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Monday, July 27, 2026

सरकार की व्यवस्था कैसे सुधरे?

पिछले कुछ सालों से मीडिया दो खेमों में बटा हुआ है। एक तरफ़ है निजी टीवी चैनल और दूसरी तरफ़ है सोशल मीडिया। निजी टीवी चैनलों के मालिकों को सरकार विज्ञापन के नाम पर बहुत मोटी रकम देती है। इसलिए इन चैनलों के उन एंकरों को भी बहुत मोटी रकम मिलती है जो रात-दिन सरकार का इकतरफ़ा गुणगान करते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछली सरकारों में जब निजी चैनल और सोशल मीडिया दोनों ही नदारद थे तब भी ये बँटवारा इस तरह था कि सरकारी नियंत्रण वाला दूरदर्शन और सरकार से विज्ञापनों के नाम पर मोटा पैसा लेने वाले अख़बार, तत्कालीन सरकार का भौपूँ हुआ करते थे। जबकि दूसरे अख़बार विपक्षी दलों से समर्थन लेकर सरकार की आलोचना किया करते थे। हालांकि उस दौर में ये फ़र्क़ इतना प्रखर नहीं था कि आम आदमी उसकी गहराई समझ सके। पर आज जो देश में हो रहा है उसमें दोनों ही पक्ष इकतरफ़ा अभियान चलाते हैं। जिससे हकीकत पता नहीं चल पाती। उदाहरण के तौर पर, सोशल मीडिया में आए दिन वीडियो आते हैं कि भाजपा सरकारों के बनाए पुल ताश के पत्तों की तरह ढहते रहते हैं और भाजपा सरकारों के बनाए राजमार्गों पर जगह-जगह भारी गड्डे हो गए हैं। ऐसा ही एक वीडियो समाचार आया कि नवनिर्मित दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, बनते ही जगह-जगह टूट गया है। पिछले हफ़्ते जब मैं इस राजमार्ग पर पहली बार गया तो लगातार कार की खिड़की से बाहर देख रहा था कि वो गड्डे कहाँ हैं? पर मुझे ऐसा कोई गड्ढा नज़र नहीं आया। बल्कि ये राजमार्ग इतना बढ़िया बना है कि हम मात्र डेढ़ घंटे में दिल्ली से मुज़फ़्फ़रनगर पहुँच गए। 



सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार होना कोई नई बात नहीं है। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोग़ा’ 150 साल पहले भारत में चल रहे भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है। 2500 साल पहले राजनीति के महारथी चाणक्य पंडित ने कहा था, ‘शहद के गोदाम की रखवाली करने वाले के होठों पर शहद लगा मिलेगा’। आज़ादी के बाद से केंद्र और राज्यों की सभी सरकारों ने देश के संसाधनों को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्या वजह है कि नेता किसी भी दल का क्यों न हो, अगर वो पार्षद से लेकर मंत्री तक कभी भी किसी भी पद पर रहा होगा तो उसकी आर्थिक हैसियत उस दौर में कई गुना बढ़ी होगी। ये कोई छिपी बात नहीं है। अपवाद तो हमेशा और हर जगह होते हैं। पर आम धारणा तो यही है कि राजनीति कोयले की दलाली की तरह एक ऐसा पेशा है जिसमें हाथ काले होते ही हैं। इसलिए मौजूदा दौर में संघ और भाजपा पर जो तीव्र हमला हो रहा है वो क्या उन राजनेताओं द्वारा किया जा रहा है जिनका अपना दामन पाक साफ़ है? अगर नहीं तो फिर ग़ुलाम अली की ग़ज़ल की वो लाइन दोहराना अनुचित न होगा, हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है….



प्रधान मंत्री मोदी ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से लेकर, ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना’, ‘प्रधान मंत्री आवास योजना’, ‘आयुष्मान भारत’, ‘जल जीवन मिशन’, ‘स्किल इंडिया मिशन’, ‘नमामि गंगे’, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’, ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना’, ‘प्रधान मंत्री मुद्रा योजना’, ‘अटल पेंशन योजना’, ‘प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना’, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’, ‘उजाला योजना’, ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’, ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ जैसी तमाम योजनाएं और अभियान चलाए। विपक्ष कहता है कि ये सब फ्लॉप हो गए, कहीं कुछ नहीं हुआ। जबकि इसका दूसरा पक्ष भी सामने आता है। हमारे घर और दफ्तर के स्टाफ़ में जो कर्मचारी हैं वे मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से हैं। उनका कहना है कि उन्हें घर बनाने के लिए सरकार से ख़ासा अनुदान मिला, आज़ादी के बाद उनके गाँव में पहली बार सड़क आई और पेयजल का संकट भी दूर हुआ। ये वो साधारण लोग हैं जिन्हें अकारण झूठ बोलने की कोई आवश्यकता नहीं। उन्हें लाभ मिला है इसलिए वे उसे बताने में संकोच नहीं करते। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि हर अभियान पूरी तरह से असफल हुआ है। कहीं सफलता और कहीं विफलता का होना असामान्य बात नहीं है।   



मुझे लगता है कि चाहे कोई भी दल सत्ता में हो जब तक उसका शासन और प्रशासन आम जनता के प्रति जवाबदेह न हो तब तक वो कितना भी ढोल पीटता रहे, जनता उसके दावों पर विश्वास नहीं करती। आम जनता को बड़े स्तर के बड़े घोटालों से इतना सरोकार नहीं होता जितना उनकी रोज़ की ज़िंदगी में पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार से होता है। इस स्तर का भ्रष्टाचार, हुक्मरानों का अहंकार और आम मतदाता की उपेक्षा का ख़ामियाज़ा सीधा मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री को भुगतना पड़ता है। ज़रूरत इस बात की है कि कोई ऐसी व्यवस्था बने जिसके अंतर्गत आम जनता की छोटी सी छोटी शिकायत पर तुरंत कारवाही हो और उसे राहत मिले। इस दिशा में तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय ने जो पहल की हैं उसका बहुत अच्छा संदेश आम जनता के बीच गया है। आगे चल कर वो कितने सफल होंगे ये तो समय ही बताएगा। पर तमिलनाडु तो एक राज्य है, आवश्यकता हर राज्य में ऐसे ही सुधार की है। डबल इंजन का दावा करने वाली प्रांतीय सरकारों में यह काम केंद्र सरकार की पहल पर अविलंब शुरू होना चाहिए। साथ ही महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां यदि भ्रष्टाचार में बदनाम हुए अफसरों और राजनेताओं की होती है तो उससे सरकार की छवि बहुत ख़राब होती है। भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के उसके दावे खोखले साबित होते हैं।  

एक बात और; इस देश में ईमानदार अफसरों और प्रतिष्ठित सामाजिक लोगों की संख्या इतनी कम नहीं है कि वे शासन और प्रशासन को जवाबदेह बनने के लिए मजबूर न कर सकें। आज के AI युग में किसी भी व्यक्ति के जीवन के विषय में पता लगाना कठिन कार्य नहीं है। आधुनिक तकीनिकी का इस्तेमाल करके देश के हर ज़िले में ऐसे लोगों की सूची बनाई जानी चाहिए और उन्हें कुछ अधिकार देकर स्थानीय शासन और प्रशासन पर निगरानी रखने के काम सौंपना चाहिए। अगर ऐसा हो सका तो ये जनता और सरकार के बीच की खाई को पाटने का एक महत्वपूर्ण कदम होगा।  

Monday, October 27, 2025

बिहार चुनाव: एक नया मोड़ या वही राह?

बिहार की राजनीति हमेशा से प्रयोगों, व्यक्तित्वों और गठबंधनों की धरती रही है। यहाँ सत्ता तक पहुँचने का रास्ता सिर्फ वोटों से नहीं, बल्कि समाजिक समीकरणों, जातीय गणित और जनभावनाओं से होकर गुजरता है। अब जब 2025 के विधानसभा चुनावों की दस्तक हो चुकी है, पूरा देश बिहार की ओर देख रहा है। यह चुनाव न केवल राज्य की राजनीति को बल्कि राष्ट्रीय समीकरणों को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है। 

इस बार मुकाबला दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण इसलिए है क्योंकि मैदान में तीन धाराएँ साफ तौर पर दिखाई दे रही हैं। ‘इंडिया’ गठबंधन, जिसमें मुख्य भूमिका में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) है। एनडीए, जिसमें जनता दल (यू) के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फिर एक बार केंद्र में हैं। वहीं, तेजी से उभरती शक्ति के रूप में प्रशांत किशोर का ‘जन सुराज अभियान’।


राजद की अगुवाई वाला ‘इंडिया’ गठबंधन इस चुनाव को अपनी साख बचाने के साथ-साथ केंद्र की राजनीति पर असर डालने के अवसर के रूप में देख रहा है। तेजस्वी यादव पिछले कुछ वर्षों में अपनी राजनीतिक परिपक्वता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, चाहे वह बेरोजगारी का मुद्दा हो, युवाओं से संवाद हो या नीतीश सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना। 


राजद के पास एक ठोस सामाजिक आधार है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। भ्रष्टाचार के पुराने मामलों और शासन की यादें आज भी मतदाताओं के दिमाग में ताजा हैं। कांग्रेस, वामदलों और अन्य सहयोगियों के बीच सीट बँटवारे को लेकर संभावित खींचतान भी गठबंधन की मजबूती पर सवाल उठाती है।फिर भी, तेजस्वी का युवा जोश और उनके प्रचार की डिजिटल समझबूझ उन्हें पहले से अलग बनाती है। ‘इंडिया’ गठबंधन यह भलीभाँति जानता है कि अगर बिहार में उसकी पकड़ मजबूत होती है, तो यह 2029 के लोकसभा समीकरणों में एक नई ऊर्जा भर सकता है।

एनडीए का चेहरा इस बार भी नीतीश कुमार ही हैं, जिनका राजनीतिक अनुभव किसी परिचय का मोहताज नहीं। वे सात बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं, लेकिन अब जनता उनसे बदलाव की बजाय जवाब चाहती है। उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है साफ़ छवि और साझा सामाजिक आधार। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पिछले कुछ सालों में उनके राजनीतिक पलटवारों, कभी महागठबंधन में, कभी एनडीए में आने-जाने ने उनकी विश्वसनीयता को काफ़ी कमजोर किया है।


भाजपा, जो एनडीए की दूसरी बड़ी ताकत है, नीतीश के साथ रहते हुए भी अपने संगठन को बढ़ाने की कोशिश कर रही है। उसे यह अंदाज़ा है कि बिहार में अगर उसे भविष्य में स्वतंत्र रूप से मज़बूत होना है, तो नीतीश के बाद का दौर भी ध्यान में रखना होगा। यही कारण है कि भाजपा अब स्थानीय नेताओं को उभारने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सहारे मैदान को अपने पक्ष में करने की योजना पर काम कर रही है।

एनडीए का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उसके पास वोटों का एक स्थिर कोर आधार है और शासन की निरंतरता की छवि बनी हुई है। लेकिन एंटी-इनकम्बेंसी, बेरोजगारी और ग्रामीण ढाँचों में ठहराव जैसे मुद्दे उनके लिए सिरदर्द बन सकते हैं।

बिहार के इस राजनीतिक त्रिकोण में सबसे दिलचस्प और नया पैदा हुआ  कारक हैं प्रशांत किशोर (पीके)। उन्होंने रणनीतिकार से जननेता बनने की जो यात्रा शुरू की, वह अब निर्णायक दौर में पहुँची है। उनका जन सुराज अभियान पिछले दो वर्षों से गाँव-गाँव में सक्रिय रहा है। वे न तो स्वयं को किसी पारंपरिक पार्टी की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं और न किसी गठबंधन का हिस्सा हैं। उनका संदेश सीधा है — "सिस्टम को बदलने के लिए राजनीति में साफ और नई सोच लानी होगी।" प्रशांत किशोर का यह प्रयोग बिहार की राजनीति की जमीनी सच्चाई को चुनौती देता है। वे युवाओं और शिक्षित तबके में धीरे-धीरे एक विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।

हालाँकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि वे बड़े पैमाने पर सीटें जीतेंगे, लेकिन उनका प्रभाव दो स्तरों पर होगा। वोट कटवा असर: कई क्षेत्रों में वे परंपरागत दलों का समीकरण बिगाड़ सकते हैं। विचारधारात्मक बदलाव: उनकी राजनीति भ्रष्टाचार विरोधी और विकास-केंद्रित विमर्श को चुनावी बहस के केंद्र में ला रही है। अगर उनका अभियान थोड़ा भी जनसमर्थन जुटाने में सफल रहता है, तो यह बिहार में तीसरी शक्ति के उदय की भूमिका लिख सकता है। 

गौरतलब है कि बिहार की राजनीति बिना जातीय समीकरणों के समझी ही नहीं जा सकती। यादव, कुशवाहा, भूमिहार, राजपूत और मुसलमानों के बीच सामंजस्य और टकराव हमेशा परिणामों को प्रभावित करते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नया सामाजिक तबका, युवा और प्रवासी मजदूर वर्ग, निर्णायक बनकर उभर रहा है।

प्रशासन, कृषि संकट, रोजगार और शिक्षा की स्थिति इस बार मुख्य मुद्दे होंगे। डिजिटल मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्मों के उदय ने इस बार चुनावी प्रचार के तरीके को भी बदल दिया है। अब गाँवों तक व्हाट्सऐप समूह और सोशल अभियानों के माध्यम से राजनीतिक विमर्श पहुँच रहा है और यहाँ पर प्रशांत किशोर जैसे नेताओं की रणनीतिक क्षमता का उन्हें फायदा हो सकता है।

इस चुनाव की सबसे बड़ी बहस विकास बनाम विश्वसनीयता की होगी। नीतीश कुमार कहेंगे कि उन्होंने राज्य को बुनियादी ढाँचे और शासन में सुधार दिया, जबकि विरोधी पक्ष यह पूछेगा कि इतने वर्षों में युवाओं के लिए अवसर क्यों नहीं बढ़े। तेजस्वी यादव रोजगार और सामाजिक न्याय का नारा देंगे; भाजपा मोदी के नाम और केंद्रीय योजनाओं की बदौलत वोट जुटाने की कोशिश करेगी और प्रशांत किशोर नई राजनीति की बात करेंगे। नतीजतन, यह चुनाव किसी एक मुद्दे या व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहेगा — बल्कि यह आस्था, असंतोष और आकांक्षा के मिश्रण से तय होगा।

बिहार के 2025 के चुनाव इसलिए रोचक हैं क्योंकि तीन पीढ़ियाँ और तीन दृष्टिकोण आमने-सामने हैं। नीतीश कुमार, जिनकी राजनीति स्थिरता और अनुभवी शासन का प्रतीक है। तेजस्वी यादव, जो परिवर्तन और युवा आकांक्षाओं के वाहक हैं। प्रशांत किशोर, जो मौजूदा राजनीति को बदलने की चुनौती दे रहे हैं। यह चुनाव यह तय करेगा कि बिहार पुरानी राजनीति की सीमाओं में रहेगा या सोच के नए अध्याय की ओर कदम बढ़ाएगा। चाहे परिणाम कुछ भी हो, इतना तो तय है कि इस बार बिहार का जनादेश केवल सरकार नहीं, बल्कि देश की  राजनीति की दिशा भी तय करेगा। 

Monday, April 7, 2025

वक़्फ़ क़ानून में संशोधन किसलिए?


वक़्फ़ संशोधन बिल, जिसे हाल ही में भारतीय संसद में पेश किया गया और 2-3 अप्रैल 2025 को लोकसभा और राज्यसभा से पारित किया गया, देश में एक गहन बहस का विषय बन गया है। यह बिल 1995 के वक़्फ़ अधिनियम में संशोधन करने और वक़्फ़ संपत्तियों के प्रबंधन को अधिक पारदर्शी और समावेशी बनाने का दावा करता है। सरकार इसे एक प्रगतिशील कदम के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष और कई मुस्लिम संगठन इसे धार्मिक स्वायत्तता पर हमला मानते हैं। इस लेख में हम इस बिल के समर्थन और विरोध के तर्कों को तटस्थ दृष्टिकोण से देखेंगे और इसके संभावित प्रभावों का आकलन करेंगे। 



वक़्फ़ एक इस्लामी परंपरा है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को धार्मिक, शैक्षिक या परोपकारी उद्देश्यों के लिए समर्पित कर देता है। भारत में वक़्फ़ संपत्तियों का प्रबंधन 1995 के वक़्फ़ अधिनियम के तहत होता है, जिसके अंतर्गत राज्य वक़्फ़ बोर्ड और केंद्रीय वक़्फ़ परिषद कार्य करते हैं। वक़्फ़ संशोधन बिल 2024 में कई बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, जैसे वक़्फ़ बोर्ड में गैर-मुस्लिम और महिला सदस्यों की अनिवार्यता, संपत्ति सर्वेक्षण के लिए कलेक्टर की भूमिका और विवादों में हाई कोर्ट की अपील का प्रावधान। सरकार का कहना है कि यह बिल वक़्फ़ प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही लाएगा, जबकि विरोधी इसे वक़्फ़ की मूल भावना के खिलाफ मानते हैं।


इस बिल का समर्थन करने वाले जो तर्क देते हैं उनका कहना है कि वक़्फ़ बोर्डों में भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की शिकायतें लंबे समय से चली आ रही हैं। देश में 8.7 लाख से अधिक वक़्फ़ संपत्तियां हैं, जिनकी कीमत लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है, लेकिन इनका उपयोग गरीब मुस्लिम समुदाय के कल्याण के लिए प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रहा। कलेक्टर द्वारा संपत्ति सर्वेक्षण और रिकॉर्ड डिजिटलीकरण जैसे प्रावधानों से इन संपत्तियों का बेहतर प्रबंधन संभव होगा। बिल में वक़्फ़ बोर्ड में कम से कम दो महिलाओं और गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान भी है। समर्थकों का तर्क है कि इससे बोर्ड में लैंगिक और सामाजिक समावेशिता बढ़ेगी। विशेष रूप से पसमांदा मुस्लिम समुदाय, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा है, इस बिल का समर्थन करता है, क्योंकि उनका मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में धनी और प्रभावशाली लोग वक़्फ़ संपत्तियों पर कब्जा जमाए हुए हैं। 



पहले वक़्फ़ ट्रिब्यूनल का फैसला अंतिम माना जाता था, जिसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। नए बिल में हाई कोर्ट में अपील का अधिकार दिया गया है, जिसे समर्थक संविधान के अनुरूप और न्यायसंगत मानते हैं। उनका कहना है कि इससे वक़्फ़ बोर्ड के मनमाने फैसलों पर अंकुश लगेगा। बिल में यह शर्त भी जोड़ी गई है कि बिना दान के कोई संपत्ति वक़्फ़ की नहीं मानी जाएगी। समर्थकों का कहना है कि इससे उन मामलों में कमी आएगी जहां वक़्फ़ बोर्ड बिना ठोस सबूत के संपत्तियों पर दावा करता था, जिससे आम लोगों को परेशानी होती थी।



वहीं इस बिल के विरोध में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और विपक्षी दलों का कहना है कि यह बिल वक़्फ़ की मूल भावना को कमजोर करता है। वक़्फ़ एक धार्मिक परंपरा है और इसमें गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना इसकी पवित्रता को नुकसान पहुंचाएगा। उनका यह भी आरोप है कि सरकार वक़्फ़ संपत्तियों पर कब्जा करने की योजना बना रही है। बिल में कलेक्टर को वक़्फ़ संपत्तियों का सर्वेक्षण करने और उनकी स्थिति तय करने का अधिकार दिया गया है। विरोधियों का कहना है कि यह एक सरकारी हस्तक्षेप है, जो वक़्फ़ बोर्ड की स्वायत्तता को खत्म कर देगा। उनका तर्क है कि कलेक्टर, जो ज्यादातर गैर-मुस्लिम हो सकता है, वक़्फ़ के धार्मिक महत्व को नहीं समझ पाएगा। विपक्ष का दावा है कि यह बिल संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार देता है। उनका कहना है कि वक़्फ़ एक इस्लामी परंपरा है और इसमें सरकारी दखल अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य संगठनों ने बिल के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन किए हैं। ईद और जुमातुल विदा जैसे अवसरों पर काली पट्टी बांधकर नमाज पढ़ने की अपील इसका उदाहरण है। विरोधियों का कहना है कि यह बिल मुस्लिम समुदाय को अपने ही धर्म से दूर करने की साजिश है। 


वक़्फ़ संशोधन बिल के लागू होने से कई सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। यदि यह पारदर्शिता और समावेशिता को बढ़ाता है, तो वक़्फ़ संपत्तियों का उपयोग गरीब मुस्लिमों, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए बेहतर तरीके से हो सकता है। दूसरी ओर, यदि यह धार्मिक स्वायत्तता को कमजोर करता है या सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ाता है, तो इससे मुस्लिम समुदाय में असंतोष और अविश्वास बढ़ सकता है। 


राजनीतिक दृष्टिकोण से यह बिल सत्तारूढ़ एनडीए के लिए एक जोखिम भरा कदम है। जहां बीजेपी इसे हिंदू मतदाताओं के बीच वक़्फ़ बोर्ड की कथित मनमानी के खिलाफ एक कदम के रूप में पेश कर सकती है, वहीं सहयोगी दल जैसे जेडीयू टीडीपी और आरएलडी को अपने मुस्लिम समर्थकों के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है। यदि मोदी सरकार संसद में बहुमत के चलते इस बिल को अपने पिछले दो कार्यकालों में बड़े आराम से ला सकती थी। लेकिन तीसरे कार्यकाल में इस बिल को लाकर भाजपा ने अपने सहयोगी दलों को पशोपेश में डाल दिया है।


वक़्फ़ संशोधन बिल एक जटिल मुद्दा है, जिसमें सुधार की आवश्यकता और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। समर्थकों के लिए यह भ्रष्टाचार को खत्म करने और वक़्फ़ को आधुनिक बनाने का अवसर है, जबकि विरोधियों के लिए यह धार्मिक पहचान और स्वायत्तता पर हमला है। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं छिपी है। इस बिल का असली प्रभाव इसके कार्यान्वयन पर निर्भर करेगा। यदि सरकार इसे संवेदनशीलता और पारदर्शिता के साथ लागू करती है, तो यह एक सकारात्मक बदलाव ला सकता है। लेकिन यदि इसे जल्दबाजी या राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया, तो यह सामाजिक तनाव को और गहरा सकता है। अंततः इस बिल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह वक़्फ़ की मूल भावना को कितना सम्मान देता है और समाज के सभी वर्गों को कितना लाभ पहुंचाता है। 

Monday, September 9, 2024

कांग्रेस समझदारी से चले


जून 2024 के चुनाव परिणामों के बाद राहुल गांधी का ग्राफ काफ़ी बढ़ गया है। बेशक इसके लिए उन्होंने लम्बा संघर्ष किया और भारत के आधुनिक इतिहास में शायद सबसे लम्बी पदयात्रा की। जिसके दौरान उन्हें देशवासियों का हाल जानने और उन्हें समझने का अच्छा मौक़ा मिला। इस सबका परिणाम यह है कि वे संसद में आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं और तथ्यों के साथ सरकार को घेरते रहते हैं। किसी भी लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों का मज़बूत होना ज़रूरी होता है। इसी से सत्ता का संतुलन बना रहता है और सत्ताधीशों की जनता के प्रति जवाबदेही संभव होती है। अन्यथा किसी भी लोकतंत्र को अधिनायकवाद में बदलने में देर नहीं लगती।
 


आज राहुल गांधी विपक्ष के नेता भी हैं। जो कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत एक अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। जिसकी बात को सरकार हल्के में नहीं ले सकती। इंग्लैंड, जहां से हमने अपने मौजूदा लोकतंत्र का काफ़ी हिस्सा अपनाया है, वहाँ तो विपक्ष के नेता को ‘शैडो प्राइम मिनिस्टर’ के रूप में देखा जाता है। उसकी अपनी समानांतर कैबिनेट भी होती है, जो सरकार की नीतियों पर कड़ी नज़र रखती है। ये एक अच्छा मॉडल है जिसे अपने सहयोगी दलों के योग्य नेताओं को साथ लेकर राहुल गांधी को भी अपनाना चाहिए। आपसी सहयोग और समझदारी बढ़ाने के लिए, ये एक अच्छी पहल हो सकती है। 


राहुल गांधी को विपक्ष का नेता बनाने में ‘इंडिया गठबंधन’ के सभी सहयोगी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उत्तर प्रदेश से 37 लोक सभा सीट जीत कर अखिलेश यादव ने राहुल गांधी को विपक्ष का नेता बनने का आधार प्रदान किया। आज समाजवादी पार्टी भारत की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। ऐसे में अब राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का ये नैतिक दायित्व है कि वे भी अखिलेश यादव जैसी उदारता दिखाएं जिसके कारण कांग्रेस को रायबरेली और अमेठी जैसी प्रतिष्ठा की सीटें जीतने का मौक़ा मिला। वरना उत्तर प्रदेश में कांग्रेस संगठन और जनाधार के मामले में बहुत पीछे जा चुकी थी। अब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव हैं, जहां कांग्रेस सबसे बड़े दल की भूमिका में हैं। वहाँ उसे समाजवादी पार्टी को साथ लेकर चलना चाहिए और दोनों राज्यों के चुनावों में समाजवादी पार्टी को भी कुछ सीटों पर चुनाव लड़वाना चाहिए। महाराष्ट्र में तो समाजवादी पार्टी के दो विधायक अभी भी थे। हरियाणा में भी अगर कांग्रेस के सहयोग से उसके दो-तीन विधायक बन जाते हैं तो अखिलेश यादव को अपने दल को राष्ट्रीय दल बनाने का आधार मिलेगा। इससे दोनों के रिश्ते प्रगाढ़ होंगे और ‘इंडिया गठबंधन’ भी मज़बूत होंगे। 



स्वाभाविक सी बात है कि कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं को इस रिश्ते से तक़लीफ़ होगी। क्योंकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश में वोट बैंक एक सा है। ये नेता पुराने ढर्रे पर चलकर समाजवादी पार्टी के जनाधार पर निगाह गढ़ाएँगे। पर ऐसी हरकत से दोनों दलों के आपसी संबंध बिगड़ेंगे और बहुत दूर तक साथ चलना मुश्किल होगा। इसलिए ‘इंडिया गठबंधन’ के हर दल को ये ध्यान रखना होगा कि जिस राज्य में जिस दल का वर्चस्व है वो वहाँ नेतृत्व संभले पर, साथ ही अपने सहयोगी दलों को भी साथ खड़ा रखे। विशेषकर उन दलों को जिनका उन  राज्यों में कुछ जनाधार है। इससे गठबंधन के हर सदस्य दल को लाभ होगा। राहुल गांधी को ये सुनिश्चित करना होगा कि उनके सहयोगी दल ‘इंडिया गठबंधन’ में अपने को उपेक्षित महसूस न करें। इंडिया गठबंधन में राहुल गांधी के बाद सबसे बड़ा क़द अखिलेश यादव का है। अखिलेश की शालीनता और उदारता का उनके विरोधी दलों के नेता भी सम्मान करते हैं। ऐसे में अखिलेश यादव को पूरा महत्व देकर राहुल गांधी अपनी ही नींव मज़बूत करेंगे। 



हालाँकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के पिछले कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे। इसलिए और भी सावधानी बरतनी होगी। क्योंकि अखिलेश यादव में इतना बड़प्पन है कि वे अपनी कटु आलोचक बुआजी बहन मायावती से भी संबंध सुधारने में सद्भावना से पहल कर रहे हैं। यही नीति ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, शरद पवार व लालू यादव आदि को भी अपनानी होगी। तभी ये सब दल भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत बना पायेंगे। 


यही बात भाजपा पर भी लागू होती है। ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा देकर भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ एनडीए गठबंधन चला रही है। पर भाजपा का पिछले दस वर्षों का ये इतिहास रहा है कि उसने प्रांतों की सरकार बनाने में जिन छोटे दलों का सहयोग लिया, कुछ समय बाद उन्हीं दलों को तोड़ने का काम भी किया। इससे उसकी नीयत पर इन दलों को संदेह बना रहता है। पिछले दो लोक सभा चुनावों में भाजपा अपने बूते पर केंद्र में सरकार बना पाई। पर 2024 के चुनाव परिणामों ने उसे मिलीजुली सरकार बनाने पर मजबूर कर दिया। पर अब फिर वही संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा का नेतृत्व, तेलगुदेशम, जदयू व चिराग़ पासवान के दलों में सेंध लगाने की जुगत में हैं।  अगर इस खबर में दम है तो ये भाजपा के हित में नहीं होगा। जिस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने जाँच एजेंसियों के तौर-तरीक़ों पर लगाम कसनी शुरू की है, उससे तो यही लगता है कि डरा-धमका कर सहयोग लेने के दिन लद गए। भाजपा को अगर केंद्र में सरकार चलानी है या आगामी चुनावों में भी वो राज्यों की सरकारें बनाना चाहती है तो उसे ईमानदारी से सबका साथ-सबका विकास की नीति पर चलना होगा। 


हमारे लोकतंत्र का ये दुर्भाग्य है कि जीते हुए सांसद और विधायकों की प्रायः बोली लगाकर उन्हें ख़रीद लिया जाता है। इससे मतदाता ठगा हुआ महसूस करता है और लोकतंत्र की जड़ें भी कमज़ोर होती हैं। 1967 से हरियाणा में हुए दल-बदल के बाद से ‘आयाराम-गयाराम’ का नारा चर्चित हुआ था। अनेक राजनैतिक चिंतकों और समाज सुधारकों ने लगातार इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने की माँग की है। पर कोई भी दल इस पर रोक लगाने को तैयार नहीं है। जबकि होना यह चाहिए कि संविधान में परिवर्तन करके ऐसा क़ानून बनाया जाए कि जब कोई उम्मीदवार, लोक सभा या विधान सभा का चुनाव जीतता है तो उसे उस लोक सभा या विधान सभा के पूरे कार्यकाल तक उसी दल में बने रहना होगा जिसके चुनाव चिन्ह पर वो जीत के आया है। अगर वो दूसरे दल में जाता है तो उसे अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा देना होगा। तभी इस दुष्प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। सभी दलों को अपने हित में इस विधेयक को पारित कराने के लिए एकजुट होना होगा। 

Monday, July 8, 2024

अयोध्यावासियों का बहिष्कार क्यों?


जब से लोकसभा चुनावों के परिणाम आए हैं तब से सोशल मीडिया पर व अन्य माध्यमों से ऐसी बातें सुनने को मिल रही है कि भगवान श्रीसीताराम जी का दर्शन करने अयोध्या जाने वाले भक्त अयोध्यावासियों का बहिष्कार करें। वो वहाँ की दुकानों से कुछ भी सामान, भोग, माला, तस्वीर, ग्रंथ आदि न ख़रीदें। ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ के नागरिकों ने भाजपा को वोट नहीं दिया। यहाँ ये जानना बहुत ज़रूरी है कि अयोध्या जिसे अवध पुरी कहते हैं वो भगवान श्रीराम का नित्य धाम है और उन्हें अत्यंत प्रिय है। रामचरित् मानस के अनुसार भगवान श्री राम ने अयोध्या के विषय में कहा है कि -

‘अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी॥ 

हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी॥4॥’ 


इस चौपाई को हर राम भक्त ने अपने जीवन में कभी न कभी अवश्य पढ़ा होगा और पढ़ कर इसका अर्थ भी समझा होगा, जो इस प्रकार है कि, यहाँ के (अयोध्या के) निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुख की राशि और मेरे परमधाम को देने वाली है। प्रभु की वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए (और कहने लगे कि) जिस अवध की स्वयं श्रीरामजी ने बड़ाई की, वह (अवश्य ही) धन्य है। इस चौपाई में भगवान श्रीराम अयोध्या पुरी का इतना बड़ा माहात्म्य बता रहे हैं कि इसमें हमें भगवान श्रीराम के परमधाम तक पहुँचाने की सामर्थ है।  


अब प्रश्न उठता है कि जो भी अपने को राम भक्त कहता है या राम भक्त होने का दावा करता है, क्या वो भगवान श्रीराम की प्रिय वस्तु का तिरस्कार करेगा? जब भगवान स्वयं कह रहे हैं कि मुझे ये अयोध्या पुरी प्रिय है और यहाँ रहने वाले अयोध्यावासी अतिप्रिय हैं, तो भगवान श्रीराम की अतिप्रिय वस्तु का अपमान करना, उसकी उपेक्षा करना, उसका बहिष्कार करना, उसके प्रति द्वेष भावना रखना, क्या ये भक्ति का लक्षण है या ये भक्ति के मार्ग में किया जा रहा धाम अपराध है? यह एक बहुत गंभीर प्रश्न है। हर संप्रदाय के आचार्यों ने भक्तों को बार-बार चेतावनी दी है कि वे धाम अपराध से बचें। उदाहरण के तौर पर ब्रह्म गौड़ीय माधव संप्रदाय के प्रमुख आचार्य इस विषय में क्या कहते हैं, यह जानकर हमारा भ्रम दूर हो जाएगा। वे कहते हैं कि, ‘जो भी भक्त तीर्थ यात्रा पर जाते हैं वे उन अपराधों से सावधानी से बचें जो पवित्र स्थान की आपकी यात्रा को बिगाड़ सकते हैं। महान आध्यात्मिक गुरु श्रील भक्तिविनोद ठाकुर धाम के साथ-साथ इसके निवासियों के प्रति भी अत्यंत सावधानीपूर्वक व्यवहार करने का निर्देश दे रहे हैं। 



वे कहते हैं कि तीर्थ यात्रा के समय जब आप अयोध्या पुरी या मथुरा पुरी जैसे किसी धाम में जाते हैं तो अपने आध्यात्मिक गुरु का अनादर न करें, क्योंकि ये धाम अपराध माना जाएगा। यह सोचना कि अयोध्या पुरी जैसा पवित्र धाम अस्थायी है, भी धाम के प्रति अपराध है। क्योंकि धाम भौतिक सिद्धांतों के परे होते हैं। वे शाश्वत होते हैं। यानी सदैव थे और सदैव रहेंगे। ऐसे पवित्र धाम के निवासियों में से किसी के प्रति हिंसा करना या उन्हें साधारण व्यक्ति समझकर उनका अनादर करना या उस धाम में कूड़ा-कचरा फैलाना भी धामवासियों के प्रति हिंसा ही है। वे आगे कहते हैं कि, पवित्र धाम में अन्य देवताओं की पूजा करना और धर्म का व्यवसायीकरण करके धाम का उपयोग व्यक्तिगत आर्थिक विकास के लिए करना भी धाम अपराध है। बाहरी लोगों का धाम में जाकर कालोनियाँ काटना, होटल बनाना या व्यापार करना भी धाम अपराध की श्रेणी में ही आता है। उन शास्त्रों की निन्दा करना जो पवित्र धाम की इस गौरवशाली स्थिति का ज्ञान देते हैं, भी धाम अपराध है। धाम की शक्ति के प्रति अविश्वासी होना और यह सोचना कि धाम की महिमा काल्पनिक है, भी धाम अपराध है। इसी प्रकार अन्य संप्रदायों के आचार्यों ने और अनेक शास्त्रों ने धाम और धाम के वासियों के प्रति अपराध न करने का निर्देश दिया है।  



अब ज़रा सोचिए कि जिन लोगों ने भी अयोध्यावासियों का बहिष्कार करने का आह्वान किया है, वे किस श्रेणी के लोग हैं? या तो वे मूर्ख और अज्ञानी हैं, जिन्होंने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया? या वे भक्त हैं ही नहीं और राम भक्त होने का झूठा दावा कर रहे हैं और अगर यह सब उन्होंने जानते-बूझते हुए किया है तो वे न सिर्फ़ ख़ुद घोर पाप कर रहे हैं, बल्कि अन्य भक्तों को भी पाप कर्म करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अतः पिछले दिनों जिस किसी ने भी अयोध्या यात्रा के दौरान उनके इस आह्वान पर अयोध्यावासियों का बहिष्कार या तिरस्कार किया है, या इस संदेश को प्रसारित करने में योगदान किया है, उसने भी घोर पाप किया है। इसलिए इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए उन्हें पुनः अयोध्या जा कर अयोध्यावासियों और अयोध्या धाम से क्षमा माँगनी चाहिए।



चुनावी राजनीति से भगवत् भक्ति को जोड़ना आध्यात्मिक सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। आज किसी दल का सांसद बना है, पहले किसी और दल का था और भविष्य में न जाने किस दल का बनेगा। सांसद और विधायक तो आते-जाते रहेंगे, पर अयोध्या और अयोध्यावासियों का महत्व हज़ारों वर्षों से रहा है और रहेगा। उल्लेखनीय है कि मोदी जी कोई अवसर नहीं छोड़ते जब वे तीर्थ स्थलों में जाकर श्रद्धा और आस्था के साथ पूजन न करते हों। फिर चाहे वो केदारनाथ हो, काशी विश्वनाथ हो, पशुपतिनाथ हो, मथुरा-वृंदावन हो, तिरूपति बालाजी हो, जगन्नाथ
  पुरी हो, उद्दुपि हो, रामेश्वरम हो, द्वारिका पुरी हो, कामख्या देवी हो या अयोध्या हो। माना जा सकता है कि मोदी जी सनातन धर्म और अन्य तीर्थों के प्रति अपनी आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन और व्यापक प्रचार इस उद्देश्य से करते हैं कि उनके प्रशंसक उनसे प्रेरणा लेकर धाम के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रदर्शन करें। ऐसे में नरेंद्र मोदी जी ये कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि उनके आराध्य भगवान श्रीराम के अतिप्रिय अयोध्यावासियों और अयोध्या का तिरस्कार वे लोग करें जो स्वयं को मोदी जी का या भाजपा का समर्थक मानते हैं। चूँकि कुछ लोग इस तरह का आह्वान करके ये अपराध कर चुके हैं, इसलिए अपेक्षा की जानी चाहिए कि मोदी जी सार्वजनिक वक्तव्य जारी करके इसकी आलोचना करें और सभी देशवासियों से हर धर्म के तीर्थ स्थल के प्रति श्रद्धा और आस्था का भाव रखने की अपील करें ताकि भारतवासी धाम अपराध के पाप बचे रहें।  

Monday, June 17, 2024

नीट परीक्षा: हंगामा क्यों है बरपा?



जब भी कभी हम किसी प्रतियोगी परीक्षा के पेपर लीक होने की खबर सुनते हैं तो सबके मन में व्यवस्था को लेकर काफ़ी सवाल उठते हैं। इससे  पूरी व्यवस्था में फैले हुए भारी भ्रष्टाचार का प्रमाण मिलता है।

पिछले कुछ वर्षों में ऐसी खबरें कुछ ज़्यादा ही आने लगी हैं। सोचने वाली बात है कि इससे  देश के युवाओं पर क्या असर पड़ेगा? महीनों तक परीक्षा के लिए मेहनत करने वाले विद्यार्थियों के मन में इस बात का डर बना रहेगा कि रसूखदार परिवारों के बच्चे पैसे के बल पर उनकी मेहनत पर पानी फेर देंगे? मद्य प्रदेश में हुए व्यापम घोटाले के बाद अब एक बार फिर मेडिकल कॉलेजों में दाख़िले के लिए ‘नीट परीक्षा’ में हुए घोटाले पर जो बवाल मचा है उससे तो यही लगता है कि चंद भ्रष्ट लोगों ने लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। 



साल 2016 में पहली बार मेडिकल एंट्रेंस के लिए ‘नेशनल एंट्रेंस कम एलिजिबिलिटी टेस्ट’ यानी नीट की शुरुआत हुई।  पहले तीन सालों में इसे सीबीएसई द्वारा संचालित किया गया। परंतु वर्ष 2019 से इन इम्तहानों की ज़िम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को दी गई। जब से नीट की परीक्षा लागू हुई है ऐसा पहली बार हुआ है कि इस परीक्षा की कटऑफ इतनी हाई गई है। यदि एनटीए की मानें तो नीट कट ऑफ कैंडिडेट्स की ओवरऑल परफॉर्मेंस पर निर्भर करती है। कटऑफ बढ़ने का मतलब है कि परीक्षा कंपटीटिव थी और बच्चों ने बेहतर परफॉर्म किया परंतु क्या ये बात सही है? 


ग़ौरतलब है कि इस बार की नीट परीक्षा में 67 ऐसे युवा हैं जिन्हें 720 अंकों में से 720 अंक मिलते हैं। इसके साथ ही ऐसे कई युवा भी हैं जिन्हें 718 व 719 अंक प्राप्त हुए हैं, जो कि परीक्षा पद्धति के मुताबिक़ असंभव है। 720 के टोटल मार्क्स वाली नीट परीक्षा में हर सवाल 4 अंक का होता है। गलत उत्तर के लिए 1 अंक कटता है। अगर किसी स्टूडेंट ने सभी सवाल सही किए तो उसे 720 में से 720 मिलेंगे। अगर एक सवाल का उत्तर नहीं दिया, तो 716 अंक मिलेंगे। अगर एक सवाल गलत हो गया, तो उसे 715 अंक मिलने चाहिए। लेकिन 718 या 719 किसी भी सूरत में नहीं मिल सकते। ज़ाहिर है तगड़ा घोटाला हुआ है। 



जिन विद्यार्थियों ने इस वर्ष नीट परीक्षा दी उनसे जब यह पूछा गया कि इस बार की परीक्षा कैसी थी? तो उनका जवाब था कि इस बार की परीक्षा काफ़ी कठिन थी, कटऑफ काफ़ी नीचे रहेगी। एनटीए द्वारा एक और स्पष्टीकरण भी दिया गया है जिसके मुताबिक़ इस बार टॉप करने वाले कई बच्चों को ग्रेस मार्क्स भी दिये गये हैं। इसका कारण है कि फिजिक्स के एक प्रश्न के दो सही उत्तर हैं। ऐसा इसलिए है कि फिजिक्स की एक पुरानी किताब जिसे 2018 में हटा दिया गया था, वह अभी भी पढ़ी जा रही थी। परंतु यहाँ सवाल उठता है कि आजकल के युग में जहां सभी युवा एक दूसरे के साथ सोशल मीडिया के किसी न किसी माध्यम से जुड़े रहते हैं या फिर जहां कोचिंग लेते हैं वहाँ पर सबसे संपर्क में रहते हैं फिर ये कैसे संभव है कि छह साल पुरानी किताब  को सही नहीं कराया गया होगा? 


अगला सवाल यह भी उठता है कि एनटीए द्वारा किस आधार पर ग्रेस मार्क्स दिये गये? जबकि मेडिकल परीक्षाओं में ग्रेस मार्क्स देने का कोई प्रावधान नहीं है। एनटीए ने ग्रेस मार्क्स देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के एक आदेश का संज्ञान लिया है, जिसके अनुसार यदि प्रशासनिक लापरवाही के कारण परीक्षार्थी का समय ख़राब हो तो किन विद्यार्थियों को किन परिस्थितियों में कितने ग्रेस मार्क्स दिये जा सकते हैं। परंतु ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के जिस फ़ैसले का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है वह कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (सीएलएटी) के लिए था, उसी आदेश में यह साफ़-साफ़ लिख है कि यह आदेश मेडिकल और इंजीनियरिंग की परीक्षाओं पर लागू नहीं होगा। परंतु एनटीए ने न जाने किस आधार पर इस आदेश को संज्ञान में लिया और ग्रेस मार्क्स दे दिये ?



नीट परीक्षा का ये मामला अब सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है और अदालत ने नीट परीक्षा करवाने वाली एजेंसी एनटीए को व केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। देखना होगा कि ये दोनों कोर्ट में क्या जवाब दाखिल करते हैं? परंतु जिस तरह इस मामले ने तूल पकड़ा है, इस पर राजनीति भी होने लग गई है। इतना ही नहीं जिस तरह एनटीए ने परीक्षा से पहले ही इसके पंजीकरण में ढील बरती है वह भी सवालों के घेरे में है। टॉपर्स की लिस्ट में कम से कम 6 विद्यार्थी ऐसे हैं जो एक ही सेंटर के हैं। इस सेंटर को इसलिए भी शक की नज़र से देखा जा रहा है, जहां विद्यार्थी देश के दूसरे कोने से परीक्षा देने आए। इसके साथ ही बिहार, गुजरात व अन्य राज्यों में नीट परीक्षा के पेपर लीक के मामले भी सामने आए हैं जिन पर जाँच चल रही है। 


सोचने वाली बात है कि देश का भविष्य माने जाने वाले विद्यार्थी, जो आगे चल कर डॉक्टर बनेंगे, यदि इस प्रकार भ्रष्ट तंत्र के चलते किसी मेडिकल कॉलेज में दाख़िला पा भी लेते हैं तो क्या भविष्य में अच्छे डॉक्टर बन पायेंगे या पैसे के बल पर वहाँ भी पेपर लीक करवा कर ‘मुन्ना भाई एम बी बी एस ’ की तरह सिर्फ़ डिग्री ही हासिल करना चाहेंगे चाहे उन्हें कोई ज्ञान हो या न हो? 


सवाल सिर्फ़ नीट की परीक्षा का ही नहीं है, पिछले कुछ वर्षों से अनेक प्रांतों में होने वाली सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं में भी लगातार घोटाले हो रहे हैं। जिनकी खबरें आए दिन मीडिया में प्रकाशित होती रहती हैं। इससे देश के युवाओं में भारी निराशा फैल रही है। नतीजा यह हुआ है कि पिछले 40 बरसों में आज भारत में बेरोज़गारी की दर सबसे अधिक हो गई है। 


एक मध्यम वर्गीय या निम्न वर्गीय परिवार के पास अगर ख़ुद की ज़मीन-जायदाद, खेतीबाड़ी या कोई दुकान न हो तो नौकरी ही एकमात्र आय का सहारा होती है। घर के युवा को मिली नौकरी उसके माँ-बाप का बुढ़ापा, बहन-भाई की पढ़ाई और शादी, सबकी ज़िम्मेदारी सम्भाल लेती है। पर अगर बरसों की मेहनत के बाद घोटालों के कारण देश के करोड़ों युवा इस तरह बार-बार धोखा खाते रहेंगे तो सोचिए कितने परिवारों का जीवन बर्बाद हो जाएगा? ये बहुत गंभीर विषय है जिस पर केंद्र और राज्य सरकारों को फ़ौरन ध्यान देना चाहिए। 

Monday, April 15, 2024

इस चुनाव में मुद्दे और माहौल क्या हैं?


इस बार का चुनाव बिलकुल फीका है। एक तरफ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा हिंदू, मुसलमान, कांग्रेस की नाकामियों को ही चुनावी मुद्दा बनाए हुए हैं। वहीं चार दशक में बढ़ी सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी, किसान को फसल के उचित दाम न मिलना, बेइंतहा महंगाई और तमाम उन वायदों को पूरा न करना जो मोदी जी 2014 व 2019 में किए थे - ऐसे मुद्दे हैं जिन पर भाजपा का नेतृत्व चुनावी सभाओं में कोई बात ही नहीं कर रहा। ‘सबका साथ सबका विकास’ नारे के बावजूद समाज में जो खाई पैदा हुई है, वो चिंताजनक है। रोचक बात यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव को मोदी जी ने गुजरात मॉडल, भ्रष्टाचार मुक्त शासन और विकास के मुद्दे पर लड़ा था। पता नहीं 2019 में और इस बार क्यों वे इनमें से किसी भी मुद्दों पर बात नहीं कर रहे हैं? इसलिए देश के किसान, मजदूर, करोड़ों बेरोजगार युवाओं, छोटे व्यापारियों यहां तक कि उद्योगपतियों को भी मोदी जी के भाषणों में रूचि खत्म हो गई है। उन्हें लगता है कि मोदी जी ने उन्हें वायदे के अनुसार कुछ भी नहीं दिया। बल्कि बहुत से मामलों में तो जो कुछ उनके पास था, वो भी छीन लिया गया। इसलिए यह विशाल मतदाता वर्ग भाजपा सरकार के विरोध में है। हालांकि वह अपना विरोध खुलकर प्रकट नहीं कर रहा। पर यहाँ ये उल्लेख करना भी ज़रूरी है कि प्रतिव्यक्ति हर महीने 5 किलो अनाज मुफ़्त बाँटने का मोदी जी का फार्मूला कारगर रहा है। जिन्हें ये अनाज मिल रहा है वे कहते हैं कि इससे पहले कभी किसी सरकार ने उन्हें ऐसा कुछ नहीं दिया। इसलिए वे मोदी जी के समर्थन में हैं।
 



पर इस मुद्दे पर बुद्धिजीवियों और अर्थशास्त्रियों की राय भिन्न है। वे कहते हैं कि अगर मोदी जी ने अपने वायदे के अनुसार हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोज़गार दिया होता तो अब तक 20 करोड़ युवाओं को रोज़गार मिल जाता। तब हर युवा अपने परिवार के कम से कम पाँच सदस्यों का भरण पोषण कर लेता। इस तरह भारत के 100 करोड़ लोग सम्मान की ज़िंदगी जी रहे होते। जबकि आज 80 करोड़ लोग 5 किलो राशन के लिए भीख का कटोरा लेकर जी रहे हैं।  


दूसरी तरफ वे लोग हैं, जो मोदी जी के अन्धभक्त हैं। जो हर हाल में मोदी सरकार फिर से लाना चाहते हैं। वे मोदी जी के 400 पार के नारे से आत्ममुग्ध हैं। मोदी सरकार की सब नाकामियों को वे कांग्रेस शासन के मत्थे मढ़कर पिंड छुड़ा लेते हैं। क्योंकि इन प्रश्नों का कोई उत्तर उनके पास नहीं है। अभी यह बताना असंभव है कि इस कांटे की टक्कर में ऊंट किस करवट बैठेगा। क्या विपक्षी गठबंधन की सरकार बनेगी या मोदी जी की? सरकार जिसकी भी बने, चुनौतियां दोनों के सामने बड़ी होंगी। मान लें कि भाजपा की सरकार बनती है, तो क्या हिंदुत्व के ऐजेंडे को इसी आक्रामकता से, बिना सनातन मूल्यों की परवाह किये, बिना सांस्कृतिक परंपराओं का निर्वहन किये सब पर थोपा जाऐगा, जैसा पिछले 10 वर्षों में थोपने का प्रयास किया गया। इसका मोदी जी को सीमित मात्रा में राजनैतिक लाभ भले ही मिल जाऐ, हिंदू धर्म और संस्कृति को स्थाई लाभ नहीं मिलेगा।



भाजपा व संघ दोनों ही हिंदू धर्म के लिए समर्पित होने का दावा करते हैं, पर सनातन हिंदू धर्म की मूल सिद्धांतों से परहेज करते हैं। सैंकड़ों वर्षों से हिंदू धर्म के स्तंभ रहे शंकराचार्य ये मानते हैं कि जिस तरह का हिंदूत्व मोदी और योगी राज में पिछले कुछ वर्षों में प्रचारित और प्रसारित किया गया, उससे हिंदू धर्म का मजाक ही उड़ा है। केवल नारों और जुमलों में ही हिंदू धर्म का हल्ला मचाया गया। हाँ उज्जैन, काशी, अयोध्या, केदारनाथ आदि धर्मस्थलों पर भगवान के विशाल मंदिरों के निर्माण से हिंदू समाज में अपनी पहचान के लिए जागरूकता बढ़ी है। पर इसके अलावा जमीन पर ठोस ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिससे ये सनातन परंपरा पल्लवित-पुष्पित होती। इस बात का हम जैसे सनातनधर्मियों को अधिक दुख है। क्योंकि हम साम्यवादी विचारों में विश्वास नहीं रखते। हमें लगता है कि भारत की आत्मा सनातन धर्म में बसती है और वो सनातन धर्म विशाल हृदय वाला है। जिसमें नानक, कबीर, रैदास, महावीर, बुद्ध, तुकाराम, नामदेव सबके लिए गुंजाइश है। वो संघ और भाजपा की तरह संकुचित हृदय नहीं है, इसलिए हजारों साल से पृथ्वी पर जमा हुआ है। जबकि दूसरे धर्म और संस्कृतियां अपनी अहंकारी नीतियों के कारण कुछ सदियों के बाद धरती के पर्दे पर से गायब हो गए।


संघ और भाजपा के राजनैतिक हिंदू ऐजेंडा से उन सब लोगों का दिल टूटता है, जो हिंदू धर्म और संस्कृति के लिए समर्पित हैं, ज्ञानी हैं, साधन-संपन्न हैं पर उदारमना भी है। क्योंकि ऐसे लोग धर्म और संस्कृति की सेवा डंडे के डर से नहीं, बल्कि श्रद्धा और प्रेम से करते हैं। जिस तरह की मानसिक अराजकता पिछले 5 वर्षों में भारत में देखने में आई है, उसने भविष्य के लिए बड़ा संकट खड़ा दिया है। अगर ये ऐसे ही चला, तो भारत में दंगे, खून-खराबे और बढ़ेगे। जिसके परिणामस्वरूप भारत का विघटन भी हो सकता है। इसलिए संघ और भाजपा को इस विषय में अपना नजरिया क्रांतिकारी रूप में बदलना होगा। तभी आगे चलकर भारत अपने धर्म और संस्कृति की ठीक रक्षा कर पायेगा, अन्यथा नहीं। अलबत्ता हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अगर संघ का संगठन सक्रिय रहता है तो सनातनधर्मियों को अच्छा लगेगा।


जहां तक ‘इंडिया’ गठबंधन की बात है, ये आश्चर्यजनक तथ्य है कि समय और अवसर दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हुए भी इस गठबंधन का सामूहिक नेतृत्व वो एकजुटता और आक्रामकता नहीं दिखा पा रहा जो उसे बड़ी सफलता की ओर ले जा सकती थी। फिर भी ‘इंडिया’ के समर्थकों का विश्वास है कि इस बार का चुनाव ‘विपक्ष बनाम भाजपा’ नहीं बल्कि आम ‘जनता बनाम भाजपा’ की तर्ज़ पर लड़ा जाएगा, जैसा आपातकाल के बाद 1977 में लड़ा गया था। वैसे अगर राज्यवार आँकलन किया जाए तो गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कुछ हद तक राजस्थान को छोड़ कर कोई भी प्रांत ऐसा नहीं है जहां भाजपा विपक्षी दलों के सामने कमज़ोर नहीं है। ऐसे में कुछ भी हो सकता है। 


लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में है कि मतभेदों का सम्मान किया जाए, समाज के हर वर्ग को अपनी बात कहने की आजादी हो, चुनाव जीतने के बाद, जो दल सरकार बनाए, वो विपक्ष के दलों को लगातार कोसकर या चोर बताकर, अपमानित न करें, बल्कि उसके सहयोग से सरकार चलाए। क्योंकि राजनीति के हमाम में सभी नंगे हैं। चुनावी बाँड के तथ्य उजागर होने के बाद यह स्पष्ट है कि मोदी जी की सरकार भी इसकी अपवाद नहीं रही। इसलिए और भी सावधानी बरतनी चाहिए।