Showing posts with label Nirmala Sitharaman. Show all posts
Showing posts with label Nirmala Sitharaman. Show all posts

Monday, February 7, 2022

बजट इतना फीका क्यों?


आपको याद होगा कि आठ साल पहले तक जब आम बजट पेश किया जाता था तो सारे देश में एक उत्सुकता का माहौल होता था। देश के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट तो बजट के काफ़ी पहले आ जाती थी जिससे देश की आर्थिक सेहत का अंदाज़ा लग जाता था। फिर शुरू होता था उद्योगपतियों, व्यापारियों, व्यवसाइयों व अर्थशास्त्रियों का वित्त मंत्री से संभावित बजट को लेकर वार्ताओं का दौर।
 

जिस दिन वित्त मंत्री लोक सभा में बजट प्रस्तुत करते थे उस दिन शहरों में सामान्य गति थम सी जाती थी। उद्योगपतियों और व्यापारियों के अलावा कर सलाहकार टीवी के पर्दे से चिपके रहते थे। यहाँ तक कि मध्यमवर्गीय और नौकरी पेश लोग भी इस उम्मीद में वित्त मंत्री का बजट भाषण सुनते थे कि शायद उन्हें भी कुछ राहत मिल जाए। बजट प्रस्तुति के साथ ही मीडिया में कई दिनों तक बजट का विश्लेषण किया जाता था, जिसे गम्भीर विषय होते हुए भी लोगों को सुनने में रुचि होती थी। जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है तब से बजट को लेकर देश भर में पहले जैसा न तो उत्साह दिखाई देता है और न उत्सुकता। इसका मूल कारण है संवाद हीनता। 



ऐसा नहीं है कि पिछली सरकारों में लोगों की हर माँग और सुझावों का उस वर्ष के बजट में समावेश होता हो। पर मौजूदा सरकार ने तो इस परम्परा को ही तिलांजलि दे दी है। नोटबंदी व कृषि क़ानून अचानक बिना संवाद के जिस तरह देश पर सौंपे गए उससे देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक सौहार्द का भारी नुक़सान हुआ। जिसका ख़ामियाज़ा देशवासी आज तक भुगत रहे हैं। नीतियों को बुलडोज़र की तरह थोपने और ‘डबल इंजन की सरकार’ जैसे दावे करने का कोई सकारात्मक परिणाम अभी तक सामने नहीं आया है। हां इससे देश में अराजकता, तनाव व असुरक्षा ज़रूर बढ़ी है जो किसी सभ्य समाज और भारत जैसे सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए एक अच्छा लक्षण नहीं है। 


चूँकि आम बजट पर चर्चा करने की एक रस्म चली आ रही है तो हम भी यहाँ निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट का विश्लेषण कर लेते हैं। इस बार के बजट को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ आई हैं। कुछ लोग इसे एक साधारण बजट कह रहे हैं वहीं कुछ लोग इसमें की गई घोषणाओं को चुनावों से पहले की राजनैतिक घोषणाएँ मान रहे हैं।   


मशहूर अर्थशास्त्री डॉ अरुण कुमार के एक विश्लेषण में दिए गए आँकड़ों की मानें तो वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजट में कुल 39.44 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि 2020-21 का संशोधित अनुमान के अनुसार यह 37.7 लाख करोड़ रुपये का था। इस आँकड़े से यह सिद्ध होता है कि जिस 5.5 फीसदी के हिसाब से महंगाई बढ़ी, उस हिसाब से खर्च नहीं बढ़ा। इसका मतलब यह है कि अगर खर्च वास्तविक अर्थ में नहीं बढ़ा, तो बाजार में मांग कैसे बढ़ी? अगर पूंजीगत व्यय की बात करें तो उस मद में भी इस साल का संशोधित अनुमान 6.3 लाख करोड़ रुपये था। परंतु आंकड़े बताते हैं कि नवंबर 2021 तक 2.5 लाख करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हुए। इसलिए, यह समझ नहीं आता कि नवंबर 2021 के बाद के चार महीने में बचे हुए करीब चार लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे? डॉ कुमार के अनुसार अगले साल 7.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की बात भी अतिशयोक्ति सी प्रतीत होती है। जबकि विकास की गति बरकरार रखने के लिए कुल खर्च को महंगाई के अनुपात में बढ़ाने की जरूरत थी।  


डॉ कुमार ने अपने विश्लेषण में यह भी कहा कि सरकार को ऐसे क्षेत्र में भी अपने खर्च बढ़ाने चाहिए थे, जहां से रोजगार पैदा होने की ज़्यादा उम्मीद होते। जैसे कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में खर्च बढ़ता तो बेहतर होता। सोचने वाली बात यह है कि इस बार के बजट में इस मद में अगले वर्ष लगभग  73 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की गई है, जबकि वर्तमान वर्ष में 98 हजार करोड़ खर्च किए जाएंगे। इसी तरह, सब्सिडी में भी कटौती की गई है। 2021-22 के संशोधित अनुमान में 1.40 लाख करोड़ रुपये खाद सब्सिडी देने की बात की गई थी। परंतु 2022-23 के बजट में इसे भी घटाकर 1.05 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। वहीं खाद्य सब्सिडी को भी बजट में घटाकर 2.06 लाख करोड़ कर दिया गया है। डॉ कुमार इसे उचित नहीं मानते, क्योंकि देश के गरीबों के हाथ में अभी पैसा देना जरूरी है।


बजट के बाद से ही सोशल मीडिया में बजट को लेकर वित्त मंत्री का काफ़ी मज़ाक़ उड़ाया गया है।  असल में वित्त मंत्री द्वारा की गई घोषणाओं में काफ़ी बातें विरोधाभासी दिखाई दी। जैसे कि उन्होंने एक ओर पर्यावरण को बचाने के लिए घोषणा की वहीं शहरीकरण को बढ़ावा देने की भी बात कह डाली। बजट में सरकार ने कहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक डिजिटल करेंसी शुरू करेगा। एक ओर सरकार ने क्रिप्टो करेंसी को हतोत्साहित करने का प्रावधान तो किया है, लेकिन उस पर प्रतिबंध नहीं लगाए हैं। 


बजट में आम आदमी की चिंता प्रत्यक्ष कर या अप्रत्यक्ष करों की दरों से जुड़ी रहती है। इस बार के बजट में तमाम आंकड़ों के बावजूद यह नहीं बताया गया कि इन करों में कोई बदलाव न करने से कर संग्रह पर क्या असर होगा? महंगाई और महामारी से जूझते हुए आम आदमी को इस उलझे हुए बजट में कुछ विशेष नज़र नहीं आया है। आम आदमी को यह उम्मीद थी कि पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरें में रखा जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जिस तरह हीरे पर कर में छूट दी गई है उससे तो यह लगता है कि उद्योगपतियों को सारी सुविधाएं हैं, लेकिन जनता को टैक्स की जंजीर में जकड़ दिया गया हैं। वहीं किसान नेताओं के अनुसार इस बजट में किसानों के लिये भी कुछ विशेष नहीं हैं। देश का व्यापारी वर्ग भी इस बजट से निराश हैं।


जिस तरह बड़ी योजनाओं के लिए इस बजट में पैसे बढ़ाए गए हैं और दावा किया जा रहा है कि इनका अनुमानित लाभ आने वाले 3 वर्ष में मिलेगा, उससे तो यह लगता है कि सरकार के इस बजट में अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए किसी त्वरित वित्तीय प्रावधान नहीं है। उसी तरह 30 लाख नए रोजगार बनाने की बात कही गई है, लेकिन यह रोजगार कैसे बनेंगे? इसका कोई रोडमैप नहीं है। चुनावों से पहले इस बजट में जनता के लिए यह बजट मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा ही दिखाई दे रहा है। अब देखना यह है कि इस बजट का  चुनावों के परिणाम पर क्या असर होता है?

Monday, January 6, 2020

बजट के पहले की दुविधा

2020 का बजट असाधरण परिस्थितियों में आ रहा है। सरकार पर चारों तरफ से दबाव हैं। अर्थव्यवस्था में मंदी या सुस्ती के दौर में चैतरफा दबाव होते ही हैं। वैसे सरकार ने अपने तईं हर उपाय करके देख लिए। हालात अभी भले ही न बिगड़े हों लेकिन अर्थव्यवस्था के मौजूदा लक्षण सरकार को जरूर चिंता में डाले होंगे। 

यह पहली बार हुआ है कि सरकार ने संजीदा होकर बजट के पहले हर तबके से सुझाव मांगे। हालांकि ज्यादातर सुझाव आर्थिक क्षेत्र में प्रभुत्व रखने वाले तबके यानी उद्योग व्यापार की तरफ से आए। अब देखना यह है कि इस बार के बजट में सरकार किस तरफ ज्यादा घ्यान देती है।

अर्थशास्त्र की भाषा में समझें तो अर्थव्यवस्था के तीन क्षेत्र हैं। एक विनिर्माण, दूसरा सेवा और तीसरा कृषि। उद्योग व्यापार का नाता सिर्फ विनिर्माण और सेवा क्षेत्र से ही ज्यादा होता है। जाहिर है कृषि को उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती। क्योंकि कृषि को असंगठित क्षेत्र ही समझा जाता है। इसीलिए उस पर ध्यान देने की जिम्मेदारी सरकार की ही समझी जाती है। अर्थव्यवस्था में भारी सुस्ती के मौजूदा दौर में कृषि पर कुछ ज्यादा ध्यान देने की बात उठाई जा सकती है।

माना जाता रहा है कि कृषि की भूमिका आर्थिक वृद्धि दर बढ़ाने में ज्यादा नहीं होती है। उद्योग व्यापार की हिस्सेदारी जीडीपी में तीन चैथाई से ज्यादा है जबकि कृषि की एक चैथाई से कम है। मोटा अनुमान है कि जीडीपी में कृषि का योगदान सिर्फ सोलह से अटठारह फीसद ही बचा है। अब सवाल यह है कि जीडीपी में अपने योगदान की मात्रा के आधार पर ही क्या कृषि की अनदेखी की जा सकती है?

हम कृषि प्रधान देश इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि देश की आधी से ज्यादा आबादी इसी में लगी है। जीडीपी में अपने योगदान के आधार पर न सही लेकिन लोकतांत्रिक राजव्यवस्था में अपने आकार के आधार पर उसे अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण न मानना समझदारी नहीं है। उस हालत में जब उद्योग व्यापार को ताबड़तोड़ राहत  पैकेज देकर देख लिए गए हों फिर भी मनमुताविक असर अर्थव्यवस्था पर न पड़ा हो तब कृषि को महत्वपूर्ण मानकर देख लेने में हर्ज नहीं होना चाहिए।

एक बहस हो सकती है कि कृषि की उपेक्षा कभी भी नहीं हुई। सरकार कृषि क्षेत्र पर होने वाले खर्च का हवाला दे सकती है । प्रश्न है कि कृषि पर जो खर्च किया जाता है वह क्या सीधे सीधे कृषि और कृषि उत्पादकों के तन को लगता है। महंगे उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्रों के विनिर्माण और कृषि उत्पादों के व्यापार जैसी मदों पर खर्च को कृषि के खाते में जोड़कर कुल रकम बड़ी दिख सकती है। सिंचाई के पहले से बने आधारभूत ढांचे के रखरखाव या गांव की सड़कों पर खर्च को कृषि पर खर्च दिखाना भी इसमें शामिल है। जबकि इस समय की  जरूरत किसानों की जेब तक सीधे सीधे राहत पहुंचाने की है। अर्थव्यवस्था के लिहाज से देखें तो किसान अपनी बड़ी आबादी के कारण देश का सबसे बड़ा उपभोक्ता माना जा सकता है। अगर यह मान लिया गया है कि भारतीय बाजार मांग की कमी का शिकार हो गया है तो किसान को उपभोक्ता मानने से बचना समझदारी नहीं है।

तो क्या किसान को एक बड़ा उपभोक्ता मानकर बजट में कोई प्रावधान किया जा सकता है? बहस करने वाले यह तर्क भी दे सकते हैं कि किसानों को बड़ा राहत पैकेज देने से उनमें मुफतखोरी व राजकोषीय घाटा बढ़ेगा ।जवाब में किसान पक्ष के विशेषज्ञ सवाल पूछ सकते हैं कि चुनिंदा उद्योग व्यापार तबके को बड़े राहत पैकेज देने से क्या वह घाटा नहीं होता ? रही बात उद्योग व्यापार बढ़ाने के जरिए अर्थव्यवस्था को तेज भगाने की , तो पिछले तीन चार महीनों में ऐसा करके देखा चुका है। पता चल रहा है कि उत्पादन बढ़ाने में दिक्कत नहीं है बल्कि दिक्कत यह है कि बाजार में ग्राहक ही नहीं है। यानी इस रहस्य को समझा जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में भारी सुस्ती का मुख्य कारण देश के उपभोक्ताओं की जेबें ख़ाली हो जाना है। 

उपभोक्ताओं का सबसे बड़ा तबका अगर गांव को मान लिया जाए तो अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद लगाई जा सकती है। आखिर किसानों, गांव के मजदूरों और गरीबों की जेब में अगर पैसा पहुंचा दिया जाए तो वह पैसा घूमफिर कर उद्योग व्यापार और शहरी बाजार में ही तो पहुंचता है। देश दुनिया के तमाम अर्थशास्त्री अपने अपने अंदाज में यही सुझाव दे रहे हैं।

खासतौर पर ग्रामीण बेराजगारी पर ध्यान टिकाकर चमत्कारी असर पैदा किया जा सकता है। वैसे इस सिलसिले में पहले से ही मनरेगा कानून बना रखा है। इस मद में ज्यादा सरकारी खर्च बढ़ाने पर किसी तरह का राजनीतिक एतराज भी नहीं किया जा सकता।सरकार के पक्ष के लोग कह सकते हैं कि किसान और गांव तक सीधे सीधे धन पहुंचाने का काम तो उसने किया तो है। वे जनधन खातों  के जरिए 500 रूप्ए महीना उनके खाते में पहुंचाने का हवाला दे सकते हैं। मौजूदा सरकार की इस योजना को साल भर हो चुका है। लेकिन इस भारीभरकम योजना के क्रियान्वयन में अब तक जितनी अड़चने आती रही हैं उससे ग्रामीण उपभोक्ताओं तक पर्याप्त धन पहुंचने पर सवाल उठ रहे हैं। सुपात्र किसानों की पहचान का कागजी काम परेशान कर रहा है।फिर लगता है इस योजना का एलान व उसके लिए प्रावधान सालभर के लिए ही हुआ था। अब जब अगले साल का बजट पेश होने को है तो इस बारे सरकार अगर कुछ नया सोच रही होगी तो उसे बहुत अच्छी बात कही जाएगी। 

दशकों बाद यह स्थिति बनी है जिसमें यह पता नहीं चल रहा है कि देश के मध्यवर्ग की क्या स्थिति है। महंगाई काबू में रहने की बात बार बार दोहराई जा रही है। सरकार का दावा सही भी हो सकता है कि इस समय महंगाई काबू में है। लेकिन इस बात का पता नही ं चल रहा है देश के मध्यवर्ग की आमदनी की क्या स्थिति है। मध्यवर्ग राजनीतिक तौर पर भी संवेदनशील होता है। लिहाज़ा इस बार के बजट में भी मध्यवर्ग पर ज्यादा गौर किए जाने की संभावनाएं तो बहुत ही ज्यादा हैं। लेकिन इस चक्कर में अंदेशा यही है कि  कहीं देश का बहुतायत उपभोक्ता यानी किसान और खेतिहर मजदूर न छूट जाएं।

Monday, June 17, 2019

मोदी जी हम टैक्स चोर नहीं हैं!


जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हमारी सहपाठी रहीं भारत की वर्तमान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश की जनता से आगामी बजट के लिए रचनात्मक सुझाव मांगे है। इसकी प्रतिक्रिया में एक डॉक्टर ने भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी जी को एक रोचक पत्र लिखा है। जिसमें डॉक्टर का कहना कि मोदी जी हम टैक्स चोर नहीं हैं। फिर हम क्यों टैक्स चोरी करते हैं? ये पत्र उन्होंने हर उस व्यापारी या प्रोफेश्नल की तरफ से लिखा है, जिसकी क्षमता आयकर देने की है।

वे लिखते हैं कि हमें अपने घर, दफ्तर और कारखानों में जेनरेटर चलाकर बिजली पैदा करनी पड़ती है, क्योंकि सरकार 24 घंटे बिजली नहीं दे पाती। हमें सबमर्सिबल पंप लगाकर अपनी जलापूर्ति करनी पड़ती है, क्योंकि जल विभाग हमें आवश्यकतानुसार पानी नहीं दे पाता। हमें अपनी सुरक्षा के लिए सिक्योरिटी गार्ड भी रखने पड़ते हैं, क्योंकि पुलिस हमारी रक्षा नहीं करती। हमें अपने बच्चों को मंहगे प्राइवेट स्कूलों में पढाना पड़ता है, क्योंकि सरकारी स्कूलों की हालत बहुत खराब है। हमें अपना इलाज भी मंहगे प्राइवेट अस्पतालों में करवाना पड़ता है, क्योंकि सरकारी अस्पताल खुद ही आई.सी.यू. में पड़े हैं। हमें आवागमन के लिए अपनी कारें खरीदनी पड़ती हैं, क्योंकि सरकारी ट्रांस्पोर्ट व्यवस्था की हालत खस्ता है।

सेवानिवृत्त होने के बाद एक आयकरदाता को इज्जत से जिंदा रहने के लिए सरकार से मिलता ही क्या है? कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती। बल्कि उसकी जिंदगीभर की मेहनत की कमाई से सरकार जो कर उघाती है, वह राजनेता वोटों के लालच में बड़ी-बड़ी खैरात बांटकर लुटा देते हैं। प्रश्न ये है कि हमारे कर की आय से सरकार क्या-क्या करती है? अदालत चलाती है? जहां वर्षों न्याय नहीं मिलता। थाने बनाये गए हैं? जहां केवल राजनेताओं और आला-अफसरों की सुनी जाती है। आम आदमी की तो शिकायत भी रिश्वत लेने के बाद दर्ज होती है। स्कूल और अस्पतालों के भवनों को बनाने पर सरकार खूब खर्च करती है, जो कुछ सालों में खंडहर हो जाते हैं। सरकार सड़के बनवाती है, जिसमें 40 फीसदी तक कमीशन खाया जाता है। यह सूची बहुत लंबी है।

पश्चिमी देशों में जिस तरह की सामाजिक सुरक्षा सरकार देती है, उसके बाद वहां के नागरिक टैक्स चोरी क्यों करें ? जब हर सुविधा उन्हें सरकार से ही मिल जाती है, तो उन्हें चिंता किस बात की? जबकि हमारे यहां अरबों-खरबों रूपया केवल नेताओं और अफसरों के ठाट-बाट, सैर-सपाटों और ताम-झाम पर खर्च होता है। जनता पर खर्च होने के लिए बचता ही क्या है?

एक कारखानेदार 2 से 10 फीसदी मुनाफे पर उत्पादन करता है। जबकि सरकार को अपनी आय का 30 फीसदी अपनी व्यवस्था चलाने पर ही खर्च करना होता है। ये कहां तक न्याय संगत है?

यही कारण है कि भारत में कोई सरकार को कर अदा नहीं करना चाहता। हम टैक्स बचाते हैं, अपने परिवार की परवरिश के लिए और बुढ़ापे में अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए। जबकि ये सब जिम्मेदारी अगर सरकार लेती, तो हमें इसकी चिंता नहीं करनी पड़ती।

दूसरी तरफ अगर सरकार ये घोषणा करे कि उसे सेना के लिए या बाढ़ व तूफान में राहत पहुंचाने के लिए 1000 करोड़ रूपये चाहिए, तो हम सब देशवासी इतना धन 2 दिन में जमा करवा सकते हैं और करवाते भी हैं। सरकार की ऐसी किसी भी मांग पर हम सभी करदाता खुले दिल से सहयोग करने में आगे बढ़ेंगे। इससे स्पष्ट है कि हम सरकार का सहयोग करना चाहते हैं। हम सरकार की उन रणनीतियों और कार्यक्रमों के लिए धन देने को भी तैयार हैं, जिनसे देश की सुरक्षा हो, गरीबों को न्याय मिले और हम सबका जीवन आराम से गुजरे। पर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है। इसलिए आम करदाता कर देने से बचता है।

जरूरत इस बात की है कि इन सरकारी सेवाओं को सुधारा जाऐ और हमें चोर बताने से पहले जिले से लेकर ऊपर तक भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों और नेताओं की कड़ाई से नकेल कसी जाए। जो अभी तक नहीं हो पाया है। चाहे वह राज्य किसी भी दल द्वारा शासित क्यों न हो, आम आदमी को तो हर जा-बेजा बात के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। इससे जनता में सरकार की छवि खराब होती है।

जब भ्रष्टचारी अधिकारियों, नेताओं और मंत्रियों पर लगाम कसी जायेगी, तो इसके तीन लाभ होंगे। एक तो भ्रष्टाचार और कालेधन पर प्रभावी रोक लग सकेगी। दूसरा आम जनता के बीच मोदी जी इतने लोकप्रिय हो जाऐंगे कि अगली बार दुगने मतों से जीतेंगे। तीसरा इस देश का आम व्यक्ति ईमानदारी से इतना कर देगा कि सरकार का खजाना कभी खाली न हो। बशर्ते जनता के इस धन का पारदर्शिता से सार्थक उपयोग हो, उसको एय्याशी में बर्बाद न किया जाए।

पिछले 5 वर्षों में मोदी जी ने भारत सरकार में भ्रष्टाचार को रोकने में भारी सफलता हासिल की है। अब दिल्ली के 5 सितारा होटलों में आपको हाई प्रोइफल दलाल कहीं दिखाई नहीं देते। क्योंकि अब कोई ये दावा नहीं कर सकता कि तुम मुझे इतना रूपया दो, तो मैं तुम्हारा काम करवा दूंगा। अब इससे एक कदम और आगे जाने की जरूरत है। प्रांतों और जिलों में भी इसी संस्कृति का अविलंब परिचय मिलना चाहिए। तभी जनता को लगेगा कि ‘मोदी है, तो मुमकिन है’।