Monday, February 16, 2026

एचबीए1सी टेस्ट पर नया अध्ययन: डायबिटीज की चुनौतियाँ

डायबिटीज, जिसे आधुनिक युग की महामारी कहा जा रहा है, भारत में करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत दुनिया का डायबिटीज कैपिटल है, जहां 10 करोड़ से अधिक लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं। डायबिटीज के निदान और नियंत्रण के लिए एचबीए1सी (ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट को ‘सोने का मानक’ माना जाता रहा है। यह टेस्ट पिछले दो-तीन महीनों की औसत ब्लड शुगर लेवल को मापता है, जो आसान, गैर-आक्रामक और विश्वसनीय लगता है। लेकिन फरवरी 2026 में ‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ - साउथईस्ट एशिया’ जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। यह अध्ययन, जो विशेष रूप से भारतीय और दक्षिण एशियाई आबादी पर केंद्रित है, चेतावनी देता है कि एनीमिया, हीमोग्लोबिन विकृतियों और अन्य कारकों के कारण एचबीए1सी टेस्ट गलत निदान कर सकता है, जिससे डायबिटीज का पता चार साल तक देरी से चल सकता है।


यह अध्ययन, प्रोफेसर अनूप मिश्रा और उनके सहयोगियों द्वारा लिखित, एचबीए1सी की सीमाओं पर गहन समीक्षा करता है। भारत में एनीमिया एक महामारी है – राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, 50% से अधिक वयस्क महिलाएं और 25% पुरुष एनीमिया से प्रभावित हैं। एनीमिया आयरन की कमी से लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या घटाता है, जिससे एचबीए1सी का स्तर कृत्रिम रूप से ऊंचा हो जाता है। परिणामस्वरूप, जो व्यक्ति डायबिटीज से ग्रस्त नहीं है, उसे गलत तरीके से डायबिटीज का मरीज घोषित कर दिया जा सकता है। इसके विपरीत, हीमोग्लोबिनोपैथी (जैसे थैलेसीमिया, जो भारत में 4% आबादी को प्रभावित करता है) या जी6पीडी की कमी एचबीए1सी को कम दिखा सकती है, जिससे वास्तविक डायबिटीज वाले मरीजों का निदान देरी से होता है।



अध्ययन के अनुसार, दक्षिण एशियाई लोगों में एचबीए1सी और वास्तविक ब्लड ग्लूकोज के बीच सहसंबंध कमजोर है। उदाहरण के लिए, एनीमिया वाले क्षेत्रों में एचबीए1सी पर निर्भरता से डायबिटीज का निदान 20-30% मामलों में गलत हो सकता है। यह न केवल निदान को प्रभावित करता है, बल्कि उपचार को भी, अनावश्यक दवाएं या देरी से उपचार से जटिलताएं जैसे हृदय रोग, किडनी फेलियर बढ़ सकती हैं। अध्ययन की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत जैसे विकासशील देशों में जहां एनीमिया और आनुवंशिक विकार आम हैं, एचबीए1सी को अकेले इस्तेमाल करना जोखिमपूर्ण है। यह पश्चिमी आबादी पर आधारित मानकों को सीधे लागू करने की भूल को उजागर करता है।



भारत में डायबिटीज का बोझ पहले से ही भारी है। आईसीएमआर के अनुसार, 2030 तक यह 13.5 करोड़ तक पहुंच सकता है। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि लाखों लोग अनदेखे डायबिटीज से पीड़ित हो सकते हैं, क्योंकि एचबीए1सी पर अंधविश्वास ने अन्य टेस्ट जैसे ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) या फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज (एफपीजी) को पीछे धकेल दिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत और महिलाओं के लिए यह खतरा अधिक है, जहां एनीमिया दर 60% से ऊपर है। देरी से निदान से न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य बिगड़ता है, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ भी बढ़ता है।


चिंता का मतलब घबराहट नहीं होना चाहिए। यह अध्ययन एक जागृति का संकेत है। भारतीयों की आनुवंशिक संरचना – जैसे ‘थ्रिफ्टी जीन’ हाइपोथेसिस, जो दक्षिण एशियाई लोगों में इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है – पहले से ही डायबिटीज को जन्मभूमि बनाती है। लेकिन एचबीए1सी की सीमाएं जानकर हम बेहतर रणनीति बना सकते हैं। अगर हम इसे नजरअंदाज करेंगे, तो ‘साइलेंट किलर’ जाने जाने वाली डायबिटीज और घातक हो जाएगी।


गौरतलब है कि फार्मा उद्योग, जो डायबिटीज मार्केट से सालाना अरबों-खरबों कमाता है, इस अध्ययन से हलचल में आ सकता है। भारत में एचबीए1सी टेस्ट किट्स का बाजार 500 करोड़ रुपये से अधिक का है। इस अध्ययन से बड़ी कमानियों की बिक्री प्रभावित हो सकती है, क्योंकि डॉक्टर अब कॉम्बिनेशन टेस्ट की सिफारिश करेंगे।  


संभावना है कि फार्मा कंपनियां वैकल्पिक डायग्नोस्टिक टूल्स पर निवेश बढ़ाएंगी। दवाओं के मामले में भी सदियों से चली आ रही दवाओं पर सीधा असर कम होगा, क्योंकि निदान गलत होने से उपचार की शुरुआत प्रभावित होगी, लेकिन एक बार निदान हो जाए तो दवाओं को उसी मुताबिक दिया जाएगा। हालांकि, फार्मा इंडस्ट्री की लॉबी इस  अध्ययन को चुनौती दे सकती है, यह दावा करते हुए कि एचबीए1सी अभी भी उपयोगी है। वहीं वैश्विक स्तर पर, कुछ कंपनियां, जो अलग तरह के जांच उपकरण व दवाएँ बेचती हैं, इस नए अध्ययन को मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं। कुल मिलाकर, यह उद्योग के लिए एक अवसर भी साबित हो सकता है, जो बाजार को नया आयाम देगा। लेकिन अगर प्रतिक्रिया नकारात्मक हुई, तो नियामक दबाव बढ़ सकता है।


भारतीय डॉक्टर इस अध्ययन से सहमत हैं, लेकिन घबराहट की बजाय सतर्कता की वकालत करते हैं। प्रोफेसर अनूप मिश्रा, अध्ययन के मुख्य लेखक और फोर्टिस सीकेडी हॉस्पिटल के चेयरमैन, कहते हैं, एचबीए1सी पर पूर्ण निर्भरता से डायबिटीज की स्थिति का गलत वर्गीकरण हो सकता है। कुछ लोग अनुचित रूप से देरी से निदान हो सकते हैं। एंडोक्राइन सोसाइटी ऑफ इंडिया के एक सर्वे में 70% डॉक्टरों ने कहा कि एनीमिया वाले मरीजों में ओजीटीटी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस अध्ययन के बाद, डॉक्टरों का मत है कि एचबीए1सी उपयोगी है, लेकिन अकेला नहीं। वो मानते हैं कि मिलीजुली प्रकिया के तहत डायबटीज जैसी बीमारी का निदान किया जा सकता है।


यह अध्ययन हमें निष्क्रियता से हटाकर सक्रियता की ओर ले जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर आप एचबीए1सी टेस्ट करवा रहे हैं, तो सीबीसी (कम्प्लीट ब्लड काउंट) से एनीमिया भी चेक जरूर करवाएं। अगर एनीमिया है, तो ओजीटीटी या एफपीजी पर स्विच करें। इसके साथ ही 30 वर्ष से ऊपर वाले व्यक्तियों को हर साल कम से कम दो टेस्ट – एफपीजी और एचबीए1सी करवाने चाहिए। डायबिटीज का 80% जोखिम रोकथाम योग्य है। दैनिक 30 मिनट व्यायाम, फाइबर-युक्त आहार (दालें, सब्जियां) और वजन नियंत्रण अपनाएं। अध्ययन दिखाता है कि भारतीयों में वजन बढ़ने से इंसुलिन रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ता है। एनीमिया रोकने के लिए आहार में पालक, गुड़ और पौष्टिक आहार शामिल करें, लेकिन अपने डॉक्टर की सलाह से। अस्पतालों और सामाजिक संस्थाओं को सामुदायिक स्तर पर कैंप लगाने चाहिए, जिससे कि जागरूकता बढ़े। सस्ते व आसानी से उपलब्ध ग्लूकोमीटर या ऐप्स से घर पर मॉनिटरिंग करें। ये कदम न केवल डायबिटीज को नियंत्रित करेंगे, बल्कि समग्र स्वास्थ्य भी सुधारेंगे।

यह लैंसेट अध्ययन एचबीए1सी को खारिज नहीं करता, बल्कि इसकी सीमाओं को उजागर करता है। भारतीयों के लिए यह एक जागृति का क्षण है, चिंता करें, लेकिन उचित कार्रवाई भी करें। डायबिटीज से लड़ाई में सटीक निदान पहला कदम है। अगर हम इसे अपनाएं, तो भारत न केवल डायबिटीज कैपिटल से उबर सकता है, बल्कि हेल्थकेयर का वैश्विक मॉडल भी बन सकता है। समय है सोच बदलने का – स्वास्थ्य के लिए, भविष्य के लिए। 

Tuesday, February 10, 2026

सनातन धर्म, चारों शंकराचार्य और हम!

आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः। तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः॥


हमारी सनातन सभ्यता संस्कृति में आचरण को प्रथम स्थान दिया है। आचरण के अभाव में बड़े नाम वाले व्यक्ति या संस्थाएं ही नहीं देवराज इंद्र से लेकर रावण की भी सत्ता चली गई। सनातन-सनातन के नाम का नारा लगाने से हिंदू धर्म को कितना लाभ हुआ है इसका सर्वमान्य निष्कर्ष अभी नहीं निकला है। विशेष रूप से जब हम सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को ही न जानते हों और सनातन-सनातन के नारे लगते रहें पर हमारा व्यक्ति, व्यवस्था व सत्ता के आचरण से कोई लेना-देना नहीं हो तो ये थोथी नारेबाजी ही होगी। इसका सनातन धर्म से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होगा।  


सनातन धर्म ही हिंदू धर्म है। इसके मूल सिद्धांत गहन और सार्वभौमिक हैं। ये सिद्धांत वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, मनुस्मृति और अन्य शास्त्रों से निकले हैं। सनातन धर्म कोई एक किताब या संस्थापक पर आधारित नहीं है, बल्कि यह शाश्वत सत्य की खोज के लिए समर्पित वैयक्तिक और सामाजिक उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए जीवन जीने की व्यवस्था है। ये जाति, वर्ण, भौगोलिक परिस्थिति और देशकाल के आधार पर किसी से भेद नहीं करता।  


सनातन धर्म के सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत मुख्य मूल पहला सिद्धांत हैं: ब्रह्म सत्यं यानि केवल एक परम सत्य है – ब्रह्म या परमात्मा जो निराकार रूप में सर्वव्यापी चेतना है और जीवात्मा से अभिन्न है। ये अद्वैत दर्शन है और द्वैतवाद में परमात्मा साकार रूप में है और वह जीव से एक होकर भी भिन्न हैं। जैसे नमी वायु में सर्वत्र व्याप्त है पर दिखायी नहीं देती। ये उसका निराकार स्वरूप है। जब तापक्रम बहुत गिर जाता है तो यही नमी सघन हो कर ओस, वर्षा, धुंध या बर्फ बनकर दिखने लगती है। ये उसका साकार रूप है। भक्त की भावना जब इतनी प्रबल हो जाती है कि उसे अपने आराध्य को देखे बिना चैन नहीं पड़ता, तब निराकार ब्रह्म साकार रूप धारण करके अपने भक्त को दर्शन देते हैं।  


सनातन धर्म का दूसरा सिद्धांत है: आत्मा अजर-अमर अविनाशी, शाश्वत और जन्म-मृत्यु से परे है। शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं। नैनं छिन्दंति शस्त्राणि… (गीता 2.20) 


तीसरा कर्म का सिद्धांत है: जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा (कारण-कार्य का नियम) अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा जीवन-दर-जीवन चलता है। 


चौथा है पुनर्जन्म का सिद्धांत यानि संसार चक्र। आत्मा कर्मों के अनुसार बार-बार नए शरीरों में आती रहती है। जन्म-मरण का ये चक्र तब तक चलता है जब तक मोक्ष न मिले। 


पाँचवाँ है मोक्ष या मुक्ति का सिद्धांत: जन्म-मृत्यु के चक्र से पूर्ण मुक्ति, ब्रह्म में लीन होना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। चार पुरुषार्थों में सबसे ऊँचा लक्ष्य: है मोक्ष, शेष हैं धर्म, अर्थ व काम। 


छठा सिद्धांत है अहिंसा परमो धर्म: अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। मन, वचन, कर्म से सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखना और किसी के प्रति हिंसा न करना। 


सातवां है: सत्यं वद, धर्मं चर यानि सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। ये महावाक्य ‘तैत्तिरीय उपनिषद’ से लिया गया है। 


आठवाँ सिद्धांत है अपने-अपने धर्म का आचरण करना। धर्म क्या है? कर्तव्य, नैतिकता, न्याय सामाजिक व्यवस्था का आधार है: व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व। 


नवाँ है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानि समस्त विश्व एक परिवार है इसलिए सर्व प्राणियों में एकत्व की भावना।  


दसवाँ सिद्धांत है: ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। इसलिए शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, सौर अथवा स्मार्त आदि एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।

 

सनातन धर्म के अन्य महत्वपूर्ण सहायक सिद्धांत हैं: पंच महायज्ञ– देव, पितृ, भूत, मनुष्य और ब्रह्म यज्ञ ये दैनिक जीवन में कर्तव्य हैं। यम-नियम से जो पतंजलि योग सूत्र के अनुसार हैं: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि। फिर हैं त्रिगुण यानि: सत्व, रज, तम। प्रकृति के ये तीन गुण जो जीवन को प्रभावित करते संक्षेप में कहें तो सनातन धर्म का सार है: एक परम सत्य की खोज, आत्मा की अमरता को समझना, कर्मों के अनुसार जीवन जीना और अंत में उस सत्य में लीन हो जाना या मोक्ष प्राप्त करना।


यह कोई कठोर नियमावली नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है जो व्यक्ति को स्वतंत्रता देता है कि वह अपने स्वभाव, समय और परिस्थिति के अनुसार अपना मार्ग चुन सके। भक्ति, ज्ञान, कर्म या योग कोई भी रास्ता चुना जा सकता है।


सनातन धर्म को मानने वालों को मार्गदर्शन देने के लिए आदि शंकराचार्य जी ने भारत में चार पीठों की स्थापना की थी। यही चारों शंकराचार्य सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य हैं। इन्हें हज़ारों वर्षों से भगवान शंकर के रूप में पूजा जाता है। सभी संप्रदाय के आचार्य व अनुयायी सदियों से इन्हें अपने गुरु के रूप में पूजते हैं। किंतु आज देश में अनेक छ्द्म अराजक तत्व अपने नाम के पहले स्वघोषित शंकराचार्य नाम लगा कर घूम रहे हैं, जिन्हें कोई शास्त्रीय मान्यता प्राप्त नहीं है। आज सनातन धर्म का दुर्भाग्य देखिए कि स्वयं को उसके ध्वजवाहक होने का भ्रम पालने वाले ही आज अपने सर्वोच्च धर्माचार्यों पर सोशल मीडिया में या सार्वजनिक रूप से मर्यादा विहीन अभद्र टीका टिप्पणी करने की धृष्टता करते हैं। अब जरा सोचिए कि जो लोग सनातन धर्म का नारा लगाते हैं क्या वो इन सिद्धांतों पर चल रहे हैं या इनके विरुद्ध आचरण कर रहे हैं?


भारत की जनता ने सदैव आचरण को ही स्वीकार किया है। मुखौटा अधिक समय तक नहीं रहता है। कितना ही कुशल कलाकार या अभिनेता हो, जनता सब देखती-समझती है।  

Monday, February 9, 2026

शहरी विकास: पुरातन और आधुनिक में संघर्ष

काशी के मणिकर्णिका घाट को लेकर उपजे विवाद ने एक बार फिर इस प्रश्न को देश के सामने खड़ा कर दिया है कि हमारी प्राचीन धरोहरों को हानि पहुँचाए बिना शहरों का आधुनिकरण कैसे किया जाए? यह प्रश्न भारत के धार्मिक नगरों में चल रहे शहरी विकास कार्यों के संदर्भ में और भी ज्वलंत हो गया है।

धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतिृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।



इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़जे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पाते होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे भवन खड़े कर दिये हैं। नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।


माना कि विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि भारत में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन पुरातन नगरों का स्वरूप?



विकास की प्रक्रिया में जहाँ एक तरफ़ रचनात्मक सोच और कलात्मक दृष्टि का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है वहीं भ्रष्टाचार भी अन्य क्षेत्रों की तरह स्थिति को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाता है। शहरी विकास की प्रक्रिया में दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, करप्शन ऑफ डिजाईनकरप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश  होगा, विकास नहीं।



पिछले तीन दशकों में, इस तरह कितना व्यापक विनाश धर्मक्षेत्रों का किया गया है कि उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? पिछले 24 वर्षों से मैं ब्रज में धरोहरों के जीर्णोद्धार और संरक्षण में जुटा हूँ और इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें?


जबसे केंद्र में भाजपा की सरकार आई है, तब से धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उद्देश्य रहा है, इसलिए संघ नेतृत्व को चाहिए कि धर्मक्षेत्रों के विकास पर स्पष्ट नीति निधार्रित करने के लिए अनुभवी और चुने हुए लोगों की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय गोष्ठी बुलाए और उनकी राय लेकर नीति निर्धारण में सकारात्मक योगदान करे। पर इस विषय को राजनीति से अलग रखा जाए। क्योंकि धरोहर किसी एक दल के सत्ता में रहने या न रहने से अपना स्वरूप नहीं बदलती। उनका अस्तित्व सदियों से है और सदियों तक रहेगा। इसलिए धरोहरों के संरक्षण में जुटे  लोगों और विशेषज्ञों के प्रति राग द्वेष की भावना से अलग हटकर केवल धरोहरों के हित में ही निर्णय लिए जाएँ। 


नीतियों में क्रांतिकारी परिवर्तन किये बिना, वांछित सुधार आना असंभव है। फिर तो वही होगा कि चौबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनके लौटे। पर इसमें भी एक खतरा है। क्योंकि जब कभी सरकारी स्तर पर ऐसा विचार-विमर्श करना होना होता है, तो निहित स्वार्थ सार्थक विचारों को दबवाने के लिए या उनका विरोध करवाने के लिए, सत्ता के दलालनुमा लोगों को विशेषज्ञ या समाजसेवी बताकर इन बैठकों में बुला लेते हैं और सही बात को आगे नहीं बढ़ने देते। इसलिए ऐसी गोष्ठी में केवल वे लोग ही आऐ, जो स्वयंसिद्ध हैं, ढपोरशंखी नहीं। क्या केंद्र या प्रांतीय सरकारें  इतनी उदारता दिखा पायेंगी? अगर नहीं तो संरक्षण और विकास के नाम पर विनाश ही होगा। ये नहीं भूलना चाहिए कि प्राचीन धरोहरें किसी एक धर्म, समाज या देश की संपत्ति नहीं होती बल्कि पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण  विरासत होती हैं। इसका प्रमाण है कि जब 2001 में बामियान (अफ़ग़ानिस्तान) में गौतम बुद्ध की हज़ारों साल पुरानी विशाल प्रतिमा को तालिबानियों ने तोप के गोलों से उड़ाया था तो पूरी दुनिया ने इसका शोक मनाया था।

Monday, February 2, 2026

‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ को कैसे प्रभावी बनाए सरकार?

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के रूप में जाना जा रहा है, 27 जनवरी 2026 को संपन्न हुआ है। यह समझौता लगभग दो दशकों की लंबी वार्ताओं का परिणाम है और इसमें 2 अरब से अधिक की आबादी तथा 27 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था शामिल है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 25 प्रतिशत है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे वैश्विक व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा कवर करने वाला ऐतिहासिक कदम बताया।  यह समझौता भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का अवसर प्रदान करता है, विशेषकर ऐसे समय में जब अमेरिकी टैरिफ के कारण निर्यात प्रभावित हो रहा है। हालांकि, इसे प्रभावी बनाने के लिए सरकार को रणनीतिक कदम उठाने होंगे, जिसमें अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। 


इस समझौते के तहत यूरोपीय संघ भारत में निर्यात होने वाले 96.6 प्रतिशत सामानों पर टैरिफ को समाप्त या कम करेगा, जिससे यूरोपीय कंपनियों को सालाना लगभग 4 बिलियन यूरो (लगभग 4.7 बिलियन डॉलर) की बचत होगी। भारत ने यूरोपीय संघ को 102 सेवा उप-क्षेत्रों में पहुंच प्रदान की है, जबकि यूरोपीय संघ ने भारत को 144 उप-क्षेत्रों में अवसर दिए हैं, जिसमें वित्तीय, समुद्री और दूरसंचार सेवाएं शामिल हैं। ऑटोमोटिव क्षेत्र में यूरोपीय कारों पर वर्तमान 110 प्रतिशत टैरिफ को धीरे-धीरे 10 प्रतिशत तक कम किया जाएगा। भारत के लिए यह समझौता टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाओं और इंजीनियरिंग निर्यात को बढ़ावा देगा। अनुमान है कि यह समझौता 2032 तक यूरोपीय संघ के भारत में निर्यात को दोगुना कर देगा।  साथ ही, यह अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा, जहां भारत के श्रम-गहन निर्यात प्रभावित हो रहे हैं।


माना जा रहा है कि यह समझौता ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ योजनाओं के साथ तालमेल बैठाता है। यह न केवल निर्यात को बढ़ाएगा बल्कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निवेश और रोजगार सृजन को भी प्रोत्साहित करेगा। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ के साथ समझौता भारतीय एमएसएमई को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने का अवसर देगा। हालांकि, इसके लाभों को अधिकतम करने के लिए चुनौतियों का सामना करना होगा। यहां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियां प्रासंगिक हैं। प्रोफेसर कुमार, जो काले धन और आर्थिक नीतियों के विशेषज्ञ हैं, ने भारत-यूरोपीय संघ एफटीए को ‘अमेरिका जैसा एक और जाल’ बताया है। उन्होंने असमान शर्तों, घरेलू उद्योगों विशेषकर कृषि और डेयरी पर जोखिम, व्यापार घाटे में वृद्धि, नीति स्थान की हानि और दीर्घकालिक आर्थिक निर्भरता की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि पिछले एफटीए में भागीदारों को अधिक लाभ हुआ है, और निवेश नियमों, नियामक संरेखण तथा बाजार बाढ़ से आत्मनिर्भरता कमजोर हो सकती है। उन्होंने अमेरिकी व्यापार समझौतों से सबक लेने की सलाह दी है, जहां कृषि बाजार खोलने की मांग भारत के लिए कठिन है। 



इन चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए, सरकार को रचनात्मक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले, संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। समझौते में डेयरी और कुछ कृषि उत्पादों को बाहर रखा गया है, लेकिन कुमार की चेतावनी के अनुसार, बाजार बाढ़ से बचने के लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित करें। सरकार कृषि क्षेत्र में सब्सिडी और समर्थन को मजबूत करे, जैसे कि फसल बीमा और बाजार लिंकेज को बढ़ावा देकर। साथ ही, एग्रीस्टैक जैसी डिजिटल पहलों को तेज करें ताकि किसान वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन कर सकें। 


दूसरा, एमएसएमई और छोटे उद्योगों की तैयारी पर फोकस करें। प्रोफ़ेसर कुमार की निर्भरता की चेतावनी को संबोधित करने के लिए, उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम को विस्तार दें, विशेषकर टेक्सटाइल, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स में। एमएसएमई को क्रेडिट पहुंच, कौशल विकास और निर्यात प्रशिक्षण प्रदान करें। यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त निवेश कोष स्थापित करें जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित हो, ताकि ‘मेक इन इंडिया’ मजबूत हो सके।


तीसरा, पर्यावरण और सस्टेनेबिलिटी मानकों का अनुपालन। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम), जो 1 जनवरी 2026 से पूर्ण रूप से लागू है, भारतीय स्टील और एल्यूमिनियम पर कार्बन टैक्स लगा सकता है, जिससे निर्यातकों को 22 प्रतिशत तक कीमत कम करनी पड़ सकती है। सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाकर, जैसे कि 500 जीडब्ल्यू सौर लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़कर, इस चुनौती का सामना करना चाहिए। सीबीएएम-अनुपालन प्रमाणन प्रणाली विकसित करें और यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त हरित प्रौद्योगिकी परियोजनाएं शुरू करें।


चौथा, व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए विविधीकरण। प्रोफ़ेसर कुमार की व्यापार घाटे की चेतावनी को देखते हुए, सरकार निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नए बाजारों की तलाश करे, जैसे कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका। साथ ही, समझौते के तहत निवेश नियमों को मजबूत करें ताकि नीति स्थान सुरक्षित रहे। राष्ट्रीय निवेश बोर्ड को सक्रिय करें जो विदेशी निवेश की समीक्षा करे और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे।


पांचवां, मानव संसाधन और प्रवासन पर फोकस। समझौता प्रवासन और मोबिलिटी फ्रेमवर्क से जुड़ा है, जो ‘टैलेंट एंड सिक्योरिटी’ पर केंद्रित है। सरकार को कौशल विकास कार्यक्रमों को यूरोपीय मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए, जैसे कि आईटी और इंजीनियरिंग में। इससे युवा रोजगार बढ़ेगा और ब्रेन ड्रेन को रोका जा सकेगा।


इन सुझावों से, सरकार यदि चाहे तो प्रोफ़ेसर कुमार की चेतावनियों को अवसर में बदल सकती है। समझौता वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे कि अमेरिकी टैरिफ और चीन से व्यापार विचलन के बीच, भारत को रणनीतिक लाभ देगा। अनुमान है कि यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार को 41-65 प्रतिशत बढ़ाएगा और जीडीपी में 0.12-0.13 प्रतिशत की वृद्धि करेगा।  यह चीन से व्यापार विचलन (5-9 प्रतिशत) को बढ़ावा देगा, जो यूरोपीय संघ की डी-रिस्किंग और भारत की विविधीकरण रणनीति से मेल खाता है। 


‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ भारत को विकसित राष्ट्र की दिशा में ले जाने का माध्यम बन सकता है। कबीरदास के दोहे, ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।’ को ध्यान में रखते हुए  सरकार को प्रोफेसर कुमार की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए और संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इससे न केवल आर्थिक विकास होगा बल्कि आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। 2047 तक ‘विकसित भारत’ का सपना साकार करने के लिए यह समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।