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Monday, October 12, 2026

युवा आंदोलन और सत्ता का दायित्व !

एक बार फिर से देश में युवाओं ने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा दी है। यह कोई नई बात नहीं है, जब-जब छात्र राजनैतिक व्यवस्था के विरूद्ध सड़क पर उतरते हैं, तब-तब ये सवाल उठता है कि क्या छात्रों को राजनीति करनी चाहिए? इस सवाल के उत्तर अपनी-अपनी दृष्टि से हर समुदाय देता है। जो राजनैतिक दल सत्ता में होते हैं, वे छात्र आन्दोलन की भर्त्सना करते हैं। उसे हतोत्साहित करते हैं और जब छात्र काबू में नहीं आते, तो उनका दमन भी करते हैं। फिर वो चाहे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों या 70 के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन से शुरू होकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्णं क्रांति के आव्हान पर कूंदने वाले छात्र हों, जिन्होने इंदिरा गांधी की सत्ता पलट दी थी या फिर अन्ना हजारे के आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों। लेकिन देश में कॉक्रोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन और देश भर में चल रहे ताज़ा आंदोलन ने इस सवाल को दोबारा जगा दिया है युवा और सरकार के आंदोलन का हल कैसे निकले?   



रोचक बात ये है कि जो दल सत्ता में आकर छात्रों का दमन करते हैं, वही दल जब विपक्ष में होते हैं, तो छात्र आन्दोलनों को हवा देकर ही अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं। इसमें कोई दल अपवाद नहीं हैं। अगर शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की दृष्टि से देखा जाऐ, तो भी दो मत हैं। जो संस्थान या अभिभावक चाहते हैं कि उनके निर्देशन में युवा केवल पढ़ाई पर ध्यान दें, डिग्री हासिल करें और नौकरी करे, वे नहीं चाहते कि उनके छात्र किसी भी तरह की राजनीति में हिस्सा ले। 


मगर एक दूसरा वर्ग उन शिक्षकों और अभिभावकों का है, जो अपने छात्रों में पूर्णं विश्वास रखते हैं और जानते हैं कि चाहे वे छात्र राजनीति में कितना ही हिस्सा क्यों न लें, उन्हें अपने भविष्य को लेकर पूरी स्पष्टता है। इसलिए वे पढ़ाई की कीमत पर आन्दोलन नहीं करेंगे। ऐसे संस्थान और अभिभावक छात्रों को रचनात्मक राजनीति करने से नहीं रोकते।



अगर निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो हम पाऐंगे कि जो छात्र केवल पढ़ाई पर ध्यान देते हैं और रट्टू तोते की तरह इम्तेहान पास करते जाते हैं, उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं होता। प्रायः ऐसे नौजवानों में समाजिक सारोकार भी नहीं होते। उनका व्यक्तित्व एकांगी हो जाता है और जीवन के संघर्षों में वे उतनी मजबूती से नहीं खड़े हो पाते, जितना कि वे छात्र खड़े होते हैं, जिन्होंने शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार को बनाऐ रखा हो। जो छात्र विज्ञान, शोध या तकनीकी के क्षेत्र में जाते हैं, उनकी बात दूसरी है। उनका ध्यान अपने विषय पर ही केंद्रित रहता है और वे अपने संपूर्णं अंगों को कछुऐ की तरह समेटकर एक ही दिशा में लगातार काम करते जाते हैं।



अपने जीवन में मैंने भी अलग-अलग तरह माहौल में अनुभव प्राप्त किये हैं। जब तक मैं कॉलेज में पढ़तो था, तो मेरा व्यक्तित्व दो धुरियों में बटां था। मेरे पिता जो एक बड़े शिक्षाविद् थे, उनके विचार यही थे कि मैं पढ़ू और नौकरी करूं। जबकि मेरी मां जो कि संस्कृत की विद्वान थी और मथुरा के रमणरेती वाले महाराज श्रद्धेय गुरू शरणनानंद जी की लखनऊ विश्विद्यालय की सहपाठी थीं, वे छात्र जीवन से ही गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक सरोकारों को लेकर बहुत सक्रिय रहीं थीं। उनका ही प्रभाव मुझ पर ज्यादा पड़ा और 18 वर्ष की आयु में एक स्वयंसेवक के रूप में पिछड़े गाँवों में सेवा कार्य करने घर छोड़कर चला गया। 1974 के उस दौर में मैंने गाँव की गरीबी और बदहाली में जीवन के अनूठे अनुभव प्राप्त किये। उसका ही परिणाम है कि आजतक मैं धन कमाने की दौड़ में न पड़कर समाज, राष्ट्र या सनातन धर्म के विषयों पर अपनी ऊर्जा पूरी निष्ठा से लगाता रहा हूं। अगर इसे अपने मुंह मियाँ मिट्ठू न माना जाऐ, तो देश में जो लोग मुझे जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मैंने प्रभु कृपा भारत में कई बार इतिहास रचा है। ये निर्भीकता और समाज के प्रति समर्पण का ये भाव इसीलिए आया क्योंकि मैंने पढ़ाई के साथ समाज का भी अध्ययन जारी रखा। अन्यथा मैं आज किसी तंत्र की नौकरी में जीवन बिताकर खाली बैठा होता। जैसा आईसीएस रहे श्री जेसी माथुर ने सेवानिवृत्त होने के बाद एक सुप्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका ‘दिनमान’ में एक श्रृंखला लिखी थी। जिसका मूल था कि ‘मैं आईसीएस में रहते हुए, एक मशीन का पुर्जा था, जिसका न दिल था, न दिमाग था’। 


कल का आईसीएस ही आज का आईएएस है। पिछले 40 वर्षों में मैं सैंकड़ों आईएएस अधिकारियों से संपर्क रहा है और मैं दावे से कह सकता हूं कि, वही आईएसएस अधिकारी जीवन में कुछ ठोस और रचनात्मक कार्य कर पाते हैं, जो अपनी नौकरी के मायाजाल के बाहर, समाज से जुड़कर सहज जीवन जीते हैं और अपनी संवेदनशीलता को मरने नहीं देते। बाकी तो पूरी जिंदगी अच्छी पोस्टिंग और प्रमोशन के चक्कर में ही काट देते हैं। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। पर आमतौर पर यही अनुभव रहा है। 


इसलिए मैं इस बात का समर्थक हूं कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। फिर वो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य हों, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य हों या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्में सीजेपी के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। प्रांतीय और केंद्र सरकार का ये दायित्व है कि वे छात्र राजनीति पर तब तक अंकुश न लगायें, जब तक कि वह हिंसात्मक या विध्वंसात्मक न हो। ऐसी छात्र राजनीति समाज की घुटन को ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में बाहर निकालती है और ये राज सत्ता के हित में ही होता है। इसलिए जब कभी देश का युवा सड़कों पर उतरे तो उसे गंभीरता से लिया जाए न कि दमनकारी रवैये से।  

Monday, October 13, 2025

जल संकट की दस्तक: अब दिल्ली से दूर नहीं

इस वर्ष देश भर में हुई भारी बारिशों और जल प्रलय के बावजूद भारत के शहरी क्षेत्रों में जल संकट अब कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि एक कठोर सच्चाई बन चुका है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु जैसे महानगर, जो आर्थिक प्रगति और आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक हैं, अब जल प्रबंधन की विफलता के गंभीर परिणाम झेल रहे हैं। हाल ही में दिल्ली के वसंत कुंज क्षेत्र में तीन बड़े मॉल और आसपास की कॉलोनियों में पानी की सप्लाई पूरी तरह ठप हो जाने से यह संकट फिर सुर्ख़ियों में आया। इन प्रतिष्ठानों को बंद करने की नौबत इसलिए आ गई है क्योंकि टैंकरों से इनकी जल आपूर्ति रुक गई, जबकि भूजल दोहन (ग्राउंड वॉटर बोरिंग) पर पहले से ही एनजीटी ने प्रतिबंध लगा रखा है। यह स्थिति केवल अस्थायी तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक और नैतिक संकट की ओर संकेत करती है। पिछले सात दशकों में खरबों रुपया जल प्रबंधन पर खर्च किए जाने के बावजूद ऐसा क्यों है? 


दिल्ली जैसे शहर में जहाँ जनसंख्या 2 करोड़ से अधिक है, जल आपूर्ति व्यवस्था लंबे समय से दबाव में है। दिल्ली जल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, शहर में प्रतिदिन करीब 1,000 मिलियन गैलन पानी की मांग है, जबकि उपलब्धता मुश्किल से 850 मिलियन गैलन तक पहुँच पाती है। वसंत कुंज जैसे पॉश इलाकों में भी पिछले कुछ वर्षों से पानी की टंकियों और निजी टैंकरों पर निर्भरता बढ़ी है। परंतु इस बार स्थिति पहले से कहीं अधिक भयावह हो गई क्योंकि प्रशासन ने सुरक्षा और ट्रैफिक कारणों से टैंकरों की आवाजाही पर रोक लगा दी। इस निर्णय का सबसे बड़ा असर व्यापारिक केंद्रों जैसे मॉल्स, रेस्तरां और दुकानों पर पड़ा है। इन मॉल्स में हज़ारों कर्मचारी काम करते हैं और प्रतिदिन लाखों ग्राहक आते हैं; बिना पानी के ऐसी व्यवस्था एक दिन भी नहीं चल सकती। शौचालय, सफाई, भोजनालय, अग्निशमन प्रणाली, सब कुछ जल आपूर्ति पर निर्भर हैं। जब टैंकरों की आपूर्ति रुकी, तो केवल व्यापार ही नहीं, आसपास के आवासीय समाज भी संकट में पड़ गए।



दिल्ली सरकार ने कुछ वर्ष पहले भूजल दोहन पर सख्त प्रतिबंध लगाया था। उद्देश्य यह था कि गिरते जलस्तर को रोका जाए। यह पहल पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक थी, क्योंकि लगातार बढ़ते दोहन ने दिल्ली के अधिकांश क्षेत्रों में भूजल को 300 फीट से भी अधिक नीचे पहुँचा दिया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या वैकल्पिक व्यवस्था पर्याप्त रूप से विकसित की गई?


जब सरकार ने ग्राउंड वॉटर बोरिंग को गैरकानूनी घोषित किया, तब उसे समानांतर रूप से मजबूत टैंकर नेटवर्क, पुनर्चक्रण संयंत्र और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम विकसित करने चाहिए थे। दुर्भाग्यवश, नीतियाँ बनीं पर उनका कार्यान्वयन अधूरा रह गया। परिणामस्वरूप, लोग न तो कानूनी तरीके से पानी निकाल सकते हैं, न सरकारी वितरण पर भरोसा कर सकते हैं। सोचने वाली बात ये है कि यदि जाड़ों में यह हाल है तो गर्मियों में क्या होगा?



दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में पानी की आपूर्ति से जुड़ा टैंकर कारोबार वर्षों से विवादों में रहा है। कई जगह यह सार्वजनिक सेवा से अधिक निजी व्यवसाय बन चुका है। अधिकारियों और टैंकर ठेकेदारों के बीच मिलीभगत के आरोप नए नहीं हैं। दिल्ली में जल आपूर्ति में आई यह हालिया बाधा भी ऐसे ही भ्रष्टाचार की परतें उजागर करती प्रतीत होती है।


त्योहारों के मौसम में जब पानी की मांग बढ़ जाती है, घरों में सजावट, साफ-सफाई और उत्सव आयोजन अधिक होते हैं।ऐसे समय पर टैंकरों की आवाजाही पर प्रतिबंध या ‘तकनीकी समस्या’ का बहाना बना देना संदेह उत्पन्न करता है। कई स्थानीय निवासियों का कहना है कि कुछ जल एजेंसियों ने टैंकरों की उपलब्धता को कृत्रिम रूप से सीमित कर कीमतें बढ़ाने की कोशिश की है। इससे न केवल आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा, बल्कि मॉल्स और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बंद करने की स्थिति आ गई। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का उदाहरण होगा। जल जैसी बुनियादी संपदा के साथ ऐसा बर्ताव किसी नागरिक समाज में अक्षम्य अपराध है।


भारत में जल नीति के कई स्तर हैं। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और नगरपालिका निकाय सब अपने ढंग से काम करते हैं। लेकिन इन सबमें तालमेल का अभाव है। राष्ट्रीय जल नीति (2012) यह कहती है कि हर नागरिक को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण जल मिलेगा, पर छोटे शहरों को तो छोड़ें, दिल्ली जैसे शहरों में भी वास्तविकता इसके उलट है। नगर पालिकाएँ रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की अनिवार्यता घोषित तो करती हैं, पर अधिकांश इमारतों में यह प्रणाली केवल कागज़ों पर मौजूद है। जल पुनर्चक्रण संयंत्रों की क्षमता भी इस संकट का सामना करने के लिए अपर्याप्त है। यमुना का प्रदूषण भी दिल्ली की जल आपूर्ति पर सीधा असर डालता है। यदि यमुना से शुद्ध जल नहीं मिलेगा, तो शहर को बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे राजनीतिक टकराव भी बढ़ते हैं।


हालाँकि नीति-निर्माण और कार्यान्वयन की बड़ी जिम्मेदारी सरकार पर है, नागरिक भी पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं। शहरी समाज में जल का अनावश्यक उपयोग आम बात है। बागवानी में अत्यधिक पानी, कार धोने में व्यर्थ बहाव, और रिसाव की अनदेखी। स्वच्छ भारत मिशन या हर घर जल जैसे अभियानों की सफलता तभी संभव है जब लोग खुद बदलाव का हिस्सा बनें। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और ग्रे-वॉटर रीसाइक्लिंग जैसे उपाय व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर अपनाए जा सकते हैं। मॉल्स और हाउसिंग सोसाइटीज़ में यह व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि टैंकरों पर निर्भरता घटे।


दिल्ली का वर्तमान संकट केवल एक चेतावनी है। आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएँ और बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक़, यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए तो 2030 तक देश के आधे बड़े शहर ‘जल-विहीन’ क्षेत्रों की श्रेणी में आ सकते हैं। इसलिए अब समय है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर दीर्घकालिक रणनीति अपनाएँ। गौरतलब है कि अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी पानी के अभाव के कारण मात्र 15 सालों में ही उजड़ गई थी। महानगरों में वर्षा जल संग्रहण प्रणाली को सख्ती से लागू करना। जल पुनर्चक्रण संयंत्रों की संख्या और क्षमता बढ़ाना। टैंकर संचालन को पारदर्शी और जीपीएस-नियंत्रित बनाना ताकि रिश्वतखोरी पर रोक लगे। यमुना जैसी नदियों की सफाई और पुनर्जीवन को प्राथमिकता देना। पानी की बर्बादी रोकने के लिए सख्त कानून और जनजागरूकता अभियान चलाना। इन कदमों के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जल प्रबंधन केवल संकट आने पर चर्चा का विषय न बने, बल्कि शहरी नियोजन की मूल नीति का हिस्सा हो। 


दिल्ली पर आई जल संकट की दस्तक यह याद दिलाता है कि पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जब-जब हम इसे समझने में चूक करते हैं, तो सभ्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। यदि सरकार और नागरिक समाज अब भी इस संकट को गंभीरता से नहीं लेते, तो ‘जल युद्ध’ भविष्य का नहीं, वर्तमान का शब्द बन जाएगा। जलसंकट का समाधान केवल योजनाओं से नहीं, ईमानदार नीयत और सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। 

 Corruption

Monday, November 25, 2024

उड़ता भारत


कुछ वर्ष पहले एक फ़िल्म आई थी ‘उड़ता पंजाब’, जिसमें दिखाया गया था कि प्रदेश सरकार की लापरवाही से पंजाब के घर-घर में मादक दवाओं का प्रयोग फैल गया है। जिसके चलते पंजाब कि पूरी युवा पीढ़ी तबाह हो रही है। जिनमें हर वर्ग के युवा शामिल हैं। ग़रीब-अमीर का कोई भेद नहीं। उस वक्त पंजाब में अकाली दल की सरकार थी, तो आम आदमी पार्टी ने सरकार को इस तबाही के लिए ज़िम्मेदार ठहराकर अपना चुनाव अभियान चलाया। इधर पिछले दस वर्षों से दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है, पर क्या ये सरकार दावे से कह सकती है कि दिल्ली में मादक पदार्थों की बिक्री सारे आम नहीं हो रही? कुछ महीने पहले हरियाणा के सोनीपत में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्थानीय डिग्री कॉलेज के छात्रों को नशीली दवाओं के सेवन के विरुद्ध भाषण दे रहे थे। तभी एक छात्र ने उनसे पूछा कि हमारे कॉलेज के बाहर पान की दुकान पर नशीली दवाएँ रात-दिन बिकती हैं तो आपकी पुलिस क्या कर रही है? जब हर युवा को पता है कि उनके शहर में कहाँ-कहाँ नशीली दवाएँ बिकती हैं तो आपका पुलिस विभाग इतना नकारा कैसे है कि वो इन बेचनेवालों को पकड़ नहीं पाता। पुलिस अधिकारी निरुत्तर हो गये।



मेरे एक पत्रकार मित्र ने 1996 में मुझे बताया था कि देश के एक प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने के मुखिया के विरुद्ध मादक दवाएँ अवैध रूप से उत्पादन करने और अफ़ग़ानिस्तान भेजने के आरोप पर उनकी जनहित याचिका सारे सबूतों के बावजूद दो दशकों से ठंडे बस्ते में पड़ी है। क्योंकि उस घराने के गहरे संबंध हर प्रमुख दल के बड़े नेताओं से हैं। सबको इस कांड का पता भी है। पर कोई कुछ नहीं करता।


उधर पिछले कुछ वर्षों से गुजरात के एक पोर्ट से बार-बार भारी मात्रा में नशीली दवाएँ पकड़ी जा रही हैं। पर इसके पीछे कौन है वो सामने नहीं आ रहा।आए दिन देश में ऐसी अनेकों खबरें आती रहती हैं कि करोड़ों के मूल्य के नशीले पदार्थ पकड़े जाते हैं। इन पकड़ी गई ड्रग्स की मात्रा इतनी ज़्यादा होती है कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये ड्रग्स देश भर में वितरण के लिये ही आई हैं। पर ये कारोबार बिना रोक टोक जारी है। जबकि सिंगापुर में ड्रग्स के विरुद्ध इतना सख़्त क़ानून है कि वहाँ ड्रग्स को छूने से भी ये लोग डरते हैं। क्योंकि पकड़े जाने पर सज़ा-ए-मौत मिलती है, बचने का कोई रास्ता नहीं। 



गृह मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, भोपाल, अमृतसर और चेन्नई, यूपी के हापुड़ और गुजरात के अंकलेश्वर तक ड्रग्स तस्करों का नेटवर्क का भांडाफोड़ हुआ है. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 13 दिनों में 13,000 करोड़ रुपये कीमत की कोकीन और 40 किलो हाइड्रोपोनिक थाईलैंड मारिजुआना जब्त की। इतना ही नहीं 2004 से 2014 के बीच जब्त की गई ड्रग्स का मूल्य 5,900 करोड़ रुपए था, जबकि 2014 से 2024 के बीच जब्त की गई ड्रग्स का मूल्य 22,000 करोड़ रुपये है।



दूसरी तरफ़ दुनियाँ भर में दादागिरी दिखाने वाला अमरीका जो ख़ुद को बहुत ताकतवर मानता है वहाँ ड्रग्स का खूब प्रचलन है। ज़ाहिर है ड्रग माफिया की पकड़ बहुत ऊँची है। यही हाल दुनियाँ के तमाम दूसरे देशों का है जहां इस कार्टल के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों को दबा दिया जाता है या ख़त्म कर दिया जाता है। चाहे वो व्यक्ति न्यायपालिका या सरकार के बड़े पद पर ही क्यों न हो।


सब जानते हैं कि इन नशीली दवाओं के सेवन से लाखों घर तबाह हो जाते है। औरतें विधवा और बच्चे अनाथ हो जाते हैं। बड़े-बड़े घर के चिराग़ बुझ जाते हैं। पर कोई सरकार चाहें केंद्र की हो या प्रांतों की इसके ख़िलाफ़ कोई  ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाती। 


सनातन धर्म का बड़े तीर्थ श्री जगन्नाथ पुरी हो या पश्चिमी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र गोवा, हिमाचल प्रदेश के पर्यटक स्थल कुल्लू, मनाली हो या धर्मशाला, भोलेनाथ की नगरी काशी हो या केरल का प्रसिद्ध समुद्र तटीय नगर त्रिवेंद्रम, राजधानी दिल्ली का पहाड़गंज इलाक़ा हो या मुंबई के फार्म हाउसों में होने वाली रेव पार्टियाँ, हर ओर मादक दवाओं का प्रचलन खुले आम हो रहा है। आज से नहीं दशकों से। हर आम और ख़ास को पता है कि ये दवाएँ कहाँ बिकती हैं, तो क्या स्थानीय पुलिस और नेताओं को नहीं पता होगा। फिर ये सब कारोबार कैसे चल रहा है? जिसमें करोड़ों रुपये के वारे न्यारे होते हैं। 


नशीली दवाओं में प्रमुख हैं: अफ़ीम, पोस्त और इनसे बनने वाली मॉर्फिन, कोडीन, हेरोइन या सिंथेटिक विकल्प मेपरिडीन, मेथाडोन। इनकी भारी लोकप्रियता का कारण है कि इनके सेवन से भय, तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है। सदा असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहने वाले कलाकार और फ़िल्मी सितारों में ये इसीलिए जल्दी पैठ बना लेती हैं। इनमें से कुछ उत्पाद मेडिकल साइंस में भी चिकित्सा के लिये उपयोग किए जाते हैं। जैसे दर्द निवारक दवा बनाने के लिए। पर इस छूट का ग़लत फ़ायदा उठाकर प्रायः दवा कंपनियाँ नशीली दवाओं के नेटवर्क का हिस्सा बन जाती हैं और अरबों रुपया कमाती हैं। ऐसे में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इस व्यापार को करने वाले न सिर्फ़ क़ानून का उल्लंघन कर रहे हैं बल्कि एक सामाजिक और नैतिक संकट को भी जन्म दे रहे हैं। ऐसे में यदि सरकार और संबंधित एजेंसियाँ सख़्ती नहीं दिखाएँगी तो ऐसे अपराध और अपराधी बढ़ते ही जाएँगे। 


ये सब बंद हो सकता है अगर केंद्रीय और प्रांतीय सरकारें अपने क़ानून कड़े बनायें और उन्हें सख्ती से लागू करें। अगर हर ज़िले के पुलिस अधीक्षक को ये आदेश मिले कि उसके ज़िले में ड्रग्स की बिक्री होती पायी गयी तो उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया जाएगा।फिर देखिए कैसे नशीली दवाओं का व्यापार बंद होता है। पर देश के जनता के हित में  ऐसा सोचने वाले नेता हैं ही कहाँ? अगर होते तो तपोभूमि भारत “उड़ता भारत कैसे बनती ?”  

Monday, August 19, 2024

क्या पुलिस बलात्कार रोक सकती है?


काम की जगह पर या देश में कभी भी कहीं भी महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ तेज़ी बढ़ती जा रही हैं। विशेषकर छोटी उम्र की बच्चियों का बलात्कार करके उनकी हत्या करने के मामले भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं। हमारे समाज का ये नासूर इतना गहरा है कि पिछले चार-पाँच दिनों में ही देश के अलग-अलग प्रांतों में हुई ऐसी वारदातों को सुनकर आपका कलेजा हिल जाएगा। 


पंजाब में एक युवा अपनी प्रेमिका को भगा करे ले गया तो उसकी प्रेमिका के घरवालों ने उस युवक की बहन के साथ सामूहिक बलात्कार किया। उत्तराखण्ड में एक नर्स अस्पताल से ड्यूटी ख़त्म कर घर जा रही थी तो उसके साथ बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी गई। तमिलनाडू के तंजोर ज़िले में 22 वर्षीय युवती का तीन मित्रों ने सामूहिक बलात्कार किया। उड़ीसा में एक मशहूर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर को दो मरीज़ों के बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। मुंबई के साकी नाका में 3 साल की बच्ची से 9 साल के लड़के ने बलात्कार किया। राजस्थान के जोधपुर में 11 साल की लड़की के साथ उसके पड़ोसी ने उससे बार-बार बलात्कार किया। हरियाणा में बलात्कार और हत्या के आरोपी राम रहीम को हर चुनाव के पहले पैरोल पर रिहा किया जा रहा है। इस तरह वो अब तक 235 दिन की आज़ादी का मज़ा ले चुका है। 



उत्तर प्रदेश में एक बाप ने अपने 13 साल की बेटी के साथ बलात्कार किया। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में एक सरकारी अफ़सर ने दलित लड़की के घर में उससे बलात्कार किया और पुलिस ने एक बुजुर्ग मौलाना को एक बच्ची से बलात्कार से कोशिश करते हुए गिरफ़्तार किया। बिहार में 14 साल की दलित लड़की को सामूहिक बलात्कार के बाद मुज़फ़्फ़रपुर में मार डाला गया। झारखंड में एक स्कूल बस ड्राइवर ने 3 साल की छात्र के साथ बलात्कार किया। कर्नाटक में एक अध्यापक ने 11 साल की बच्ची से बलात्कार की कोशिश की और गिरफ़्तार हुआ। ये सब हादसे पिछले चार पाँच दिनों में हुए हैं। इसके अलावा सैंकड़ों अन्य मामले दबा दिए जाते हैं और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के हज़ारों मामले रोज़ होते हैं। हमारे समाज की ये भयावह तस्वीर सिद्ध करती है कि हम घोर कलयुग में जी रहे हैं।


महिलाओं के साथ बलात्कार की ये सारी वारदातें देश भर में पिछले हफ़्ते में ही हुई हैं। क्या कहीं भी पुलिस या प्रांतीय सरकार इन बलात्कारों को रोक पायी? कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी डॉक्टर से हुई दरिंदगी की खबर ने देश भर में एक बार फिर महिला सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठा दिए हैं। देश भर में मेडिकल के छात्र दिल्ली के निर्भया काण्ड की तर्ज़ पर इस हादसे के खिलाफ सड़क पर उतरे हुए हैं। 



हर कोई पुलिस की नाकामी पर सवाल उठा रहा है। परन्तु सोचने वाली बात यह है कि क्या हमारे देश में इतना पुलिस बल है कि वो देश के हर नागरिक को सुरक्षित रख सकता है? जिस तरह कोलकाता पुलिस ने अपनी सूझबूझ और तत्परता से आरजी कर मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी महिला डॉक्टर के साथ दरिंदगी करने वाले मुख्य अभियुक्त संजय रॉय को हिरासत में लिया वो सराहनीय है। परन्तु इससे यह साबित नहीं होता कि पुलिस अपराध होने से पहले ही घटनास्थल पर पहुँच कर अपराध को रोक सकती थी।


यदि ऐसे अस्पतालों में या ऐसे ही किसी अन्य स्थान, में जहां नाईट शिफ्ट में महिलाओं की कर्मचारी मौजूद होती हैं, वहाँ पर सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त प्रबंध भी किए जाने चाहिए। उल्लेखनीय है कि प्रायः यहाँ पर आपको सीसीटीवी कैमरे लगे ज़रूर दिखाई देंगे। परंतु ये तो अपराध होने के बाद ही सहायक साबित होते हैं। लेकिन ऐसा कुछ होना चाहिए कि यदि इन स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की कंट्रोल रूम में निगरानी होती रहे और कैमरों के साथ एक अलार्म भी लगा हो। कंट्रोल रूम में बैठा सुरक्षाकर्मी किसी भी अप्रिय घटना को देखते ही अलार्म बजाए और तुरंत उस स्थान पर मदद भी पहुँचाए तो ऐसे अपराध होने से पहले रोके जा सकते हैं। ज़रूरत केवल लीक से हट कर सोचने की है। यदि ऐसा होता है तो देश में हज़ारों की तादाद में अस्पतालों, होटलों, स्कूल व कॉलेज में इसका प्रबंधन किया जा सकता है। ऐसा करने से रोज़गार के अतिरिक्त मौक़े भी उत्पन्न होंगे। अपराध पर भी नियंत्रण पाने में आसानी होगी।


कोई पुलिस या प्रशासन बलात्कार रोक नहीं सकता। क्योंकि इतने बड़े मुल्क में किस गांव, खेत, जंगल, कारखाने, मकान या सुनसान जगह बलात्कार होगा, इसका अन्दाजा कोई कैसे लगा सकता है? वैसे भी जब हमारे समाज में परिवारों के भीतर बहू-बेटियों के शारीरिक शोषण के अनेकों समाजशास्त्रीय अध्ययन उपलब्ध हैं तो यह बात सोचने की है कि कहीं हम दोहरे मापदण्डों से जीवन तो नहीं जी रहे? उस स्थिति में हमारे पुरूषों के रवैये में बदलाव का प्रयास करना होगा। जो एक लम्बी व धीमी प्रक्रिया है। समाज में हो रही आर्थिक उथल-पुथल, शहरीकरण, देशी और विदेशी संस्कृति का घालमेल और मीडिया पर आने वाले कामोत्तेजक कार्यक्रमों ने अपसंस्कृति को बढ़ाया है। जहाँ तक पुलिसवालों के खराब व्यवहार का सवाल है, तो उसके भी कारणों को समझना जरूरी है। 1980 से राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रिपोर्ट धूल खा रही है। इसमें पुलिस की कार्यप्रणाली को सुधारने के व्यापक सुझाव दिए गए थे। पर किसी भी राजनैतिक दल या सरकार ने इस रिपोर्ट को प्रचारित करने और लागू करने के लिए जोर नहीं दिया। नतीजतन हम आज भी 200 साल पुरानी पुलिस व्यवस्था से काम चला रहे हैं।


पुलिसवाले किन अमानवीय हालतों में काम करते हैं, इसकी जानकारी आम आदमी को नहीं होती। जिन लोगों को वीआईपी बताकर पुलिसवालों से उनकी सुरक्षा करवायी जाती है, ऐसे वीआईपी अक्सर कितने अनैतिक और भ्रष्ट कार्यों में लिप्त होते हैं, यह देखकर कोई पुलिसवाला कैसे अपना मानसिक संतुलन रख सकता है? समाज में भी प्रायः पैसे वाले कोई अनुकरणीय आचरण नहीं करते। पर पुलिस से सब सत्यवादी हरीशचंद्र होने की अपेक्षा रखते हैं। हममें से कितने लोगों ने पुलिस ट्रेनिंग कॉलेजों में जाकर पुलिस के प्रशिक्षणार्थियों के पाठ्यक्रम का अध्ययन किया है? इन्हें परेड और आपराधिक कानून के अलावा कुछ भी ऐसा नहीं पढ़ाया जाता जिससे ये समाज की सामाजिक, आर्थिक व मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को समझ सकें। ऐसे में हर बात के लिए पुलिस को दोष देने वाले नेताओं और मध्यमवर्गीय जागरूक समाज को अपने गिरेबां में झांकना चाहिए। 

Monday, April 1, 2024

मुख़्तार अंसारी की मौत से सबक़


माफिया डॉन के नाम से मशहूर और बरसों से जेल की सज़ा भुगत रहे पूर्व विधायक मुख़्तार अंसारी की पिछले सप्ताह मौत हो गई। पिछले कुछ सालों में एक के बाद एक माफ़ियाओं को रहस्यमय परिस्थितियों में मौत का सामना करना पड़ा है। फिर वो चाहे विकास दुबे की पलटी जीप हो या प्रयागराज के अस्पताल में जाते हुए तड़ातड़ चली गोलियों से ढेर हुए अतीक बंधु हों। अगर कोई यह कहे कि योगी आदित्यनाथ की सरकार साम, दाम, दंड, भेद अपनाकर उत्तर प्रदेश से एक एक करके सभी माफ़ियाओं का सफ़ाया करवा रही है या ऐसे हालात पैदा कर रही है कि ये माफिया एक एक करके मौत के घाट उतार रहे हैं, तो ये अर्धसत्य होगा। क्योंकि आज देश का कोई भी राजनैतिक दल ऐसा नहीं है जिसमें गुंडे, मवालियों, बलात्कारियों और माफ़ियाओं को संरक्षण न मिलता हो। फ़र्क़ इतना है कि जिसकी सत्ता होती है वो केवल विपक्षी दलों के माफ़ियाओं को ही निशाने पर रखता है अपने दल के अपराधियों की तरफ़ से आँख मूँद लेता है। ये सिलसिला पिछले पैंतीस बरसों से चला आ रहा है।



आज़ादी के बाद से 1990 तक अपराधी, राजनेता नहीं बनते थे। क्योंकि हर दल अपनी छवि न बिगड़े, इसकी चिंता करता था। पर ऐसा नहीं था कि अपराधियों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त न रहा हो। चुनाव जीतने, बूथ लूटने और प्रतिद्वंदियों को निपटाने में तब भी राजनेता पर्दे के पीछे से अपराधियों से मदद लेते थे और उन्हें संरक्षण प्रदान करते थे। 90 के दशक से परिस्थितियां बदल गईं। जब अपराधियों को ये समझ में आया कि चुनाव जितवाने में उनकी भूमिका काफ़ी महत्वपूर्ण होती है तो उन्होंने सोचा कि हम दूसरे के हाथ में औज़ार क्यों बनें? हम ख़ुद ही क्यों न राजनीति में आगे आएँ? बस फिर क्या था अपराधी बढ़-चढ़ कर राजनैतिक दलों में घुसने लगे और अपने धन-बल और बाहु बल के ज़ोर पर चुनावों में टिकट पाने लगे। इस तरह धीरे-धीरे कल के गुंडे मवाली आज के राजनेता बन गये। इनमें बहुत से विधायक और सांसद तो बने ही, केंद्र और राज्य में मंत्री पद तक पाने में सफल रहे। 



जब क़ानून बनाने वाले ख़ुद ही अपराधी होंगे तो अपराध रोकने के लिए प्रभावी क़ानून कैसे बनेंगे? यही वजह है कि चाहे दलों के राष्ट्रीय नेता अपराधियों के ख़िलाफ़ लंबे-चौड़े भाषण करें, चाहे पत्रकार राजनीति के अपराधिकरण को रोकने के लिए लेख लिखें और चाहे अदालतें राजनैतिक अपराधियों को कड़ी फटकार लगाएँ, बदलता कुछ भी नहीं है। योगी आदित्यनाथ अगर ये दावा करें कि उनके शासन में उत्तर प्रदेश अपराध मुक्त हो गया तो क्या कोई इस पर विश्वास करेगा? जबकि आए दिन महिलाएँ उत्तर प्रदेश में हिंसा और बलात्कार का शिकार हो रहीं हैं। पुलिस वाले होटल में घुस कर बेक़सूर व्यापारियों की हत्या कर रहे हैं और थानों में पीड़ितों की कोई सुनवाई नहीं होती। हाँ ये ज़रूर है कि सड़कों पर जो छिछोरी हरकतें होती थीं उन पर योगी सरकार में रोक ज़रूर लगी है। पर फिर भी अपराधों का ग्राफ़ कम नहीं हुआ। 



90 के दशक में आई वोरा समिति की रिपोर्ट अपराधियों के राजनेताओं, अफ़सरों व न्यायपालिका के साथ गठजोड़ का खुलासा कर चुकी है और इस परिस्थिति से निपटने के सुझाव भी दे चुकी है। बावजूद इसके आजतक किसी सरकार ने इस समिति की या 70 के दशक में बने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने में कोई रचीं नहीं दिखाई। ऐसी तमाम सिफ़ारिशें आजतक धूल खा रही हैं। 


ऐसा नहीं है कि सत्ता और अपराध का गठजोड़ आज की घटना हो। मध्य युग के सामंतवादी दौर में भी अनेक राजाओं का अपराधियों से गठजोड़ रहता था। ये तो प्रकृति का नियम है कि अगर समाज में ज़्यादातर लोग सतोगुणी या रजोगुणी हों तो भी कुछ फ़ीसद ही लोग तो तमोगुणी होते ही हैं। ऐसा हर काल में होता आया है। फिर भी सतोगुणी और रजोगुणी प्रवृत्ति के लोगों का प्रयास रहता है कि समाज की शांति भंग करने वाले या आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को नियंत्रित किया जाए, उन्हें रोका जाए और सज़ा दी जाए। यह सब होने के बावजूद भी समाज में अपराध होते हैं। क्योंकि आपराधिक प्रवृत्ति के  व्यक्ति को अपराध करना अनुचित नहीं लगता। उसके लिए यह सहज प्रक्रिया होती है। 


जब यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? तो युधिष्ठिर ने कहा कि हम रोज़ लोगों को काल के मुँह में जाते हुए देखते हैं पर फिर भी इस भ्रम में जीते हैं कि हमारी मौत नहीं आएगी। और इसीलिए हर तरह का अनैतिक आचरण और अपराध करने में संकोच नहीं करते। सोचने वाली बात यह है कि हर अपराधी की मौत अतीक अहमद, विकास दुबे या मुख़्तार अंसारी जैसी ही होती है। फिर भी हर अपराधी इसी भ्रम में जीता है कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वाल्मीकि जी डाकू थे। रोज़ लूट-पाट करते थे। एक दिन कुछ संत उनकी गिरफ़्त में आ गये। संतों ने डाकू वाल्मीकि से पूछा कि वो ये अपराध क्यों करता है? डाकू बोला अपने परिवार को प्रसन्न करने के लिए। इस पर संतों ने वाल्मीकि से कहा कि जिनके लिए तू ये पाप करता है क्या वे तेरे साथ इस पाप की सज़ा भुगतने को तैयार हैं? वाल्मीकि   को लगा कि इसमें क्या संदेह है, पर संतों के आग्रह पर वो अपने परिवार से ये सवाल पूछने गया तो परिवार जनों ने साफ़ कह दिया कि हम तुम्हारे पाप में भागीदार नहीं हैं। वाल्मीकि की आँखें खुल गयीं और वो डाकू से ऋषि वाल्मीकि बन गये। पुराणों और इतिहास के ये सभी उदाहरण उन अपराधियों के लिए हैं जो इस भ्रम में जीते हैं कि वे अमृत पी कर आए हैं और जो कर रहे हैं वो अपने परिवार की ख़ुशी के लिये ही कर रहे हैं। उनका यह भ्रम जितनी जल्दी टूट जाए उतना ही उनका और समाज का भला होगा।      

Monday, August 21, 2023

तीर्थों की भीड़ संभालें !

प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी व उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री योगी जी ने हिन्दू तीर्थों के विकास की तरफ जितना ध्यान पिछले सालों में दिया है उतना पिछली दो सदी में किसी ने नही दिया था। ये बात दूसरी है कि उनकी कार्यशैली को लेकर संतों के बीच कुछ मतभेद है। पर आज जिस विषय पर मैं अपनी बात रखना चाहता हूँ उससे हर उस हिन्दू का सरोकार है जो तीर्थाटन में रुचि रखता है। जब से काशी, अयोध्या, उज्जैन व केदारनाथ जैसे तीर्थ स्थलों पर मोदी जी ने विशाल मंदिरों का निर्माण करवाया है, तब से इन सभी तीर्थों पर तीर्थयात्रियों का सागर उमड़ पड़ा है। इतनी भीड़ आ रही है कि कहीं भी तिल रखने को जगह नही मिल रही।

इस परिवर्तन का एक सकारात्मक पहलू ये है कि इससे स्थानीय नागरिकों की आय तेज़ी से बढ़ी है और बड़े स्तर पर रोजगार का सृजन भी हुआ है। स्थानीय नागरिक ही नहीं बाहर से आकार भी लोगों ने इन तीर्थ नगरियों में भारी निवेश किया है। इससे यह भी पता चला है कि अगर देश के अन्य तीर्थ स्थलों का भी विकास किया जाए तो तीर्थाटन व पर्यटन उद्योग में भारी उछाल आ जायेगा। इस विषय में प्रांतीय सरकारों को भी सोचना चाहिए। जहाँ एक तरफ इस तरह के विकास के आर्थिक लाभ हैं वहीं इससे अनेक समस्याएँ भी पैदा हो रही हैं।



उदाहरण के तौर पर अगर मथुरा को ही लें तो बात साफ़ हो जाएगी। आज से 2 वर्ष पहले तक मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन व बरसाना आना-जाना काफ़ी सुगम था। जो आज असंभव जैसा हो गया है। कोविड के बाद से तीर्थाटन के प्रति भी एक नया ज्वार पैदा हो गया है। आज मथुरा के इन तीनों तीर्थ स्थलों पर प्रवेश से पहले वाहनों की इतनी लम्बी कतारें खड़ी रहती हैं कि कभी-कभी तो लोगों को चार-चार घंटे इंतज़ार करना पड़ता है। यही हाल इन कस्बों की सड़कों व गलियों का भी हो गया है। जन सुविधाओं के अभाव में, भारी भीड़ के दबाव में वृन्दावन में बिहारी जी मंदिर के आस-पास आए दिन लोगों के कुचलकर मरने या बेहोश होने की ख़बरें आ रही हैं। भीड़ के दबाव को देखते हुए आधारभूत संरचना में सुधार न हो पाने के कारण आए दिन दुर्घटनाएँ हो रही हैं। जैसे हाल ही में वृंदावन के एक पुराने मकान का छज्जा गिरने से पांच लोगों की मौत और पांच लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। अब नगर निगम ने वृन्दावन के ऐसे सभी जर्जर भवनों की पहचान करना शुरू किया है जिनसे जान-माल का खतरा हो सकता है। ऐसे सभी भवनों को प्रशासन निकट भविष्य में मकान-मालिकों से या स्वयं ही गिरवा देगा, ऐसे संकेत मिल रहे हैं। ये एक सही कदम होगा। पर इसमें एक सावधानी बरतनी होगी कि जो भवन पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं या जिनकी वास्तुकला ब्रज की संस्कृति को प्रदर्शित करती है, उन्हें गिराने की बजाय उनका जीर्णोद्धार किया जाना चाहिए।



इस सन्दर्भ में यह बात भी महत्वपूर्ण है कि जो नए निर्माण हो रहे हैं या भविष्य में होंगे उनमें भवन निर्माण के नियमों का पालन नही हो रहा। जिससे अनेक समस्याएँ पैदा हो रही हैं। इस पर कड़ाई से नियंत्रण होना चाहिए। पिछले दिनों यमुना जी की बाढ़ ने जिस तरह वृन्दावन में अपना रौद्र रूप दिखाया उससे स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने यमुना डूब क्षेत्र में हुए सभी अवैध निर्माण गिराने के आदेश दिए हैं। फिर वो चाहें घर हों, आश्रम हों या मंदिर हों। स्थानीय नागरिकों का प्रश्न है कि यमुना के इसी डूब क्षेत्र में हाल के वर्षों जो निर्माण सरकारी संस्थाओं ने बिना दूर-दृष्टि के करवा दिए क्या उनको भी ध्वस्त किया जायेगा?


जहाँ तक तीर्थ नगरियों में भीड़ और यातायात को नियंत्रित करने का प्रश्न है इस दिशा में प्रधान मंत्री मोदी जी को विशेष ध्यान देना चाहिए। हालांकि यह विषय राज्य का होता है लेकिन समस्या सब जगह एक सी है। इसलिए इस पर एक व्यापक सोच और नीति की ज़रूरत है, जिससे प्रांतीय सरकारों को हल ढूँढने में मदद मिल सके। वैसे आन्ध्र प्रदेश के तीर्थ स्थल तिरुपति बालाजी का उदाहरण सामने है जहाँ लाखों तीर्थयात्री बिना किसी असुविधा के दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं। जबकि मुख्य मंदिर का प्रांगण बहुत छोटा है और उसका विस्तार करने की बात कभी सोची नही गई। इसी तरह अगर काशी, मथुरा व उज्जैन जैसे तीर्थ नगरों की यातायात व्यवस्था पर इस विषय के जानकारों और विशेषज्ञों की मदद ली जाए तो विकराल होती इस समस्या का हल निकल सकता है।


तीर्थ स्थलों के विकास की इतनी व्यापक योजनाएँ चलाकर प्रधान मंत्री मोदी जी ने आज सारी दुनिया का ध्यान सनातन हिन्दू धर्म की ओर आकर्षित किया है। स्वाभाविक है कि इससे आकर्षित होकर देशी पर्यटक ही नही बल्कि विदेशों से भी भारी मात्रा में पर्यटक इन तीर्थ नगरों को देखने आ रहे हैं। अगर उन्हें इन नगरों में बुनियादी सुविधाएँ भी नही मिलीं या भारी भीड़ के कारण परेशानियों का सामना करना पड़ा, तो इससे एक ग़लत संदेश जायेगा। इसलिए तीर्थों के विकास के साथ आधारभूत ढांचे के विकास पर भी ध्यान देना चाहिए। केंद्र और राज्य की सरकारें हमारे धर्मक्षेत्रों को सजाएं-संवारें तो सबसे ज्यादा हर्ष हम जैसे करोड़ों धर्म प्रेमियों को होगा, पर धाम सेवा के नाम पर, अगर छलावा, ढोंग और घोटाले होंगे तो भगवान तो रुष्ट होंगे ही, भाजपा की भी छवि खराब होगी।


2008 से मैं, अपने साप्ताहिक लेखों में मोदी जी के कुछ अभूतपूर्व प्रयोगों की चर्चा करता रहा हूँ जो उन्होंने गुजरात का मुख्य मंत्री रहते हुए किये थे। जैसे हर समस्या के हल के लिए उसके विशेषज्ञों को बुलाना और उनकी सलाह को नौकरशाही से ज्यादा वरीयता देना। ऐसा ही प्रयोग इन तीर्थ नगरों के लिए किया जाना चाहिए क्योंकि कानून-व्यवस्था की दैनिक जिम्मेदारी में उलझा हुआ जिला-प्रशासन इस तरह की नई जिम्मेदारियों को सँभालने के लिए न तो सक्षम होता है और न उसके पास इतनी ऊर्जा और समय होता है। इसलिए समाधान गैर-पारंपरिक तरीकों से निकला जाना चाहिए। 

Monday, April 17, 2023

क्यों उठते हैं एनकाउंटर पर सवाल?


उत्तर प्रदेश के व्यापारी आजकल कहते हैं कि योगी राज में मुसलमानों का आतंक ख़त्म हो गया है। इसलिये माफिया डॉन अतीक अहमद के बेटे असद अहमद की एनकाउंटर में मौत का समाचार उन लोगों को सुखद लगा। एनकाउंटर के विषय में कुछ तथ्य और क़ानूनी पेचीदगियों का ज़िक्र मैं इस लेख में आगे करूँगा। पर यहाँ एक सवाल जो समाजवादी पार्टी ने उठाया है वो भी महत्वपूर्ण है। वो ये कि ऐन चुनावों के पहले ही इस एनकाउंटर को करने का योगी सरकार का क्या उद्देश्य था? सिवाय इसके कि इस एनकाउंटर की खबर को दिन-रात टीवी चैनलों पर चलवाकर इसका फ़ायदा अगले महीने होने वाले निकायों के चुनावों में लिया जाए। इसलिये सरकार की नीयत पर शक होता है। क़ानून की नज़र में सब बराबर होने चाहिए। किसी अपराधी का कोई जाति या धर्म नहीं होता। इसलिए बिना भय और पक्षपात के अगर प्रदेश के माफ़ियाओं के विरुद्ध योगी सरकार कड़े कदम उठाती है तो उसका स्वागत ही होगा। पर ऐसे कदम सब अपराधियों पर एक समान उठाए जाने चाहिए, जो आज नहीं हो रहा है। हत्या, बलात्कार और पुलिस उत्पीड़न के शिकार कितने ही लोगों को न्याय नहीं मिल रहा। फ़रियादी हताश होकर आत्महत्या तक कर रहे हैं ऐसी खबरें अक्सर सामने आती रहती है। उत्तर प्रदेश के एक विशेष जाति के माफ़ियाओं की सूची आज कल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है जिसमें योगी सरकार से पूछा जा रहा है कि इन माफ़ियाओं के विरुद्ध आजतक ‘बुलडोज़रनुमा’ कार्यवाही क्यों नहीं हुई? उनमें से किसी का एनकाउंटर क्यों नहीं होता? उत्तर प्रदेश सरकार की इस नीति के विरुद्ध भी बहुत लोगों को आक्रोश है।



एनकाउंटर उमेश पाल के आरोपियों का हो या किसी अन्य का जब भी उस पर सवाल उठते हैं तो मामला जाँच कमेटी के पास पहुँचता है। आपको याद होगा कि कुछ ही समय पहले नवंबर 2019 में तेलंगाना राज्य के हैदराबाद में हुए गैंगरेप और हत्या के चार अभियुक्तों के संदिग्ध एनकाउंटर को सर्वोच्च न्यायालय की जाँच समिति ने फ़र्ज़ी पाया। जाँच समिति द्वारा इन पुलिसवालों पर हत्या का मुक़द्दमा चलाने की सिफ़ारिश भी की गई। 


पाठकों को याद होगा कि जब यह एनकाउंटर हुआ था, तब लोगों ने पुलिस का समर्थन करते हुए भारी जश्न मनाया था। जैसा असद व अन्य आरोपियों के एनकाउंटर पर भी हो रहा है। वहीं दूसरी ओर हमेश की तरह पुलिस एनकाउंटर पर तमाम सवाल भी खड़े हो रहे हैं। प्रायः ऐसा मान लिया जाता है कि पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटर फ़र्ज़ी ही होते हैं। एनकाउंटर कब और कैसे होते हैं इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं देता। 


क़ानून की बात करें तो देश में मौजूद भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और दण्ड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) दोनों में ही एनकाउंटर का कोई भी ज़िक्र नहीं है। तो फिर सवाल उठता है कि पुलिस एनकाउंटर आख़िर है क्या? यदि कोई भी पुलिसकर्मी आत्मरक्षा में सामने वाले पर गोली चलाता है तो उसे सामान्य भाषा में एनकाउंटर माना जाता है। तो क्या पुलिस किसी भी अपराधी पर आत्मरक्षा में गोली चला सकती है? नहीं ऐसा नहीं है। 



जब कभी भी पुलिस को किसी अपराधी के बारे में सूचना मिलती है और वह उसे गिरफ़्तार करने जाती है, तो अगर वो अपराधी आत्मसमर्पण कर देता है तब पुलिस उस पर बल प्रयोग नहीं कर सकती। यदि कोई कुख्यात अपराधी, जिसे उम्र क़ैद या उससे ज़्यादा सज़ा हो सकती है और वो गिरफ़्तारी से बचने के लिए भागने का प्रयास करता है और पुलिस उसे पकड़ नहीं पाती, तो उस सूरत में पुलिस उसे ज़ख़्मी करने की नियत से उसके शरीर के किसी भी हिस्से में गोली मार सकती है। प्रायः ये गोली उसकी टांगों में मारी जाती है। जिससे वह ज़्यादा दूर न भाग सके और उसे गिरफ़्तार कर लिया जाए। यदि ऐसे किसी अपराधी के पास कोई जान लेवा हथियार होता है और वो पुलिस पर वार करता है, तो केवल उस सूरत में पुलिस उस पर आत्मरक्षा में गोली चला सकती है। 


मुंबई पुलिस के बहुचर्चित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट दया नायक और प्रदीप शर्मा से जब किसी पत्रकार ने पूछा कि मुंबई में अपराधियों की सफ़ाई के लिए आप दोनो को ही श्रेय दिया जाता है तो, उनका कहना था कि, “हम तो अपराधियों को पकड़ने के लिए ही जाते हैं, लेकिन वो जब हम पर वार करते हैं तो हमें भी पलटवार करना पड़ता है।” अपराधियों को भी पता है कि यदि वो पुलिस के हत्थे चढ़े तो कई सालों तक जेल के बाहर नहीं आएँगे। इसलिए इन सब से बच कर भागने के प्रयास में वे पुलिस की गोली का शिकार हो जाते हैं। उनके अनुसार 97-98 में जब मुंबई में गैंगस्टरों का आतंक चरम पर था तब सरकार कड़े क़ानून ले कर आई। अपराधी इन्हीं कड़े क़ानूनों से बचने की पुरज़ोर कोशिश में मारा जाता है। इसी के बाद से मुंबई के अंडरवर्ल्ड में एनकाउंटर का भय बढ़ने लगा। कारण चाहे कुछ और भी रहे हों पर मुंबई में गैंगस्टरों का आतंक थमने लगा।    



पुलिस एनकाउंटर को बॉलीवुड की कई फ़िल्मों में भी दिखाया गया हैं। जहां ज़्यादातर एनकाउंटर को ऐसे दर्शाया जाता है कि भले ही वो एनकाउंटर फ़र्ज़ी हो, लेकिन जाँच में असली ही पाया जाए। लेकिन यदि किसी भी एनकाउंटर की योजना ग़लत नीयत से की जाती है तो वो आज नहीं तो कल पकड़ा ही जाता है। 


इस बात के कई प्रमाण भी हैं जहां फ़र्ज़ी एनकाउंटर करने पर पुलिस वालों को सज़ा भी हुई है। इसका मतलब यह नहीं होता कि सभी एनकाउंटर फ़र्ज़ी होते हैं। जनता में पुलिस पर विश्वास की कमी होने के कारण ऐसी धारणा बन जाती है की ज़्यादातर एनकाउंटर फ़र्ज़ी होते हैं। 


एक पूर्व आईपीएस अधिकारी ने दिल्ली में 2008 के बाटला हाउस एनकाउंटर का हवाला देते हुए बताया कि, पुलिस को ज़्यादातर मामलों में इस बात का पता होता है कि वो जहां गिरफ़्तारी करने जा रही हैं वहाँ कितना ख़तरा हो सकता है। ऐसे एनकाउंटर को एक सुनियोजित एनकाउंटर कहा जाता है। ऐसे एनकाउंटर में पुलिस की टीम पूरी तैयारी के साथ जाती है। 


बाटला हाउस में सब जानकारी के बावजूद दिल्ली पुलिस के एक बहादुर अफ़सर मोहन चंद शर्मा शहीद हुए थे। पुलिस एनकाउंटर में काफ़ी ख़तरा होता है। पुलिसकर्मी भी घायल होते हैं, परंतु ऐसा मान लेना कि सभी एनकाउंटर फ़र्ज़ी होते हैं सही नहीं। दोषियों को सज़ा देना अदालत का काम होता है न कि पुलिस का। लेकिन पुलिसकर्मी यदि आत्मरक्षा में गोली चलाता है तो उसे हमेशा ग़लत नहीं समझना चाहिए। 


एनकाउंटर करने के लिए जिन अनुभवी पुलिसकर्मियों को चुना जाता है, उन्हें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहा जाता है। एनकाउंटर जोखिम भरा होता है और ऐसा जोखिम हर कोई नहीं ले सकता। उसके लिए हथियारों को सही ढंग से चलाना और सामने वाले से बेहतर निशाना लगाना आना चाहिए। परंतु ऐसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रायः विवादों में भी घिरे रहते हैं। जिस तरह हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी तरह कुछ एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के घमंड और कभी-कभी उसके भ्रष्टाचार के चलते हर पुलिस एनकाउंटर को शक की निगाह से ही देखा जाता है। ख़ासकर जब राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के पाले हुए गुंडों का एंकाउंटर होता है तब तो जनता के मन में ऐसे ही सवाल उठते हैं कि ऐसे सभी एनकाउंटर फ़र्ज़ी होते हैं। परंतु सच्चाई तो जाँच के बाद ही सामने आती है।