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Monday, September 6, 2021

मुसलमान क्यों रोकें गोवंश की हत्या ?


इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पिछले हफ़्ते गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित कर उसके वध पर पूरे देश में प्रतिबंध लगाने को कहा। आम धारणा ऐसी बनाई गई है कि गौ हत्या के लिए सबसे ज़्यादा मुसलमान ज़िम्मेदार हैं। जबकि सच्चाई कुछ और है। गौ हत्या एक संवेदनशील मुद्दा है।महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि हम हिंदुओं के लिए गौ माँ के समान है। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय नस्ल की देशी गाय कुदरत की एक ऐसी नियामत है जिसका दूध ही नहीं मूत्र और गोबर भी पूरी मानव जाति के
  लिए जीवन रक्षक है। यह बात वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हो चुकी है। 


भारतीय परम्परा के सुविख्यात इतिहासकार धर्मपाल जी अपने शोध के आधार पर अपनी किताब ‘गौ वध और अंग्रेज’ में लिखते हैं कि महारानी विक्टोरिया ने तत्कालीन वायसराय लैंस डाऊन को लिखे एक पत्र में कहा था, हालांकि मुसलमानों द्वारा की जा रही गौ हत्या आंदोलन का कारण बनी है, लेकिन हकीकत में यह आंदोलन हमारे खिलाफ है, क्योंकि मुसलमानों से कहीं ज्यादा हम गौ हत्या कराते हैं। इस पत्र से यह बात साफ़ है कि न केवल ज़्यादातर भारतीय हिन्दू, मुसलमान और ईसाई उस समय इसे साफ़ तौर पर देख रहे थे, बल्कि ब्रिटिश अफसरों का एक बड़ा वर्ग भी इस बात को जानता था कि पशु वध बंदी का यह आन्दोलन जिस गो-हत्या के विरोध में है वह वास्तव में भारत में एक लाख से भी अधिक अंग्रेज सैनिकों एवं अफसरों के भोजन के काम आता है। उस समय के दौरान ब्रिटिश खुफिया विभाग के दस्तावेजों का एकाग्र अध्ययन यह बताता है कि मुसलमान गो हत्या छोड़ने के पक्ष में थे, पर अंग्रेजों के इशारे पर ऐसा कर रहे थे। यह भी कहा जा सकता है कि गो-हत्या पर मुसलमानों का जोर 1880 से बढ़ा, जो कि ब्रिटिश उकसावे का ही परिणाम था। साथ ही अंग्रेजों का इस पर जोर भी रहा कि ‘मुसलमानों की गोवध प्रथा’ जारी रहनी चाहिए।



इस्लाम का जन्म पश्चिम एशिया में जहां हुआ वहाँ रेगिस्तानों में गाय की उपलब्धता लगभग न के बराबर थी। इसलिये मुस्लिम समाज में गौ मांस भक्षण की परम्परा बहुत पुरानी नहीं है। कुरान शरीफ़ में सात आयतें ऐसी हैं, जिनमें दूध और ऊन देने वाले पशुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाने की सलाह दी गई है। इतना ही नहीं गौवंश से मानव जाति को मिलने वाली सौगातों के लिए उनका आभार तक जताया गया है। इसलिये पश्चिम एशिया के इस्लामिक देशों में ऊँट की क़ुर्बानी देने की प्रथा है। पर आश्चर्य की बात है कि गोमांस का भारत आज भी दुनियाँ में सबसे बड़ा निर्यातक देश है। इस धंधे में हिंदुओं की भारी हिस्सेदारी है । इन कम्पनियों में हिस्सेदारी वाले हिंदुओं के नामों और हिस्सेदारी के प्रतिशत का खुलासा भारत सरकार को फ़ौरन करना चाहिये। 


दरअसल इतिहास के पन्नों में यह बात अंकित है कि अंग्रेजों ने हिंदू-मुसलमानों के बीच फूट पड़वाने के लिए गाय और सूअर के माँस की कटाई को बढ़ावा दिया था। अंग्रेजों के पहले मुग़ल राज में भारत में गोकशी नहीं होती थी। मुगल बादशाह बाबर ने जहां गाय की कुर्बानी से परहेज करने का हुक्म दिया था, वहीं अकबर ने तो गोकशी करने वालों के लिये सजा-ए-मौत मुकर्रर कर रखी थी। 1921 में प्रकाशित ख्वाजा हसन निजामी देहलवी की किताब ‘तर्क-ए-कुरबानी-ए-गऊ’ के मुताबिक भोपाल रियासत के पुस्तकालय में मुगल शहंशाह बाबर का ऐसा ही एक फरमान मौजूद है जिसमें गाय की कुरबानी से परहेज करने को कहा गया था।


इतना ही नहीं गो हत्या के खिलाफ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी समय समय पर फतवे जारी किये हैं। इनमें फिरंगी महल के मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली और मौलाना अब्दुल हई फिरंगी महली का फ़तवा प्रमुख हैं। मौलाना अब्दुल हई फिरंगी महली के एक फतवे में कहा गया था कि गाय के बजाय ऊंट की कुरबानी करना बेहतर है। मौलाना बारी ने महात्मा गांधी को 20 अप्रैल 1919 को एक तार भेज कहा था हिन्दू और मुसलमानों में एकता हो, इसलिये इस बकरीद में फिरंगी महल (लखनऊ) में गो-हत्या नहीं हुई। अगर खुदा चाहेगा, तो गाय आइंदा कुर्बान ना की जाएगी। 


सन 1700 में जब अंग्रेज़ भारत में व्यापारी बनकर आए थे, उस समय भारत में गाय और सुअर का वध नहीं किया जाता था। हिन्दू गाय को पूजनीय मानते थे और मुसलमान सुअर का नाम तक लेना पसंद नहीं करते थे। परंतु अंग्रेज़ इन दोनों ही पशुओं के मांस के शौकीन थे। लिहाज़ा भारत पर कब्जा करने हेतु अंग्रेजों ने ऐसी विघटनकारी नीतियों का बीज बोना शुरू किया। अंग्रेजों ने मुसलमानों को भड़काया कि कुरान में कहीं भी नहीं लिखा है कि गौवध नहीं करना चाहिए। इतना ही नहीं उन्होंने मुसलमानों को गौ मांस का व्यापार करने का लालच भी दिया। ठीक इसी तरह दलित हिन्दुओं को सुअर के मांस की बिक्री करने का लालच देकर अपने मक़सद को पूरा किया।  


यूरोप दो हज़ार सालों से गाय के मांस का प्रमुख उपभोक्ता रहा है। अंग्रेजों ने भारत में अपने आगमन के साथ ही यहां गौ हत्या शुरू करा दी। 18वीं सदी के आखिर तक अंग्रेजों की बंगाल, मद्रास और बम्बई की  प्रेसीडेंसी सेना के रसद विभागों में बड़े पैमाने पर कसाईखाने बने जहां बड़ी तादाद में गौ हत्या होने लगी। समय के चलते जैसे-जैसे भारत में अंग्रेजी सेना और अफ़सरों की तादाद बढ़ने लगी वैसे-वैसे ही गोकशी में भी बढ़ोतरी हुई। इसी दौरान हिन्दू संगठनों ने पशु वध के ख़िलाफ़ एक आंदोलन शुरू किया।


धर्म के नाम पर सियासत की रोटियाँ सेकने वाले नेता चाहे हिंदू हों या मुसलमान या और किसी धर्म के हों, उनका एक ही लक्ष्य होता है, समाज को बाँटना और अपना उल्लू सीधा करना। ये बात हम दशकों से देखते और अनुभव करते आ रहे हैं। आज जब देश को आर्थिक प्रगति और युवाओं को रोज़गार की ज़रूरत है, ऐसे में साम्प्रदायिकता का ज़हर हमारे अस्तित्व के लिए ख़तरा बन चुका है। इसलिए यह ज़रूरी है कि हर धर्म के समझदार लोग इस ज़हर से अपने समाज को बचाने का काम करें। अगर मुसलमान तय कर लेते हैं कि गौ हत्या नहीं करेंगे और गौ मांस का व्यापार भी नहीं  करेंगे तो पूरे देश में एक ऐसा भाईचारा क़ायम होगा, जिसमें हम सब अपना ध्यान और ऊर्जा अपनी आर्थिक प्रगति के लिए लगा सकेंगे। 1980 में मुरादाबाद में हुए साम्प्रदायिक दंगों के बाद महीनों कर्फ़्यू रहा जिससे बर्तन के कारीगर और निर्यातक दोनों तबाह हो गए। तबसे वहाँ के लोगों ने दंगों से तौबा कर ली। माना कि सनातन धर्म और इस्लाम में कोई समानता नहीं है। फिर भी हम 1000 सालों से साथ रहते आए हैं और आगे भी शांति से रह सकें इसलिए मुसलमानों को ही गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने की माँग करनी चाहिए।