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Monday, May 4, 2026

किन्नरों को जबरन वसूली का अधिकार नहीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक किन्नर की याचिका पर नेग के नाम पर जबरन वसूली को ग़ैर क़ानूनी करार दिया है। अदालत ने इस तरह की वसूली को भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत अपराध बताया है। यह केस उत्तर प्रदेश के गौंडा ज़िले के किन्नर रेखा देवी की याचिका पर सुना जा रहा था। जिसमें रेखा देवी ने अपनी जजमानी का इलाक़ा निर्धारित करने की अदालत से माँग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि इलाक़ों की भौगोलिक सीमा स्पष्ट ना होने के कारण, प्रायः किनारों के अलग-अलग समूहों के बीच झड़पें व हिंसा तक होती है। पर अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए उक्त निर्णय सुनाया। 



यह सही है कि घर में ख़ुशी के मौक़े पर, जैसे पुत्र या पुत्री का जन्म, विवाह या नए घर में गृह-प्रवेश के अवसर पर किन्नर बधाई देने आते हैं और नाच गा कर अपना नेग माँगते हैं। भारत में यह अनूठी प्रथा हज़ारों सालों से चली आ रही है। इसकी जड़ें पौराणिक काल में हैं।


सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से स्वीकृत कथा रामायण से जुड़ी है। जब भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या से जाते हैं, तो वे लोगों (पुरुषों और स्त्रियों) को वापस लौट जाने को कहते हैं। किन्नर (जो न पुरुष हैं न स्त्री) इस आदेश से खुद को बंधा नहीं मानते और राम की प्रतीक्षा में वहीं रह जाते हैं। 14 वर्ष बाद राम लौटते हैं तो उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर राम उन्हें वरदान देते हैं कि शुभ अवसरों पर उनका आशीर्वाद विशेष रूप से फलीभूत होगा। इसी वरदान को बधाई की परंपरा का मूल माना जाता है। किन्नर समुदाय गाते-बजाते, तालियां बजाते हुए आशीर्वाद देते हैं और बदले में नेग (दक्षिणा या उपहार) लेते हैं। यह मान्यता है कि उनकी उपस्थिति और आशीर्वाद नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है और सौभाग्य लाती है। यह कथा वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस दोनों में मिलते हैं।



इसी तरह महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप (तीसरे लिंग वाला) और शिखंडी जैसे पात्र तीसरे लिंग की मान्यता दिखाते हैं। लगभग 400 ईसा पूर्व लिखे गए कामसूत्र में किन्नरों का स्पष्ट उल्लेख है। वेदों, पुराणों और अन्य शास्त्रों में भी किन्नरों का जिक्र मिलता है। किन्नरों को गायन, नृत्य और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा माना जाता था। कई विद्वान और स्रोत इस समुदाय की उपस्थिति को 4000 वर्ष से अधिक पुरानी बताते हैं।


मुगल काल में हिजड़ों की भूमिका और संगठित हुई। वे हरम की रखवाली, दरबारी सेवाएं और प्रशासन में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। बधाई की परंपरा इस काल में अधिक प्रचलित और संरचित रूप में चली, जहां वे शुभ अवसरों पर नृत्य-गान करके आशीर्वाद देते और नेग प्राप्त करते थे। दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य में उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति मजबूत थी।



अंग्रेज़ों ने 1871 के ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के तहत किन्नरों को अपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनकी पारंपरिक आजीविका और सम्मान प्रभावित हुआ। आज़ादी के बाद यह क़ानून समाप्त कर दिया गया। इस तरह बधाई-नेग की परंपरा उत्तर भारत, खासकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में आज भी जीवित है। कुछ राज्यों में सरकार ने नेग की दरें तय करने की कोशिश भी की है। पर उसमें विशेष कामयाबी नहीं मिली। 



इसी अस्पष्टता का लाभ उठा कर किन्नर समुदाय प्रायः अपने जजमानों से जबरन वसूली करता है। कभी-कभी तो वसूली का तरीका बहुत अभद्र होता है। जिसमें जजमान के परिवार के सामने निर्वस्त्र हो जाना, भद्दी गालियाँ देना, बद्दुआएँ देना और डराना धमकाना। कभी-कभी यह सब नाटक इस सीमा तक हो जाता है कि भयभीत जजमान अपनी आर्थिक हैसियत से कई गुना ज़्यादा दे कर पिंड छुड़ाता है। ऐसी वसूली को ‘नेग’ कतई नहीं कहा जा सकता। ये सरासर गुंडई और अवैध वसूली का तरीका है, जिस पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन को लगाम लगानी चाहिए। इसके साथ ही कई बार ऐसी घटनाएँ भी सामने आती हैं जब बाकायदा सम्पूर्ण पुरुष होते हुए भी मर्द, स्त्री का रूप धारण कर किन्नर होने का दावा करते हैं और इस वसूली में अपनी ताक़त दिखाते हैं। 


हमारी सामाजिक मान्यताओं के अनुसार किन्नरों का शुभ अवसरों पर आकर गाना बजाना और बधाई देना शुभ माना जाता है। समाज इनका ख़ुशी से स्वागत करता है और ऐसे अवसरों पर अड़ोसी-पड़ोसी जुट कर इनके साथ हास-परिहास भी करते हैं। ये एक स्वस्थ परंपरा है। प्रायः छोटे शहरों और कस्बों में किन्नरों के समूह कई पीढ़ियों तक अपने जजमान परिवारों से जुड़े रहते हैं और उनकी सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद देते हैं। देखा जाए तो सभी किन्नर संपन्न नहीं होते। वे अभावों में पलते हैं। उनकी आर्थिक, शैक्षिक या स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का उचित इंतज़ाम नहीं होता। फिर भी वे पारस्परिक सहयोग से अपना जीवन यापन कर लेते हैं। ऐसे में किन्नरों को नाचने गाने या भीख मांगने से हटा कर छोटे व्यवसायों या नौकरियों में लगाने की ज़िम्मेदारी, सरकार और समाज दोनों की है। जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। पर आपराधिक तरीके से जबरन वसूली करने वाले किन्नरों से परिवारों को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी स्थानीय पुलिस को तत्परता से निभानी चाहिए, जबकि ऐसा नहीं होता। इस समस्या को भी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है।   

Monday, May 31, 2021

सुशील कुमार कांड: टूटना भरोसे का


भारत के ध्वज को अपने कंधे पर गर्व से लिए फ़ोटो में दिखाई देने वाले मशहूर पहलवान सुशील कुमार का नाम पिछले दिनों एक अन्य पहलवान सागर धंकड़ के हत्याकांड से जोड़ा गया और उसकी गिरफ़्तारी भी हुई। असलियत क्या है यह तो जाँच का विषय है। लेकिन यहाँ चाणक्य पंडित की एक बात याद आती है, उनके अनुसार विश्वासघात विष के समान होता है। इस बहुचर्चित हत्याकांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ। यहाँ एक व्यक्ति का दूसरे से नहीं बल्कि गुरु शिष्य परम्परा का विश्वासघात हुआ है।
 


कुश्ती जगत से सम्बंधित किसी भी युवा या वरिष्ठ पहलवान से पूछा जाए तो सुशील कुमार कुश्ती जगत के एक आदर्श के रूप में पूजे जाते रहे हैं। लेकिन इस हत्याकांड में सुशील का नाम आते ही मानो सभी का विश्वास टूट सा गया है। 2008 में ओलम्पिक विजेता बने सुशील कुमार उभरते हुए पहलवानों के आदर्श थे। तभी की बात है कि सागर धंकड़ नाम के दिल्ली के एक युवा पहलवान ने तय कर लिया कि वो भी कुश्ती की शिक्षा लेकर देश का नाम रोशन करेगा। दिल्ली पुलिस के सिपाही के इस बेटे ने सुशील कुमार को अपना गुरु मान लिया और उनसे इस खेल की ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया। 



कुश्ती जगत के लोगों के अनुसार सुशील कुमार जब एक युवा पहलवान था तब वह कुश्ती के प्रति बहुत समर्पित था। उन दिनों वह हर समय अखाड़े में रह कर खूब ट्रेनिंग करता था। उसकी नज़र भी अर्जुन की नज़र की तरह ओलम्पिक के पदक पर ही गढ़ी हुई थी। खूब मेहनत और मशक़्क़त का ही नतीजा है कि उसे 2008 और फिर उसके बाद लगातार कई पदक मिले जिससे कुश्ती के खेल में देश का नाम रोशन हुआ।


मीडिया में सागर की हत्या के पीछे एक मकान के किराए की बात का काफ़ी ज़िक्र हो रहा है। पुलिस के अनुसार सागर दिल्ली के जिस मकान में रह रहा था वह सुशील की पत्नी के नाम था। कुछ महीनों से किराया न दे पाने के कारण इस हत्या को अंजाम दिया गया। ग़ौरतलब है कि पिछले साल से लॉकडाउन के चलते कई ऐसे मकान मालिक हैं जो अपने किराएदारों से किराया देने पर ज़ोर नहीं दे रहे। सागर धंकड़ भी ‘बेरोज़गार’ था, तो वह किराया कहाँ से दे पाता? पर केवल किराया न दे पाने के कारण ही उसकी हत्या कर देना, यह बात गले नहीं उतरती। 


किसी ने ठीक ही कहा है कि शौहरत को पचा पाना बहुत कठिन होता है। सुशील के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। कुश्ती जगत में भारत का नाम कई बार रौशन करने के बाद, एक साधारण परिवार से आए सुशील कुमार एक बेहद ‘सुशील’ व्यक्ति थे। एक बार बाबा रामदेव के बिजवासन फार्म हाउस पर जब वो मुझ से मिला और बाबा ने मेरा परिचय करवाया तो सुशील ने तपाक से मेरे पैर छुए। वो चाहता तो प्रणाम करके भी काम चला लेता। पर ये उसकी विनम्रता ही थी । 


पर शायद उसे अपनी शौहरत बहुत समय तक रास नहीं आई। भारत सरकार के रेल मंत्रालय की नौकरी और फिर दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम के सह निदेशक पद की नौकरी के बावजूद सुना है कि सुशील कुमार ने खुद को कई और धंधों में शामिल कर लिया था। इन धंधों में सबसे ख़तरनाक धंधा था विवादित प्रॉपर्टी में फ़ैसले करवाना। 


यहाँ इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि दिल्ली के पहलवानों का बहुत कम प्रतिशत ऐसे पहलवानों का है जो पहलवानी करने के साथ-साथ दूसरे धंधों में भी शामिल हों। फिर वो चाहे अभिनेताओं के, व्यापारियों के या महंगे होटलों में ‘बाउंसर’ बनना ही क्यों न हो। वे यही करते हैं। ऐसे दूसरे धंधे केवल वही पहलवान करते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। ज़्यादातर पहलवान तो अपनी कुश्ती के अभ्यास में ही लगे रहते हैं और मस्त रहते हैं। वे न तो किसी प्रकार के नशे का सेवन करते हैं और न ही ग़लत संगत में रहते हैं। सुशील कुमार जैसे पहलवान जिसके पास करोड़ों रुपया और शोहरत थी उससे ऐसी उम्मीद शायद ही किसी को होगी ।         


दिल्ली जैसे बड़े शहरों में यह आम बात है कि जब किसी महंगे इलाक़े में कोई मकान, दुकान या फार्म इत्यादि विवादित हो जाते हैं। तो इन विवादों का समाधान या तो राजनैतिक बल या फिर बाहुबल से ही निकलता है। सुशील कुमार के पास ये दोनों बल थे। बस फिर क्या होना था? कुछ लोगों के बहकावे में आने के बाद पिछले कुछ सालों में सुशील ने भी अपने इसी काम का सेटअप चालू कर दिया। 


जानकारों की मानें तो दिल्ली के मॉडल टाउन के जिस मकान से सागर धंकड़ को हत्या वाली रात उठाया गया था, उस विवादित मकान पर पहले सुशील कुमार का ही क़ब्ज़ा था। लेकिन किसी दूसरे गैंग ने उस मकान को अपने क़ब्ज़े में लेकर सागर को उस मकान में रहने के लिए रख दिया था। यह दोनों गैंग के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई थी। जो सागर के लिए जानलेवा बन गई। जिसके बाद गर्व से भारत का ध्वज उठाने वाले सुशील कुमार को अपना मुँह छिपा कर रहने पर मजबूर होना पड़ा। अपनी गिरफ़्तारी से पहले वो कई हफ़्तों तक पुलिस को चकमा देता रहा।


सुशील की गिरफ़्तारी के बाद कई ऐसे तथ्य और सामने आए हैं जिनसे यह साबित होता है कि सुशील का कुख्यात अपराधियों के साथ भी उठना बैठना हो चुका था। वो इस ग़ैरक़ानूनी दुनिया, जिसे आम भाषा में अंडरवर्ल्ड कहा जाता है, का एक अहम हिस्सा बन चुका था। सच्चाई क्या है यह तो समय ही बताएगा। लेकिन जिस तरह से सुशील-सागर के बीच गुरु-शिष्य का भरोसे टूटा, वह सभी के मन में कई सवाल खड़े करता है। ऐसी क्या मजबूरी थी कि सुशील जैसे अंतराष्ट्रीय ख्याति के पहलवान को ये जोखिम भरा कदम उठाना पड़ा? कहावत है कि ‘फलदार पेड़ और गुणवान व्यक्ति ही झुकते हैं, सूखा पेड़ और मूर्ख व्यक्ति कभी नहीं झुकता’। कद्र तो किरदार की होती है, वरना तो कद में साया भी इंसान से बड़ा होता है।