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Monday, December 19, 2022

माधवराव सिंधिया की ‘डायरी’ याद आई !


दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का टर्मिनल 3 भीड़ और अव्यवस्था को लेकर सुर्ख़ियों में है। वहाँ पर सवारियों की लंबी कतारें और बदहाली के चित्र व वीडियो सोशल मीडिया में कई दिनों से छाए हुए हैं। जैसे ही इस मामले ने तूल पकड़ा तो आनन-फ़ानन में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हरकत में आए। वे स्थिति का जायज़ा लेने अचानक टी 3 पर पहुँच गए। वहाँ उन्होंने सभी विभागों के अधिकारियों को कई निर्देश दे डाले। यात्रियों को भी भरोसा दिलाया कि स्थिति बहुत जल्द नियंत्रण में आ जाएगी। उनकी इस पहल को देख उनके स्वर्गवासी पिता और केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया की ‘डायरी’ याद आ गई। 


दरअसल, जब माधवराव सिंधिया 1986-89 तक भारत के रेल मंत्री थे तो मैं रेल मंत्रालय कवर करता था। वहाँ के वरिष्ठ अधिकारी रेल मंत्री माधवराव सिंधिया की ‘डायरी’ से बहुत घबराते थे। जब भी कभी सिंधिया जी अधिकारियों की बैठक लेते थे तो अपनी एक छोटी सी तारीख़ वाली ‘डायरी’ को सामने रखते थे। रेल मंत्रालय की तमाम योजनाओं पर जब विस्तार से चर्चा होती थी तो वे अधिकारियों से उस कार्य योजना के एक चरण का कार्य पूर्ण होने की अनुमानित तारीख़ तय करते थे। उस तारीख़ को वे अपनी छोटी ‘डायरी’ में लिख लेते थे और फिर वो महीना और तारीख़ आने पर, उस दिन उन अधिकारियों से उस कार्य की ‘अपडेट’ लेते थे। जैसे ही माधवराव सिंधिया अपनी ‘डायरी’ में किसी तारीख़ के आगे किसी कार्य से संबंधित कुछ लिखते थे, वैसे ही उस कार्य से संबंधित अधिकारियों के पसीने छूट जाते थे। रात-दिन मेहनत करके संबंधित अधिकारी ये सुनिश्चित कर लेते थे कि वह कार्य निर्धारित तारीख़ से पहले पूरा हो जाए। वरना मंत्री जी को मुँह दिखाना भारी पड़ जाएगा। 


पर लगता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पिता का वह गुण उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं किया। इसके हमारे पास अनेक प्रमाण हैं। मेरे सहयोगी पत्रकार रजनीश कपूर ने ‘नागर विमानन निदेशालय (डीजीसीए)’ व ‘नागरिक उड्डयन मंत्रालय’ में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की दर्जनों शिकायतें सप्रमाण ज्योतिरादित्य सिंधिया को भेजी हैं। जिन पर आज तक कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई। यह मंत्री महोदय की कार्यक्षमता का परिचायक है। इसी तरह दिल्ली के हवाई अड्डे पर अव्यवस्था फैलने से पहले यदि संबंधित अधिकारी नागरिक उड्डयन मंत्री को सही रिपोर्ट देते तो शायद ऐसा न होता। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास दो-दो मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी है। इसके साथ ही उन पर भाजपा के सदस्य होने के नाते भी कई ज़िम्मेदारियों हैं। ऐसे में यदि वे कुछ ‘चुनिंदा अधिकारियों’ के कहने में आ कर अपने मंत्रालयों के कामों को पार्टी के कामों से कम महत्व दें तो ये सही नहीं। दोनों ज़िम्मेदारियों में संतुलन बना कर ही उनको सभी काम कुशलता से करने होंगे। दिल्ली के टी 3 जैसे औचक निरीक्षण उन्हें कई जगह करने होंगे। अपने स्वर्गवासी पिता की तरह उन्हें भी एक ‘डायरी’ रखनी चाहिए, जिससे अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सके। पार्टी से संबंधित कार्यों को लेकर केवल फ़ीता काटने और फ़ोटो खिंचवाने से कुछ नहीं होगा।


मिसाल के तौर पर दिल्ली हवाई अड्डे की अव्यवस्था को लेकर नागरिक उड्डयन मंत्रालय के नये कार्यक्रम ‘डिजि यात्रा’ को ही लें। कहा जा रहा है कि इस नई व्यवस्था से यात्रियों को सहूलियत मिलेगी। लम्बी-लम्बी क़तारों से मुक्ति मिलेगी। एक ही बार अपनी शक्ल दिखा कर उनकी हवाई यात्रा संबंधित सभी तरह की जानकारी सिस्टम पर दर्ज हो जाएगी। हवाई अड्डे के ई-गेट पर अपना बार कोड वाला बोर्डिंग पास स्कैन करना होगा, जिसके बाद वहां लगे फेशियल रिकग्निशन की मदद से आपकी पहचान की जाएगी। आपके फेस और आपके डॉक्यूमेंट को वैरिफाई किया जाएगा। इसके बाद आप आसानी से ईगेट के जरिए एयरपोर्ट और सिक्योरिटी चेक से गुजर सकेंगे। डिजी यात्रा का इस्तेमाल करने के लिए आपको ‘डिजी यात्रा’ ऐप डाउनलोड करना होगा। इसके बाद आपको अपनी डीटेल भरनी होगी। आपको अपनी जानकारी आधार बेस वैलिडेशन और सेल्फ इमेज के साथ डालनी होगी। आपके द्वारा दी गई जानकारी को सबसे पहले सत्यापित किया जाएगा। उड़ान से पहले वेब चेक इन करते वक्त आपको अपना टिकट इस ऐप पर अपलोड करना होगा। इस नई व्यवस्था की 1 दिसंबर से देश के कुछ एयरपोर्ट पर शुरूआत की गई है। ये व्यवस्था पूरी तरह से पेपरलेस है।

फिलहाल ये सेवा दिल्ली, बेंगलूरु और वाराणसी एयरपोर्ट पर शुरू की गई है, जिसका विस्तार दूसरे चरण में मार्च 2023 तक हैदराबाद, पुणे, विजयवाड़ा और कोलकाता के एयरपोर्ट पर किया जाएगा। दिल्ली के मुक़ाबले बेंगलुरु और वाराणसी के हवाई अड्डे छोटे हैं। इसलिए अभी तक वहाँ से कोई भीड़ और अव्यवस्था की खबर नहीं आई। दिल्ली के टी 3 पर ही ऐसी अव्यवस्था दिखाई दी। 

जानकारों के अनुसार, यदि इस नई सेवा को लागू करना ही था तो दिल्ली जैसे भीड़भाड़ वाले व्यस्त हवाई अड्डे से शुरुआत नहीं करनी चाहिए थी। यदि किन्ही कारणों से दिल्ली में ऐसा करना ज़रूरी था तो दिल्ली के ही छोटे व कम व्यस्त टर्मिनल को चुना जाना बेहतर होता। वहाँ भी केवल एक या दो गेटों पर ही इसे अनिवार्य करते। यात्रियों की सहायता के लिये एयरपोर्ट पर सहायकों को नियुक्त किया जाना चाहिए था। वो सब किया जाना चाहिए था जो मामले के तूल पकड़ने पर मंत्री जी के औचक निरीक्षण के बाद तय हुआ। जानकर इस अव्यवस्था को भी नोटबंदी के बाद एटीएम और बैंकों पर लगी लंबी कतारों की तरह मान रहे हैं। डिजी यात्रा के जल्दबाज़ी के इस निर्णय ने देश का नाम ख़राब किया है। इसका प्रयोग पहले देश के छोटे व कम व्यस्त एयरपोर्ट से होता तो बेहतर होता। जिससे इसकी ख़ामियों को भी दुरुस्त किया जा सकता था। ‘डिजी यात्रा’ के सफल होने का भरपूर प्रचार किया जाता और देश की जनता को इसके फ़ायदे बताए जाते। चरणबद्ध तरीक़े से इसे देश भर में लागू किया जाता।   

ऐसा लगता है कि शायद ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पिता की तरह अफ़सरशाही को अपने काबू में नहीं कर पा रहे हैं। वरना ऐसी नौबत नहीं आती। अधिकारी केवल इसी बात की दुहाई दे रहे हैं कि कोविड के बाद यात्रियों की संख्या में अचानक बढ़ौतरी हुई है। ऐसे में छुट्टियों की भीड़ भी आग में घी डालने का काम कर रही है। ऐसे में ‘डिजी यात्रा’ को इस समय लागू करना क्या सही था?

Monday, May 2, 2022

मुख्य मंत्री योगी जी की भ्रष्टाचार के विरुद्ध क्रांतिकारी पहल


उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी जी ने एक क्रांतिकारी घोषणा की है कि सभी अफ़सर, मंत्री व विधायक तीन महीने के अंदर अपनी चल-अचल सभी सम्पत्तियों की घोषणा सार्वजनिक करें। ज़ाहिर है कि इस घोषणा से अफ़सरशाही और मंत्रियों में हड़कम्प मचेगा। भ्रष्टाचार से जनता हमेशा त्रस्त रहती है। इसलिए जब भी कोई नेता इस मुद्दे को उठाता है तो उसकी लोकप्रियता सातवें आसमान पर चढ़ जाती है। योगी जी को भी इस घोषणा से ये लाभ मिल सकता है। बशर्ते वे इसे अपने बुलडोज़र वाले तेवर से लागू करें।
 


बोफ़ोर्स का मुद्दा उठाकर ही विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन गए थे। इसी मुद्दे को उठाकर अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए। ये बात दूसरी है कि दोनों के मुद्दे फुस्स रहे और जिनके ख़िलाफ़ इन्होंने अपना अभियान चलाया था और ढेरों सबूत सामने लाने का जन सभाओं में बार-बार आश्वासन दिया था, वो कभी सामने ही नहीं आए। 


दरअसल कोई भी नेता भ्रष्टाचार से ईमानदारी से लड़ना नहीं चाहता। सब इस पर शोर मचा कर कुर्सी हथियाते हैं और फ़िर मौन हो जाते हैं। पर योगी जी कुर्सी पाने के बाद भी अगर इस अभियान को शुरू कर रहे हैं तो उन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए। बाबा इरादे के पक्के हैं और जानते हैं कि प्रदेश के विकास का धन हुक्मरानों की तिजोरियों में चला जा रहा है। इसलिए वे इस मुहीम को कैसे आगे बढ़ाते हैं ये बात प्रदेश की ही नहीं देश भर की जनता देखेगी।


पर योगी जी को ये ध्यान रखना होगा कि उनके इर्द गिर्द के अफ़सरान ही उनके इस महत्वपूर्ण अभियान को पलीता न लगा दें। जैसा वे अभी तक लगाते आए हैं। इस कॉलम के पाठकों को याद होगा कि 29 जून 2020 और 20 जुलाई 2020 को हमने योगी जी के वीआईपी पाइलट कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा के भारी भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था। इस पाइलट के परिवार की 200 से ज़्यादा ‘शैल कम्पनियों’ में हज़ारों करोड़ रुपया घूम रहा है। जिसे सप्रमाण दिल्ली में मेरे सहयोगी, कालचक्र समाचार ब्युरो के प्रबंधकीय सम्पादक रजनीश कपूर ने उजागर किया था। कपूर की शिकायत पर ही प्रवर्तन निदेशालय ने प्रज्ञेश मिश्रा के ख़िलाफ़ जाँच करने का नोटिस उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को 19 मई 2020 को जारी किया था। आश्चर्य है कि दो साल में भी इसकी जाँच क्यों नहीं हुई? 


रजनीश कपूर ने उत्तर प्रदेश की महामहिम राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को भी इसकी जाँच न होने की लिखित शिकायत अप्रैल 2021 भेजी। राज्यपाल महोदया ने तुरंत 31 मई 2021 को उत्तर प्रदेश शासन को इस जाँच को करने के निदेश दिए। पर उस जाँच का क्या हुआ, आज तक नहीं पता चला। 


इस बीच यूपी के कई बड़े अफ़सरों व नेताओं ने रजनीश कपूर पर दबाव डालने की नाकाम कोशिश की जिससे वे इस जाँच को करवाने की अपनी ज़िद छोड़ दें। जाहिरन उन सबके सैकड़ों करोड़ रुपए कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा की कम्पनियों में लगे होंगे, तभी उन सब में आज तक इस मामले को लेकर इतनी बेचैनी है। 


रजनीश कपूर ने कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा की इन ‘शैल कम्पनियों’ की कई सूचियाँ भी योगी जी के कार्यालय को भेजी हैं। मैने भी ट्वीटर पर योगी जी का ध्यान कई बार इस ओर दिलाया है कि ये जाँच जानबूझकर दबाई जा रही है। उधर उत्तर प्रदेश शासन ने अपनी तरफ़ से आश्वस्त होने के लिए या कपूर का नैतिक बल परखने के लिए, उनसे शपथ पत्र भी लिया कि वे अपनी शिकायत पर क़ायम हैं और पूरी ज़िम्मेदारी से ये मामला जनहित में उठा रहे हैं। इसके बाद भी जाँच क्यों नहीं हुई ये चिंता का विषय है। अगर इन कम्पनियों में घूम रहे हज़ारों करोड़ रुपए का स्रोत कैप्टन प्रज्ञेश मिश्र या उनके परिवारजनों से कड़ाई से पूछा गया होता तो अब तक प्रदेश के कितने ही बड़े अफ़सर और नेता बेनक़ाब हो चुके होते। इसीलिए उन्होंने इस जाँच को आज तक आगे नहीं बढ़ने दिया और योगी जी को लगातार धोखे में रखा। अब योगी जी को इस जाँच का बुलडोज़र तेज़ी से चलाना चाहिए। इस से उनकी छवि तो बनेगी ही, भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके इस अभियान की ईमानदारी भी सिद्ध होगी। क्योंकि किसी मुख्यमंत्री के एक साधारण से पाइलट को कुछ लाख रुपए का ही वेतन मिलता है। उस पर इतनी अकूत दौलत कहाँ से आ गयी, ये योगी जी के लिए गहरी चिंता का कारण होना चाहिए। 


इस पाइलट पर यह भी आरोप था कि इसने अपने आपराधिक इतिहास की जानकारी छुपा कर अपने लिए ‘एयरपोर्ट एंट्री पास’ हासिल किया था। इसकी शिकायत भी रजनीश ने नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) के महानिदेशक  राकेश अस्थाना से की और जाँच के बाद सभी आरोपों को सही पाए जाने पर इसका ‘एयरपोर्ट एंट्री पास’ भी रद्द किया गया। 


उत्तर प्रदेश सरकार में सूत्रों की मानें तो जब योगी जी को इस पाइलट की असलियत का पता चला तो कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा, जो कि उस समय उत्तर प्रदेश नागरिक उड्डयन विभाग का ऑपरेशन मैनेजर था, उसका प्रदेश के किसी भी हवाई अड्डे पर प्रवेश वर्जित कर दिया गया। रजनीश कपूर की शिकायत पर ही कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा का हवाई जहाज उड़ाने का लाईसेंस भी डीजीसीए से सस्पेंड कर दिया गया था। योगी जी के निर्देश पर मुख्यमंत्री कार्यालय और आवास पर भी उसका प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया था। पर उसके महाघोटालों को देखते हुए ये सब बहुत सतही कार्यवाही है। उत्तर प्रदेश शासन के जो ताक़तवर मंत्री और अफ़सर उसके साथ अपनी अवैध कमाई को ठिकाने लगाने में आज तक जुटे रहे हैं, वो ही उसे आज भी बचाने में लगे हैं। क्योंकि कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा के विरुद्ध ईमानदारी से जाँच का मतलब उत्तर प्रदेश शासन में बीस वर्षों से व्याप्त भारी भ्रष्टाचार के क़िले का ढहना होगा। तो ये लोग क्यों कोई जाँच होने देंगे? 


इसी के साथ एक काम करना और ज़रूरी है जो योगी जी के इस अभियान को सफल बनाएगा। आज प्रदेश में विकास का काम करने के लिए सैंकड़ों करोड़ रुपए के बजट से खेलने वाले कुछ ऐसे अफ़सर हैं जो एक ही शहर में बीस बीस बरस से कुंडली मारे बैठे हैं। कोई भी सरकार आ जाए ये विभाग बदल बदल कर वहीं तैनात रहते हैं। इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण तो मथुरा के ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद’ में ही देखा जा सकता है। किसी अफ़सर का एक शहर में तीन बरस से ज़्यादा रहना उसकी ईमानदारी पर सवाल खड़े करता है। इसलिए शुरू से ये प्रथा रही है कि अफ़सरों के तबादले हर तीन साल में कर दिए जाते हैं। योगी जी को पूरे प्रदेश में ये फेरबदल भी तुरंत करनी होगी वरना वे भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं कस पाएँगे। अब देखना यह है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हिम्मत से छेड़ी इस मुहीम को योगी जी कितनी तेज़ी से आगे बढ़ाते हैं ?