संसदीय परंपराओं में, असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली होती है। भारतीय संसद में, स्पीकर अक्सर ऐसी भाषा को हटाने का आदेश देते हैं, लेकिन संसद के बाहर ऐसे बयानों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता। राजनीतिक नेता अक्सर विपक्षी नेताओं को 'चोर', 'गद्दार' या इससे भी बदतर शब्दों से संबोधित करते हैं। चुनावी मौसम में यह और तीव्र हो जाता है, जहां व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की जगह ले लेते हैं। गौरतलब है कि कुछ नेताओं की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के युग में यह वायरल होकर लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे समाज पर इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
भारतीय वोटर या नागरिक अपनी पसंद अनुसार राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं और उन दलों के नेताओं को अपना आदर्श भी मानते हैं। जब नेता सार्वजनिक मंचों पर गाली-गलौज करते हैं, तो यह नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान की भावना को कमजोर करता है। विशेषकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, इससे प्रभावित होती है। वे सोचते हैं कि अगर देश के लोकप्रिय नेता खुले मंचों पर ही ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो सामान्य जीवन में क्या करते होंगे? इससे समाज में असहिष्णुता और हिंसा की संस्कृति पनपती है। उदाहरणस्वरूप, जब कोई नेता विपक्षी को 'कुत्ता' या 'सुअर' जैसे शब्दों से नवाजता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति का अपमान है, बल्कि पूरे लोकतंत्र का मजाक उड़ाता है। नागरिकों में यह धारणा बनती है कि राजनीति एक गंदा खेल है, जहां नैतिकता की कोई जगह नहीं। परिणामस्वरूप, मतदान में उदासीनता बढ़ती है और लोग राजनीति से दूर होते जाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, कई नागरिकों का मानना है कि ऐसी भाषा से राजनीति की विश्वसनीयता घटती है, जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है।
राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करते हैं। जब शीर्ष नेता असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यह कार्यकर्ताओं में भी वैसी ही प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है। चुनावी रैलियों में कार्यकर्ता विपक्षी दलों के खिलाफ नारे लगाते समय अक्सर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो कभी-कभी हिंसक झड़पों में बदल जाता है। इससे दल के अंदर अनुशासनहीनता बढ़ती है और कार्यकर्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में उलझ जाते हैं। इसके अलावा, जब कोई नेता अपनी ही पार्टी के सदस्यों के खिलाफ ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है (जैसे असंतोषी सदस्यों को 'गद्दार' कहना), तो यह आंतरिक कलह को जन्म देता है। पार्टी कार्यकर्ता निराश होते हैं और उनका मनोबल गिरता है। लंबे समय में, यह दलों की एकजुटता को प्रभावित करता है और राजनीतिक स्थिरता को खतरे में डालता है। कार्यकर्ता सोचते हैं कि अगर नेता ही सम्मान नहीं रखते, तो वे क्यों रखें? इससे राजनीतिक संस्कृति में गिरावट आती है।
वहीं मीडिया पर इसका प्रभाव सबसे अधिक चिंताजनक है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो नेताओं से सवाल पूछकर जवाबदेही सुनिश्चित करती है। लेकिन जब पत्रकार तीखे सवाल पूछते हैं, तो कई नेता उन पर व्यक्तिगत हमला करते हैं या अभद्र व्यवहार करते हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेता पत्रकारों को 'पेड मीडिया' या 'दलाल' कहकर अपमानित करते हैं। कभी-कभी यह शारीरिक धमकी तक पहुंच जाता है, जैसे कैमरा छीनना या बाहर निकालना। इससे मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा मंडराता है। पत्रकार डर के मारे सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं, जिससे जनता को सच्ची जानकारी नहीं मिलती। सोशल मीडिया पर नेता पत्रकारों के खिलाफ ट्रोल आर्मी को सक्रिय करते हैं, जो अभद्र टिप्पणियों से उन्हें परेशान करते हैं। यह न केवल मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा को भी खतरे में डालता है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का उल्लेख है, और असंसदीय भाषा इसका एक प्रमुख कारण है।
भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उनके खिलाफ लिंगभेदी टिप्पणियां एक बड़ी समस्या हैं। नेता अक्सर महिला विपक्षी नेताओं की शारीरिक बनावट, कपड़ों या व्यक्तिगत जीवन पर अभद्र टिप्पणियां करते हैं। जैसे 'आइटम' या 'डांस करने वाली' जैसे शब्दों का प्रयोग। यह न केवल महिलाओं का अपमान है, बल्कि पूरे समाज में लिंग असमानता को बढ़ावा देता है। इससे महिला कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है और वे राजनीति में आने से हिचकिचाती हैं। विपक्षी दलों के प्रति भी ऐसी भाषा का प्रयोग आम है। नीतिगत मतभेदों की बजाय, नेता व्यक्तिगत हमलों में उलझ जाते हैं, जैसे परिवार को निशाना बनाना या जाति-धर्म पर टिप्पणियां। इससे राजनीतिक बहस का स्तर गिरता है और समाज में विभाजन बढ़ता है। पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का जिक्र पहले हो चुका है, लेकिन महिलाओं पत्रकारों के साथ यह और गंभीर होता है, जहां लिंगभेदी टिप्पणियां जोड़ी जाती हैं।
यह सब देखकर लगता है कि भारतीय राजनीति में सभ्यता की कमी एक बड़ी चुनौती है। लेकिन इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सख्त नियम लागू करने चाहिए और बाहर के मंचों पर भी नैतिक दिशानिर्देश। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा न देकर, जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी चाहिए। नागरिकों को भी सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री को शेयर न करके, विरोध जताना चाहिए। राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना चाहिए कि बहस नीतियों पर हो, न कि व्यक्तिगत हमलों पर। महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाए जा सकते हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून सख्त किए जाएं।
लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असंसदीय भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, तो राजनीतिक बयानों व भाषणों को सभ्य बनाना होगा। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया सब मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में चमकेगा।



