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Monday, October 5, 2026

प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना का विश्लेषण

वृंदावन के विश्विख्यात संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक नौजवान भक्त की ऐसी रहस्यमय मृत्यु समाज और पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण घटना है, जिसकी गहराई से जाँच की जा रही है। पर इससे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि कुछ सनातन धर्म विरोधी लोग इस दुर्घटना के लिए प्रेमानंद महाराज को ज़िम्मेदार ठहराकर उनपर कीचड़ उछाल रहे हैं। इस विषय में जो बात मैं आगे कहने जा रहा हूँ वो ऐसे आलोचकों को मेरा निष्पक्ष जवाब है। पर इसके साथ ही मैं उन बातों को भी यहाँ रखूँगा जिनको लेकर प्रेमानंद महाराज के चाहने वालों में भी लंबे समय से मंथन चल रहा है। उन्हें लगता है कि महाराज अपने चेलों के जाल में उलझ गए हैं। वे चेले जो महाराज की तपस्या को सोशल मीडिया पर वायरल करवाने की धुन में ब्रज के रसिक संतों की रहनी और आचरण को भूल बैठे हैं। आरोप है कि ऐसे चेले संपत्ति बनाने, कालोनियाँ बनाने और अपने-अपने साम्राज्य स्थापित करने में जुटे हैं। इन्हीं सब बातों पर आगे चर्चा होगी। 


प्रेमानंद महाराज एक लंबे अरसे से वृंदावन में रहकर तपस्वी का जीवन जी रहे थे। वे भीषण गर्मी के दिनों में भी घंटों यमुना जी की तपती रेत में पड़े रहकर भजन किया करते थे। प्रायः वे वृन्दावन की कँटीली झाड़ियों के बीच बैठ कर भी भजन करते थे। उन्होंने बरसों तक न भला खाया, न भला पहना। हम वृंदावनवासी जानते हैं कि वे वृन्दावन की गलियों में भिक्षा माँगकर रोटी खाते थे। 7-8 बरस पहले तक उनका नाम भी कोई नहीं जानता था। उनके दैन्य और तपस्या की प्रशंसा हर ब्रजवासी आजतक करता आया है। वे भी ब्रजवासियों के प्रति भारी श्रद्धा का भाव रखते हैं। 



अब से कुछ वर्ष पहले तक यमुना किनारे एक बगीची में, अपने चंद शिष्यों के बीच वे प्रवचन किया करते थे। धीरे-धीरे उनके प्रवचन की लोकप्रियता बढ़ने लगी और देखते ही देखते लगभग 1000 भक्त हर प्रातः उनका प्रवचन सुनने आने लगे। उस दौर में मैं भी प्रायः उनका प्रवचन सुनने उस बगीची में जाता था। धीरे-धीरे इस भीड़ में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ने लगी जो आईआईटी - आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ कर देश विदेश में अपनी लाखों की नौकरी छोड़ कर आ गए और प्रेमानंद महाराज के शिष्य बन कर पीली चादर ओढ़ ली। 


इन्हीं शिष्यों में कुछ ऐसे शिष्य भी थे जिन्होंने महाराज के प्रति अपने गहरे प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना शुरू किया और पूरी दुनिया में उन्हें इतना प्रचारित कर दिया कि विराट कोहली से लेकर तमाम जानी-मानी हस्तियां  उनके दर्शन को आने लगी। महाराज की मार्किटिंग इस कदर की गई कि उनके दर्शन के लिए आधी रात से हज़ारों की भीड़ जमा होने लगी। इस भीड़ के कारण वृंदावन की यातायात व्यवस्था भी बाधित हुई। महाराज जब रात में सड़क पर पैदल निकलते तो हज़ारों लोग उनके दर्शन को खड़े रहते। 


फिर तो वहाँ पैसे की वर्षा होने लगी। अब संपत्तियां खरीदने व बड़े-बड़े आश्रम बनाने की होड़ लग गई। यमुना की खादर में अवैध रूप से कॉलोनी बनाने के आरोप भी इन्हीं शिष्यों पर लगे। महाराज के दर्शन के लिए एडवांस टोकन मिलने लगे और भारी तामझाम का एक सुनियोजित आडंबर रच दिया गया। 


इतना ही नहीं प्रेमानंद महाराज के कुछ वर्ष पहले ही बने शिष्य भी अब सोशल मीडिया पर अपनी मार्केटिंग करवाने लगे। किसी को शिव का स्वरूप बताया जाने लगा तो किसी को ब्रह्म ऋषि। सैंकड़ों सालों से ब्रज के संत घर-घर रोटी माँग कर प्रसाद पाते थे। इसे माधुकरी कहते हैं। ब्रज में ये संतों का सामान्य शिष्टाचार है। पर किसी ने भी कभी इसे प्रचारित कर सेलिब्रिटी बनने की कोशिश नहीं की। प्रेमानंद महाराज के शिष्यों का माधुकरी माँगना भी सोशल मीडिया का ग्लैमर बन गया। पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता  को बढ़ाने और उनकी मार्केटिंग करने के जितने प्रयास हुए वैसा ब्रज में पहले कभी नहीं देखा गया। यह ब्रज की भक्ति परंपरा के अनुकूल नहीं था। परिणामतः केलि कुंज की आलोचनाएं भी होने लगी। इसी सबके बीच महाराज के शिष्यों में सत्ता और संपत्ति को लेकर गुटबाजी और झगड़े शुरू हो गए। 


इस सब से विचलित हो कर प्रेमानंद महाराज वृंदावन के अपने नए बने भव्य आश्रमों को छोड़ कर यमुना के उस पार बेल वन में चले गए।वहाँ जो बृजवासी गांव वाले रहते हैं वे परेशान हैं क्योंकि रात भर महाराज के दर्शनार्थी आते हैं। ब्रजवासी बच्चे घर से निकल जाए तो भीड़ में खो जाते हैं। सारे रास्ते जाम हो जाते हैं। अब वहाँ भी चेलों द्वारा कालोनियां बनाने का खेल चालू हो गया है। प्रेमानंद जी महाराज के प्रति श्रद्धा रखने वाले हम जैसे लाखों भक्त हैं। उनके शिष्य रसिक दुलारी शरण की मृत्यु से उस श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है। पर इतना अवश्य है कि अब समय आ गया है कि जब प्रेमानंद महाराज शिष्यों के बनाये इस आडंबर के जाल से निकल कर अपने मूल स्वरूप में लौट आएँ। 


जहाँ तक रसिक दुलारी शरण की मृत्यु का प्रश्न है तो सच्चाई तो पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी। पर इतना अवश्य है कि युवा साधकों के बीच ऐसी दुर्घटना होना कोई नई बात नहीं है। साधना की प्रारंभिक अवस्था में अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न रख पाने के कारण कई युवा साधक अपने लिंग को हानि पहुँचा देते हैं। ये उनकी नासमझी या उत्साह के अतिरेक में उठाया गया एक मूर्खतापूर्ण कदम होता है। इन्द्रियों पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण होने के बाद होता है। अगर मन वास्तव में भगवत भक्ति में रम जाए तो हमारी सभी इंद्रियाँ स्वयं ही शांत हो जाती हैं। इस तरह के जबरन किए गए प्रयासों से इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता ये हर साधक को जानना चाहिए। इस घटना का जो भी परिणाम हो इससे प्रेमानंद महाराज की प्रतिष्ठा में कोई आंच नहीं आएगी। पर उनके इर्द-गिर्द जमा शिष्यों को इससे सबक लेकर आत्मवालोकन करना चाहिए।   

Tuesday, July 2, 2024

धर्मगुरुओं के बीच यूट्यूब संग्राम


जब से सोशल मीडिया का प्रभाव तेज़ी से व्यापक हुआ है तब से समाज का हर वर्ग, यहाँ तक कि ग्रहणियाँ भी 24 घंटे सोशल मीडिया पर हर समय छाए रहते हैं। इसके दुष्परिणामों पर काफ़ी ज्ञान उपलब्ध है। सलाह दी जाती है कि यदि आपको अपने परिवार या मित्रों से संबंध बनाए रखना है, अपना बौद्धिक विकास करना है और स्वस्थ और शांत जीवन जीना है तो आप सोशल मीडिया से दूर रहें या इसका प्रयोग सीमित मात्रा में करें। पर विडंबना देखिए कि समाज को संयत और सुखी जीवन जीने का और माया मोह से दूर रहने का दिन रात उपदेश देने वाले संत और भागवताचार्य आजकल स्वयं ही सोशल मीडिया के जंजाल में कूद पड़े हैं। विशेषकर ब्रज में ये प्रवृत्ति तेज़ी से फैलती जा रही है। 


अभी पिछले ही दिनों वृंदावन के विरक्त संत प्रेमानंद महाराज और प्रदीप मिश्रा के बीच सोशल मीडिया पर श्री राधा तत्व को लेकर भयंकर विवाद चला। ऐसे ही पिछले दिनों वृंदावन में नये स्थापित हुए भगवताचार्य अनिरुद्धाचार्य के भी वक्तव्य विवादों में रहे। 



इसी बीच बरसाना के विरक्त संत श्री रमेश बाबा द्वारा लीला के मंचन में राधा स्वरूप धारण कर बालाकृष्ण से पैर दबवाने पर विवाद हुआ। ये सब ब्रज की विभूतियाँ हैं। हर एक के चाहने वाले भक्त लाखों करोड़ों की संख्या में हैं। जैसे ही कोई विवाद पैदा होता है इनका चेला समुदाय भी सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय हो जाता है। ठीक वैसे ही राजनैतिक दलों की ट्रोल आर्मी, जो बात का बतंगड़ बनाने में मशहूर है, सक्रिय हो जाती है। ये सब सोशल मीडिया में अपनी पहचान बनाने का एक तरीक़ा बन गया है। अब प्रेमानंद जी वाले विवाद को ही लीजिए, कितने  ही कम मशहूर भागवताचार्य भी इस विवाद में कूद पड़े। जिनके फ़ॉलोवर्स चार-पाँच सौ ही थे पर जैसे ही वे इस विवाद में कूदे तो उनकी संख्या 20 हज़ार पार कर गई। यानी बयानबाज़ी भी फ़ायदे का सौदा है। 


परंपरा से शास्त्र ज्ञान का आदान-प्रदान गुरुओं द्वारा निर्जन स्थलों पर किया जाता था। जहां जिज्ञासु अपने प्रश्न लेकर जाता था और गुरु की सेवा कर ज्ञान प्राप्त करता था। यही पद्धति भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को बताई थी। भगवद् गीता के चौथे अध्याय का चौंतीसवाँ श्लोक इसी बात को स्पष्ट करता है। “तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।”



परंतु सोशल मीडिया ने आकर ऐसी सारी सीमाओं को तोड़ दिया है। अब धर्म गुरु चाहें न चाहें पर उनके शिष्य, उनके प्रवचनों का सोशल मीडिया पर प्रसारण करने को बेताब रहते हैं और फिर अलग-अलग गुरुओं के शिष्य समूहों में आपसी प्रतिद्वंदता चलती है कि किस गुरु के कितने चेले या श्रोता हैं। जिस संत के फ़ॉलोवर्स की संख्या लाखों में होती है उन पर टिप्पणी करना या उन्हें विवाद में घसीटना लाभ का सौदा माना जाता है। क्योंकि वैसे तो ऐसा विवाद खड़ा करने वालों की कोई फॉलोइंग होती नहीं है। पर इस तरह उन्हें बहुत बड़ी तादाद में फॉलोवर और लोक प्रियता मिल जाती है। मतलब ये कि आप में योग्यता है कि नहीं, पात्रता है कि नहीं, आपको उस विषय का ज्ञान है कि नहीं, इसका कोई संकोच नहीं किया जाता। केवल सस्ती लोकप्रियता पाने के लालच में बड़े बड़े संतों के साथ नाहक विवाद खड़ा किया जाता है। आजकल ऐसे विवादों की भरमार हो गई है। 


वैसे तो तकनीकी के हमले को कोई चाह कर भी नहीं रोक सकता। पर कभी-कभी इंसान को लगता है कि उसने भयंकर भूल कर दी। 2003 की बात है जब मैंने बरसाना (मथुरा) के विरक्त संत श्री रमेश बाबा के प्रवचन नियमित रूप से हर सप्ताह बरसाना जा कर सुनना शुरू किया, बाबा की भक्ति और सरलता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। और मुझे लगा कि बाबा के प्रवचन पूरी दुनिया के कृष्ण भक्तों तक पहुँचने चाहिए। तब ऐसा होना केवल टीवी चैनल के माध्यम से ही संभव था। क्योंकि तब तक सोशल मीडिया इतना लोकप्रिय नहीं हुआ था। मैंने इसके लिए प्रयास करके श्री मान मंदिर में टीवी रिकॉर्डिंग स्टूडियो की स्थापना कर दी। उस दौर में मान मंदिर के विरक्त साधुओं ने मेरा कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि बाबा की बात अगर इस तरह प्रसारित की जाएगी तो बरसाना में कलियुग का प्रवेश कोई रोक नहीं पाएगा। पर बाबा ने मुझे अनुमति दी तो काम शुरू हो गया। इसका लाभ मान मंदिर को यह हुआ कि उसके भक्तों की संख्या में देश विदेशों में तेज़ी से बढ़ौतरी हुई और वहाँ धन की वर्षा होने लगी। तब मुझे विरोध करने वाले अव्यवहारिक प्रतीत होते थे। पर आज जब मैं पलट कर देखता हूँ तो मुझे लगता है कि वाक़ई इस प्रयोग में मान मंदिर के पवित्र, शांत और निर्मल वातावरण को बहुत सारे झमेलों में फँसा दिया। अगर वहाँ टीवी का प्रवेश न हुआ होता तो वहाँ का अनुभव पारलौकिक होता था। जिसे अनुभव करने मेरे साथ नीतीश कुमार, अर्जुन सिंह, सुषमा स्वराज, लालू यादव, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तक उस दौर में वहाँ गए और गदगद हो कर लौटे। 


हमने बात शुरू की थी सोशल मीडिया पर बाबाओं के संग्राम से और बात पहुँच गई अध्यात्म की एकांतिक अनुभूति से शुरू होकर उसके व्यवसायी करण तक। इस आधुनिक तकनीकी ने जहां श्री राधा-कृष्ण की भक्ति का और ब्रज की संस्कृति का दुनिया के कोने कोने में प्रचार किया वहीं इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज वृंदावन, गोकुल, गोवर्धन, बरसाना व मथुरा आदि अपना सदियों से संचित आध्यात्मिक वैभव व नैसर्गिक सौंदर्य तेज़ी से समेटते जा रहे हैं। हर ओर बाज़ार की शक्तियों ने हमला बोल दिया है। कहते हैं कि विज्ञान अगर हमारा सेवक बना रहे तो उससे बहुत लाभ होता है। पर अगर वो हमारा स्वामी बन जाए तो उसके घातक परिणाम होते हैं। एक ब्रजवासी होने के नाते और संतों के प्रति श्रद्धा होने के नाते मेरा देश भर के संतों से विनम्र निवेदन है कि वे सोशल मीडिया के संग्राम से बचें और अपने अनुयायियों को होड़ में आगे आकर अपना बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार करने से रोकें। जिससे वे अपना ध्यान भजन साधन के अलावा तीर्थ स्थलों के सौंदर्यकरण और रख-रखाव में लगा सकें। ताकि तीर्थ यात्रियों को ब्रज जैसे तीर्थों में जाने पर सांस्कृतिक आघात न लगे।जो आज उन्हें लगने लगा है।        

Monday, December 4, 2023

संतों को किससे भय लगता है?


पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के दर्शन करने गए। आजकल देश भर के वीआईपी और विराट कोहली जैसी सेलिब्रिटी, जो भी वृंदावन आता है वो महाराज के दर्शन करने अवश्य जाता है। इनमें से ज़्यादातर लोग इसलिए जाते हैं क्योंकि पिछले दो-तीन वर्षों में महाराज श्री सोशल मीडिया पर पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से वायरल हुए हैं। बाक़ी लोग उनका आशीर्वाद लेने जाते हैं और थोड़े से जिज्ञासु लोग उनसे ज्ञान लेने जाते हैं। माना जा सकता है कि भागवत जी भी प्रथम श्रेणी के ही दर्शनार्थी थे, जो आशीर्वाद या आध्यात्मिक ज्ञान लेने नहीं बल्कि महाराज के करोड़ों प्रशंसकों के बीच वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने गये थे।



‘संतन के ढिग रहत है सबके हित की बात’ की भावना को चरितार्थ करते हुए महाराज ने भागवत जी को एक लंबा प्रवचन दे डाला। जिसका मूल आशय यह था कि संघ और भाजपा सहित देश के सभी राजनैतिक दल रेवड़ियाँ बाँट कर भारत का ‘विकास’ करने का जो दावा कर रहे हैं उससे भारत कभी सुखी और संपन्न नहीं बन सकता। बल्कि मानसिक और नैतिक रूप से दुर्बल और सामाजिक रूप से विभाजित राष्ट्र बन रहा है, जो देश के भविष्य के लिये बहुत घातक है। महाराज का ज़ोर इस बात पर था कि धर्मांधता, उत्तेजना, आक्रामकता और हिंसा को बढ़ाने वाले दल समाज का भला नहीं कर सकते। यह प्रवचन बड़ी तेज़ी से दुनिया भर में वायरल हो चुका है। इसे सुन कर भागवत जी निरुत्तर हो गये। क्या यह आशा की जा सकती है कि संघ में इस विषय पर आत्मविश्लेषण व चिंतन किया जाएगा? क्योंकि स्वयं महाराज प्रायः यह कहते हैं कि उनके प्रवचन को सुनने से कोई लाभ नहीं, जब तक उसे आचरण में न लाया जाए।



प्रेमानंद महाराज जी देश के एक अति शक्तिशाली राजनेता से इतने कड़े शब्दों में ऐसा इसलिए कह सके  क्योंकि उनका हृदय निर्मल है और उन्होंने जीवन में कठोर तप किया है और उन्हें किसी भी सरकार से किसी लाभ, उपाधि या सहायता की कोई अपेक्षा नहीं है। अब ज़रा परिदृश्य को बदलिए और देखिए उन तथाकथित संतों की ओर जो अध्यात्म का चोला ओढ़ कर वैभव, सत्ता और ग्लैमर का सुख भोग रहे हैं। किसी एक का नाम लेने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, क्योंकि इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे सभी आत्मघोषित सद्गुरुओं, महामंडलेश्वरों, शंक्राचार्यों और मठाधीशों की पूछ अचानक बढ़ गई है। धर्म के नाम पर अरबों रुपये की संपत्ति जमा कर लेने वाले ऐसे सभी ‘मीडियाजीवी संत’ आजकल भारत सरकार या राज्य सरकार द्वारा दी गई एक्स, वाई या जेड श्रेणी की पुलिस सुरक्षा के घेरे में चलते हैं। इनकी सुरक्षा पर इस देश के मेहनतकश करदाताओं के टैक्स का अरबों रुपया हर साल खर्च हो रहा है। जबकि करदाताओं को इसका कोई लाभ नहीं मिलता। हिरण्यकश्यप के वध के बाद उसके खून में सनी आंतड़ियों की माला पहने रौद्र रूप में सामने खड़े नरसिंह भगवान को शांत करने गये सुकुमार बालक प्रह्लाद जी ने कहा, ‘भगवन मुझे आपके इस भयानक रूप से डर नहीं लगता, पर अपनी वासनाओं से डर लगता है जो मेरी आध्यात्मिक राह में बाधक हैं।’ सुरक्षा के घेरे में चलने वाले इन संतों ने अपने प्रवचनों अनेक बार श्रीमद् भागवत के इस प्रसंग का उल्लेख किया होगा? पर क्या इससे मिले ज्ञान पर कभी मंथन भी किया? हमने तो विरक्त संतों से यही सुना है कि लाभ, पूजा, प्रतिष्ठा के पीछे भागने वाले कभी आध्यात्मिक प्रगति नहीं कर सकते।    



आप पूछ सकते हैं कि जब दूसरे विशिष्ट व्यक्तियों को सरकार की तरफ़ से इस तरह की सुरक्षा दी जाती है तो इन मशहूर संतों को सुरक्षा क्यों न दी जाए? दोनों परिस्थितियों में अंतर है। बाक़ी लोग अपने सत्कर्मों या कुकर्मों के कारण लगातार मौत के भय में जीते हैं इसलिए वे सरकार से सुरक्षा माँगते हैं। जबकि स्वयं को संत मानने वाले उस आध्यात्मिक मार्ग के पथिक हैं जिसमें, ‘चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह। जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥’ आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले को मौत का क्या भय? गोस्वामी तुलसीदास जी भी कह गये हैं, ‘हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।’ फिर मौत से क्या डरना? 


अगर पाठकों को ये आत्मश्लाघा न लगे तो विनम्रता से यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि 1993-98 के बीच अलग-अलग जगहों पर मुझ पर कई बार जानलेवा हमले हुए। क्योंकि ‘जैन हवाला कांड’ को उजागर करके मैंने देश के सबसे ताकतवर लोगों और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों के विरुद्ध अकेले ही युद्ध छेड़ दिया था। पर प्रभु कृपा से मैं न तो डरा, न झुका और न बिका। उस दौर में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी एन शेषन और मैं देश भर में जनसभाओं को संबोधित करने जाते थे तो अक्सर मुझसे यह प्रश्न पूछा जाता था कि ‘आप इतना ख़तरनाक युद्ध लड़ रहे हैं, आपको डर नहीं लगता?’ मेरा श्रोताओं को उत्तर होता था, ‘मारे कृष्णा राखे के, राखे कृष्णा मारे के’, श्री चैतन्य महाप्रभु के उक्त वचन से मुझे नैतिक बल मिलता था। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि बड़े-बड़े मंचों से धार्मिक प्रवचन करने वाले लोग कमांडो और पुलिस के घेरे में रह कर गर्व का अनुभव करते हैं। माया मोह त्यागने का उपदेश देने वालों की कथनी और करनी में इस भेद के कारण ही देश की आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं हो पा रहा है। कुछ ऐसी ही बात प्रेमानंद जी महाराज ने डॉ मोहन भागवत जी से कही। 


पिछले चार दशकों में ये आम रिवाज हो गया है कि आपराधिक चरित्र के राजनेता, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों, सरकारों द्वारा प्रदत्त पुलिस सुरक्षा के घेरे में चलते हैं। इसका समय-समय पर समाज में विरोध भी हुआ और सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिकाएँ भी दायर हुई हैं। पर कोई सरकार इस कुरीति को रोकना नहीं चाहती क्योंकि उसे इन आपराधिक छवि के नेताओं का इस्तेमाल अपनी सत्ता बनाने और चलाने में करना होता है। हर दल के बड़े और मशहूर राजनेताओं को सरकार द्वारा सुरक्षा दिये जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। क्योंकि उनके जीवन पर हर समय ख़तरा रहता है। पर गुंडे मवालियों को सुरक्षा मिले या माया-मोह त्यागने का उपदेश देने वाले संतों को यह सुरक्षा मिले, तो यह बात गले नहीं उतरती। आपका क्या विचार है?