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Monday, June 15, 2026

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय का भविष्य

तमिलनाडु के नए युवा लोकप्रिय मुख्यमंत्री श्री सी. जोसेफ विजयने शपथ ग्रहण करते ही तीन अहम आदेशों पर हस्ताक्षर किए। जिनमें दो प्रमुख थे। एक, नशीली दवाओं की रोकथाम के कड़े कदम उठाना और दूसरा, महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुलिस और प्रशासन को मुस्तैद करना। पर जिन कारणों से श्री विजय की ओर सबका ध्यान गया है, वो है उनकी सादगी, सहृदयता और धर्म निरपेक्षता। श्री विजय के पिता ईसाई हैं और माँ सनातनी हिंदू। इसलिए श्री विजय दोनों धर्मों में आस्था रखते हैं और दोनों के धार्मिक कृत्यों में श्रद्धा से भाग लेते हैं। उनका यही रवैया अन्य धर्मों के प्रति भी है। आज जब देश में धर्म के नाम पर उन्माद बढ़ता जा रहा है तब श्री विजय की इस पहल ने तमिलनाडु के लोगों को बहुत राहत प्रदान की है। 


प्रायः राजनीति में जो लोग आते रहे, वे होते हैं जिनकी आर्थिक पृष्ठभूमि मज़बूत नहीं होती थी। इसीलिए वे राजनीति को कमाई का ज़रिया बना कर अकूत धन संपत्ति जमा करने में जुट जाते थे। कमोबेश यह इतिहास हर राजनेता का रहा है। श्री विजय तमिलनाडु के सुपर स्टार हैं और 600 करोड़ से अधिक की अर्जित संपत्ति के मालिक हैं। वे अपने राज्य में एक कलाकार के रूप में लोकप्रियता के शिखर पर रहे हैं। इसलिए माना जा सकता है कि राजनीति में उनका प्रवेश धन या यश कमाने के लिए नहीं हुआ। वे कुछ नया कर गुज़रना चाहते हैं। उन्होंने तमिलनाडु में नेताओं के कटआउट और पोस्टर लगाने को प्रतिबंधित कर दिया है। जबकि हर दल के नेता अपने फ़ोटो के विज्ञापनों और कटआउटों पर देश की ग़रीब जनता का अरबों रुपया बर्बाद करते हैं। जिन पाठकों ने तमिलनाडु का दौरा किया है उन्होंने यह आश्चर्यजनक संस्कृति वहाँ देखा होगी कि राजनेताओं के 100-100 फुट ऊँचे कटआउट जगह-जगह लगे होते हैं। 



श्री विजय राजनीति से वीआईपी संस्कृति समाप्त करना चाहते हैं और इस दिशा में भी उन्होंने कई पहल की हैं जिसका अच्छा संदेश गया है। इतने सम्पन्न और सुप्रसिद्ध व्यक्ति होते हुए श्री विजय एक कर्मचारी की तरह समय पर दफ़्तर आते हैं और अपना लंच बॉक्स साथ लाते हैं। दोपहर को वे अपनी मेज़ पर डिब्बा खोल कर अकेले लंच करते हैं, कोई तामझाम नहीं। ऐसी छोटी-छोटी बातों का जनता पर बहुत अच्छा असर पड़ रहा है। दरअसल आम जनता की सरकार से अपेक्षाएँ बहुत सीमित होती हैं। मसलन बिजली-पानी की आपूर्ति गड्ढा-मुक्त सड़कें, नागरिक सुविधाएं प्रदान करने वाली एजेंसियों में आम जनता के प्रति ज़िम्मेदारी और सम्मान का भाव आदि। श्री विजय ने सख़्त आदेश दिए हैं कि नागरिकों की ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं का हल 24 घंटों के भीतर हो जाना चाहिए। देश की जो कार्य संस्कृति रही है उसमें ऐसा हो पाना आसान नहीं है। पर नेतृत्व में अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो असंभव कुछ भी नहीं है। 



आज के राजनैतिक माहौल में जब अपने विपक्षी दलों के नेताओं को अपमानित करना, उनके प्रति अपशब्द बोलना और उनके परिवार पर छींटाकशी करना आम बात हो गई है, वहाँ श्री विजयने अपने व्यवहार से एक शुभ संकेत दिया है। मुख्यमंत्री का पद संभालते ही वे विपक्षी दलों के सभी बड़े नेताओं के घर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने गए थे। इसे तमिलनाडु की राजनीति में एक अनूठी पहल माना गया है। छोटे दलों के कुछ नेताओं का तो ये कहना था, कि उनके जीवन में पहली बार कोई मुख्यमंत्री उनके आवास पर इस तरह शिष्टाचार प्रदर्शित करने आया। जाहिर है कि विपक्ष के नेता भी श्री विजय की इस विनम्रता से अभिभूत हैं। 



आज के दौर में जब धर्मांध लोग एक दूसरे के धर्मस्थलों को अपमानित या ध्वस्त करना अपनी उपलब्धि मानते हैं, उस दौर में श्री विजय ने एक नई पहल की है। उन्होंने सभी धर्मों के उपेक्षित पड़े धर्मस्थलों का सरकारी प्रयास से जीर्णोद्धार कराए जाने की इच्छा व्यक्त की है। इस दिशा में वे कितने सफल हो पायेंगे, ये तो आनेवाला समय ही बताएगा। पर भारत के लोकतंत्र के लिए ये एक शुभ संकेत है। 



हम यहाँ उत्साह के अतिरेक में बह कर कल्पना लोक में नहीं जीना चाहते। हमें धरातल पर खड़े हो कर मुख्यमंत्री श्री विजय का निष्पक्ष मूल्यांकन करते रहना होगा। कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने बहुत आशा जगाई थी। लंबे-चौड़े दावे किए थे। अनेक क्रांतिकारी कदमों का ऐलान किया था। पर क्रमशः वह सब काफूर हो गया। आम आदमी पार्टी ने जनहित में कुछ अच्छे कार्य भी किए पर वो उन दावों की तुलना में बहुत कम थे, जो शुरू में किए गए थे। अब इसे देश का दुर्भाग्य कहें या राजनीति का यथार्थ कि सत्ता पाकर हर व्यक्ति बदल जाता है या हालात उसे बदलने के लिए मजबूर कर देते हैं। मेरा मानना है कि जिनमें आध्यात्मिक चेतना और नैतिक बल होता है वही राजनीति की दलदल कमल की तरह खिल पाते हैं। पर ऐसा यदा-कदा ही होता है। मुझे याद है किस तरह वाजपेयी जी की सरकार में जगमोहन जी के मंत्रालय तीन बार बदल दिए गए। वे कर्मठ व्यक्ति थे और पारदर्शिता के साथ सुधार करना चाहते थे। पर जिस मंत्रालय में भी वे सुधार के प्रयास करते थे, उन्हें वहाँ से हटा दिया जाता था। यही रवैया अन्य दलों के सत्ता में आने बाद देखा जाता है कि योग्य और भले लोगों को दरकिनार कर दिया जाता है, क्योंकि वे अपने राजनैतिक आकाओं की अनैतिक आकांशाओं को पूरा करने में सहयोग नहीं करते। 


श्री विजय की एक और सीमा है कि उनका दल पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर सका है। ऐसे में उन्हें अन्य दलों का सहारा लेना पड़ा है। अब ये दल कब तक उनका साथ दे पायेंगे इस पर सबकी नज़र रहेगी। उनकी एक और सीमा यह भी है कि वे उस आर्थिक-राजनैतिक गठजोड़ की संस्कृति में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहते हैं जो गठजोड़ इतना सशक्त होता है कि जो इसकी नहीं सुनता ये उसे विफल करने में ये कोई कसर नहीं छोड़ता। इसलिए श्री विजय की राह आसान नहीं होगी। पर सिंगापुर जैसे गाँव को अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विकसित देश बनाने वाले ली क्वान का उदाहरण आशा की किरण दिखाता है। जो नगरपालिका के क्लर्क से उठ कर राष्ट्रपति बने और अपने ईमानदारी, सादगी और फौलादी इरादों से सिंगापुर को अग्रणी राष्ट्र बना दिया। देशवासियों की श्री विजय को यह शुभकामना रहेगी कि वे सफल हों, चिरायु हों और भारत की राजनीति में अपने आचरण और उपलब्धियों से नए मानदंड स्थापित करें।  

Monday, June 28, 2021

आईपीएस अपना कर्तव्य समझें


मार्च 2010 में भोपाल में मध्य प्रदेश शासन की ‘आर.सी.वी.पी. नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी’ ने आईपीएस अधिकारियों के बड़े समूह को संबोधित करने के लिए मुझे आमंत्रित किया। वहाँ शायद पाँच दर्जन आईपीएस अधिकारी देश के विभिन्न राज्यों से आकर कोर्स कर रहे थे। मुझे याद पड़ता है कि वे सन 2000 से 2008 के बैच के अधिकारी थे। मैं एक घंटा बोला और फिर तीन घंटे तक उनके अनेक जिज्ञासु प्रश्नों के उत्तर देता रहा। बाद में मुझे अकादमी के निदेशक व आईएएस अधिकारी संदीप खन्ना ने फ़ोन पर बताया कि इन युवा आईपीएस अधिकारियों ने अपनी कोर्स बुक में जो टिप्पणी दर्ज की वो इस प्रकार थी,
इस कोर्स के दौरान हमने विशेषज्ञों के जितने भी व्याख्यान सुने उनमें श्री विनीत नारायण का व्याख्यान सर्वश्रेष्ठ था।



आप सोचें कि ऐसा मैंने क्या अनूठा बोला होगा, जो उन्हें इतना अच्छा लगा? दरअसल, मैं शुरू से आजतक अपने को ज़मीन से जुड़ा जागरूक पत्रकार मानता हूँ। इसलिए चाहे मैं आईपीएस या आईएएस अधिकारियों के समूहों को सम्बोधित करूँ या वकीलों व न्यायाधीशों के समूहों को या फिर आईआईटी, आईआईएम या नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों को, जो भी बोलता हूँ, अपने व्यावहारिक अनुभव और दिल से बोलता हूँ। कभी-कभी वो इतना तीखा भी होता है कि श्रोताओं को डर लगने लगता है कि कोई इस निडरता से संवैधानिक पदों पर बैठे देश के बड़े-बड़े लोगों के बारे में इतना स्पष्ट और बेख़ौफ़ कैसे बोल सकता है। कारण है कि मैं किताबी ज्ञान नहीं बाँटता, जो प्रायः ऐसे विशेष समूहों को विशेषज्ञों व उच्च पदासीन व्यक्तियों द्वारा दिया जाता है। चूँकि मैंने गत चालीस वर्षों में कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों के अनैतिक आचरणों को, युवा अवस्था से ही, निडर होकर उजागर करने की हिम्मत दिखाई है, इसलिए मैंने जो देखा और भोगा है वही माँ सरस्वती की कृपा से वाणी में झलकता है। हर वक्ता को यह पता होता है कि जो बात ईमानदारी और मन से बोली जाती है, वह श्रोताओं के दिल में उतर जाती है। वही शायद उन युवा आईपीएस अधिकारियों के साथ भी हुआ होगा। 


उनके लिए उस दिन मैंने एक असमान्य विषय चुना था: ‘अगर आपके राजनैतिक आका आपसे जनता के प्रति अन्याय करने को कहें, तो आप कैसे न्याय करेंगे?’ उदाहरण के तौर पर राजनैतिक द्वेष के कारण या अपने अनैतिक व भ्रष्ट कृत्यों पर पर्दा डालने के लिए, किसी राज्य का मुख्य मंत्री किसी आईपीएस अधिकारी पर इस बात के लिए दबाव डाले कि वह किसी व्यक्ति पर क़ानून की तमाम वो कठोर धाराएँ लगा दे, जिस से उस व्यक्ति को दर्जनों मुक़दमों में फँसा कर डराया या प्रताड़ित किया जा सके। ऐसा प्रायः सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं व राजनैतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ करवाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों पर भी इस तरह के आपराधिक मुक़दमें क़ायम करने की कुछ प्रांतों में अचानक बाढ़ सी आ गई है। हालाँकि हाल ही में भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने देश के मशहूर पत्रकार विनोद दुआ पर हिमाचल प्रदेश में की गई ऐसी ही एक ग़ैर ज़िम्मेदाराना एफ़आईआर को रद्द करते हुए 117 पन्नों का जो निर्णय दिया है, उसमें आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के विरुद्ध मुखर रहे मराठी अख़बार ‘केसरी’ के संपादक लोकमान्य तिलक से लेकर आजतक दिए गए विभिन्न अदालतों के निर्णयों का हवाला देते हुए पत्रकारों की स्वतंत्रता की हिमायत की है और कहा है कि यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है। 


सवाल है कि जब मुख्य मंत्री कार्यालय से ही ग़लत काम करने को दबाव आए तो एक आईपीएस अधिकारी क्या करे? जिसमें ईमानदारी और नैतिक बल होगा, वह अधिकारी ऐसे दबाव को मानने से निडरता से मना कर देगा। चार दशकों से मेरी मित्र, पुलिस महानिदेशक रही, महाराष्ट्र की दबंग पुलिस अधिकारी, मीरा बोरवांकर, मुंबई के 150 साल के इतिहास में पहले महिला थी, जिसे मुंबई की क्राइम ब्रांच का संयुक्त पुलिस आयुक्त बनाया गया। फ़िल्मों में देख कर आपको पता ही होगा कि मुंबई अंडरवर्ल्ड के अपराधों के कारण कुविख्यात है। ऐसे में एक महिला को ये ज़िम्मेदारी दिया जाना मीरा के लिए गौरव की बात थी। अपने कैरीयर के किसी मोड़ पर जब उसे महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री के निजी सचिव का फ़ोन आया, जिसमें उससे इसी तरह का अनैतिक काम करने का निर्देश दिया गया तो उसने साफ़ मना कर दिया, यह कह कर, कि मैं ऐसे आदेश मौखिक रूप से नहीं लेती। मुख्य मंत्री जी मुझे लिख कर आदेश दें तो मैं कर दूँगी। मीरा के इस एक स्पष्ट और मज़बूत कदम ने उसका शेष कार्यकाल सुविधाजनक कर दिया। कैरियर के अंत तक फिर कभी किसी मुख्य मंत्री या गृह मंत्री ने उससे ग़लत काम करने को नहीं कहा। 


कोई आईपीएस अधिकारी जानते हुए भी अगर ऐसे अनैतिक आदेश मानता है, तो स्पष्ट है कि उसकी आत्मा मर चुकी है। उसे या तो डर है या लालच। डर तबादला किए जाने का और लालच अपने राजनैतिक आका से नौकरी में पदोन्नति मिलने का या फिर अवैध धन कमाने का। पर जो एक बार फिसला फिर वो रुकता नहीं। फिसलता ही जाता है। अपनी ही नज़रों में गिर जाता है। हो सकता है इस पतन के कारण उसके परिवार में सुख शांति न रहे, अचानक कोई व्याधि आ जाए या उसके बच्चे संस्कारहीन हो जाएं। ये भी हो सकता है कि वो इस तरह कमाई अवैध दौलत को भोग ही न पाए। सीबीआई के एक अति भ्रष्ट माने जाने वाले चर्चित निदेशक की हाल ही में कोरोना से मृत्यु हो गई। जबकि उन्हें सेवानिवृत हुए कुछ ही समय हुआ था। उस अकूत दौलत का उन्हें क्या सुख मिला? दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश के 1972 बैच के आईपीएस अधिकारी राजीव माथुर, जो आईपीएस के सर्वोच्च पद, निदेशक आईबी और भारत के मुख्य सूचना आयुक्त रहे, वे सेवानिवृत हो कर आज डीडीए के साधारण फ़्लैट में रहते हैं। देश में आईबी के किसी भी अधिकारी से आप श्री माथुर के बारे में पूछेंगे तो वह बड़े आदर से उनका नाम लेते हैं। एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने तो उन्हें भगवान तक की उपाधि दी। 


आम जनता के कर के पैसे से वेतन और सुविधाएँ लेने वाले आईपीएस अधिकारी, अगर उस जनता के प्रति ही अन्याय करेंगे और केवल अपना घर भरने पर दृष्टि रखेंगे, तो वे न तो इस लोक में सम्मान के अधिकारी होंगे और न ही परलोक में। दुविधा के समय ये निर्णय हर अधिकारी को अपने जीवन में स्वयं ही लेना पड़ता है। भोपाल में जो व्यावहारिक नुस्ख़े उन आईपीएस अधिकारियों को मैंने बताए थे, वो तो यहाँ सार्वजनिक नहीं करूँगा, क्योंकि वो उनके लिए ही थे। पर जिन्होंने उन्हें अपनाया होगा उनका आचरण आप अपने ज़िले अनुभव कर रहे होंगे।

Monday, October 1, 2018

पंजाब दी कुड़ी ने महाराष्ट्र पुलिस में कित्ता कमाल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ नारे से बहुत पहले पंजाब की लड़कियों ने भारतीय पुलिस सेवा में झंडे गाड़ दिये थे। अमृतसर की किरण बेदी भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी थीं, जो आजकल पुडुचेरी की उप राज्यपाल हैं। पर एक नाम ऐसा है, जिसे उत्तर भारत में कम लोग जानते हैं, लेकिन पश्चिमी भारत में उसका काफी जलवा रहा है। मुबंई आतंकी हमले के अपराधी अजमल कसाब और याकूब मेनन को पुणे की यरवदा जेल और नागपुर जेल में फांसी के फंदे पर चढ़ाने वाली महाराष्ट्र काडर की पहली आईपीएस अधिकारी मीरां चड्डा बोरवणकर भी पंजाब में जन्मीं और पली-बढीं। मूलतः जलन्धर की रहने वाली मीरां के पिता भी पंजाब राज्य पुलिस में थे और डीआईजी के पद से रिटायर हुए। जबकि मीरां भारत के ‘पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो’ के महानिदेशक पद से हाल ही में सेवा निवृत्त हुई हैं।

यूं तो अनेक अधिकारी सेवा निवृत्त होते हैं, पर इस समय मीरां पर लेख लिखने की वजह उनकी हाल में प्रकाशित हुई पुस्तक ‘जिंदगी के कुछ पन्ने’ है, जो आजकल विद्यालयों की छात्राओं को आगे बढ़ने की उपयोगी जानकारियां देने के कारण काफी लोकप्रिय हो रही हैं। मेरी 40 साल पुरानी मित्र मीरां जब डीजीपी बनकर दिल्ली आई, तो मैंने उसे कहना शुरू किया कि वो सेवा निवृत्ति के बाद की तैयारी शुरू कर दे, वरना समय काटना भारी पड़ेगा। पर मीरां अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त थी और एक नई जिंदगी की शुरूआत के लिए उत्सुक थी। उसने रिटायर होते ही अपने जीवन के रोचक प्रसंगों को लेकर छात्राओं को प्रेरणा देने वाली ये पुस्तक अंग्रेजी और हिंदी में लिख डाली। जिसके कारण अब उसे देशभर के महिला विद्यालयों और कॉलेजों से व्याख्यान देने के लिए निमंत्रण आ रहे हैं।
मीरां की इस पुस्तक की विशेषता ये है कि यह बहुत ही सरल बातचीत की भाषा में लिखी गई है और इसमें बहुत छोटे-छोटे अध्याय हैं। हर अध्याय के अंत में मीरां ने उस अनुभव से क्या सबक मिलता है, यह बतानें की सफल कोशिश की है। साथ ही छात्राओं को आगे बढ़ने के कुछ सुझाव भी हर अध्याय में दिये हैं। इस पुस्तक में एक अध्याय में मीरां ने हम चार साथियों का भी जिक्र किया है, जब हम तीन दशक के अंतराल के बाद एक साथ कुछ समय बिताने के लिए मेरे निवास वृंदावन आऐ और हमने जीवन के अनुभवों को वृंदावन के सुरम्य वातावरण में साझा किया।
पुस्तक के विषय में और अधिक न कहकर, मैं मीरां के व्यक्तित्व के कुछ रोचक प्रसंग बताना चाहूंगा। जब हम लोग साथ में दिल्ली में पढते थे, तो मीरां उस समूह की सबसे सुंदर लड़की थी। हमारे समूह के कई लड़के उसकी नज़ाकत देखकर, अगर छात्रों की भाषा में कहूं तो, उस पर ‘लाइन मारने’ की कोशिश करते थे। पर मीरां जितनी दिखने में कोमल है, उतनी ही अंदर से कड़क भी। उसने किसी को आगे नहीं बढ़ने दिया और आखिर में समूह के एक गंभीर मराठी छात्र अभय बोरवणकर को अपना जीवन साथी चुना, जो आईएएस में सफल होकर महाराष्ट्र में ही उसके साथ तैनात था। उसकी सख्ती का प्रमाण ये है कि मीरां पिछले डेढ़ सौ साल के इतिहास में पहली महिला पुलिस अधिकारी थी, जिसे मुबंई का संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध) नियुक्त किया गया। अंडरवल्र्ड और अपराध की नगरी मुबंई में एक महिला का इतने संवेदनशील पद पर तैनात होना मीरां के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। पर उसकी सख्ती, ईमानदारी और कड़े अनुशासन ने उसे पुलिस के खौफ का पर्याय बना दिया था। यहां तक कि बॉलीवुड में एक सफल हिंदी फिल्म ‘मर्दानी’ मीरां के जीवन पर बनीं और लोकप्रिय हुई। इसमें मीरां का किरदार रानी मुखर्जी ने निभाया था। जिन दिनों ये फिल्म बन रही थी, तब मीरां पुणे की पुलिस आयुक्त थीं। तब रानी मुखर्जी ने मीरां के साथ कुछ दिन रहकर उसके तौर तरीकों का अध्ययन किया था।
ऐसा ही एक प्रसंग और है। जब मीरां महाराष्ट्र की जेलों की सर्वोच्च अधिकारी थी, तो सिने अभिनेता संजय दत्त कई वर्षों तक मीरां के अधीन कैद में रहा। पर उसके ग्लैमर से आकर्षित होकर मीरां ने उसे कभी कोई विशेष सुविधा प्रदान नहीं की और न ही उसके प्रति कोई उत्सुकता दिखाई। लगभग 3 दशक पहले एक बार मुबंई में मेरी रिश्ते की बहन, उसके आईएएस पति और मैं ‘रोज़ा’ फिल्म देखना चाहते थे। जो मुबंई के भिंडी बाजार स्थित ‘मैट्रो सिनेमा’ में लगी थी। मीरां उस इलाके की उप पुलिस आयुक्त थी। मैंने दीदी के कहने पर उसे फोन किया कि वो हमारे लिए टिकट खिड़की पर तीन टिकट लेकर किसी को खड़ा कर दे। तो हमें लाइन में नहीं लगना पड़ेगा। रात के दस बजे का शो था। जब हम तीनों वहां पहुंचे, तो देखा कि सलवार कुर्ता पहने एक साधारण महिला की तरह टिकट खिड़की के पास हमारी तीन टिकट लिए मीरां खड़ी थी। मैंने चैंककर कहा कि, ‘अरे! तुम क्यों आईं, किसी सिपाही को भेज देतीं ?’ मीरां बोली, ‘‘मैं अपने निजी कामों के लिए सिपाहियों को इस्तेमाल नहीं करती।’’ उसकी यह निष्ठा प्रभावशाली थी। जीवन में फिर दोबारा मैंने उसे कभी कोई ऐसा काम नहीं कहा, जो उसके सिद्धांतों के विपरीत था। ऐसी शख्सियत, दबंग महिला व हमारी मित्र का जीवन निश्चय ही छात्राओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाला है।