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Monday, July 17, 2023

ईडी: कार्यपालिका पर न्यायपालिका की नज़र


प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मौजूदा निदेशक संजय कुमार मिश्रा के कार्यकाल विस्तार को सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध ठहराया है। क्योंकि उनको तीन बार जो सेवा विस्तार दिया गया वो सर्वोच्च न्यायालय के 1997 के आदेश, ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार, सीवीसी एक्ट, दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट व कॉमन कॉज़’ के फ़ैसले के विरुद्ध था। इन सब फ़ैसलों के अनुसार ईडी निदेशक का कार्यकाल केवल दो वर्ष का ही होना चाहिए। इस तरह लगातार सेवा विस्तार देने का उद्देश्य क्या था? इस सवाल के जवाब में भारत सरकार का पक्ष यह था कि श्री मिश्रा ‘वित्तीय कार्रवाई कार्य बल’ (एफ़एटीएफ़) में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं इसलिए इनको सेवा विस्तार दिया जा रहा है। जबकि एफ़एटीएफ़ की वेबसाइट पर ईडी निदेशक का कोई कोई उल्लेख नहीं है। इस पर न्यायाधीशों की टिप्पणी थी कि क्या भारत में कोई दूसरा व्यक्ति इतना योग्य नहीं है जो ये काम कर सके? 



संजय कुमार मिश्रा की कार्य प्रणाली पर लगातार उँगलियाँ उठती रहीं हैं। उन्होंने जितने नोटिस भेजे, छापे डाले, गिरफ़्तारियाँ की या संपत्तियाँ ज़ब्त कीं वो सब विपक्ष के नेताओं के ख़िलाफ़ थीं। जबकि सत्तापक्ष के किसी नेता, विधायक, सांसद व मंत्री के ख़िलाफ़ कोई करवाई नहीं की। इससे भी ज़्यादा विवाद का विषय यह था कि विपक्ष के जिन नेताओं ने ईडी की ऐसी करवाई से डर कर भाजपा का दामन थाम लिया, उनके विरुद्ध आगे की करवाई फ़ौरन रोक दी गई। ये निहायत अनैतिक कृत्य था। जिसका विपक्षी नेताओं ने तो विरोध किया ही, देश-विदेश में भी ग़लत संदेश गया। सोशल मीडिया पर भाजपा को ‘वाशिंग पाउडर’ कह कर मज़ाक़ बनाया गया। अगर श्री मिश्रा निष्पक्ष व्यवहार करते तो भी उनके कार्यकाल का विस्तार अवैध ही था, पर फिर इतनी उँगलियाँ नहीं उठतीं। इन्हीं सब कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने उनके सेवा विस्तार को अवैध करार दिया और भारत सरकार को निर्देश दिया कि वो 31 जुलाई 2023 तक ईडी के नये निदेशक को नियुक्त कर दें। इसे देश-विदेश में एक बड़ा फ़ैसला माना गया है। हालाँकि सेवा विस्तार के सरकारी अध्यादेश को निर्धारित प्रक्रिया के तहत पालन करने की छूट भी भारत सरकार को दी गई। मनमाने ढंग से अब सरकार ये सेवा विस्तार नहीं दे सकती। 



सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले का देश की नौकरशाही ने बहुत स्वागत किया है। उनकी इस भावना का वैध कारण भी है। कोई भी व्यक्ति जब आईएएस, आईपीएस या आईआरएस की नौकरी शुरू करता है तो उसे इस बात उम्मीद होती है कि अपने सेवा काल के अंत में, वरिष्ठता के क्रम से, अगर संभव हुआ तो वो सर्वोच्च पद तक पहुँचेगा। परंतु जब एक ही व्यक्ति को इस तरह बार-बार सेवा विस्तार दिया जाता है तो उसके बाद के बैच के अधिकारी ऐसे पदों पर पहुँचने से वंचित रह जाते हैं। जिससे पूरी नौकरशाही में हताशा फैलती है। यह सही है कि ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर किस व्यक्ति को तैनात करना है, ये फ़ैसला प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय नियुक्ति समिति करती है। पर इसके लिए भी कुछ नियम और प्रक्रिया निर्धारित हैं। जैसे इस समिति को विचारार्थ संभावित उम्मीदवारों की जो सूची भेजी जाती है उसे केंद्रीय सतर्कता आयोग छान-बीन करके तैयार करता है। लेकिन हर सरकार अपने प्रति वफादार अफ़सरों को तैनात करने की लालसा में कभी-कभी इन नियमों की अवहेलना करने का प्रयास करती है। इसी तरह के संभावित हस्तक्षेप को रोकने के लिए दिसंबर 1997 में जैन हवाला कांड के मशहूर फ़ैसले में विस्तृत निर्देश दिये गये थे। 



इन निर्देशों की अवहेलना, जैसे अब मोदी सरकार ने की है वैसे ही 2014 में मनमोहन सिंह सरकार ने भी की थी। जब उसने तमिलनाडु की पुलिस महानिदेशक अर्चना रामासुंदरम को पिछले दरवाज़े से ला कर सीबीआई का विशेष निदेशक नियुक्त कर दिया था। इस बार की ही तरह 2014 में भी मैंने इस अवैध नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। मेरी उस याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने अर्चना रामासुंदरम की नियुक्ति को ख़ारिज कर दिया था। 


उधर गृह मंत्री अमित शाह ने ईडी वाले मामले में फ़ैसला आते ही ट्विटर पर बयान दिया कि विपक्षी दल ख़ुशी न मनाएँ क्योंकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध ईडी की मुहिम जारी रहेगी। उनका ये बयान स्वागत योग्य है यदि ईडी की ये मुहिम बिना भेद-भाव के सत्तापक्ष और विपक्ष के संदेहास्पद लोगों के ख़िलाफ़ जारी रहती है। जहां तक मेरा प्रश्न है मेरा कभी कोई राजनैतिक उद्देश्य नहीं रहता। चूँकि सीबीआई, सीवीसी, ईडी आदि को अधिकतम स्वायत्तता दिलवाने में मेरी भी अहम भूमिका रही थी। इसलिए जब भी कोई सरकार ऐसे मामलों में क़ानून के विरुद्ध कुछ करती है तो मैं उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देना अपना कर्तव्य समझता हूँ।



सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले से उत्साहित हो कर देश के मीडिया में एक बहस चल पड़ी है कि अगर सर्वोच्च न्यायालय ने संजय कुमार मिश्रा के कार्यकाल के विस्तार को अवैध माना है तो श्री मिश्रा द्वारा इस दौरान लिये गये सभी निर्णय भी अवैध क्यों न माने जाएँ? इस तरह के सुझाव मुझे भी देश भर से मिल रहे हैं कि मैं इस मामले में फिर से सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाऊँ। फ़िलहाल मुझे इसकी ज़रूरत महसूस नहीं हो रही। कारण, सर्वोच्च न्यायालय के ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ फ़ैसले में पहले से ही इस बात का सुझाव है कि ईडी व सीबीआई के कार्यकलापों की एक नोडल एजेंसी द्वारा हर महीने समीक्षा की जाएगी। इस समिति की अध्यक्षता, भारत के गृह सचिव करेंगे। जिनके अलावा इसमें सीबीडीटी के सदस्य (इन्वेस्टीगेशन), महानिदेशक राजस्व इंटेलिजेंस, ईडी व सीबीआई के निदेशक रहेंगे, विशेषकर जिन मामलों में नेताओं और अफ़सरों के आपराधिक गठजोड़ के आरोप हों। ये नोडल एजेंसी हर महीने ऐसे मामलों का मूल्यांकन करेगी। अगर सर्वोच्च न्यायालय के इस सुझाव को सरकार अहमियत देती है तो ऐसे विवाद खड़े ही नहीं होंगे। ईडी और सीबीआई दो सबसे महत्वपूर्ण जाँच एजेंसियाँ हैं जिनकी साख धूमिल नहीं होनी चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हर सरकार इन एजेंसियों का दुरुपयोग करने की कोशिश करती हैं। पर इससे सरकार और ये एजेंसियाँ नाहक विवादों में घिरते रहते हैं और हर अगली सरकार फिर पिछली सरकार के विरुद्ध बदले की भावना से काम करती है, जो नहीं होना चाहिए।
    

Monday, November 21, 2022

इतने बड़े घोटालों की जाँच में पक्षपात क्यों हो रहा है?



बैंकों का धन लूटकर विदेशों में धन शोधन करने वाले बड़े औद्योगिक घरानों की जाँच को लेकर जाँच एजेंसियाँ आए दिन विवादों में घिरी रहती हैं। मामला नीरव मोदी का हो, विजय माल्या का हो या मेहुल चोक्सी का हो, इन भगोड़े वित्तीय अपराधियों को जेल की सलाख़ों के पीछे भेजने में हमारे देश की बड़ी जाँच एजेंसियाँ लगातार विफल रही हैं। ऐसी नाकामी के कारण ही इन एजेंसियों पर चुनिन्दा आरोपियों के ख़िलाफ़ ही कारवाई करने के आरोप भी लगते रहे हैं। 


पिछले दिनों कानपुर की रोटोमैक पेन कंपनी के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो ने 750 करोड़ रुपए से अधिक के बैंक फ्रॉड का मामला दर्ज किया है। पेन बनाने वाली इस नामी कंपनी पर आरोप है कि इन्होंने कई बैंकों से ऋण लेकर आज तक नहीं लौटाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 7 बैंकों के समूह के लगभग 2919 करोड़ रुपये इस कंपनी पर बकाया हैं। ग़ौरतलब है कि बैंक फ्रॉड का यह मामला नया नहीं है। बैंक को चूना लगाने वाली यह कंपनी जून 2016 में ही नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) घोषित कर दी गई थी। छह साल बाद 2022 में जब सीबीआई द्वारा इस कंपनी पर कार्यवाही शुरू हुई तब तक कंपनी के कर्ताधर्ता विक्रम कोठारी का निधन भी हो चुका था। जाँच और कार्यवाही में देरी के कारण बैंकों को करोड़ों का चूना लग चुका था। 


देश में कोठारी जैसे अनेक लोग हैं जो बैंक से लोन लेते हैं। यदि वो छोटे-मोटे लोन लेने वाले व्यापारी होते हैं तो उनके ख़िलाफ़ बहुत जल्द कड़ी कार्यवाही की जाती है। परंतु आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि बैंकों के धन की बड़ी चोरी करने वाले आसानी से जाँच एजेंसियों के हत्थे नहीं चढ़ते। इसका कारण, बैंक अधिकारी और व्यापारी की साँठ-गाँठ होता है। ऋण लेने वाला व्यापारी बैंक के अधिकारी को मोटी रिश्वत के भार के तले दबा कर अपना काम करा लेता है और किसी को कानों-कान खबर नहीं होती। जब ऋण और उस पर ब्याज मिला कर रक़म बहुत बड़ी हो जाती है तो तेज़ी से कार्यवाही करने का नाटक किया जाता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 



रोटोमैक कांड के आरोपियों की सूची में कानपुर का एक और समूह है जिस पर जाँच एजेंसियों की कड़ी नज़र नहीं पड़ी। आरोप है कि इस समूह ने विभिन्न बैंकों के साथ सात हज़ार करोड़ से अधिक रुपये का घोटाला किया है। इस समूह ने फ़र्ज़ी कंपनियों का जाल बिछा कर बैंकों के साथ धोखा किया है। इस समूह के मुख्य आरोपीयों, उदय देसाई और सरल वर्मा की कंपनियाँ - एफटीए एचएसआरपी सोल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड और एग्रोस इम्पेक्स इंडिया लिमिटेड, रोटोमैक कांड के सह-अभियुक्त भी हैं। इसके चलते इनकी गिरफ़्तारी भी हुई थी। लेकिन कोविड और स्वास्थ्य कारणों के चलते इन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ज़मानत दी गई। ग़ौरतलब है कि सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और गंभीर धोखाधड़ी जाँच कार्यालय (एसएफ़आईओ) में इस समूह के ख़िलाफ़ 2019 से विभिन्न बैंकों द्वारा 8 एफ़आईआर दायर हो चुकी हैं। परंतु वर्मा और देसाई बंधुओं पर आज तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई।  


उदय देसाई ने दिल्ली उच्च न्यायालय में विदेश जाने की गुहार लगा कर एक याचिका दायर की। कोर्ट ने जुलाई 2022 के अपने आदेश में याचिका रद्द करते हुए इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया कि विभिन्न जाँच एजेंसियों में लंबित पड़े अनेक गंभीर मामलों के बावजूद आरोपियों को केवल एक ही बार पूछताछ के लिए बुलाया गया। जाँच एजेंसियों ने सघन जाँच और पूछताछ की शुरुआत ही नहीं की। 



सोचने वाली बात है कि हज़ारों करोड़ के घोटाले के आरोपियों को केवल एक ही बार बुला जाँच एजेंसियों को इस बात का इत्मीनान हो गया कि आरोपियों को दोबारा पूछताछ के लिए नहीं बुलाना चाहिए? क्या एक ही बार में पूछताछ से जाँच एजेंसियाँ संतुष्ट हो गई? क्या आरोपी एक ही बार में एजेंसियों के ‘कड़े सवालों’ का संतोषजनक जवाब दे पाये? क्या ये प्रमुख जाँच एजेंसियाँ सभी आरोपियों से ऐसे ही, केवल एक बार ही जाँच और पूछताछ करती हैं? इस से कहीं छोटे मामलों में विपक्षी नेताओं या नामचीन लोगों के ख़िलाफ़ भी इन एजेंसियों का क्या यही रवैया रहता है? क्या इन आरोपियों की करोड़ों संपत्ति को ज़ब्त किया गया? क्या इनकी बेनामी संपत्तियों तक ये एजेंसियाँ पहुँच पाईं? सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमयी मृत्यु के बाद जिस तरह बॉलीवुड के सितारों को लगातार पूछताछ के लिए बुलाया गया था क्या वैसा कुछ इनके भी साथ हुआ? अगर नहीं तो क्यों नहीं? 


केंद्र में जो भी सरकार रही हो, उस पर इन जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगता रहा है। जैसा हमने पिछली बार भी लिखा था कि मौजूदा सरकार पर विपक्ष द्वारा यह आरोप बार-बार लगातार लग रहा है कि वो कुछ चुनिन्दा लोगों पर, अपने राजनैतिक प्रतीद्वंदियों या अपने विरुद्ध खबर छापने वाले मीडिया प्रथिष्ठानों के ख़िलाफ़ इन एजेंसियों का लगातार दुरुपयोग कर रही है। जाँच एजेंसियों में लंबित पड़े अन्य मामलों को छोड़ अगर देसाई और वर्मा बंधुओं के मामले को ही लें तो यह बात सच साबित होती है। 


दिल्ली के ‘कालचक्र समाचार ब्यूरो’ के प्रबंधकीय संपादक रजनीश कपूर को जब एफटीए एचएसआरपी सोल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड और एग्रोस इम्पेक्स इंडिया लिमिटेड के घोटालों से संबंधित सभी दस्तावेज़ मिले तो उन्होंने इन आरोपों को सही पाया। कपूर ने 6 मई 2022 को इन सभी एजेंसियों को सप्रमाण पत्र लिख कर देसाई और वर्मा द्वारा किए गए हज़ारों करोड़ रुपये के घोटालों की जाँच की माँग की थी। 


ऐसे में अपनी ‘योग्यता’ के लिए प्रसिद्ध देश की प्रमुख जाँच एजेंसियाँ शक के घेरे में आ जाती हैं। इन एजेंसियों पर विपक्ष द्वारा लगाए गए ‘ग़लत इस्तेमाल’ के आरोप सही लगते हैं। मामला चाहे छोटे घोटाले का हो या बड़े घोटाले का, एक ही अपराध के लिए दो मापदंड कैसे हो सकते हैं? यदि देश का आम आदमी या किसान बैंक द्वारा लिये गये ऋण चुकाने में असमर्थ होता है तो बैंक की शिकायत पर पुलिस या जाँच एजेंसियाँ तुरंत कड़ी कार्यवाही करती हैं। उसकी दयनीय दशा की परवाह न करके कुर्की तक कर डालती हैं। परंतु बड़े घोटालेबाजों के साथ ऐसी सख़्ती क्यों नहीं बरती जाती? 


घोटालों की जाँच कर रही एजेंसियों का निष्पक्ष होना बहुत ज़रूरी है। एक जैसे अपराध पर, आरोपी का रुतबा देखे बिना, अगर एक सामान कार्यवाही होती है तो जनता के बीच ऐसा संदेश जाता है कि जाँच एजेंसियाँ अपना काम स्वायत्तता और निष्पक्ष रूप से कर रहीं हैं। सिद्धांत ये होना चाहिये कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। चाहे वो किसी भी विचारधारा या राजनैतिक दल का समर्थक क्यों न हो। क़ानून अपना काम क़ानून के दायरे में ही करेगा।