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Monday, March 9, 2026

अमेरिका की कूटनीति नहीं दादागिरी!

आज दुनिया में हर ओर युद्ध, तबाही और अराजकता का दौर है। विकास की गति रुक रही है। अनिश्चितता का वातावरण है। अनेक देशों के नेता ही मवालियों की तरह बर्ताव कर रहे हैं। जबकि विश्व के लोग हमेशा शांति और विकास चाहते हैं। कोई भी युद्ध नहीं चाहता। हर कोई यह चाहता है कि दुनिया के हर मुल्क में स्थिरता का माहौल बना रहे। इसी उठा-पटक में अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सबसे आगे हैं। ट्रम्प ही क्यों, अमरीका की तो फ़ितरत ही रही है कि कोई बहाना ढूँढ कर कमजोर देशों को दबाना और उनके संसाधनों पर क़ब्ज़ा करना। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट ने अमेरिका की कूटनीति और युद्ध रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 

सोशल मीडिया पर @sankofa360 से एक पोस्ट काफ़ी वायरल हुई जिसमें लिखा है कि, प्रिय दुनिया, क्या तुम अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा झूठ बोलने से थक नहीं गए हो? क्या तुम उस साम्राज्य से थक नहीं गए हो जो खून और मौत की तलाश में नहीं रुकता? उन्होंने कोरिया (1950–1953) के बारे में झूठ बोला, ग्वाटेमाला (1954) के बारे में, इंडोनेशिया (1958), क्यूबा (1961), वियतनाम (1961–1975), लाओस (1964–1973), कांगो (1964), डोमिनिकन रिपब्लिक (1965), कंबोडिया (1969–1970), ग्रेनाडा (1983), लेबनान (1983–1984), लीबिया (1986), ईरान (1987–1988), पनामा (1989), इराक (1991, 1998, 2003), सोमालिया (1992–1994, 2007–वर्तमान), बोस्निया (1994–1995), सूडान (1998), अफगानिस्तान (1998, 2001), यूगोस्लाविया (1999), यमन (2002–वर्तमान), पाकिस्तान (2004), सीरिया (2014), लीबिया (2011), वेनेजुएला (2026), क्यूबा (2026), ईरान (2026) के बारे में झूठ बोला। अमेरिका या उसके सहयोगी कभी किसी बात पर सच्चे रहे हैं? दुनिया कब इनके झूठ से ऊब जाएगी? अब तो हमें पता होना चाहिए कि वैश्विक अशांति, मौत, अराजकता और विनाश के जिम्मेदार कौन हैं? जो दुनिया की स्थिरता के खिलाफ हैं? जो विश्व शांति के विचार से डरते हैं? तुम्हारी चुप्पी सहयोग है! अमेरिका वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाला है। मौत और विनाश की मशीन! अमेरिकी साम्राज्य की तानाशाही के खिलाफ बोलो!!!



यह पोस्ट न केवल अमेरिका की ऐतिहासिक गलतियों को उजागर करती है बल्कि दुनिया को जगाने का प्रयास भी करती है। आज, जब हम वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान जैसे देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप की नई लहर देख रहे हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका के फैसले गलत साबित हो चुके हैं। इन युद्धों ने न केवल लाखों जानें लीं बल्कि दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेला। अमेरिका की इन गलतियों से यह पता चलता है कि वैश्विक समुदाय अब युद्धों से कितना ऊब चुका है?



अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास झूठ, हस्तक्षेप और युद्धों से भरा पड़ा है। 1950 के दशक से शुरू करें तो कोरियाई युद्ध (1950-1953) में अमेरिका ने उत्तर कोरिया के आक्रमण का बहाना बनाकर हस्तक्षेप किया, लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह शीत युद्ध की रणनीति का हिस्सा था। लाखों कोरियाई मारे गए, लेकिन क्या अमेरिका की जीत हुई? नहीं, यह युद्ध आज भी कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव का कारण बना हुआ है। इसी तरह, 1954 में ग्वाटेमाला में अमेरिका ने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंका, क्योंकि वहां की भूमि सुधार नीतियां अमेरिकी कंपनियों को पसंद नहीं आईं। सीआईए के ऑपरेशन ने देश को दशकों की अस्थिरता में डाल दिया। क्या यह फैसला सही साबित हुआ? नहीं, ग्वाटेमाला आज भी गरीबी और हिंसा से जूझ रहा है।



1950-60 के दशक से अमेरिका के झूठ की फेहरिस्त लंबी है। इंडोनेशिया (1958) में सीआईए ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन असफल रहा। क्यूबा (1961) में ‘बे ऑफ पिग्स’ हमला एक बड़ी असफलता थी, जहां अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को हटाने की कोशिश की लेकिन खुद की किरकिरी हुई। वियतनाम युद्ध (1961-1975) तो अमेरिकी इतिहास का सबसे काला अध्याय है। अमेरिका ने 'टोंकिन की खाड़ी घटना' को बहाना बनाकर युद्ध शुरू किया, जो बाद में झूठ साबित हुआ। 58,000 अमेरिकी सैनिक और लाखों वियतनामी मारे गए। अमेरिका हारकर लौटा, और वियतनाम आज एक मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश है। क्या अमेरिका का फैसला सही था? नहीं, यह युद्ध अमेरिकी समाज को भी बांट गया। लाओस (1964-1973) और कंबोडिया (1969-1970) में गुप्त बमबारी ने लाखों लोगों को मार डाला और खमेर रूज जैसे आतंक को जन्म दिया। कांगो (1964) में अमेरिका ने वहाँ प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा की हत्या में भूमिका निभाई, जो अफ्रीका की आजादी के प्रतीक थे। डोमिनिकन रिपब्लिक (1965) में हस्तक्षेप ने लोकतंत्र को कुचला।



1980 के दशक में भी यह सिलसिला जारी रहा। ग्रेनाडा (1983) में अमेरिका ने मेडिकल छात्रों की सुरक्षा का बहाना बनाकर आक्रमण किया, लेकिन यह छोटे देश पर साम्राज्यवादी कब्जा था। लेबनान (1983-1984) में अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, लेकिन कोई स्थायी शांति नहीं आई। लीबिया (1986) में कद्दाफी पर हमला, ईरान (1987-1988) में नौसेना संघर्ष, पनामा (1989) में नोरिएगा को हटाना – ये सभी फैसले अमेरिका की ताकत दिखाने के लिए थे, लेकिन उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाई। इराक के खिलाफ 1991 का गल्फ वॉर, 1998 की बमबारी और 2003 का आक्रमण 'महाविनाश के हथियारों' के झूठ पर आधारित था। सद्दाम हुसैन को हटाया गया, लेकिन इराक आज भी अराजकता में डूबा है, आईएसआईएस जैसे समूह पैदा हुए। सोमालिया (1992-1994, 2007-वर्तमान) में अमेरिकी हस्तक्षेप ने समुद्री डकैती और आतंकवाद बढ़ाया। बोस्निया (1994-1995) में नाटो हमले, सूडान (1998) में दूतावास बमबारी, अफगानिस्तान (1998, 2001) में तालिबान के खिलाफ युद्ध – ये सभी अमेरिका की ‘आतंकवाद विरोधी’ नीति के नाम पर थे, लेकिन अफगानिस्तान से 2021 की शर्मनाक वापसी ने साबित किया कि 20 साल का युद्ध व्यर्थ था।


यूगोस्लाविया (1999) में नाटो बमबारी ने कोसोवो को अलग किया, लेकिन जातीय तनाव आज भी हैं। यमन (2002-वर्तमान) में ड्रोन हमलों ने नागरिकों को मार डाला, पाकिस्तान (2004) में भी यही हुआ। सीरिया (2014) में आईएसआईएस के खिलाफ हस्तक्षेप ने देश को बर्बाद कर दिया। लीबिया (2011) में कद्दाफी को हटाने के बाद देश गृहयुद्ध में फंस गया। और अब 2026 में वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान पर झूठ। वेनेजुएला में अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए और विपक्ष को समर्थन दिया, दावा किया कि मदुरो तानाशाह है, लेकिन यह तेल संसाधनों पर कब्जे की कोशिश है। क्यूबा पर दशकों से प्रतिबंध, लेकिन 2026 में नए आरोप लगाकर दबाव बढ़ाया जा रहा है। ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के बहाने हमले की धमकी, जबकि ईरान शांति समझौते चाहता है। ये सभी फैसले गलत साबित हो चुके हैं क्योंकि उन्होंने न केवल लक्षित देशों को नुकसान पहुंचाया बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। 


संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स बताती हैं कि युद्धों से करोड़ों लोग विस्थापित हुए, अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं। यूक्रेन-रूस संघर्ष और इजराइल-फिलिस्तीन विवाद में अमेरिका की भूमिका ने दिखाया कि वह शांति दलाल नहीं, बल्कि युद्ध उकसाने वाला है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश अब चीन और रूस जैसे भागीदारों की ओर मुड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये देश शांति और विकास पर जोर देते हैं। ब्रिक्स जैसे संगठन अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर #NoMoreWars जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। प्यू रिसर्च के सर्वे बताते हैं कि 70% से ज्यादा वैश्विक नागरिक युद्ध विरोधी हैं। कोरोना महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने साबित किया कि दुनिया को सहयोग चाहिए, न कि संघर्ष।

अमेरिका की ये गलतियां साबित करती हैं कि उसकी कूटनीति स्वार्थ पर आधारित है। वह लोकतंत्र और मानवाधिकारों का ढोंग रचता है, लेकिन वास्तव में संसाधनों और वर्चस्व की तलाश करता है। अब समय आ गया है कि दुनिया जागे। जैसे पोस्ट कहती है, चुप्पी सहयोग है। हमें अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में सुधार, बहुपक्षीय समझौते और शांति वार्ताएं ही रास्ता हैं। भारत जैसे देश, जो अहिंसा का संदेश देते हैं, वैश्विक शांति के लिए आगे आएं। दुनिया शांति चाहती है, कोई युद्ध नहीं। अमेरिका को अपनी गलतियों से सीखना चाहिए, अन्यथा इतिहास उसे वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाले के रूप में याद रखेगा। 

Monday, June 12, 2023

कैसे हों पूरब - पश्चिम के रिश्ते?


2011 में देश भर के अख़बारों में छपी एक खबर ने सबका ध्यान आकर्षित किया। ये खबर थी ही ऐसी कि जो कोई पढ़ता अचंभित हो जाता। अब तक लोगों का अनुभव था कि एक माँ से उसके बच्चे तभी अलग होते हैं जब कोई उन्हें अगवा कर ले या माता-पिता का तलाक़ हो जाए और बच्चों का बंटवारा या फिर माँ मानसिक या शारीरिक रूप से अपने बच्चों की परवरिश करने की स्थिति में न हो। इसके अलावा अत्यंत ग़रीब परिवारों द्वारा भी कई बार आर्थिक मजबूरी के चलते अपने बच्चे या तो गोद दे दिये जाते हैं या बेच दिये जाते हैं। पर इस खबर के मुताबिक़ सागरिका भट्टाचार्य नाम की जिस महिला का चार साल का बेटा और छः महीने की बेटी पश्चिमी यूरोप के देश नॉर्वे में सरकारी एजेंसी द्वारा छीन लिये गये थे। वो महिला अपने बच्चों की परवरिश करने में पूरी तरह सक्षम थी और अपने इंजीनियर पति के साथ पूरी ज़िम्मेदारी से अपनी गृहस्थी चला रही थी। फिर उसके साथ ऐसा क्यों हुआ?
 



पिछले हफ़्ते नेटफ़्लिक्स पर सागरिका भट्टाचार्य के जीवन की इस घटना पर आधारित एक फ़िल्म रिलीज़ हुई है जिसका शीर्षक है ‘मिसेज़ चटर्जी बनाम नॉर्वे’। फ़िल्म को देखने के बाद हर दर्शक नॉर्वे के समाज और सरकार के रवैए पर सवाल उठा रहा है। नॉर्वे दुनिया का एक बेहद संपन्न देश है जिसकी आबादी मात्र पचपन लाख है। ये वही देश है जो पिछले सौ वर्षों से दुनिया के मेधावी लोगों को समाज सेवा, पत्रकारिता, विज्ञान, कला व राजनीति के क्षेत्र में विश्व स्तर के उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित ‘नोबल पुरस्कार’ प्रदान करता है। फिर ऐसे देश में ये कैसे हुआ कि सुखी-संपन्न युवा परिवार के बच्चे, सरकार द्वारा समर्थित संस्था द्वारा माँ की गोद से छीन लिये गये? अपने बच्चों को पाने के लिए सागरिका भट्टाचार्य को नॉर्वे से लेकर भारत तक की अदालतों में तमाम मुक़द्दमें लड़ने पड़े। आख़िरकार माँ के प्यार की ही जीत हुई और तीन वर्ष बाद वो अबोध बालक माँ को वापिस मिल गए। अलबत्ता सागरिका भट्टाचार्य के पति ने इस लड़ाई में उनके साथ धोखाधड़ी की क्योंकि वो नॉर्वे में रहने के लिए अपने वीज़ा को ज़्यादा प्राथमिकता देते थे और इसीलिए चाहे-अनचाहे उन्होंने नॉर्वे की सरकार और क़ानून का पक्ष लिया। ‘मिसेज़ चटर्जी बनाम नॉर्वे’ फ़िल्म में सागरिका भट्टाचार्य के किरदार को रानी मुखर्जी ने बखूबी निभाया है। 



हुआ यूँ कि जब सागरिका नॉर्वे में जा कर अपने पति के साथ रहने लगी तो नॉर्वे की सरकार की बाल कल्याण एजेंसी के अधिकारियों ने भट्टाचार्य दंपत्ति के निजी जीवन में ताक-झांक करनी शुरू कर दी। उनको घोषित उद्देश्य था बच्चों कि परवरिश में भट्टाचार्य दंपत्ति की मदद करना। क्योंकि नॉर्वे की सरकार बच्चों की परवरिश पर बहुत ज़ोर देती है और उस पर करोड़ों रुपया ख़र्च भी करती है। इस ताक-झांक की ये अधिकारी नियमित रिपोर्ट लिखते रहे और एक दिन अचानक भट्टाचार्य दंपत्ति के इन अबोध बच्चों को उनसे जबरन छीन कर बाल कल्याण गृह में ले गये। जहां सागरिका को अपने बच्चों से हफ़्ते में केवल एक बार मिलने दिया जाता था। इस बाल कल्याण एजेंसी का आरोप था कि सागरिका अपने बच्चों की परवरिश करने के लायक़ सही माँ नहीं है। क्योंकि वह अपने छ महीने की बेटी और चार साल के बेटे को छुरी-काँटे से नहीं बल्कि हाथों से ख़ाना खिलाती है। उनका आरोप था कि शरारत कर रहे अपने बच्चे को सागरिका डाँटती है और उसे थप्पड़ भी दिखाती है। बाल कल्याण एजेंसी के इन अधिकारियों का यह भी आरोप था कि सागरिका इन बच्चों के माथे पर काला टीका (नज़रबट्टू) लगाती है। इसके अलावा उनका आरोप यह भी था कि सागरिका के पति अपने बच्चों की परवरिश में हाथ नहीं बटाते। 


इन आरोपों को पढ़ कर इस लेख के पाठक हँसेंगे। क्योंकि जो आरोप सागरिका पर लगाए गए वो तो दक्षिण एशिया के किसी भी समाज के परिवारों पर लगाए जा सकते हैं। इससे पहले कि हम ये जानें कि नॉर्वे की सरकार ने ऐसा क्यों किया, पहले ये जान लें कि इन आरोपों से निपटने के लिए सागरिका को कई अदालतों में बहुत कठिन संघर्ष करना पड़ा। इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि बाल कल्याण के नाम पर ये पूरा तंत्र निहित स्वार्थों के लिए काम कर रहा है। जो किसी बड़े घोटाले से कम नहीं है। जिसमें बाल संरक्षण एजेंसी, सामाजिक कार्यकर्ता, मनोचिकित्सक, वकील, सरकारी अनुदान के बदले ऐसे छीने गये बच्चों को पालने वाले दत्तक परिवार या इन बच्चों को क़ानून गोद लेने वाले परिवार भी शामिल हैं। क्योंकि इसमें इन सबकी कमाई होती है। 


नॉर्वे की सरकार, इस फ़िल्म के आने से, पूरी दुनिया में विवादों में घिरना शुरू हो गई है। फ़िल्म देखने के बाद मैंने भी नॉर्वे की सरकार व भारत में नॉर्वे के राजदूत को ट्विटर पर एक संदेश भेजा, जो इस प्रकार है। ‘आपका देश दुनिया का एक प्रतिष्ठित देश है। पर ‘मिसेज़ चटर्जी बनाम नॉर्वे’ फ़िल्म को देख कर आपके बाल कल्याण कार्यक्रम का एक दिल-दहलाने वाला पक्ष उजागर हुआ है। आशा है अब आप एशियाई मूल के परिवारों के प्रति अपना रवैया बदलेंगे और उन्हें अपने देश की संस्कृति और जीवन मूल्यों के चश्में से देखना बंद करेंगे। आपको याद दिला दूँ कि सुप्रसिद्ध अमरीकी समाज शास्त्री तालकॉट पार्संस ने अपनी पुस्तक में भारत के संयुक्त परिवारों को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ समाज व्यवस्था बताया है। क्योंकि इस व्यवस्था में परिवार के सदस्यों का तनाव प्रबंधन होता है, आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा रहती है और पारस्परिक संबंध प्रगाढ़ होते हैं, जो इन समाजों को लंबे समय तक स्थायित्व देते हैं। जबकि पश्चिमी समाजों में एक परिवार या व्यक्ति केंद्रित व्यवस्था के कारण समाज का विघटन हो रहा है।’ 


इसी ट्वीट में मैंने आगे लिखा, ‘1988 में अमरीका के शहर विस्कॉन्सिन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए मैंने कहा था कि पूर्वी देशों की सामाजिक व सांस्कृतिक विरासत समृद्ध है और सदियों पुरानी है। जबकि पश्चिमी देशों के समाज अपने कुशल प्रबंधन के कारण भौतिक रूप से तो आगे बढ़ रहे हैं लेकिन उनके पास जीवन जीने की दृष्टि नहीं है। अगर दोनों समाजों के बीच पारस्परिक सम्मान का ऐसा रिश्ता स्थापित हो जाए कि पूर्व की दृष्टि और पश्चिम का प्रबंधन संयुक्त रूप से काम करें तो ये पूरी मानव जाति के रहने के लिए यह दुनिया कल्याणकारी हो जाएगी।’

Monday, April 30, 2018

चीन नीति पर मोदी का कमाल

विपक्षी दल प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति को विफल बता कर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका आरोप है कि डोकलम में झटका झेलने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने चीन को कड़क जबाव नहीं दिया। बल्कि एक के बाद एक मंत्रियों और अधिकारियों को चीन भेजकर और खुद अचानक वहां जाकर, यह संदेश दिया है कि भारत ने चीन के आगे घुटने टेक दिये हैं। विपक्षी दलों का यह भी आरोप है कि चीन ने नेपाल, भूटान, वर्मा, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव व पाकिस्तान पर अपनी पकड़ मजबूत बनाकर भारत को चारों तरफ से घेर लिया है और इस तरह मोदी की पड़ोसी देशों के साथ विदेश नीति को विफल कर दिया है।
जबकि हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में अजीत डोभाल, सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमन आदि ने भारत-चीन संबंधों के मामले में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। आज जबकि चीन के राष्ट्रपति शी शिनफिंग दुनिया के सबसे ताकतवर नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं और आजीवन वहां राष्ट्रपति रहने वाले हैं, तो उनसे लड़कर भारत को कुछ मिलने वाला नहीं था। इसलिए उनसे मिलकर चलने में ही भलाई है, इसे प्रधानमंत्री ने तुरंत समझ लिया। वैसे भी चीन की ताकत आज दुनिया में बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। ऐसे में चीन को बंदर घुड़की दिखाने से काम बनने वाला नहीं था। 
औपचारिक शिखर सम्मेलन अनेक दबावों के बीच हुआ करते हैं। उसमें नौकरशाही की बड़ी भूमिका रहती है। संधि और घोषणाऐं करने का काफी दबाव रहता है। साझे बयानों को तैयार करने में ही काफी मशक्क्त करनी पड़ती है। जबकि अगर दो देशों के नेता पारस्परिक संबंध बना लें, तो बहुत सी कूटनीतिज्ञ समस्याऐं सुगमता से हल हो जाती है और उनके लिए नाहक वार्ताओं के दौर नहीं चलाने पड़ते। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले वर्षों की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता यह रही है कि उन्होंने दुनिया के लगभग हर देश के नेता से अपने व्यक्तिगत संबंध बना लिये हैं। अब वे कभी भी किसी से फोन पर सीधे बात कर सकते हैं। यही उन्होंने चीन जाकर किया।
भारत-चीन सीमा पर आए दिन चीनी फौज डोकलम जैसे उत्पात मचाती रही है। वहां की फौज सीधे कम्युनिस्ट पार्टी के निर्देश पर काम करती है। जिसे केवल सैन्य स्तर पर निपटना भारत के लिए आसान नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने इस चीन यात्रा में एक नया अध्याय जोड़ा है। अब चीन की सेना और भारतीय सेना के अधिकारियों के बीच नियमित संवाद होता रहेगा। जिससे गफलत की गुंजाईश न रहे।
इसके साथ ही इस यात्रा से भारत-चीन संबंध खासी गति से विकसित हुआ है। इसी पर दोनों देशों का आर्थिक उदारीकरण और सुरक्षा व्यवस्था निर्भर करती है। चीन का व्यापार अमेरिका, यूरोप और भारत के साथ बहुत ज्यादा हैं, शेष विश्व के साथ उसका व्यापार घाटे का ही है। इस लिहाज से यदि चीन का भारत के साथ व्यापार बढ़त भारत-अमेरिका व्यापार से ज्यादा हो जाती है, तो फिर दिल्ली और बिजिंग को राजनीतिक मुद्दे अलग-अलग करने होंगे।
भारत और पाकिस्तान के मध्य चल रहे विवादों में चीन की भूमिका किसी न किसी तरह से हमेशा ही पाई जाती रही है। चीन ने पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रमों को मदद देने का संकेत भी दिया था। चीन के सरकारी मीडिया ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपने एक संपादकीय में लिखा था कि यदि पश्चिमी देश भारत को एक परमाणु ताकत के रूप में स्वीकारते हैं और भारत तथा पाकिस्तान के बीच बढ़ती परमाणु होड़ के प्रति उदासीन रहते हैं, तो चीन चुप नहीं बैठेगा।
लेकिन अब ‘द्विपक्षीय मैत्री’ एव सहयोग संधि के बाद पाकिस्तान दबाव में आ जायेगा। भारत-चीन की मार्फत पाकिस्तान को आतंकवाद नियंत्रित करने के लिए मजबूर कर सकता है। साथ ही चीन को इस बात के लिए राजी कर सकता है कि वह महमूद अजहर को आतंकवादी घोषित किये जाने की अंतराष्ट्रीय मांग का विरोध न करें। साथ ही परमाणु शक्ति के मामलों में भारत और चीन के बीच में जो कई मूल मुद्दे अंतराष्ट्रीय स्तर पर उलझ रहे थे। उनका भी समाधान होने की संभावना है। जाहिर है कि अजित डोभाल ने इन परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्दे के पीछे रहकर काफी मेहनत की है। इसके साथ ही चीन ने भारत को मुक्त व्यापार समझौते का सुझाव दिया है, ताकि दोनों एशियाई देशों के बीच संबंधों को व्यापक प्रोत्साहन दिया जा सके।
भारत और चीन संबंधों में सुधार दोनों ही देशों के हित में है। प्रश्न है कि  क्या यह सुधार भारत को अपनी सम्प्रभुता और सुरक्षा की कीमत चुकाकर करनी चाहिए? क्या चीन पर भरोसा किया जा सकता है कि भविष्य में वह धोखा नहीं देगा? उम्मीद के सहारे दुनिया टिकी है। बदलते अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में दोनों देशों के लिए यही बेहतर है कि वे मिलकर चलें, जिससे एक बड़ी ताकत के रूप में उभरें। जिससे क्षेत्र का आर्थिक विकास भी तेजी से हो सकेगा।

Monday, January 29, 2018

भारत-पाक लोक सम्बन्धों में नया मोड़

जब से अमरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने पाकिस्तान की तरफ से हाथ खींचा है, तब से पाकिस्तान में हताशा का माहौल है। उधर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की छवि आतंकवाद को संरक्षण देने वाले और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हनन करने वाले देश के रूप में बन चुकी है। ऐसे में पाकिस्तान की सरकार और उसका मीडिया तमाम कोशिशे करके अपनी छवि सुधारने में जुटा है।


पिछले दिनों ‘यू-ट्यूब’ चैनलों पर ऐसी दर्जनों टीवी रिर्पोट अपलोड की गई हैं, जिनमें पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं और सिक्खों के धर्मस्थलों, त्यौहारों और सामान्य जीवन पर प्रकाश डाला जा रहा है। ये बताने की कोशिश की जा रही है कि पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों को किसी किस्म का सौतेला व्यवहार नहीं झेलना पड़ता। उन्हें अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने की पूरी आजादी है और उन पर कोई अत्याचार नहीं होता। यह बात करांची के रहने वाले हिंदुओं और शेष पाकिस्तान में रहने वाले मुठ्ठीभर संपन्न हिंदुओं पर तो शायद लागू हो सकती हो, पर शेष पाकिस्तान में हालात ऐसे नहीं है जैसा दिखाया जा रहा है। एक सीधा सा प्रश्न है कि आजादी के समय पाकिस्तान की अल्पसंख्यक आबादी कितने फीसदी थी और आज कितने फीसदी है? दूसरी तरफ भारत में अल्पसंख्यकों की आबादी कितने फीसदी थी और आज कितनी है? उत्तर साफ है कि पाकिस्तान में ये आबादी लगभग 90 फीसदी कम हो गयी। जबकि भारत में ये लगातार बढ़ रही है।

लेकिन इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। आज तक जो भी भारत से पाकिस्तान घूमने गया, उसने आकर वहां की मेहमान नवाजी की तारीफों के पुल बांध दिये। यहां तक कि पाकिस्तान के दुकानदार और होटल वाले, भारतीयों से अक्सर पैसा तक नहीं लेते और बड़ी गर्मजोशी से उनका स्वागत करते हैं। जबकि भारत आने पर शायद पाकिस्तानियों को ऐसा स्वागत नहीं मिलता। इससे साफ जाहिर है कि पाकिस्तान का आवाम भावनात्मक रूप से आज भी खुद को आजादी पूर्व भारत का हिस्सा मानता है और उसके दिल में विभाजन की टीस बाकी है।

पर ये टीस भी इकतरफा नहीं है। पिछले कुछ समय से कुछ उत्साही नौजवानों ने भारत, पाकिस्तान, इंग्लैंड व कनाडा आदि देशों में उन बुर्जुगों के टीवी इंटरव्यू रिकार्ड कर अपलोड करने शुरू किये, जिन्हें विभाजन के समय मजबूरन अपनी जन्मभूमि को छोड़कर, भारत या पाकिस्तान जाना पड़ा था। इनकी उम्र आज 80 से 95 वर्ष के बीच है। पर इनकी याददाश्त कमाल की है। इन्हें अपने घर, गली, मौहल्ले, शहर, स्कूल, बाजार और अड़ोस-पड़ोस की हर बात बखूबी याद है। इनमें से कुछ ने तो अपने परिवार की मदद से भारत या पाकिस्तान जाकर उन जगहों को देखा भी है। ‘यू-ट्यूब’ पर इनकी भावनाऐं देखकर, पत्थर दिल इंसान की भी आंखे भर आती है। इस कदर प्यार और गर्मजोशी से जाकर ये लोग वहां मिलते हैं कि बिना देखे विश्वास नहीं किया जा सकता। ये बात दूसरी है कि इनकी पीढ़ी का शायद ही कोई साथी इन्हें अब अपनी जगह मिल पाता हो। पर घर, दुकान तो वहीं हैं न। कुछ लोगों को तो अपने घरों में 70 बरस बाद जाकर भी अपनी तिजोरी और फर्नीचर ज्यों का त्यों मिला और उनके जजबातों का सैलाब टूअ पड़ा।

भला हो इन नौजवानों का जिन्होंने ये कोशिश की। वरना इस पीढ़ी के चले जाने के बाद, हमें कौन बताता कि आजादी के पहले आज के हिंदुस्तान और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदु, मुसलमान और सिक्खों के बीच कितना प्रेम और सौहार्द था। किसी तरह का कोई वैमनस्य नहीं था। सब एक-दूसरे के तीज-त्यौहारों में उत्साह से भाग लेते थे और एक-दूसरे की भावनाओं की भी कद्र करते थे। कभी उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक ऐसा वक्त आयेगा, जब उन्हें अपनों के बीच पराये होने का अहसास होगा। बहुत से लोगों को तो बंटवारे के दिन तक यह यकीन नहीं हुआ कि अब वे अपने ही देश में बेगाने हो गये हैं और उन्हें परदेश जाना पड़ेगा।

ये सब बुजुर्ग एक स्वर से कहते हैं कि विभाजन सियासतदानों की महत्वाकांक्षाओं का दुष्परिणाम था और अंग्रेजी की साजिश थी, जिसने भारत के सीने पर तलवार खींचकर खून की नदियां बहा दी। हम उस पीढ़ी के हैं, जिसने इस त्रासदी को नहीं भोगा। पर जब से हमारा जन्म हुआ है, विभाजन के मारों से इस त्रादसी की दुखभरी दासतानें सुनते आऐ हैं। अब जब इन नौजवानों ने इन बुर्जुगों को इनका मादर-ए-वतन दिखाने की जो कोशिश शुरू की है, वो काबिल-ऐ तारीफ है। काश ‘यू-ट्यूब पहले बना होता और ये कोशिश पचास बरस पहले शुरू की गई होती, तो शायद अब तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान का आवाम फिर से गले मिलने और एक हो जाने को बेचैन हो उठता। नफरत का जो बीज कट्टरपंथियों ने इन दशकों में बोया और नयी पीढ़ियों को गुमराह किया, वो शायद कामयाब न होता। उम्मीद की जानी चाहिए कि पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी की तरह ही एक दिन फिर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक राष्ट्र बनेंगे या कम से कम महासंघ बनेंगे। जहां हमारी ताकत और अरबों रुपये  नाहक की जंगों में और हथियारों के जखीरे खरीदने में बार्बाद होने की बजाय आम जनता के आर्थिक और समाजिक विकास पर खर्च होगें। हम ननकाना साहब, कटास राज, तक्षशिला, हिंगलाज शक्तिपीठ, शारदा शक्ति पीठ और श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर जैसे तीर्थों में खुलकर जा सकेंगे और वे भी अजमेर शरीफ, निजामुद्दीन, सलीम चिश्ती जैसे अपने तीर्थों पर खुलकर आ सकेंगे। सारा भारतीय महाद्वीप अमन, चैन और तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ेगा और अपनी मेहनत और कबिलियत के बल पर भारत फिर से सोने की चिड़िया बनेगा।