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Monday, March 9, 2026

अमेरिका की कूटनीति नहीं दादागिरी!

आज दुनिया में हर ओर युद्ध, तबाही और अराजकता का दौर है। विकास की गति रुक रही है। अनिश्चितता का वातावरण है। अनेक देशों के नेता ही मवालियों की तरह बर्ताव कर रहे हैं। जबकि विश्व के लोग हमेशा शांति और विकास चाहते हैं। कोई भी युद्ध नहीं चाहता। हर कोई यह चाहता है कि दुनिया के हर मुल्क में स्थिरता का माहौल बना रहे। इसी उठा-पटक में अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सबसे आगे हैं। ट्रम्प ही क्यों, अमरीका की तो फ़ितरत ही रही है कि कोई बहाना ढूँढ कर कमजोर देशों को दबाना और उनके संसाधनों पर क़ब्ज़ा करना। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट ने अमेरिका की कूटनीति और युद्ध रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 

सोशल मीडिया पर @sankofa360 से एक पोस्ट काफ़ी वायरल हुई जिसमें लिखा है कि, प्रिय दुनिया, क्या तुम अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा झूठ बोलने से थक नहीं गए हो? क्या तुम उस साम्राज्य से थक नहीं गए हो जो खून और मौत की तलाश में नहीं रुकता? उन्होंने कोरिया (1950–1953) के बारे में झूठ बोला, ग्वाटेमाला (1954) के बारे में, इंडोनेशिया (1958), क्यूबा (1961), वियतनाम (1961–1975), लाओस (1964–1973), कांगो (1964), डोमिनिकन रिपब्लिक (1965), कंबोडिया (1969–1970), ग्रेनाडा (1983), लेबनान (1983–1984), लीबिया (1986), ईरान (1987–1988), पनामा (1989), इराक (1991, 1998, 2003), सोमालिया (1992–1994, 2007–वर्तमान), बोस्निया (1994–1995), सूडान (1998), अफगानिस्तान (1998, 2001), यूगोस्लाविया (1999), यमन (2002–वर्तमान), पाकिस्तान (2004), सीरिया (2014), लीबिया (2011), वेनेजुएला (2026), क्यूबा (2026), ईरान (2026) के बारे में झूठ बोला। अमेरिका या उसके सहयोगी कभी किसी बात पर सच्चे रहे हैं? दुनिया कब इनके झूठ से ऊब जाएगी? अब तो हमें पता होना चाहिए कि वैश्विक अशांति, मौत, अराजकता और विनाश के जिम्मेदार कौन हैं? जो दुनिया की स्थिरता के खिलाफ हैं? जो विश्व शांति के विचार से डरते हैं? तुम्हारी चुप्पी सहयोग है! अमेरिका वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाला है। मौत और विनाश की मशीन! अमेरिकी साम्राज्य की तानाशाही के खिलाफ बोलो!!!



यह पोस्ट न केवल अमेरिका की ऐतिहासिक गलतियों को उजागर करती है बल्कि दुनिया को जगाने का प्रयास भी करती है। आज, जब हम वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान जैसे देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप की नई लहर देख रहे हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका के फैसले गलत साबित हो चुके हैं। इन युद्धों ने न केवल लाखों जानें लीं बल्कि दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेला। अमेरिका की इन गलतियों से यह पता चलता है कि वैश्विक समुदाय अब युद्धों से कितना ऊब चुका है?



अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास झूठ, हस्तक्षेप और युद्धों से भरा पड़ा है। 1950 के दशक से शुरू करें तो कोरियाई युद्ध (1950-1953) में अमेरिका ने उत्तर कोरिया के आक्रमण का बहाना बनाकर हस्तक्षेप किया, लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह शीत युद्ध की रणनीति का हिस्सा था। लाखों कोरियाई मारे गए, लेकिन क्या अमेरिका की जीत हुई? नहीं, यह युद्ध आज भी कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव का कारण बना हुआ है। इसी तरह, 1954 में ग्वाटेमाला में अमेरिका ने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंका, क्योंकि वहां की भूमि सुधार नीतियां अमेरिकी कंपनियों को पसंद नहीं आईं। सीआईए के ऑपरेशन ने देश को दशकों की अस्थिरता में डाल दिया। क्या यह फैसला सही साबित हुआ? नहीं, ग्वाटेमाला आज भी गरीबी और हिंसा से जूझ रहा है।



1950-60 के दशक से अमेरिका के झूठ की फेहरिस्त लंबी है। इंडोनेशिया (1958) में सीआईए ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन असफल रहा। क्यूबा (1961) में ‘बे ऑफ पिग्स’ हमला एक बड़ी असफलता थी, जहां अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को हटाने की कोशिश की लेकिन खुद की किरकिरी हुई। वियतनाम युद्ध (1961-1975) तो अमेरिकी इतिहास का सबसे काला अध्याय है। अमेरिका ने 'टोंकिन की खाड़ी घटना' को बहाना बनाकर युद्ध शुरू किया, जो बाद में झूठ साबित हुआ। 58,000 अमेरिकी सैनिक और लाखों वियतनामी मारे गए। अमेरिका हारकर लौटा, और वियतनाम आज एक मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश है। क्या अमेरिका का फैसला सही था? नहीं, यह युद्ध अमेरिकी समाज को भी बांट गया। लाओस (1964-1973) और कंबोडिया (1969-1970) में गुप्त बमबारी ने लाखों लोगों को मार डाला और खमेर रूज जैसे आतंक को जन्म दिया। कांगो (1964) में अमेरिका ने वहाँ प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा की हत्या में भूमिका निभाई, जो अफ्रीका की आजादी के प्रतीक थे। डोमिनिकन रिपब्लिक (1965) में हस्तक्षेप ने लोकतंत्र को कुचला।



1980 के दशक में भी यह सिलसिला जारी रहा। ग्रेनाडा (1983) में अमेरिका ने मेडिकल छात्रों की सुरक्षा का बहाना बनाकर आक्रमण किया, लेकिन यह छोटे देश पर साम्राज्यवादी कब्जा था। लेबनान (1983-1984) में अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, लेकिन कोई स्थायी शांति नहीं आई। लीबिया (1986) में कद्दाफी पर हमला, ईरान (1987-1988) में नौसेना संघर्ष, पनामा (1989) में नोरिएगा को हटाना – ये सभी फैसले अमेरिका की ताकत दिखाने के लिए थे, लेकिन उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाई। इराक के खिलाफ 1991 का गल्फ वॉर, 1998 की बमबारी और 2003 का आक्रमण 'महाविनाश के हथियारों' के झूठ पर आधारित था। सद्दाम हुसैन को हटाया गया, लेकिन इराक आज भी अराजकता में डूबा है, आईएसआईएस जैसे समूह पैदा हुए। सोमालिया (1992-1994, 2007-वर्तमान) में अमेरिकी हस्तक्षेप ने समुद्री डकैती और आतंकवाद बढ़ाया। बोस्निया (1994-1995) में नाटो हमले, सूडान (1998) में दूतावास बमबारी, अफगानिस्तान (1998, 2001) में तालिबान के खिलाफ युद्ध – ये सभी अमेरिका की ‘आतंकवाद विरोधी’ नीति के नाम पर थे, लेकिन अफगानिस्तान से 2021 की शर्मनाक वापसी ने साबित किया कि 20 साल का युद्ध व्यर्थ था।


यूगोस्लाविया (1999) में नाटो बमबारी ने कोसोवो को अलग किया, लेकिन जातीय तनाव आज भी हैं। यमन (2002-वर्तमान) में ड्रोन हमलों ने नागरिकों को मार डाला, पाकिस्तान (2004) में भी यही हुआ। सीरिया (2014) में आईएसआईएस के खिलाफ हस्तक्षेप ने देश को बर्बाद कर दिया। लीबिया (2011) में कद्दाफी को हटाने के बाद देश गृहयुद्ध में फंस गया। और अब 2026 में वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान पर झूठ। वेनेजुएला में अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए और विपक्ष को समर्थन दिया, दावा किया कि मदुरो तानाशाह है, लेकिन यह तेल संसाधनों पर कब्जे की कोशिश है। क्यूबा पर दशकों से प्रतिबंध, लेकिन 2026 में नए आरोप लगाकर दबाव बढ़ाया जा रहा है। ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के बहाने हमले की धमकी, जबकि ईरान शांति समझौते चाहता है। ये सभी फैसले गलत साबित हो चुके हैं क्योंकि उन्होंने न केवल लक्षित देशों को नुकसान पहुंचाया बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। 


संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स बताती हैं कि युद्धों से करोड़ों लोग विस्थापित हुए, अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं। यूक्रेन-रूस संघर्ष और इजराइल-फिलिस्तीन विवाद में अमेरिका की भूमिका ने दिखाया कि वह शांति दलाल नहीं, बल्कि युद्ध उकसाने वाला है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश अब चीन और रूस जैसे भागीदारों की ओर मुड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये देश शांति और विकास पर जोर देते हैं। ब्रिक्स जैसे संगठन अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर #NoMoreWars जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। प्यू रिसर्च के सर्वे बताते हैं कि 70% से ज्यादा वैश्विक नागरिक युद्ध विरोधी हैं। कोरोना महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने साबित किया कि दुनिया को सहयोग चाहिए, न कि संघर्ष।

अमेरिका की ये गलतियां साबित करती हैं कि उसकी कूटनीति स्वार्थ पर आधारित है। वह लोकतंत्र और मानवाधिकारों का ढोंग रचता है, लेकिन वास्तव में संसाधनों और वर्चस्व की तलाश करता है। अब समय आ गया है कि दुनिया जागे। जैसे पोस्ट कहती है, चुप्पी सहयोग है। हमें अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में सुधार, बहुपक्षीय समझौते और शांति वार्ताएं ही रास्ता हैं। भारत जैसे देश, जो अहिंसा का संदेश देते हैं, वैश्विक शांति के लिए आगे आएं। दुनिया शांति चाहती है, कोई युद्ध नहीं। अमेरिका को अपनी गलतियों से सीखना चाहिए, अन्यथा इतिहास उसे वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाले के रूप में याद रखेगा। 

Monday, August 4, 2025

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत को तोहफ़ा?

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयात होने वाले सामानों पर 25% टैरिफ और रूस से तेल और हथियारों की खरीद के लिए अतिरिक्त दंड की घोषणा की। यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से तब जब दोनों देश एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। ट्रम्प ने भारत और रूस को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ (डेड इकॉनमी) कहकर निशाना बनाया और भारत के उच्च टैरिफ और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं को इसका कारण बताया।


डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने वाली आक्रामक टैरिफ नीतियों को अपनाया है। 7 अगस्त 2025 से लागू होने वाले 25% टैरिफ का ऐलान करते हुए, ट्रम्प ने भारत के रूस से तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद को प्रमुख कारण बताया। उनके अनुसार, भारत रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है, जो यूक्रेन में रूस के सैन्य अभियान के समय में अस्वीकार्य है। इसके अतिरिक्त, ट्रम्प ने भारत के उच्च टैरिफ (जिसे उन्होंने दुनिया में सबसे अधिक बताया) और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं की भी आलोचना की।



यह टैरिफ अचानक भारत के लिए एक झटके के रूप में आया है, क्योंकि भारत और अमेरिका पिछले कुछ महीनों से एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे थे। ट्रम्प ने पहले 20-25% टैरिफ की संभावना जताई थी, लेकिन अंतिम घोषणा में अतिरिक्त दंड भी शामिल किया गया। यह कदम भारत के फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, रत्न और आभूषण, और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है, जो अमेरिका के साथ भारत के व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।


कांग्रेस के नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ट्रम्प के ‘मृत अर्थव्यवस्था’ वाले बयान का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, हां, ट्रम्प सही हैं। हर कोई जानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मृत है, सिवाय प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के। मुझे खुशी है कि ट्रम्प ने यह तथ्य सामने रखा। पूरी दुनिया जानती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था खत्म हो चुकी है। भाजपा ने अडानी को मदद करने के लिए अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया।



राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए, विशेष रूप से नोटबंदी और ‘त्रुटिपूर्ण’ जीएसटी को अर्थव्यवस्था के पतन का कारण बताया। उन्होंने यह भी पूछा कि ट्रम्प के भारत-पाकिस्तान सीजफायर को लेकर बार बार किए जा रहे दावों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी क्यों है?



कांग्रेस पार्टी ने इस टैरिफ को भारत की विदेश नीति की विफलता के रूप में चित्रित किया। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, राहुल गांधी ने पहले ही इस बारे में चेतावनी दी थी। यह टैरिफ हमारी अर्थव्यवस्था, निर्यात, उत्पादन और रोजगार पर असर डालेगा। हम अमेरिका को फार्मास्यूटिकल्स निर्यात करते हैं और 25% टैरिफ से ये महंगे हो जाएंगे, जिससे मांग कम होगी और उत्पादन व रोजगार पर असर पड़ेगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए और टैरिफ को भारत के व्यापार, एमएसएमई और किसानों के लिए हानिकारक बताया।


अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना की। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बुरे दिनों की शुरुआत बताया, जबकि असदुद्दीन ओवैसी ने ट्रम्प को व्हाइट हाउस का जोकर कहकर उनकी आलोचना की। हालांकि, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी के रुख से अलग हटकर अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। शशि थरूर ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत-अमेरिका व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं और भारत को अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता है।


वहीं अर्थशास्त्रियों ने इस टैरिफ के भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को लेकर मिश्रित राय व्यक्त की है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रभाव सीमित होगा, जबकि अन्य ने दीर्घकालिक नुकसान की चेतावनी दी है। ईन्वेस्टमेंट इनफार्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया (आईसीआरए) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, प्रस्तावित टैरिफ और दंड हमारी अपेक्षा से अधिक हैं और इससे भारत की जीडीपी वृद्धि पर असर पड़ सकता है। प्रभाव की गंभीरता दंड के आकार पर निर्भर करेगी। अर्नेस्ट एंड यंग इंडिया (ई वाई) के व्यापार नीति विशेषज्ञ अग्नेश्वर सेन ने बताया कि टैरिफ से समुद्री उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, चमड़ा और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होंगे। ये क्षेत्र भारत-अमेरिका व्यापार में मजबूत हैं, और टैरिफ से इनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।


फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट के राहुल अहलूवालिया ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत को वियतनाम और चीन जैसे अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कमजोर स्थिति में ला सकता है। उनके अनुसार, निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं का भारत की ओर स्थानांतरण अब संभावना नहीं है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने आशावादी रुख अपनाया। फिक्की के अध्यक्ष हर्षवर्धन अग्रवाल ने कहा, हालांकि यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण है और हमारे निर्यात पर असर डालेगा, हमें उम्मीद है कि यह एक अल्पकालिक घटना होगी और दोनों पक्ष जल्द ही एक स्थायी व्यापार समझौते पर पहुंच जाएंगे।


भारत सरकार ने इस मुद्दे पर सतर्क और संयमित रुख अपनाया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा, हम राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएंगे। भारत ने एक दशक में ‘फ्रैजाइल फाइव’ से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का सफर तय किया है। सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि भारत तत्काल जवाबी टैरिफ लगाने के बजाय बातचीत के रास्ते को अपनाएगा। एक सूत्र ने कहा, चुप्पी सबसे अच्छा जवाब है। हम बातचीत की मेज पर इस मुद्दे को हल करेंगे। 

कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ और अतिरिक्त दंड ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। राहुल गांधी और विपक्ष ने इसे सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की विफलता के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि अर्थशास्त्रियों ने इसके मिश्रित प्रभावों की ओर इशारा किया है। जहां कुछ क्षेत्रों पर तत्काल असर पड़ सकता है, वहीं भारत के पास अन्य बाजारों में विविधता लाने और बातचीत के जरिए समाधान खोजने का अवसर है। यह स्थिति न केवल आर्थिक बल्कि भूराजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों को संतुलित करना होगा। देखना यह है कि आनेवाले दिनों में सरकार इस समस्या से कैसे निपटती है।  

Monday, June 23, 2025

हम इतने जंगली क्यों हैं ?

शेर बहुत हिंसक प्राणी है ये हम सब जानते हैं। पिछले हफ़्ते हम केन्या के विश्व प्रसिद्ध मसाई मारा वन्य अभ्यारण्य में खुली जीप में घूमते रहे। सबसे रोमांचक क्षण वो थे जब हमारी जीप के तीन तरफ़ चार पाँच बब्बर शेर व शेरनी बैठे थे। उनसे हमारी दूरी मात्र 10 फीट थी। वो हमें निहार रहे थे और हम उन्हें। वो तो बेफिक्र होकर अपने जिस्म चाट रहे थे और हमारी रूह काँप रही थी कि कहीं वो हम पर हमला न कर दें। हालाँकि फारेस्ट गार्ड ने आश्वस्त किया कि ऐसा कुछ नहीं होगा। हम न सिर्फ़ उन्हें आधे घंटे तक एकटक निहारते रहे बल्कि जब वो उठ कर चल दिए तो हम भी धीमी गति से उनका पीछा करते हुए चलते रहे। उन्होंने फिर भी कोई उत्तेजना नहीं दिखाई। कमाल है कि जंगल का सबसे हिंसक पशु भी अपने अनुशासन की सीमा में रहना जानता है और अपने को सभ्य समाज मानने वाले हम कितने हिंसक हैं कि वाणी से, क्रिया से और विचारों से हमेशा अपने समाज व पर्यावरण के प्रति हिंसा करते रहते हैं। चाहे हमारे ये क्रियाएं आत्मघाती ही क्यों न हों। 



केन्या के उस सुनसान जंगल में बैठे बैठे सोशल मीडिया पर समाचार मिला कि डोनाल्ड ट्रम्प भी अब इसराइल व ईरान के युद्ध में कूदने का मन बना रहे हैं। उधर यूक्रेन व रूस का युद्ध बरसों से लगातार तबाही मचा ही रहा है और इधर अब ये नया मोर्चा तैयार हो रहा है। क्या ये विश्व युद्ध की ओर बढ़ते कदम नहीं हैं ? 


वैसे तो मानव समाज जब से संगठित हुआ होगा तब से युद्ध उसके जीवन का अंग बने होंगे। इतिहास आज तक हुए लाखों युद्धों की गाथाओं से भरा पड़ा है। फिर भी मेरे मन में ये दार्शनिक प्रश्न आ रहा है कि इन युद्धों की शुरुआत करने वाले इतने जंगली क्यों होते हैं? क्या उन्हें नहीं दिखता कि युद्ध की विभीषिका में कितने बच्चे अनाथ हो जाते हैं, महिलायें विधवा हो जाती हैं, बने बनाए घर-मकान, विशाल भवन आदि सब ध्वस्त हो जाते हैं, युद्ध के गोले बारूद से पर्यावरण जहरीला हो जाता है, अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा जाती हैं, विकास अवरुद्ध हो जाता है और आम जनता तबाह हो जाती हैं। 



फिर हर युद्ध के बाद युद्ध विराम होता है और शांति वार्ताएं होती हैं। अगर हर युद्ध की परिणति शांति वार्ता ही होनी थी तो फिर ये सब विध्वंस क्यों किया गया? हुक्मरानों से ये सवाल पूछने वाला कोई नहीं होता। सवाल पूछना तो दूर प्रायः आम जनता तो अपनी तबाही के लिए ज़िम्मेदार नेता की ही मुरीद हो जाती है। युद्ध के उन्माद में उसे मसीहा मान लेती है। जैसा जर्मनी की जनता ने किया। जो हिटलर की आत्महत्या के आख़िर क्षण तक यही मानते रही कि वो उन्हें हर बला से बचा लेगा। एक अहमक के फ़ितूर ने जर्मनी को तबाह कर दिया। 


प्रायः हर देश में ऐसी मानसिकता वाले लोगों की कमीं नहीं है जो शस्त्र निर्माता लॉबी व भ्रष्ट, अहंकारी और आत्म मुग्ध, अति महत्वाकांक्षी अपने नेताओं के प्रोपोगैंडा के प्रभाव में आकर अपना अच्छा बुरा देखने की क्षमता ही खो बैठती है। ट्रम्प के समर्थक मतदाताओं का भी अमरीका के चुनाव से पहले यही हाल था।



मैं कभी सैन्य विज्ञान का विद्यार्थी नहीं रहा। इसलिए युद्धों के कारण की सैद्धांतिक व्याख्या करने का दुस्साहस नहीं करूँगा। पर एक संवेदनशील आम नागरिक होने के नाते ये सोचने और पूछने का हक़ तो रखता हूँ कि आख़िर ये युद्ध किसके हित में होते हैं? उस जनता के हित में तो बिल्कुल नहीं होते जिसके ख़ून पसीने की कमाई पर वसूले गए टैक्स के अरबों रुपये ऐसे युद्धों में फूंक दिए जाते हैं। सफेद हाथी की तरह बैठा सयुंक्त राष्ट्र (संघ) आज तक एक भी युद्ध नहीं रोक पाया। क्या कोई पुतिन, ट्रम्प या तालिबानी नेता उसकी सुनने को तैयार है? फिर भी सयुंक्त राष्ट्र के नाम पर दुनियाँ में दशकों से नौटंकी चल रही है।



आज इस लेख में समाधान प्रस्तुत करने वाला कोई विचार मेरे पास नहीं हैं। पर एक फ़िक्र ज़रूर खाये जा रही है कि आज दुनिया एक अजीब दौर से गुज़र रही है। जहाँ अशांति व असुरक्षा और पर्यावरण का विनाश तेज़ी से बढ़ रहा है व मानवीय संवेदनशीलता उतनी ही तेज़ी से घट रही है। डोनाल्ड ट्रम्प को ही लें। जिनके स्वागत में हमने पलक पाँवड़े बिछाये थे वो अपने देश में घुसे अवैध भारतीयों को हथकड़ी और बेड़ियों में बाँध कर वापिस भेज रहे हैं। जबकि दूसरे देशों के ऐसे लोगों को ससम्मान भेज जा रहा है। ट्रम्प वहाँ रह रहे भारतीयों के वीजा ख़त्म करने के धमकी दे रहे हैं। इससे डर कर कितने सफल युवा अमरीका के अपने सपने को चूर-चूर होते देख घर लौट रहे हैं। 


दरअसल ये हुक्मरान आम जनता को चैन से जीने नहीं देना चाहते। उसे हमेशा डरा दबा कर रखना चाहते हैं। इन सबसे तो जंगल का राजा शेर कहीं ज्यादा अमन पसंद है जो अपना पेट भरने के बाद अकारण किसी पर हमला नहीं करता। हम तो उससे कहीं ज़्यादा हिंसक हो चुके हैं। फिर भी ठहर कर सही और ग़लत पर सोचने का समय नहीं है आज हमारे पास।आज जब सूचना क्रांति ने पूरी दुनियाँ के लोगों को इस तरह जोड़ दिया है कि सैकंडों में सूचनाएँ दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच जाती हैं। तब क्या युद्ध और पर्यावरण के विनाश को रोकने के लिए हर देश की जागरूक जनता सोशल मीडिया पर संगठित होकर ऐसे हुक्मरानों पर दबाव नहीं बना सकती जो इस विनाश के कारण बन रहे हैं? 

दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में कई देशों में विरोध के स्वरों को दबाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। पहले ऐसा केवल तानाशाह या सैन्य सरकारों में होता था पर अब कुछ देशों की लोकतांत्रिक सरकारें भी विरोध के स्वरों को दबाने में हिचकती नहीं हैं। इसके दुष्परिणाम न केवल उस देश की जनता को भोगने पड़ते हैं बल्कि वो हुक्मरान भी ज़मीनी सच्चाई से कट जाते हैं और चाटुकारों से घिर कर आत्मघाती कदम उठा लेते हैं जैसा श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगाकर किया था। बाद में उन्हें चुनावों में जनता का कोप भाजन बनना पड़ा। इसलिए हर लोकतांत्रिक सरकार को विरोध के स्वरों को मुक्त रूप से सामने आने देना चाहिए। इससे उसे अपनी हकीकत जानने  का मौक़ा मिलता है। 

Monday, December 5, 2011

क्या दक्षिणी चीन में संघर्ष होगा ?


Rajasthan Patrika 4Dec

पिछले दिनों चीन और भारत के बीच हुए वाक युद्ध को गंभीरता से लिया जाए तो इस बात की संभावना बनती है कि निकट भविष्य में भारत और चीन के बीच संघर्ष विकसित हो सकता है। पर इससे पहले कि स्थिति बिगड़े दोनों ही देशों को दक्षिणी चीन सागर की हकीकत को समझना होगा। चीन इस बात से नाराज है कि भारत के तेल व प्राकृतिक गैस आयोग की विदेशी शाखा ओ.वी.एल. वियतनाम के साथ मिलकर इस सागर में तेल की खुदाई का काम तेजी से आगे बढ़ा रही है। पिछले दिनों जब भारत के विदेश मंत्री श्री एस.एम. कृष्णा हनोई गए थे तो वहां उनके और चीन के बीच इस विषय पर जो बयानबाजी हुई उससे चीन सहमत नहीं था। चीन इस क्षेत्र में अपने वर्चस्व को कायम रखना चाहता है और इस बात से खफा है कि वियतनाम, फिलीपिन्स जैसे देश उसकी चेतावनी के बावजूद भारत और अन्य देशों के साथ मिलकर इस सागर में अपनी आर्थिक गतिविधियां बढ़ा रहे हैं। 

चीन यह भूल जाता है कि वह पाकिस्तान के साथ मिलकर पाक अधिकृत कश्मीर में न सिर्फ महंगे सामरिक प्रोजेक्ट खड़े कर रहा है बल्कि उसने अपनी फौजें भी वहां तैनात कर रखी हैं। पाक अधिकृत क्षेत्र उसी तरह विवादास्पद है जिस तरह दक्षिणी चीन सागर। क्योंकि इस समुद्र को लेकर अमरीका भी अपने ‘राष्ट्रीय हित’ का दावा कर चुका है जिसे चीन मानने को तैयार नहीं हैं और वह इसे निर्विवाद रूप से अपना अधिकार क्षेत्र मानता है। यह बात दूसरी है कि सागर में प्राकृतिक तेल निकालने का जो प्रयास आज चर्चा में आया है उसकी शुरूआत तो मई 2006 में हुई थी जब भारत और वियतनाम के बीच इस आशय का समझौता हुआ था। वैसे इस क्षेत्र से तेल निकाले का काम तो 2003 में ही शुरू हो गया था। तो अब चीन इतना शोर क्यों मचा रहा है ? 

Punjab Kesari 5Dec
जबकि यह बात अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में मानी गई है कि तट से 200 नाटिकल मील दूर तक का क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की दृष्टि से उसी देश का माना जाएगा जिसके तट से सागर लगा होगा। पर इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे समुद्र से व्यावसायिक जल पोतों का आवागमन नहीं होगा। बल्कि उनके स्वतंत्रापूर्वक आने-जाने की आम सहमति है। इतना ही नहीं संचार से जुड़े तार बिछाने की भी छूट सब देशों को है। इसलिए चीन का फड़फड़ाना किसी के गले नहीं उतर रहा है। सामरिक परिस्थितियों के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन चाहे फड़फड़ाए जितना वह इस सागर को लेकर कोई बड़ा विवाद खड़ा करने नहीं जा रहा है, जिसका कारण बड़ा साफ है। वियतनाम और भारत के साथ चीन का अरबों रूपए का द्विपक्षीय व्यापार है। वियतनाम के साथ तो चीन के आर्थिक संबंधों की एक लंबी कड़ी है। वियतनात उन अतिविशिष्ट देशों में हैं जहां चीन का विनियोग सबसे ज्यादा है। यह बात दूसरी है कि कुछ विशेषज्ञ भारत से चीन के खिलाफ कड़े कदम उठाने की अपेक्षा रखते हैं। वे कहते हैं कि वियतनाम का तो चीन के खिलाफ लड़ने का इतिहास है। छोटा होते हुए भी वियतनाम दबने वाला नहीं हैं। वियतनाम ही क्यों दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों का महासंघ (आसियान) भी चीन की दादागिरी से विचलित है और चाहता है कि भारत आसियान के पक्ष में सामरिक रूप से खड़ा रहे और चीन के इस सागर में बढ़ते साम्राज्यवादी दावों को खारिज करने में उनकी मदद करे। ऐसे में भारत को बहुत सोच-समझ कर कदम उठाने होंगे।

दरअसल भरत इस मामले में शुरू से सजग रहा है। भारत की नौसेना के 2007 के दस्तावेजों में समुद्र संबंधी भारतीय नीति में अरब सागर से दक्षिण चीन सागर तक के बीच भारतीय हितों को रेखांकित किया गया है। 1910 में भारत उन 12 देशों में से था जिन्होंने अमरीका के इस प्रस्ताव का समर्थन किया कि दक्षिणी चीन सागर का मामला द्विपक्षीय मामला न होकर बहुपक्षीय मामला है। जुलाई 2011 में भी भारत की विदेश सचिव निरूपमा राव ने साफ शब्दों में कहा कि भारत का इस सागर में आर्थिक हित है और भारत इसके स्वतंत्र समुद्री मार्ग होने की बात को समर्थन करता है। 

कारण साफ है कि सागर का यह हिस्सा प्रशांत महासागर और हिन्द महासागर के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी है। एशिया प्रशांत देशों के बीच होने वाले भारत के व्यापार का आधे से ज्यादा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर जाता है। इतना ही नहीं जापान और कोरिया जैसे देशों को उनकी ऊर्जा की आवश्यकतापूर्ति के लिए भारत से की जा रही तेल की आपूर्ति भी इसी मार्ग से होकर की जाती है। अगर चीन इस इलाके पर अपनी दादागिरी जमाता है तो भारत का इन देशों से व्यापार बुरी तरह प्रभावित होगा। इसलिए भारत ऐसा कभी नहीं होने देगा। 

भारत के नौसेना प्रमुख एडमिरल निर्मल वर्मा का यह सुझाव प्रशंसनीय है कि भारत और चीन को दक्षिण चीन सागर के संबंध में एक साझी नौसैनिक समिति का गठन कर देना चाहिए जिससे इस क्षेत्र में आए दिन उठने वाले विवादों का यह समिति गंभीरता से विचार कर समाधान निकाल सके। इससे अनावश्यक संघर्ष की स्थिति पैदा नहीं होगी। यह ठीक वैसी ही समिति होगी जैसी भारतीय सेना और पाकिस्तानी सेना ने मिलकर घुसपैठ बनाई है जो युद्धविराम की स्थिति में यथासंभव विवादों का शांतिपूर्ण हल खोजती रहती है। आज पूरी दुनिया, विशेषकर विकसित राष्ट्र आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहे हैं और चीन एवं भारत भी अपनी आर्थिक प्रगति की दर को कायम रखने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे माहौल में नाहक संघर्ष एशिया के इन दोनों ही देशों की उभरती आर्थिक भूमिका को करारा झटका दे सकता है, जिसके लिए शायद दोनों ही देश तैयार नहीं होंगे।