Showing posts with label Suicide. Show all posts
Showing posts with label Suicide. Show all posts

Monday, October 5, 2026

प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना का विश्लेषण

वृंदावन के विश्विख्यात संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक नौजवान भक्त की ऐसी रहस्यमय मृत्यु समाज और पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण घटना है, जिसकी गहराई से जाँच की जा रही है। पर इससे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि कुछ सनातन धर्म विरोधी लोग इस दुर्घटना के लिए प्रेमानंद महाराज को ज़िम्मेदार ठहराकर उनपर कीचड़ उछाल रहे हैं। इस विषय में जो बात मैं आगे कहने जा रहा हूँ वो ऐसे आलोचकों को मेरा निष्पक्ष जवाब है। पर इसके साथ ही मैं उन बातों को भी यहाँ रखूँगा जिनको लेकर प्रेमानंद महाराज के चाहने वालों में भी लंबे समय से मंथन चल रहा है। उन्हें लगता है कि महाराज अपने चेलों के जाल में उलझ गए हैं। वे चेले जो महाराज की तपस्या को सोशल मीडिया पर वायरल करवाने की धुन में ब्रज के रसिक संतों की रहनी और आचरण को भूल बैठे हैं। आरोप है कि ऐसे चेले संपत्ति बनाने, कालोनियाँ बनाने और अपने-अपने साम्राज्य स्थापित करने में जुटे हैं। इन्हीं सब बातों पर आगे चर्चा होगी। 


प्रेमानंद महाराज एक लंबे अरसे से वृंदावन में रहकर तपस्वी का जीवन जी रहे थे। वे भीषण गर्मी के दिनों में भी घंटों यमुना जी की तपती रेत में पड़े रहकर भजन किया करते थे। प्रायः वे वृन्दावन की कँटीली झाड़ियों के बीच बैठ कर भी भजन करते थे। उन्होंने बरसों तक न भला खाया, न भला पहना। हम वृंदावनवासी जानते हैं कि वे वृन्दावन की गलियों में भिक्षा माँगकर रोटी खाते थे। 7-8 बरस पहले तक उनका नाम भी कोई नहीं जानता था। उनके दैन्य और तपस्या की प्रशंसा हर ब्रजवासी आजतक करता आया है। वे भी ब्रजवासियों के प्रति भारी श्रद्धा का भाव रखते हैं। 



अब से कुछ वर्ष पहले तक यमुना किनारे एक बगीची में, अपने चंद शिष्यों के बीच वे प्रवचन किया करते थे। धीरे-धीरे उनके प्रवचन की लोकप्रियता बढ़ने लगी और देखते ही देखते लगभग 1000 भक्त हर प्रातः उनका प्रवचन सुनने आने लगे। उस दौर में मैं भी प्रायः उनका प्रवचन सुनने उस बगीची में जाता था। धीरे-धीरे इस भीड़ में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ने लगी जो आईआईटी - आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ कर देश विदेश में अपनी लाखों की नौकरी छोड़ कर आ गए और प्रेमानंद महाराज के शिष्य बन कर पीली चादर ओढ़ ली। 


इन्हीं शिष्यों में कुछ ऐसे शिष्य भी थे जिन्होंने महाराज के प्रति अपने गहरे प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना शुरू किया और पूरी दुनिया में उन्हें इतना प्रचारित कर दिया कि विराट कोहली से लेकर तमाम जानी-मानी हस्तियां  उनके दर्शन को आने लगी। महाराज की मार्किटिंग इस कदर की गई कि उनके दर्शन के लिए आधी रात से हज़ारों की भीड़ जमा होने लगी। इस भीड़ के कारण वृंदावन की यातायात व्यवस्था भी बाधित हुई। महाराज जब रात में सड़क पर पैदल निकलते तो हज़ारों लोग उनके दर्शन को खड़े रहते। 


फिर तो वहाँ पैसे की वर्षा होने लगी। अब संपत्तियां खरीदने व बड़े-बड़े आश्रम बनाने की होड़ लग गई। यमुना की खादर में अवैध रूप से कॉलोनी बनाने के आरोप भी इन्हीं शिष्यों पर लगे। महाराज के दर्शन के लिए एडवांस टोकन मिलने लगे और भारी तामझाम का एक सुनियोजित आडंबर रच दिया गया। 


इतना ही नहीं प्रेमानंद महाराज के कुछ वर्ष पहले ही बने शिष्य भी अब सोशल मीडिया पर अपनी मार्केटिंग करवाने लगे। किसी को शिव का स्वरूप बताया जाने लगा तो किसी को ब्रह्म ऋषि। सैंकड़ों सालों से ब्रज के संत घर-घर रोटी माँग कर प्रसाद पाते थे। इसे माधुकरी कहते हैं। ब्रज में ये संतों का सामान्य शिष्टाचार है। पर किसी ने भी कभी इसे प्रचारित कर सेलिब्रिटी बनने की कोशिश नहीं की। प्रेमानंद महाराज के शिष्यों का माधुकरी माँगना भी सोशल मीडिया का ग्लैमर बन गया। पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता  को बढ़ाने और उनकी मार्केटिंग करने के जितने प्रयास हुए वैसा ब्रज में पहले कभी नहीं देखा गया। यह ब्रज की भक्ति परंपरा के अनुकूल नहीं था। परिणामतः केलि कुंज की आलोचनाएं भी होने लगी। इसी सबके बीच महाराज के शिष्यों में सत्ता और संपत्ति को लेकर गुटबाजी और झगड़े शुरू हो गए। 


इस सब से विचलित हो कर प्रेमानंद महाराज वृंदावन के अपने नए बने भव्य आश्रमों को छोड़ कर यमुना के उस पार बेल वन में चले गए।वहाँ जो बृजवासी गांव वाले रहते हैं वे परेशान हैं क्योंकि रात भर महाराज के दर्शनार्थी आते हैं। ब्रजवासी बच्चे घर से निकल जाए तो भीड़ में खो जाते हैं। सारे रास्ते जाम हो जाते हैं। अब वहाँ भी चेलों द्वारा कालोनियां बनाने का खेल चालू हो गया है। प्रेमानंद जी महाराज के प्रति श्रद्धा रखने वाले हम जैसे लाखों भक्त हैं। उनके शिष्य रसिक दुलारी शरण की मृत्यु से उस श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है। पर इतना अवश्य है कि अब समय आ गया है कि जब प्रेमानंद महाराज शिष्यों के बनाये इस आडंबर के जाल से निकल कर अपने मूल स्वरूप में लौट आएँ। 


जहाँ तक रसिक दुलारी शरण की मृत्यु का प्रश्न है तो सच्चाई तो पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी। पर इतना अवश्य है कि युवा साधकों के बीच ऐसी दुर्घटना होना कोई नई बात नहीं है। साधना की प्रारंभिक अवस्था में अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न रख पाने के कारण कई युवा साधक अपने लिंग को हानि पहुँचा देते हैं। ये उनकी नासमझी या उत्साह के अतिरेक में उठाया गया एक मूर्खतापूर्ण कदम होता है। इन्द्रियों पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण होने के बाद होता है। अगर मन वास्तव में भगवत भक्ति में रम जाए तो हमारी सभी इंद्रियाँ स्वयं ही शांत हो जाती हैं। इस तरह के जबरन किए गए प्रयासों से इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता ये हर साधक को जानना चाहिए। इस घटना का जो भी परिणाम हो इससे प्रेमानंद महाराज की प्रतिष्ठा में कोई आंच नहीं आएगी। पर उनके इर्द-गिर्द जमा शिष्यों को इससे सबक लेकर आत्मवालोकन करना चाहिए।   

Monday, June 22, 2020

सुशांत सिंह राजपूत जैसे और भी हैं

आत्महत्या के बाद से सुशांत सिंह राजपूत के जीवन और व्यक्तित्व के बारे में जितनी जानकारियाँ सामने आई हैं उनसे यह स्पष्ट है कि ये नौजवान कई मायनों में अनूठा था। उसकी सोच, उसका ज्ञान, उसकी लगन, उसका स्वभाव और उसका जुनून ऐसा था जैसा बॉलीवुड में बहुत कम देखने को मिलता है। कहा जा सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत अपने आप में एक ऐसी शख़्सियत था जो अगर ज़िंदा रहता तो एक संजीदा सुपर स्टार बन जाता। 


जितनी बातें सोशल मीडिया में सुशांत के बारे में सामने आ रहीं हैं उनसे तो यही लगता है कि बॉलीवुड माफिया ने उसे तिल-तिल कर मारा। पर ये कोई नई बात नहीं है।  बॉलीवुड में गॉडफादर या मशहूर ख़ानदान या अंडरवर्ल्ड कनेक्शन के सहारे चमकने वाले तमाम सितारे ऐसे हैं जिनका व्यक्तित्व सुशांत के सामने आज भी कोई हैसियत नहीं रखता। पर आज तक कोई भी इस अनैतिक गठबंधन को तोड़ नहीं पाया। इसलिए वे बेख़ौफ़ अपनी कूटनीतियों को अंजाम देते रहते हैं। 


पर इस त्रासदी का शिकार सुशांत अकेला नहीं था। हर पेशे में कमोवेश ऐसी ही हालत है। आज़ादी के बाद से अगर आँकड़ा जोड़ा जाए तो देश भर में सैंकड़ों ऐसे युवा वैज्ञानिकों के नाम सामने आएँगे जिन्होंने इन्हीं हालातों में आत्महत्या की। ये सब युवा वैज्ञानिक बहुत मेधावी थे और मौलिक शोध कर रहे थे। पर इनसे ईर्ष्या करने वाले इनके सुपर बॉस वैज्ञानिकों ने इनकी मौलिक शोध सामग्री को अपने नाम से प्रकाशित किया। इन्हें लगातार हतोत्साहित किया और इनका कई तरह से शोषण किया। मजबूरन इन्होंने आत्महत्या कर ली। 


यही हाल कारपोरेट सेक्टर में भी देखा जाता रहा है। जहां योग्य व्यक्तियों को उनके अयोग्य साथी अपमानित करते हैं और हतोत्साहित करते हैं। मालिक की चाटुकारिता करके उच्च पदों पर क़ायम हो जाते हैं। हालाँकि सूचना क्रांति के बाद से अब योग्यता को भी तरजीह मिलने लगी है। क्योंकि अब योग्यता छिपी नहीं रहती। पर पहले वही हाल था। 


यही हाल राजनीति का भी है। जहां गणेश प्रदक्षिणा करने वाले तो तरक़्क़ी पा जाते हैं और सच्चे, मेहनती, समाजसेवी कार्यकर्ता सारे जीवन दरी बिछाते रह जाते हैं। पिछले 30 वर्षों से तो हर राजनैतिक दल पर परिवारवाद इस कदर हावी हो गया है कि कार्यकर्ताओं का काम केवल प्रचार करना और गुज़ारे के लिये दलाली करना रह गया है। 


संगीत, कला, नृत्य का क्षेत्र हो या खेल-कूद का, कम ही होता है जब बिना किसी गॉडफादर के कोई अपने बूते पर अपनी जगह बना ले। भाई-भतीजावाद, शारीरिक और मानसिक शोषण और भ्रष्टाचार इन क्षेत्रों में भी खूब हावी है। 


आश्चर्य की बात तो यह है कि दुनिया की पोल खोलने वाले पत्रकार भी इन षड्यंत्रों से अछूते नहीं रहते। किसको क्या असाइनमेंट मिले, कौनसी बीट मिले, कितनी बार वीआइपी के साथ विदेश जाने का मौक़ा मिले, ये इस पर निर्भर करता है कि उस पत्रकार के अपने सम्पादक के साथ कैसे सम्बंध हैं। कोई मेधावी पत्रकार अगर समाचार सम्पादक या सम्पादक की चाटुकारिता न कर पाए तो उसकी सारी योग्यता धरी रह जाती है। इसी तरह अवार्ड पाने का भी एक पूरा विकसित तंत्र है जो योग्यता के बजाए दूसरे कारणों से अवार्ड देता है। फिर वो चाहे बॉलीवुड के अवार्ड हों या खेल जगत के या पद्मश्री या पद्मभूषण जैसे राजकीय सम्मान हों। सब के सब योग्यता के बजाए किन्हीं अन्य कारणों से मिलते हैं। इन्हीं सब कारणों से युवा या अन्य योग्य लोग  अवसाद में चले जाते हैं और आत्महत्या जैसे ग़लत कदम उठा बैठते हैं। इन सब परिस्थियाँ से लड़ने में आध्यात्म भी एक अच्छा साधन सिद्ध हो सकता है और ये पीड़ित को शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने में मदद कर सकता है।


चूँकि यह समस्या सर्वव्यापी है इसलिए इसे एकदम रातों रात में ख़त्म नहीं किया जा सकता। पर इसके समाधान ज़रूर खोजे जा सकते हैं। मसलन सरकारी विभागों में बने शिकायत केंद्रों की तरह ही हर राज्य और केंद्र के स्तर पर ‘शोषण निवारण आयोग’ बनाए जाएँ। जिनमें समाज के वरिष्ठ नागरिक, निशुल्क सेवाएं दें। वकालत, मनोविज्ञान, प्रशासनिक तंत्र, कला व खेल और पुलिस विभाग के योग्य, अनुभवी और सेवा निवृत लोग इन आयोगों के सदस्य मनोनीत किए जाएं। इन आयोगों के पते, ईमेल और फ़ोन इत्यादि, हर प्रांतीय भाषा में खूब प्रचारित किए जाएं । जिससे ऐसे शोषण को झेल रहे युवा अपने अपने प्रांत के आयोग को समय रहते लिखित सूचना भेज सकें। आयोग की ज़िम्मेदारी हो कि ऐसी शिकायतों पर तुरंत ध्यान दें और जहां तक सम्भव हो, उस पीड़ित को नैतिक बल प्रदान करें। जैसा महिला आयोग, महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर करते हैं। इन आयोगों का स्वरूप सरकारी न होकर स्वायत्त होगा तो इनकी विश्वसनीयता और प्रभाव धीरे धीरे स्थापित होता जाएगा। 


अनेक समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों ने समाज का अध्यन कर के कुछ ऐसे सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं जिनसे ऐसी शोषक व्यवस्था का चरित्र उजागर होता है। जैसे ‘सरवाइवल औफ़ द फ़िटेस्ट’, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, ‘शोषक और शोषित’। ये सब सिद्धांत समाज की उस प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं जो ताकतवर व्यक्ति के सौ खून भी माफ़ करने को तैयार रहता है किंतु मेधावी व्यक्ति की सही शिकायत पर भी ध्यान नहीं देता। पर जिस तरह अमरीका में हाल ही में एक अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की मृत्यु पुलिसवाले के अमानवीय व्यवहार से हो गई और उस पर पूरा अमरीकी समाज उठ खड़ा हुआ और उन गोरे सिपाहियों को कड़ी सजा मिली। या जिस तरह विश्वविद्यालय प्रशासन की तानाशाही का देशभर में छात्र एकजुट हो कर विरोध करते हैं। उसी तरह हर व्यवसाय के लोग, ख़ासकर युवा जब ऐसे मामलों पर सामूहिक आवाज़ उठाने लगेंगे तो ये प्रवृतियाँ धीरे धीरे कमजोर पड़ती जाएँगीं। इसलिए शोषण और अत्याचार का जवाब आत्महत्या नहीं बल्कि हमलावर हो कर मुक़ाबला करना है।