Monday, August 25, 2025

निसंदेह गुमनामी बाबा ही थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस

बचपन से हमें पढ़ाया गया की हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को ताइपे (ताइवान) में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। पर उनकी मौत के विवाद को सुलझाने के लिए बने ‘मुखर्जी आयोग’ ने ताइपे (ताइवान) जाकर उनकी सरकार से संपर्क किया तो पता चला कि उस तारीख को ही नहीं बल्कि उस पूरे महीने ही वहाँ कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था। यानी नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी। ये झूठी कहानी गढ़ी गई। तो प्रश्न उठता है कि फिर नेताजी गए कहाँ? इस पर बाद में चर्चा करेंगे।


बाद के कई दशकों तक देश में चर्चा चलती रही कि नेताजी अचानक प्रगट होंगे। बाबा जयगुरुदेव ने देश भर की दीवारों पर बड़ा-बड़ा लिखवाया कि नेता जी सुभाष चंद्र बोस जल्दी ही देश के सामने प्रगट होंगे। पर वे नहीं हुए। मेरी माँ बहुत राष्ट्रभक्त थीं और बड़े राजनैतिक परिवारों के बच्चे उनके साथ पढ़ते थे, सो उनकी शुरू से राजनीति में रुचि थी। उन्होंने मुझे 1967 में कहा था कि ‘नेता जी अभी ज़िंदा हैं और गुमनाम रूप से कहीं संत भेष में पूर्वी उत्तर प्रदेश में रहते है।’



पर्दे वाले बाबा नाम से एक संत पचास के दशक में नेपाल के रास्ते भारत आए और गोपनीय रूप से बस्ती, लखनऊ, नैमिषारण्य, फैजाबाद व अयोध्या के मंदिरों या घरों में रहे। इस दौरान उनसे मिलने बहुत से लोग आते थे। पर सबको हिदायत थी कि उनके सामने कोई सुभाष नाम नहीं लेगा। इनमें 13 लोग जो वहीं के थे, जो उनके अंतरंग थे। उनमें से दो परिवारों ने तो उन्हें परदे के पीछे जाकर भी देखा था। बाक़ी अनेक लोग बंगाल से लगातार उनसे मिलने आते थे। उनमें दो लोग नेता जी की ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ की ‘इंटेलिजेंस विंग’ के सदस्य थे। ये लोग हर 23 जनवरी को आते थे और बड़े हर्षोल्लास से पर्दे वाले बाबा का जन्मदिन मना कर लौट जाते थे। गौरतलब है कि 23 जनवरी ही नेताजी का जन्मदिन होता है।जिसे मोदी जी ने ‘शौर्य दिवस’ घोषित किया है। यही लोग हर वर्ष दोबारा दुर्गा पूजा के समय उनके पास आते थे। इसके अलावा बाबा की जरूरत के हिसाब से बीच-बीच में भी लोग आते जाते रहते थे। देश के कई बड़े नामी राजनेता व बड़े सैन्य अधिकारी भी लगातार उनसे मिलने आते थे। पर सब उनसे पर्दे के सामने से ही बात करते और सलाह लेते थे। 


पत्रकार अनुज धर और पर्यावरणवादी चंद्रचूड़ घोष, इन दो लोगों ने अपनी जवानी के बीस वर्ष इसे सिद्ध करने में लगा दिए कि ‘पर्दे वाले बाबा’ जिन्हें बाद में लोग ‘गुमनामी बाबा’कहने लगे, जिन्हें उनके निकट के लोग ‘भगवन जी’ कहते थे, वही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। पिछले हफ़्ते ये दोनों मेरे दिल्ली कार्यालय आए और विस्तार से मुझे इस विषय में जानकारी दी। उन्होंने अपनी लिखी हिंदी व अंग्रेज़ी की कई पुस्तकें भी दीं। जिनमे वो सारे तथ्य, दस्तावेज़ और उन सामानों के चित्र थे जो ‘गुमनामी बाबा’ के कमरे से 16 सितंबर 1985 को उनकी मृत्यु के बाद, उनके दो दर्जन से ज़्यादा बक्सों में से निकले थे । ये सब सामान देखकर कोलकाता से बुलाई गयीं नेताजी की भतीजी ललिता बोस रोने लगी और बेहोश हो गई। क्योंकि उसमें नेता जी और ललिता जी के माता-पिता के बीच हुए पत्राचार के हस्त लिखित प्रमाण भी थे। उनके परिवार के तमाम फोटो थे। जिनमें नेताजी के माता पिता का फ्रेम किया फोटो भी है। तब ललिता बोस ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर के इन सामानों को सरकार की ट्रेज़री में जमा करवाने की माँग की। अदालत ने भी ये माना कि ‘गुमनामी बाबा’ के ये सब सामान राष्ट्रीय महत्व के है। तब फैजाबाद के जिलाधिकारी ने उन 2760 सामानों की सूची बनवाकर ट्रेज़री में जमा करवा दिया। बरसों बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने इन सामानों को ‘राम कथा संग्रहालय’ अयोध्या में जन प्रदर्शन के लिए रखवा दिया। पता नहीं क्यों अब ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ उन्हें वहाँ से हटाने की प्रक्रिया चला रहा है?



इन सामानों में गुमनामी बाबा (नेताजी) के तीन चश्मे, जापानी क्रॉकरी, बहुत मंहगी जर्मन दूरबीन, ब्रिटिश टाइपराइटर, आईएनए की वर्दी जो नेता जी के साइज़ की हैं। लगभग एक हज़ार पुस्तकें जो राजनीति, साहित्य, इतिहास, युद्ध नीति, होम्योपैथी, धार्मिक विषयों आदि पर हैं व मुख्यतः अंग्रेज़ी में हैं। तीन विदेशी सिगार पाइप, पाँच बोरों में देश विदेश के अख़बारों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में छपी ख़बरों की कतरने, आईएनए के वरिष्ठ अधिकारियों से उनका नियमित पत्राचार व आरएसएस प्रमुख श्री गुरु गोलवलकर का गुमनामी बाबा के नाम लिखा एक पत्र भी मिला है। इसके अलावा एक बड़े गत्ते पर गुमनामी बाबा के रूस से चीन, तिब्बत और नेपाल के रास्ते बस्ती (ऊ प्र) आने के मार्ग का हाथ से बना विस्तृत नक़्शा भी है।



अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष के शोध से पता चलता है कि नेता जी विमान दुर्घटना की झूठी कहानी के आवरण में रूस पहुँच गए। जहाँ रूस की सरकार ने उन्हें गुलाग में एक बंगला, दो अंगरक्षक, एक कार और ड्राइवर की सुविधा के साथ महफ़ूज़ रखा। तीन साल गुमनाम रूप से रूस में रहने के बाद वे चीन, तिब्बत और नेपाल के रास्ते एक संत के वेश में भारत आए और 16 सितंबर 1985 को अपनी मृत्यु तक पर्दे के पीछे ही छिप कर रहे। पर्दे के भीतर जा कर उन्हें केवल फैजाबाद का डॉ बनर्जी व मिश्रा जी का परिवार ही देख सकता था। उनकी दबंग आवाज़, बंगाली उच्चारण में हिंदी और फर्राटेदार अंग्रेजी सुन कर पर्दे के सामने बैठा हर व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। फिर भी सबको यह हिदायत थी कि उनके सामने ‘सुभाष’ नाम नहीं लिया जाएगा। सब उन्हें ‘भगवन जी’ कह कर ही बुलाते थे। जिस व्यक्ति की मृत्यु पर 13 लाख लोग जमा होने चाहिए थे, उनके अंतिम संस्कार में मात्र यही 13 लोग थे। उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी के किनारे अयोध्या के ‘गुप्तार घाट’ पर किया गया, जहाँ उनकी समाधि है। गुप्तार घाट वही स्थल है, जहाँ भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने जल समाधि ली थी। हज़ारों साल में उस पवित्र स्थल पर आजतक केवल गुमनामी बाबा का ही अंतिम संस्कार हुआ है। सारा ज़िला प्रशासन और पुलिस दूर खड़े उनका अंतिम संस्कार देखते रहे।



इतना कुछ प्रमाण उपलब्ध है फिर भी आज तक केंद्र की कोई सरकार गुमनामी बाबा की सही पहचान को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने को तैयार नहीं है। मोदी सरकार तक भी नहीं। जबकि मोदी जी ने इंडिया गेट के सामने की छतरी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की खड़ी प्रतिमा स्थापित करने का पुण्य कार्य किया है। आरएसएस के दिवंगत सर संघ चालक के एस सुदर्शन जी का एक सार्वजनिक वीडियो वक्तव्य है, जो यूट्यूब पर भी उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने साफ़ कहा है कि गुमनामी बाबा ही नेता जी सुभाष चंद्र बोस थे। अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष बताते हैं कि पंडित नेहरू से लेकर मोदी जी तक हर प्रधान मंत्री को इसकी जानकारी है और नेताजी से 1945 तक जुड़े रहे उनके सहयोगी नेता उनसे मिलने जाते रहे। पर साधना में लीन गुमनामी बाबा ये नहीं चाहते थे कि कोई उनकी असलियत जाने।  

Monday, August 18, 2025

बिहारीजी कॉरिडोर का विवाद

काफ़ी रस्साकशी के बाद वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर का कॉरिडोर बनने का रास्ता साफ़ हो गया। योगी सरकार ने इस मंदिर के प्रबंधन के लिए न्यास भी गठित कर दिया। जिसमें मंदिर की बागडोर अब पूरी तरह सरकार के हाथ में है। मंदिर के सेवायत गोस्वामियों के परंपरा से चले आ रहे दो समूहों: राजभोग सेवा अधिकारी और शयन भोग सेवा अधिकारी में से मात्र एक-एक प्रतिनिधि इस न्यास का सदस्य रहेगा। इस पूरे विवाद में वृंदावन का समाज दो भागो में बटा हुआ था। एक तरफ़ थे सेवायत गोस्वामी व उनके परिवार, बिहारीपुरा के बाशिंदे और आसपास के दुकानदार, जिनकी संपत्तियां प्रस्तावित कॉरिडोर के दायरे में आ रही हैं। दूसरी तरफ़ वृन्दावन के आम नागरिक और बाहर से आने वाले दर्शनार्थी। जहाँ पहला पक्ष कॉरिडोर के विरुद्ध आंदोलन करता आया है। वहीं दूसरा पक्ष कॉरिडोर का स्वागत कर रहा है। 



इस विषय में बहुत से गोस्वामीगणों ने मुझसे भी संपर्क किया और इस विवाद में मेरा समर्थन मांगा। कई कारणों से मैं इस मामले में उदासीन रहा। इसकी वजह यह थी कि 2003 - 2005 के बीच जब मैं इस मंदिर का अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर यानी, प्रशासक था तो मैंने मंदिर की अव्यवस्थाओं को सुधारने का सफल प्रयास किया था। पर गोस्वामियों का सहयोग नहीं मिला।


30 जून 2003 को मैंने बिहारी जी के मंदिर का कार्यभार संभाला और 1 अगस्त को हरियाली तीज थी। इस दिन उत्तर भारत से लाखों भक्त स्वर्ण हिंडोले में बैठे श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन करने आने वाले थे। मंदिर के कुछ पुराने गोस्वामियों ने मुझे चुनौती दी कि मैं ये व्यवस्था नहीं संभाल पाऊँगा। ठाकुर जी पर निर्भर होकर चुनौती स्वीकार की और ये पता लगाया कि क्या- क्या समस्याएं आती हैं। सबसे बड़ी समस्या थी, बिहारी जी तक जाने वाले पाँचों मार्गों से आने वाली अपार भीड़। दूसरी समस्या थी, मंदिर के प्रवेश द्वार पर जूते चप्पलों का पहाड़ बन जाना। तीसरी समस्या थी, लोगों की जेब कटना और सोने की चेन खींचना। चौथी समस्या थी, महिलाओं के साथ भीड़ का दुर्व्यवहार। मैं फौरन दिल्ली गया और छतरपुर स्थित कात्यानी देवी के मंदिर के प्रबंधक तिवारी जी से मिला। जो हर नवरात्रि पर लाखों दर्श्नार्थियों की भीड़ सँभालते थे। उन्होंने बताया कि एसपीजी के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी भीड़ प्रबंधन की एजेंसी चलाते हैं। उनसे संपर्क किया और उन्हें वृन्दावन बुलाया। मथुरा के तत्कालीन जिलाधिकारी श्री सुधीर श्रीवास्तव और एसएसपी श्री सतेन्द्र वीर सिंह से लगभग दो सौ सिपाही मांगे और इतने ही स्वयंसेवक अपने संगठन ‘ब्रज रक्षक दल’ के बुलाये। इन चार सौ लोगों को मोदी भवन में भीड़ नियंत्रण के लिए प्रशिक्षित किया। इस कार्य में मान मंदिर के युवा साधुओं का विशेष सहयोग मिला। बिपिन व्यास ने सुझाव दिया कि मंदिर आने और जाने का एक-एक ही मार्ग रखा जाये और बाकी मार्ग बंद कर दिए जाएँ। इसके अलावा विद्यापीठ के चौराहे पर दस हजार टोकन के साथ जूता घर बनाया गया। जिसमें सेवा करने चांदनी चौक दिल्ली के युवा व्यापारी आये। एसपीजी के इन अधिकारियों ने मंदिर के प्रांगण से विद्यापीठ चौराहे तक पूरे मार्ग को दस सेक्टरों में बाँट दिया और वॉकी-टॉकी से हर सेक्टर के दर्शनार्थीयों को क्रमानुसार आगे बढ़ाया। महिलाओं और बुजुर्गों की सहायता के लिये हमने हर सेक्टर में ’ब्रज रक्षक दल’ के स्वयं सेवक तैनात किये गए।



इन सब व्यवस्थाओं का परिणाम यह हुआ कि न तो किसी की जेब कटी, न धक्का-मुक्की हुई, न चप्पल-जूते खोये, बल्कि बूढ़े और जवान सबको बड़े आराम से दर्शन हुए। इस हरियाली तीज के कई दिन बाद तक मुझे मुंबई, कलकत्ता और अन्य शहरों से परिचित भक्त परिवारों के फोन आते रहे कि जैसी व्यवस्था बिहारी जी में इस बार हुई ऐसी पहले कभी नही हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि भीड़ कितनी भी हो दर्शन की व्यवस्था सुधारी जा सकती थी। 


मंदिर प्रबंधन की दूसरी चुनौती थी चढ़ावे की राशि का ईमानदारी से आंकलन और उसे बैंक में जमा कराना। इसमें काफी गड़बड़ी की शिकायत आती थी। मंदिर की आमदनी भी बहुत कम थी। एक वरिष्ठ गोस्वामी का मुझे फोन आये की मैं हर महीने दो दान-पात्र अपने लिए अलग करवा लूँ। सुनकर धक्का लगा। लेकिन इसे एक चेतावनी मानकर मैंने एक नई व्यवस्था बनाई। मंदिर के प्रांगण में जहाँ गुल्लकें (दानपत्र) खोली जाती थीं वहाँ विडियो कैमरे लगवा दिए और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्कता बरतने के लिए वहाँ बिठा दिया। परिणाम यह हुआ कि पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा दानराशि गुल्लकों से निकली जिसे बैंक में जमा करा दिया गया। 


बिहारी जी के मंदिर की व्यवस्था सुधारने के उद्देश्य से मैंने वाजपेई सरकार में केन्द्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री जगमोहन जी को वृन्दावन बुलाया। उन्होंने मेरे साथ बिहारी जी के मंदिर का विस्तृत दौरा किया और अगले ही दिन दिल्ली से एएसआई व सीपीडब्ल्यूडी के वरिष्ठ अधिकारियों के मुझे फ़ोन आने लगे कि, ‘मंत्री जी ने हमें आदेश दिया है कि आपके जो निर्देश हों, उनके अनुसार मंदिर की व्यवस्था को सुधारने में सहयोग करें।’ इससे मंदिर में
  हलचल मच गई। मुझे कुछ गोस्वामियों के गुमनाम फोन आये, जिन्होंने धमकी दी कि मैं मंदिर की व्यवस्था में कोई बदलाव न करूँ। मैंने श्री रमेश बाबा से पूछा कि क्या करूँ? वे बोले, ब्राह्मणों के पेट पर लात मारने वाला दीर्घ काल तक ‘रौरव नर्क’ में फेंक दिया जाता है। तुम ये मत करो। उनका यह रुख देखकर तब मैंने इस दिशा में प्रयास करना बंद कर दिया। किन्तु मंदिर की दैनिक व्यवस्था में जितना सुधार कर सकता था किया। फिर यह सोचकर कि मुझे अपनी ऊर्जा सम्पूर्ण ब्रज के विकास पर लगानी चाहिए, एक मंदिर में उलझकर नहीं रहना चाहिए। इसलिए 22 महीने बाद 2005 में मैंने स्वतः ही बिहारी जी के मंदिर के रिसीवर पद से त्यागपत्र दे दिया। मैं ऋणी हूँ बिहारी जी का, संतों का, अपने ब्रजवासी बंधुओं का व बाहर से आने वाले दर्शनार्थियों का, जिन्होंने इस कार्यकाल में मेरी विनम्र सेवा को स्वीकार किया और सराहा। अगर मंदिर के सभी आदरणीय गोस्वामीगण 2003-05 में मंदिर की व्यवस्थाओं को स्थाई रूप से सुधारने के लिए निष्काम भावना से किए जा रहे मेरे ठोस प्रयासों में सहयोग करते तो कदाचित ये स्थिति न आती।   

Monday, August 11, 2025

उत्तरकाशी की त्रासदी: एक चेतावनी

भारत के पहाड़ी क्षेत्र, विशेष रूप से हिमालयी राज्यों जैसे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, प्राकृतिक सौंदर्य और जैव-विविधता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। ये क्षेत्र न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं, बल्कि गंगा, यमुना और अन्य प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल भी हैं, जो देश की जीवनरेखा हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता ने गंभीर चिंता पैदा की है। उत्तरकाशी में हाल ही में भीषण बाढ़ और मलबे के प्रवाह ने एक बार फिर से यह सवाल उठाया है कि क्या हम अपने पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे हैं ? यह आपदा, जो भगीरथी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र (बीईएसजेड) में हुई, न केवल प्राकृतिक कारणों से बल्कि अवसंरचना परियोजनाओं के कुप्रबंधन और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण और भी विनाशकारी बन गई। यह समय है कि हम इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें और तत्काल कार्रवाई करें।



5 अगस्त 2025 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में एक बादल फटने की घटना ने भारी तबाही मचाई। खीर गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में हुई इस घटना ने गांव के घरों, होटलों, दुकानों और सड़कों को तहस-नहस कर दिया।चार लोगों की मौत हो गई और 50 से 100 लोग लापता हो गए। यह आपदा भगीरथी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में हुई, जो 2012 में गंगा नदी की पारिस्थितिकी और जलस्रोतों की सुरक्षा के लिए अधिसूचित किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण कार्य, जैसे कि नदी के बाढ़ क्षेत्रों पर होटल और हेलीपैड का निर्माण, ने इस आपदा को और अधिक गंभीर बना दिया।



उत्तरकाशी की यह घटना कोई अपवाद नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बार-बार बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। 2013 की केदारनाथ बाढ़, जिसमें 5,700 से अधिक लोग मारे गए थे और 2021 की चमोली बाढ़, जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए, ऐसी त्रासदियों के उदाहरण हैं। इन आपदाओं का एक प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है, जो हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने और बादल फटने की घटनाओं को बढ़ा रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ मानवीय गतिविधियां, विशेष रूप से अवसंरचना परियोजनाओं का गलत प्रबंधन, इन आपदाओं की तीव्रता को और बढ़ा रहा है।


हिमालयी क्षेत्र की भूवैज्ञानिक संरचना अत्यंत नाजुक है। यह क्षेत्र टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण भूकंपीय रूप से सक्रिय और भूस्खलन के लिए अतिसंवेदनशील है। फिर भी, चारधाम परियोजना जैसे बड़े पैमाने की सड़क निर्माण परियोजनाएं, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और अनियंत्रित पर्यटन ने इस क्षेत्र की स्थिरता को और कमजोर किया है। उत्तरकाशी में चारधाम परियोजना के तहत धरासू-गंगोत्री खंड का चौड़ीकरण और हिना-टेखला के बीच प्रस्तावित बायपास, जिसमें 6,000 देवदार के पेड़ों को काटने की योजना है, पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय रहा है।


चारधाम परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई कानूनी चुनौतियां सामने आई हैं, क्योंकि यह परियोजना पर्यावरणीय खतरों को बढ़ा रही है। विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि सड़क चौड़ीकरण के लिए पहाड़ों की कटाई, वनों की अंधाधुंध कटाई और नदी के किनारों पर निर्माण कार्य इस क्षेत्र को और अधिक अस्थिर बना रहे हैं। 2023 में सिल्क्यारा सुरंग प्रकरण ने भी यही दिखाया कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) के बिना परियोजनाओं को मंजूरी देना कितना खतरनाक हो सकता है।


इसी तरह, हिमाचल प्रदेश में शिमला के शोघी-धल्ली राजमार्ग परियोजना के लिए पहाड़ों की कटाई ने भूस्खलन के खतरे को बढ़ा दिया है। शिमला, जो कभी 30,000 लोगों के लिए बनाया गया था, अब 300,000 लोगों और लाखों पर्यटकों का बोझ सह रहा है। कुल्लू और मनाली जैसे पर्यटन स्थल भी अनियंत्रित निर्माण और पर्यटकों की भीड़ के कारण पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहे हैं।


जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता को बढ़ा दिया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, 1988 से 2023 तक उत्तराखंड में 12,319 भूस्खलन हुए, जिनमें से 1,100 अकेले 2023 में दर्ज किए गए। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और ग्लेशियल झीलों का विस्तार ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) का खतरा बढ़ा रहा है। उत्तरकाशी की हालिया बाढ़ में भी विशेषज्ञों ने जीएलओएफ की संभावना जताई है।


इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ रही है, जिससे बादल फटने और भारी बारिश की घटनाएं अधिक आम हो रही हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, उत्तरकाशी में 43 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो बादल फटने की परिभाषा (100 मिमी/घंटा) से कम थी, लेकिन लगातार तीन दिनों की बारिश ने मिट्टी को संतृप्त कर दिया, जिससे मलबे का प्रवाह और बाढ़ बढ़ गई।


पर्यटन उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा है। 2023 में चारधाम यात्रा में 56 लाख से अधिक पर्यटक आए, जिसके कारण होटल, लॉज और सड़कों का निर्माण तेजी से हुआ। हालांकि, यह अनियंत्रित निर्माण नदी किनारों और अस्थिर ढलानों पर किया गया, जिसने प्राकृतिक प्रतिरोधों को नष्ट कर दिया। जोशीमठ में 2023 में 700 से अधिक घरों में दरारें आ गईं, क्योंकि यह शहर प्राचीन भूस्खलन मलबे पर बना है और वहां टपकेश्वर विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना और चारधाम सड़क परियोजना ने इसके ढलानों को अस्थिर कर दिया।


उत्तरकाशी की त्रासदी और हिमाचल-उत्तराखंड में बार-बार होने वाली आपदाएं यह स्पष्ट करती हैं कि अब केवल चर्चा पर्याप्त नहीं है। हमें तत्काल और ठोस कदम उठाने होंगे। बीईएसजेड जैसे नियमों को सख्ती से लागू करना होगा। अवैध निर्माण पर तत्काल रोक और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है। सड़क और अन्य परियोजनाओं के लिए आधुनिक तकनीकों, जैसे हाफ-टनेल और ढलान स्थिरीकरण संरचनाओं का उपयोग करना होगा। हिमालयी क्षेत्र में स्वचालित मौसम स्टेशनों (एडब्ल्यूएस) की संख्या बढ़ानी होगी और समुदाय-आधारित चेतावनी प्रणालियों को लागू करना होगा। वनों की कटाई को रोकने और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के माध्यम से प्राकृतिक बाधाओं को बहाल करना होगा। पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित करने और पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देने की जरूरत है।

उत्तरकाशी की हालिया बाढ़ और हिमाचल-उत्तराखंड में बार-बार होने वाली आपदाएं हमें एक स्पष्ट संदेश दे रही हैं, यदि हमने अभी नहीं चेता, तो हमारी लापरवाही हमें और हमारे पर्यावरण को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह समय है कि हम विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाएं। हिमालय केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर का हिस्सा है। इसे बचाने के लिए सरकार, स्थानीय समुदायों और नागरिकों को एकजुट होकर काम करना होगा। अब समय है कार्रवाई का, क्योंकि देरी का मतलब और अधिक त्रासदियां होंगी। 

Monday, August 4, 2025

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत को तोहफ़ा?

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयात होने वाले सामानों पर 25% टैरिफ और रूस से तेल और हथियारों की खरीद के लिए अतिरिक्त दंड की घोषणा की। यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से तब जब दोनों देश एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। ट्रम्प ने भारत और रूस को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ (डेड इकॉनमी) कहकर निशाना बनाया और भारत के उच्च टैरिफ और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं को इसका कारण बताया।


डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने वाली आक्रामक टैरिफ नीतियों को अपनाया है। 7 अगस्त 2025 से लागू होने वाले 25% टैरिफ का ऐलान करते हुए, ट्रम्प ने भारत के रूस से तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद को प्रमुख कारण बताया। उनके अनुसार, भारत रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है, जो यूक्रेन में रूस के सैन्य अभियान के समय में अस्वीकार्य है। इसके अतिरिक्त, ट्रम्प ने भारत के उच्च टैरिफ (जिसे उन्होंने दुनिया में सबसे अधिक बताया) और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं की भी आलोचना की।



यह टैरिफ अचानक भारत के लिए एक झटके के रूप में आया है, क्योंकि भारत और अमेरिका पिछले कुछ महीनों से एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे थे। ट्रम्प ने पहले 20-25% टैरिफ की संभावना जताई थी, लेकिन अंतिम घोषणा में अतिरिक्त दंड भी शामिल किया गया। यह कदम भारत के फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, रत्न और आभूषण, और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है, जो अमेरिका के साथ भारत के व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।


कांग्रेस के नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ट्रम्प के ‘मृत अर्थव्यवस्था’ वाले बयान का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, हां, ट्रम्प सही हैं। हर कोई जानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मृत है, सिवाय प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के। मुझे खुशी है कि ट्रम्प ने यह तथ्य सामने रखा। पूरी दुनिया जानती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था खत्म हो चुकी है। भाजपा ने अडानी को मदद करने के लिए अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया।



राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए, विशेष रूप से नोटबंदी और ‘त्रुटिपूर्ण’ जीएसटी को अर्थव्यवस्था के पतन का कारण बताया। उन्होंने यह भी पूछा कि ट्रम्प के भारत-पाकिस्तान सीजफायर को लेकर बार बार किए जा रहे दावों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी क्यों है?



कांग्रेस पार्टी ने इस टैरिफ को भारत की विदेश नीति की विफलता के रूप में चित्रित किया। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, राहुल गांधी ने पहले ही इस बारे में चेतावनी दी थी। यह टैरिफ हमारी अर्थव्यवस्था, निर्यात, उत्पादन और रोजगार पर असर डालेगा। हम अमेरिका को फार्मास्यूटिकल्स निर्यात करते हैं और 25% टैरिफ से ये महंगे हो जाएंगे, जिससे मांग कम होगी और उत्पादन व रोजगार पर असर पड़ेगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए और टैरिफ को भारत के व्यापार, एमएसएमई और किसानों के लिए हानिकारक बताया।


अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना की। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बुरे दिनों की शुरुआत बताया, जबकि असदुद्दीन ओवैसी ने ट्रम्प को व्हाइट हाउस का जोकर कहकर उनकी आलोचना की। हालांकि, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी के रुख से अलग हटकर अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। शशि थरूर ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत-अमेरिका व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं और भारत को अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता है।


वहीं अर्थशास्त्रियों ने इस टैरिफ के भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को लेकर मिश्रित राय व्यक्त की है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रभाव सीमित होगा, जबकि अन्य ने दीर्घकालिक नुकसान की चेतावनी दी है। ईन्वेस्टमेंट इनफार्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया (आईसीआरए) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, प्रस्तावित टैरिफ और दंड हमारी अपेक्षा से अधिक हैं और इससे भारत की जीडीपी वृद्धि पर असर पड़ सकता है। प्रभाव की गंभीरता दंड के आकार पर निर्भर करेगी। अर्नेस्ट एंड यंग इंडिया (ई वाई) के व्यापार नीति विशेषज्ञ अग्नेश्वर सेन ने बताया कि टैरिफ से समुद्री उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, चमड़ा और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होंगे। ये क्षेत्र भारत-अमेरिका व्यापार में मजबूत हैं, और टैरिफ से इनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।


फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट के राहुल अहलूवालिया ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत को वियतनाम और चीन जैसे अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कमजोर स्थिति में ला सकता है। उनके अनुसार, निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं का भारत की ओर स्थानांतरण अब संभावना नहीं है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने आशावादी रुख अपनाया। फिक्की के अध्यक्ष हर्षवर्धन अग्रवाल ने कहा, हालांकि यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण है और हमारे निर्यात पर असर डालेगा, हमें उम्मीद है कि यह एक अल्पकालिक घटना होगी और दोनों पक्ष जल्द ही एक स्थायी व्यापार समझौते पर पहुंच जाएंगे।


भारत सरकार ने इस मुद्दे पर सतर्क और संयमित रुख अपनाया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा, हम राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएंगे। भारत ने एक दशक में ‘फ्रैजाइल फाइव’ से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का सफर तय किया है। सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि भारत तत्काल जवाबी टैरिफ लगाने के बजाय बातचीत के रास्ते को अपनाएगा। एक सूत्र ने कहा, चुप्पी सबसे अच्छा जवाब है। हम बातचीत की मेज पर इस मुद्दे को हल करेंगे। 

कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ और अतिरिक्त दंड ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। राहुल गांधी और विपक्ष ने इसे सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की विफलता के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि अर्थशास्त्रियों ने इसके मिश्रित प्रभावों की ओर इशारा किया है। जहां कुछ क्षेत्रों पर तत्काल असर पड़ सकता है, वहीं भारत के पास अन्य बाजारों में विविधता लाने और बातचीत के जरिए समाधान खोजने का अवसर है। यह स्थिति न केवल आर्थिक बल्कि भूराजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों को संतुलित करना होगा। देखना यह है कि आनेवाले दिनों में सरकार इस समस्या से कैसे निपटती है।  

Monday, July 28, 2025

भारतीय पासपोर्ट की बढ़ती लोकप्रियता!

हाल ही में जारी हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2025 में भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। पिछले वर्ष के 85वें स्थान से 8 पायदान ऊपर चढ़कर भारत अब 77वें स्थान पर पहुंच गया है। इसका सीधा लाभ पासपोर्ट धारकों को मिल रहा है और यह हमारी अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक संबंधों के लिए भी शुभ संकेत है।


हेनले पासपोर्ट इंडेक्स एक वैश्विक बेंचमार्क है जो दुनिया के पासपोर्टों को उनकी यात्रा स्वतंत्रता के आधार पर रैंक करता है। यानी कोई पासपोर्ट धारक बिना पूर्व वीज़ा के कितने देशों की यात्रा कर सकता है। भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग में यह सुधार सीधे तौर पर भारतीय नागरिकों के लिए अधिक वीज़ा-मुक्त या वीज़ा-ऑन-अराइवल देशों तक पहुंच का मार्ग प्रशस्त करता है। वर्तमान में, भारतीय पासपोर्ट धारक 59 देशों में बिना पूर्व वीज़ा के यात्रा कर सकते हैं, जबकि पिछले साल यह संख्या 57 थी। इसमें फिलीपींस और श्रीलंका जैसे नए देश भी शामिल हुए हैं।



यह बढ़ी हुई पहुंच भारतीय यात्रियों के लिए कई मायनों में फायदेमंद है। वीज़ा प्रक्रिया अक्सर लंबी, जटिल और खर्चीली होती है। वीज़ा-मुक्त या वीज़ा-ऑन-अराइवल की सुविधा यात्रा योजना को सरल बनाती है, समय बचाती है और अचानक यात्राओं को संभव बनाती है। यह व्यापार, पर्यटन और व्यक्तिगत यात्राओं को बढ़ावा देता है।  व्यापारिक पेशेवरों के लिए आसान अंतरराष्ट्रीय यात्रा व्यावसायिक अवसरों को बढ़ाने में मदद करती है। इससे विदेशी निवेश आकर्षित होता है और भारतीय व्यवसायों को वैश्विक बाजारों तक पहुंचने में आसानी होती है। भारतीय पर्यटकों के लिए अधिक गंतव्यों तक आसान पहुंच अंतरराष्ट्रीय पर्यटन को प्रोत्साहित करती है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि होती है और सेवा क्षेत्र को बढ़ावा मिलता है। छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए आसान यात्रा विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन या शोध के लिए नए अवसर खोलती है, जिससे ज्ञान और सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ता है। एक मजबूत पासपोर्ट किसी देश की वैश्विक प्रतिष्ठा और उसके नागरिकों की स्वीकार्यता को दर्शाता है। यह भारत की बढ़ती ‘सॉफ्ट पावर’ का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।



भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग में इस उछाल के पीछे कई कारक जिम्मेदार हैं। भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और वीज़ा समझौतों को उदार बनाने पर विशेष जोर दिया है। विदेश मंत्रालय की सक्रिय कूटनीति ने कई देशों को भारतीय नागरिकों के लिए वीज़ा नीतियों में ढील देने के लिए प्रेरित किया है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और वैश्विक भू-राजनीति में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। भारत का आर्थिक उदय और रणनीतिक महत्व अन्य देशों को भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने और भारतीय नागरिकों को अधिक सुगम यात्रा सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित करता है। किसी भी देश की पासपोर्ट रैंकिंग में उसकी आंतरिक सुरक्षा स्थिति और राजनीतिक स्थिरता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत ने हाल के वर्षों में आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और एक स्थिर वातावरण बनाए रखने में महत्वपूर्ण प्रगति की है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में विश्वास बढ़ा है। भारत में पासपोर्ट आवेदन प्रक्रिया को डिजिटल बनाने और सरल बनाने के लिए किए गए प्रयासों ने भी अप्रत्यक्ष रूप से इस सुधार में योगदान दिया है। सुगम और पारदर्शी पासपोर्ट सेवाएं नागरिकों के लिए अंतरराष्ट्रीय यात्रा को और अधिक व्यवहार्य बनाती हैं। इसके साथ ही कोविड-19 महामारी के दौरान यात्रा प्रतिबंधों के कारण दुनिया भर के पासपोर्टों की रैंकिंग प्रभावित हुई थी। अब जब वैश्विक यात्रा धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, तो देशों के बीच समझौते और यात्रा की बहाली रैंकिंग में सुधार का एक कारण है।



भारतीय पासपोर्ट की इस क्रमशः बढ़ती ताकत को बनाए रखना और उसे और मजबूत करना एक सतत प्रक्रिया है। इसके लिए कई उपायों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। विदेश मंत्रालय को दुनिया के उन देशों के साथ बातचीत जारी रखनी चाहिए जो अभी भी भारतीय नागरिकों के लिए सख्त वीज़ा आवश्यकताएं रखते हैं। विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहां भारतीय व्यापार, पर्यटन या छात्र समुदाय की महत्वपूर्ण उपस्थिति है।एक मजबूत और स्थिर अर्थव्यवस्था एक मजबूत पासपोर्ट की नींव होती है। भारत को अपनी आर्थिक वृद्धि दर को बनाए रखना चाहिए और वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों का सम्मान करना और उनका प्रभावी ढंग से पालन करना भारत की विश्वसनीयता को बढ़ाता है, जिससे अन्य देश उसके नागरिकों को अधिक वीज़ा स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था का मजबूत ढांचा किसी भी देश की अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए महत्वपूर्ण है। यह पर्यटकों और व्यापारिक आगंतुकों के लिए एक सुरक्षित वातावरण का आश्वासन देता है। 


भारत को उन देशों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ना चाहिए जो ई-वीज़ा या वीज़ा-ऑन-अराइवल की पेशकश नहीं करते हैं। इन सुविधाओं का विस्तार यात्रा को और अधिक सुविधाजनक बना सकता है। सरकार को भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए उपलब्ध वीज़ा-मुक्त/वीज़ा-ऑन-अराइवल देशों के बारे में जागरूकता बढ़ानी चाहिए। विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर नियमित अपडेट और सार्वजनिक जागरूकता अभियान इसमें मदद कर सकते हैं।भारत को ‘अतिथि देवो भव’ की अपनी परंपरा के अनुरूप विदेशी पर्यटकों का स्वागत करना जारी रखना चाहिए। सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आदान-प्रदान से भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ बढ़ती है, जिससे बदले में अन्य देशों से वीज़ा उदारता प्राप्त होती है।


भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग में यह सुधार देश के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, पर अभी बहुत आगे जाना है। भारत की विदेश नीति को लेकर विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं। इस नीति के आलोचकों का कहना है कि हाल में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के मामले में दुनिया का कोई भी देश भारत के साथ खड़ा नहीं हुआ। जबकि चीन और टर्की आदि ने पाकिस्तान को खुला समर्थन देने की घोषणा की थी। उधर अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दर्जनों बार यह दोहराया कि भारत पाकिस्तान के बीच उन्होंने ही सीज़-फ़ायर करवाई है। जबकि भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रम्प के इस दावे का बार-बार खंडन किया। दरअसल किसी भी देश की विदेश नीति का आधार उसकी आर्थिक प्राथमिकताएँ व भू-राजनैतिक (जियो पोलिटिकल) बाध्यताओं से निर्धारित होती है। अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक परिदृश्य में जहाँ एक तरफ़ अमरीका और रूस की नज़र हमेशा भारत के बड़े बाज़ार पर रहती है वहीं चीन से संतुलन बनाए रखने के लिए इन्हें पाकिस्तान को भी साधना पड़ता है। क्योंकि उसकी भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है। इन सब दबावों के बीच भारत अपनी विदेश नीति तय करता है।   

Monday, July 21, 2025

बढ़ती बेरोज़गारी एक विकट समस्या

पिछले दिनों खबर छपी कि उत्तर प्रदेश में 2 हज़ार पदों के लिए 29 लाख आवेदन प्राप्त हुए। इसी तरह एक बार ऐसी भी खबर आई थी कि आईआईटी से पास हुए 38 फ़ीसदी युवाओं को रोज़गार नहीं मिला। अक्सर यह देखा जाता है कि जब भी कभी कोई सरकारी पद पर भर्ती खुलती है तो कुछ हज़ार पदों के लिए लाखों आवेदन आ जाते हैं। फिर वो पद छोटा हो या बड़ा, उस पद की योग्यता से अधिक योग्य आवेदक अपना आवेदन देते हैं। बात बिहार की हो उत्तर प्रदेश की या देश में किसी अन्य राज्य की, जब भी एक पद पर उम्मीद से ज़्यादा आवेदन आते हैं तो स्थिति अनियंत्रित हो जाती है। 



आज के दौर में अगर ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ किन्ही कारणों से ऐसे सवालों को जनता तक नहीं पहुँचाता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि जनता तक वह सवाल पहुँच नहीं पाएँगे। सोशल मीडिया पर ऐसे सैंकड़ों इंटरव्यू देखें जा सकते हैं जो बेरोज़गारी की भयावय समस्या से जूझते युवाओं की हताशा दर्शाते हैं। जब ये युवा रोज़गार की माँग लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो इनके राज्यों की सरकारें पुलिस से इन पर डंडे बरसाती हैं। अगर युवाओं को सरकारी नौकरी मिलने की भी उम्मीद नहीं होगी तो हार कर उन्हें निजी क्षेत्र में जाना पड़ेगा और निजी क्षेत्र की मनमानी का सामना करना पड़ेगा। दिक्कत यह है कि निजी क्षेत्र में भी रोज़गार की संभावनाएँ बहुत तेज़ी से घटती जा रही हैं। इससे और हताशा फ़ैल रही है। नौकरी नहीं मिलती तो युवाओं की शादी नहीं होती और उनकी उम्र बढ़ती जाती है। समाज शास्त्रीय शोधकर्ताओं को इस विषय पर शोध करना चाहिए कि इन करोड़ों बेरोज़गार युवाओं की इस हताशा का समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? 



देश के आर्थिक और सामाजिक ढाँचे को देखते हुए शहरों में अनौपचारिक रोज़गार की मात्रा को क्रमशः घटा कर औपचारिक रोज़गार के अवसर को बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। देश की सिकुड़ती हुई अर्थव्यवस्था के कारण बेरोज़गारी ख़तरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है। एक शोध के अनुसार भवन निर्माण क्षेत्र में 50%, व्यापार, होटेल व अन्य सेवाओं में 47%, औद्योगिक उत्पादन क्षेत्र में 39% और खनन क्षेत्र में 23% बेरोज़गारी फैल चुकी है। 



चिंता की बात यह है कि ये वो क्षेत्र हैं जो देश को सबसे ज़्यादा रोज़गार देते हैं। इसलिए उपरोक्त आँकड़ों का प्रभाव भयावह है। जिस तीव्र गति से ये क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं उससे तो और भी तेज़ी से बेरोज़गारी बढ़ने की स्थितियाँ पैदा हो रही हैं। दो वक्त की रोटी का भी जुगाड़ न कर पाने की हालत में लाखों मज़दूर व अन्य लोग जिस तरह लॉकडाउन शुरू होते ही पैदल ही अपने गाँवों की ओर चल पड़े उससे इस स्थिति की भयावयता का पता चलता है।



उल्लेखनीय है कि दक्षिण एशिया के देशों में अनौपचारिक रोज़गार के मामले में भारत सबसे ऊपर है। जिसका मतलब हुआ कि हमारे देश में करोड़ों मज़दूर कम मज़दूरी पर, बेहद मुश्किल हालातों में काम करने पर मजबूर हैं, जहां इन्हें अपने बुनियादी हक़ भी प्राप्त नहीं हैं। इन्हें नौकरी देने वाले जब चाहे रखें, जब चाहें निकाल दें। क्योंकि इनका ट्रेड यूनीयनों में भी कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार भारत में 53.5 करोड़ मज़दूरों में से 39.8 करोड़ मज़दूर अत्यंत दयनीय अवस्था में काम करते हैं। जिनकी दैनिक आमदनी 200 रुपय से भी कम होती है। इसलिए मोदी सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियाँ हैं। पहली; शहरों में रोज़गार के अवसर कैसे बढ़ाए जाएं? क्योंकि पिछले 7 वर्षों में बेरोज़गारी का फ़ीसदी लगातार बढ़ता गया है। दूसरा; शहरी मज़दूरों की आमदनी कैसे बढ़ाएँ, जिससे उन्हें अमानवीय स्थित से बाहर निकाला जा सके।


इसके लिए तीन काम करने होंगे। भारत में शहरीकरण का विस्तार देखते हुए, शहरी रोज़गार बढ़ाने के लिए स्थानीय सरकारों के साथ समन्वय करके नीतियाँ बनानी होंगी। इससे यह लाभ भी होगा कि शहरीकरण से जो बेतरतीब विकास और गंदी बस्तियों का सृजन होता है उसको रोका जा सकेगा। इसके लिए स्थानीय शासन को अधिक संसाधन देने होंगे। दूसरा; स्थानीय स्तर पर रोज़गार सृजन वाली विकासात्मक नीतियाँ लागू करनी होंगी। तीसरा; शहरी मूलभूत ढाँचे पर ध्यान देना होगा जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था भी सुधरे। चौथा; देखा यह गया है, कि विकास के लिए आवंटित धन का लाभ शहरी मज़दूरों तक कभी नहीं पहुँच पाता और ऊपर के लोगों में अटक कर रह जाता है। इसलिए नगर पालिकाओं में विकास के नाम पर ख़रीदी जा रही भारी मशीनों की जगह अगर मानव श्रम आधारित शहरीकरण को प्रोत्साहित किया जाएगा तो शहरों में रोज़गार बढ़ेगा। पाँचवाँ; शहरी रोज़गार योजनाओं को स्वास्थ्य और सफ़ाई जैसे क्षेत्र में तेज़ी से विकास करके बढ़ाया जा सकता है। क्योंकि हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आज यह हालत नहीं है कि वो प्रवासी मज़दूरों को रोज़गार दे सके। अगर होती तो वे गाँव छोड़ कर शहर नहीं गए होते। 


मौजूदा हालात में यह सोचना कि पढ़े-लिखे युवाओं के लिए एक ऐसी योजना लानी पड़ेगी जिससे इनको भी रोज़गार मिल जाए। पर ऐसा करने से करोड़ों बेरोज़गारों का एक छोटा सा अंश ही संभल पाएगा। जबकि बेरोज़गारों में ज़्यादा तादाद उन नौजवानों की है जो आज देश में बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेकर भी बेरोज़गार हैं। उनका आक्रोश इतना बढ़ चुका है और सरकारी तंत्र द्वारा नौकरी के बजाए लाठियों ने आग में घी का काम किया है। कुछ वर्ष पहले सोशल मीडिया पर एक व्यापक अभियान चला कर देश के बेरोज़गार नौजवानों ने प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस को ही ‘बेरोज़गारी दिवस’ के रूप में मनाया था। उस समय इसी कॉलम में मैंने कहा था कि ये एक ख़तरनाक शुरुआत है जिसे केवल वायदों से नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में शिक्षित रोज़गार उपलब्ध कराकर ही रोका जा सकता है। मोदी जी ने 2014 के अपने चुनावी अभियान के दौरान प्रतिवर्ष 2 करोड़ नए रोज़गार सृजन का अपना वायदा अगर निभाया होता तो आज ये हालात पैदा न होते।

यहाँ ये उल्लेख करना भी ज़रूरी है कि कोई भी राजनैतिक दल जो अपने चुनावी अभियान में बेरोजगारी दूर करने का सपना दिखता है, वो सत्ता में आने के बाद अपना वायदा पूरा नहीं करता। इसलिए सभी राजनैतिक दलों को मिल बैठ कर इस भयावय समस्या के निदान के लिए एक नई आर्थिक नीति पर सहमत होना पड़ेगा। जिसके माध्यम से देश की सम्पदा, चंद हाथों तक सीमित होने के बजाय उसका विवेकपूर्ण बँटवारा हो। छोटे और मंझले उद्योगों के तेज़ी से बंद होने की मजबूरी को दूर करना होगा और इन उद्योगों को अविलंब पुनः स्थापित करने की दिशा में ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे।