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Friday, October 30, 2026

खड़गे के बयान पर बवाल!

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके नेताओं की गरिमा और संवाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक बयानों में अभद्र और व्यक्तिगत हमले बढ़ते जा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण 25 अक्टूबर 2026 को पटना में मिला, जहां कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भीड़ में से किसी के “मोदी नहीं जाएंगे” कहने पर जवाब दिया,“मोदी का बाप भी जाएगा।” इस विवादित बयान के बाद भाजपा ने इसे जहरीली और अमर्यादित राजनीति बताते हुए माफी की मांग की और देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। 


संसदीय परंपरा में असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली हो। संसद के अंदर स्पीकर ऐसी भाषा हटा सकते हैं, लेकिन बाहर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है। चुनावी मौसम में यह और तीखा हो जाता है। खड़गे का यह बयान नया नहीं है; इससे पहले भी वे प्रधानमंत्री को “आतंकवादी” कह चुके हैं और भाजपा-आरएसएस की तुलना “जहरीले सांप” से कर चुके हैं। सोशल मीडिया के युग में ऐसे बयान तुरंत वायरल हो जाते हैं और लाखों लोगों तक पहुंचते हैं।


ऐसा नहीं है कि अभद्र भाषा का प्रयोग किसी एक राजनैतिक दल द्वारा ही किया गया हो। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ कांग्रेस के नेताओं को भी अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा। इनमें प्रमुख बयान हैं, “कांग्रेस की विधवा”, “जर्सी गाय”, “50 करोड़ की गर्लफ्रेंड”, “हाइब्रिड बछड़ा” आदि। यदि इतना कुछ काफ़ी नहीं था तो एक लाइव टीवी डिबेट में भाजपा के प्रवक्ता ने कांग्रेस के प्रवक्ता की माँ के प्रति काफ़ी अपशब्द कहे जो कि किसी भी सभ्य समाज में सहन नहीं किए जा सकते। लेकिन इस सबके बावजूद भाजपा ने अपने उस प्रवक्ता पर कोई कारवाही नहीं की। अब खड़गे के बयान के बाद कांग्रेस भी इन सभी बयानों को खुल कर याद दिला रही है।   

जब शीर्ष नेता सार्वजनिक मंच पर परिवार को निशाना बनाते हैं तो नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान कमजोर होता है। खासकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, सोचती है कि अगर देश के बड़े नेता खुले मंच पर ऐसी भाषा इस्तेमाल कर सकते हैं तो सामान्य जीवन में क्या होगा? इससे राजनीति को ‘गंदा खेल’ मानने की धारणा मजबूत होती है और मतदान में उदासीनता बढ़ती है। कई नागरिक मानते हैं कि ऐसी भाषा से लोकतंत्र की विश्वसनीयता घटती है।

पार्टी कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानते हैं। जब शीर्ष नेता व्यक्तिगत हमला करते हैं तो कार्यकर्ताओं में भी यही प्रवृत्ति बढ़ती है। रैलियों में अभद्र नारे और कभी-कभी हिंसक झड़पें देखने को मिलती हैं। खड़गे के बयान के बाद पटना में पुतले फूंके गए और माफी की मांग की गई, यह दिखाता है कि एक बयान कितनी तेजी से सड़क पर उतर सकता है। ऐसी घटनाओं से आंतरिक कलह और मनोबल गिरने का खतरा भी बना रहता है।

नेता एक दूसरों पर बयान दें वो तो आजकल की राजनीति में आम बात हो चुकी है। लेकिन ऐसे में मीडिया पर इसका असर और भी चिंताजनक है। जब नेता तीखे सवालों पर “पेड मीडिया” या “दलाल” कहते हैं या शारीरिक धमकी देते हैं तो पत्रकार सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी सक्रिय हो जाती है। खड़गे मामले में भी विवाद तुरंत सुर्खियों में आ गया, लेकिन कई बार पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों प्रभावित होती है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का जिक्र है।

महिलाओं और विपक्षी नेताओं के प्रति लिंगभेदी या व्यक्तिगत टिप्पणियां भी आम हैं। “आइटम” या शारीरिक बनावट पर हमले न केवल अपमानजनक हैं बल्कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित करते हैं। नीतिगत मतभेद की जगह परिवार, जाति या धर्म पर हमले राजनीतिक बहस का स्तर गिरा देते हैं।

सवाल है कि इसका समाधान क्या है? सबसे पहले नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना होगा। संसद और विधानसभाओं के बाहर भी नैतिक दिशानिर्देश लागू होने चाहिए। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा देने के बजाय जिम्मेदारी से रिपोर्ट करना चाहिए। नागरिक सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री शेयर करने से बचें और विरोध जताएं। राजनीतिक दलों को कार्यकर्ताओं को नीतियों पर बहस का प्रशिक्षण देना चाहिए, व्यक्तिगत हमलों का नहीं। महिलाओं के प्रति सम्मान के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून जरूरी हैं।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन व्यक्तिगत और अभद्र भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। खड़गे का ताजा बयान और उसके बाद का बवाल इसी प्रवृत्ति की ताजा मिसाल है। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में मजबूत होगा। 

Monday, August 4, 2025

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत को तोहफ़ा?

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयात होने वाले सामानों पर 25% टैरिफ और रूस से तेल और हथियारों की खरीद के लिए अतिरिक्त दंड की घोषणा की। यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से तब जब दोनों देश एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। ट्रम्प ने भारत और रूस को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ (डेड इकॉनमी) कहकर निशाना बनाया और भारत के उच्च टैरिफ और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं को इसका कारण बताया।


डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने वाली आक्रामक टैरिफ नीतियों को अपनाया है। 7 अगस्त 2025 से लागू होने वाले 25% टैरिफ का ऐलान करते हुए, ट्रम्प ने भारत के रूस से तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद को प्रमुख कारण बताया। उनके अनुसार, भारत रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है, जो यूक्रेन में रूस के सैन्य अभियान के समय में अस्वीकार्य है। इसके अतिरिक्त, ट्रम्प ने भारत के उच्च टैरिफ (जिसे उन्होंने दुनिया में सबसे अधिक बताया) और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं की भी आलोचना की।



यह टैरिफ अचानक भारत के लिए एक झटके के रूप में आया है, क्योंकि भारत और अमेरिका पिछले कुछ महीनों से एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे थे। ट्रम्प ने पहले 20-25% टैरिफ की संभावना जताई थी, लेकिन अंतिम घोषणा में अतिरिक्त दंड भी शामिल किया गया। यह कदम भारत के फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, रत्न और आभूषण, और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है, जो अमेरिका के साथ भारत के व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।


कांग्रेस के नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ट्रम्प के ‘मृत अर्थव्यवस्था’ वाले बयान का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “हां, ट्रम्प सही हैं। हर कोई जानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मृत है, सिवाय प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के। मुझे खुशी है कि ट्रम्प ने यह तथ्य सामने रखा। पूरी दुनिया जानती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था खत्म हो चुकी है। भाजपा ने अडानी को मदद करने के लिए अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया।”



राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए, विशेष रूप से नोटबंदी और ‘त्रुटिपूर्ण’ जीएसटी को अर्थव्यवस्था के पतन का कारण बताया। उन्होंने यह भी पूछा कि ट्रम्प के भारत-पाकिस्तान सीजफायर को लेकर बार बार किए जा रहे दावों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी क्यों है?



कांग्रेस पार्टी ने इस टैरिफ को भारत की विदेश नीति की विफलता के रूप में चित्रित किया। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, “राहुल गांधी ने पहले ही इस बारे में चेतावनी दी थी। यह टैरिफ हमारी अर्थव्यवस्था, निर्यात, उत्पादन और रोजगार पर असर डालेगा। हम अमेरिका को फार्मास्यूटिकल्स निर्यात करते हैं और 25% टैरिफ से ये महंगे हो जाएंगे, जिससे मांग कम होगी और उत्पादन व रोजगार पर असर पड़ेगा।” कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए और टैरिफ को भारत के व्यापार, एमएसएमई और किसानों के लिए हानिकारक बताया।


अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना की। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए “बुरे दिनों की शुरुआत” बताया, जबकि असदुद्दीन ओवैसी ने ट्रम्प को “व्हाइट हाउस का जोकर” कहकर उनकी आलोचना की। हालांकि, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी के रुख से अलग हटकर अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। शशि थरूर ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत-अमेरिका व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं और भारत को अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता है।


वहीं अर्थशास्त्रियों ने इस टैरिफ के भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को लेकर मिश्रित राय व्यक्त की है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रभाव सीमित होगा, जबकि अन्य ने दीर्घकालिक नुकसान की चेतावनी दी है। ईन्वेस्टमेंट इनफार्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया (आईसीआरए) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, प्रस्तावित टैरिफ और दंड हमारी अपेक्षा से अधिक हैं और इससे भारत की जीडीपी वृद्धि पर असर पड़ सकता है। प्रभाव की गंभीरता दंड के आकार पर निर्भर करेगी। अर्नेस्ट एंड यंग इंडिया (ई वाई) के व्यापार नीति विशेषज्ञ अग्नेश्वर सेन ने बताया कि टैरिफ से समुद्री उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, चमड़ा और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होंगे। ये क्षेत्र भारत-अमेरिका व्यापार में मजबूत हैं, और टैरिफ से इनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।


फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट के राहुल अहलूवालिया ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत को वियतनाम और चीन जैसे अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कमजोर स्थिति में ला सकता है। उनके अनुसार, निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं का भारत की ओर स्थानांतरण अब संभावना नहीं है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने आशावादी रुख अपनाया। फिक्की के अध्यक्ष हर्षवर्धन अग्रवाल ने कहा, हालांकि यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण है और हमारे निर्यात पर असर डालेगा, हमें उम्मीद है कि यह एक अल्पकालिक घटना होगी और दोनों पक्ष जल्द ही एक स्थायी व्यापार समझौते पर पहुंच जाएंगे।


भारत सरकार ने इस मुद्दे पर सतर्क और संयमित रुख अपनाया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा, “हम राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएंगे। भारत ने एक दशक में ‘फ्रैजाइल फाइव’ से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का सफर तय किया है।” सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि भारत तत्काल जवाबी टैरिफ लगाने के बजाय बातचीत के रास्ते को अपनाएगा। एक सूत्र ने कहा, चुप्पी सबसे अच्छा जवाब है। हम बातचीत की मेज पर इस मुद्दे को हल करेंगे। 

कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ और अतिरिक्त दंड ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। राहुल गांधी और विपक्ष ने इसे सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की विफलता के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि अर्थशास्त्रियों ने इसके मिश्रित प्रभावों की ओर इशारा किया है। जहां कुछ क्षेत्रों पर तत्काल असर पड़ सकता है, वहीं भारत के पास अन्य बाजारों में विविधता लाने और बातचीत के जरिए समाधान खोजने का अवसर है। यह स्थिति न केवल आर्थिक बल्कि भूराजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों को संतुलित करना होगा। देखना यह है कि आनेवाले दिनों में सरकार इस समस्या से कैसे निपटती है।  

Monday, September 9, 2024

कांग्रेस समझदारी से चले


जून 2024 के चुनाव परिणामों के बाद राहुल गांधी का ग्राफ काफ़ी बढ़ गया है। बेशक इसके लिए उन्होंने लम्बा संघर्ष किया और भारत के आधुनिक इतिहास में शायद सबसे लम्बी पदयात्रा की। जिसके दौरान उन्हें देशवासियों का हाल जानने और उन्हें समझने का अच्छा मौक़ा मिला। इस सबका परिणाम यह है कि वे संसद में आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं और तथ्यों के साथ सरकार को घेरते रहते हैं। किसी भी लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों का मज़बूत होना ज़रूरी होता है। इसी से सत्ता का संतुलन बना रहता है और सत्ताधीशों की जनता के प्रति जवाबदेही संभव होती है। अन्यथा किसी भी लोकतंत्र को अधिनायकवाद में बदलने में देर नहीं लगती।
 


आज राहुल गांधी विपक्ष के नेता भी हैं। जो कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत एक अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। जिसकी बात को सरकार हल्के में नहीं ले सकती। इंग्लैंड, जहां से हमने अपने मौजूदा लोकतंत्र का काफ़ी हिस्सा अपनाया है, वहाँ तो विपक्ष के नेता को ‘शैडो प्राइम मिनिस्टर’ के रूप में देखा जाता है। उसकी अपनी समानांतर कैबिनेट भी होती है, जो सरकार की नीतियों पर कड़ी नज़र रखती है। ये एक अच्छा मॉडल है जिसे अपने सहयोगी दलों के योग्य नेताओं को साथ लेकर राहुल गांधी को भी अपनाना चाहिए। आपसी सहयोग और समझदारी बढ़ाने के लिए, ये एक अच्छी पहल हो सकती है। 


राहुल गांधी को विपक्ष का नेता बनाने में ‘इंडिया गठबंधन’ के सभी सहयोगी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उत्तर प्रदेश से 37 लोक सभा सीट जीत कर अखिलेश यादव ने राहुल गांधी को विपक्ष का नेता बनने का आधार प्रदान किया। आज समाजवादी पार्टी भारत की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। ऐसे में अब राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का ये नैतिक दायित्व है कि वे भी अखिलेश यादव जैसी उदारता दिखाएं जिसके कारण कांग्रेस को रायबरेली और अमेठी जैसी प्रतिष्ठा की सीटें जीतने का मौक़ा मिला। वरना उत्तर प्रदेश में कांग्रेस संगठन और जनाधार के मामले में बहुत पीछे जा चुकी थी। अब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव हैं, जहां कांग्रेस सबसे बड़े दल की भूमिका में हैं। वहाँ उसे समाजवादी पार्टी को साथ लेकर चलना चाहिए और दोनों राज्यों के चुनावों में समाजवादी पार्टी को भी कुछ सीटों पर चुनाव लड़वाना चाहिए। महाराष्ट्र में तो समाजवादी पार्टी के दो विधायक अभी भी थे। हरियाणा में भी अगर कांग्रेस के सहयोग से उसके दो-तीन विधायक बन जाते हैं तो अखिलेश यादव को अपने दल को राष्ट्रीय दल बनाने का आधार मिलेगा। इससे दोनों के रिश्ते प्रगाढ़ होंगे और ‘इंडिया गठबंधन’ भी मज़बूत होंगे। 



स्वाभाविक सी बात है कि कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं को इस रिश्ते से तक़लीफ़ होगी। क्योंकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश में वोट बैंक एक सा है। ये नेता पुराने ढर्रे पर चलकर समाजवादी पार्टी के जनाधार पर निगाह गढ़ाएँगे। पर ऐसी हरकत से दोनों दलों के आपसी संबंध बिगड़ेंगे और बहुत दूर तक साथ चलना मुश्किल होगा। इसलिए ‘इंडिया गठबंधन’ के हर दल को ये ध्यान रखना होगा कि जिस राज्य में जिस दल का वर्चस्व है वो वहाँ नेतृत्व संभले पर, साथ ही अपने सहयोगी दलों को भी साथ खड़ा रखे। विशेषकर उन दलों को जिनका उन  राज्यों में कुछ जनाधार है। इससे गठबंधन के हर सदस्य दल को लाभ होगा। राहुल गांधी को ये सुनिश्चित करना होगा कि उनके सहयोगी दल ‘इंडिया गठबंधन’ में अपने को उपेक्षित महसूस न करें। इंडिया गठबंधन में राहुल गांधी के बाद सबसे बड़ा क़द अखिलेश यादव का है। अखिलेश की शालीनता और उदारता का उनके विरोधी दलों के नेता भी सम्मान करते हैं। ऐसे में अखिलेश यादव को पूरा महत्व देकर राहुल गांधी अपनी ही नींव मज़बूत करेंगे। 



हालाँकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के पिछले कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे। इसलिए और भी सावधानी बरतनी होगी। क्योंकि अखिलेश यादव में इतना बड़प्पन है कि वे अपनी कटु आलोचक “बुआजी” बहन मायावती से भी संबंध सुधारने में सद्भावना से पहल कर रहे हैं। यही नीति ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, शरद पवार व लालू यादव आदि को भी अपनानी होगी। तभी ये सब दल भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत बना पायेंगे। 


यही बात भाजपा पर भी लागू होती है। ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा देकर भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ एनडीए गठबंधन चला रही है। पर भाजपा का पिछले दस वर्षों का ये इतिहास रहा है कि उसने प्रांतों की सरकार बनाने में जिन छोटे दलों का सहयोग लिया, कुछ समय बाद उन्हीं दलों को तोड़ने का काम भी किया। इससे उसकी नीयत पर इन दलों को संदेह बना रहता है। पिछले दो लोक सभा चुनावों में भाजपा अपने बूते पर केंद्र में सरकार बना पाई। पर 2024 के चुनाव परिणामों ने उसे मिलीजुली सरकार बनाने पर मजबूर कर दिया। पर अब फिर वही संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा का नेतृत्व, तेलगुदेशम, जदयू व चिराग़ पासवान के दलों में सेंध लगाने की जुगत में हैं।  अगर इस खबर में दम है तो ये भाजपा के हित में नहीं होगा। जिस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने जाँच एजेंसियों के तौर-तरीक़ों पर लगाम कसनी शुरू की है, उससे तो यही लगता है कि डरा-धमका कर सहयोग लेने के दिन लद गए। भाजपा को अगर केंद्र में सरकार चलानी है या आगामी चुनावों में भी वो राज्यों की सरकारें बनाना चाहती है तो उसे ईमानदारी से “सबका साथ-सबका विकास” की नीति पर चलना होगा। 


हमारे लोकतंत्र का ये दुर्भाग्य है कि जीते हुए सांसद और विधायकों की प्रायः बोली लगाकर उन्हें ख़रीद लिया जाता है। इससे मतदाता ठगा हुआ महसूस करता है और लोकतंत्र की जड़ें भी कमज़ोर होती हैं। 1967 से हरियाणा में हुए दल-बदल के बाद से ‘आयाराम-गयाराम’ का नारा चर्चित हुआ था। अनेक राजनैतिक चिंतकों और समाज सुधारकों ने लगातार इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने की माँग की है। पर कोई भी दल इस पर रोक लगाने को तैयार नहीं है। जबकि होना यह चाहिए कि संविधान में परिवर्तन करके ऐसा क़ानून बनाया जाए कि जब कोई उम्मीदवार, लोक सभा या विधान सभा का चुनाव जीतता है तो उसे उस लोक सभा या विधान सभा के पूरे कार्यकाल तक उसी दल में बने रहना होगा जिसके चुनाव चिन्ह पर वो जीत के आया है। अगर वो दूसरे दल में जाता है तो उसे अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा देना होगा। तभी इस दुष्प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। सभी दलों को अपने हित में इस विधेयक को पारित कराने के लिए एकजुट होना होगा। 

Monday, August 12, 2024

बांग्लादेश के संदेश को गंभीरता से लिया जाए


भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में जो हुआ उसने कई तरह के सवाल खड़े किए हैं। परंतु इन सब में एक अहम सवाल भारत और बांग्लादेश के संबंधों का है। पड़ोसी व मित्र होने के चलते जिस तरह भारत ने बांग्लादेश की पूर्व प्रधान मंत्री व अपदस्थ नेता शेख़ हसीना को दिल्ली में शरण दी है वह आने वाले समय में भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर गहरा असर डाल सकता है। क्योंकि आम बांग्लादेशियों की नज़र में शेख़ हसीना और भारत एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं। ऐसे में अगले कुछ महीने दोनों देशों के रिश्तों के लिए तनाव भरे भी हो सकते हैं। बांग्लादेश में बनी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार भारत के साथ किस तरह पेश आती है, ये अभी कहा नहीं जा सकता। ये हमारी चिंता का विषय रहेगा। 



कई देशों में भारत के राजदूत रहे पूर्व आईएफ़एस अधिकारी अनिल त्रिगुणायत के अनुसार यह एक ऐसा संकट है जो वाजिब संदेह से परे नहीं है। दुनिया में सबसे लंबे समय तक सत्तारूढ़ रहीं महिला प्रधान मंत्री और बांग्लादेश में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली प्रधान मंत्री शेख़ हसीना का बांग्लादेश में हो रही घटनाओं के त्वरित क्रम में, अचानक इस्तीफा, निष्कासन और प्रस्थान अप्रत्याशित था। उनके कार्यकाल के दौरान, उनके प्रशासन ने बांग्लादेश को महत्वपूर्ण स्थायित्व प्रदान किया। इसके कारण उसकीआर्थिक प्रगति भी प्रभावशाली रही। पर साथ ही शेख़ हसीना के शासन में बढ़े भारी भ्रष्टाचार और उनके अहंकार के साथ-साथ उन पर चुनावों में गड़बड़ी करवाने के आरोपों ने उनकी विरासत को कलंकित किया। सरकारी नौकरियों में अपने ही दल के लोगों को स्वतंत्रता सेनानी बताकर लगातार सरकारी नौकरियों में तीस फ़ीसदी आरक्षण देना युवाओं में उनके भारी विरोध का मुद्दा बना। हालांकि जुलाई के तीसरे सप्ताह में बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय ने इसे सुलटा दिया था। फिर भी ये विवाद का एक बड़ा मुद्दा बना रहा। इसी के चलते 300 से अधिक छात्रों और प्रदर्शनकारियों की मौत के साथ वहाँ स्थिति बिगड़ गई। वो एक महत्वपूर्ण मोड़ था जब सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। घटनाओं का यह क्रम श्रीलंका और मिस्र में देखे गए संकटों की प्रतिध्वनि है। 



इस बीच, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नेता बेगम खालिदा जिया की नजरबंदी रद्द कर दी गई है। जो अब फिर से सक्रिय हो रही हैं। वे कट्टरपंथियों व पाकिस्तान के क़रीब मानी जाती हैं। ये हमारे लिए चिंता का कारण है। वहीं दूसरी तरफ़ शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद ने दावा किया है कि अब एक राजनैतिक गाथा खत्म हो गई है। क्योंकि उनका परिवार अब बांग्लादेश को अव्यवस्था की खाई में से निकालने या पाकिस्तान के जाल से बचाने और उग्रवाद के भँवर में फँसने से बचाने के लिए वापिस बांग्लादेश नहीं आएगा। क्योंकि शेख़ हसीना द्वारा प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ हाल में सेना के साथ सरकार बनाने की बातचीत करने वाली टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा था। वाजेद ने यह भी कहा कि अब हसीना का राजनीति से नाता भी खत्म हो चुका है। आवामी लीग को एक नया कथानक और अपना नया स्वीकार्य नेता ढूंढना होगा। ये रुझान आने वाली परिस्थितियों के स्वरूप का संकेत देते हैं। 


उधर बांग्लादेश की सेना के लिए भी आने वाला समय आसान नहीं है। क्योंकि सेना प्रमुख ने जनता, विशेषकर छात्रों से, इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों के मामले में कार्रवाई और जांच का आश्वासन देते हुए सहयोग मांगा है। यदि ऐसा है तो क्या उग्र और अनियंत्रित भीड़ द्वारा शेख़ हसीना के कार्यालय, आवास और संसद में की गई तोड़फोड़ को नजरअंदाज किया जाएगा?


ग़ौरतलब है कि बांग्लादेश के लोगों, खासकर युवाओं को लंबे समय तक चलने वाला सैन्य शासन पसंद नहीं है। इसलिए यदि एक समय सीमा के बाद सत्ता का लोकतांत्रिक हस्तांतरण नहीं किया गया और उसे राजनेताओं को नहीं सौंपा गया तो सेना को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा, बड़ी संख्या में छात्र सेना द्वारा थोपी गई अंतरिम सरकार के विचार से भी खुश नहीं हैं।


दूसरी तरफ़ अंतरराष्ट्रीय मामलों के कुछ अन्य जानकर ऐसा भी मानते हैं कि बांग्लादेश में यदि आरक्षण ही मुद्दा होता तो शेख़ हसीना जनवरी 2024 में भारी बहुमत से चुनाव कैसे जीतीं? ऐसा क्या हुआ कि मात्र छह महीनों में ही उन्हें देश छोड़ कर जाने पर मजबूर होना पड़ा? उनका कहना है कि पाकिस्तान बांग्लादेश के अलग होने से बिलकुल भी खुश नहीं था। उसकी जासूस एजेंसी आईएसआई हमेशा से ही बांग्लादेश में सक्रिय रही है। जिसने इस तख़्त पलट की पटकथा लिखी है। क्योंकि शेख़ हसीना ने पिछले 15 वर्षों से भारत के साथ अच्छे संबंध रखे और वे भारतीय हितों को पोषित करने वाली मानीं जातीं थी। जिससे पाकिस्तान काफ़ी बेचैन था। ऐसे पड़ोसी मित्र का सत्ता से अचानक हटना अब भारत के लिए चिंता का सबब अवश्य है। 


प्रश्न है कि भारत जैसे मज़बूत देश और भारत का एक तेज़-तर्रार ख़ुफ़िया तंत्र होने के बावजूद ढाका में होने वाले राजनैतिक घटनाक्रम की भनक तक क्यों नहीं लगी? ये बात गले नहीं उतरती। क्या इसे भी पुलवामा की तरह ‘इंटेलिजेंस फेलियर’ माना जाए? उल्लेखनीय है कि 1975 में, जब भारत की इंटेलिजेंस एजेंसियों को बांग्लादेश में तख्तापलट होने जा रहा है, इसकी भनक लगी, तो तब भारत की प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने लगभग एक सप्ताह पहले ही अपने हेलीकॉप्टर भेज कर शेख़ मुजीबुर रहमान को भारत में शरण लेने की सलाह दी थी, परंतु वे नहीं माने। परिणाम स्वरूप उन्हें व उनके बेटों और परिवार के 17 सदस्यों को ढाका में उनके घर में ही मार दिया गया। यदि उसी तरह हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियाँ ढाका में होने वाले ताज़ा घटनाक्रम की खबर समय रहते दे देतीं तो शायद प्रधानमंत्री मोदी जी बांग्लादेश को इस संकट से बचा भी सकते थे। वहीं दूसरी ओर यदि हमारे पास इस घटनाक्रम की जानकारी थी तो हमने बांग्लादेश के समर्थन में समय रहते कठोर कदम क्यों नहीं उठाए? 


विदेशी मामलों के ये जानकार यह भी कहते हैं कि भारत ने 2014 तक अपनी कूटनीति के चलते दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को अपने पाँव पसारने नहीं दिये। नेपाल, म्यांमार, श्री लंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और भारत सहित सात देशों के समूह ने भारत की पहल पर ही सार्क का गठन किया। जिसमें पाकिस्तान के अलावा भारत के सभी से अच्छे संबंध रहे। परंतु किन्हीं कारणों से हमारी विदेश नीति में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए कि 2015 के बाद से सार्क देशों की एक भी बैठक नहीं हुई। सार्क के बिखरते ही चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के चलते पहले पाकिस्तान और फिर भारत के अन्य पड़ोसी देशों में भी अपने पाँव पसारने शुरू कर दिये। परंतु ये सब होते हुए हम चुपचाप बैठे देखते रहे। नतीजन आज भारत चारों और से चीन के प्रभाव वाले पड़ौसियों से घिर गया है। अब छोटे से देश भूटान को छोड़कर कोई हमारा मित्र नहीं है। ग़ौरतलब है कि चीन से पहले अमरीका भी श्रीलंका और बांग्लादेश पर अपनी नज़र बनाए हुए था। परंतु चीन ने श्री लंका पर भी अपनी पकड़ बना कर अमरीका का सपना तोड़ दिया। 


बांग्लादेश के साथ हमारा लाखों करोड़ ₹ का व्यापार चल रहा है। दोनों देशों के बीच काफ़ी लंबी सीमा भी लगती है। जो हमारी बड़ी चिंता का विषय है। इसलिए हमारे हक़ में होगा कि बांग्लादेश में जो भी सरकार चुनी जाए वह भारत के हित की ही बात करे। वरना जहां हमारी दो सीमाएँ पहले से ही नाज़ुक स्थित में हैं, कहीं हम चारों ओर से दुश्मनों से घिर न जाएँ। अब ये उत्सुकता से देखना होगा कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के बाद जो भी सरकार बने वह भारत के साथ कैसे संबंध रखती है। इसलिए ढाका में हुए घटनाक्रम को दिल्ली को बहुत गंभीरता से लेना होगा।  

Monday, July 29, 2024

लोक सभा अध्यक्ष विवादों में क्यों?

भारतीय लोकतंत्र की परंपरा काफ़ी सराहनीय रही है। लोक सभा भारत की जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि सभा है जहां देश के कोने-कोने से आम जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि अपने क्षेत्र, प्रांत व राष्ट्र के हित में समस्याओं पर विमर्श करते हैं। लोकतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच लगातार नोक-झोंक का चलना बहुत सामान्य व स्वाभाविक बात है। सत्तापक्ष अपनी छवि बढ़ा-चढ़ा कर पेश करता है तो विपक्ष उसे आईना दिखाने का काम करता है। इससे मुद्दों पर वस्तु स्थिति स्पष्ट होती है। इस नोक-झोंक का कोई बुरा नहीं मानता। क्योंकि आज जो सत्ता में हैं, कल तक वो विपक्ष में थे और तब वे भी यही करते थे जो आज विपक्ष कर रहा है। जो आज सत्ता में हैं कल वो विपक्ष में होंगे और फिर वे भी वही करेंगे। लेकिन इस नोक-झोंक की सार्थकता तभी है जब वक्ताओं द्वारा मर्यादा में रह कर अपनी बात रखी जाए। 



जब तक संसदीय कार्यवाही का टीवी पर प्रसारण नहीं होता था, तब तक देश की जनता को यह पता ही नहीं चलता था कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि संसद में कैसा व्यवहार कर रहे हैं? उन्हें यह भी नहीं पता चलता था कि वे संसद में किन मुद्दों को उठा रहे हैं? अक्सर ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब सांसदों ने आर्थिक लाभ की एवज़ में बड़े औद्योगिक घरानों के हित में सवाल पूछे। वरिष्ठ पत्रकार ए सूर्यप्रकाश ने तीस वर्ष पहले ऐसे लेखों की श्रृंखला छापी थी जिसमें सांसदों के ऐसे आचरण का खुलासा हुआ और देश ने पहली बार जाना कि ‘संसद में सवाल बिकते हैं’। पर जब से टीवी पर संसदीय कार्यवाही का प्रसारण होने लगा तब से आम देशवासियों को भी ये देखने को मिला कि हमारे सांसद सदन में कैसा व्यवहार करते हैं। बिना अतिशयोक्ति के ये कहा जा सकता है कि प्रायः कुछ सांसद जिस भाषा का प्रयोग आजकल करने लगे हैं उसने शालीनता की सारी सीमाएँ लांघ दी है। शोर-शराबा तो अब आम बात हो गई है। ऐसा नहीं है कि संसद में ये हुड़दंग केवल भारत में ही देखने को मिलता है। यूरोप सहित दुनिया के अनेक देशों से ऐसे वीडियो आते रहते हैं, जिनमें सांसद हाथापाई करने और एक दूसरे पर कुर्सियाँ और माइक फेंकने तक में संकोच नहीं करते। सोचिए इसका देश के बच्चों और युवा पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ता होगा? 


सोचने वाली बात ये भी है कि संसद की कार्यवाही पर इस देश की ग़रीब जनता का अरबों रुपया ख़र्च होता है। एक आँकलन के अनुसार संसद चलने का प्रति मिनट खर्च ढाई लाख रुपये से थोड़ा अधिक आता है। इसका सदुपयोग तब हो जब गंभीर चर्चा करके जनता की समस्याओं के हल निकाले जाएँ। जिस तरह एक विद्यालय में शिक्षक कक्षा के सक्षम और योग्य छात्र को क्लास का मॉनिटर बना देते हैं, जिससे वो कक्षा में अनुशासन रख सके। उसी तरह लोक सभा के सांसद भी अपना मॉनिटर चुनते हैं जो लोक सभा की कार्यवाही का संचालन करता है। आजतक हमारी लोक सभा का यह इतिहास रहा है कि लोक सभा के अध्यक्षों ने यथा संभव निष्पक्षता से सदन की कार्यवाही का संचालन किया। उल्लेखनीय है कि 15वीं लोक सभा के तत्कालीन अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने अपने ही दल के विरुद्ध निर्णय दिये थे जिसका ख़ामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा । उन्हें दल से निष्कासित कर दिया गया। पर उन्होंने अपने पद की मर्यादा से समझौता नहीं किया। लेकिन पिछले दस वर्षों से लोक सभा के वर्तमान अध्यक्ष ओम बिरला जी लगातार विवादों में रहे हैं। उन पर सत्तापक्ष के प्रति अनुचित झुकाव रखने का आरोप विपक्ष लगातार लगाता रहा है। 17वीं लोक सभा में तो हद ही हो गई जब सत्तापक्ष के एक सांसद ने विपक्ष के सांसद को सदन की कार्यवाही के बीच बहुत ही अपमानजनक गालियाँ दी। अध्यक्ष ने उनसे वैसा कड़ा व्यवहार नहीं किया जैसा वो लगातार विपक्ष के सांसदों के साथ करते आ रहे थे। तब तो और भी हद हो गई जब उन्होंने विपक्ष के 141 सांसदों को सदन से निष्कासित कर दिया। ऐसा आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार हुआ।



हाल ही में एक टीवी चर्चा में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री व समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से बातचीत करते हुए देश के नामी वकील, सांसद और पूर्व क़ानून मंत्री कपिल सिब्बल ने बताया कि, “देश के संविधान के अनुच्छेद 105, संसद के सदस्यों को संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी। परंतु क्या सांसदों को ऐसा करने दिया जाता है? जबकि इसी अनुच्छेद में या पूरे संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि किसी भी सांसद का, संसद सदन में, अपनी बारी पर बोलते समय, माइक बंद किया जा सकता है। यह भी कहीं नहीं लिखा है कि किसी सांसद को बोलते समय, यदि वह नियम व मर्यादा के अनुसार बोल रहा हो तो उसे टोका जा सकता। इतना ही नहीं ये बात भी नहीं लिखी है कि यदि विपक्ष किसी मुद्दे पर सत्तापक्ष का विरोध करे तो उसे टीवी पर नहीं दिखा सकते। परंतु आजकल ऐसा होता है और यदि लोक सभा अध्यक्ष इस बात को नकार देते हैं कि वे किसी का माइक बंद नहीं करते तो फिर कोई तो है जो माइक को बंद करता है। यदि ऐसा है तो इसकी जाँच होनी चाहिए कि ऐसा कौन कर रहा है और किसके निर्देश पर कर रहा है?”



इसके साथ ही एक और भी अजीब घटना हुई, अब तक परंपरा यह थी कि लोक सभा का अध्यक्ष सत्तापक्ष से चुना जाता था और उपाध्यक्ष विपक्ष से चुना जाते थे। इससे सदन में संतुलन बना रहता था। पर पिछली लोक सभा में इस परंपरा को तोड़ दिया गया और बिना उपाध्यक्ष के ही पिछली लोक सभा का कार्यकाल पूरा हो गया। 


18वीं लोक सभा की शुरुआत ही ऐसी हुई है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव और अभिषेक बनर्जी तक अनेक दलों के सांसदों ने लोक सभा के वर्तमान अध्यक्ष ओम बिरला जी के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैये का खुला आरोप ही नहीं लगाया, बल्कि अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। ये न सिर्फ़ लोक सभा अध्यक्ष के पद की गरिमा के प्रतिकूल है, बल्कि ओम बिरला जी के निजी सम्मान को भी कम करता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि ओम बिरला जी मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना ‘पंच परमेश्वर’ को गंभीरता से पढ़ें जो शायद उन्होंने अपने स्कूली शिक्षा के दौरान पढ़ी होगी। इस कहानी ये शिक्षा मिलती है कि न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को अपने सगे-संबंधियों का भी लिहाज़ नहीं करना चाहिए।लोकसभा की सार्थकता और अपने पद की गरिमा के अनुरूप ओम बिरला जी को किसी सांसद को ये कहने का मौक़ा नहीं देना चाहिये कि उनका व्यवहार पक्षपातपूर्ण है। 

Monday, February 5, 2024

इंडिया एलायन्स क्यों बिखरा ?


देश के मौजूदा राजनैतिक माहौल में दो ख़ेमे बंटे हैं। एक तरफ वो करोड़ों लोग हैं जो दिलो जान से मोदी जी को चाहते हैं और ये मानकर बैठे हैं कि ‘अब की बार चार सौ पार।’ इनके इस विश्वास का आधार है मोदी जी की आक्रामक कार्यशैली, श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा, मोदी जी का बेहिचक होकर हिंदुत्व का समर्थन करना, काशी, उज्जैन, केदारनाथ, अयोध्या, मिर्जापुर और अब मथुरा आदि तीर्थ स्थलों पर भव्य कॉरिडोरों का निर्माण, अप्रवासी भारतीयों का भारतीय दूतावासों में मिल रहा स्वागतपूर्ण रवैया, निर्धन वर्ग के करोड़ों लोगों को उनके बैंक खातों में सीधा पैसा ट्रान्सफर होना, 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन का बाँटना और भविष्य के आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे। 


जबकि दूसरे ख़ेमे के नेताओं और उनके करोड़ों चाहने वालों का मानना है कि देश के युवाओं में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि दो करोड़ रोजगार हर वर्ष देने का वायदा करके भाजपा की मोदी सरकार देश के नौजवानों को सेना, पुलिस, रेल, शिक्षा व अन्य सरकारी विभागों में नौकरी देने में नाकाम रही है। आज भारत में बेरोज़गारी की दर पिछले 40 वर्षों में सबसे ज्यादा है। जबकि मोदी जी के वायदे के अनुसार इन दस वर्षों में 20 करोड़ लोगों को नौकरी मिल जाती तो किसी को भी मुफ्त राशन बाँटने की नौबत ही नहीं आती। क्योंकि रोजगार पाने वाला हर एक युवा अपने परिवार के पांच सदस्यों के पालन पोषण की जिम्मेदारी उठा लेता। यानी देश के 100 करोड़ लोग गरीबी की सीमा रेखा से ऊपर उठ जाते। इसलिए इस खेमे के लोगों का मानना है कि इन करोड़ों युवाओं का आक्रोश भाजपा को तीसरी बार केंद्र में सरकार नहीं बनाने देगा। 


विपक्ष के इस खेमे के अन्य आरोप हैं कि भाजपा सरकार महंगाई को काबू नही कर पाई। उसका शिक्षा और स्वास्थ्य बजट लगातार गिरता रहा है। जिसके चलते आज गरीब आदमी के लिए मुफ्त या सस्ता इलाज और सस्ती शिक्षा प्राप्त करना असंभव हो गया है। इसी खेमे का यह भी दावा है कि मोदी सरकार ने पिछले 10 सालों में विदेशी कर्ज की मात्रा 2014 के बाद कई गुना बढ़ा दी है। इसलिए बजट में से भारी रकम केवल ब्याज देने में खर्च हो जाती है और विकास योजनाओं के लिए मुठ्ठी भर धन ही बचता है। इसका खामियाजा देश की जनता को रोज बढती महंगाई और भारी टैक्स देकर झेलना पड़ता है। इसलिए सेवा निवृत्त लोग, मध्यम वर्ग और व्यापारी बहुत परेशान है।


इसके अलावा विपक्षी दलों के नेता मोदी सरकार पर केन्द्रीय जाँच एजेंसियों व चुनाव आयोग के लगातार दुरूपयोग का आरोप भी लगा रहे हैं। इसी विचारधारा के कुछ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता ईवीएम के दुरूपयोग का आरोप लगाकर आन्दोलन चला रहे हैं। दूसरी तरफ इतने लम्बे चले किसान आन्दोलन की समाप्ति पर जो आश्वासन दिए गये थे वो आज तक पूरे नहीं हुए। इसलिए इस खेमे का मानना है कि देश का किसान अपनी फ़सल के वाजिब दाम न मिलने के कारण मोदी सरकार से ख़फ़ा है। इसलिए इनका विश्वास है कि किसान भाजपा को तीसरी बार केंद्र में सत्ता नहीं लेने देगा। 

अगर विपक्ष के दल और उनके नेता पिछले साल भर में उपरोक्त सभी सवालों को दमदारी से जनता के बीच जाकर उठाते तो वास्तव में मोदी जी के सामने 2024 का चुनाव जीतना भारी पड़ जाता। इसी उम्मीद में पिछले वर्ष सभी प्रमुख दलों ने मिलकर ‘इंडिया’ एलायंस बनाया था। पर उसके बाद न तो इस एलायंस के सदस्य दलों ने एक साथ बैठकर देश के विकास के मॉडल पर कोई दृष्टि साफ़ की, न कोई साझा एजेंडा तैयार किया, जिसमें ये बताया जाता कि ये दल अगर सत्ता में आ गये तो बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से कैसे निपटेंगे। न अपना कोई एक नेता चुना। हालाँकि लोकतंत्र में इस तरह के संयुक्त मोर्चे को चुनाव से पहले अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार तय करने की बाध्यता नहीं होती। चुनाव परिणाम आने के बाद ही प्रायः सबसे ज्यादा सांसद लाने वाले दल का नेता प्रधानमंत्री चुन लिया जाता है। पर भाजपा इस मुद्दे पर अपने मतदाताओं को यह समझाने में सफल रही है कि विपक्ष के पास मोदी जी जैसा कोई सशक्त नेता प्रधानमंत्री बनने के लायक़ नहीं है। ये भी बार-बार कहा जाता है कि ‘इंडिया’ एलायंस के घटक दलों का हर नेता प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहा है।

‘इंडिया’ एलायंस के घटक दलों ने इतना भी अनुशासन नहीं रखा कि वे दूसरे दलों पर नकारात्मक बयानबाजी न करें। जिसका ग़लत संदेश गया। इस एलायंस के बनते ही सीटों के बंटवारे का काम हो जाना चाहिए था। जिससे उम्मीदवारों को अपने-अपने क्षेत्र में जनसंपर्क करने के लिए काफी समय मिल जाता। पर शायद इन दलों के नेता ईडी, सीबीआई और आयकर की धमकियों से डरकर पूरी हिम्मत से एकजुट नहीं रह पाए। यहाँ तक कि क्षेत्रीय दल भी अपने कार्यकर्ताओं को हर मतदाता के घर-घर जाकर प्रचार करने का काम भी आज तक शुरू नहीं कर पाए। इसलिए ये एलायंस बनने से पहले ही बिखर गया। 

दूसरी तरफ भाजपा व आर एस एस ने हमेशा की तरह चुनाव को एक युद्ध की तरह लड़ने की रणनीति 2019 का चुनाव जीतने के बाद से ही बना ली थी और आज वो विपक्षी दलों के मुकाबले बहुत मजबूत स्थिति में खड़े हैं। उसके कार्यकर्ता घर घर जा रहे हैं। जिनसे एलायंस के घटक दलों को पार पाना, लोहे के चने चबाना जैसा होगा। इसके साथ ही पिछले नौ वर्षों में भाजपा दुनिया की सबसे धनी पार्टी हो गई है। इसलिए उससे पैसे के मामले में मुकाबला करना आसान नहीं होगा। आज देश के मीडिया की हालत तो सब जानते हैं। प्रिंट और टीवी मीडिया इकतरफा होकर रातदिन केवल भाजपा का प्रचार करता है। जबकि विपक्षी दलों को इस मीडिया में जगह ही नहीं मिलती। जाहिर है कि चौबीस घंटे एक तरफा प्रचार देखकर आम मतदाता पर तो प्रभाव पड़ता ही है। इसलिए मोदी जी, अमित शाह जी, नड्डा जी बार-बार आत्मविश्वास के साथ कहते हैं, “अबकी बार चार सौ पार।” 

जबकि विपक्ष के नेता ये मानते हैं कि भाजपा को उनके दल नहीं बल्कि 1977 व 2004 के चुनावों की तरह आम मतदाता हराएगा। भविष्य में क्या होगा ये तो चुनावों के परिणाम आने पर ही पता चलेगा कि ‘इंडिया’ एलायंस के घटक दलों ने बाजी क्यों हारी और अगर जीती तो किन कारणों से जीती?