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Monday, June 1, 2026

गर्मियों में बिजली की आपूर्ति कैसे हो ?

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने जनता से बिजली की खपत कम करने की अपील की है। हालांकि उन्होंने यह भी आश्वासन दिया है कि बिजली की आपूर्ति में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी। उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली मिलेगी। उनका यह आश्वासन सराहनीय है। मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। इसी हफ़्ते टीवी पर एक शो में बहस के दौरान पत्रकारों ने बताया कि नोएडा में बिजली का भारी संकट चल रहा है। बहुमंजलीय इमारतों में रहने वाले लोग भी बेहाल हैं। क्योंकि उन्हें पॉवर बैक-अप नहीं मिल रहा। उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों में बिजली कमी को लेकर जगह-जगह जन-आंदोलन चल रहे हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश में बिजली के ‘स्मार्ट मीटर’ का बड़ा घोटाला भी सामने आया है। इन मीटरों को लगवाने का निर्णय योगी सरकार के पहले कार्यकाल में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के नेतृत्व में लिया गया था। इन मीटरों को लेकर जनता की शुरू से ही यह शिकायत रही है कि उनके बिल खपत से कई गुना ज़्यादा आ रहे हैं। अब जब पानी सर के ऊपर से गुज़र गया तो उत्तर प्रदेश की त्रस्त जनता ने ‘स्मार्ट मीटर’ उखाड़ कर फेंकने शुरू कर दिए और आक्रोशित जनता सड़कों पर उतर आई। योगी सरकार ने अब इन मीटरों को ना लगाने का फ़ैसला किया है।


वैसे तो हर साल गर्मियों में खास कर कर उत्तर भारत में बिजली का संकट बहुत बढ़ जाता है। क्योंकि बांधों में जल का स्तर तेज़ी से घटता है और नदियाँ भी सूखने लगती हैं। कारण पहाड़ों पर चल रहे सड़कों के विस्तार ने वृक्षों की अंधाधुंध कटाई की है। जिससे वर्षा की मात्रा तेज़ी से गिर गई है। पहाड़ ही क्यों मैदानों में भी जंगलों की अविवेकपूर्ण कटाई ने देश का हरित क्षेत्र  खतरनाक स्तर तक कम कर दिया है। जब ज़्यादा हरियाली होती है तो वातावरण में नमी पैदा होती है और उससे वर्षा होती है। 



उधर अमरीका-इसराइल-इराक़ युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो, इन युद्धों में जो गोला बारूद रात-दिन आग उगल रहा है, उससे भी ‘ग्लोबल वार्मिंग’ बढ़ रही है। इसका प्रमाण है, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर तेज़ी से घटते हिमखंड। कुछ वर्ष पहले तक यूरोप के लोग गर्मी का नाम ही नहीं जानते थे। वहाँ के घरों में पंखे या एसी नाम का उपकरण नहीं लगाया जाता था। आज यूरोप के इन देशों को भीषण गर्मी की मार झेलनी पड़ रही है। पर किसी भी देश की सरकार पर्यावरण के इस मुद्दे पर गंभीरता से कोई ठोस काम नहीं कर रही।


अगर बिजली की खपत पर लौट कर आएँ तो योगी जी की ये चिंता निर्मूल नहीं है। एक ज़माने में ख़स के पर्दे से ही भवन ठण्डे किए जाते थे। फिर कूलर का दौर आया और आज तो घर-घर ए सी लग गए हैं। पर ए सी की जितनी खपत आम नागरिक करते हैं उससे कई गुना ज़्यादा सरकारी और व्यवसायिक प्रतिष्ठान करते हैं। योगी जी अगर अपने मंत्रालयों के भवनों का औचक निरीक्षण करें तो पाएंगे कि जब अफ़सर और बाबू कमरों में नहीं होते तब भी वहाँ कई-कई ए सी फालतू चलते रहते हैं। यही हाल अन्य प्रांतों के सरकारी दफ्तरों का भी होता है। इसलिए बिजली की खपत कम करने की पहल जितनी नागरिकों की तरफ़ से ज़रूरी है, उतनी ही शासक वर्ग से भी है।



हाइड्रो पॉवर या थर्मल पॉवर की बिजली बनाने की अनेकों सीमाएँ हैं। इनसे उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। बिजली की आपूर्ति को सुनिश्चित करने का सबसे बढ़िया उपाय है, सोलर एनर्जी। भारत जैसे विशाल भूभाग वाले क्षेत्र में भवनों की छतों पर सोलर पैनल लगा कर प्रदूषण मुक्त बिजली पैदा की जा सकती है। चीन इस दिशा में बहुत आगे बढ़ गया है। वो अपनी आवश्यकता से कहीं ज़्यादा बिजली सोलर पैनलों से पैदा कर रहा है। कोचीन का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पूरी तरह सोलर एनर्जी पर निर्भर है। इसलिए शेष प्रांतों में भी इस दिशा में तीव्रता से काम करने की ज़रूरत है। 



उल्लेखनीय है कि मई 2026 में उत्तर प्रदेश ने 31,824 MW का रिकॉर्ड पीक डिमांड पूरा करने का दावा किया है। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे राष्ट्रीय रिकॉर्ड बताते हुए कहा कि शहरों में 24 घंटे और गांवों में 18-22 घंटे बिजली दी जा रही है। केंद्र सरकार भी पूरे देश में 270 GW से अधिक पीक डिमांड को सफलतापूर्वक पूरा करने का दावा कर रही है। 2012 के बड़े ब्लैकआउट की तुलना में यह प्रगति प्रभावित करती है, लेकिन इन आंकड़ों की चमक जमीनी हकीकत को छुपा नहीं पा रही।


वास्तविकता यह है कि यूपी में ललितपुर व घाटमपुर जैसे थर्मल प्लांटों के बंद पड़े रहने से बिजली का संकट गहराया है। कोयला आपूर्ति की कमी और ट्रांसमिशन-डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के पुरानेपन ने स्थिति और बिगाड़ दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 6-12 घंटे तक बिजली गुल रहने की शिकायतें आम हैं। लखनऊ, गोंडा, वाराणसी जैसे शहरों में भी रात के समय बिजली की कटौती हो रही है। यहां तक कि भाजपा के विधायक भी इस मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। 


सरकार का दावा है कि मांग बढ़ने के कारण समस्या है, न कि उत्पादन की कमी। लेकिन सवाल उठता है कि जब हर साल गर्मी आती है और मांग बढ़ती है, तो तैयारी क्यों नहीं होती? पिछले वर्षों में क्षमता में वृद्धि हुई है, लेकिन वितरण व्यवस्था में सुधार अपर्याप्त रहा। ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर, पुरानी लाइनें और शाम के समय सोलर जनरेशन घटने के बाद की कमी को प्रबंधित करने की ठोस योजना नजर नहीं आती। ऊर्जा एक्सचेंज से भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही । क्योंकि पूरे उत्तर भारत में बिजली की मांग समान रूप से बढ़ी हुई है।


यह संकट केवल गर्मी का नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का भी है। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद, बैटरी स्टोरेज और स्मार्ट ग्रिड पर पर्याप्त निवेश नहीं हुआ। किसान, छोटे उद्योग और आम घरेलू उपभोक्ता सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। गर्मी में बिजली न होने से स्वास्थ्य, पानी की आपूर्ति और आजीविका सब प्रभावित हो रही है।


सरकार को अब संख्याओं से आगे बढ़कर समाधान पर ध्यान देना चाहिए। थर्मल प्लांटों का तुरंत रखरखाव, नई ट्रांसमिशन लाइनों का तेजी से निर्माण, डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का आधुनिकीकरण और मांग प्रबंधन की बेहतर रणनीति जरूरी है। ‘24x7 बिजली’ के बड़े-बड़े दावे तब तक खोखले रहेंगे, जब तक जनता को राहत न मिले।


विद्युत क्षेत्र में प्रगति निश्चित रूप से हुई है, लेकिन संकट के समय यह प्रगति जनता तक नहीं पहुंच रही। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी भारी है। सरकार को अब दावों से हटकर वास्तविक सुधार पर ध्यान देना होगा, अन्यथा गर्मी के साथ-साथ जनाक्रोश भी बढ़ता रहेगा।

Monday, September 1, 2025

‘गुमनामी बाबा’ के कमरे से निकले सामान ख़ास क्यों हैं?

पिछले हफ़्ते नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विषय में इस कॉलम में जो मैंने लिखा था उस पर बहुत प्रतिक्रियाएँ आई हैं। पाठकों को और जानने की उत्सुकता है। इस विषय में यूट्यूब पर तमाम इंटरव्यू व रिपोर्ट्स हैं। वहाँ आप ‘गुमनामी बाबा’ या सुभाष चंद्र बोस’ टाइप करके उन्हें देख सकते हैं। विशेषकर अनुज धर, चंद्रचूड़ घोष, शक्ति सिंह, डॉ दिनेश सिंह तोमर, आदि के इंटरव्यू व ज़ी टीवी पर एक ‘गुमनामी बाबा का बॉक्स नंबर 26’ जैसी रिपोर्ट्स देख, सुनकर आप दंग रह जाएँगे। 


पिछले लेख में मैंने उनके कमरे से मिली 2760 वस्तुओं में से कुछ का ज़िक्र किया था। यहाँ उन सामानों में से कुछ और का विस्तार से वर्णन कर रहा हूँ। ये सूची इतनी प्रभावशाली है कि केवल साधना करने वाले संत का सामान नहीं हो सकता। आप सोचने पर मजबूर हो जाएँगे कि ‘गुमनामी बाबा’ अगर नेताजी सुभाष चंद्र बोस नहीं थे तो और कौन थे? ये सूची जब मैंने देश के एक सबसे बड़े पुलिस अधिकारी रहे सज्जन को पढ़वाई तो वे भी दंग रह गए। 



‘गुमनामी बाबा’ के कमरे में अंग्रेज़ी, बंगला व संस्कृत साहित्य की 304 पुस्तकें मिली हैं। वहीं 260 आध्यात्मिक पुस्तकें भी मिली हैं। मेडिकल साइंस पर 118, राजनीति व इतिहास पर 57, रहस्य और तंत्रशास्त्र पर 46, रामायण व महाभारत पर 36, सुभाष चन्द्र बोस पर 34, यात्रा वृतांत ग्रन्थ 33 व ज्योतिष और हस्तरेखा विज्ञान पर 12 पुस्तकें मिली हैं। अब ज़रा अंग्रेज़ी की पुस्तकों के लेखकों नाम और उनके लिखे ग्रंथों की संख्या देखिए, चार्ल्स डिकेंस (51), अलेक्सांद्र सोल्जेनित्सिन (11), विल ड्यूरांट (11), शेक्सपियर का लिखा सम्पूर्ण साहित्य व 9 नाटक, टी. लोबसांग रम्पा (10), वाल्टर स्कॉट (8), अलेक्जेंडर डुमास (8), एरिक वॉन डेनिकेन (4), पीजी वोडहाउस (3), कुलदीप नैयर (3) आदि पुस्तकें उनके बक्सों और अलमारी से निकली हैं। ऐसे उच्च कोटि के विश्वविख्यात साहित्य को पढ़ने वाला कोई भजनानंदी साधु नहीं हो सकता। सभी जानते हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक संपन्न व कुलीन परिवार से थे। आईसीएस (वर्तमान में आईएएस) की परीक्षा में, 1920 में उनकी चौथी रैंक आई थी। आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए 1921 में उन्होंने इतनी बड़ी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था।



उपरोक्त साहित्य के अलावा, उनके कमरे से रीडर्स डाइजेस्ट, अमरीकी पत्रिका टाइम, इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया, ब्लिट्ज, ऑर्गेनाइजर, जुगवाणी, द पायनियर, आज, अमृत प्रभात, अमृत बाज़ार पत्रिका, आनंद बाज़ार पत्रिका, दैनिक जागरण, द स्टेट्समैन, टेलीग्राफ, टाइम्स ऑफ़ इंडिया व अमर उजाला जैसी तमाम प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ और अख़बार भी मिले हैं। 



उनके बक्से में से उनके परिवार व निकट के लोगों के 110 चित्र मिले हैं। जिनमें नेताजी के माता-पिता का फ्रेम करा हुआ चित्र, मखमली कपड़े में लिपटा हुआ उनके बक्से में रखा था। श्री शक्ति सिंह के अयोध्या स्थित घर, ‘राम भवन’ के जिस कमरे में गुमनामी बाबा रहते थे, उसमें दीवार पर माँ काली का चित्र टंगा था। जिनकी वे रोज़ धूप-बत्ती जला कर पूजा करते थे। रोचक बात यह है कि 23 जनवरी को देश भर में जहां भी उनका जन्मदिन मनाया जाता था उसकी ख़बरों में से सुभाष चंद्र बोस की फोटो निकाल कर संग्रह की गई हैं। इसी बक्से से नेताजी की बचपन से मित्र रहीं और क्रांतिकारी संगठन की नेत्री सुश्री लीला रॉय, पंडित नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद और महात्मा गांधी के चित्र भी मिले हैं।  



उनके संगीत संग्रह में महिषासुरमर्दनी स्रोत की रिकॉर्डिंग, रवींद्र संगीत, नज़रुल इस्लाम, श्यामा संगीत, केएल सहगल, ज्योतिका रॉय, उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ान, पं रवि शंकर का सितार वादन, बिस्मिल्लाह ख़ाँ की शहनाई, नेताजी के बचपन से मित्र और मशहूर गायक दिलीप कुमार रॉय के गाए गीत, हेमंत कुमार के गीत, पन्नालाल घोष, लालन फ़क़ीर आदि की गायकी के रिकॉर्ड भी मिले हैं। इसके अलावा बॉलीवुड की फ़िल्म ‘सुभाष चंद्र बोस’ का पूरा साउंडट्रैक भी मिला है। 



इंग्लैंड के टाइपराइटर और जर्मनी की बनी दूरबीन, जापानी क्रॉकरी, दो महंगी घड़ियाँ जिनमें से एक सोने की बनी ओमेगा घड़ी बिल्कुल वैसी है जैसी नेताजी की माँ ने उन्हें जन्मदिन पर भेंट की थी, जिसे वो अक्सर पहना करते थे। दूसरी महंगी घड़ी रोलेक्स की है। गोल फ्रेम के 8 चश्में जिसमें से एक का फ्रेम शायद सफेद सोने का है। इन सब सामानों में सबसे भावुक वस्तु है नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पिता श्री जानकी नाथ बोस की एक पुरानी छतरी जो, उनकी यादगार के प्रतीक रूप में गुमनामी बाबा ने सहेज कर रख रखी थी। इस छतरी को नेता जी के भतीजी ललिता बोस ने पहचाना। 


उनके काग़ज़ों में अयोध्या व काशी के विस्तृत नक्शे, भारत के सड़क मार्गों व फौजी ठिकानों के नक्शे, मध्य एशिया, मध्य पूर्व एशिया व दक्षिण पूर्व एशिया के नक्शे, जिन्हें हाथ से बनाया गया था, भी वहाँ बरामद हुए हैं। उनके सबसे प्रिय साथी पवित्र मोहन रॉय की संपत्तियों के नक्शे व एक अन्य साथी अतुल कृष्ण गुप्तो की ढाका में छूट गई संपत्ति के नक्शे आदि भी मिले हैं। 


उनके रहन-सहन के स्तर दर्शाते हुए उनके कमरे से नहाने के 75 साबुन मिले हैं, जो महंगे ब्रांड के हैं, जैसे यार्डले, क्यूटीक्यूरा, पियर्स, पोंड्स, लेवेंडर व ड्यू आदि। सबको मालूम है कि सुभाष चंद्र बोस ‘चेन स्मोकर’ थे। वे लगातार सिगरेट पीते थे। उनके सामानों में ‘गोल्ड फ्लैक’ व ‘इंडिया किंग्स’, सिगरेट के कई पैकेट, रोल बनाकर सिगरेट बनाने वाले काग़ज़ के 15 पैकेट व इन काग़ज़ों में भरने वाले तंबाकू के पैकेट और इनको लपेट कर सिगरेट बनाने वाली छोटी सी मशीन, जो इंग्लैंड की बनी हुई है। 3 विदेशी पाइप व तम्बाकू के पैकेट, सिगरेट जलाने वाले लाइटर भी मिले हैं। उनके कमरे में अंग्रेज़ी व बंगला में हस्त लिखित 1683 पत्र भी मिले हैं। दो भारतीय और एक अमरीकी हस्तलेखन विशेषज्ञों ने यह प्रमाणित किया है कि इन पत्रों पर पाई जाने वाली लिखाई 1935-36 की नेताजी सुभाष चंद्र बोस की लिखाई से पूरी तरह मेल खाती है।   


पूजा के सामानों में तीन मुखी व छह मुखी रुद्राक्ष की, स्फटिक व तुलसी की 28 मालाएँ मिली हैं। गौमुखी कमण्डल, आचमनी, शिवलिंग, शिवजी व माँ काली के चित्र, मैहर की देवी का चित्र, चंदन की लकड़ियाँ, सिंदूर, आलता, शंख (जिसे कान के पास लाने पर वह गूँजता है) मिला है। गुमनामी बाबा के कमरे से 13 क़मीज़ें, 4 पैंट, 31 बनियान, 31 चड्डी, 58 धोतियाँ, 3 वार्मर, 2 दस्ताने, 2 बरसाती कोट, 30 तौलिये, 1 जैकेट, 2 जोड़ी काले जूते, 1 जोड़ी लाल जूते, चेरी ब्लॉसम की पॉलिश के डिब्बे, जूता चमकाने की क्रीम, खड़ाऊँ, बंदर टोपी, 7 गद्दे, राजस्थानी रज़ाई जिस पर रेशम की कढ़ाई है, चादर व तकिये आदि भी मिले हैं। उनके कमरे से जो तमाम बर्तन व रसोई का सामान मिला है उनमें से कुछ विदेशों में निर्मित हैं जो उनके लाइफस्टाइल को दर्शाता है। चूँकि वे होम्योपैथी के अच्छे जानकर थे इसलिए इसकी व दूसरी तमाम दवाइयां भी मिली हैं। अब आप ख़ुद ही सोच लीजिए कि गुमनामी बाबा अगर नेताजी सुभाष चंद्र बोस नहीं थे तो और कौन थे? 

Monday, August 25, 2025

निसंदेह गुमनामी बाबा ही थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस

बचपन से हमें पढ़ाया गया की हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को ताइपे (ताइवान) में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। पर उनकी मौत के विवाद को सुलझाने के लिए बने ‘मुखर्जी आयोग’ ने ताइपे (ताइवान) जाकर उनकी सरकार से संपर्क किया तो पता चला कि उस तारीख को ही नहीं बल्कि उस पूरे महीने ही वहाँ कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था। यानी नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी। ये झूठी कहानी गढ़ी गई। तो प्रश्न उठता है कि फिर नेताजी गए कहाँ? इस पर बाद में चर्चा करेंगे।


बाद के कई दशकों तक देश में चर्चा चलती रही कि नेताजी अचानक प्रगट होंगे। बाबा जयगुरुदेव ने देश भर की दीवारों पर बड़ा-बड़ा लिखवाया कि नेता जी सुभाष चंद्र बोस जल्दी ही देश के सामने प्रगट होंगे। पर वे नहीं हुए। मेरी माँ बहुत राष्ट्रभक्त थीं और बड़े राजनैतिक परिवारों के बच्चे उनके साथ पढ़ते थे, सो उनकी शुरू से राजनीति में रुचि थी। उन्होंने मुझे 1967 में कहा था कि ‘नेता जी अभी ज़िंदा हैं और गुमनाम रूप से कहीं संत भेष में पूर्वी उत्तर प्रदेश में रहते है।’



पर्दे वाले बाबा नाम से एक संत पचास के दशक में नेपाल के रास्ते भारत आए और गोपनीय रूप से बस्ती, लखनऊ, नैमिषारण्य, फैजाबाद व अयोध्या के मंदिरों या घरों में रहे। इस दौरान उनसे मिलने बहुत से लोग आते थे। पर सबको हिदायत थी कि उनके सामने कोई सुभाष नाम नहीं लेगा। इनमें 13 लोग जो वहीं के थे, जो उनके अंतरंग थे। उनमें से दो परिवारों ने तो उन्हें परदे के पीछे जाकर भी देखा था। बाक़ी अनेक लोग बंगाल से लगातार उनसे मिलने आते थे। उनमें दो लोग नेता जी की ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ की ‘इंटेलिजेंस विंग’ के सदस्य थे। ये लोग हर 23 जनवरी को आते थे और बड़े हर्षोल्लास से पर्दे वाले बाबा का जन्मदिन मना कर लौट जाते थे। गौरतलब है कि 23 जनवरी ही नेताजी का जन्मदिन होता है।जिसे मोदी जी ने ‘शौर्य दिवस’ घोषित किया है। यही लोग हर वर्ष दोबारा दुर्गा पूजा के समय उनके पास आते थे। इसके अलावा बाबा की जरूरत के हिसाब से बीच-बीच में भी लोग आते जाते रहते थे। देश के कई बड़े नामी राजनेता व बड़े सैन्य अधिकारी भी लगातार उनसे मिलने आते थे। पर सब उनसे पर्दे के सामने से ही बात करते और सलाह लेते थे। 


पत्रकार अनुज धर और पर्यावरणवादी चंद्रचूड़ घोष, इन दो लोगों ने अपनी जवानी के बीस वर्ष इसे सिद्ध करने में लगा दिए कि ‘पर्दे वाले बाबा’ जिन्हें बाद में लोग ‘गुमनामी बाबा’कहने लगे, जिन्हें उनके निकट के लोग ‘भगवन जी’ कहते थे, वही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। पिछले हफ़्ते ये दोनों मेरे दिल्ली कार्यालय आए और विस्तार से मुझे इस विषय में जानकारी दी। उन्होंने अपनी लिखी हिंदी व अंग्रेज़ी की कई पुस्तकें भी दीं। जिनमे वो सारे तथ्य, दस्तावेज़ और उन सामानों के चित्र थे जो ‘गुमनामी बाबा’ के कमरे से 16 सितंबर 1985 को उनकी मृत्यु के बाद, उनके दो दर्जन से ज़्यादा बक्सों में से निकले थे । ये सब सामान देखकर कोलकाता से बुलाई गयीं नेताजी की भतीजी ललिता बोस रोने लगी और बेहोश हो गई। क्योंकि उसमें नेता जी और ललिता जी के माता-पिता के बीच हुए पत्राचार के हस्त लिखित प्रमाण भी थे। उनके परिवार के तमाम फोटो थे। जिनमें नेताजी के माता पिता का फ्रेम किया फोटो भी है। तब ललिता बोस ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर के इन सामानों को सरकार की ट्रेज़री में जमा करवाने की माँग की। अदालत ने भी ये माना कि ‘गुमनामी बाबा’ के ये सब सामान राष्ट्रीय महत्व के है। तब फैजाबाद के जिलाधिकारी ने उन 2760 सामानों की सूची बनवाकर ट्रेज़री में जमा करवा दिया। बरसों बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने इन सामानों को ‘राम कथा संग्रहालय’ अयोध्या में जन प्रदर्शन के लिए रखवा दिया। पता नहीं क्यों अब ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ उन्हें वहाँ से हटाने की प्रक्रिया चला रहा है?



इन सामानों में गुमनामी बाबा (नेताजी) के तीन चश्मे, जापानी क्रॉकरी, बहुत मंहगी जर्मन दूरबीन, ब्रिटिश टाइपराइटर, आईएनए की वर्दी जो नेता जी के साइज़ की हैं। लगभग एक हज़ार पुस्तकें जो राजनीति, साहित्य, इतिहास, युद्ध नीति, होम्योपैथी, धार्मिक विषयों आदि पर हैं व मुख्यतः अंग्रेज़ी में हैं। तीन विदेशी सिगार पाइप, पाँच बोरों में देश विदेश के अख़बारों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में छपी ख़बरों की कतरने, आईएनए के वरिष्ठ अधिकारियों से उनका नियमित पत्राचार व आरएसएस प्रमुख श्री गुरु गोलवलकर का गुमनामी बाबा के नाम लिखा एक पत्र भी मिला है। इसके अलावा एक बड़े गत्ते पर गुमनामी बाबा के रूस से चीन, तिब्बत और नेपाल के रास्ते बस्ती (ऊ प्र) आने के मार्ग का हाथ से बना विस्तृत नक़्शा भी है।



अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष के शोध से पता चलता है कि नेता जी विमान दुर्घटना की झूठी कहानी के आवरण में रूस पहुँच गए। जहाँ रूस की सरकार ने उन्हें गुलाग में एक बंगला, दो अंगरक्षक, एक कार और ड्राइवर की सुविधा के साथ महफ़ूज़ रखा। तीन साल गुमनाम रूप से रूस में रहने के बाद वे चीन, तिब्बत और नेपाल के रास्ते एक संत के वेश में भारत आए और 16 सितंबर 1985 को अपनी मृत्यु तक पर्दे के पीछे ही छिप कर रहे। पर्दे के भीतर जा कर उन्हें केवल फैजाबाद का डॉ बनर्जी व मिश्रा जी का परिवार ही देख सकता था। उनकी दबंग आवाज़, बंगाली उच्चारण में हिंदी और फर्राटेदार अंग्रेजी सुन कर पर्दे के सामने बैठा हर व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। फिर भी सबको यह हिदायत थी कि उनके सामने ‘सुभाष’ नाम नहीं लिया जाएगा। सब उन्हें ‘भगवन जी’ कह कर ही बुलाते थे। जिस व्यक्ति की मृत्यु पर 13 लाख लोग जमा होने चाहिए थे, उनके अंतिम संस्कार में मात्र यही 13 लोग थे। उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी के किनारे अयोध्या के ‘गुप्तार घाट’ पर किया गया, जहाँ उनकी समाधि है। गुप्तार घाट वही स्थल है, जहाँ भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने जल समाधि ली थी। हज़ारों साल में उस पवित्र स्थल पर आजतक केवल गुमनामी बाबा का ही अंतिम संस्कार हुआ है। सारा ज़िला प्रशासन और पुलिस दूर खड़े उनका अंतिम संस्कार देखते रहे।



इतना कुछ प्रमाण उपलब्ध है फिर भी आज तक केंद्र की कोई सरकार गुमनामी बाबा की सही पहचान को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने को तैयार नहीं है। मोदी सरकार तक भी नहीं। जबकि मोदी जी ने इंडिया गेट के सामने की छतरी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की खड़ी प्रतिमा स्थापित करने का पुण्य कार्य किया है। आरएसएस के दिवंगत सर संघ चालक के एस सुदर्शन जी का एक सार्वजनिक वीडियो वक्तव्य है, जो यूट्यूब पर भी उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने साफ़ कहा है कि गुमनामी बाबा ही नेता जी सुभाष चंद्र बोस थे। अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष बताते हैं कि पंडित नेहरू से लेकर मोदी जी तक हर प्रधान मंत्री को इसकी जानकारी है और नेताजी से 1945 तक जुड़े रहे उनके सहयोगी नेता उनसे मिलने जाते रहे। पर साधना में लीन गुमनामी बाबा ये नहीं चाहते थे कि कोई उनकी असलियत जाने।  

Monday, August 18, 2025

बिहारीजी कॉरिडोर का विवाद

काफ़ी रस्साकशी के बाद वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर का कॉरिडोर बनने का रास्ता साफ़ हो गया। योगी सरकार ने इस मंदिर के प्रबंधन के लिए न्यास भी गठित कर दिया। जिसमें मंदिर की बागडोर अब पूरी तरह सरकार के हाथ में है। मंदिर के सेवायत गोस्वामियों के परंपरा से चले आ रहे दो समूहों: राजभोग सेवा अधिकारी और शयन भोग सेवा अधिकारी में से मात्र एक-एक प्रतिनिधि इस न्यास का सदस्य रहेगा। इस पूरे विवाद में वृंदावन का समाज दो भागो में बटा हुआ था। एक तरफ़ थे सेवायत गोस्वामी व उनके परिवार, बिहारीपुरा के बाशिंदे और आसपास के दुकानदार, जिनकी संपत्तियां प्रस्तावित कॉरिडोर के दायरे में आ रही हैं। दूसरी तरफ़ वृन्दावन के आम नागरिक और बाहर से आने वाले दर्शनार्थी। जहाँ पहला पक्ष कॉरिडोर के विरुद्ध आंदोलन करता आया है। वहीं दूसरा पक्ष कॉरिडोर का स्वागत कर रहा है। 



इस विषय में बहुत से गोस्वामीगणों ने मुझसे भी संपर्क किया और इस विवाद में मेरा समर्थन मांगा। कई कारणों से मैं इस मामले में उदासीन रहा। इसकी वजह यह थी कि 2003 - 2005 के बीच जब मैं इस मंदिर का अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर यानी, प्रशासक था तो मैंने मंदिर की अव्यवस्थाओं को सुधारने का सफल प्रयास किया था। पर गोस्वामियों का सहयोग नहीं मिला।


30 जून 2003 को मैंने बिहारी जी के मंदिर का कार्यभार संभाला और 1 अगस्त को हरियाली तीज थी। इस दिन उत्तर भारत से लाखों भक्त स्वर्ण हिंडोले में बैठे श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन करने आने वाले थे। मंदिर के कुछ पुराने गोस्वामियों ने मुझे चुनौती दी कि मैं ये व्यवस्था नहीं संभाल पाऊँगा। ठाकुर जी पर निर्भर होकर चुनौती स्वीकार की और ये पता लगाया कि क्या- क्या समस्याएं आती हैं। सबसे बड़ी समस्या थी, बिहारी जी तक जाने वाले पाँचों मार्गों से आने वाली अपार भीड़। दूसरी समस्या थी, मंदिर के प्रवेश द्वार पर जूते चप्पलों का पहाड़ बन जाना। तीसरी समस्या थी, लोगों की जेब कटना और सोने की चेन खींचना। चौथी समस्या थी, महिलाओं के साथ भीड़ का दुर्व्यवहार। मैं फौरन दिल्ली गया और छतरपुर स्थित कात्यानी देवी के मंदिर के प्रबंधक तिवारी जी से मिला। जो हर नवरात्रि पर लाखों दर्श्नार्थियों की भीड़ सँभालते थे। उन्होंने बताया कि एसपीजी के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी भीड़ प्रबंधन की एजेंसी चलाते हैं। उनसे संपर्क किया और उन्हें वृन्दावन बुलाया। मथुरा के तत्कालीन जिलाधिकारी श्री सुधीर श्रीवास्तव और एसएसपी श्री सतेन्द्र वीर सिंह से लगभग दो सौ सिपाही मांगे और इतने ही स्वयंसेवक अपने संगठन ‘ब्रज रक्षक दल’ के बुलाये। इन चार सौ लोगों को मोदी भवन में भीड़ नियंत्रण के लिए प्रशिक्षित किया। इस कार्य में मान मंदिर के युवा साधुओं का विशेष सहयोग मिला। बिपिन व्यास ने सुझाव दिया कि मंदिर आने और जाने का एक-एक ही मार्ग रखा जाये और बाकी मार्ग बंद कर दिए जाएँ। इसके अलावा विद्यापीठ के चौराहे पर दस हजार टोकन के साथ जूता घर बनाया गया। जिसमें सेवा करने चांदनी चौक दिल्ली के युवा व्यापारी आये। एसपीजी के इन अधिकारियों ने मंदिर के प्रांगण से विद्यापीठ चौराहे तक पूरे मार्ग को दस सेक्टरों में बाँट दिया और वॉकी-टॉकी से हर सेक्टर के दर्शनार्थीयों को क्रमानुसार आगे बढ़ाया। महिलाओं और बुजुर्गों की सहायता के लिये हमने हर सेक्टर में ’ब्रज रक्षक दल’ के स्वयं सेवक तैनात किये गए।



इन सब व्यवस्थाओं का परिणाम यह हुआ कि न तो किसी की जेब कटी, न धक्का-मुक्की हुई, न चप्पल-जूते खोये, बल्कि बूढ़े और जवान सबको बड़े आराम से दर्शन हुए। इस हरियाली तीज के कई दिन बाद तक मुझे मुंबई, कलकत्ता और अन्य शहरों से परिचित भक्त परिवारों के फोन आते रहे कि जैसी व्यवस्था बिहारी जी में इस बार हुई ऐसी पहले कभी नही हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि भीड़ कितनी भी हो दर्शन की व्यवस्था सुधारी जा सकती थी। 


मंदिर प्रबंधन की दूसरी चुनौती थी चढ़ावे की राशि का ईमानदारी से आंकलन और उसे बैंक में जमा कराना। इसमें काफी गड़बड़ी की शिकायत आती थी। मंदिर की आमदनी भी बहुत कम थी। एक वरिष्ठ गोस्वामी का मुझे फोन आये की मैं हर महीने दो दान-पात्र अपने लिए अलग करवा लूँ। सुनकर धक्का लगा। लेकिन इसे एक चेतावनी मानकर मैंने एक नई व्यवस्था बनाई। मंदिर के प्रांगण में जहाँ गुल्लकें (दानपत्र) खोली जाती थीं वहाँ विडियो कैमरे लगवा दिए और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्कता बरतने के लिए वहाँ बिठा दिया। परिणाम यह हुआ कि पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा दानराशि गुल्लकों से निकली जिसे बैंक में जमा करा दिया गया। 


बिहारी जी के मंदिर की व्यवस्था सुधारने के उद्देश्य से मैंने वाजपेई सरकार में केन्द्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री जगमोहन जी को वृन्दावन बुलाया। उन्होंने मेरे साथ बिहारी जी के मंदिर का विस्तृत दौरा किया और अगले ही दिन दिल्ली से एएसआई व सीपीडब्ल्यूडी के वरिष्ठ अधिकारियों के मुझे फ़ोन आने लगे कि, ‘मंत्री जी ने हमें आदेश दिया है कि आपके जो निर्देश हों, उनके अनुसार मंदिर की व्यवस्था को सुधारने में सहयोग करें।’ इससे मंदिर में
  हलचल मच गई। मुझे कुछ गोस्वामियों के गुमनाम फोन आये, जिन्होंने धमकी दी कि मैं मंदिर की व्यवस्था में कोई बदलाव न करूँ। मैंने श्री रमेश बाबा से पूछा कि क्या करूँ? वे बोले, ब्राह्मणों के पेट पर लात मारने वाला दीर्घ काल तक ‘रौरव नर्क’ में फेंक दिया जाता है। तुम ये मत करो। उनका यह रुख देखकर तब मैंने इस दिशा में प्रयास करना बंद कर दिया। किन्तु मंदिर की दैनिक व्यवस्था में जितना सुधार कर सकता था किया। फिर यह सोचकर कि मुझे अपनी ऊर्जा सम्पूर्ण ब्रज के विकास पर लगानी चाहिए, एक मंदिर में उलझकर नहीं रहना चाहिए। इसलिए 22 महीने बाद 2005 में मैंने स्वतः ही बिहारी जी के मंदिर के रिसीवर पद से त्यागपत्र दे दिया। मैं ऋणी हूँ बिहारी जी का, संतों का, अपने ब्रजवासी बंधुओं का व बाहर से आने वाले दर्शनार्थियों का, जिन्होंने इस कार्यकाल में मेरी विनम्र सेवा को स्वीकार किया और सराहा। अगर मंदिर के सभी आदरणीय गोस्वामीगण 2003-05 में मंदिर की व्यवस्थाओं को स्थाई रूप से सुधारने के लिए निष्काम भावना से किए जा रहे मेरे ठोस प्रयासों में सहयोग करते तो कदाचित ये स्थिति न आती।   

Monday, April 1, 2024

मुख़्तार अंसारी की मौत से सबक़


माफिया डॉन के नाम से मशहूर और बरसों से जेल की सज़ा भुगत रहे पूर्व विधायक मुख़्तार अंसारी की पिछले सप्ताह मौत हो गई। पिछले कुछ सालों में एक के बाद एक माफ़ियाओं को रहस्यमय परिस्थितियों में मौत का सामना करना पड़ा है। फिर वो चाहे विकास दुबे की पलटी जीप हो या प्रयागराज के अस्पताल में जाते हुए तड़ातड़ चली गोलियों से ढेर हुए अतीक बंधु हों। अगर कोई यह कहे कि योगी आदित्यनाथ की सरकार साम, दाम, दंड, भेद अपनाकर उत्तर प्रदेश से एक एक करके सभी माफ़ियाओं का सफ़ाया करवा रही है या ऐसे हालात पैदा कर रही है कि ये माफिया एक एक करके मौत के घाट उतार रहे हैं, तो ये अर्धसत्य होगा। क्योंकि आज देश का कोई भी राजनैतिक दल ऐसा नहीं है जिसमें गुंडे, मवालियों, बलात्कारियों और माफ़ियाओं को संरक्षण न मिलता हो। फ़र्क़ इतना है कि जिसकी सत्ता होती है वो केवल विपक्षी दलों के माफ़ियाओं को ही निशाने पर रखता है अपने दल के अपराधियों की तरफ़ से आँख मूँद लेता है। ये सिलसिला पिछले पैंतीस बरसों से चला आ रहा है।



आज़ादी के बाद से 1990 तक अपराधी, राजनेता नहीं बनते थे। क्योंकि हर दल अपनी छवि न बिगड़े, इसकी चिंता करता था। पर ऐसा नहीं था कि अपराधियों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त न रहा हो। चुनाव जीतने, बूथ लूटने और प्रतिद्वंदियों को निपटाने में तब भी राजनेता पर्दे के पीछे से अपराधियों से मदद लेते थे और उन्हें संरक्षण प्रदान करते थे। 90 के दशक से परिस्थितियां बदल गईं। जब अपराधियों को ये समझ में आया कि चुनाव जितवाने में उनकी भूमिका काफ़ी महत्वपूर्ण होती है तो उन्होंने सोचा कि हम दूसरे के हाथ में औज़ार क्यों बनें? हम ख़ुद ही क्यों न राजनीति में आगे आएँ? बस फिर क्या था अपराधी बढ़-चढ़ कर राजनैतिक दलों में घुसने लगे और अपने धन-बल और बाहु बल के ज़ोर पर चुनावों में टिकट पाने लगे। इस तरह धीरे-धीरे कल के गुंडे मवाली आज के राजनेता बन गये। इनमें बहुत से विधायक और सांसद तो बने ही, केंद्र और राज्य में मंत्री पद तक पाने में सफल रहे। 



जब क़ानून बनाने वाले ख़ुद ही अपराधी होंगे तो अपराध रोकने के लिए प्रभावी क़ानून कैसे बनेंगे? यही वजह है कि चाहे दलों के राष्ट्रीय नेता अपराधियों के ख़िलाफ़ लंबे-चौड़े भाषण करें, चाहे पत्रकार राजनीति के अपराधिकरण को रोकने के लिए लेख लिखें और चाहे अदालतें राजनैतिक अपराधियों को कड़ी फटकार लगाएँ, बदलता कुछ भी नहीं है। योगी आदित्यनाथ अगर ये दावा करें कि उनके शासन में उत्तर प्रदेश अपराध मुक्त हो गया तो क्या कोई इस पर विश्वास करेगा? जबकि आए दिन महिलाएँ उत्तर प्रदेश में हिंसा और बलात्कार का शिकार हो रहीं हैं। पुलिस वाले होटल में घुस कर बेक़सूर व्यापारियों की हत्या कर रहे हैं और थानों में पीड़ितों की कोई सुनवाई नहीं होती। हाँ ये ज़रूर है कि सड़कों पर जो छिछोरी हरकतें होती थीं उन पर योगी सरकार में रोक ज़रूर लगी है। पर फिर भी अपराधों का ग्राफ़ कम नहीं हुआ। 



90 के दशक में आई वोरा समिति की रिपोर्ट अपराधियों के राजनेताओं, अफ़सरों व न्यायपालिका के साथ गठजोड़ का खुलासा कर चुकी है और इस परिस्थिति से निपटने के सुझाव भी दे चुकी है। बावजूद इसके आजतक किसी सरकार ने इस समिति की या 70 के दशक में बने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने में कोई रचीं नहीं दिखाई। ऐसी तमाम सिफ़ारिशें आजतक धूल खा रही हैं। 


ऐसा नहीं है कि सत्ता और अपराध का गठजोड़ आज की घटना हो। मध्य युग के सामंतवादी दौर में भी अनेक राजाओं का अपराधियों से गठजोड़ रहता था। ये तो प्रकृति का नियम है कि अगर समाज में ज़्यादातर लोग सतोगुणी या रजोगुणी हों तो भी कुछ फ़ीसद ही लोग तो तमोगुणी होते ही हैं। ऐसा हर काल में होता आया है। फिर भी सतोगुणी और रजोगुणी प्रवृत्ति के लोगों का प्रयास रहता है कि समाज की शांति भंग करने वाले या आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को नियंत्रित किया जाए, उन्हें रोका जाए और सज़ा दी जाए। यह सब होने के बावजूद भी समाज में अपराध होते हैं। क्योंकि आपराधिक प्रवृत्ति के  व्यक्ति को अपराध करना अनुचित नहीं लगता। उसके लिए यह सहज प्रक्रिया होती है। 


जब यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? तो युधिष्ठिर ने कहा कि हम रोज़ लोगों को काल के मुँह में जाते हुए देखते हैं पर फिर भी इस भ्रम में जीते हैं कि हमारी मौत नहीं आएगी। और इसीलिए हर तरह का अनैतिक आचरण और अपराध करने में संकोच नहीं करते। सोचने वाली बात यह है कि हर अपराधी की मौत अतीक अहमद, विकास दुबे या मुख़्तार अंसारी जैसी ही होती है। फिर भी हर अपराधी इसी भ्रम में जीता है कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वाल्मीकि जी डाकू थे। रोज़ लूट-पाट करते थे। एक दिन कुछ संत उनकी गिरफ़्त में आ गये। संतों ने डाकू वाल्मीकि से पूछा कि वो ये अपराध क्यों करता है? डाकू बोला अपने परिवार को प्रसन्न करने के लिए। इस पर संतों ने वाल्मीकि से कहा कि जिनके लिए तू ये पाप करता है क्या वे तेरे साथ इस पाप की सज़ा भुगतने को तैयार हैं? वाल्मीकि   को लगा कि इसमें क्या संदेह है, पर संतों के आग्रह पर वो अपने परिवार से ये सवाल पूछने गया तो परिवार जनों ने साफ़ कह दिया कि हम तुम्हारे पाप में भागीदार नहीं हैं। वाल्मीकि की आँखें खुल गयीं और वो डाकू से ऋषि वाल्मीकि बन गये। पुराणों और इतिहास के ये सभी उदाहरण उन अपराधियों के लिए हैं जो इस भ्रम में जीते हैं कि वे अमृत पी कर आए हैं और जो कर रहे हैं वो अपने परिवार की ख़ुशी के लिये ही कर रहे हैं। उनका यह भ्रम जितनी जल्दी टूट जाए उतना ही उनका और समाज का भला होगा।      

Monday, August 21, 2023

तीर्थों की भीड़ संभालें !

प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी व उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री योगी जी ने हिन्दू तीर्थों के विकास की तरफ जितना ध्यान पिछले सालों में दिया है उतना पिछली दो सदी में किसी ने नही दिया था। ये बात दूसरी है कि उनकी कार्यशैली को लेकर संतों के बीच कुछ मतभेद है। पर आज जिस विषय पर मैं अपनी बात रखना चाहता हूँ उससे हर उस हिन्दू का सरोकार है जो तीर्थाटन में रुचि रखता है। जब से काशी, अयोध्या, उज्जैन व केदारनाथ जैसे तीर्थ स्थलों पर मोदी जी ने विशाल मंदिरों का निर्माण करवाया है, तब से इन सभी तीर्थों पर तीर्थयात्रियों का सागर उमड़ पड़ा है। इतनी भीड़ आ रही है कि कहीं भी तिल रखने को जगह नही मिल रही।

इस परिवर्तन का एक सकारात्मक पहलू ये है कि इससे स्थानीय नागरिकों की आय तेज़ी से बढ़ी है और बड़े स्तर पर रोजगार का सृजन भी हुआ है। स्थानीय नागरिक ही नहीं बाहर से आकार भी लोगों ने इन तीर्थ नगरियों में भारी निवेश किया है। इससे यह भी पता चला है कि अगर देश के अन्य तीर्थ स्थलों का भी विकास किया जाए तो तीर्थाटन व पर्यटन उद्योग में भारी उछाल आ जायेगा। इस विषय में प्रांतीय सरकारों को भी सोचना चाहिए। जहाँ एक तरफ इस तरह के विकास के आर्थिक लाभ हैं वहीं इससे अनेक समस्याएँ भी पैदा हो रही हैं।



उदाहरण के तौर पर अगर मथुरा को ही लें तो बात साफ़ हो जाएगी। आज से 2 वर्ष पहले तक मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन व बरसाना आना-जाना काफ़ी सुगम था। जो आज असंभव जैसा हो गया है। कोविड के बाद से तीर्थाटन के प्रति भी एक नया ज्वार पैदा हो गया है। आज मथुरा के इन तीनों तीर्थ स्थलों पर प्रवेश से पहले वाहनों की इतनी लम्बी कतारें खड़ी रहती हैं कि कभी-कभी तो लोगों को चार-चार घंटे इंतज़ार करना पड़ता है। यही हाल इन कस्बों की सड़कों व गलियों का भी हो गया है। जन सुविधाओं के अभाव में, भारी भीड़ के दबाव में वृन्दावन में बिहारी जी मंदिर के आस-पास आए दिन लोगों के कुचलकर मरने या बेहोश होने की ख़बरें आ रही हैं। भीड़ के दबाव को देखते हुए आधारभूत संरचना में सुधार न हो पाने के कारण आए दिन दुर्घटनाएँ हो रही हैं। जैसे हाल ही में वृंदावन के एक पुराने मकान का छज्जा गिरने से पांच लोगों की मौत और पांच लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। अब नगर निगम ने वृन्दावन के ऐसे सभी जर्जर भवनों की पहचान करना शुरू किया है जिनसे जान-माल का खतरा हो सकता है। ऐसे सभी भवनों को प्रशासन निकट भविष्य में मकान-मालिकों से या स्वयं ही गिरवा देगा, ऐसे संकेत मिल रहे हैं। ये एक सही कदम होगा। पर इसमें एक सावधानी बरतनी होगी कि जो भवन पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं या जिनकी वास्तुकला ब्रज की संस्कृति को प्रदर्शित करती है, उन्हें गिराने की बजाय उनका जीर्णोद्धार किया जाना चाहिए।



इस सन्दर्भ में यह बात भी महत्वपूर्ण है कि जो नए निर्माण हो रहे हैं या भविष्य में होंगे उनमें भवन निर्माण के नियमों का पालन नही हो रहा। जिससे अनेक समस्याएँ पैदा हो रही हैं। इस पर कड़ाई से नियंत्रण होना चाहिए। पिछले दिनों यमुना जी की बाढ़ ने जिस तरह वृन्दावन में अपना रौद्र रूप दिखाया उससे स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने यमुना डूब क्षेत्र में हुए सभी अवैध निर्माण गिराने के आदेश दिए हैं। फिर वो चाहें घर हों, आश्रम हों या मंदिर हों। स्थानीय नागरिकों का प्रश्न है कि यमुना के इसी डूब क्षेत्र में हाल के वर्षों जो निर्माण सरकारी संस्थाओं ने बिना दूर-दृष्टि के करवा दिए क्या उनको भी ध्वस्त किया जायेगा?


जहाँ तक तीर्थ नगरियों में भीड़ और यातायात को नियंत्रित करने का प्रश्न है इस दिशा में प्रधान मंत्री मोदी जी को विशेष ध्यान देना चाहिए। हालांकि यह विषय राज्य का होता है लेकिन समस्या सब जगह एक सी है। इसलिए इस पर एक व्यापक सोच और नीति की ज़रूरत है, जिससे प्रांतीय सरकारों को हल ढूँढने में मदद मिल सके। वैसे आन्ध्र प्रदेश के तीर्थ स्थल तिरुपति बालाजी का उदाहरण सामने है जहाँ लाखों तीर्थयात्री बिना किसी असुविधा के दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं। जबकि मुख्य मंदिर का प्रांगण बहुत छोटा है और उसका विस्तार करने की बात कभी सोची नही गई। इसी तरह अगर काशी, मथुरा व उज्जैन जैसे तीर्थ नगरों की यातायात व्यवस्था पर इस विषय के जानकारों और विशेषज्ञों की मदद ली जाए तो विकराल होती इस समस्या का हल निकल सकता है।


तीर्थ स्थलों के विकास की इतनी व्यापक योजनाएँ चलाकर प्रधान मंत्री मोदी जी ने आज सारी दुनिया का ध्यान सनातन हिन्दू धर्म की ओर आकर्षित किया है। स्वाभाविक है कि इससे आकर्षित होकर देशी पर्यटक ही नही बल्कि विदेशों से भी भारी मात्रा में पर्यटक इन तीर्थ नगरों को देखने आ रहे हैं। अगर उन्हें इन नगरों में बुनियादी सुविधाएँ भी नही मिलीं या भारी भीड़ के कारण परेशानियों का सामना करना पड़ा, तो इससे एक ग़लत संदेश जायेगा। इसलिए तीर्थों के विकास के साथ आधारभूत ढांचे के विकास पर भी ध्यान देना चाहिए। केंद्र और राज्य की सरकारें हमारे धर्मक्षेत्रों को सजाएं-संवारें तो सबसे ज्यादा हर्ष हम जैसे करोड़ों धर्म प्रेमियों को होगा, पर धाम सेवा के नाम पर, अगर छलावा, ढोंग और घोटाले होंगे तो भगवान तो रुष्ट होंगे ही, भाजपा की भी छवि खराब होगी।


2008 से मैं, अपने साप्ताहिक लेखों में मोदी जी के कुछ अभूतपूर्व प्रयोगों की चर्चा करता रहा हूँ जो उन्होंने गुजरात का मुख्य मंत्री रहते हुए किये थे। जैसे हर समस्या के हल के लिए उसके विशेषज्ञों को बुलाना और उनकी सलाह को नौकरशाही से ज्यादा वरीयता देना। ऐसा ही प्रयोग इन तीर्थ नगरों के लिए किया जाना चाहिए क्योंकि कानून-व्यवस्था की दैनिक जिम्मेदारी में उलझा हुआ जिला-प्रशासन इस तरह की नई जिम्मेदारियों को सँभालने के लिए न तो सक्षम होता है और न उसके पास इतनी ऊर्जा और समय होता है। इसलिए समाधान गैर-पारंपरिक तरीकों से निकला जाना चाहिए। 

Monday, April 17, 2023

क्यों उठते हैं एनकाउंटर पर सवाल?


उत्तर प्रदेश के व्यापारी आजकल कहते हैं कि योगी राज में मुसलमानों का आतंक ख़त्म हो गया है। इसलिये माफिया डॉन अतीक अहमद के बेटे असद अहमद की एनकाउंटर में मौत का समाचार उन लोगों को सुखद लगा। एनकाउंटर के विषय में कुछ तथ्य और क़ानूनी पेचीदगियों का ज़िक्र मैं इस लेख में आगे करूँगा। पर यहाँ एक सवाल जो समाजवादी पार्टी ने उठाया है वो भी महत्वपूर्ण है। वो ये कि ऐन चुनावों के पहले ही इस एनकाउंटर को करने का योगी सरकार का क्या उद्देश्य था? सिवाय इसके कि इस एनकाउंटर की खबर को दिन-रात टीवी चैनलों पर चलवाकर इसका फ़ायदा अगले महीने होने वाले निकायों के चुनावों में लिया जाए। इसलिये सरकार की नीयत पर शक होता है। क़ानून की नज़र में सब बराबर होने चाहिए। किसी अपराधी का कोई जाति या धर्म नहीं होता। इसलिए बिना भय और पक्षपात के अगर प्रदेश के माफ़ियाओं के विरुद्ध योगी सरकार कड़े कदम उठाती है तो उसका स्वागत ही होगा। पर ऐसे कदम सब अपराधियों पर एक समान उठाए जाने चाहिए, जो आज नहीं हो रहा है। हत्या, बलात्कार और पुलिस उत्पीड़न के शिकार कितने ही लोगों को न्याय नहीं मिल रहा। फ़रियादी हताश होकर आत्महत्या तक कर रहे हैं ऐसी खबरें अक्सर सामने आती रहती है। उत्तर प्रदेश के एक विशेष जाति के माफ़ियाओं की सूची आज कल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है जिसमें योगी सरकार से पूछा जा रहा है कि इन माफ़ियाओं के विरुद्ध आजतक ‘बुलडोज़रनुमा’ कार्यवाही क्यों नहीं हुई? उनमें से किसी का एनकाउंटर क्यों नहीं होता? उत्तर प्रदेश सरकार की इस नीति के विरुद्ध भी बहुत लोगों को आक्रोश है।



एनकाउंटर उमेश पाल के आरोपियों का हो या किसी अन्य का जब भी उस पर सवाल उठते हैं तो मामला जाँच कमेटी के पास पहुँचता है। आपको याद होगा कि कुछ ही समय पहले नवंबर 2019 में तेलंगाना राज्य के हैदराबाद में हुए गैंगरेप और हत्या के चार अभियुक्तों के संदिग्ध एनकाउंटर को सर्वोच्च न्यायालय की जाँच समिति ने फ़र्ज़ी पाया। जाँच समिति द्वारा इन पुलिसवालों पर हत्या का मुक़द्दमा चलाने की सिफ़ारिश भी की गई। 


पाठकों को याद होगा कि जब यह एनकाउंटर हुआ था, तब लोगों ने पुलिस का समर्थन करते हुए भारी जश्न मनाया था। जैसा असद व अन्य आरोपियों के एनकाउंटर पर भी हो रहा है। वहीं दूसरी ओर हमेश की तरह पुलिस एनकाउंटर पर तमाम सवाल भी खड़े हो रहे हैं। प्रायः ऐसा मान लिया जाता है कि पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटर फ़र्ज़ी ही होते हैं। एनकाउंटर कब और कैसे होते हैं इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं देता। 


क़ानून की बात करें तो देश में मौजूद भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और दण्ड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) दोनों में ही एनकाउंटर का कोई भी ज़िक्र नहीं है। तो फिर सवाल उठता है कि पुलिस एनकाउंटर आख़िर है क्या? यदि कोई भी पुलिसकर्मी आत्मरक्षा में सामने वाले पर गोली चलाता है तो उसे सामान्य भाषा में एनकाउंटर माना जाता है। तो क्या पुलिस किसी भी अपराधी पर आत्मरक्षा में गोली चला सकती है? नहीं ऐसा नहीं है। 



जब कभी भी पुलिस को किसी अपराधी के बारे में सूचना मिलती है और वह उसे गिरफ़्तार करने जाती है, तो अगर वो अपराधी आत्मसमर्पण कर देता है तब पुलिस उस पर बल प्रयोग नहीं कर सकती। यदि कोई कुख्यात अपराधी, जिसे उम्र क़ैद या उससे ज़्यादा सज़ा हो सकती है और वो गिरफ़्तारी से बचने के लिए भागने का प्रयास करता है और पुलिस उसे पकड़ नहीं पाती, तो उस सूरत में पुलिस उसे ज़ख़्मी करने की नियत से उसके शरीर के किसी भी हिस्से में गोली मार सकती है। प्रायः ये गोली उसकी टांगों में मारी जाती है। जिससे वह ज़्यादा दूर न भाग सके और उसे गिरफ़्तार कर लिया जाए। यदि ऐसे किसी अपराधी के पास कोई जान लेवा हथियार होता है और वो पुलिस पर वार करता है, तो केवल उस सूरत में पुलिस उस पर आत्मरक्षा में गोली चला सकती है। 


मुंबई पुलिस के बहुचर्चित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट दया नायक और प्रदीप शर्मा से जब किसी पत्रकार ने पूछा कि मुंबई में अपराधियों की सफ़ाई के लिए आप दोनो को ही श्रेय दिया जाता है तो, उनका कहना था कि, हम तो अपराधियों को पकड़ने के लिए ही जाते हैं, लेकिन वो जब हम पर वार करते हैं तो हमें भी पलटवार करना पड़ता है। अपराधियों को भी पता है कि यदि वो पुलिस के हत्थे चढ़े तो कई सालों तक जेल के बाहर नहीं आएँगे। इसलिए इन सब से बच कर भागने के प्रयास में वे पुलिस की गोली का शिकार हो जाते हैं। उनके अनुसार 97-98 में जब मुंबई में गैंगस्टरों का आतंक चरम पर था तब सरकार कड़े क़ानून ले कर आई। अपराधी इन्हीं कड़े क़ानूनों से बचने की पुरज़ोर कोशिश में मारा जाता है। इसी के बाद से मुंबई के अंडरवर्ल्ड में एनकाउंटर का भय बढ़ने लगा। कारण चाहे कुछ और भी रहे हों पर मुंबई में गैंगस्टरों का आतंक थमने लगा।    



पुलिस एनकाउंटर को बॉलीवुड की कई फ़िल्मों में भी दिखाया गया हैं। जहां ज़्यादातर एनकाउंटर को ऐसे दर्शाया जाता है कि भले ही वो एनकाउंटर फ़र्ज़ी हो, लेकिन जाँच में असली ही पाया जाए। लेकिन यदि किसी भी एनकाउंटर की योजना ग़लत नीयत से की जाती है तो वो आज नहीं तो कल पकड़ा ही जाता है। 


इस बात के कई प्रमाण भी हैं जहां फ़र्ज़ी एनकाउंटर करने पर पुलिस वालों को सज़ा भी हुई है। इसका मतलब यह नहीं होता कि सभी एनकाउंटर फ़र्ज़ी होते हैं। जनता में पुलिस पर विश्वास की कमी होने के कारण ऐसी धारणा बन जाती है की ज़्यादातर एनकाउंटर फ़र्ज़ी होते हैं। 


एक पूर्व आईपीएस अधिकारी ने दिल्ली में 2008 के बाटला हाउस एनकाउंटर का हवाला देते हुए बताया कि, पुलिस को ज़्यादातर मामलों में इस बात का पता होता है कि वो जहां गिरफ़्तारी करने जा रही हैं वहाँ कितना ख़तरा हो सकता है। ऐसे एनकाउंटर को एक सुनियोजित एनकाउंटर कहा जाता है। ऐसे एनकाउंटर में पुलिस की टीम पूरी तैयारी के साथ जाती है। 


बाटला हाउस में सब जानकारी के बावजूद दिल्ली पुलिस के एक बहादुर अफ़सर मोहन चंद शर्मा शहीद हुए थे। पुलिस एनकाउंटर में काफ़ी ख़तरा होता है। पुलिसकर्मी भी घायल होते हैं, परंतु ऐसा मान लेना कि सभी एनकाउंटर फ़र्ज़ी होते हैं सही नहीं। दोषियों को सज़ा देना अदालत का काम होता है न कि पुलिस का। लेकिन पुलिसकर्मी यदि आत्मरक्षा में गोली चलाता है तो उसे हमेशा ग़लत नहीं समझना चाहिए। 


एनकाउंटर करने के लिए जिन अनुभवी पुलिसकर्मियों को चुना जाता है, उन्हें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहा जाता है। एनकाउंटर जोखिम भरा होता है और ऐसा जोखिम हर कोई नहीं ले सकता। उसके लिए हथियारों को सही ढंग से चलाना और सामने वाले से बेहतर निशाना लगाना आना चाहिए। परंतु ऐसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रायः विवादों में भी घिरे रहते हैं। जिस तरह हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी तरह कुछ एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के घमंड और कभी-कभी उसके भ्रष्टाचार के चलते हर पुलिस एनकाउंटर को शक की निगाह से ही देखा जाता है। ख़ासकर जब राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के पाले हुए गुंडों का एंकाउंटर होता है तब तो जनता के मन में ऐसे ही सवाल उठते हैं कि ऐसे सभी एनकाउंटर फ़र्ज़ी होते हैं। परंतु सच्चाई तो जाँच के बाद ही सामने आती है।