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Monday, May 4, 2026

पर्यटन का विस्फोट : खतरे की घंटी !

इस हफ़्ते जबलपुर में नर्मदा नदी के बरगी बाँध पर मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग की क्रूज बोट के अंधड़ में पलट जाने से नौ लोगों की डूब कर दर्दनाक मौत हो गई। दो हफ़्ते पहले उत्तर प्रदेश के वृंदावन में यमुना में भी नाव पलटने से दस लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। सुरक्षा नियमों का लागू न होना और बिना लाइफ जैकेट के पर्यटकों को नावों, स्टीमरों या क्रूज़ बोट्स में सैर सपाटा कराना, इन हादसों का मुख्य कारण है। ऐसे हादसे देश में आए दिन हो रहे हैं। पर उन से किसी भी राज्य की सरकार या प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया। ऐसा लगता भी नहीं कि आने वाले दिनों में इस दिशा में कोई कड़ी पहल की जाएगी। लोग अपनी मस्ती में जान जोखिम में डालते रहेंगे, चाहे उनकी ज़िंदगी को कितना ही ख़तरा क्यों न हो। 


पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों, तीर्थ नगरियों और कुंभ जैसे धार्मिक उत्सवों में लगातार बढ़ती दर्शनार्थियों की भीड़ अब इतनी बेकाबू हो गई है कि उसमें कुचल कर सैंकड़ों जानें चली जाती हैं। जैसे जनवरी 2025 में प्रयाग के कुंभ में हुआ, जहाँ बहुत लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए। और यही हाल कई बार वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में हुआ। मार्च 2026 में शीतला मंदिर (नालंदा, बिहार) में पूजा के दौरान भगदड़ में 8 लोग मारे गए, कई घायल हुए। 2025 में भारत में कुल 8 से ज़्यादा भगदड़ हादसों में 129 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें ज्यादातर धार्मिक स्थलों पर हुईं। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ बेक़सूर लोगों ने भीड़ के कारण अपनी जान गवाई।  


राज्यों के मुख्य मंत्री बड़े गर्व से घोषणा करते हैं कि उनके यहाँ पर्यटकों की संख्या कितनी तेज़ी से बढ़ रही है। पर वो ये नहीं बताते कि पर्यटकों की इस बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के काम में वे कितना असफल हो रहे हैं। इसी हफ़्ते केदारनाथ में इतनी भीड़ बड़ गई कि बहुत से दर्शनार्थियों को बिना दर्शन के बैरंग लौटना पड़ा। क्या वजह है कि तिरुपति बालाजी जैसे कुछ अपवादों को छोड़ कर किसी भी राज्य की सरकार पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की भीड़ को व्यवस्थित तरीके से संचालित या नियंत्रित नहीं करना चाहती? जबकि ऐसा करना बिल्कुल असंभव नहीं है। मुझे याद है कि 1984 में मैं स्विट्जरलैंड के माउंट ब्लांक के सर्वोच्च शिखर पर जाने लिए जब उस पर्यटन स्थल से 50 मील दूर था, तो स्थानीय पुलिस ने हमारी जैसी सैंकड़ों गाड़ियों को वहीं रोक दिया और हमें तब तक इंतज़ार करने को कहा जब तक की एक निर्धारित संख्या की गाड़ियाँ सामने की तरफ़ से लौट नहीं आईं। इस तरह उन्होंने पहाड़ की तलहटी में अनियंत्रित भीड़ होने की संभावना को ख़ारिज कर दिया। क्या ऐसी नीतियाँ हमारी प्रदेश सरकारें नहीं अपना सकती? पुलिस का जितना अमला हर राज्य में छोटे से बड़े तथाकथित वीआईपीयों की सुरक्षा व्यवस्था में रोज़ाना खपा रहता है, वो अगर हर तीर्थस्थल या पर्यटन स्थल के भीड़ नियंत्रण पर तैनात किया जाए तो न तो दुर्घटनाएं होंगी और न ही यात्रियों व स्थानीय नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। 


हमारी प्रदेश सरकारें इस बात में बहुत गर्व महसूस करती हैं कि उनकी नीतियों के कारण उनके प्रदेश में पर्यटन दिन दुगना और रात चौगुना बढ़ रहा है। पर इस पर्यटन विस्फोट से जो अव्यवस्था फैलती जा रही है, उसका उल्लेख कोई मुख्य मंत्री नहीं करता। भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर हर महत्वपूर्ण शहर में प्लास्टिक और कूड़े के अंबार लगते जा रहे हैं। जिनसे निपटने की कोई योजना किसी भी सरकार के पास नहीं है। कूड़े के ये पहाड़ न सिर्फ़ आँख की किरकिरी हैं बल्कि जनता के स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा भी पैदा कर रहे हैं। मोदी जी की पहल पर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का कोई असर इन तीर्थ नगरियों और पर्यटन क्षेत्रों में दिखाई नहीं देता। फिर वो चाहे पहाड़ों की घाटियाँ हों, समुद्र और नदियों के तट हों या हरे भरे जंगल, हर ओर कूड़े के अंबार लगते जा रहे हैं। इसलिए पश्चिमी देश भारत को दुनिया का सबसे गंदा देश अगर कहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है? 


पर्यटन विस्फोट की इस आपाधापी में प्रांतीय सरकारों को इस बात की चिंता नहीं है कि देश के नागरिकों को खाने के सामानों या प्रसाधन की वस्तुओं में कितना ज़हर परोसा जा रहा है। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भारी मात्रा में मरे हुए जानवरों की चर्बी से बनाए जा रहे नकली घी के भारी भंडार छापों में पकड़े गए हैं। पर ये कारवाई प्रतीकात्मक ज़्यादा है, प्रभावी कम। क्योंकि ऐसे नक़ली घी का कारोबार बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से चल रहा है। इसी तरह उत्तर भारत में रसायनों से बने नकली दूध और पनीर को सरेआम बेचा जा रहा है। फल और सब्जियों की तो बात ही छोड़ दीजिए, उन पर हानिकारक कीटनाशक और खतरनाक रसायन छिड़क कर नक़ली रंगों से तरो-ताज़ा दिखा कर हर मंडी में बेचा जा रहा है। आम आदमी असहाय है, वो कुछ कर नहीं सकता इसलिए न चाह कर भी अपने परिवार को ये ज़हरीले पदार्थ खिलाने पर मजबूर है। पर्यटन और तीर्थ क्षेत्रों में तो मिलावट का धंधा कई गुना ज़्यादा हो रहा है। क्योंकि विक्रेता के सामने जो ग्राहक खड़ा है वो एक बार ही उसके होटल आया है और अगले दिन लौट जाएगा तो दूसरा ग्राहक आ जाएगा। इसलिए उसे शिकायत नहीं झेलनी पड़ती। 


इस तरह हो रहे पर्यटन विस्फोट ने इन क्षेत्रों के आधारभूत ढांचों की कमर तोड़ दी है। जिसका समाधान शहरीकरण के नए-नए मेगा प्रोजेक्ट बनाना नहीं है। क्योंकि उनसे उस तीर्थाटन या पर्यटन क्षेत्र का नैसर्गिक स्वरूप और आध्यात्मिक चेतना, दोनों का तेज़ी से विनाश होता है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में भारत के ये क्षेत्र एक नासूर बन कर रह जाएँगे। जबकि दुनिया के तमाम देशों ने अपने पर्यटन उद्योग को नियमों के तहत बांधकर रखा है और अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को बिगाड़ने नहीं दिया। अमरीका के पश्चिमी तट पर एक तरफ़ घने पहाड़ और जंगल और दूसरी तरफ़ लहराते समुद्र के बीच हमारी कार तेज़ी से दौड़ रही थी, मुझे भूख लगी तो मेरे मेजबान ने जंगल के भीतर जा रही एक छोटी सड़क पर कार मोड़ दी। कुछ किलोमीटर जंगल पार करने के बाद मुझे ये देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहाँ स्थित खाने-पीने और मनोरंजन का एक बड़ा केंद्र मौजूद था। पर वो समुद्र तट और जंगल के बाद था। इसलिए समुद्र तट का प्राकृतिक सौंदर्य इससे प्रभावित नहीं हुआ था। जबकि केरल में त्रिवेंद्रम का कोवलम बीच या गोवा के समुद्र तट बेतरतीब विकसित हुए होटलों के कारण अपनी प्राकृतिक पहचान खो चुके हैं। आख़िर हम कब जागेंगे?  

Monday, December 29, 2025

बढ़ता धार्मिक पर्यटन और धार्मिक नगरों की चुनौती 

भारत में धार्मिक पर्यटन सदैव से हमारी सांस्कृतिक और आस्था परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रहा है। किंतु पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जिस तीव्र गति से वृद्धि हुई है, उसने धार्मिक नगरों की तस्वीर ही बदल दी है। अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, वृंदावन, उज्जैन, द्वारका, तिरुपति जैसे नगर आज विश्व स्तरीय धार्मिक पर्यटन केंद्रों में बदल चुके हैं। सरकारें भी इसे ‘आस्था से अर्थव्यवस्था’ के सूत्र में जोड़कर पर्यटन को प्रोत्साहन देने के प्रयास में लगी हैं। लेकिन इन प्रयासों के समानांतर कुछ ऐसे प्रश्न भी हैं, जिनसे आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। क्या इस विकास की गति निभाई जा रही है? क्या स्थानीय निवासियों और तीर्थ स्थलों के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखा जा सका है? क्या प्रशासन इतना सक्षम है कि वो त्योहारों और छुट्टियों के समय अतिरिक्त पर्यटकों को संभाल सके?


अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण के बाद देश भर में धार्मिक पर्यटन में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यहाँ प्रतिवर्ष करोड़ों पर्यटक पहुंचेंगे। इसी तरह काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने बनारस की ऐतिहासिक गलियों को व्यवसायिक जीवन दिया है; होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन और हस्तशिल्प उद्योगों को भी नई सांस मिली है। वृंदावन और मथुरा में हर त्योहार अब अंतरराष्ट्रीय आयोजन का रूप ले चुका है। आर्थिक दृष्टि से यह परिवर्तन शुभ संकेत है, रोजगार बढ़े हैं, स्थानीय व्यापार में तेजी आई है और बुनियादी ढाँचे पर निवेश भी हुआ है।

लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इस तेज़ी ने धार्मिक नगरीय संतुलन को डगमगा दिया है। छोटे नगरों की सीमित सड़कों, आवासों और संसाधनों पर अचानक लाखों की भीड़ का दबाव प्रशासन के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। पर्यावरणीय दबाव, कचरा प्रबंधन और जल संकट जैसी समस्याएँ अब इन नगरों के स्थायी साथी बन चुके हैं।


उल्लेखनीय है कि भारत में भीड़ प्रबंधन का ढाँचा अभी भी विकासशील स्तर पर है। चाहे कुंभ मेले का आयोजन हो या अयोध्या में दीपोत्सव, प्रशासनिक तैयारियाँ अक्सर अनुमान से कम पड़ ही जाती हैं। पश्चिमी देशों जैसे इटली, फ्रांस या स्पेन में धार्मिक पर्यटन अत्यधिक संगठित ढंग से संचालित होता है। वेटिकन सिटी या लूर्ड जैसे स्थानों पर पर्यटकों की संख्या भले लाखों में हो, लेकिन वहाँ डिजिटल टिकटिंग, समय-वार प्रवेश प्रणाली, स्पष्ट दिशानिर्देश और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों का जाल पूरी व्यवस्था को सुचारु बनाए रखता है। इन्हीं से प्रेरित हो कर हमारे देश में भी कुछ स्वघोषित गुरुओं के स्थानों पर भी व्यवस्था काफ़ी हद तक सुचारू दिखाई देती है।  


वहीं इसके विपरीत भारत के धार्मिक नगरों में तीर्थयात्रियों का आगमन प्रायः अनियोजित होता है। ट्रेन, बस, सड़कों पर भीड़ एक साथ उमड़ती है जिससे जाम, दुर्घटनाएँ और अव्यवस्था आम हो जाती है। सुरक्षा बलों और प्रशासनिक कर्मचारियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, और अक्सर स्थानीय निवासियों का सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

धार्मिक पर्यटन का यह उभार स्थानीय नागरिकों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। अयोध्या या वाराणसी की गलियों में रहने वाले निवासियों को अब अपने ही घरों तक पहुंचने में कठिनाई होती है। सड़कों पर निरंतर भीड़, बढ़ते वाहन और लगातार चल रहे निर्माण कार्यों ने जीवन-स्तर को प्रभावित किया है। किराए आसमान छू गए हैं, स्थानीय दुकानों की जगह बड़े ब्रांडों ने ले ली है और धार्मिक शांति की जगह अब व्यावसायिक कोलाहल ने ले ली है। धार्मिक नगरों का जो आत्मिक वातावरण कभी लोगों को भीतर तक आस्था से जोड़ता था, वह अब सजावटी प्रकाशों और सेल्फ़ी प्वाइंट्स में खोता जा रहा है। श्रद्धा के स्थलों का ‘पर्यटन स्थल’ में बदल जाना विकास के नाम पर एक सांस्कृतिक ह्रास भी है।


अयोध्या, वाराणसी या वृंदावन जैसे नगरों की आत्मा उनकी प्राचीनता, उनकी पवित्रता और उनके पारंपरिक जीवन में बसती है। लेकिन आज ये नगर तेजी से ‘आधुनिक तीर्थ’ में तब्दील किए जा रहे हैं। चौड़ी सड़कों, चमकीले कॉरिडोर, आधुनिक गेस्टहाउस और मॉल जैसी परियोजनाएं विकास के प्रतीक मानी जा रही हैं। निःसंदेह इनसे सुविधा बढ़ी है, लेकिन इसके साथ-साथ धार्मिक अनुभव का मूल स्वरूप भी धीरे-धीरे बदल गया है।

वह आध्यात्मिक संवेदना, वह साधु-संतों के भजनों की सुगंध और घाटों पर बहती शांति, ये सब अब पर्यटक आकर्षण के दृश्य में सिमट गए हैं। भवनों के रंग, पारंपरिक स्थापत्य और स्थानीय शिल्प को आधुनिक डिज़ाइन ने विस्थापित कर दिया है। यह भीड़ केंद्रित विकास कहीं न कहीं नगरों की ‘आस्था आधारित पहचान’ को बाज़ारीकरण में बदल रहा है।

धार्मिक पर्यटन का बढ़ना अपने आप में बुरा नहीं है। यह सांस्कृतिक एकता, लोक व्यवसाय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब तीर्थस्थलों का विकास केवल संरचनात्मक दृष्टि से किया जाए और उसमें सांस्कृतिक संरक्षण की भावना गायब हो। भारत को पश्चिमी देशों से यह सीखने की जरूरत है कि आध्यात्मिक धरोहर को आधुनिक सुविधाओं के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है।

इसके लिए तीन स्तरों पर ठोस पहल जरूरी है: स्मार्ट प्लानिंग: पर्यटन की पूर्वानुमानित योजना बनाई जाए। डिजिटल टिकटिंग, भीड़ नियंत्रण एप्स और समयबद्ध दर्शनों की व्यवस्था लागू की जाए। स्थानीय सहभागिता: नगर के विकास में स्थानीय निवासियों की राय और सहभागिता सुनिश्चित हो, ताकि विकास उनके जीवन को प्रभावित न करे। सांस्कृतिक संरक्षण: निर्माण कार्यों में पारंपरिक स्थापत्य, स्थानीय कला और जीवन शैली को प्राथमिकता दी जाए, ताकि नगर की आत्मा जीवित रहे।

भारतीय धार्मिक पर्यटन आज देश की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान का नया प्रतीक बन गया है। अयोध्या, काशी, मथुरा, वृंदावन जैसे नगर आस्था की ऊर्जा से भरे हुए हैं, लेकिन उसी आस्था के संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही व्यापक है। यदि हम केवल पर्यटक बढ़ाने पर ध्यान देंगे और तीर्थ के मूल भाव को नजरअंदाज करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन नगरों में केवल चमक देख पाएंगी, वह अनुभूति नहीं, जिसके लिए हमारे पूर्वज तीर्थ यात्रा करते थे। विकास का अर्थ केवल इमारतों का निर्माण नहीं, बल्कि उस भावना को सहेजना है जो हमें भीतर से जोड़ती है। अगर आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच यह संतुलन साध लिया गया, तभी धार्मिक पर्यटन भारत की सांस्कृतिक आत्मा को मजबूत करेगा, न कि उसकी मूल पहचान को मिटाएगा।