‘कछुआ सेंचुरी’ जिम्मेदार है। 

    प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में गंगा के 87 घाट हैं। पिछले कई वर्षों से उच्च न्यायालय के आदेश के तहत इनका जीर्णोद्धार रूका हुआ है। इन ऐतिहासिक घाटों को खरीदकर उन्हें होटल बनाने या उन पर भवन निर्माण करने की होड़ से चिंतित कुछ पर्यावरणविद्ों ने जनहित याचिका के माध्यम से ये रोक लगवाई। किंतु इससे उन घाटों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है, जिनकी संरचना काफी कमजोर पड़ चुकी है। अगर इनकी मरम्मत नहीं की गई, तो ये चरमराकर गिर सकते हैं। जो धरोहरों की दृष्टि से एक भारी क्षति होगी। जबसे नरेंद्र भाई मोदी ने वाराणसी को अपनाया, तबसे अनेक औद्योगिक घराने, सार्वजनिक उपक्रम व केंद्र सरकार के मंत्रालय वाराणसी को सजाने की मुहिम में जुट गए हैं। इसी क्रम में केंद्रीय सरकार के कुछ मंत्रालयों ने मिलकर उच्च न्यायालय से सीमित जीर्णोद्धार की अनुमति मांगी, जो सशर्त उन्हें मिल गई। अब कुछ घाटों पर जीर्णोद्धार का कार्य चालू है।

    ये वास्तव में चिंता की बात है कि कुछ निजी उद्यमियों ने इनमें से कुछ घाटों को औने-पौने दामों में खरीदकर इन्हें हैरिटेज होटल के रूप में बदलना शुरू कर दिया है। ये होटल मालिक पुरातत्व महत्व के इन भवनों में बदलाव करने से भी नहीं चूकते। होटल की सीवर लाइन चुपचाप गंगा में खोल देते हैं। इससे घाटों पर विपरीत असर पड़ रहा है। पर इसके साथ ही जो दूसरी बड़ी समस्या है, वह है गंगा के उस पार बनाई गई ‘कछुआ सेंचुरी’। कछुओं को अभयदान देने की दृष्टि से गंगा के उस पार बालू के खनन पर लंबे समय से रोक लगी है। इसका उद्देश्य था कि इस क्षेत्र में कछुओं का जीवन सुरक्षित रहे और उनके कुनबे में वृद्धि हो, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। गंगा का प्रदूषण हो या कोई अन्य कारण, ‘कछुआ सेंचुरी’ में कछुए दिखाई नहीं देते। बालू का खनन रोकने का नुकसान ये हुआ है कि गंगा के उस पार रेत के पहाड़ बनते जा रहे हैं, क्योंकि गंगा इस इलाके से वक्राकार स्थिति में आगे बढ़ती है। इसलिए उसके जलप्रवाह के साथ निरंतर आने वाली बालू यहां जमा होती जाती है।

    रेत के इन पहाड़ों के कारण उस पार का गंगातल ऊंचा हो गया है। नतीजतन, जल का सारा प्रवाह घाटों की तरफ मुड़ गया है। सब जानते हैं कि जल की ताकत के सामने बड़ी-बड़ी इमारतें भी खड़ी नहीं रह पातीं। जापान और भारत के सुनामी इसके गवाह हैं। वाराणसी में गंगा के इस तरह बहने से बड़े वेग से आने वाला गंगाजल घाटों की नींव को काट रहा है। नतीजतन उनका आधार दरकता जा रहा है। काशीवासियों को चिंता है कि अगर इसका समाधान तुरंत नहीं खोजा गया, तो कभी भी भारी आपदा आ सकती है। केदारनाथ की जलप्रलय की तरह यहां भी गंगा इन ऐतिहासिक घाटों को लील सकती है। इस विषय में पुरातत्वविद्ों और नगर के जागरूक नागरिकों ने अनेक बार सरकार का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है। पर अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई। 

    पिछले 3 महीनों से गंगा में हर साल की तरह भारी बाढ़ आई हुई है। घाटों की सीढ़ियां लगभग 2 महीने से पूरी तरह जलमग्न हैं। यह गंगा का वार्षिक चरित्र है। ऐसे में इन घाटों के लिए खतरा और भी बढ़ जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार साझे रूप में कुछ निर्णय ले। जिनमें पहले तो ‘कछुआ सेंचुरी’ को समाप्त किया जाए और वहां बालू के खनन की अनुमति दी जाए। जिससे जल का दबाव घाटों की तरफ से घटकर गंगा के उस पार चला जाए। दूसरा इन घाटों के संरक्षण के लिए एक सुस्पष्ट नीति घोषित की जाए। जिसके तहत घाटों का मूलरूप सुरक्षित रखते हुए जीर्णोद्धार करने की अनुमति हो, लेकिन इनके व्यवसायिक दुरूपयोग पर पूरी रोक लगा दी जाए। तीसरा हर घाट को किसी औद्योगिक घराने या सार्वजनिक उपक्रम के जिम्मे सौंप दिया जाए, जो इसकी देखरेख करे और वहां जनसुविधाओं का व्यवस्थित संचालन करे। ऐसा करने से इन घाटों की रक्षा भी हो सकेगी और वाराणसी की यह दिव्य धरोहरें आने वाली सदियों में भी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को सुख प्रदान करती रहेंगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री कार्यालय इस विषय में कुछ पहल करेगा और काशीवासियों को इस संकट से उबारेगा।