Monday, October 19, 2026

बच्चों का इंटरनेट अधिकार: प्रतिबंध नहीं, जिम्मेदारी की ज़रूरत

सुप्रीम कोर्ट का हालिया आदेश भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसमें बच्चे भी शामिल हैं। यह अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) से जुड़ा है। कोर्ट ने बच्चों पर इंटरनेट के पूर्ण प्रतिबंध को असंगत और अनुपातहीन माना, जबकि बाल यौन शोषण संबंधी सामग्री की पहचान, रिपोर्टिंग और हटाने के लिए सख्त व्यवस्था करने का निर्देश दिया। साथ ही ‘चाइल्ड मोड’, अभिभावकीय सहमति और लक्षित सुरक्षा उपायों का सुझाव भी दिया। यह फैसला ‘डिजिटल इंडिया’ में सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक आवश्यक कदम है।



भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन अब जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। लाखों बच्चे शिक्षा, मनोरंजन, सामाजिक संपर्क और जानकारी के लिए ऑनलाइन दुनिया पर निर्भर हैं। कोविड काल के बाद डिजिटल शिक्षा का विस्तार हुआ, लेकिन इसके साथ ही इसके जोखिम भी बढ़े। सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री, साइबर बुलिंग, गेमिंग की लत और बाल शोषण के मामले बार-बार सामने आते रहे हैं। कुछ राज्यों में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं चिंताओं के बीच यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पूर्ण प्रतिबंध न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह बच्चों को डिजिटल साक्षरता और अभिव्यक्ति के अवसर से भी वंचित कर सकता है।



फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया। उसने बाल यौन शोषण सामग्री के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर हैश और यूआरएल डेटाबेस बनाने, प्लेटफॉर्म्स के लिए त्वरित रिपोर्टिंग की समय-सीमा तय करने और मजबूत मॉडरेशन तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया। देखा जाए तो यह कदम आवश्यक था, क्योंकि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या हल नहीं होती। इंटरनेट पर हानिकारक सामग्री तेजी से फैलती है और तकनीकी समाधान के बिना उसे नियंत्रित करना मुश्किल है। कोर्ट ने ‘चाइल्ड मोड’ जैसी व्यवस्था का सुझाव देकर एक मध्यम मार्ग अपनाया है, जिसमें खाते डिफॉल्ट रूप से निजी हों, अजनबियों से संपर्क सीमित हो और विज्ञापन तथा सामग्री का उचित मॉडरेशन हो। यह व्यावहारिक दृष्टिकोण है, जो पूर्ण प्रतिबंध की जगह जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देता है।



भारत में इस फैसले का महत्व और भी अधिक है क्योंकि यहां डिजिटल डिवाइड अभी भी मौजूद है। शहरी और शिक्षित परिवारों में बच्चे आसानी से स्मार्टफोन और इंटरनेट का उपयोग करते हैं, जबकि कई ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में इसकी पहुंच सीमित है। पूर्ण प्रतिबंध लगाने से जो बच्चे पहले से ही डिजिटल अवसरों से वंचित हैं, वे और पीछे रह जाएंगे। दूसरी ओर, जिनके पास पहुंच है, उनके लिए बिना उचित मार्गदर्शन के सोशल मीडिया मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अध्ययनों और रिपोर्टों में किशोरों में चिंता, अवसाद और नींद की कमी जैसी समस्याएं बढ़ने के संकेत मिले हैं। ऐसे में कोर्ट का यह रुख सही है कि समाधान प्रतिबंध में नहीं, बल्कि जागरूकता, शिक्षा और तकनीकी सुरक्षा में है।


इस फैसले से सरकार, टेक कंपनियों और अभिभावकों तीनों की जिम्मेदारी स्पष्ट होती है। सरकार को अब मजबूत नियामक ढांचा तैयार करना होगा, जिसमें प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही सुनिश्चित हो, लेकिन बच्चों के अधिकारों का हनन न हो। टेक कंपनियों को अपने एल्गोरिदम और मॉडरेशन सिस्टम को और पारदर्शी तथा प्रभावी बनाना होगा। भारत जैसे देश में, जहां लाखों बच्चे पहली बार इंटरनेट से जुड़ रहे हैं, कंपनियों को स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखकर सुरक्षा उपाय विकसित करने चाहिए। ऐसे में अभिभावकों की भूमिका भी अहम है। डिजिटल साक्षरता केवल बच्चों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। माता-पिता को भी समझना होगा कि पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है, लेकिन नियमित संवाद, समय-सीमा और सकारात्मक उपयोग की आदत डालना जरूरी है।


स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था को भी इस दिशा में सक्रिय होना होगा। डिजिटल नागरिकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि बच्चे ऑनलाइन जोखिमों को पहचान सकें और इंटरनेट के सुरक्षित व्यवहार सीख सकें। साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता को भी मजबूत करने की जरूरत है, क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है।


सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक चेतावनी भी है। यदि सरकार और प्लेटफॉर्म्स प्रभावी कदम नहीं उठाते, तो भविष्य में और अधिक सख्त हस्तक्षेप की मांग उठ सकती है। दूसरी ओर, अगर सुरक्षा के नाम पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो यह बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा और डिजिटल असमानता को बढ़ाएगा। संतुलित दृष्टिकोण ही भारत के लिए सही है। हमें एक ऐसा डिजिटल वातावरण चाहिए जहां बच्चे सीख सकें, सृजन कर सकें और सुरक्षित रह सकें। इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है। समाज, परिवार, स्कूल और तकनीक कंपनियों को मिलकर काम करना होगा।


कुल मिलाकर, यह फैसला हमें याद दिलाता है कि डिजिटल युग में अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं। इंटरनेट एक शक्तिशाली साधन है, जो ज्ञान और अवसर देता है, लेकिन बिना सावधानी के यह नुकसान भी पहुंचा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सही दिशा दिखाई है। अब जरूरत है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भारत के बच्चे डिजिटल युग का लाभ उठा सकें और उसकी चुनौतियों से सुरक्षित रह सकें। यह संतुलन ही भविष्य की पीढ़ी के लिए एक मजबूत और जिम्मेदार डिजिटल समाज की नींव रखेगा। 

Monday, October 12, 2026

युवा आंदोलन और सत्ता का दायित्व !

एक बार फिर से देश में युवाओं ने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा दी है। यह कोई नई बात नहीं है, जब-जब छात्र राजनैतिक व्यवस्था के विरूद्ध सड़क पर उतरते हैं, तब-तब ये सवाल उठता है कि क्या छात्रों को राजनीति करनी चाहिए? इस सवाल के उत्तर अपनी-अपनी दृष्टि से हर समुदाय देता है। जो राजनैतिक दल सत्ता में होते हैं, वे छात्र आन्दोलन की भर्त्सना करते हैं। उसे हतोत्साहित करते हैं और जब छात्र काबू में नहीं आते, तो उनका दमन भी करते हैं। फिर वो चाहे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों या 70 के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन से शुरू होकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्णं क्रांति के आव्हान पर कूंदने वाले छात्र हों, जिन्होने इंदिरा गांधी की सत्ता पलट दी थी या फिर अन्ना हजारे के आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों। लेकिन देश में कॉक्रोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन और देश भर में चल रहे ताज़ा आंदोलन ने इस सवाल को दोबारा जगा दिया है युवा और सरकार के आंदोलन का हल कैसे निकले?   



रोचक बात ये है कि जो दल सत्ता में आकर छात्रों का दमन करते हैं, वही दल जब विपक्ष में होते हैं, तो छात्र आन्दोलनों को हवा देकर ही अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं। इसमें कोई दल अपवाद नहीं हैं। अगर शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की दृष्टि से देखा जाऐ, तो भी दो मत हैं। जो संस्थान या अभिभावक चाहते हैं कि उनके निर्देशन में युवा केवल पढ़ाई पर ध्यान दें, डिग्री हासिल करें और नौकरी करे, वे नहीं चाहते कि उनके छात्र किसी भी तरह की राजनीति में हिस्सा ले। 


मगर एक दूसरा वर्ग उन शिक्षकों और अभिभावकों का है, जो अपने छात्रों में पूर्णं विश्वास रखते हैं और जानते हैं कि चाहे वे छात्र राजनीति में कितना ही हिस्सा क्यों न लें, उन्हें अपने भविष्य को लेकर पूरी स्पष्टता है। इसलिए वे पढ़ाई की कीमत पर आन्दोलन नहीं करेंगे। ऐसे संस्थान और अभिभावक छात्रों को रचनात्मक राजनीति करने से नहीं रोकते।



अगर निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो हम पाऐंगे कि जो छात्र केवल पढ़ाई पर ध्यान देते हैं और रट्टू तोते की तरह इम्तेहान पास करते जाते हैं, उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं होता। प्रायः ऐसे नौजवानों में समाजिक सारोकार भी नहीं होते। उनका व्यक्तित्व एकांगी हो जाता है और जीवन के संघर्षों में वे उतनी मजबूती से नहीं खड़े हो पाते, जितना कि वे छात्र खड़े होते हैं, जिन्होंने शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार को बनाऐ रखा हो। जो छात्र विज्ञान, शोध या तकनीकी के क्षेत्र में जाते हैं, उनकी बात दूसरी है। उनका ध्यान अपने विषय पर ही केंद्रित रहता है और वे अपने संपूर्णं अंगों को कछुऐ की तरह समेटकर एक ही दिशा में लगातार काम करते जाते हैं।



अपने जीवन में मैंने भी अलग-अलग तरह माहौल में अनुभव प्राप्त किये हैं। जब तक मैं कॉलेज में पढ़तो था, तो मेरा व्यक्तित्व दो धुरियों में बटां था। मेरे पिता जो एक बड़े शिक्षाविद् थे, उनके विचार यही थे कि मैं पढ़ू और नौकरी करूं। जबकि मेरी मां जो कि संस्कृत की विद्वान थी और मथुरा के रमणरेती वाले महाराज श्रद्धेय गुरू शरणनानंद जी की लखनऊ विश्विद्यालय की सहपाठी थीं, वे छात्र जीवन से ही गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक सरोकारों को लेकर बहुत सक्रिय रहीं थीं। उनका ही प्रभाव मुझ पर ज्यादा पड़ा और 18 वर्ष की आयु में एक स्वयंसेवक के रूप में पिछड़े गाँवों में सेवा कार्य करने घर छोड़कर चला गया। 1974 के उस दौर में मैंने गाँव की गरीबी और बदहाली में जीवन के अनूठे अनुभव प्राप्त किये। उसका ही परिणाम है कि आजतक मैं धन कमाने की दौड़ में न पड़कर समाज, राष्ट्र या सनातन धर्म के विषयों पर अपनी ऊर्जा पूरी निष्ठा से लगाता रहा हूं। अगर इसे अपने मुंह मियाँ मिट्ठू न माना जाऐ, तो देश में जो लोग मुझे जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मैंने प्रभु कृपा भारत में कई बार इतिहास रचा है। ये निर्भीकता और समाज के प्रति समर्पण का ये भाव इसीलिए आया क्योंकि मैंने पढ़ाई के साथ समाज का भी अध्ययन जारी रखा। अन्यथा मैं आज किसी तंत्र की नौकरी में जीवन बिताकर खाली बैठा होता। जैसा आईसीएस रहे श्री जेसी माथुर ने सेवानिवृत्त होने के बाद एक सुप्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका ‘दिनमान’ में एक श्रृंखला लिखी थी। जिसका मूल था कि ‘मैं आईसीएस में रहते हुए, एक मशीन का पुर्जा था, जिसका न दिल था, न दिमाग था’। 


कल का आईसीएस ही आज का आईएएस है। पिछले 40 वर्षों में मैं सैंकड़ों आईएएस अधिकारियों से संपर्क रहा है और मैं दावे से कह सकता हूं कि, वही आईएसएस अधिकारी जीवन में कुछ ठोस और रचनात्मक कार्य कर पाते हैं, जो अपनी नौकरी के मायाजाल के बाहर, समाज से जुड़कर सहज जीवन जीते हैं और अपनी संवेदनशीलता को मरने नहीं देते। बाकी तो पूरी जिंदगी अच्छी पोस्टिंग और प्रमोशन के चक्कर में ही काट देते हैं। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। पर आमतौर पर यही अनुभव रहा है। 


इसलिए मैं इस बात का समर्थक हूं कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। फिर वो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य हों, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य हों या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्में सीजेपी के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। प्रांतीय और केंद्र सरकार का ये दायित्व है कि वे छात्र राजनीति पर तब तक अंकुश न लगायें, जब तक कि वह हिंसात्मक या विध्वंसात्मक न हो। ऐसी छात्र राजनीति समाज की घुटन को ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में बाहर निकालती है और ये राज सत्ता के हित में ही होता है। इसलिए जब कभी देश का युवा सड़कों पर उतरे तो उसे गंभीरता से लिया जाए न कि दमनकारी रवैये से।  

Monday, October 5, 2026

प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना का विश्लेषण

वृंदावन के विश्विख्यात संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक नौजवान भक्त की ऐसी रहस्यमय मृत्यु समाज और पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण घटना है, जिसकी गहराई से जाँच की जा रही है। पर इससे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि कुछ सनातन धर्म विरोधी लोग इस दुर्घटना के लिए प्रेमानंद महाराज को ज़िम्मेदार ठहराकर उनपर कीचड़ उछाल रहे हैं। इस विषय में जो बात मैं आगे कहने जा रहा हूँ वो ऐसे आलोचकों को मेरा निष्पक्ष जवाब है। पर इसके साथ ही मैं उन बातों को भी यहाँ रखूँगा जिनको लेकर प्रेमानंद महाराज के चाहने वालों में भी लंबे समय से मंथन चल रहा है। उन्हें लगता है कि महाराज अपने चेलों के जाल में उलझ गए हैं। वे चेले जो महाराज की तपस्या को सोशल मीडिया पर वायरल करवाने की धुन में ब्रज के रसिक संतों की रहनी और आचरण को भूल बैठे हैं। आरोप है कि ऐसे चेले संपत्ति बनाने, कालोनियाँ बनाने और अपने-अपने साम्राज्य स्थापित करने में जुटे हैं। इन्हीं सब बातों पर आगे चर्चा होगी। 


प्रेमानंद महाराज एक लंबे अरसे से वृंदावन में रहकर तपस्वी का जीवन जी रहे थे। वे भीषण गर्मी के दिनों में भी घंटों यमुना जी की तपती रेत में पड़े रहकर भजन किया करते थे। प्रायः वे वृन्दावन की कँटीली झाड़ियों के बीच बैठ कर भी भजन करते थे। उन्होंने बरसों तक न भला खाया, न भला पहना। हम वृंदावनवासी जानते हैं कि वे वृन्दावन की गलियों में भिक्षा माँगकर रोटी खाते थे। 7-8 बरस पहले तक उनका नाम भी कोई नहीं जानता था। उनके दैन्य और तपस्या की प्रशंसा हर ब्रजवासी आजतक करता आया है। वे भी ब्रजवासियों के प्रति भारी श्रद्धा का भाव रखते हैं। 



अब से कुछ वर्ष पहले तक यमुना किनारे एक बगीची में, अपने चंद शिष्यों के बीच वे प्रवचन किया करते थे। धीरे-धीरे उनके प्रवचन की लोकप्रियता बढ़ने लगी और देखते ही देखते लगभग 1000 भक्त हर प्रातः उनका प्रवचन सुनने आने लगे। उस दौर में मैं भी प्रायः उनका प्रवचन सुनने उस बगीची में जाता था। धीरे-धीरे इस भीड़ में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ने लगी जो आईआईटी - आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ कर देश विदेश में अपनी लाखों की नौकरी छोड़ कर आ गए और प्रेमानंद महाराज के शिष्य बन कर पीली चादर ओढ़ ली। 


इन्हीं शिष्यों में कुछ ऐसे शिष्य भी थे जिन्होंने महाराज के प्रति अपने गहरे प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना शुरू किया और पूरी दुनिया में उन्हें इतना प्रचारित कर दिया कि विराट कोहली से लेकर तमाम जानी-मानी हस्तियां  उनके दर्शन को आने लगी। महाराज की मार्किटिंग इस कदर की गई कि उनके दर्शन के लिए आधी रात से हज़ारों की भीड़ जमा होने लगी। इस भीड़ के कारण वृंदावन की यातायात व्यवस्था भी बाधित हुई। महाराज जब रात में सड़क पर पैदल निकलते तो हज़ारों लोग उनके दर्शन को खड़े रहते। 


फिर तो वहाँ पैसे की वर्षा होने लगी। अब संपत्तियां खरीदने व बड़े-बड़े आश्रम बनाने की होड़ लग गई। यमुना की खादर में अवैध रूप से कॉलोनी बनाने के आरोप भी इन्हीं शिष्यों पर लगे। महाराज के दर्शन के लिए एडवांस टोकन मिलने लगे और भारी तामझाम का एक सुनियोजित आडंबर रच दिया गया। 


इतना ही नहीं प्रेमानंद महाराज के कुछ वर्ष पहले ही बने शिष्य भी अब सोशल मीडिया पर अपनी मार्केटिंग करवाने लगे। किसी को शिव का स्वरूप बताया जाने लगा तो किसी को ब्रह्म ऋषि। सैंकड़ों सालों से ब्रज के संत घर-घर रोटी माँग कर प्रसाद पाते थे। इसे माधुकरी कहते हैं। ब्रज में ये संतों का सामान्य शिष्टाचार है। पर किसी ने भी कभी इसे प्रचारित कर सेलिब्रिटी बनने की कोशिश नहीं की। प्रेमानंद महाराज के शिष्यों का माधुकरी माँगना भी सोशल मीडिया का ग्लैमर बन गया। पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता  को बढ़ाने और उनकी मार्केटिंग करने के जितने प्रयास हुए वैसा ब्रज में पहले कभी नहीं देखा गया। यह ब्रज की भक्ति परंपरा के अनुकूल नहीं था। परिणामतः केलि कुंज की आलोचनाएं भी होने लगी। इसी सबके बीच महाराज के शिष्यों में सत्ता और संपत्ति को लेकर गुटबाजी और झगड़े शुरू हो गए। 


इस सब से विचलित हो कर प्रेमानंद महाराज वृंदावन के अपने नए बने भव्य आश्रमों को छोड़ कर यमुना के उस पार बेल वन में चले गए।वहाँ जो बृजवासी गांव वाले रहते हैं वे परेशान हैं क्योंकि रात भर महाराज के दर्शनार्थी आते हैं। ब्रजवासी बच्चे घर से निकल जाए तो भीड़ में खो जाते हैं। सारे रास्ते जाम हो जाते हैं। अब वहाँ भी चेलों द्वारा कालोनियां बनाने का खेल चालू हो गया है। प्रेमानंद जी महाराज के प्रति श्रद्धा रखने वाले हम जैसे लाखों भक्त हैं। उनके शिष्य रसिक दुलारी शरण की मृत्यु से उस श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है। पर इतना अवश्य है कि अब समय आ गया है कि जब प्रेमानंद महाराज शिष्यों के बनाये इस आडंबर के जाल से निकल कर अपने मूल स्वरूप में लौट आएँ। 


जहाँ तक रसिक दुलारी शरण की मृत्यु का प्रश्न है तो सच्चाई तो पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी। पर इतना अवश्य है कि युवा साधकों के बीच ऐसी दुर्घटना होना कोई नई बात नहीं है। साधना की प्रारंभिक अवस्था में अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न रख पाने के कारण कई युवा साधक अपने लिंग को हानि पहुँचा देते हैं। ये उनकी नासमझी या उत्साह के अतिरेक में उठाया गया एक मूर्खतापूर्ण कदम होता है। इन्द्रियों पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण होने के बाद होता है। अगर मन वास्तव में भगवत भक्ति में रम जाए तो हमारी सभी इंद्रियाँ स्वयं ही शांत हो जाती हैं। इस तरह के जबरन किए गए प्रयासों से इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता ये हर साधक को जानना चाहिए। इस घटना का जो भी परिणाम हो इससे प्रेमानंद महाराज की प्रतिष्ठा में कोई आंच नहीं आएगी। पर उनके इर्द-गिर्द जमा शिष्यों को इससे सबक लेकर आत्मवालोकन करना चाहिए।