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Friday, June 26, 2026

चढ़ावा चोरी जघन्य पाप है !

अयोध्या के श्री राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को लेकर रोज़ विस्फोटक खुलासे हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो जांच समिति गठित की है वो अपने उद्देश में कितनी सफल हो पाएगी ये तो उसकी रिपोर्ट देखने के बाद ही पता चलेगा। किंतु एक बात निश्चित है कि भगवान के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन, सोना, चाँदी व जवाहरात आदि की लेशमात्र भी चोरी करना हमारे शास्त्रों में जघन्य अपराध बताया गया है। चूँकि योगी जी सनातन धर्म की ध्वजा संभालने में गर्व महसूस करते हैं इसलिए आशा की जानी चाहिए कि वे इस दान चोरी के सभी आरोपियों को यथासंभव सनातन धर्म के नियमों के अनुसार कठोरतम सज़ा देंगे। 

उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्मशास्त्रों में देवद्रव्य (देवता की संपत्ति) की चोरी को अत्यंत गंभीर पाप माना गया है। मनुस्मृति के अनुसार देवता की संपत्ति (सोना आदि) चोरी पर मृत्यु दंड का प्रावधान है। बृहस्पति स्मृति के अनुसार चोरी किए गए द्रव्य और सोना, रत्न आदि की कीमत का दोगुना जुर्माना भरना पड़ता है या अपराधी को मृत्युदंड दिये जाने का प्रावधान है। गरुड़ पुराण आदि में नरक के वर्णन में चोरों के लिए विशेष यातनाएँ जैसे जलते अंगारों पर चलना, ख़ूँख़ार कुत्तों द्वारा पीछा किए जाना, आदि का वर्णन आता है। चढ़ावा भगवान का होता है, उसे चुराना भगवान से चोरी के समान है। यह कर्म का भारी बोझ बनता है—इस जन्म में अपयश और अगले जन्म में घोर दुख मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि ऐसा पाप क्षमा नहीं होता जब तक पूर्ण प्रायश्चित न हो। तात्पर्य यह है कि श्री राम मंदिर अयोध्या के चढ़ावा चोरी के सभी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए, अन्यथा भक्तों का विश्वास सरकार पर नहीं रहेगा। क्योंकि श्री राम मंदिर के सभी ट्रस्टी सरकार द्वारा मनोनीत हैं, वे अपनी किसी धार्मिक उपलब्धि या सनातन धर्म के ऊँचे पद पर आसीन होने के कारण ट्रस्टी नहीं बनाए गए थे। 


2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश महोदय के अनुरोध पर मैंने मथुरा के दो प्रसिद्ध मंदिरों के रिसीवर का अवैतनिक पद स्वीकार किया। ये थे वृंदावन के श्री बांके बिहारी जी का मंदिर व गोवर्धन की दान घाटी का मंदिर। मंदिर प्रबंधन की चुनौती थी चढ़ावे की राशि का ईमानदारी से आंकलन और उसे बैंक में जमा कराना। इसमें काफी गड़बड़ी की शिकायत आती थी। मंदिर की आमदनी भी बहुत कम थी। एक वरिष्ठ गोस्वामी का फोन आया कि मैं हर महीने चौदह में से दो दान-पात्र अपने लाभ के लिए अलग करवा लूँ। ये सुनकर मुझे बहुत धक्का लगा। लेकिन इसे एक चेतावनी मानकर मैंने एक नई व्यवस्था बनाई। मंदिर के प्रांगण में जहाँ गुल्लकें (दानपत्र) खोली जाती थीं वहाँ वीडियो कैमरे लगवा दिए और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्कता बरतने के लिए वहाँ बिठा दिया। परिणाम यह हुआ कि पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा दानराशि गुल्लकों से निकली, जिसे बैंक में जमा करा दिया गया।


एक और रोचक अनुभव हुआ जो अयोध्या के संदर्भ में बहुत उपयोगी रहेगा। कैसे दानदाता और मंदिर प्रबंधन के बीच बिचौलिए दान का धन हड़प लेते हैं। वृन्दावन के एक प्रतिष्ठित नागरिक हैं, जो काफी धनवान हैं और आजकल एक प्रमुख राजनैतिक दल के नेता भी हैं। एक दिन सुबह वे मेरे घर आये और बोले कि उनके परिचित कलकत्ता के एक सेठ, बिहारी जी मंदिर को मोटी रकम नकद दान देना चाहते हैं। पर वो आपके हाथ में ही पैसा देना चाहते हैं। उन्हें मैं आज शाम को आपके घर लेकर आऊंगा। आप दान ले लेना और उसमें से एक तिहाई रूपये आप रख लेना व एक तिहाई रूपये मुझे दे देना। बाकी मंदिर में जमा करा देना। मैंने उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई। निर्धारित समय पर मंदिर के मैनेजर, अकाउंटेंट और दो बैंकों के कैशियरों को पहले से बुलाकर अपनी कोठी के स्टाफ क्वार्टर में बिठा दिया। दानदाता और उन स्थानीय नेता की मैंने आवभगत की। जब सेठ जी नोटों की गड्डियां बैग से निकालने लगे तो मैंने फौरन मंदिर के स्टाफ को वहीं बुला लिया। यह देख कर वो नेता जी बहुत विचलित हो गए। मंदिर स्टाफ ने जब नोट गिन लिए तो मैंने उन्हें यह सब धनराशि बैंक में जमा कराने को कह दिया और उन्हें तुरंत  ‘गुप्तदान’ की रसीद काट कर दिलवा दी। उस दिन के बाद से ऐसा प्रस्ताव लेकर कोई मेरे पास नहीं आया। श्री राम मंदिर अयोध्या के ट्रस्टीगणों ने अगर पहले दिन से चढ़ावे की व्यवस्था पारदर्शी बनाई होती तो आज उन्हें इतनी बदनामी नहीं झेलनी पड़ती। समाचार पत्रों से पता चल रहा है कि जब से ये चढ़ावा विवाद सामने आया है तब से मंदिर को होने वाली दान की आय एक-तिहाई से भी कम हो गई है। स्पष्ट है कि इस विवाद से सभी सनातन धर्मियों को गहरा आघात लगा है। 


त्रिवेंद्रम के विश्व प्रसिद्ध व दुनिया के सबसे ज़्यादा संपन्न पद्मनाभ स्वामी के मंदिर का उदाहरण पूरे भारत के लिए अनुकरणीय है। इस मंदिर का स्वामित्व वहाँ के राज परिवार के पास है। मंदिर के लॉकरों में लाखों करोड़ रुपये का सोना, चाँदी और जवाहरात जमा है। उल्लेखनीय बात यह है कि सदियों से राज परिवार ने अपनी निज संपत्ति होते हुए भी मंदिर के चढ़ावे में से कभी एक अंश भर भी लेना स्वीकार नहीं किया। हर दिन प्रातः भगवान के प्रथम दर्शन का अधिकार राज परिवार को प्राप्त है। ये परिवार जब हर रोज़ दर्शन करके मंदिर से बाहर निकलता है तो मंदिर के द्वार पर बैठ कर अपने पैर के तलवों पर चिपक गई मंदिर की धूल को अपने हाथों से झाड़ कर वहीं गिरा देता है। तात्पर्य यह है कि भगवान के मंदिर से धूल का कण भी ले जाना उनकी दृष्टि में जघन्य अपराध है। पिछले कुछ दशकों से केंद्र और राज्य सरकारें मंदिरों के अधिग्रहण के प्रति अति-उत्साहित हैं। पर अनुभव बताता है कि इन व्यवस्थाओं में लगाए जाने वाले लोग प्रायः संदेहास्पद आचरण वाले ही होते हैं। ऐसे में सरकारों को इस नीति को त्याग कर मंदिरों का प्रबंधन विरक्त संत महात्माओं या धन्ना सेठों को सौंपना चाहिए जिनकी भगवान में आस्था है और जो दैविक द्रव्य की चोरी को विषपान के समान समझते हैं।  

Monday, June 22, 2026

पेपर लीक: सही कारण पकड़ें और सफल उदाहरण से सीखें!

भारत में प्रवेश परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में एनईईटी-यूजी 2026 परीक्षा को पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द कर दिया गया। इससे लाख से अधिक छात्र-छात्राओं का भविष्य प्रभावित हुआ। एक 'गेस पेपर' में सैकड़ों सवाल असली पेपर से मैच कर गए, जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। राजस्थान, बिहार, हरियाणा आदि राज्यों में कोचिंग माफिया और प्रिंटिंग एजेंसियों तक लीक का सिलसिला पहुंचा। पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 2024 में भी एनईईटी विवादों में घिरा था। वहीं, आईआईटी-जेईई जैसी परीक्षाओं का रिकॉर्ड आजतक लगभग बेदाग रहा है। एक बार 1997 में लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर से लीक की खबर आई थी, लेकिन उसके बाद सख्त प्रोटोकॉल ने इसे रोका। ऐसा क्यों है कि एक ही देश में कुछ परीक्षाएं दोष रहित रहती हैं और क्यों अन्य परीक्षाएं बार-बार पेपर लीक से निरस्त होती हैं?


एनईईटी जैसी परीक्षाओं में लीक का मुख्य कारण मानवीय हस्तक्षेप और कमजोर सुरक्षा है। पेपर सेटिंग, प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्टेशन और परीक्षा केंद्रों तक पहुंच, हर चरण में भ्रष्टाचार की गुंजाइश है। एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) पर बहुत अधिक बोझ है। ऐसे में कई परीक्षाएं आउटसोर्स की जाती हैं, जहां प्राइवेट प्रिंटिंग प्रेस और लॉजिस्टिक्स कंपनियां शामिल होती हैं। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में पेपर लीक की गुंजाइश को नकारा नहीं जा सकता।  


गौरतलब है कि एक पेपर लाखों रुपये में बिकता है। जिसके पीछे छात्रों का दबाव, कोचिंग उद्योग का सैकड़ों करोड़ का कारोबार और राजनीतिक संरक्षण पेपर लीक को बढ़ावा देते हैं। वहीं देश में इस अपराध की कानूनी सजा कमजोर है, आरोपी आसानी से ज़मानत पर बाहर आ जाते हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में 70-90 से अधिक पेपर लीक के मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन किसी भी मामले में किसी बड़े अधिकारी को कोई सज़ा नहीं सुनाई गई। 



वहीं एनटीए की ‘एड-हॉक’ व्यवस्था, संस्थागत स्मृति की कमी और पारदर्शिता की अनुपस्थिति इस समस्या को गहरा बनाती है। ओएमआर शीट्स का इस्तेमाल, डिजिटल ट्रांसिशन में देरी और चेन-ऑफ-कस्टडी की कमी लीक को आसान बनाती है।


गौरतलब है कि हमारे देश में ही आईआईटी-जेईई में लीक लगभग नहीं के बराबर होता। इसका कारण स्पष्ट हैं, बहु-स्तरीय सुरक्षा: पेपर सेटिंग आईआईटी प्रोफेसरों द्वारा कैंपस में होती है। कई सेट तैयार किए जाते हैं, जिसमें सीबीटी (कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट) फॉर्मेट से अंतिम मिनट तक बदलाव संभव होता है। कम आउटसोर्सिंग के कारण ये प्रक्रिया आईआईटी संस्थानों के सीधे नियंत्रण में ही रहती है। जेईई भारत की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा है। इसलिए इसमें शामिल लोग अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। इसके साथ ही तकनीकी का पूरा इस्तेमाल किया जाता है: जिससे  रैंडमाइज्ड प्रश्न, मजबूत एन्क्रिप्शन और सख्त निगरानी की जाती है। जेईई में लाखों छात्र शामिल होते हैं, फिर भी इस पर उनका विश्वास कायम है। यानी कि समस्या परीक्षा के आकार में नहीं, बल्कि प्रबंधन और इरादे में है।



भारत अकेला ही ऐसा देश नहीं है जहाँ बड़े पैमाने पर ऐसी परीक्षाएं होती हैं। चीन का गाओकाओ एक करोड़ तीस लाख छात्र जिसमें बैठते हैं वो दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक है । पर इसमें लीक की घटनाएं नगण्य हैं। पेपर को परमाणु हथियारों जैसा ‘टॉप सीक्रेट’ माना जाता है। पेपर सेटर्स एक महीने पहले से ही आइसोलेशन में भेजे जाते हैं। पर्चों की प्रिंटिंग जेलों या विशेष सरकारी सुविधाओं में की जाती है जहाँ फोन/संपर्क प्रतिबंधित रहता है। पर्चों का ट्रांसपोर्ट पुलिस और आर्म्ड फोर्सेस, द्वारा एयरटाइट सुरक्षा में किया जाता है। इसके बाद इन पर्चों को आर्म्ड गार्ड्स, 24x7 कैमरा निगरानी के साथ सुरक्षित रखा जाता है। जहाँ फेशियल रिकग्निशन, ड्रोन, सिग्नल जैमर्स द्वारा ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जाती है। इतना ही नहीं चीन में सख्त कानूनों के चलते लीक को देशद्रोह माना जाता है, जिसकी कड़ी सजा दी जाती है। समाज इसे राष्ट्रीय त्योहार की तरह देखता है। परिणाम: लगभग शून्य बड़े लीक।


2026 के नीट परीक्षाओं के ‘री-एग्जाम’ के लिए भारतीय वायुसेना को पेपर ट्रांसपोर्ट के लिए बुलाया गया है। सेना  भी लॉजिस्टिक्स में मदद देगी। ऐसा पहली बार हुआ है। जानकर मानते हैं कि सैन्य अनुशासन और निष्पक्षता से विद्यार्थियों और जनता का विश्वास बढ़ेगा। लेकिन वहीं कुछ लोग इसे सिस्टम की विफलता का स्वीकारोक्ति भी मानते हैं। सैन्य बल देश की सीमा की रक्षा करती है, ऐसे में इन्हें शिक्षा मंत्रालय/एनटीए की जिम्मेदारी नहीं संभालनी चाहिए। यह ‘फायरफाइटिंग’ तो अवश्य है, लेकिन समाधान नहीं। यदि प्रबंधन सही होते तो ऐसे संसाधनों का दुरुपयोग रोका जा सकता था। यह अच्छा अल्पकालिक कदम हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। चीन की तरह सिविलियन सिस्टम को मजबूत बनाना चाहिए, न कि सेना पर निर्भर होना।


लीक रोके बिना भारत का मानव संसाधन विकास असंभव है। ऐसे में सरकार को लीक रोकने और प्रभावी प्रबंधन के विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए। जैसे कि पूर्ण डिजिटलीकरण, रैंडम प्रश्न। केंद्रीकृत, आईआईटी/यूपीएससी जैसे मॉडल की तरह स्वायत्त प्राधिकरण। लीक से निपटने के लिए सख्त कानून बनें जहाँ लीक को राष्ट्रीय सुरक्षा अपराध माना जाए और ऐसे मामलों का समयबद्ध ट्रायल हो। इसके साथ ही कोचिंग जैसे बीडी उद्योग का रेगुलेशन किया जाए जो कि पारदर्शी हो।


एनईईटी विवाद छात्रों, परिवारों और राष्ट्र के लिए दर्दनाक है। आत्महत्याएं, आर्थिक नुकसान और विश्वास का ह्रास हो रहा है। आईआईटी-जेईई साबित करता है कि भारत में सक्षम सिस्टम संभव है। वहीं चीन दिखाता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति से बड़े पैमाने पर परीक्षाएं सुरक्षित हो सकती हैं। सशस्त्र बलों की मदद स्वागत योग्य है, लेकिन यह सिस्टम की नाकामी है। सरकार को एनटीए का पुनर्गठन, जवाबदेही और सुधारों पर फोकस करना चाहिए। युवाओं का भविष्य राजनीति या मुनाफे की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। शिक्षा राष्ट्र की नींव है इसे मजबूत बनाएं, वरना ‘विश्व गुरु’ का सपना अधूरा रहेगा।


Monday, June 8, 2026

नकलमुक्त शिक्षा व्यवस्था प्रबंधन कैसे हो ?

हाल ही में रद्द हुई नीट परीक्षाओं के विवाद से देश भर में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। ये परीक्षाएं दोबारा करवाने की बात भी हो रही है। लेकिन अक्सर यह देखा गया है कि भारत में होने वाली परीक्षाओं में या तो पेपर लीक किए जाते हैं या फिर परीक्षाओं के समय बड़े स्तर पर नक़ल की जाती है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता रहती है कि जो परीक्षाएँ हों, न तो उनके पेपर लीक हों न ही ऐसी परीक्षाओं में नकल हो। लेकिन असल में वास्तविकता इसके विपरीत ही हो जाती है। ऐसा नहीं है कि देश में नक़लमुक्त शिक्षा संभव नहीं है। कमी है तो सिर्फ़ इसके प्रबंधन की। 

प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश का हर युवा, देश के विकास में योगदान करे। इसके लिए उन्होंने ‘कौशल विकास’ का विशेष मंत्रालय भी बनाया है। सर्वविदित है कि सरकार हर नौजवान को नौकरी नहीं दे सकती है। निजी क्षेत्र, कृषि या स्वरोजगार ही वो रास्ते है, जिनके जरिये एक नौजवान अपने जीवन में स्थायित्व ला सकता है। जीवन जीने की चुनौतियां अनेक है। जिनका सामना करने के लिए, हर युवा का संतुलित विकास होना आवश्यक है। व्यक्तित्व विकास का एक महत्वपूर्णं अंग शिक्षा है। अशिक्षित युवा के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाती है। पर समस्या इस बात की है कि जिन्हें शिक्षित या डिग्रीधारी माना जाता है, वे स्वयं ही अंधेरे कुऐं में पड़े हैं। डिग्रियां हाथ में हैं, फिर भी वे शिक्षित नहीं कहे जाते।


वैसे तो संपूर्ण भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था अपनी आत्मा और आधारभूत संरचनाओं में वर्तमान एवं भावी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। परन्तु विशेषतः उत्तर प्रदेश के परिपेक्ष में इसे सरकारी संरक्षण में नकल माफिया के हाथ सौंपकर इसकी लगभग हत्या ही कर दी गयी है। आश्चर्य जनक है कि समाज, सरकार, प्रशासन और मीडिया, इस न बदली जा सकने वाली सामाजिक और राष्ट्रीय बर्बादी पर चुप्पी साधे है।



सारे साल स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाई न के बराबर होती है। शिक्षा व्यवस्था के प्रबंध तंत्र, शिक्षक एवं छात्र सभी भाई-भतीजावाद एवं पैसों के लेनदेन से नकल कराकर प्रमाणपत्र हासिल कर लेने के दुश्चक्र में फंस चुके हैं। इस माफिया का अंग बना युवा, मेधावी बच्चों की संभावनाओं का गला काटकर, अपने प्रमाण पत्र लहराकर शिक्षित दिखता है, सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है या फिर बड़े संस्थानों में प्रवेश पा लेता है। जबकि मेधावी छात्र, जो इस फरेब का अंग नहीं बनना चाहते, वे पीछे छूट जाते हैं। इससे उपजी अर्थव्यवस्था से सरकारी अधिकारी परीक्षा करने वाली संस्थाएं, स्कूल-कॉलेजों के मालिक, शिक्षक, माफिया एवं निकम्मे छात्र लाभान्वित होते हैं और भारत के ताबूत में हर साल कीलें ठोक रहे हैं। आश्चर्य है कि इस सामूहिक बर्बादी पर सब चुप हैं। सरकार शायद विवश है कि वो निकम्मे और जाल-साज शिक्षकों पर अच्छा काम करने का दबाव डालना नहीं चाहती क्योंकि वह चुनाव तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।



प्रदेशों में कई बार ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं जिन्होंने बातें तो बड़ी-बड़ी की लेकिन बजाए इसके कि वो शिक्षा में सुधार लाते, उन्होंने एक ऐसा शिक्षा माफिया खड़ा कर दिया, जिसने विद्यार्थियों की नकल करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया और इससे उपजने वाले धन के संग्रहण के लिए पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी। कोई भी पीढ़ी जिसकी शिक्षा की जड़ें हवा में हों, मजबूत भारत के निर्माण में कैसे सहायक होगी? खोखली शिक्षा के आधार पर तैयार ये पीढ़ी, जिसके हाथों में स्मार्ट फोन है, वही इस माफिया तंत्र का हिस्सा बन जाता है और ये क्रम निरंतर जारी है।


छोटे-छोटे देश अपनी मजबूत शिक्षा व्यवस्था की वजह से विकसित देशों की कतार में आ गए हैं। हमने माफिया को शिक्षा व्यवस्था सौंपकर अपनी कम से कम दो पीढ़ियों को निकम्मा और लाचार बना दिया है। इस बात की ज्यादा संभावना है कि ये पीढ़ी, नक्सलवाद, आतंकवाद और संगठित अपराध की ओर जाए। ऐसे में ऐसी पीढ़ी न समाज के लिए और न ही देश के विकास के लिए कोई योगदान देने में सक्षम हो पायेगी।


यदि हमें एक विकसित समाज और देश की संरचना करनी है, जैसा हमारे नेता भी अपने चुनावी भाषणों में बोलते हैं, तो नेताओं व बुद्धिजीवियों को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करनी ही होगी, जिसमें तकनीक द्वारा संचालित नकल मुक्त शिक्षा पद्धतियों का विकास, मानकीकरण एवं निगरानी अनुभवी व्यक्तियों की समिति या आयोग द्वारा की जाए। नौकरशाही, शिक्षकों एवं पुलिस द्वारा केवल प्रबंधन ही किया जाए। क्योंकि नौकरशाही, शिक्षक एवं पुलिस इस व्यवस्था को ठीक करने में लगातार नाकाम रहे हैं।


तकनीकी पर आधारित शिक्षा व्यवस्था ही हमें इस मानवीय दुर्गुण से बचा सकती है। अन्यथा हम ऐसे सामूहिक विनाश की तरफ अग्रसर होंगे, जिसे ठीक करने का मौका भी समय हमे नहीं देगा और भावी पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। आशा की जानी चाहिए कि सभी शिक्षाविद् इसकी महत्ता को समझेंगे और वर्तमान नेतागण इस विषय पर गंभीर और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे और इस अधोगति को रोकने में सहायक होंगे।

आजादी के बाद से आज तक शिक्षा को सुधारने के लिए दर्जनों आयोग बने और उन्होंने तमाम सुझाव भी दिये। जिसकी रिर्पोट दशाब्दियों से धूल खा रही है। जब देश में इतना कुछ बदल रहा है, तो प्रदेशों की सरकार को अपने-अपने प्रदेशों के शिक्षा तंत्र से इस माफिया को दूर करना चाहिए और शिक्षा नीति में बड़ा परिवर्तन करना चाहिए। तभी होगा ‘सबका साथ और सबके विकास‘ का नारा सार्थक।