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Monday, July 13, 2020

पुलिसवालों की पीड़ा समझिए

कानपुर में जिस तरह विकास दुबे ने 8 पुलिसवालों की निर्मम हत्या की उससे प्रदेश की ही नहीं देश भर के पुलिसकर्मियों में आक्रोश है। इस पूरे घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश शासन के कुछ वरिष्ठ  अधिकारियों और नेताओं की भूमिका पर तमाम सवाल उठ रहे हैं। जिन्होंने इस जघन्य कांड के पहले और बाद भी विकास दुबे की मदद की। अभी बहुत सारे तथ्य सामने आने बाक़ी हैं जिन्हें दबाने के उद्देश्य से ही विकास दुबे को मारा गया। 


इसी संदर्भ में पुलिसवालों की तरफ़ से ये विचरोतेजक पोस्ट सोशल मीडिया पर आई है। 

मैं पुलिस हूँ...

मैं जानता था कि फूलन देवी ने नरसंहार किया है। मैं जानता था कि शाहबुद्दीन ने चंद्रशेखर प्रसाद के तीन बेटों को मारा है। मैं जानता था कि कुलदीप सेंगर का चरित्र ठीक नही है और उसने दुराचार किया है। मैं जानता था कि मलखान सिंह बिशनोई ने भँवरी देवी को मारा है। मैं जानता हूँ की दिल्ली के दंगो में अमानतुल्लाह खान ने लोगों को भड़काया। मैं जानता हूँ कि सैयद अली शाह गिलानी, यासीन मालिक, मीरवाज उमर फारूक आंतंकवादियो का साथ देते हैं।  लेकिन संविधान ने बोला की चुप ये सभी नेता है इनके बॉडीगार्ड बनो में बना क्यूँकि मैं पुलिस हूँ। आपको भी पता था की इशरत जहाँ, तुलसी प्रजापति आतंकवादी थे लेकिन फिर भी आपने हमारे वंजारा साहेब को कई सालों तक जेल में रखा। मैं चुप रहा क्योंकि में पुलिस हूँ। कुछ सालों पहले हमने विकास दुबे जिसने एक नेता का ख़ून किया था को आपके सामने प्रस्तुत किया था लेकिन गवाह के अभाव में आपने उसे छोड़ दिया था, मैं चुप रहा क्योंकि में पुलिस हूँ।


लेकिन माईलॉर्ड विकास दुबे ने इस बार ठाकुरों को नही, चंद्रशेखर के बच्चों को नही, भँवरी देवी को नही किसी नेता को नही मेरे अपने 8 पुलिस वालों की बेरहमी से हत्या की थी, उसको आपके पास लाते तो देर से ही सही लेकिन आप मुझे उसका बॉडीगार्ड बनने पर ज़रूर मजबूर करते इसी उधेड़बुन और डर से मैंने रात भर उज्जैन से लेकर कानपुर तक गाड़ी चलायी और कब नींद आ गयी पता ही नही चला और ऐक्सिडेंट हो गया और उसके बाद की घटना सभी को मालूम है। 


माईलॉर्ड कभी सोचिएगा की अमेरिका जैसे सम्पन्न और आधुनिक देश में पाँच सालों में पुलिस ने 5511 अपराधियों का एंकाउंटर किया वहीं हमारे विशाल जनसंख्या वाले देश में पिछले पाँच साल में 824 एंकाउंटर हुए और सभी पुलिस वालों की जाँच चल रही है।  


माईलॉर्ड मैं यह नही कह रहा हूँ की एंकाउंटर सही है लेकिन बड़े बड़े वकीलों द्वारा अपराधियों को बचाना फिर उनका राजनीति में आना और फिर आपके द्वारा हमें उनकी सुरक्षा में लगाना अब बंद होना चाहिये, सच कह रहा हूँ अब थकने लगे हैं हम, संविधान जो कई दशकों पहले लिखा गया था उसमें अब कुछ बदलाव की आवश्यकता है यदि बदलाव नही हुए तो ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी और हम और आप कुछ दिन हाय तौबा करने के बाद चुप हो जाएँगे।


मूल में जाइए और रोग को जड़ से ख़त्म कीजिए, रोग हमारी क़ानून प्रणाली में है जिसे सही करने की आवश्यकता है अन्यथा देर सवेर ऐसी घटनाएं को सुनने के लिए तैयार रहिये 


पुलिस को स्वायत्ता दीजिए। हमें इन नेताओं के चंगुल से बचाइये ताकि देश और समाज अपने आप को सुरक्षित महसूस कर सके।


प्रार्थी 

नेताओं की कठपुतली 

हिंदुस्तान की पुलिस


यह बड़े दुख और चिंता की बात है कि कोई भी राजनैतिक दल पुलिस व्यवस्था के मौजूदा स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहता। इसलिए न सिर्फ पुलिस आयोगों और समितियों की सिफारिशों की उपेक्षा कर दी जाती है बल्कि आजादी के 73 साल बाद भी आज देश औपनिवेशिक मानसिकता वाले संविधान विरोधी पुलिस कानून को ढो रहा है। इसलिए इस कानून में आमूलचूल परिवर्तन होना परम आवश्यक है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पुलिस को जनोन्मुख होना ही पड़ेगा। पर राजनेता ऐसा होने दें तब न। 


आज हर सत्ताधीश राजनेता पुलिस को अपनी निजी जायदाद समझता है। नेताजी की सुरक्षा, उनके चारो ओर कमांडो फौज का घेरा, उनके पारिवारिक उत्सवों में मेहमानों की गाडि़यों का नियंत्रण, तो ऐसे वाहियात काम है ही जिनमें इस देश की ज्यादातर पुलिस का, ज्यादातर समय जाया होता है। इतना ही नहीं अपने मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए या उन्हें नियंत्रित करने के लिए पुलिस का दुरूपयोग अपने कार्यकर्ताओं और चमचों के अपराधों को छिपाने में भी किया जाता है। स्थानीय पुलिस को स्थानीय नेताओं से इसलिए भय लगाता है क्योंकि वे जरा सी बात पर नाराज होकर उस पुलिस अधिकारी या पुलिसकर्मी का तबादला करवाने की धमकी देते हैं और इस पर भी सहयोग न करने वाले पुलिस अधिकारी का तबादला करवा देते हैं। इसका नतीजा ये हुआ है कि अब निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के बीच तेजी से जातिवाद फैलता जा रहा है। अपनी जाति के लोगों को संरक्षण देना और अपनी जाति के नेताओं के जा-बेजा हुक्मों को मानते जाना आज प्रांतीय पुलिस के लिए आम बात हो गई है। खामियाजा भुगत रही है वह जनता जिसके वोटों से ये राजनेता चुने जाते हैं। किसी शहर के बुजुर्ग और प्रतिष्ठित आदमी को भी इस बात का भरोसा नहीं होता कि अगर नौबत आ जाए तो पुलिस से उनका सामना सम्माननीय स्थिति में हो पाएगा। एक तरफ तो हम आधुनिकरण की बात करते हैं और जरा-जरा बात पर सलाह लेने पश्चिमी देशों की तरफ भागते हैं और दूसरी तरफ हम उनकी पुलिस व्यवस्था से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं। वहां पुलिस जनता की रक्षक होती है, भक्षक नहीं। लंदन की भीड़ भरी सड़क पर अक्सर पुलिसकर्मियों को बूढ़े लोगों को सड़क पार करवाते हुए देखा जा सकता है। पश्चिम की पुलिस ने तमाम मानवीय क्रिया कलापो से वहां की जनता का विश्वास जीत रखा है। जबकि हमारे यहां यह स्वप्न जैसा लगेगा।


पुलिस आयोग की सिफारिश से लेकर आज तक बनी समितियों की सिफारिशों को इस तरह समझा जा सकता है; पुलिस जनता के प्रति जवाबदेह हो। पुलिस की कार्यप्रणाली पर लगातार निगाह रखी जाए। उनके प्रशिक्षण और काम की दशा पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए। उनका दुरूपयोग रोका जाए। उनका राजनीतिकरण रोका जाए। उन पर राजनीतिक नियंत्रण समाप्त किया जाए। उनकी जवाबदेही निर्धारित करने के कड़े मापदंड हों। पुलिस महानिदेशकों का चुनाव केवल राजनैतिक निर्णयों से प्रभावित न हों बल्कि उसमें न्यायपालिका और समाज के प्रतिष्ठित लोगों का भी प्रतिनिधित्व हो। इस बात की आवश्यकता महसूस की गई कि पुलिस में तबादलों की व्यवस्था पारदर्शी हो। उसके कामकाज पर नजर रखने के लिए निष्पक्ष लोगों की अलग समितियां हों। पुलिस में भर्ती की प्रक्रिया में व्यापक सुधार किया जाए ताकि योग्य और अनुभवी लोग इसमें आ सकें। आज की तरह नहीं जब सिफारिश करवा कर या रिश्वत देकर अयोग्य लोग भी पुलिस में भर्ती हो जाते हैं। जो सिपाही या इन्सपेक्टर मोटी घुस देकर पुलिस की नौकरी प्राप्त करेगा उससे ईमानदार रहने की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? पुलिस जनता का विश्वास जीते। उसकी मददगार बनें। अपराधों की जांच बिना राजनैतिक दखलंदाज़ी के और बिना पक्षपात के फुर्ती से करे। लगभग ऐसा कहना हर समिति की रिपोर्ट का रहा है। पर लाख टके का सवाल यह है कि क्या हो यह तो सब जानते हैं, पर हो कैसे ये कोई नहीं जानता। राजनैतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी सुधार सफल नहीं हो सकता।