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Monday, August 11, 2025

उत्तरकाशी की त्रासदी: एक चेतावनी

भारत के पहाड़ी क्षेत्र, विशेष रूप से हिमालयी राज्यों जैसे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, प्राकृतिक सौंदर्य और जैव-विविधता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। ये क्षेत्र न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं, बल्कि गंगा, यमुना और अन्य प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल भी हैं, जो देश की जीवनरेखा हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता ने गंभीर चिंता पैदा की है। उत्तरकाशी में हाल ही में भीषण बाढ़ और मलबे के प्रवाह ने एक बार फिर से यह सवाल उठाया है कि क्या हम अपने पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे हैं ? यह आपदा, जो भगीरथी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र (बीईएसजेड) में हुई, न केवल प्राकृतिक कारणों से बल्कि अवसंरचना परियोजनाओं के कुप्रबंधन और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण और भी विनाशकारी बन गई। यह समय है कि हम इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें और तत्काल कार्रवाई करें।



5 अगस्त 2025 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में एक बादल फटने की घटना ने भारी तबाही मचाई। खीर गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में हुई इस घटना ने गांव के घरों, होटलों, दुकानों और सड़कों को तहस-नहस कर दिया।चार लोगों की मौत हो गई और 50 से 100 लोग लापता हो गए। यह आपदा भगीरथी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में हुई, जो 2012 में गंगा नदी की पारिस्थितिकी और जलस्रोतों की सुरक्षा के लिए अधिसूचित किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण कार्य, जैसे कि नदी के बाढ़ क्षेत्रों पर होटल और हेलीपैड का निर्माण, ने इस आपदा को और अधिक गंभीर बना दिया।



उत्तरकाशी की यह घटना कोई अपवाद नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बार-बार बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। 2013 की केदारनाथ बाढ़, जिसमें 5,700 से अधिक लोग मारे गए थे और 2021 की चमोली बाढ़, जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए, ऐसी त्रासदियों के उदाहरण हैं। इन आपदाओं का एक प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है, जो हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने और बादल फटने की घटनाओं को बढ़ा रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ मानवीय गतिविधियां, विशेष रूप से अवसंरचना परियोजनाओं का गलत प्रबंधन, इन आपदाओं की तीव्रता को और बढ़ा रहा है।


हिमालयी क्षेत्र की भूवैज्ञानिक संरचना अत्यंत नाजुक है। यह क्षेत्र टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण भूकंपीय रूप से सक्रिय और भूस्खलन के लिए अतिसंवेदनशील है। फिर भी, चारधाम परियोजना जैसे बड़े पैमाने की सड़क निर्माण परियोजनाएं, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और अनियंत्रित पर्यटन ने इस क्षेत्र की स्थिरता को और कमजोर किया है। उत्तरकाशी में चारधाम परियोजना के तहत धरासू-गंगोत्री खंड का चौड़ीकरण और हिना-टेखला के बीच प्रस्तावित बायपास, जिसमें 6,000 देवदार के पेड़ों को काटने की योजना है, पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय रहा है।


चारधाम परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई कानूनी चुनौतियां सामने आई हैं, क्योंकि यह परियोजना पर्यावरणीय खतरों को बढ़ा रही है। विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि सड़क चौड़ीकरण के लिए पहाड़ों की कटाई, वनों की अंधाधुंध कटाई और नदी के किनारों पर निर्माण कार्य इस क्षेत्र को और अधिक अस्थिर बना रहे हैं। 2023 में सिल्क्यारा सुरंग प्रकरण ने भी यही दिखाया कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) के बिना परियोजनाओं को मंजूरी देना कितना खतरनाक हो सकता है।


इसी तरह, हिमाचल प्रदेश में शिमला के शोघी-धल्ली राजमार्ग परियोजना के लिए पहाड़ों की कटाई ने भूस्खलन के खतरे को बढ़ा दिया है। शिमला, जो कभी 30,000 लोगों के लिए बनाया गया था, अब 300,000 लोगों और लाखों पर्यटकों का बोझ सह रहा है। कुल्लू और मनाली जैसे पर्यटन स्थल भी अनियंत्रित निर्माण और पर्यटकों की भीड़ के कारण पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहे हैं।


जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता को बढ़ा दिया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, 1988 से 2023 तक उत्तराखंड में 12,319 भूस्खलन हुए, जिनमें से 1,100 अकेले 2023 में दर्ज किए गए। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और ग्लेशियल झीलों का विस्तार ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) का खतरा बढ़ा रहा है। उत्तरकाशी की हालिया बाढ़ में भी विशेषज्ञों ने जीएलओएफ की संभावना जताई है।


इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ रही है, जिससे बादल फटने और भारी बारिश की घटनाएं अधिक आम हो रही हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, उत्तरकाशी में 43 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो बादल फटने की परिभाषा (100 मिमी/घंटा) से कम थी, लेकिन लगातार तीन दिनों की बारिश ने मिट्टी को संतृप्त कर दिया, जिससे मलबे का प्रवाह और बाढ़ बढ़ गई।


पर्यटन उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा है। 2023 में चारधाम यात्रा में 56 लाख से अधिक पर्यटक आए, जिसके कारण होटल, लॉज और सड़कों का निर्माण तेजी से हुआ। हालांकि, यह अनियंत्रित निर्माण नदी किनारों और अस्थिर ढलानों पर किया गया, जिसने प्राकृतिक प्रतिरोधों को नष्ट कर दिया। जोशीमठ में 2023 में 700 से अधिक घरों में दरारें आ गईं, क्योंकि यह शहर प्राचीन भूस्खलन मलबे पर बना है और वहां टपकेश्वर विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना और चारधाम सड़क परियोजना ने इसके ढलानों को अस्थिर कर दिया।


उत्तरकाशी की त्रासदी और हिमाचल-उत्तराखंड में बार-बार होने वाली आपदाएं यह स्पष्ट करती हैं कि अब केवल चर्चा पर्याप्त नहीं है। हमें तत्काल और ठोस कदम उठाने होंगे। बीईएसजेड जैसे नियमों को सख्ती से लागू करना होगा। अवैध निर्माण पर तत्काल रोक और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है। सड़क और अन्य परियोजनाओं के लिए आधुनिक तकनीकों, जैसे हाफ-टनेल और ढलान स्थिरीकरण संरचनाओं का उपयोग करना होगा। हिमालयी क्षेत्र में स्वचालित मौसम स्टेशनों (एडब्ल्यूएस) की संख्या बढ़ानी होगी और समुदाय-आधारित चेतावनी प्रणालियों को लागू करना होगा। वनों की कटाई को रोकने और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के माध्यम से प्राकृतिक बाधाओं को बहाल करना होगा। पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित करने और पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देने की जरूरत है।

उत्तरकाशी की हालिया बाढ़ और हिमाचल-उत्तराखंड में बार-बार होने वाली आपदाएं हमें एक स्पष्ट संदेश दे रही हैं, यदि हमने अभी नहीं चेता, तो हमारी लापरवाही हमें और हमारे पर्यावरण को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह समय है कि हम विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाएं। हिमालय केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर का हिस्सा है। इसे बचाने के लिए सरकार, स्थानीय समुदायों और नागरिकों को एकजुट होकर काम करना होगा। अब समय है कार्रवाई का, क्योंकि देरी का मतलब और अधिक त्रासदियां होंगी। 

Monday, July 14, 2025

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना: पर्यावरण से खिलवाड़

ग्रेट निकोबार द्वीप, जो भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का हिस्सा है, अपनी अनूठी जैव विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यह द्वीप भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु, इंदिरा पॉइंट, होने के साथ-साथ यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व भी है। कुछ समय पहले नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित 72,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना ने इस क्षेत्र को वैश्विक व्यापार, पर्यटन और सामरिक महत्व का केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है। इस परियोजना में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और एक गैस और सौर ऊर्जा आधारित पावर प्लांट का निर्माण शामिल है। इस परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं।



ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को नीति आयोग ने 2021 में शुरू किया था, जिसका उद्देश्य इस द्वीप को एक आर्थिक और सामरिक केंद्र के रूप में विकसित करना है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जो विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। परियोजना के तहत 16,610 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया जाएगा, जिसमें से 130.75 वर्ग किलोमीटर प्राचीन वन क्षेत्र शामिल है। इस परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों ने इसे विवादों के केंद्र में ला खड़ा किया है।


ग्रेट निकोबार द्वीप 1989 में बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया था और 2013 में यूनेस्को के मैन एंड बायोस्फीयर प्रोग्राम में शामिल किया गया। यह द्वीप 1,767 प्रजातियों के साथ एक समृद्ध जैव विविधता का घर है, जिसमें 11 स्तनधारी, 32 पक्षी, 7 सरीसृप और 4 उभयचर प्रजातियां शामिल हैं, जो इस क्षेत्र में स्थानिक हैं। परियोजना के लिए लगभग 9.6 लाख से 10 लाख पेड़ों की कटाई की जाएगी, जो द्वीप के प्राचीन वर्षावनों को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगी। यह न केवल स्थानीय वनस्पतियों और जीवों को प्रभावित करेगा, बल्कि प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ्स) और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचाएगा।



गलाथिया खाड़ी, जहां ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल प्रस्तावित है, लेदरबैक कछुओं और निकोबार मेगापोड पक्षियों का प्रमुख प्रजनन स्थल है। 2021 में गलाथिया खाड़ी वन्यजीव अभयारण्य को डिनोटिफाई कर दिया गया, जो भारत के राष्ट्रीय समुद्री कछुआ संरक्षण योजना (2021) के विपरीत है। यह कछुओं और अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है, क्योंकि बंदरगाह निर्माण से होने वाला प्रदूषण, ड्रेजिंग, और जहाजों की आवाजाही उनके प्रजनन और अस्तित्व को प्रभावित करेगी।



द्वीप पर शोम्पेन और निकोबारी आदिवासी समुदाय रहते हैं, जो विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत हैं। ये समुदाय अपनी आजीविका और संस्कृति के लिए जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। परियोजना से इनके पारंपरिक क्षेत्रों का 10% हिस्सा प्रभावित होगा, जिससे उनकी सामाजिक संरचना और जीविका पर खतरा मंडराएगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बाहरी लोगों के संपर्क से इन जनजातियों में रोगों का खतरा बढ़ सकता है, जिससे उनकी आबादी विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकती है।


ग्रेट निकोबार द्वीप अंडमान-सुमात्रा फॉल्ट लाइन पर स्थित है, जो भूकंप और सुनामी के लिए अत्यधिक संवेदनशील है। 2004 की सुनामी ने इस क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया था। पर्यावरण प्रभाव आकलन में भूकंपीय जोखिमों को कम करके आंका गया है और विशेषज्ञों का कहना है कि परि

योजना के लिए साइट-विशिष्ट भूकंपीय अध्ययन नहीं किए गए। यह एक बड़े पैमाने पर आपदा का कारण बन सकता है।


परियोजना के लिए काटे गए जंगलों की भरपाई के लिए हरियाणा और मध्य प्रदेश में प्रतिपूरक वनीकरण का प्रस्ताव है। लेकिन ये क्षेत्र निकोबार की जैव विविधता से कोई समानता नहीं रखते। यह पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करने में असमर्थ है।


पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया और मूल्यांकन दस्तावेजों को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर गोपनीय रखा गया है। विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल हवाई अड्डे का सामरिक महत्व हो सकता है, न कि पूरी परियोजना का। पारदर्शिता की यह कमी परियोजना की वैधता पर सवाल उठाती है।


विपक्षी दलों, विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ने परियोजना को "पारिस्थितिक और मानवीय आपदा" करार दिया है। पर्यावरणविदों और नागरिक समाज संगठनों ने इसे जैव विविधता और आदिवासी अधिकारों के लिए खतरा बताया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2023 में परियोजना की पर्यावरण और वन मंजूरी की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी, लेकिन इसके बावजूद परियोजना को आगे बढ़ाने में जल्दबाजी दिखाई दे रही है।


ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पारदर्शी और व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन, आदिवासी समुदायों के साथ उचित परामर्श और भूकंपीय जोखिमों का सटीक मूल्यांकन आवश्यक है। इसके साथ ही, परियोजना के आर्थिक व्यवहार्यता की पुन: समीक्षा होनी चाहिए, क्योंकि भारत में हाल ही में शुरू हुआ विशाखापत्तनम का ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल पहले से ही वैश्विक व्यापार में योगदान दे रहा है।


पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। जैसे कि परियोजना क्षेत्र को CRZ 1A क्षेत्रों से बाहर रखा जाए। आदिवासी समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। भूकंपीय जोखिमों के लिए साइट-विशिष्ट अध्ययन किए जाएं। निकोबार के भीतर ही प्रतिपूरक वनीकरण पर ध्यान दिया जाए।


ग्रेट निकोबार द्वीप भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। इसे बचाने के लिए विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना होगा। भ्रामक तथ्यों के आधार पर जल्दबाजी में लिए गए निर्णय न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएंगे, बल्कि भारत की वैश्विक पर्यावरण संरक्षण प्रतिबद्धताओं को भी कमजोर करेंगे।