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Monday, July 20, 2026

मंदिरों का प्रबंधन कैसे हो?

जबसे अयोध्या के श्री राम मंदिर में भारी मात्रा में चढ़ावा चोरी की खबरें सामने आई हैं उसके बाद से देश के अन्य मंदिरों के भी ऐसे घोटाले रोज़ सामने आ रहे हैं। फिर वो चाहे जम्मू कश्मीर के माता वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड का मामला हो, उत्तराखंड के केदारनाथ व बद्रीनाथ धाम का हो या मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकाल का हो या आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम का हो, हर जगह से भारी मात्रा में रुपया व सोने-चाँदी के चोरी के समाचार आ रहे हैं। सनातन धर्म के मंदिरों की संपत्ति पर सैंकड़ों सालों से लुटेरों की गिद्ध-दृष्टि रही है। फिर वो चाहे यवन आक्रांता हों या देश के ही विभिन्न राज्यवंशों के हिंदू या बौद्ध राजा ही क्यों न हों या अंग्रेज़ हुक्मरान और आज़ादी के बाद विभिन्न दलों के राजनेता। सबने जब मौक़ा मिला मंदिरों की अरबों की संपत्ति को चुराया या लूटा है। करण स्पष्ट है कि धर्म-प्रधान देश होने के कारण सनातन धर्म के मंदिरों में हमेशा से भावुक भक्त उदारता से सोना-चाँदी, ज़मीन-जायदाद और हीरे जवाहरात दान करते आए हैं। इस संपत्ति के प्रबंधन की कोई सुव्यवस्थित पारदर्शी व्यवस्था स्थापित नहीं की गई है। हर मंदिर के संरक्षकों, सेवायतों और भक्तों द्वारा अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार प्रबंधन की व्यवस्थाएं की जाती हैं। 


इस दिशा में जो सबसे प्रभावशाली उदाहरण है वो दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य का है। चोल राजवंश ने तमिलनाडु और आसपास के भूभाग पर नवीं से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक शासन किया। इन शासकों के कार्यकाल में विदेशों से व्यापार और देश में अच्छे उत्पादन के कारण बहुत सम्पन्नता आई। चोल राजाओं ने अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मंदिरों पर केंद्रित रखा। हर गांव, कस्बे और नगर की सभी आर्थिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक, कलात्मक, शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र ये मंदिर हुआ करते थे। इन मंदिरों में लोकतांत्रिक प्रणाली से विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समितियों का चयन किया जाता था। जैसे सरोवरों का प्रबंधन, कर संग्रह, वनों का संरक्षण आदि, इन्हीं समितियों के दायित्व होते थे। इस तरह हर मंदिर स्थानीय समाज के नियंत्रण में काम करता था। इस आशय के जो शिलालेख मिले हैं उनमें इन मंदिरों की कार्यप्रणाली का विस्तृत ब्योरा है। 


आज उपरोक्त अनेक क्षेत्रों में विभिन्न सरकारी या ग़ैर-सरकारी एजेंसियां काम कर रही हैं। इसलिए मंदिर पूरे समाज की गतिविधियों का केंद्र नहीं हो सकते। पर मंदिरों का प्रबंधन समाज की ही ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन लोगों की होनी चाहिए जो उस मंदिर विशेष को नियमित रूप से उदारता से दान देते हैं। ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से अपने श्रम अर्जित धन को उदारता से उस मंदिर को दान देता है वह उस धन की चोरी भी करेगा। ये हमारे संस्कारों में नहीं है। जो दैविक द्रव्य की चोरी करते हैं वे चाहे आस्तिक होने का कितना ही आडम्बर क्यों न रचें, निरे नास्तिक होते हैं। फिर वे चाहें किसी संगठन से जुड़े हों या राजनैतिक दल से। ऐसे लोगों को मंदिरों के प्रबंधन से कोसों दूर रखना चाहिए। इनमें सरकारी अधिकारी और न्यायपालिका के सदस्य भी शामिल हैं। हर मंदिर के प्रबंधन में प्रभावी मार्ग निर्देशक की भूमिका उस सम्प्रदाय के प्रतिष्ठित संतों को सौंपी जानी चाहिए। इस पूरे तंत्र के ऊपर निगरानी रखने का दायित्व चारों मान्य शंकराचार्यों का होना चाहिए। उन आत्मघोषित फर्जी शंकराचार्यों या नए बनाए गए तथाकथित संतों का नहीं जो किसी न किसी राजनैतिक दल या नेता द्वारा प्रायोजित किए जाते हैं। 


इसके साथ ही केंद्र या प्रांतों की सरकारों को मंदिरों के प्रबंधन में या उनकी समितियों में अपने प्रतिनिधि नामित करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। क्योंकि ऐसे नामित व्यक्तियों की जवाबदेही विराजमान देव विग्रह, उस संप्रदाय या उसके प्रतिष्ठित संतों के प्रति नहीं होती। इन लोगों की जवाबदेही तो अपने प्रशासनिक और राजनैतिक आकाओं के प्रति ही होती है। इसलिए इनकी मौजूदगी के बावजूद सरकारी अधिकृत मंदिरों में बड़े-बड़े घोटाले होते हैं। जैसे तिरुमाला तिरुपति देवस्थानममें आईएएस सीईओ के बावजूद भगवान को लगने वाले भोग के लड्डुओं में जानवरों की चर्बी पाई गई या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के भंडार में रखी चाँदी गलाने पर 80 फ़ीसदी नक़ली निकली। कोई भक्त तो नक़ली चाँदी चढ़ाएगा नहीं, क्योंकि सोना या चाँदी चढ़ाने की उस पर कोई बाध्यता नहीं होती। जो भक्त चाँदी या सोना चढ़ाता है वो श्रद्धा से चढ़ाता है। ज़ाहिर है कि चढ़ी हुई चाँदी को बदल कर व्यवस्थापकों द्वारा नक़ली चाँदी रखी गई होगी। 


सरकार का काम तो बस इतना होना चाहिए कि देश के बड़े धर्माचार्यों, विशेषकर चारों शंकराचार्यों के निर्देश में मंदिरों के प्रबंधन की एक नियमावली बना दी जाए। जिसमें प्रबंधन की कार्यप्रणाली का विस्तृत ब्योरा हो, साथ ही यह भी स्पष्ट हो कि चढ़ावे की संपत्ति का निस्तारण किस फार्मूले के तहत होगा? कितना धन मंदिर के रख-रखाव पर खर्च होगा? कितना देव विग्रह की सेवा-पूजा और विग्रहों पर खर्च होगा? कितने धन को भविष्य निधि के रूप में बैंकों में जमा कराया जाएगा? कितने धन को मंदिरों के सेवायतों के रख-रखाव पर खर्च किया जाएगा? कितने धन को निर्धन श्रद्धालुओं के भोजन, शिक्षा और इलाज पर खर्च किया जाएगा? और कितने धन को जनसुविधाओं के विस्तार पर खर्च किया जाएगा? इस नियमावली का शब्दशः अनुपालन करने की बाध्यता हर मंदिर की प्रबंध समिति की होनी चाहिए। हर समिति को सालाना ऑडिट कराना और ऑडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक करना अनिवार्य होना चाहिए। 


इसी तरह का प्रारूप मस्जिदों, गुरुद्वारों, चर्चों और अन्य धर्मों के केंद्रों के प्रबंधन के लिए भी बनाया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा नहीं है कि चढ़ावे की चोरी सिर्फ मंदिरों में ही होती है। अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों पर भी ऐसी मानवीय दुर्बलता समय-समय पर सामने आती रहती हैं। अब देखना यह है कि नेता और अफसर व धनलोलुप, ऐश्वर्यशाली तथाकथित संत ऐसी पारदर्शिता को लागू होने देंगे या नहीं?    

Friday, June 26, 2026

चढ़ावा चोरी जघन्य पाप है !

अयोध्या के श्री राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को लेकर रोज़ विस्फोटक खुलासे हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो जांच समिति गठित की है वो अपने उद्देश में कितनी सफल हो पाएगी ये तो उसकी रिपोर्ट देखने के बाद ही पता चलेगा। किंतु एक बात निश्चित है कि भगवान के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन, सोना, चाँदी व जवाहरात आदि की लेशमात्र भी चोरी करना हमारे शास्त्रों में जघन्य अपराध बताया गया है। चूँकि योगी जी सनातन धर्म की ध्वजा संभालने में गर्व महसूस करते हैं इसलिए आशा की जानी चाहिए कि वे इस दान चोरी के सभी आरोपियों को यथासंभव सनातन धर्म के नियमों के अनुसार कठोरतम सज़ा देंगे। 

उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्मशास्त्रों में देवद्रव्य (देवता की संपत्ति) की चोरी को अत्यंत गंभीर पाप माना गया है। मनुस्मृति के अनुसार देवता की संपत्ति (सोना आदि) चोरी पर मृत्यु दंड का प्रावधान है। बृहस्पति स्मृति के अनुसार चोरी किए गए द्रव्य और सोना, रत्न आदि की कीमत का दोगुना जुर्माना भरना पड़ता है या अपराधी को मृत्युदंड दिये जाने का प्रावधान है। गरुड़ पुराण आदि में नरक के वर्णन में चोरों के लिए विशेष यातनाएँ जैसे जलते अंगारों पर चलना, ख़ूँख़ार कुत्तों द्वारा पीछा किए जाना, आदि का वर्णन आता है। चढ़ावा भगवान का होता है, उसे चुराना भगवान से चोरी के समान है। यह कर्म का भारी बोझ बनता है—इस जन्म में अपयश और अगले जन्म में घोर दुख मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि ऐसा पाप क्षमा नहीं होता जब तक पूर्ण प्रायश्चित न हो। तात्पर्य यह है कि श्री राम मंदिर अयोध्या के चढ़ावा चोरी के सभी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए, अन्यथा भक्तों का विश्वास सरकार पर नहीं रहेगा। क्योंकि श्री राम मंदिर के सभी ट्रस्टी सरकार द्वारा मनोनीत हैं, वे अपनी किसी धार्मिक उपलब्धि या सनातन धर्म के ऊँचे पद पर आसीन होने के कारण ट्रस्टी नहीं बनाए गए थे। 


2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश महोदय के अनुरोध पर मैंने मथुरा के दो प्रसिद्ध मंदिरों के रिसीवर का अवैतनिक पद स्वीकार किया। ये थे वृंदावन के श्री बांके बिहारी जी का मंदिर व गोवर्धन की दान घाटी का मंदिर। मंदिर प्रबंधन की चुनौती थी चढ़ावे की राशि का ईमानदारी से आंकलन और उसे बैंक में जमा कराना। इसमें काफी गड़बड़ी की शिकायत आती थी। मंदिर की आमदनी भी बहुत कम थी। एक वरिष्ठ गोस्वामी का फोन आया कि मैं हर महीने चौदह में से दो दान-पात्र अपने लाभ के लिए अलग करवा लूँ। ये सुनकर मुझे बहुत धक्का लगा। लेकिन इसे एक चेतावनी मानकर मैंने एक नई व्यवस्था बनाई। मंदिर के प्रांगण में जहाँ गुल्लकें (दानपत्र) खोली जाती थीं वहाँ वीडियो कैमरे लगवा दिए और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्कता बरतने के लिए वहाँ बिठा दिया। परिणाम यह हुआ कि पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा दानराशि गुल्लकों से निकली, जिसे बैंक में जमा करा दिया गया।


एक और रोचक अनुभव हुआ जो अयोध्या के संदर्भ में बहुत उपयोगी रहेगा। कैसे दानदाता और मंदिर प्रबंधन के बीच बिचौलिए दान का धन हड़प लेते हैं। वृन्दावन के एक प्रतिष्ठित नागरिक हैं, जो काफी धनवान हैं और आजकल एक प्रमुख राजनैतिक दल के नेता भी हैं। एक दिन सुबह वे मेरे घर आये और बोले कि उनके परिचित कलकत्ता के एक सेठ, बिहारी जी मंदिर को मोटी रकम नकद दान देना चाहते हैं। पर वो आपके हाथ में ही पैसा देना चाहते हैं। उन्हें मैं आज शाम को आपके घर लेकर आऊंगा। आप दान ले लेना और उसमें से एक तिहाई रूपये आप रख लेना व एक तिहाई रूपये मुझे दे देना। बाकी मंदिर में जमा करा देना। मैंने उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई। निर्धारित समय पर मंदिर के मैनेजर, अकाउंटेंट और दो बैंकों के कैशियरों को पहले से बुलाकर अपनी कोठी के स्टाफ क्वार्टर में बिठा दिया। दानदाता और उन स्थानीय नेता की मैंने आवभगत की। जब सेठ जी नोटों की गड्डियां बैग से निकालने लगे तो मैंने फौरन मंदिर के स्टाफ को वहीं बुला लिया। यह देख कर वो नेता जी बहुत विचलित हो गए। मंदिर स्टाफ ने जब नोट गिन लिए तो मैंने उन्हें यह सब धनराशि बैंक में जमा कराने को कह दिया और उन्हें तुरंत  ‘गुप्तदान’ की रसीद काट कर दिलवा दी। उस दिन के बाद से ऐसा प्रस्ताव लेकर कोई मेरे पास नहीं आया। श्री राम मंदिर अयोध्या के ट्रस्टीगणों ने अगर पहले दिन से चढ़ावे की व्यवस्था पारदर्शी बनाई होती तो आज उन्हें इतनी बदनामी नहीं झेलनी पड़ती। समाचार पत्रों से पता चल रहा है कि जब से ये चढ़ावा विवाद सामने आया है तब से मंदिर को होने वाली दान की आय एक-तिहाई से भी कम हो गई है। स्पष्ट है कि इस विवाद से सभी सनातन धर्मियों को गहरा आघात लगा है। 


त्रिवेंद्रम के विश्व प्रसिद्ध व दुनिया के सबसे ज़्यादा संपन्न पद्मनाभ स्वामी के मंदिर का उदाहरण पूरे भारत के लिए अनुकरणीय है। इस मंदिर का स्वामित्व वहाँ के राज परिवार के पास है। मंदिर के लॉकरों में लाखों करोड़ रुपये का सोना, चाँदी और जवाहरात जमा है। उल्लेखनीय बात यह है कि सदियों से राज परिवार ने अपनी निज संपत्ति होते हुए भी मंदिर के चढ़ावे में से कभी एक अंश भर भी लेना स्वीकार नहीं किया। हर दिन प्रातः भगवान के प्रथम दर्शन का अधिकार राज परिवार को प्राप्त है। ये परिवार जब हर रोज़ दर्शन करके मंदिर से बाहर निकलता है तो मंदिर के द्वार पर बैठ कर अपने पैर के तलवों पर चिपक गई मंदिर की धूल को अपने हाथों से झाड़ कर वहीं गिरा देता है। तात्पर्य यह है कि भगवान के मंदिर से धूल का कण भी ले जाना उनकी दृष्टि में जघन्य अपराध है। पिछले कुछ दशकों से केंद्र और राज्य सरकारें मंदिरों के अधिग्रहण के प्रति अति-उत्साहित हैं। पर अनुभव बताता है कि इन व्यवस्थाओं में लगाए जाने वाले लोग प्रायः संदेहास्पद आचरण वाले ही होते हैं। ऐसे में सरकारों को इस नीति को त्याग कर मंदिरों का प्रबंधन विरक्त संत महात्माओं या धन्ना सेठों को सौंपना चाहिए जिनकी भगवान में आस्था है और जो दैविक द्रव्य की चोरी को विषपान के समान समझते हैं।  

Monday, June 1, 2026

गौ-माता राष्ट्रीय पशु घोषित हो !

पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजों ने वो कर दिखाया जिसका दशकों से इंतज़ार था। पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने बक़रा ईद पर गौवंश की बलि न चढ़ाने का फ़ैसला किया है। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के मुसलमान संगठनों ने भारत सरकार से गौ-माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग की है। उन्होंने गौ हत्या करने वालों और गौ मांस का निर्यात करने वालों को सख्त सज़ा दिए जाने का क़ानून बनाने की भी माँग की है। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है तब से लगातार गौ हत्या को लेकर गौ रक्षकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आक्रोश व्यक्त किया जाता रहा है। इतना ही नहीं गौ मांस खाने व ले जाने के संदेह में कई बार मुसलमानों पर हिंसक हमले भी किए गए हैं। इस सबसे मुसलमानों के बीच ये संदेश गया है कि हिंदुस्तान में गौ वंश की हत्या को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए उनका ये ताज़ा फ़ैसला और गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग एक समझदारी भरा कदम माना जाना चाहिए। मुस्लिम समाज के नेताओं को यहीं माँग देश के अन्य प्रांतों से भी उठानी चाहिए।   

उल्लेखनीय है कि हमारे पूरे इतिहास में, इस देश के शासकों और आदर्श व्यक्तियों ने गाय की रक्षा और पोषण किया है। राजा पृथु, जिनके नाम पर पृथ्वी को पृथ्वीकहा जाता है, ने पृथ्वी के स्वरूप वाली गाय का दोहन कर पृथ्वी पर अकाल को समाप्त किया और मानवता की रक्षा की। भगवान श्रीकृष्ण एक गोपाल (गाय चराने वाले) थे। अर्जुन ने विराटनगर के युद्ध में गायों की रक्षा के लिए 14 वर्ष का और निर्वासन झेलने का जोखिम उठाना उचित समझा। राजा नहुष को ऋषि च्यवन के जीवन के बराबर पुरस्कार देकर मछुआरों को मुआवजा देना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने उन्हें एक गाय दान कर दी। चोल राजा मनु नीति चोलन ने अपने पुत्र वीधिविदंगन को मार डाला, क्योंकि उसके रथ के पहियों के नीचे एक गाय का बछड़ा कुचल गया था।


मुगल सम्राट अकबर (1556–1605), जहांगीर (1605–1627), और अहमद शाह (1748–1754) ने भी गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाए थे। मैसूर के सुल्तान हैदर अली (1761-82) ने गौ-हत्या को दंडनीय अपराध बनाया, जिसमें अपराधियों के हाथ काटे जाते थे। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में, सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पूरे राज्य में गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने 1857 में गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाया, गोमांस खाने पर रोक लगाई और गाय की हत्या करने वाले किसी भी व्यक्ति को तोप से उड़ाकर सजा देने की घोषणा की।


मराठा, जो सभी धर्मों के प्रति समावेशी और सहिष्णु माने जाते थे, उन्होंने गौ-हत्या को रोकने के लिए व्यापक कदम उठाए और गायों को मारने वालों से कठोरता से निपटा। कई मामलों में उन्हें फाँसी भी दी गई। उन्होंने 1790 के दशक के अंत में बसेन (वर्तमान वसई, महाराष्ट्र) के आसपास नाकेबंदी भी कर दी थी, ताकि गायों की लाशों को बॉम्बे और सलसेट के कसाइयों तक तस्करी से न पहुँचाया जा सके। हिंदू धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज से लेकर आज तक हर संत और सनातन धर्मी गौ वंश की हत्या रोकने की मांग करता आया है। फिर भी रोज़ाना भारत से हज़ारों ट्रक गौ वंश काटने के लिए अवैध रूप से बांग्लादेश भेजा जाता है। आश्चर्य है कि बीएसएफ उसे रोक क्यों नहीं पाती?   


दरअसल गौरक्षा का मुद्दा बिल्कुल धार्मिक नहीं है। यह तो शुद्धतम रूप में लोगों की कृषि, अर्थव्यवस्था और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है। हजारों साल पहले भारत के ऋषियो ने गौवंश के असीमित लाभ जान लिए थे। इसलिए उन्होंने भारतीय समाज में गौवंश को इतना महत्व दिया। अंग्रेज़ शासकों ने बाकायदा रणनीति बनाकर भारतीय गौवंश को पूरी तरह नष्ट करने का अभियान चलाया, जो आज तक चल रहा है। क्योंकि वह जानते थे कि हजारों साल से भारत की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत गौ आधारित कृषि रहा था। बिना गौवंश की हत्या किए भारत और भारतीयों को कमजोर नहीं किया जा सकता था। आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसमें बड़ी होशियारी से पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई। उन्होंने इस तरह की मानसिकता तैयार की कि घर-घर में पलने वाली गाय हमारी उपेक्षा और हीनभावना का शिकार हो गयी। जिससे गाय का दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ सेवन करके हर भारतीय परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान रहता था। आज आम भारतीयों को जीवन के लिए पोषक तत्व प्राप्त नहीं हैं। दूध, दही, घी के नाम पर जो बड़े ब्रांडो के नाम से बेचा जा रहा है, उसमें कितने कीटनाशक, रासायनिक खाद्य और नकली तत्व मिले हैं, इसका अब हिसाब रखना भी मुश्किल है। नतीजा सामने है कि मेडीकल का व्यवसाय हर गली व शहर में तेजी से पनप रहा है।


चिंता और दुख की बात ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन पर जीने वाले कैसे देश के हित में सोच सकते हैं ? वह तो वही लिखेंगे और बोलेंगे, जो उनके कॉरपोरेट आका उन्हें लिखने को कहेंगे। इस लॉबी के खिलाफ देशभक्तो को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। पर हिंसा से नहीं तर्क और प्रमाण के साथ। भारतीय गौवंश की श्रेष्ठता को भारतीय जनमानस के सामने लगातार हर मंच पर इस तरह रखना होगा कि एक बार फिर भारतीय परिवार गौवंश को अपने आंगन में स्थान दे।


गांवों में तो यह आसानी से संभव है, पर दुख की बात है कि वहां भी आज गौवंश की उपेक्षा हो रही है। हमने हमेशा कहा है कि गाय गौशाला में नहीं, बल्कि जब हर घर के आंगन में पलेंगी, तब गौवंश की रक्षा होगी। जिनके पास स्थान का अभाव है, उनकी तो मजबूरी है। पर वह भी भारतीय गौवंश के उत्पादों को सामूहिक रूप से प्रोत्साहन देकर अपने परिवार और समाज का भला कर सकते है। भूटान में हर व्यक्ति सुखी है, क्योंकि उनका जीवन गौ और कृषि आधारित है। उन्हें दुनिया के साथ दौड़ने की इच्छा नहीं है। क्योंकि वह तीव्र औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से परिचित हैं।

फिर भारत क्यों औद्योगीकरण की और ‘बीफ’ निर्यात की अंधी दौड़ में भागना चाहता है, जिसका फल भौतिक प्रगति तो हो सकता है, पर उससे समाज सुखी नहीं होता। बल्कि समाज और ज्यादा असुरक्षित होकर तनाव में आ जाता है। भारत की सनातन संस्कृति सादा जीवन और उच्च विचार को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देती है। इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज हजारों साल से निरंतर जिंदा रहा है। जबकि पश्चिमी समाज ने एक शताब्दी के अंदर ही औद्योगीकरण के नफे और नुकसान, दोनों का अनुभव कर लिया है। अब वह भारतीय जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में भारत को फिर से विश्वगुरू बनना होगा। जो गौ आधारित जीवन और वेद आधारित ज्ञान से ही संभव है। इसमें न तो कोई अतिश्योक्ति है और न ही कोई धर्मांधता। कहीं ऐसा न हो कि सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया। 

Monday, December 16, 2024

मुसलमान ज़रा सोचें


हर जमात में शरीफ लोगों की कमी नहीं होती। मुसलमानों में भी नहीं है। चाहे भारत के हों या पाकिस्तान के। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इम्तियाज अहमद उन मुसलमानों में से थे जिन्होंने भारत में इस्लाम की हालत पर वर्षों गहन अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। इस पुस्तकों में उन्होंने बताने की कोशिश की है कि भारत में रहने वाले मुसलमानों का सामाजिक जीवन, सोच और प्राथमिकतायें दूसरे देशों के मुसलमानों से भिन्न हैं और भारतीय हैं। उनका मानना है कि धर्मान्धता से ग्रस्त होकर विद्वेष की भावना रखने वाले मुसलमानों की संख्या बहुत थोड़ी है। भारत में रहने वाले ज्यादातर मुसलमान ये जानते हैं कि उनका जीवन पाकिस्तान में रह रहे मुसलमानों से कही बेहतर है। जितनी आजादी और आगे बढ़ने के अवसर उन्हें भारत में मिले हैं, उतने कट्टरपंथी पाकिस्तान में नहीं मिलते।



आमतौर पर यह माना जाता है कि पूरे देश का समाज हिन्दू और मुसलमान दो खेमों में बंटा है। इन दोनों खेमों के बीच स्थाई द्वेष और अपने अपने खेमे के भीतर भारी एकजुटता है। दोनों पक्षों के धर्मान्ध नेता इस मान्यता को बढ़ाने में काफी तत्पर रहते हैं। हकीकत यह नहीं है। कश्मीर के एक मुसलमान को यह देखकर आश्चर्य होगा कि तमिलनाडु के मुसलमानों के घर बारात का स्वागत केले के पत्ते, नारियल और इलायची से वैसे ही किया जाता है जैसे किसी हिन्दू के घर में। कश्मीर का मुसलमान तमिलनाडु के मुसलमान के घर का भोजन खाकर तृप्त नहीं होता ठीक वैसे ही जैसे तमिलनाडु का मुसलमान तमिल घर में भोजन खाकर ही प्रसन्न होता है। बात बात पर उत्तेजित हो जाने वाली बंगाल की आम जनता के साथ अगर आप रेलगाड़ी के साधारण डिब्बे में सफर कर रहे हैं और आपकी बहस किसी स्थानीय व्यक्ति से हो जाए तो आप अपने को अकेला पाएंगे। आपके विरोध में हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोग एकजुट होकर खड़े हो जायेंगे। वहां सवाल इस बात का नहीं होगा कि आप हिन्दू हैं या मुसलमान। आप गैर बंगाली हैं इसलिये आपके प्रति स्थानीय लोगों की हमदर्दी हो ही नहीं सकती। हर राज्य का यही हाल है। भाषा, पहनावा, भोजन, आचार विचार के मामले में भारत के भिन्न भिन्न प्रांतों में रहने वाले लोग भिन्न भिन्न समुदायों में बंटै हैं मसलन तमिल, कन्नड, केरलीय, मराठी, गुजराती, उडि़या, बंगाली, असमिया, पंजाबी, बिहारी, हरियाणवी आदि। जब तक कोई धर्मान्धता की घुट्टी पिलाने न जाए स्थानीय जनता अपने धर्म के संकुचित दायरे में ही सिमट कर नहीं रहती बल्कि परदेशी के विरूद्ध स्थानीय लोगों की एकजुटता का प्रदर्शन करती है। इसलिये यह कहना कि सारे मुसलमान एक जैसे हैं, ठीक नहीं।



ठीक इसी तरह से ये सोचना भ्रम है कि इस्लाम धर्म के मानने वाले सभी लोगों में भारी एकजुटता होती है। कुरान शरीफ के मुताबिक खुदा की नजर में उसका हर बंदा एक समान हैसियत रखता है। कोई भेद नहीं। मुसलमान दावा भी करते हैं कि वे एक पंगत में बैठकर नमाज अदा करते हैं और एक ही पंगत में बैठकर खाते हैं पर यह भी हकीकत है कि उनकी यह एकजुटता कुछ खास मकसद तक सिमट कर रह जाती है। कायदे से मुसलमानों में जाति व्यवस्था नहीं होनी चाहिये पर चूंकि भारत में रहने वाले बहुसंख्यक मुसलमान स्थानीय मूल के ही लोग हैं जिन्होंने किन्हीं कारणों से इस्लाम स्वीकार कर लिया था और जब वे मुसलमान बने तो अपने साथ वे न सिर्फ अपनी जीवनशैली ले गये बल्कि जाति व्यवस्था को भी ले गये। इसीलिये मुस्लिम समाज में भी अनेक जातियां हैं। मसलन जुलाहे, बढ़ई, लुहार, धुनिया, नाई आदि। मुसलमानों में भी तथाकथित ऊंची और नीची जातियां होती हैं ऊंची जातियों में प्रमुख हैं- सैय्यद, लोधी, पठान वगैरह। अब अगर कोई गरीब मुसलमान जुलाहा किसी पठान या सैययद के बैटे से अपनी बेटी के निकाह का पैगाम लेकर जाए तो उसे कामयाबी नहीं मिलेगी। शायद इज्जत बचाकर लौटना भी मुश्किल होगा। ठीक वैसे ही जैसे हिन्दुओं में अगर कोई केवट जाति का पिता ब्राह्मण परिवार में अपनी कन्या का प्रस्ताव लेकर जाये तो उसके साथ भी ऐसा ही होगा। इसलिये यह मानना कि सारे हिन्दू एक तरफ हैं और सारे मुसलमान एक तरफ, गलत होगा।


हिन्दूओं की तरह ही मुसलमानों में बहुसंख्यक लोग ऐसे हैं जिन्हें मजहब से ज्यादा रोजी रोटी की फिक्र है। वे चाहे पाकिस्तान में रह रहे हों या भारत में। लाहौर में बसे राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर मुबारक अली बताते हैं कि पाकिस्तान की पढ़ी लिखी आबादी तालिबान की नीतियों की समर्थक नहीं है। उन्हें डर है कि अगर कठमुल्लापन इसी तरह बढ़ता गया और इसे रोका न गया तो पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था चूर चूर हो जाएगी


मिस्त्र, इरान, इराक, मलेशिया, इंडोनेशिया और तमाम दूसरे ऐसे देश हैं जो घोषित रूप से इस्लाम में आस्था रखने वाले देश हैं पर अगर इनकी तरक्की, वेशभूषा और आधुनिकता को देखा जाए तो यह आश्चर्य होगा कि मुसलमान होते हुए भी ये इतने प्रगतिशील कैसे हैं। इन देशों के संतुश्ट और खुशहाल नागरिक बताते हैं कि उन्होंने कुरान के मूल संदेश को अपनाया है। पर साथ ही हर मोर्चे पर आगे बढ़ने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता।


जिन लोगों को 1980 के मुरादाबाद के साम्प्रदायिक दंगों की याद है उन्हें ये भी याद होगा कि इन दंगों के बाद मुरादाबाद के कलात्मक बर्तनों के निर्यात में भारी कमी आयी थी। जिसके बाद हजारों हुनरमंद कारीगरों को बदहाली से मजबूर होकर अपने बच्चों के पेट पालने के लिये रिक्शा चलाना पड़ा। जो यह करने के बाद भी अपने बच्चों का पेट नहीं भर सके उन्होंने पूरे परिवार को तेजाब पिलाकर खुद भी पी लिया और खुदा को प्यारे हो गये। आज हालात फिर वैसे ही बन रहे हैं।


दुर्भाग्य से अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिये तमाम सियासती लोग और मजहबों के ठेकेदार देश की जनता को धार्मिक और जातीय खेमों में बांटते जा रहे हैं। जिसका भारी खामियाजा देश की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। इसलिये ऐसे संवेदनशील माहौल में जब आतंकवाद का चारों तरफ तांडव हो रहा हो भारत के मुसलमानों को चाहिये कि वे वतनपरस्ती की एक ऐसी जलवाफरोशी करें कि उनके आलोचक भी दंग रह जायें। अक्सर यह सवाल उठाया जा सकता है कि इसी मुल्क में पैदा होने के बावजूद मुसलमानों से बार बार देश प्रेम का सबूत क्यों मांगा जाता है ? सवाल बिल्कुल जायज है। क्या ऐसा नहीं है कि देश के साथ अनेक मोर्चों पर गद्दारी करने वालों में विभिन्न प्रांतों के अनेक हिन्दू ही शामिल रहे हैं तो फिर ऐसी अपेक्षा मुसलमानों से ही क्यो? इसकी एक वजह है। पिछले कुछ वर्षों से देश में फैल रहे आतंकवाद में शामिल नौजवान मुस्लिम समाज से ही आये हैं। इसलिये अगर देश की शेष जनता मुस्लिम समुदाय और आतंकवादियों के बीच सीधा सम्बन्ध देखती है तो यह अस्वाभाविक नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे अमरीका में हुए आतंकवादी हमले के बाद अमरीकी जनता ने एक सरदार जी को इसलिये मार डाला क्योंकि उनकी शक्ल ओसामा बिन लादेन से मिलती थी। गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है। 


इसलिये भारत के मुसलमानों को चाहिये कि वे कट्टरपंथी और दहशतगर्दों से बचकर रहे। इतना ही नहीं इनको पकड़वाने और इनके हौसले नाकामयाब करने में सक्रिय हों। देश भर में होने वाले आतंकी हमले, ख़ासकर जम्मू कश्मीर में होने वाले  भयानक विस्फोटों की निंदा सारे भारत में उसी तरह की जानी चाहिये जैसे अमरीका में रहने वाले हर धर्म के लोगों ने न्यूयार्क के हमले के विरोध में प्रदर्शन और प्रार्थनायें कीं। यदि ऐसा किया जाता है तो इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। न सिर्फ फिरकापरस्त सियासतदानों के हौसले पस्त होंगे बल्कि समाज में जानबूझकर पैदा कर दी गयी खाई भी पटने लगेगी। इसमें कोई बुरा मानने की बात नहीं है। मौके की नजाकत को देखकर कभी कभी हमें रोजमर्रा की जिंदगी से हटकर भी कुछ करना पड़ता है। इससे आवाम का ही फायदा होता है। उम्मीद की जानी चाहिये कि भारत के मुसलमान वक्त के इस नाजुक दौर में परिपक्वता और होशियारी का परिचय देंगे ताकि हर परिवार में खुशहाली और अमन चैन बढ़े, नफरत और बैर नहीं। 

Monday, February 12, 2024

मंदिर-मस्जिद का झगड़ा कब तक चलेगा?


अयोध्या में भगवान श्री राम की भव्य प्राण प्रतिष्ठा के बाद अब हिदुत्व की शक्तियों का ध्यान काशी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि मस्जिद पर केंद्रित हो गया है। विपक्षी दल इस बात से चिंतित हैं कि धर्म के नाम पर भाजपा हिंदू मतदाताओं के ऊपर अपनी पकड़ बढ़ाती जा रही है। इन दो धर्मस्थलों पर से मस्जिद हटाने की ज़िद्द का भाजपा को पहले की तरह चुनावों में लाभ मिलता रहेगा। दूसरी तरफ़ धर्म निरपेक्षता को आदर्श मानने वाले विपक्षी दल चाह कर भी भावनाशील हिंदुओं को आकर्षित नहीं कर पाएँगे। इन धर्म निरपेक्ष राजनेताओं का सनातन धर्म में आस्था का प्रदर्शन इन्हें वांछित परिणाम नहीं दे पा रहा। क्योंकि भावनाशील हिंदुओं को लगता है कि ऐसा करना अब इन दलों की मजबूरी हो गया है। इसलिए वो इन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे। दूसरी तरफ़ जो आम जनता की ज़िंदगी से जुड़े ज़रूरी मुद्दे हैं जैसे बेरोज़गारी, महंगाई, सस्ती स्वास्थ्य व शिक्षा सेवाएँ, इन पर ज़ोर देकर विपक्ष मतदाताओं को धर्म के दायरे से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा है। कितना सफल होगा, यह तो 2024 के चुनावी परिणाम बताएँगे। 



जहां तक बात काशी में ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान मस्जिद की है तो यह कोई नया पैदा हुआ विवाद नहीं है। सैंकड़ों बरस पहले जब ये दोनों मस्जिदें बनीं तो हिंदुओं के मदिर तोड़ कर बनीं थीं, इसमें कोई संदेह नहीं है। तब से आजतक सनातन धर्मी अपने इन प्रमुख तीर्थस्थलों पर से मुस्लिम आक्रांताओं के इन अवशेषों को हटा देने के लिए  संघर्षशील रहे हैं। नरेंद्र मोदी जी के प्रधान मंत्री बनने के बाद से वृहद् हिंदू समाज में एक नया उत्साह पैदा हुआ है। उसे विश्वास है कि इन दोनों तीर्थस्थलों पर से भी ये मस्जिदें आज या कल हटा दी जाएँगी। उधर मुस्लिम पक्ष पहले की तरह उत्तेजना दिखा रहा है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच टकराव होना स्वाभाविक है। जो दोनों ही पक्षों के लिये घातक साबित होगा। भलाई इसी में है कि दोनों पक्ष बैठ कर शांतिपूर्ण तरीक़े से इसका हल निकाल लें। हालाँकि दोनों पक्षों के सांप्रदायिक नेता आसानी से ऐसा होने नहीं देंगे। इसलिए यह ज़िम्मेदारी दोनों पक्षों के समझदार लोगों की ही है कि वे इन दोनों मस्जिदों के विवाद को बाबरी मस्जिद विवाद की तरह लंबा न खिंचने दें। 



मुसलमानों के प्रति बिना किसी दुराग्रह के मेरा यह शुरू से मानना रहा है कि मथुरा, अयोध्या और काशी में जब तक मस्जिदें हमारे इन प्रमुख तीर्थस्थलों पर बनी रहेंगी तब तक सांप्रदायिक सौहार्द स्थापित नहीं हो सकता। क्योंकि भगवान कृष्ण, भगवान राम और भोलेनाथ सनातन धर्मियों के मुख्य आराध्य हैं। दुनिया भर के करोड़ों हिंदू पूरे वर्ष इन तीर्थों के दर्शन करने जाते रहे हैं। जहां खड़ी ये मस्जिदें उन्हें उस दुर्भाग्यशाली क्षण की याद दिलाती हैं, जब आतताइयों ने यहाँ खड़े भव्य मंदिरों को बेरहमी से नेस्तनाबूत कर दिया था। इन्हें वहाँ देख कर हर बार हमारे ज़ख़्म हरे हो जाते हैं। ये बात मैं अपने लेखों और टीवी रिपोर्ट्स में पिछले 35 वर्षों से इसी भावना के साथ लगातार कहता रहा हूँ। जो धर्म निरपेक्ष दल ये तर्क देते हैं कि गढ़े मुर्दे नहीं उखाड़ने चाहिए क्योंकि इस सिलसिले का कोई अंत नहीं होगा? आज हिंदू पक्ष तीन स्थलों से मस्जिदें हटाने की माँग कर रहा है, कल को तीस या तीन सौ स्थलों से ऐसे माँगें उठेंगी तो देश के हालात क्या बनेंगे, उनसे मैं सहमत नहीं हूँ। एक तरफ़ तो मक्का मदीना है जहां ग़ैर मुसलमान जा भी नहीं सकते और दूसरी तरफ़ तपोभूमि भारत है जहां सब को अपने-अपने धर्मों का पालन करने की पूरी छूट है। पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों को नीचा दिखाएं या उस ख़ौफ़नाक मंजर की याद दिलाएँ जब उन्होंने अपनी सत्ता को स्थापित करने के लिए बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत किया था। 



दशकों से चले अयोध्या प्रकरण और उसे लेकर 1984 से विश्व हिन्दू परिषद के आक्रामक अभियान से निश्चित रूप से भाजपा को बहुत लाभ हुआ है। आज भाजपा विकास या रोज़गार की बात नहीं करती। 2024 का चुनाव केवल अयोध्या में राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे पर लड़ा जा रहा है। हिंदुओं में आए इस उफान की जड़ में है मुसलमानों की असंवेदनशीलता। जब 1947 में धर्म के आधार पर भारत का बँटवारा हुआ तो भी भारत ने हर मुसलमान को पाकिस्तान जाने के लिए बाध्य नहीं किया। ये बहुसंख्यक हिंदू समाज की उदारता का प्रमाण था। जबकि कश्मीर घाटी, पाकिस्तान, बांग्लादेश और हाल के दिनों में अफ़ग़ानिस्तान में हिंदुओं पर जो अत्याचार हुए और जिस तरह उन्हें वहाँ से निकाला गया, उसके बाद भी ये आरोप लगाना कि विहिप, संघ और भाजपा मुसलमानों के प्रति हिंदुओं में उत्तेजना को बढ़ा रहे हैं, सही नहीं है।


भाजपा हिंदुओं के उस वर्ग प्रतिनिधित्व करती है जो मुसलमानों के सार्वजनिक आचरण से विचलित रहे हैं। दरअसल धर्म आस्था और आत्मोत्थान का माध्यम होता है। इसका प्रदर्शन यदि उत्सव के रूप में किया जाए, तो वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक घटना मानी जाती है। जिसका सभी आनंद लेते हैं। चाहे विधर्मी ही क्यों न हों। दीपावली, ईद, होली, बैसाखी, क्रिसमस, पोंगल, संक्रांति व नवरोज आदि ऐसे उत्सव हैं, जिनमें दूसरे धर्मों को मानने वाले भी उत्साह से भाग लेते हैं। अपने-अपने धर्मों की शोभा यात्राएं निकालना, पंडाल लगाकर सत्संग या प्रवचन करवाना, नगर-कीर्तन करना या मोहर्रम के ताजिये निकालना, कुछ ऐसे धार्मिक कृत्य हैं, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होती या नहीं होनी चाहिए। बशर्ते कि इन्हें मर्यादित रूप में, बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, आयोजित किया जाए। किन्तु हर शुक्रवार को सड़कों, बगीचों, बाजारों, सरकारी दफ्तरों, हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर मुसल्ला बिछाकर नमाज पढने की जो प्रवृत्ति रही है, उससे हिंदुओं में मुसलमानों के प्रति आक्रोश बढ़ा है। ठीक वैसे ही जैसा आक्रोश आज यूरोप के देशों में मुसलमानों के इसी रवैये के प्रति पनप रहा है। इसलिए अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज बिना हील-हुज्जत के मथुरा और काशी के धर्मस्थलों से मस्जिदों को ख़ुद ही हटा कर स:सम्मान दूसरी जगह स्थापित कर दें, जैसा अनेक इस्लामिक देशों में किया भी जा चुका है। इससे दोनों पक्षों के बीच सौहार्द बढ़ेगा और किसी को भी सांप्रदायिकता भड़काने का मौक़ा नहीं मिलेगा।  

Monday, January 22, 2024

कैसे सार्थक हो श्री राम की अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा?


हर राष्ट्र के इतिहास में कोई पल ऐसा आता है जो मील का पत्थर बन जाता है। आज पूरी दुनिया के सनातन धर्मी हिंदुओं के जीवन में वो क्षण आया है जब जन-जन के आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की जन्मस्थली व राजधानी अयोध्या जी पूरे वैभव के साथ विश्व के मानचित्र पर सदियों बाद पुनः प्रगट हुई है। इसलिए देश और विदेश में रहने वाले हिंदुओं के मन उल्लास से भरे हैं।यह सही है कि श्रीराम जन्मभूमि पर से बाबरी मस्जिद को हटाने में सदियों से हज़ारों लोगों ने बलिदान दिया और सैंकड़ों ने इस आंदोलन में अपनी क्षमता अनुसार महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पर पूरे अयोध्या नगर को जो भव्य रूप आज मिला है वो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की कल्पनाशीलता और दृढ़ इच्छा शक्ति का परिणाम है। 



इसलिए मोदी जी की आलोचना करने वालों की बात का भाजपा समर्थक हिंदू समाज पर वैसा असर नहीं पड़ रहा जैसी उनकी अपेक्षा रही होगी। इसका अर्थ यह नहीं कि जिन मुद्दों को विपक्ष के नेता उठा रहे हैं वे कम महत्वपूर्ण हैं। निःसंदेह देश के युवाओं के लिए बेरोज़गारी विकराल रूप धारण करके खड़ी हुई है। दस बरस पहले मोदी जी ने हर वर्ष दो करोड़ युवाओं को रोज़गार देने का वायदा किया था। यानी अब तक बीस करोड़ युवाओं को रोज़गार मिल जाना चाहिए था। जबकि आज भारत में बेरोज़गारी की दर पिछले 45 वर्षों में सबसे ज़्यादा है। ऐसे ही अन्य मुद्दे भी हैं जिनको लेकर विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर है। विपक्ष का यह भी आरोप है कि मंदिर निर्माण पूरा हुए बिना ही इतना भव्य उद्घाटन करने का उद्देश्य केवल 2024 का लोकसभा चुनाव जीतना है। इसलिए विपक्ष के नेता इसे राजनैतिक कार्यक्रम मान रहे हैं और इसलिए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के न्योते पर 22 तारीख़ को अयोध्या नहीं गये। उनका कहना है कि भगवान श्री राम के दर्शन करने वे अपनी श्रद्धा अनुसार भविष्य में अवश्य जाएँगे। 



विपक्ष का यह आरोप सही है कि आज का कार्यक्रम लोकसभा के चुनाव की दृष्टि से आयोजित किया गया है। पर इसमें अनहोनी बात क्या है? लोकतंत्र में हर राजनेता जो कुछ करता है वो वोटों पर नज़र रख कर ही करता है। कांग्रेस के शासन काल में भी ऐसे अनेक बड़े आयोजन हुए या फ़ैसले लिये गये जिनकी उस समय यही उपयोगिता थी कि उनसे कांग्रेस को वोट जुटाने में मदद मिले। अभी पिछले ही हफ़्ते हिंदुओं के चार धामों में से एक जगन्नाथ पुरी  में जगन्नाथ जी के मंदिर के नये बने भव्य कॉरिडोर का उद्घाटन बीजू जनता दल के नेता और उड़ीसा के मुख्य मंत्री नवीन पटनायक ने किया। निःसंदेह उनका यह प्रयास दुनिया भर के सनातन धर्मियों, विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों को आह्लादित करने वाला है। पर परोक्ष रूप से उद्देश्य तो इसका भी उड़ीसा का चुनाव जीतना है, जो इस वर्ष के अंत में होने वाला है।



इस तरह की राजनैतिक टीका-टिप्पणियाँ तो हर दल अपने विरोधियों पर हमेशा करता ही आया है। भाजपा ने भी विपक्ष में रह कर हमेशा यही किया जो आज विपक्ष भाजपा के विरोध में कर रहा है। इसलिए इस राजनैतिक बहसबाजी में न पड़ कर आज हम अपना मंथन अयोध्या के धार्मिक पक्ष पर ही केंद्रित रखना चाहेंगे। क्योंकि आज हम सब ‘राममय’ भाव में आकंठ डूबे हुए हैं। अयोध्या का यह विकास भारत के सनातन धर्मियों की आस्था के साथ ही हमारी सांस्कृतिक अस्मिता से भी जुड़ा हुआ है। पर उत्साह के अतिरेक में हमें अपनी भावनाओं को ग़लत दिशा में जाने से रोकना होगा। अन्यथा हमारी बयानबाज़ी और ट्विटरबाज़ी सनातन धर्म के लिए आत्मघाती होगी। जिस तरह ह्वाट्सऐप यूनिवर्सिटी के प्रभाव में आकर अशोभनीय तरीक़े से सनातन धर्म के आधारस्तम्भ परम श्रद्धेय शंकराचार्यों पर तथ्यहीन और छिछली टिप्पणियाँ की जा रही हैं, उनके घातक परिणाम भविष्य में सामने आयेंगे। 


अयोध्या मामले की इलाहाबाद उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में लगातार पैरवी करने वाले वरिष्ठ वकील डॉ पी एन मिश्रा ने एक न्यूज़ चैनल को दिये साक्षात्कार में स्पष्ट कहा है कि श्री राम जन्मभूमि के पक्ष में जो अदालत के निर्णय आए उसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका द्वारिका पीठ के वर्तमान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी की रही। उन्हीं के द्वारा दिये गये प्रमाणों को न्यायाधीशों ने अकाट्य माना और इसलिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के नाम का उल्लेख अपने लिखित आदेश में भी किया। डॉ मिश्रा ने इसी इंटरव्यू में बताया कि श्रद्धेय रामभद्राचार्य जी के तर्कों को अदालत ने प्रामाणिक न मानते हुए ख़ारिज कर दिया था। इसका अर्थ यह हुआ कि राम मंदिर निर्माण के लिए अदालत से जो आदेश मिला उसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। पर विडंबना देखिए कि सड़क छाप लोग श्रद्धेय शंकराचार्यों से पूछ रहे हैं कि उन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए क्या किया? दूसरी तरफ़ श्रद्धेय रामभद्राचार्य जी को इस तरह महिमा मंडित किया जा रहा है, मानो कि अदालत का फ़ैसला उन्हीं के कारण मिला हो। 


कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति या क़ानून का जानकार अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को पढ़ कर तथ्य जान सकता है। इसलिए चाहे शंकराचार्यों की बात हो या रामभद्राचार्य जी जैसे अन्य संतों की बात हो, हमें अपने संतों प्रति ऐसी छिछली टिप्पणी करने से बचना चाहिए। यथासंभव सभी संतों का सम्मान करना चाहिए। यदि कोई असहमति का बिंदु हो तो उसे मर्यादा में रहकर ही निवेदन करना चाहिए।


निःसंदेह मोदी जी के प्रयासों से आज भारत में हिंदू नव-जागरण हुआ है। जिसका प्रमाण है तीर्थों बढ़ती श्रद्धालुओं की अपार भीड़। पर इसके साथ ही सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों का अनेक मामलों में हनन भी हो रहा है। जिससे आस्थावान सनातन धर्मीं और शंकराचार्य जैसे निष्ठावान संत व्यथित हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि ‘गुरु, सचिव और वैद्य शासक को प्रसन्न करने के लिए यदि झूठ बोलते हैं तो वे उसका अहित ही करते हैं।’ आदरणीय शंकराचार्यों द्वारा आज की जा रही कुछ टिप्पणियों को भी इसी परिपेक्ष में देखा जाना चाहिए। वैसे भी बिना किसी संगठन के, बिना राजनैतिक कार्यकर्ताओं की फ़ौज के और बिना मीडिया के प्रोपेगंडा के 500 वर्ष पहले भगवान श्रीराम को भारत के हर घर में पहुँचाने का काम गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस लिख कर किया था। इसलिए भी भाजपा व संघ के नेतृत्व को गोस्वामी तुलसीदास जी का सम्मान करते हुए और भारत की सनातन परम्परा का निर्वाह करते हुए अपनी आलोचना को उदारता से स्वीकार करना चाहिए और जहां उनकी कमी हो उसे सुधारने का प्रयास करना चाहिए। तभी सार्थक होगी भगवान श्री राम की अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा। फ़िलहाल प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव पर सबको बधाई।    

Monday, January 15, 2024

अयोध्या: प्राण प्रतिष्ठा में विवाद क्यों?

आगामी 22 जनवरी को अयोध्या में भगवान श्री राम के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर जो विवाद पैदा हुए हैं उसमें सबसे महत्वपूर्ण है शंकराचार्यों का वो बयान जिसमें उन्होंने इस समारोह का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। उनका विरोध इस बात को लेकर है कि इस प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में वैदिक नियमों की अवहेलना की जा रही है। गोवर्धन पीठ (पुरी, उड़ीसा) के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी का कहना है कि, मंदिर नहीं, शिखर नहीं, शिखर में कलश नहीं - कुंभाभिषेक के बिना मूर्ति प्रतिष्ठा?” प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रभु श्री राम के शीर्ष के ऊपर चढ़ कर जब राज मज़दूर शिखर और कलश का निर्माण करेंगे तो इससे भगवान के विग्रह का निरादर होगा। बाक़ी शंकराचार्यों ने भी वैदिक नियमों से ही प्राण प्रतिष्ठा की माँग की है और ऐसे ही कई कारणों से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने भी इस समारोह की आलोचना की है। इस विवाद के दो पहलू हैं जिन पर यहाँ चर्चा करेंगे। 



पहला पक्ष यह है कि ये चारों शंकराचार्य निर्विवाद रूप से सनातन धर्म के सर्वोच्च अधिकृत मार्ग निर्देशक हैं। सदियों से पूरे देश का सनातन धर्मी समाज इनकी आज्ञा को सर्वोपरि मानता आया है। किसी धार्मिक विषय पर अगर संप्रदायों के बीच मतभेद हो जाए तो उसका निपटारा भी यही शंकराचार्य करते आये हैं। इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि ये संन्यास की किस परंपरा से आते हैं। आदि शंकराचार्य ने ही इस भेद को समाप्त कर दिया था। जब उन्होंने, अहम् ब्रह्मास्मिका तत्व ज्ञान देने के बावजूद विष्णु षट्पदी स्तोत्रकी रचना की और भज गोविन्दमगाया। इसलिए पुरी शंकराचार्य जी का ये आरोप गंभीर है कि 22 जनवरी को होने वाला प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम सनातन हिंदू धर्म के सिद्धांतों के विरुद्ध है। इसलिए हिंदुओं का वह वर्ग जो सनातन धर्म के सिद्धांतों में आस्था रखता है, पुरी शंकराचार्य से सहमत है। शंकराचार्य जी ने इस तरह किए जा रहे प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के भयंकर दुष्परिणाम सामने आने की चेतावनी भी दी है। 



उधर दूसरा पक्ष अपने तर्क लेकर खड़ा है। इस पक्ष का मानना है कि प्रधान मंत्री श्री मोदी ने एक प्रबल इच्छा शक्ति का प्रदर्शन करते हुए और सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं को अपने लक्ष्य-प्राप्ति के लिये साधते हुए, इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया है और इस तरह भाजपा समर्थक हिंदू समाज को एक चिर प्रतीक्षित उपहार दिया है। इसलिए उनके प्रयासों में त्रुटि नहीं निकालनी चाहिए। इस पक्ष का यह भी कहना है कि पिछली दो सहस्राब्दियों में भारत में जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सनातन धर्म, सिख धर्म या इस्लाम तभी व्यापक रूप से फैल सके जब उन्हें राजाश्रय प्राप्त हुआ। जैसे सम्राट अशोक मौर्य ने बौद्ध धर्म फैलाया, सम्राट चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म को अपनाया और फिर इसके विस्तार में सहयोग किया। कुषाण राजा ने पहले सनातन धर्म अपनाया फिर बौद्ध धर्म का प्रचार किया। इसी तरह मुसलमान शासकों ने इस्लाम को संरक्षण दिया और अंग्रेज़ी हुक्मरानों ने ईसाईयत को। इसी क्रम में आज नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा राजसत्ता का उपयोग करके हिंदुत्व की विचारधारा को स्थापित कर रही है। इसलिए हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण भाग इनके साथ कमर कस के खड़ा है। पर इसके साथ ही देश में ये विवाद भी चल रहा है कि हिंदुत्व की इस विचारधारा में सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों की उपेक्षा हो रही है। जिसका उल्लेख हिंदू धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज ने साठ के दशक में लिखी अपनी पुस्तक आरएसएस और हिंदू धर्ममें शास्त्रों के प्रमाण के आधार पर बहुत स्पष्टता से किया था। 



जिस तरह के वक्तव्य पिछले दो दशकों में आरएसएस के सरसंघचालक और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने दिये हैं उससे स्पष्ट है कि हिंदुत्व की उनकी अपनी परिकल्पना है, जिसके केंद्र में है हिंदू राष्ट्रवाद। इसलिए वे अपने हर कृत्य को सही ठहराने का प्रयास करते हैं। चाहे वो वैदिक सनातन धर्म की मान्यताओं और आस्थाओं के विपरीत ही क्यों न हो। आरएसएस और सनातन धर्म के बीच ये वैचारिक संघर्ष कई दशकों से चला आ रहा है। अयोध्या का वर्तमान विवाद भी इसी मतभेद के कारण उपजा है। 



फिर भी हिंदुओं का यह वर्ग इसलिए भी उत्साहित है कि प्रधान मंत्री मोदी ने हिंदुत्व के जिन लक्ष्यों को लेकर गांधीनगर से दिल्ली तक की दूरी तय की थी, उन्हें वे एक-एक करके पाने में सफल हो रहे हैं। इसलिए हिंदुओं का ये वर्ग मोदी जी को अपना हीरो मानता है। इस अति उत्साह का एक कारण यह भी है कि पूर्ववर्ती प्रधान मंत्रियों ने धर्म के मामले में सहअस्तित्व को केंद्र में रख कर संतुलित नीति अपनाई। इस सूची में भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल हैं। जिन्होंने राज धर्मकी बात कही थी। पर मोदी जी दूसरी मिट्टी के बने हैं। वो जो ठान लेते हैं, वो कर गुजरते हैं। फिर वे नियमों और आलोचनाओं की परवाह नहीं करते। इसीलिए जहां नोटबंदी, बेरोज़गारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर वे अपना घोषित लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाए, वहीं दूसरे कुछ मोर्चों पर उन्होंने अपनी सफलता के झंडे भी गाड़े हैं। ऐसे में प्राण प्रतिष्ठा समारोह को अपनी तरह आयोजित करने में उन्हें कोई हिचक नहीं है। क्योंकि ये उनके राजनैतिक लक्ष्य की प्राप्ति का एक माध्यम है। देश की आध्यात्मिक चेतना को विकसित करना उनके इस कार्यक्रम का उद्देश्य नहीं है। 


रही बात परमादरणीय शंकराचार्यों के सैद्धांतिक मतभेद की तो बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हिंदू समाज ने इन सर्वोच्च धर्म गुरुओं से वैदिक आचरण सीखने का कोई प्रयास नहीं किया। उधर पिछले सौ वर्षों में शंकराचार्यों की ओर से भी वृहद हिन्दू समाज को जोड़ने का कोई प्रयास नहीं किया गया। कारण: सनातन धर्म के शिखर पुरुष होने के नाते शंकराचार्यों की अपनी मर्यादा होती है, जिसका वे अतिक्रमण नहीं कर सकते थे। इसका एक कारण यह भी है कि बहुसंख्यक हिंदू समाज की न तो आध्यात्मिक गहराई में रुचि है और न ही उनकी क्षमता। उनके लिए आस्था का कारण अध्यात्म से ज़्यादा धार्मिक मनोरंजन व भावनात्मक सुरक्षा पाने का माध्यम है। पर अगर राजसत्ता वास्तव में सनातन धर्म की स्थापना करना चाहती तो वह शंकराचार्यों को यथोचित सम्मान देती। पर ऐसा नहीं है। हिंदुत्व की विचारधारा भारत के हज़ारों वर्षों से चले आ रहे सनातन धर्म के मूल्यों की स्थापना के लिए समर्पित नहीं है। यह एक राजनैतिक विचारधारा है जिसके अपने नियम हैं और अपने लक्ष्य हैं। श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन को खड़ा करने के लिए आरएसएस, विहिप व भाजपा ने हर संत और सम्प्रदाय का द्वार खटखटाया था। सभी संतों और सम्प्रदायों ने सक्रिय होकर इस आन्दोलन को विश्वसनीयता प्रदान की थी। यह दुर्भाग्य है कि आज शंकराचार्यों जैसे अनेक सम्मानित संत और विहिप, आरएसएस व भाजपा आमने सामने खड़े हो गये हैं।