Monday, September 21, 2026

व्यवस्था को चुभने वाले अधिकारी

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषध प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे इन दिनों एक बार फिर उन अधिकारियों की पंक्ति में खड़े दिखते हैं, जिनकी उपस्थिति व्यवस्था को असहज कर देती है। होटल-रेस्तरां की रसोइयों से शुरू हुआ उनका अभियान अब अस्पतालों के बिलों तक पहुँच गया है। सवाल केवल एक अधिकारी के तेवर का नहीं है। सवाल यह है कि जनता के स्वास्थ्य और जेब के बीच खड़ी लूट को रोकने वाले अधिकारी भारत में इतने दुर्लभ क्यों हैं? और जब वे दिखते हैं तो उनकी पदावधि इतनी छोटी क्यों रह जाती है?


मुंढे मई 2026 में एफडीए आयुक्त बने। कुछ ही महीनों में विभाग ने हजारों निरीक्षण किए, सैकड़ों लाइसेंस निलंबित किए, करोड़ों रुपये का मिलावटी या असुरक्षित माल जब्त किया और गुटखा-पान मसाला के अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई की। बड़े ब्रांड, पुराने होटल, क्विक-कॉमर्स गोदाम, यहाँ तक कि मुंबई हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहे। संदेश साफ था, नियम छोटे-बड़े के भेद से नहीं चलेंगे। अब वही सख्ती निजी अस्पतालों के उपभोग्य सामान पर दिख रही है। एक सर्वे में सामने आया कि अस्पताल ने आईवी इन्फ्यूजन सेट 11.05 रुपये में खरीदा, पर मरीज के बिल में उसकी कीमत 325 रुपये लिखी गई। यह करीब 2,841 प्रतिशत का अंतर है। सिरिंज 6.75 रुपये में खरीदी गई, बिल में 57.20 रुपये। कैथेटर 29.41 रुपये में लिया गया, मरीज से 310 रुपये वसूले गए। मुंढे ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और केंद्रीय औषध विभाग को पत्र लिखकर ट्रेड मार्जिन पर लगाम लगाने की माँग की है।


यह महज मूल्य का खेल नहीं है। अस्पताल के बिल का सबसे मोटा हिस्सा अक्सर वह होता है जिसका उपचार से सीधा संबंध कम और खरीद-बिक्री की श्रृंखला से ज्यादा होता है। उल्लेखनीय है कि जब मरीज सरकारी योजना या निजी बीमा के दायरे में होता है, तो यह लूट और निर्लज्ज हो जाती है। मरीज सोचता है कि खर्च कंपनी या सरकार उठाएगी। अस्पताल जानता है कि क्लेम पास होने की प्रक्रिया जटिल है, मरीज कमजोर है और पूछताछ कम होती है। नतीजा यह कि खपत की वस्तुएँ मनमाने मार्जिन पर चढ़ जाती हैं, कमरे-जांच-उपकरण के पैकेज फुला दिए जाते हैं और बीमा का पैसा अंततः समाज के उसी वर्ग से वसूला जाता है जो प्रीमियम चुकाता है। सरकारी योजनाओं में भी यही तर्क काम करता है और सार्वजनिक धन निजी लाभ में बदल जाता है।


भारत को तुकाराम जैसे अधिकारियों की जरूरत है क्योंकि हमारे नियामक ढांचे में कानून पर्याप्त हैं, पर प्रवर्तन चयनात्मक है। खाद्य सुरक्षा, औषधि नियंत्रण और अस्पताल शुल्क, तीनों क्षेत्र उन जगहों पर हैं जहाँ आम आदमी सबसे असहाय होता है। वह मेनू नहीं पढ़ सकता कि पनीर असली है या नहीं; वह बिल नहीं काट सकता कि सेट ग्यारह का है या तीन सौ पच्चीस का; वह बीमा कंपनी से नहीं लड़ सकता जब अस्पताल कहता है कि पैकेज में सब शामिल है। ऐसे में यदि कोई अधिकारी बिना चेतावनी निरीक्षण करता है, लाइसेंस निलंबित करता है और आंकड़े सार्वजनिक करता है, तो वह केवल विभाग नहीं चला रहा होता, वह बाजार की नैतिक सीमा खींच रहा होता है। गौरतलब है कि तुकाराम मुंढे प्रभाव तेज़ी से फैल रहा है। रसोई साफ होने लगीं, मेनू पर एनालॉग पनीर लिखा जाने लगा और अस्पताल अब कम से कम कीमतों की चर्चा से बच नहीं सकते। यह डर सुधार का पहला कदम है। स्थायी सुधार तभी आएगा जब एक व्यक्ति का अभियान संस्था की आदत बनेगी।


सवाल उठता है कि ऐसे अधिकारी बार-बार तबादले का शिकार क्यों होते हैं? मुंढे 2005 बैच के महाराष्ट्र काडर के आईएएस हैं। करीब इक्कीस वर्ष की सेवा में उनके पच्चीस के आसपास तबादले हुए हैं। सोलापुर में रेत माफिया, नवी मुंबई में अनावश्यक परियोजनाओं का विरोध, पुणे परिवहन में अनुपस्थित ड्राइवरों की छँटनी, स्वास्थ्य आयुक्त रहते सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक, हर जगह उन्होंने स्वार्थी हितों से टकराव चुना। तबादला सजा नहीं कहा जाता, पर व्यवहार में वह सजा ही है। ईमानदार अधिकारी को बार-बार हटाकर व्यवस्था यह संकेत देती है कि स्थिरता सुविधा के पक्ष में है, असुविधा के नहीं। राजनेता, स्थानीय व्यापारिक लॉबी, कभी विभाग के भीतर के कर्मचारी, सभी को एक ही शिकायत होती है: काम का दबाव, अचानक छापे, छवि खराब होना। जनसमर्थन सोशल मीडिया पर दिखता है, पर फाइलें सचिवालय में चलती हैं। जब तक तबादले की शक्ति बिना पारदर्शी कारण के बनी रहेगी, मुंढे जैसे अधिकारी अपवाद रहेंगे, आदर्श नहीं।


ऐसे में आलोचना भी जरूरी है। व्यवसाय जगत कहता है कि बिना सुधार का समय दिए लाइसेंस काटना अति है। अदालत ने कभी कहा कि मच्छर मारने के लिए तलवार न चलाई जाए। विभाग के कुछ कर्मचारियों ने कार्यभार की शिकायत की। ये बातें अनसुनी नहीं की जानी चाहिए। प्रवर्तन कठोर हो, पर पूर्वानुमान योग्य और समान भी हो। छोटे ढाबे और बड़े अस्पताल दोनों पर एक ही पैमाना लगे। मूल्य नियंत्रण ऐसा हो कि गुणवत्ता न गिरे और इनोवेटर का मार्जिन भी पूरी तरह न मिटे। बीमा कंपनियों और सरकारी योजनाओं को अस्पताल के खरीद मूल्य से बिल का मिलान अनिवार्य बनाना चाहिए। मरीज को बाहरी फार्मेसी से दवा लेने की स्वतंत्रता कागज पर नहीं, व्यवहार में मिलनी चाहिए।


आखिरकार प्रश्न व्यक्ति का नहीं, संस्कृति का है। भारत में सेवा भाव वाले अधिकारी भी पैदा होते हैं, गाँव के किसान परिवार से आईएएस बनने वाले मुंढे इसका जीवंत उदाहरण हैं। कमी यह है कि व्यवस्था उन्हें टिकाए नहीं रखती। जब तक ईमानदारी को करियर का जोखिम माना जाएगा, रसोई में कीड़े और बिल में दो हजार प्रतिशत मुनाफा सामान्य बने रहेंगे। देश को मुंढे जैसे और अधिकारियों की जरूरत है। उससे भी ज्यादा जरूरत है ऐसी प्रशासनिक सुरक्षा की, जिसमें वे एक पद पर पूरा कार्यकाल काट सकें, आंकड़े सुधार सकें और लॉबी के दबाव में विस्थापित न हों। स्वास्थ्य और भोजन मौलिक जरूरतें हैं। इन पर लूट को सहना शासन की विफलता है। एक अधिकारी का अभियान चेतावनी है। चेतावनी को नीति बनाना अब बाकी है। 

No comments:

Post a Comment