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Monday, July 20, 2026

आयुर्वेदिक दवाओं पर गहन वैज्ञानिक शोध

बीस बरस पहले वामपंथी नेता वृंदा कारत ने बाबा रामदेव के पतंजलि योग संस्थान की औषधियों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे। तब ये बहस मीडिया में छाई रही थी। वृंदा कारत की मानसिकता जिस पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित रही है उसमें ऐसे विवाद खड़ा करना आम बात थी। आश्चर्य की बात यह है कि आयुर्वेद की विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर सवाल खड़े करने वाले लोग कभी एलोपैथिक दवाइयों के बारे में ऐसे शंकाएँ प्रदर्शित नहीं करते। जबकि हकीकत यह है कि विकासशील देशों को छोड़ विकसित देशों में भी बहुराष्ट्रीय फ़ार्मासिटिकल कंपनियों के मायाजाल पर अनेक घोटाले सामने आते रहे हैं, जिन्हें पैसे, मीडिया और सत्ता की ताक़त से दबा दिया जाता है। ये अंग्रेज़ी दवा कंपनिया हमारे जीवन में कितना ज़हर घोल रही हैं इस पर कभी कोई बहस नहीं होती। जबकि पुरानी कहावत है कि ‘हर जो चीज़ चमकती है उसे सोना नहीं कहते’। 

खैर ये बात तो पुरानी हो गई। नई बात तो यह है कि बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने पश्चिमी जगत की इस चुनौती को बड़ी मजबूती से स्वीकार कर लिया है। अब वे अपने शोध और शास्त्रीय ग्रंथों पर आधारित आयुर्वेदिक दवाओं को सीधे बाज़ार में नहीं उतार रहे। अब उन्होंने हरिद्वार में ही, ‘पतंजलि रिसर्च इंस्टिट्यूट’ की स्थापना की है। जहाँ दुनिया की आधुनिकतम मशीनों से दवाओं को बाज़ार में लाने से पहले उन पर वैज्ञानिक शोध किए जा रहे हैं। उनकी यह पहल उन लोगों को करारा जवाब है जो आयुर्वेदिक दवाओं की वैज्ञानिकता को चुनौती देते आए हैं। 



पिछले हफ़्ते हरिद्वार यात्रा के दौरान मुझे इस शोध संस्थान को देखने का अवसर मिला। वहाँ के एक वैज्ञानिक ने मुझे पूरे संस्थान का भ्रमण करवाया। इस संस्थान में कैंसर, डायबटीज़, सूजन, हृदय रोग, छूत के रोग और चर्म रोगों पर विशेष शोध किया जा रहा है। इस संस्थान की केमिस्ट्री लैब में आयुर्वेदिक दवाओं को ‘फाइटो केमिस्ट्री’ और ‘एनालिटिकल केमिस्ट्री’ की दृष्टि से परखा जा रहा है। इसी संस्थान के जीव विज्ञान विभाग में आयुर्वेदिक उत्पादनों को उनके स्रोत, औषधियों के पौधे और उनसे निकाले जाने वाले तत्वों को विभिन्न प्रजातियों पर प्रयोग करके उनका गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है। संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में आयुर्वेदिक दवाओं के माइक्रोबायोलॉजिकल प्रोफाइल का गहनता से अध्ययन किया जा रहा है। इन दवाओं के बैक्टीरिया या फंगस संबंधित गुण दोषों को आधुनिकतम मशीनों से परखा जा रहा है। इसी तरह संस्थान के नैनो-टेक्नोलॉजी विभाग में दवाओं की मात्रा को घटाने और उनके साइड-इफ़ेक्ट्स को कम करने जैसे विषयों पर भी काम किया जा रहा है। इस शोध की सफलता कैंसर जैसी घातक बीमारी को रोकने में प्रभावी हो सकती है ऐसा यहाँ शोध कर रहे वैज्ञानिकों का विश्वास है। 


इस तरह के प्रयोगों के लिए आमतौर पर प्रयोगशाला में रखे जाने वाले काफ़ी तादाद में जीव-जंतु जैसे चूहे, खरगोश, जूँ और ग्यूनापिग आदि को नियंत्रित वातावरण में रखें गए हैं। जिन पर दवाओं के प्रयोग कर उनके प्रभाव का  अनुसंधान किए जा रहे हैं। यह सब भारत सरकार के ‘वन एवम् पर्यावरण मंत्रालय’ द्वारा स्थापित मानदंडों के अंतर्गत किया जा रहा है। संस्थान के भ्रमण के दौरान मैंने अलग-अलग प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों से बहुत सारे ऐसे प्रश्न किये जो एक आम व्यक्ति के दिमाग में उठते हैं। क्योंकि आज देश का माहौल ऐसा है कि विज्ञापनों के सहारे तमाम हानिकारक पदार्थ और दवाएं बाज़ारों में धड़ल्ले से बिक रही हैं। इसलिए हर जागरूक उपभोक्ता गहन छान-बीन के बाद ही इन उत्पादनों पर भरोसा कर पता है। पतंजलि शोध संस्थान की यह पहल आम उपभोक्ता के विश्वास को सुदृढ़ करेगी। क्योंकि इस प्रक्रिया से गुज़रने के बाद जो दवा उसे प्राप्त होगी उसकी गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगेंगे। शोध संस्थान के भ्रमण के बाद मैंने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। आयुर्वेद की दवाओं के विषय में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जो ग़लत जानकारी प्रचारित की जाती है उनसे निपटने में इस संस्थान का शोध एक कारगर हथियार सिद्ध होगा। 


इसी चर्चा के दौरान मैंने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को एक सुझाव और दिया। इस सुझाव की पृष्ठभूमि में वो ग्रंथ था, ‘आहार शास्त्र’ जो मैंने ‘पुनर्त्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट’, अहमदाबाद से कुछ वर्ष पूर्व प्राप्त किया था। इस ग्रंथ में गहन शोध के बाद यह बताया गया है कि भारत के किस प्रांत में, किस मौसम में, किस धातु में और कैसे भोजन पकाया जाए जो वहाँ की भौगोलिक परिस्थिति के अनुकूल हो। इससे शरीर स्वस्थ रहेगा और बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता भी बढ़ेगी। मेरा सुझाव है कि ‘पतंजलि योग संस्थान’ ऐसे युवा तैयार करे जो गाँव-गाँव में घूम कर गृहणियों को स्वास्थ्य वर्धक पारंपरिक भोजन बनाने की शिक्षा दें। आज मोमो, नूडल्स, बर्गर, पिज़्ज़ा जैसे न जाने कितने उत्पाद हैं जो अब भारत की धमनियों में प्रवेश कर चुके हैं और सबके स्वास्थ्य का सत्यानाश कर रहे हैं। यही है बाज़ारू संस्कृति। पहले अखाद्य पदार्थ खाओ। फिर बीमार पड़ो और फिर महंगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करवाओ। इस विषम चक्र से बचने का एक ही तरीका है कि हम अपनी खानपान और दिनचर्या को बदलें। बाबा रामदेव ने पिछले दो दशकों में दुनिया के कोने-कोने में योग की उपयोगिता को स्थापित किया है। अब यह चुनौती उनके सामने है कि वे हम भारतीयों का खानपान पहले जैसा करने का व्यापक अभियान चलाएँ। उनके पास मीडिया की, संगठन की और आर्थिक शक्ति है कि वे व्यापक जनहित में इस अनूठे अभियान को दिशा दे सकते हैं। मुझे प्रसन्नता हुई कि मेरे इस सुझाव पर आचार्य बालकृष्ण ने तुरंत अपने लोगों को निर्देश दिया कि इस मॉडल की संभावना तलाशें। बाबा ने भी भारतीय संस्कृति, पुरातन धरोहरों और सनातन धर्मों के केंद्रों की सेवा में किए जा रहे ऐसे सभी सद्प्रयासों में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।  

Monday, April 29, 2024

बाबा रामदेव क्यों फँसे?

1989 में जब मैंने देश की पहली हिन्दी वीडियो समाचार कैसेट ‘कालचक्र’ जारी की तो उसमें तमाम खोजी रिपोर्ट्स के अलावा एक स्लॉट भ्रामक विज्ञापनों को भी कटघरे में खड़े करने वाला था। ये वो दौर था जब प्रभावशाली विज्ञापन सिनेमा हॉल के पर्दों पर दिखाए जाते थे या दूरदर्शन के कार्यक्रमों के बीच में। उस दौर में इन कमर्शियल विज्ञापनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का प्रचलन नहीं था। इस दिशा में देश के कुछ जागरूक नागरिकों को बड़ी कामयाबी तब मिली जब उन्होंने सिगरेट बनाने वाली कंपनियों को मजबूर कर दिया कि वो सिगरेट की डिब्बी पर ये छापें ‘सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’। 

चूँकि ज़्यादातर विज्ञापन प्रिंट मीडिया में छपते थे और मीडिया कोई भी हो बिना विज्ञापनों की मदद के चल ही नहीं पता। इसलिए मीडिया में भ्रामक विज्ञापनों के विरुद्ध प्रश्न खड़े करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। उस पीढ़ी के जागरूक देशवासी जानते हैं कि हमारी कालचक्र वीडियो मैगज़ीन ने अपनी दमदार व खोजी टीवी रिपोर्ट्स के कारण पहला अंक जारी होते ही देश भर में तहलका मचा दिया था। जो काम देश के बड़े-बड़े स्थापित मीडिया घराने करने की हिम्मत नहीं दिखा पाए वो हिम्मत कालचक्र की हमारी छोटी सी जुझारू टीम ने कर दिखाया। उत्साह जनक बात यह थी कि देश भर के हर भाषा के मीडिया ने कालचक्र के हर अंक को अपने प्रकाशनों की सुर्ख़ियाँ बनाया। 


उस दौर में जिन विज्ञापनों पर हमने सीधा लेकिन तथ्यात्मक हमला किया उसकी कुछ रिपोर्ट्स थीं, ‘नमक में आयोडीन का धंधा’, ‘नूडल्स  खाने के ख़तरे’, ‘झागदार डिटर्जेंट का कमाल’, ‘प्यारी मारुति - बेचारी मारुति’ आदि। ज़ाहिर है कि हमारी इन रिपोर्ट्स से मुंबई के विज्ञापन जगत में हड़कंप मच गया और हमें बड़ी विज्ञापन कंपनियों से प्रलोभन दिए जाने लगे, जिसे हमने अस्वीकार कर दिया। क्योंकि हमारी नीति थी कि हम जनहित में ऐसे विज्ञापन बना कर प्रसारित करें जिनमें किसी कंपनी के ब्रांड का प्रमोशन न हो बल्कि ऐसी वस्तुओं का प्रचार हो जो आम जनता के लिए उपयोगी हैं। उदाहरण के तौर पर हमने एक विज्ञापन की स्क्रिप्ट लिखी, ‘भुना चना खाइए - सेहत बनाइए। हर गली मोहल्ले में मिलता है, भुना चना - टनटना’। पर हमारी यह नीति ज़्यादा चल नहीं पाई। देश के ताकतवर लोगों ने फ़िल्म सेंसर बोर्ड के माध्यम से हमें परेशान करना शुरू कर दिया। 

निजी टेलिविज़न मीडिया की अनुपस्थिति में, उस दौर में सरकार की स्पष्ट नीति न होने के कारण हमारी समाचार वीडियो पत्रिका को फिक्शन यानी काल्पनिक कथा के समान मान कर हमें प्री-सेन्सरशिप से होकर गुज़रना पड़ता था। 

इस पूरे ऐतिहासिक घटनाक्रम का बाबा रामदेव के संदर्भ में यहाँ उल्लेख करना इसलिए ज़रूरी था ताकि यह तथ्य रेखांकित किया जा सके कि देश में झूठे दावों पर आधारित भ्रामक विज्ञापनों की शुरू से भरमार रही है। जिन्हें न तो मीडिया ने कभी चुनौती दी और न ही कार्यपालिका, न्यायपालिका या विधायिका ने। लोकतंत्र के ये चारों स्तंभ आम जनता को भ्रमित करने वाले ढेरों विज्ञापनों को देख कर भी आँखें मींचे रहे और आज भी यही स्थिति है। बाबा रामदेव के समर्थन में सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने ऐसे विज्ञापनों की सूची प्रसारित की है जिनके दावे भ्रामक हैं। जैसे त्वचा का रंग साफ़ करने वाली क्रीम या फलों के रसों के नाम पर बिकने वाले रासायनिक पेय या सॉफ्ट ड्रिंक पी कर बलशाली बनने का दावा या बच्चों के स्वास्थ्य को पोषित करने वाले बाल आहार, आदि। 

मेरे इस लेख का उद्देश्य न तो बाबा रामदेव और आचार्य बालाकृष्ण के उन दावों का समर्थन करना है जो आजकल सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। न ही ऐसे भ्रामक दावों के लिए बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को कटघरे में खड़ा करना है। इसलिए नहीं कि ये दोनों ही से मेरे निःस्वार्थ गहरे आत्मीय संबंध हैं बल्कि इसलिए कि ऐसी गलती देश की तमाम बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने उत्पादनों को लेकर दशकों से करती आई हैं। तो फिर पतंजलि को ही कटघरे में खड़ा क्यों किया जाए? एक ही जैसे अपराध को नापने के दो अलग मापदंड कैसे हो सकते हैं?

‘निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय’ की भावना से बाबा रामदेव के सार्वजनिक जीवन के उन पक्षों को रेखांकित करना चाहता हूँ जिनके कारण, मेरी नज़र में आज बाबा रामदेव विवादों में घिरे हैं। इस क्रम में सबसे पहला विवाद का कारण है, उनका संन्यासी भेष में हो कर व्यापार करना। अलबत्ता आज यह कार्य सदगुरु, श्री श्री रवि शंकर, इस्कॉन व स्वामी नारायण जैसे अनेकों धार्मिक संगठन भी कर रहे हैं, जो धर्म की आड़ में व्यापारिक गतिविधियाँ भी चला रहे हैं। चूँकि बाबा रामदेव ने योग और भारतीय संस्कृति के बैनर तले अपनी सार्वजनिक यात्रा शुरू की थी और आज उनका पतंजलि, साबुन, शैम्पू, बिस्कुट, कॉर्नफ्लेक्स जैसे तमाम आधुनिक उत्पाद बना कर बेच रहा है, जिनका योग और वैदिक संस्कृति से लेना देना नहीं है। अगर बाबा रामदेव की व्यापारिक गतिविधियों बहुत छोटे स्तर पर सीमित रहतीं तो वे किसी की आँख में न खटकते। पर उनका आर्थिक साम्राज्य दिन दुगुनी और रात चौगुनी गति से बढ़ा है। इसलिए वे ज़्यादा निगाह में आ गये हैं। 

साधु सन्यासियों को राजनीति से दूर इसलिए रहना चाहिए क्योंकि राजनीति वो काल कोठरी है जिसमें, ‘कैसो ही सयानों जाए - काजल का दाग भाई लागे रे लागे’। बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन की शुरुआत तो भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध की थी पर एक ही राजनैतिक दल से जुड़ कर वे अपनी निष्पक्षता खो बैठे। इसीलिए वे आलोचना के शिकार बने। 

आंदोलन की शुरुआत में बाबा ने अपने साथ देश के तमाम क्रांतिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी जोड़ा था। इससे उनकी विश्वसनीयता भी बढ़ी और जनता का उन पर विश्वास भी बढ़ा। पर केंद्र में अपने चहेते दल के सत्ता में आने के बाद बाबा उन सारे मुद्दों और क्रांतिकारिता को भी भूल गए। शुद्ध व्यापार में जुट गये। इससे उनका व्यापक वैचारिक आधार भी समाप्त हो गया। अगर वे ऐसा न करते और धन कमाने के साथ जनहित के लिए चलाए जा रहे आंदोलनों और प्रकल्पों को उनकी आवश्यकता अनुसार थोड़ी-थोड़ी  आर्थिक मदद भी करते रहते तो उनका जनाधार भी बना रहता और योग्य व जुझारू समर्थकों की फ़ौज भी उनके साथ खड़ी रहती। जहां तक बाबा की आर्थिक गतिविधियों से संबंधित विवाद हैं या उनके उत्पादों की गुणवत्ता से संबंधित सवाल हैं उन पर मैं यहाँ टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ। मुझे लगता है कि आयु, क्षमता और ऊर्जा को देखते हुए बाबा रामदेव में इस देश का भला करने की आज भी असीम संभावनाएँ हैं अगर वे अपने तौर-तरीक़ों में वांछित बदलाव कर सकें।  

Monday, June 8, 2020

क्या बाबा रामदेव ये हिम्मत करेंगे ?

20 बरस पहले बाबा रामदेव को देश में कोई नहीं जानता था। न तो योग के क्षेत्र में और न आयुर्वेद के क्षेत्र में। पर पिछले 15 सालों में बाबा ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए। जहां एक तरफ़ उनके योग शिविर हर प्रांत में हज़ारों लोगों को आकर्षित करने लगे, दुनिया भर में रहने वाले हिंदुस्तानियों ने टेलिविज़न पर बाबा के बताए प्राणायाम और अन्य नुस्ख़े तेज़ी से अपनाना शुरू कर दिए। बाबा के अनुयाइयों की संख्या करोड़ों में पहुँच गई और उन सब के दान से बाबा रामदेव ने 2006 में हरिद्वार में पातंजलि योगपीठ का एक विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया। 

अपनी इस अभूतपूर्व कामयाबी को बाबा ने दो क्षेत्रों में भुनाया। एक तो आयुर्वेद के साथ-साथ उन्होंने अनेक उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन शुरू किया और दूसरा अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए देश भर में राजनैतिक जन-जागरण का एक बड़ा अभियान छेड़ दिया। उन्होंने काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे को इस कुशलता से उठाया कि तत्कालीन यूपीए सरकार लगातार रक्षात्मक होती चली गई। बाबा के इस अभियान की सफलता के पीछे भाजपा और आरएसएस की भी बहुत सक्रिय भागीदारी रही। ‘बिल्ली के भाग से छींका’ तब फूटा जब लोकपाल के मुद्दे को लेकर अरविंद केजरीवाल ने ‘इंडिया अगेन्स्ट करपशन’ का आंदोलन शुरू किया। जिसमें मशहूर वकील प्रशांत भूषण, शांति भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे, सेवानिवृत पुलिस अधिकारी किरण बेदी, हिंदी कवि डा. कुमार विश्वास, पूर्व न्यायधीश संतोष हेगड़े और तमाम अन्य सेलिब्रिटी भी जुड़ गए। इन सबका हमला यूपीए सरकार पर था, इसलिए बाबा राम देव के अभियान को और ऊर्जा मिल गई। इन सब ने मिल कर साझा हमला बोल दिया और अंततः यूपीए सरकार का पतन हो गया। 

केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार बनी तो दिल्ली में केजरीवाल की। जिसके बाद से इन सभी ने न तो भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है, न काले धन का और न ही प्रभावी लोकपाल का। जिस आंदोलन ने दुनियाँ की नज़र में एक बड़ी राजनैतिक क्रांति का आगाज़ किया था, वो रातों रात हवा हो गई। 

उधर बाबा ने मोदी सरकार में अपनी राजनैतिक दख़लंदाज़ी सफल होते न देख पूरा ध्यान पातंजलि के कारोबार पर केंद्रित कर दिया। जिसके पीछे आचार्य बालकृष्ण पहले से खड़े थे। उनके इस साम्राज्य की इतनी तेज़ी से वृद्धि हुई कि प्रसाधनों के क्षेत्र में हिंदुस्तान लिवर जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी और आयुर्वेद के क्षेत्र में डाबर जैसी कम्पनियाँ भी कहीं पीछे छूट गईं। आज बाबा रामदेव का कारोबार हज़ारों करोड़ का है।

आर्थिक वृद्धि की इस तेज रफ़्तार के बीच बाबा के कुछ उत्पादनों की गुणवत्ता को लेकर कभी-कभी विवाद भी होते रहे और बाबा से ईर्ष्या रखने वाले कुछ लोग उन्हें ‘लाला रामदेव’ भी कहने लगे। पर इस सबसे बेपरवाह बाबा अपनी गति से आगे बढ़ते रहे हैं। क्योंकि उन्हें अपनी सोच और क्षमता पर आत्मविश्वास है। उनके इस जज़्बे का परोक्ष लाभ समाज और देश को भी मिला है। क्योंकि बाबा की प्रेरणा से बहुत बड़ी संख्या में भारतवासियों ने विदेशी उत्पादों को छोड़ कर स्वदेशी को अपना लिया है। दूसरा; इतने व्यापक स्तर पर योगाभ्यास करने से निश्चित रूप से करोड़ों लोगों को स्वास्थ्यलाभ भी हुआ है। तीसरा; पातंजलि के व्यावसायिक साम्राज्य ने लाखों लोगों को रोज़गार भी प्रदान किया है। जिसके लिए बाबा रामदेव की लोकप्रियता देश में आज भी कम नहीं हुई है। 

बाबा रामदेव का व्यवहार बड़ा आत्मीय और सरल होने के कारण, हर क्षेत्र में उनके मित्रों की संख्या भी बहुत है। पिछले दस वर्षों से मेरे सम्बंध भी बाबा से बहुत आत्मीय रहे हैं। अपने टेलिविज़न चैनल के माध्यम से उन्होंने ब्रज सजाने के हमारे विनम्र अभियान में मीडिया सहयोग भी किया है। पर खोजी पत्रकार की अपनी साफ़गोई की छवि के कारण जहां देश के बहुत से महत्वपूर्ण लोग मेरी बेबाक़ी  से विचिलित हो जाते हैं वहीं बाबा जैसे लोग, मेरी आलोचना को भी एक खिलाड़ी की भावना की तरह सहजता से हंसते हुए स्वीकार करते हैं। 

अपनी इसी साफ़गोई को माध्यम बना कर आज जो मैं बाबा से कहने जा रहा हूँ, वह देश की वर्तमान आर्थिक दुर्दशा को, व सामाजिक विषमता को दूर करने की दिशा में एक मील का पत्थर हो सकता है - अगर बाबा मेरे इस सुझाव को गम्भीरता से लें। 

निस्संदेह व्यक्तिगत तौर पर बाबा रामदेव और उनके मेधावी व कर्मठ सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने कल्पनातीत भौतिक सफलता प्राप्त कर ली है। पर भौतिक सफलता या चाहत की कभी कोई सीमा नहीं होती। अपनी पत्नी को 600 करोड़ रुपये का हवाई जहाज़ भेंट करने वाला उद्योगपति भी कभी भी अपनी आर्थिक उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं होता। पर केसरिया वेश धारी सन्यासी तो वही होता है, जो अपनी भौतिक इच्छाओं को अग्नि में भस्म करके समाज के उत्थान के लिए स्वयं को होम कर देता है। इसलिए बाबा रामदेव को अब एक नया इतिहास रचना चाहिए। 

अपनी आर्थिक शक्ति व प्रबंधकीय योग्यता का उपयोग हर गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के लिए करना चाहिए। यह तो बाबा और आचार्य जी भी जानते हैं कि आयुर्वेदिक या खाद्यान के उत्पादनों की गुणवत्ता  बड़े स्तर के कारख़ानों में नहीं बल्कि कुटीर उद्योग के मानव श्रम आधारित उत्पादन के तरीक़ों से बेहतर होती है। बैलों की मंथर गति से, सामान्य ताप पर, कोल्हू में पेरी गई सरसों का तेल, जिसे कच्ची घानी का तेल कहते हैं, कारख़ानों में निकाले गए तेल से कहीं ज़्यादा श्रेष्ठ होता है। इसी तरह दुग्ध उत्पादन हो, खाद्यान हो, मसाले हों, प्रसाधन हों या अन्य वस्तुएँ हों, अगर इनका उत्पादन विकेंद्रियकृत प्रणाली से व गाँव की आवश्यकता के अनुरूप हर गाँव में होना शुरू हो जाए तो करोड़ों ग़रीबों को रोज़गार भी मिलेगा और गाँव में आत्मनिर्भरता भी आएगी। जिसे अंग्रेज़ी हुकूमत ने 190 सालों में अपने व्यावसायिक लाभ के लिए बुरी तरह से ध्वस्त कर दिया था। विकेंद्रीकृत व्यवस्था  से गाँव की लक्ष्मी फिर गाँव को लौटेगी। स्पष्ट है कि तब लक्ष्मी जी की कृपावृष्टि पातंजलि के साम्राज्य  पर नहीं होगी, बल्कि उन ग़रीबों के घर पर होगी, जो भारी यातनाएँ सहते हुए, महानगरों से लुट-पिट कर और सेकडों किलोमीटर पैदल चल कर रोते-कलपते फिर से रोज़गार की तलाश में अपने गाँव लौट कर गए हैं। क्या सन्यास वेशधारी बाबा रामदेव लक्ष्मी देवी को अपने द्वार से लौटा कर इन गाँवों की ओर भेजने का पारमार्थिक कदम उठाने का साहस दिखा पाएँगे ?