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Monday, July 20, 2026

आयुर्वेदिक दवाओं पर गहन वैज्ञानिक शोध

बीस बरस पहले वामपंथी नेता वृंदा कारत ने बाबा रामदेव के पतंजलि योग संस्थान की औषधियों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे। तब ये बहस मीडिया में छाई रही थी। वृंदा कारत की मानसिकता जिस पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित रही है उसमें ऐसे विवाद खड़ा करना आम बात थी। आश्चर्य की बात यह है कि आयुर्वेद की विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर सवाल खड़े करने वाले लोग कभी एलोपैथिक दवाइयों के बारे में ऐसे शंकाएँ प्रदर्शित नहीं करते। जबकि हकीकत यह है कि विकासशील देशों को छोड़ विकसित देशों में भी बहुराष्ट्रीय फ़ार्मासिटिकल कंपनियों के मायाजाल पर अनेक घोटाले सामने आते रहे हैं, जिन्हें पैसे, मीडिया और सत्ता की ताक़त से दबा दिया जाता है। ये अंग्रेज़ी दवा कंपनिया हमारे जीवन में कितना ज़हर घोल रही हैं इस पर कभी कोई बहस नहीं होती। जबकि पुरानी कहावत है कि ‘हर जो चीज़ चमकती है उसे सोना नहीं कहते’। 

खैर ये बात तो पुरानी हो गई। नई बात तो यह है कि बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने पश्चिमी जगत की इस चुनौती को बड़ी मजबूती से स्वीकार कर लिया है। अब वे अपने शोध और शास्त्रीय ग्रंथों पर आधारित आयुर्वेदिक दवाओं को सीधे बाज़ार में नहीं उतार रहे। अब उन्होंने हरिद्वार में ही, ‘पतंजलि रिसर्च इंस्टिट्यूट’ की स्थापना की है। जहाँ दुनिया की आधुनिकतम मशीनों से दवाओं को बाज़ार में लाने से पहले उन पर वैज्ञानिक शोध किए जा रहे हैं। उनकी यह पहल उन लोगों को करारा जवाब है जो आयुर्वेदिक दवाओं की वैज्ञानिकता को चुनौती देते आए हैं। 



पिछले हफ़्ते हरिद्वार यात्रा के दौरान मुझे इस शोध संस्थान को देखने का अवसर मिला। वहाँ के एक वैज्ञानिक ने मुझे पूरे संस्थान का भ्रमण करवाया। इस संस्थान में कैंसर, डायबटीज़, सूजन, हृदय रोग, छूत के रोग और चर्म रोगों पर विशेष शोध किया जा रहा है। इस संस्थान की केमिस्ट्री लैब में आयुर्वेदिक दवाओं को ‘फाइटो केमिस्ट्री’ और ‘एनालिटिकल केमिस्ट्री’ की दृष्टि से परखा जा रहा है। इसी संस्थान के जीव विज्ञान विभाग में आयुर्वेदिक उत्पादनों को उनके स्रोत, औषधियों के पौधे और उनसे निकाले जाने वाले तत्वों को विभिन्न प्रजातियों पर प्रयोग करके उनका गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है। संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में आयुर्वेदिक दवाओं के माइक्रोबायोलॉजिकल प्रोफाइल का गहनता से अध्ययन किया जा रहा है। इन दवाओं के बैक्टीरिया या फंगस संबंधित गुण दोषों को आधुनिकतम मशीनों से परखा जा रहा है। इसी तरह संस्थान के नैनो-टेक्नोलॉजी विभाग में दवाओं की मात्रा को घटाने और उनके साइड-इफ़ेक्ट्स को कम करने जैसे विषयों पर भी काम किया जा रहा है। इस शोध की सफलता कैंसर जैसी घातक बीमारी को रोकने में प्रभावी हो सकती है ऐसा यहाँ शोध कर रहे वैज्ञानिकों का विश्वास है। 


इस तरह के प्रयोगों के लिए आमतौर पर प्रयोगशाला में रखे जाने वाले काफ़ी तादाद में जीव-जंतु जैसे चूहे, खरगोश, जूँ और ग्यूनापिग आदि को नियंत्रित वातावरण में रखें गए हैं। जिन पर दवाओं के प्रयोग कर उनके प्रभाव का  अनुसंधान किए जा रहे हैं। यह सब भारत सरकार के ‘वन एवम् पर्यावरण मंत्रालय’ द्वारा स्थापित मानदंडों के अंतर्गत किया जा रहा है। संस्थान के भ्रमण के दौरान मैंने अलग-अलग प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों से बहुत सारे ऐसे प्रश्न किये जो एक आम व्यक्ति के दिमाग में उठते हैं। क्योंकि आज देश का माहौल ऐसा है कि विज्ञापनों के सहारे तमाम हानिकारक पदार्थ और दवाएं बाज़ारों में धड़ल्ले से बिक रही हैं। इसलिए हर जागरूक उपभोक्ता गहन छान-बीन के बाद ही इन उत्पादनों पर भरोसा कर पता है। पतंजलि शोध संस्थान की यह पहल आम उपभोक्ता के विश्वास को सुदृढ़ करेगी। क्योंकि इस प्रक्रिया से गुज़रने के बाद जो दवा उसे प्राप्त होगी उसकी गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगेंगे। शोध संस्थान के भ्रमण के बाद मैंने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। आयुर्वेद की दवाओं के विषय में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जो ग़लत जानकारी प्रचारित की जाती है उनसे निपटने में इस संस्थान का शोध एक कारगर हथियार सिद्ध होगा। 


इसी चर्चा के दौरान मैंने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को एक सुझाव और दिया। इस सुझाव की पृष्ठभूमि में वो ग्रंथ था, ‘आहार शास्त्र’ जो मैंने ‘पुनर्त्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट’, अहमदाबाद से कुछ वर्ष पूर्व प्राप्त किया था। इस ग्रंथ में गहन शोध के बाद यह बताया गया है कि भारत के किस प्रांत में, किस मौसम में, किस धातु में और कैसे भोजन पकाया जाए जो वहाँ की भौगोलिक परिस्थिति के अनुकूल हो। इससे शरीर स्वस्थ रहेगा और बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता भी बढ़ेगी। मेरा सुझाव है कि ‘पतंजलि योग संस्थान’ ऐसे युवा तैयार करे जो गाँव-गाँव में घूम कर गृहणियों को स्वास्थ्य वर्धक पारंपरिक भोजन बनाने की शिक्षा दें। आज मोमो, नूडल्स, बर्गर, पिज़्ज़ा जैसे न जाने कितने उत्पाद हैं जो अब भारत की धमनियों में प्रवेश कर चुके हैं और सबके स्वास्थ्य का सत्यानाश कर रहे हैं। यही है बाज़ारू संस्कृति। पहले अखाद्य पदार्थ खाओ। फिर बीमार पड़ो और फिर महंगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करवाओ। इस विषम चक्र से बचने का एक ही तरीका है कि हम अपनी खानपान और दिनचर्या को बदलें। बाबा रामदेव ने पिछले दो दशकों में दुनिया के कोने-कोने में योग की उपयोगिता को स्थापित किया है। अब यह चुनौती उनके सामने है कि वे हम भारतीयों का खानपान पहले जैसा करने का व्यापक अभियान चलाएँ। उनके पास मीडिया की, संगठन की और आर्थिक शक्ति है कि वे व्यापक जनहित में इस अनूठे अभियान को दिशा दे सकते हैं। मुझे प्रसन्नता हुई कि मेरे इस सुझाव पर आचार्य बालकृष्ण ने तुरंत अपने लोगों को निर्देश दिया कि इस मॉडल की संभावना तलाशें। बाबा ने भी भारतीय संस्कृति, पुरातन धरोहरों और सनातन धर्मों के केंद्रों की सेवा में किए जा रहे ऐसे सभी सद्प्रयासों में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।