Monday, June 1, 2026

गर्मियों में बिजली की आपूर्ति कैसे हो ?

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने जनता से बिजली की खपत कम करने की अपील की है। हालांकि उन्होंने यह भी आश्वासन दिया है कि बिजली की आपूर्ति में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी। उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली मिलेगी। उनका यह आश्वासन सराहनीय है। मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। इसी हफ़्ते टीवी पर एक शो में बहस के दौरान पत्रकारों ने बताया कि नोएडा में बिजली का भारी संकट चल रहा है। बहुमंजलीय इमारतों में रहने वाले लोग भी बेहाल हैं। क्योंकि उन्हें पॉवर बैक-अप नहीं मिल रहा। उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों में बिजली कमी को लेकर जगह-जगह जन-आंदोलन चल रहे हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश में बिजली के ‘स्मार्ट मीटर’ का बड़ा घोटाला भी सामने आया है। इन मीटरों को लगवाने का निर्णय योगी सरकार के पहले कार्यकाल में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के नेतृत्व में लिया गया था। इन मीटरों को लेकर जनता की शुरू से ही यह शिकायत रही है कि उनके बिल खपत से कई गुना ज़्यादा आ रहे हैं। अब जब पानी सर के ऊपर से गुज़र गया तो उत्तर प्रदेश की त्रस्त जनता ने ‘स्मार्ट मीटर’ उखाड़ कर फेंकने शुरू कर दिए और आक्रोशित जनता सड़कों पर उतर आई। योगी सरकार ने अब इन मीटरों को ना लगाने का फ़ैसला किया है।


वैसे तो हर साल गर्मियों में खास कर कर उत्तर भारत में बिजली का संकट बहुत बढ़ जाता है। क्योंकि बांधों में जल का स्तर तेज़ी से घटता है और नदियाँ भी सूखने लगती हैं। कारण पहाड़ों पर चल रहे सड़कों के विस्तार ने वृक्षों की अंधाधुंध कटाई की है। जिससे वर्षा की मात्रा तेज़ी से गिर गई है। पहाड़ ही क्यों मैदानों में भी जंगलों की अविवेकपूर्ण कटाई ने देश का हरित क्षेत्र  खतरनाक स्तर तक कम कर दिया है। जब ज़्यादा हरियाली होती है तो वातावरण में नमी पैदा होती है और उससे वर्षा होती है। 



उधर अमरीका-इसराइल-इराक़ युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो, इन युद्धों में जो गोला बारूद रात-दिन आग उगल रहा है, उससे भी ‘ग्लोबल वार्मिंग’ बढ़ रही है। इसका प्रमाण है, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर तेज़ी से घटते हिमखंड। कुछ वर्ष पहले तक यूरोप के लोग गर्मी का नाम ही नहीं जानते थे। वहाँ के घरों में पंखे या एसी नाम का उपकरण नहीं लगाया जाता था। आज यूरोप के इन देशों को भीषण गर्मी की मार झेलनी पड़ रही है। पर किसी भी देश की सरकार पर्यावरण के इस मुद्दे पर गंभीरता से कोई ठोस काम नहीं कर रही।


अगर बिजली की खपत पर लौट कर आएँ तो योगी जी की ये चिंता निर्मूल नहीं है। एक ज़माने में ख़स के पर्दे से ही भवन ठण्डे किए जाते थे। फिर कूलर का दौर आया और आज तो घर-घर ए सी लग गए हैं। पर ए सी की जितनी खपत आम नागरिक करते हैं उससे कई गुना ज़्यादा सरकारी और व्यवसायिक प्रतिष्ठान करते हैं। योगी जी अगर अपने मंत्रालयों के भवनों का औचक निरीक्षण करें तो पाएंगे कि जब अफ़सर और बाबू कमरों में नहीं होते तब भी वहाँ कई-कई ए सी फालतू चलते रहते हैं। यही हाल अन्य प्रांतों के सरकारी दफ्तरों का भी होता है। इसलिए बिजली की खपत कम करने की पहल जितनी नागरिकों की तरफ़ से ज़रूरी है, उतनी ही शासक वर्ग से भी है।



हाइड्रो पॉवर या थर्मल पॉवर की बिजली बनाने की अनेकों सीमाएँ हैं। इनसे उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। बिजली की आपूर्ति को सुनिश्चित करने का सबसे बढ़िया उपाय है, सोलर एनर्जी। भारत जैसे विशाल भूभाग वाले क्षेत्र में भवनों की छतों पर सोलर पैनल लगा कर प्रदूषण मुक्त बिजली पैदा की जा सकती है। चीन इस दिशा में बहुत आगे बढ़ गया है। वो अपनी आवश्यकता से कहीं ज़्यादा बिजली सोलर पैनलों से पैदा कर रहा है। कोचीन का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पूरी तरह सोलर एनर्जी पर निर्भर है। इसलिए शेष प्रांतों में भी इस दिशा में तीव्रता से काम करने की ज़रूरत है। 



उल्लेखनीय है कि मई 2026 में उत्तर प्रदेश ने 31,824 MW का रिकॉर्ड पीक डिमांड पूरा करने का दावा किया है। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे राष्ट्रीय रिकॉर्ड बताते हुए कहा कि शहरों में 24 घंटे और गांवों में 18-22 घंटे बिजली दी जा रही है। केंद्र सरकार भी पूरे देश में 270 GW से अधिक पीक डिमांड को सफलतापूर्वक पूरा करने का दावा कर रही है। 2012 के बड़े ब्लैकआउट की तुलना में यह प्रगति प्रभावित करती है, लेकिन इन आंकड़ों की चमक जमीनी हकीकत को छुपा नहीं पा रही।


वास्तविकता यह है कि यूपी में ललितपुर व घाटमपुर जैसे थर्मल प्लांटों के बंद पड़े रहने से बिजली का संकट गहराया है। कोयला आपूर्ति की कमी और ट्रांसमिशन-डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के पुरानेपन ने स्थिति और बिगाड़ दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 6-12 घंटे तक बिजली गुल रहने की शिकायतें आम हैं। लखनऊ, गोंडा, वाराणसी जैसे शहरों में भी रात के समय बिजली की कटौती हो रही है। यहां तक कि भाजपा के विधायक भी इस मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। 


सरकार का दावा है कि मांग बढ़ने के कारण समस्या है, न कि उत्पादन की कमी। लेकिन सवाल उठता है कि जब हर साल गर्मी आती है और मांग बढ़ती है, तो तैयारी क्यों नहीं होती? पिछले वर्षों में क्षमता में वृद्धि हुई है, लेकिन वितरण व्यवस्था में सुधार अपर्याप्त रहा। ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर, पुरानी लाइनें और शाम के समय सोलर जनरेशन घटने के बाद की कमी को प्रबंधित करने की ठोस योजना नजर नहीं आती। ऊर्जा एक्सचेंज से भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही । क्योंकि पूरे उत्तर भारत में बिजली की मांग समान रूप से बढ़ी हुई है।


यह संकट केवल गर्मी का नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का भी है। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद, बैटरी स्टोरेज और स्मार्ट ग्रिड पर पर्याप्त निवेश नहीं हुआ। किसान, छोटे उद्योग और आम घरेलू उपभोक्ता सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। गर्मी में बिजली न होने से स्वास्थ्य, पानी की आपूर्ति और आजीविका सब प्रभावित हो रही है।


सरकार को अब संख्याओं से आगे बढ़कर समाधान पर ध्यान देना चाहिए। थर्मल प्लांटों का तुरंत रखरखाव, नई ट्रांसमिशन लाइनों का तेजी से निर्माण, डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का आधुनिकीकरण और मांग प्रबंधन की बेहतर रणनीति जरूरी है। ‘24x7 बिजली’ के बड़े-बड़े दावे तब तक खोखले रहेंगे, जब तक जनता को राहत न मिले।


विद्युत क्षेत्र में प्रगति निश्चित रूप से हुई है, लेकिन संकट के समय यह प्रगति जनता तक नहीं पहुंच रही। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी भारी है। सरकार को अब दावों से हटकर वास्तविक सुधार पर ध्यान देना होगा, अन्यथा गर्मी के साथ-साथ जनाक्रोश भी बढ़ता रहेगा।

गौ-माता राष्ट्रीय पशु घोषित हो !

पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजों ने वो कर दिखाया जिसका दशकों से इंतज़ार था। पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने बक़रा ईद पर गौवंश की बलि न चढ़ाने का फ़ैसला किया है। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के मुसलमान संगठनों ने भारत सरकार से गौ-माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग की है। उन्होंने गौ हत्या करने वालों और गौ मांस का निर्यात करने वालों को सख्त सज़ा दिए जाने का क़ानून बनाने की भी माँग की है। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है तब से लगातार गौ हत्या को लेकर गौ रक्षकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आक्रोश व्यक्त किया जाता रहा है। इतना ही नहीं गौ मांस खाने व ले जाने के संदेह में कई बार मुसलमानों पर हिंसक हमले भी किए गए हैं। इस सबसे मुसलमानों के बीच ये संदेश गया है कि हिंदुस्तान में गौ वंश की हत्या को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए उनका ये ताज़ा फ़ैसला और गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग एक समझदारी भरा कदम माना जाना चाहिए। मुस्लिम समाज के नेताओं को यहीं माँग देश के अन्य प्रांतों से भी उठानी चाहिए।   

उल्लेखनीय है कि हमारे पूरे इतिहास में, इस देश के शासकों और आदर्श व्यक्तियों ने गाय की रक्षा और पोषण किया है। राजा पृथु, जिनके नाम पर पृथ्वी को पृथ्वीकहा जाता है, ने पृथ्वी के स्वरूप वाली गाय का दोहन कर पृथ्वी पर अकाल को समाप्त किया और मानवता की रक्षा की। भगवान श्रीकृष्ण एक गोपाल (गाय चराने वाले) थे। अर्जुन ने विराटनगर के युद्ध में गायों की रक्षा के लिए 14 वर्ष का और निर्वासन झेलने का जोखिम उठाना उचित समझा। राजा नहुष को ऋषि च्यवन के जीवन के बराबर पुरस्कार देकर मछुआरों को मुआवजा देना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने उन्हें एक गाय दान कर दी। चोल राजा मनु नीति चोलन ने अपने पुत्र वीधिविदंगन को मार डाला, क्योंकि उसके रथ के पहियों के नीचे एक गाय का बछड़ा कुचल गया था।


मुगल सम्राट अकबर (1556–1605), जहांगीर (1605–1627), और अहमद शाह (1748–1754) ने भी गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाए थे। मैसूर के सुल्तान हैदर अली (1761-82) ने गौ-हत्या को दंडनीय अपराध बनाया, जिसमें अपराधियों के हाथ काटे जाते थे। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में, सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पूरे राज्य में गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने 1857 में गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाया, गोमांस खाने पर रोक लगाई और गाय की हत्या करने वाले किसी भी व्यक्ति को तोप से उड़ाकर सजा देने की घोषणा की।


मराठा, जो सभी धर्मों के प्रति समावेशी और सहिष्णु माने जाते थे, उन्होंने गौ-हत्या को रोकने के लिए व्यापक कदम उठाए और गायों को मारने वालों से कठोरता से निपटा। कई मामलों में उन्हें फाँसी भी दी गई। उन्होंने 1790 के दशक के अंत में बसेन (वर्तमान वसई, महाराष्ट्र) के आसपास नाकेबंदी भी कर दी थी, ताकि गायों की लाशों को बॉम्बे और सलसेट के कसाइयों तक तस्करी से न पहुँचाया जा सके। हिंदू धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज से लेकर आज तक हर संत और सनातन धर्मी गौ वंश की हत्या रोकने की मांग करता आया है। फिर भी रोज़ाना भारत से हज़ारों ट्रक गौ वंश काटने के लिए अवैध रूप से बांग्लादेश भेजा जाता है। आश्चर्य है कि बीएसएफ उसे रोक क्यों नहीं पाती?   


दरअसल गौरक्षा का मुद्दा बिल्कुल धार्मिक नहीं है। यह तो शुद्धतम रूप में लोगों की कृषि, अर्थव्यवस्था और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है। हजारों साल पहले भारत के ऋषियो ने गौवंश के असीमित लाभ जान लिए थे। इसलिए उन्होंने भारतीय समाज में गौवंश को इतना महत्व दिया। अंग्रेज़ शासकों ने बाकायदा रणनीति बनाकर भारतीय गौवंश को पूरी तरह नष्ट करने का अभियान चलाया, जो आज तक चल रहा है। क्योंकि वह जानते थे कि हजारों साल से भारत की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत गौ आधारित कृषि रहा था। बिना गौवंश की हत्या किए भारत और भारतीयों को कमजोर नहीं किया जा सकता था। आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसमें बड़ी होशियारी से पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई। उन्होंने इस तरह की मानसिकता तैयार की कि घर-घर में पलने वाली गाय हमारी उपेक्षा और हीनभावना का शिकार हो गयी। जिससे गाय का दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ सेवन करके हर भारतीय परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान रहता था। आज आम भारतीयों को जीवन के लिए पोषक तत्व प्राप्त नहीं हैं। दूध, दही, घी के नाम पर जो बड़े ब्रांडो के नाम से बेचा जा रहा है, उसमें कितने कीटनाशक, रासायनिक खाद्य और नकली तत्व मिले हैं, इसका अब हिसाब रखना भी मुश्किल है। नतीजा सामने है कि मेडीकल का व्यवसाय हर गली व शहर में तेजी से पनप रहा है।


चिंता और दुख की बात ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन पर जीने वाले कैसे देश के हित में सोच सकते हैं ? वह तो वही लिखेंगे और बोलेंगे, जो उनके कॉरपोरेट आका उन्हें लिखने को कहेंगे। इस लॉबी के खिलाफ देशभक्तो को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। पर हिंसा से नहीं तर्क और प्रमाण के साथ। भारतीय गौवंश की श्रेष्ठता को भारतीय जनमानस के सामने लगातार हर मंच पर इस तरह रखना होगा कि एक बार फिर भारतीय परिवार गौवंश को अपने आंगन में स्थान दे।


गांवों में तो यह आसानी से संभव है, पर दुख की बात है कि वहां भी आज गौवंश की उपेक्षा हो रही है। हमने हमेशा कहा है कि गाय गौशाला में नहीं, बल्कि जब हर घर के आंगन में पलेंगी, तब गौवंश की रक्षा होगी। जिनके पास स्थान का अभाव है, उनकी तो मजबूरी है। पर वह भी भारतीय गौवंश के उत्पादों को सामूहिक रूप से प्रोत्साहन देकर अपने परिवार और समाज का भला कर सकते है। भूटान में हर व्यक्ति सुखी है, क्योंकि उनका जीवन गौ और कृषि आधारित है। उन्हें दुनिया के साथ दौड़ने की इच्छा नहीं है। क्योंकि वह तीव्र औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से परिचित हैं।

फिर भारत क्यों औद्योगीकरण की और ‘बीफ’ निर्यात की अंधी दौड़ में भागना चाहता है, जिसका फल भौतिक प्रगति तो हो सकता है, पर उससे समाज सुखी नहीं होता। बल्कि समाज और ज्यादा असुरक्षित होकर तनाव में आ जाता है। भारत की सनातन संस्कृति सादा जीवन और उच्च विचार को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देती है। इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज हजारों साल से निरंतर जिंदा रहा है। जबकि पश्चिमी समाज ने एक शताब्दी के अंदर ही औद्योगीकरण के नफे और नुकसान, दोनों का अनुभव कर लिया है। अब वह भारतीय जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में भारत को फिर से विश्वगुरू बनना होगा। जो गौ आधारित जीवन और वेद आधारित ज्ञान से ही संभव है। इसमें न तो कोई अतिश्योक्ति है और न ही कोई धर्मांधता। कहीं ऐसा न हो कि सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया। 

Monday, May 25, 2026

भीषण गर्मी: पारम्परिक उपाय ही प्रभावी

पिछले कुछ समय से, मौसम वैज्ञानिकों के हवाले से, ये खबर आ रही है कि इस साल भीषण गर्मी पड़ने वाली है। इस खबर से सबसे ज़्यादा चिंता कृषि वैज्ञानिकों और किसानों को है। ऐसी भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं कि इस साल भी गर्मी विकराल रूप ले लेगी। जिससे सूखे जैसे हालत पैदा हो सकते हैं। ख़रीब की फसल पर तो इसका बुरा असर पड़ेगा ही पर रवि की उपज पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। अमरीका और ईरान युद्ध के चलते पहले ही ऊर्जा संसाधनों पर महंगाई का असर दिखने लगा है और यदि गर्मी ने भी अपना असर दिखाया तो हालत बेकाबू हो सकते हैं। 


वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बढ़ती गर्मी के कारण गेहूं का उत्पादन काफ़ी कम रहेगा। इसके साथ ही फल और सब्ज़ियों के उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। नतीजतन खाद्य पदार्थों के दामों में काफ़ी बढ़ौतरी कि संभावना है। कितना असर होगा ये आने वाले समय पर ही पता चल पाएगा दरअसल गर्मी बढ़ने का एक प्रमुख कारण सर्दियों में होने वाली बारिश का लगातार कम होते जाना है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार दिसंबर, जनवरी और फ़रवरी में औसत तापमान से एक या दो डिग्री ज़्यादा दर्ज किया गया है। इतना सा तापमान बढ़ने से बारिश की मात्रा घट गई है। 



ये तो रही कृषि उत्पादनों की बात, लेकिन अगर शहरी जीवन को देखें तो ये समस्या और भी बड़ा विकराल रूप धारण करने जा रही है। हमारा अनुभव है कि गर्मियों में जब ताल-तलैये सूख जाते हैं और नदियों में भी जल की आवक घट जाती है तो सिंचाई के अलावा सामान्य जन-जीवन में भी पानी का संकट गहरा जाता है। नगर पालिकाएँ आवश्यकता के अनुरूप जल की आपूर्ति नहीं कर पाती। इसलिए निर्बल वर्ग की बस्तियों में अक्सर सार्वजनिक नलों पर संग्राम छिड़ते हुए देखे जाते हैं। नलों में पानी बहुत कम देर के लिए आता है। मध्यम वर्गीय परिवारों को भी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप पानी एकत्र करने के लिए काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है। राजनेताओं, अधिकारियों और संपन्न लोगों को इन विपरीत परिस्थितियों में भी जल संकट का सामना नहीं करना पड़ता। क्योंकि ये लोग आवश्यकता से कई गुना ज़्यादा जल जमा कर लेते हैं। असली मार तो आम लोगों पर पड़ती है। 



भीषण गर्मी पड़ने के साथ लोग कूलर या एयर कंडीशनर की तरफ़ भागते हैं। इससे जल और विद्युत दोनों का संकट बड़ जाता है। हाइड्रो पावर प्लांट में जल आपूर्ति की मात्रा घटने से विद्युत उत्पादन गिरने लगता है। जैसे-जैसे समाज पारंपरिक तरीक़ों को छोड़ कर बिजली से चलने वाले उपकरणों की तरफ़ बढ़ रहा है वैसे-वैसे वातावरण और भी गर्म होता जा रहा है। एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा भी वातावरण को प्रदूषित करने और गर्मी बढ़ाने का काम कर रही है। 1974-76 के बीच मैं एक स्वयंसेवक के रूप में मुरादाबाद के निकट अमरपुरकाशी गाँव में समाज सेवा की भावना से काफ़ी समय तक रहा। इस दौरान हर मौसम में गाँव के जीवन को जिया। मुझे याद है कि मई जून की तपती गर्मी और लू के बावजूद हम सब स्वयंसेवक दोपहर में खुले दालान पर नीम के पेड़ की छाया में सोया करते थे। तब वो छाया ही काफ़ी ठण्डी लगती थी। गर्म लू जब पसीना सुखाती थी तो शरीर में ठंडक महसूस होती थी। इसी तरह रात में छत पर पानी छिड़क कर सब सो जाते थे। रात के ग्यारह-बारह बजे तक तो गर्म हवा चलती थी, फिर धरती की तपिश ख़त्म होने के बाद ठण्डी हवा चलने लगती थी। सूर्योदय के समय की बयार तो इतनी स्फूर्तिदायक होती थी कि पूरा शरीर नई ऊर्जा से संचालित होता था। वहाँ न तो फ्रिज का ठण्डा पानी था, न कोई और इंतज़ाम। लेकिन हैंडपम्प का पानी या मिट्टी के घड़े का पानी शीतलता के साथ सौंधापन लिये शरीर के लिए भी गुणकारी होता था। जबकि आज आरओ के पानी ने हम सबको बीमार बना दिया है। क्योंकि आरओ की मशीन जल के सभी प्राकृतिक गुणों को नष्ट कर देती है। कुएँ से एक डोल पानी खींच कर सिर पर उड़ेलते ही सारे बदन में फुरफुरी आ जाती थी। जिस से दिन भर के श्रमदान की सारी थकावट क्षणों में काफ़ूर हो जाती थी। 



आजकल हर व्यक्ति, चाहे उसकी हैसियत हो या न हो शरीर को कृत्रिम तरीक़े से ठण्डा रखने के उपकरणों को ख़रीदने की चाहत रखता है। हम सब इसके शिकार बन चुके हैं और इसका ख़ामियाज़ा मौसम के बदले मिज़ास और बढ़ती गर्मी को झेल कर भुगत रहे हैं। इस आधुनिक दिनचर्या का बहुत बुरा प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ रहा है। हर शहर में लगातार बढ़ते अस्पताल और दवा की दुकानें इस बात का प्रमाण हैं कि ‘सुजलाम् सुफलाम् मलय़जशीतलाम्, शस्यश्यामलाम्’ वाले देश के हम सब नागरिक बीमारियों से घिरते जा रहे हैं। न तो हमें अपने भविष्य की चिंता है, न ही सरकारों को। समस्याएँ दिन प्रतिदिन सुलझने के बजाए उलझती जा रही हैं।



दूसरी तरफ़ हर पर्यावरणविद् मानता है कि पारंपरिक जलाशयों को सुधार कर उनकी जल संचय क्षमता को बढ़ा कर और सघन वृक्षावली तैयार करके मौसम के मिज़ाज को कुछ हद तक बदला भी जा सकता है। प्रधान मंत्री मोदी का जल शक्ति अभियान और बरसों से चले आ रहे वृक्षारोपण के सरकारी अभियान अगर ईमानदारी से चलाए जाते तो देश के पर्यावरण की हालत आज इतनी दयनीय न होती। सभी जानते हैं कि सरकार द्वारा जहां एक ओर तो वृक्षारोपण व तालाब खोदने को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं जमीनी स्तर पर कथनी और करनी में काफ़ी अंतर है। मिसाल के तौर पर जालौन क्षेत्र में 400 छोटे बांध बनाए गए थे। इनमें से आधे से ज्यादा तबाह हो चुके हैं। ललितपुर जिले में जल संरक्षण के लिए तीन करोड़ रुपये से चल रहा काम निरर्थक हो चुका है। इसी इलाके में बादहा और रसिन बांध के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन इनका भी नतीजा शून्य ही रहा। इसलिए यदि हम पारंपरिक तरीकों पर ध्यान नहीं देंगे तो ऐसे संकट आते रहेंगे।
  



Monday, May 18, 2026

उपजाऊ भूमि का विनाश क्यों ?

एक तरफ तो हम बढ़ती आबादी का रोना रोते हैं। दूसरी तरफ हम अपनी खेती योग्य जमीन को दैत्यों की तरह बर्बाद कर रहे हैं। इस आत्मघाती विकास से हम अपने भविष्य के लिए भीषण खाद्य संकट पैदा होने के हालात बना रहे हैं। यूं तो आजादी के बाद देश में कृषि, ग्रामीण विकास व जल संसाधन जैसे मंत्रालय बने, जिनके मंत्री और अफसर विदेशों में ज्ञान लेने के बहाने भागते रहे। पर क्या वजह है कि इन सबके होते हुए भी देश में कुल 33 करोड़ हेक्टेयर की तिहाई भूमि बंजर है और लगातार बढ़ रही है। जैसे गोबी मरुस्थल से उड़ी धूल उत्तर चीन से लेकर कोरिया के उपजाऊ मैदानों को ढक रही है, उसी तरह थार मरुस्थल की रेत उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों को निगल रही है। अरावली पर्वत काफी हद तक धूल भरी आंधियों को रोकने का काम करता है, लेकिन अंधाधुंध खनन की वजह से इस पर्वतमाला को नुकसान पहुंच रहा है, जिससे यह धूल भरी आंधियों को पूरी तरह नहीं रोक पा रही है। उधर हर साल 84 लाख टन भूमि के पोषक तत्व बाढ़ आदि की वजह से बह जाते हैं। कीटनाशक भी हर साल 1.4 करोड़ वर्ग किमी भूमि की उर्वरकता खत्म कर रहे हैं। इसी तरह लवणीयता और क्षारपन भी हर साल 270 हजार वर्ग किमी क्षेत्र को बंजर बना रहे हैं। 



अणुबम से भी घातक कैमिकल्स, कीटनाशक दवाएं, रासायनिक खाद व जहरीली दवाओं के अमर्यादित प्रयोग से भूमि बंजर बन रही हैं। साथ ही साथ उद्योगों से निकला प्रदूषित जल वाष्पित होकर ऊपर जाता है। फिर प्रदूषित एवं क्षारीय जल की वर्षा से भूमि पूर्णतया बंजर बन रही है। इसी प्रकार इन दवाओं का प्रयोग होता रहा तो अगले 50 वर्षों में सारे देशवासी भयानक रोगों से ग्रस्त जाएंगे। 


हाल के वर्षों में औद्योगिक कचरे से भी भूमि और जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। उद्योगों से निकले कचरे और प्रदूषित जल को नदियों में छोड़े जाने से भूतलीय और भूमिगत जल प्रदूषित हो गया है। इस तरह के प्रदूषित जल का सिंचाई के लिए इस्तेमाल किए जाने से जमीन भी खराब हो गई है। ताजा अनुमानों के अनुसार इस सबसे 34,500 हेक्टेयर भूमि बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके साथ ही भारी मात्रा में पॉलीथिन और प्लास्टिक का कचरा पृथ्वी की उर्वरकता को तेजी से खत्म कर रहा है, क्योंकि यह कचरा गलता नहीं है। इसलिए यह जमीन के लिए बहुत ही घातक है। जिस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगना चाहिए, लेकिन न तो केंद्र सरकार ऐसा कर पा रही हैं और न राज्य सरकारें। 



जमीन में बोरिंग करके अंधाधुंध पानी खींचने से पृथ्वी के भीतर भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आई है। जिससे जमीन की नमी खत्म हुई है और रेगिस्तान बढ़ता जा रहा है। फिर भी हमें अकल नहीं आ रही। 1947 में देश में एक हजार ट्यूबवेल थे, जिनकी तादाद अब 2.10 करोड़ से भी अधिक है और हर पा बढ़ती जा रही है। इससे भूमिगत पानी की सतह तेजी से नीचे होती जा रही है। इसी तरह औद्योगीकरण के इस दौर में समुद्री तटों के आसपास मनुष्यों के रहने लायक स्थिति नहीं बची है। क्योंकि आए दिन समुद्री पानी से भूमि का कटाव होकर खारा पानी आबादी क्षेत्र में 30 से 100 किमी तक प्रवेश करने लगा है। गुजरात के जामनगर, द्वारिका, जूनागढ़, भावनगर और अमरैली के तटीय गांव उजड़ने की कगार पर हैं। जिसका एक मात्र कारण तटीय जमीन का अत्यधिक कटाव किया जाना है। इतना ही नहीं बल्कि देश में हो रहे बेरोकटोक अंधाधुंध खनन से जमीन पोली हो रही है। भूचाल के खतरे बढ़ रहे हैं और इससे होने वाले प्रदूषण से भूमि बंजर हो रही है। 



खानों का कचरा खुले में फैलने से व सीमेंट उद्योग के लिए चूना-पत्थर और चीनी मिट्टी उद्योग के लिए कैल्साइट और खडि़या पत्थर की पिसाई से जो धूल उड़ती है, वह आसपास की उपजाऊ जमीन को बर्बाद कर देती है। नब्बे फीसदी खान मालिकों द्वारा खुली खदान प्रणाली के जरिये खनन कार्य किया जा रहा है। खनन पूरा हो जाने के बाद उस क्षेत्र को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। इसे फिर सही करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाता। जिससे पूरा क्षेत्र हमेशा के लिए बर्बाद होकर रेगिस्तान बन जाता है। 


वनस्पतियों का विनाश भी जमीन को बंजर बनाने का कारण है। मरुस्थलीयकरण का सबसे पहला शिकार पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ होती हैं। जमीन पर बढ़ते दबाव से पेड़-पौधों और वनस्पतियों के हृास में खतरनाक वृद्धि हो रही है। गाँवों के आस-पास चरागाहों की जमीन बुरी तरह बर्बाद हुई है, क्योंकि उसकी सबसे अधिक उपेक्षा और सबसे ज्यादा दोहन हुआ है। इस प्रकार उपजाऊ भूमि भी रेगिस्तान बनती जा रहे है।  



हमारे देश के प्रधानमंत्रियों को भारत के किसानों और उनकी जमीनों की गिरती उर्वरकता की गहरी चिंता रही है। ऐसा वे अपने वक्तव्यों से संकेत देते रहे हैं, लेकिन अभी तक इस समस्या का कोई ठोस समाधान भारत की कोई भी सरकार आजादी के बाद से नहीं दे पाई है। नतीजतन, यह विनाश बेरोकटोक जारी है। खेतों में अंधाधुंध रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग भूजल में फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ा चुका है। जिसका मानवीय स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। सबको सबकुछ मालूम है। पर कोई कुछ ठोस नहीं करता। ऐसे में इस विकट समस्या पर प्रधानमंत्री और उनके संबंधित मंत्रालयों को गंभीरता से सोचना चाहिए और कृषि योग्य भूमि के संरक्षण को प्रोत्साहित करते हुए उसका विनाश करने वालों से कड़ाई से निपटना चाहिए।
 

Monday, May 11, 2026

जनता की जान की क़ीमत पर वीआईपी सुरक्षा क्यों?

नर्मदा नदी के बरगी बाँध के दुखद हादसे के बाद सोशल मीडिया पर एक आम नागरिक की टिप्पणी ने मुझे कुछ सोचने पर मजबूर किया। उसका कहना था कि जब देश में ऊर्जा संकट बढ़ रहा है और अनावश्यक दुर्घटनाओं में कीमती जीवन समाप्त हो रहे हैं, तो वीआईपी सुरक्षा के नाम पर हज़ारों गाड़ियाँ और सुरक्षा कर्मी क्यों रात-दिन भागते रहते हैं? जबकि यही सुरक्षा कर्मी अगर यातायात, भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा नियमों के कड़े अनुपालन और  आपदा प्रबंधन के लिए तैनात रहे तो आम जनता को कितनी राहत मिलेगी? भारतीय मूल का 38 वर्षीय हिमांशु गुलाटी नॉर्वे का तीसरी बार सांसद है और वहाँ का उप-कानून मंत्री भी। उसे कोई वीआईपी सुरक्षा नहीं मिली हुई। उसने मुझे बताया कि नॉर्वे की पिछली प्रधान मंत्री एर्ना सोलबर्ग जब एक बार उसके घर रात्रि भोज पर आईं तो वे बिना किसी सुरक्षा बंदोबस्त के स्वयं कार चला कर आईं और सीधे रसोई में जा कर रसोइए से हाल चाल पूछने लगीं। सिडनी से मेरी मित्र विमला ने पिछला लेख पढ़ कर फ़ोन पर बताया कि कुछ दिन पहले वो सिनेमा घर में फ़िल्म देख रही थीं। अचानक उसकी निगाह पड़ी ऑस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री पर जो उसी पंक्ति में बिना किसी सुरक्षा के फ़िल्म देख रहे थे। अमरीका और यूरोप के देशों में अक्सर आपको वर्तमान व निवर्तमान राष्ट्राध्यक्ष आम आदमी की तरह बाज़ारों में घूमते हुए दिख जाते हैं। जिनके आगे पीछे कोई सुरक्षा घेरा नहीं होता। नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री बालेंद्र शाह ने नेपाल में वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने के लिए कई कड़े निर्णय लिए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपने फैसलों पर टिके रहेंगे। 


यहाँ मेरा आशय भारत के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री व प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों आदि की आवश्यक सुरक्षा को लेकर कोई टिप्पणी करने का नहीं है। पर इनके अलावा देश में लगभग 19,000 ऐसे लोग हैं जिन्हें सरकारी सुरक्षा प्रदान की गई है। जिस पर 66,000 सुरक्षा कर्मी तैनात हैं। अकेले दिल्ली में 500 लोगों को वीआईपी सुरक्षा मिली है जिस पर लगभग 750 करोड़ रुपया सालना खर्च होता है। अंदाज़ा लगाइए कि बाक़ी 18,500 लोगों की सुरक्षा पर कितने हज़ार करोड़ रुपया खर्च होता होगा? ये पैसा उस मतदाता की मेहनत की कमाई पर टैक्स लगाकर वसूला जाता है जिसे नर्मदा या वृंदावन की यमुना में सुरक्षा नियमों की लापरवाही के कारण बार-बार जान गवानी पड़ती है। 


मुझे याद है कि 2003-05 में जब मैं वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर का अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर था तो मैंने वहाँ वीआईपी गाड़ियों के प्रवेश को रोकने के लिए दो मुख्य रास्तों के शुरू में ही लोहे की चेन लगवा दी थी जो आजतक लगी हैं। ऐसा मैंने तब किया जब संकरे प्रवेश मार्ग में मंदिर तक जाने को आमदा एक एसडीएम की गाड़ी ने एक वृद्ध महिला को कुचल दिया। गली के बाहर मैंने एक बोर्ड भी टंगवा दिया था। जिस पर लिखा था, ‘बिहारी जी धनीनाथ या वीआईपीनाथ नहीं हैं - वे दीनबंधु दीनानाथ हैं। उनके द्वार पर दिन बनकर आओगे तभी उनकी कृपा पाओगे।’ मुझे खुशी है कि न सिर्फ़ केंद्रीय मंत्रियों ने बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक ने इस नियम का पालन किया।


पिछले कई दशकों से हालत यह है कि हर चंगू-मंगू, ऐरा-गैरा अपने राजनैतिक संपर्कों का लाभ उठा कर सरकारी सुरक्षा ले लेता है और फिर जनता के बीच दबंगई से घूमता है। इनमें से 99 फ़ीसदी लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कोई ख़तरा नहीं होता। पर अपनी ताक़त और रुतबे का प्रदर्शन करने के लिए उन्हें सरकारी सुरक्षा पाने की लालसा रहती है। अगर पाठकों को ये आत्मश्लाघा न लगे तो विनम्रता से यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि 1993-98 के बीच अलग-अलग जगहों पर मुझ पर कई बार जानलेवा हमले हुए। क्योंकि ‘जैन हवाला कांड’ को उजागर करके मैंने देश के सबसे ताकतवर लोगों और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों के विरुद्ध अकेले ही युद्ध छेड़ दिया था। पर प्रभु कृपा से मैं न तो डरा, न झुका और न बिका। उस दौर में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी एन शेषन और मैं देश भर में जनसभाओं को संबोधित करने जाते थे तो अक्सर मुझसे यह प्रश्न पूछा जाता था कि ‘आप इतना ख़तरनाक युद्ध लड़ रहे हैं, आपको डर नहीं लगता?’ मेरा श्रोताओं को उत्तर होता था, ‘मारे कृष्णा राखे के, राखे कृष्णा मारे के’, श्री चैतन्य महाप्रभु के उक्त वचन से मुझे नैतिक बल मिलता था। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि बड़े-बड़े मंचों से धार्मिक प्रवचन करने वाले केसरिया वेश धारी भी कमांडो और पुलिस के घेरे में रह कर गर्व का अनुभव करते हैं। माया मोह त्यागने का उपदेश देने वालों की कथनी और करनी में इस भेद के कारण ही देश की आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं हो पा रहा है। धर्म भी एक शान-शौकत की चीज़ बनता जा रहा है।  


समय की माँग है कि प्रधान मंत्री मोदी जी सभी राज्यों के मुख्य मंत्रियों के साथ इस विषय पर गंभीर चिंतन करें और एक ऐसी नीति बनाएँ जिसमें सरकार की ओर से केवल राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को छोड़ कर बाक़ी किसी को तब तक सुरक्षा न मिले जबतक की वास्तव में उनके जीवन को गंभीर ख़तरा न हो। इसमें उन राजनेताओं को भी अनावश्यक सुरक्षा न दी जाए जो इन पदों पर रह चुके हों, पर अब किसी पद पर न हों। इसके बावजूद अगर कुछ नेता, उद्योगपति या अन्य लोग सरकारी सुरक्षा पाने के लिए आवेदन करें तो उन्हें यह सुरक्षा इस शर्त पर दी जाए कि वे इसका खर्चा स्वयं वहन करेंगे। यहाँ कोई सवाल खड़ा कर सकता है कि इन लोगों को सुरक्षा देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। उसका उत्तर है कि जो लोग शासन प्रशासन की लापरवाही से आए दिन दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है?  

Monday, May 4, 2026

पर्यटन का विस्फोट : खतरे की घंटी !

इस हफ़्ते जबलपुर में नर्मदा नदी के बरगी बाँध पर मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग की क्रूज बोट के अंधड़ में पलट जाने से नौ लोगों की डूब कर दर्दनाक मौत हो गई। दो हफ़्ते पहले उत्तर प्रदेश के वृंदावन में यमुना में भी नाव पलटने से दस लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। सुरक्षा नियमों का लागू न होना और बिना लाइफ जैकेट के पर्यटकों को नावों, स्टीमरों या क्रूज़ बोट्स में सैर सपाटा कराना, इन हादसों का मुख्य कारण है। ऐसे हादसे देश में आए दिन हो रहे हैं। पर उन से किसी भी राज्य की सरकार या प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया। ऐसा लगता भी नहीं कि आने वाले दिनों में इस दिशा में कोई कड़ी पहल की जाएगी। लोग अपनी मस्ती में जान जोखिम में डालते रहेंगे, चाहे उनकी ज़िंदगी को कितना ही ख़तरा क्यों न हो। 


पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों, तीर्थ नगरियों और कुंभ जैसे धार्मिक उत्सवों में लगातार बढ़ती दर्शनार्थियों की भीड़ अब इतनी बेकाबू हो गई है कि उसमें कुचल कर सैंकड़ों जानें चली जाती हैं। जैसे जनवरी 2025 में प्रयाग के कुंभ में हुआ, जहाँ बहुत लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए। और यही हाल कई बार वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में हुआ। मार्च 2026 में शीतला मंदिर (नालंदा, बिहार) में पूजा के दौरान भगदड़ में 8 लोग मारे गए, कई घायल हुए। 2025 में भारत में कुल 8 से ज़्यादा भगदड़ हादसों में 129 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें ज्यादातर धार्मिक स्थलों पर हुईं। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ बेक़सूर लोगों ने भीड़ के कारण अपनी जान गवाई।  


राज्यों के मुख्य मंत्री बड़े गर्व से घोषणा करते हैं कि उनके यहाँ पर्यटकों की संख्या कितनी तेज़ी से बढ़ रही है। पर वो ये नहीं बताते कि पर्यटकों की इस बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के काम में वे कितना असफल हो रहे हैं। इसी हफ़्ते केदारनाथ में इतनी भीड़ बड़ गई कि बहुत से दर्शनार्थियों को बिना दर्शन के बैरंग लौटना पड़ा। क्या वजह है कि तिरुपति बालाजी जैसे कुछ अपवादों को छोड़ कर किसी भी राज्य की सरकार पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की भीड़ को व्यवस्थित तरीके से संचालित या नियंत्रित नहीं करना चाहती? जबकि ऐसा करना बिल्कुल असंभव नहीं है। मुझे याद है कि 1984 में मैं स्विट्जरलैंड के माउंट ब्लांक के सर्वोच्च शिखर पर जाने लिए जब उस पर्यटन स्थल से 50 मील दूर था, तो स्थानीय पुलिस ने हमारी जैसी सैंकड़ों गाड़ियों को वहीं रोक दिया और हमें तब तक इंतज़ार करने को कहा जब तक की एक निर्धारित संख्या की गाड़ियाँ सामने की तरफ़ से लौट नहीं आईं। इस तरह उन्होंने पहाड़ की तलहटी में अनियंत्रित भीड़ होने की संभावना को ख़ारिज कर दिया। क्या ऐसी नीतियाँ हमारी प्रदेश सरकारें नहीं अपना सकती? पुलिस का जितना अमला हर राज्य में छोटे से बड़े तथाकथित वीआईपीयों की सुरक्षा व्यवस्था में रोज़ाना खपा रहता है, वो अगर हर तीर्थस्थल या पर्यटन स्थल के भीड़ नियंत्रण पर तैनात किया जाए तो न तो दुर्घटनाएं होंगी और न ही यात्रियों व स्थानीय नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। 


हमारी प्रदेश सरकारें इस बात में बहुत गर्व महसूस करती हैं कि उनकी नीतियों के कारण उनके प्रदेश में पर्यटन दिन दुगना और रात चौगुना बढ़ रहा है। पर इस पर्यटन विस्फोट से जो अव्यवस्था फैलती जा रही है, उसका उल्लेख कोई मुख्य मंत्री नहीं करता। भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर हर महत्वपूर्ण शहर में प्लास्टिक और कूड़े के अंबार लगते जा रहे हैं। जिनसे निपटने की कोई योजना किसी भी सरकार के पास नहीं है। कूड़े के ये पहाड़ न सिर्फ़ आँख की किरकिरी हैं बल्कि जनता के स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा भी पैदा कर रहे हैं। मोदी जी की पहल पर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का कोई असर इन तीर्थ नगरियों और पर्यटन क्षेत्रों में दिखाई नहीं देता। फिर वो चाहे पहाड़ों की घाटियाँ हों, समुद्र और नदियों के तट हों या हरे भरे जंगल, हर ओर कूड़े के अंबार लगते जा रहे हैं। इसलिए पश्चिमी देश भारत को दुनिया का सबसे गंदा देश अगर कहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है? 


पर्यटन विस्फोट की इस आपाधापी में प्रांतीय सरकारों को इस बात की चिंता नहीं है कि देश के नागरिकों को खाने के सामानों या प्रसाधन की वस्तुओं में कितना ज़हर परोसा जा रहा है। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भारी मात्रा में मरे हुए जानवरों की चर्बी से बनाए जा रहे नकली घी के भारी भंडार छापों में पकड़े गए हैं। पर ये कारवाई प्रतीकात्मक ज़्यादा है, प्रभावी कम। क्योंकि ऐसे नक़ली घी का कारोबार बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से चल रहा है। इसी तरह उत्तर भारत में रसायनों से बने नकली दूध और पनीर को सरेआम बेचा जा रहा है। फल और सब्जियों की तो बात ही छोड़ दीजिए, उन पर हानिकारक कीटनाशक और खतरनाक रसायन छिड़क कर नक़ली रंगों से तरो-ताज़ा दिखा कर हर मंडी में बेचा जा रहा है। आम आदमी असहाय है, वो कुछ कर नहीं सकता इसलिए न चाह कर भी अपने परिवार को ये ज़हरीले पदार्थ खिलाने पर मजबूर है। पर्यटन और तीर्थ क्षेत्रों में तो मिलावट का धंधा कई गुना ज़्यादा हो रहा है। क्योंकि विक्रेता के सामने जो ग्राहक खड़ा है वो एक बार ही उसके होटल आया है और अगले दिन लौट जाएगा तो दूसरा ग्राहक आ जाएगा। इसलिए उसे शिकायत नहीं झेलनी पड़ती। 


इस तरह हो रहे पर्यटन विस्फोट ने इन क्षेत्रों के आधारभूत ढांचों की कमर तोड़ दी है। जिसका समाधान शहरीकरण के नए-नए मेगा प्रोजेक्ट बनाना नहीं है। क्योंकि उनसे उस तीर्थाटन या पर्यटन क्षेत्र का नैसर्गिक स्वरूप और आध्यात्मिक चेतना, दोनों का तेज़ी से विनाश होता है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में भारत के ये क्षेत्र एक नासूर बन कर रह जाएँगे। जबकि दुनिया के तमाम देशों ने अपने पर्यटन उद्योग को नियमों के तहत बांधकर रखा है और अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को बिगाड़ने नहीं दिया। अमरीका के पश्चिमी तट पर एक तरफ़ घने पहाड़ और जंगल और दूसरी तरफ़ लहराते समुद्र के बीच हमारी कार तेज़ी से दौड़ रही थी, मुझे भूख लगी तो मेरे मेजबान ने जंगल के भीतर जा रही एक छोटी सड़क पर कार मोड़ दी। कुछ किलोमीटर जंगल पार करने के बाद मुझे ये देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहाँ स्थित खाने-पीने और मनोरंजन का एक बड़ा केंद्र मौजूद था। पर वो समुद्र तट और जंगल के बाद था। इसलिए समुद्र तट का प्राकृतिक सौंदर्य इससे प्रभावित नहीं हुआ था। जबकि केरल में त्रिवेंद्रम का कोवलम बीच या गोवा के समुद्र तट बेतरतीब विकसित हुए होटलों के कारण अपनी प्राकृतिक पहचान खो चुके हैं। आख़िर हम कब जागेंगे?  

किन्नरों को जबरन वसूली का अधिकार नहीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक किन्नर की याचिका पर नेग के नाम पर जबरन वसूली को ग़ैर क़ानूनी करार दिया है। अदालत ने इस तरह की वसूली को भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत अपराध बताया है। यह केस उत्तर प्रदेश के गौंडा ज़िले के किन्नर रेखा देवी की याचिका पर सुना जा रहा था। जिसमें रेखा देवी ने अपनी जजमानी का इलाक़ा निर्धारित करने की अदालत से माँग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि इलाक़ों की भौगोलिक सीमा स्पष्ट ना होने के कारण, प्रायः किनारों के अलग-अलग समूहों के बीच झड़पें व हिंसा तक होती है। पर अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए उक्त निर्णय सुनाया। 



यह सही है कि घर में ख़ुशी के मौक़े पर, जैसे पुत्र या पुत्री का जन्म, विवाह या नए घर में गृह-प्रवेश के अवसर पर किन्नर बधाई देने आते हैं और नाच गा कर अपना नेग माँगते हैं। भारत में यह अनूठी प्रथा हज़ारों सालों से चली आ रही है। इसकी जड़ें पौराणिक काल में हैं।


सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से स्वीकृत कथा रामायण से जुड़ी है। जब भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या से जाते हैं, तो वे लोगों (पुरुषों और स्त्रियों) को वापस लौट जाने को कहते हैं। किन्नर (जो न पुरुष हैं न स्त्री) इस आदेश से खुद को बंधा नहीं मानते और राम की प्रतीक्षा में वहीं रह जाते हैं। 14 वर्ष बाद राम लौटते हैं तो उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर राम उन्हें वरदान देते हैं कि शुभ अवसरों पर उनका आशीर्वाद विशेष रूप से फलीभूत होगा। इसी वरदान को बधाई की परंपरा का मूल माना जाता है। किन्नर समुदाय गाते-बजाते, तालियां बजाते हुए आशीर्वाद देते हैं और बदले में नेग (दक्षिणा या उपहार) लेते हैं। यह मान्यता है कि उनकी उपस्थिति और आशीर्वाद नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है और सौभाग्य लाती है। यह कथा वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस दोनों में मिलते हैं।



इसी तरह महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप (तीसरे लिंग वाला) और शिखंडी जैसे पात्र तीसरे लिंग की मान्यता दिखाते हैं। लगभग 400 ईसा पूर्व लिखे गए कामसूत्र में किन्नरों का स्पष्ट उल्लेख है। वेदों, पुराणों और अन्य शास्त्रों में भी किन्नरों का जिक्र मिलता है। किन्नरों को गायन, नृत्य और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा माना जाता था। कई विद्वान और स्रोत इस समुदाय की उपस्थिति को 4000 वर्ष से अधिक पुरानी बताते हैं।


मुगल काल में हिजड़ों की भूमिका और संगठित हुई। वे हरम की रखवाली, दरबारी सेवाएं और प्रशासन में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। बधाई की परंपरा इस काल में अधिक प्रचलित और संरचित रूप में चली, जहां वे शुभ अवसरों पर नृत्य-गान करके आशीर्वाद देते और नेग प्राप्त करते थे। दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य में उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति मजबूत थी।



अंग्रेज़ों ने 1871 के ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के तहत किन्नरों को अपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनकी पारंपरिक आजीविका और सम्मान प्रभावित हुआ। आज़ादी के बाद यह क़ानून समाप्त कर दिया गया। इस तरह बधाई-नेग की परंपरा उत्तर भारत, खासकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में आज भी जीवित है। कुछ राज्यों में सरकार ने नेग की दरें तय करने की कोशिश भी की है। पर उसमें विशेष कामयाबी नहीं मिली। 



इसी अस्पष्टता का लाभ उठा कर किन्नर समुदाय प्रायः अपने जजमानों से जबरन वसूली करता है। कभी-कभी तो वसूली का तरीका बहुत अभद्र होता है। जिसमें जजमान के परिवार के सामने निर्वस्त्र हो जाना, भद्दी गालियाँ देना, बद्दुआएँ देना और डराना धमकाना। कभी-कभी यह सब नाटक इस सीमा तक हो जाता है कि भयभीत जजमान अपनी आर्थिक हैसियत से कई गुना ज़्यादा दे कर पिंड छुड़ाता है। ऐसी वसूली को ‘नेग’ कतई नहीं कहा जा सकता। ये सरासर गुंडई और अवैध वसूली का तरीका है, जिस पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन को लगाम लगानी चाहिए। इसके साथ ही कई बार ऐसी घटनाएँ भी सामने आती हैं जब बाकायदा सम्पूर्ण पुरुष होते हुए भी मर्द, स्त्री का रूप धारण कर किन्नर होने का दावा करते हैं और इस वसूली में अपनी ताक़त दिखाते हैं। 


हमारी सामाजिक मान्यताओं के अनुसार किन्नरों का शुभ अवसरों पर आकर गाना बजाना और बधाई देना शुभ माना जाता है। समाज इनका ख़ुशी से स्वागत करता है और ऐसे अवसरों पर अड़ोसी-पड़ोसी जुट कर इनके साथ हास-परिहास भी करते हैं। ये एक स्वस्थ परंपरा है। प्रायः छोटे शहरों और कस्बों में किन्नरों के समूह कई पीढ़ियों तक अपने जजमान परिवारों से जुड़े रहते हैं और उनकी सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद देते हैं। देखा जाए तो सभी किन्नर संपन्न नहीं होते। वे अभावों में पलते हैं। उनकी आर्थिक, शैक्षिक या स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का उचित इंतज़ाम नहीं होता। फिर भी वे पारस्परिक सहयोग से अपना जीवन यापन कर लेते हैं। ऐसे में किन्नरों को नाचने गाने या भीख मांगने से हटा कर छोटे व्यवसायों या नौकरियों में लगाने की ज़िम्मेदारी, सरकार और समाज दोनों की है। जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। पर आपराधिक तरीके से जबरन वसूली करने वाले किन्नरों से परिवारों को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी स्थानीय पुलिस को तत्परता से निभानी चाहिए, जबकि ऐसा नहीं होता। इस समस्या को भी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है।