Monday, June 29, 2020

नागर विमानन महानिदेशालय में इतने घोटाले क्यों ?

नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीननागर विमानन महानिदेशालय’ (डीजीसीए) की ज़िम्मेदारी है कि निजी या सरकारी क्षेत्र की जो भी हवाई सेवाएँ देश में चल रही हैं उन पर नियंत्रण रखना। हवाई जहाज़ उड़ाने वाले पाइलटों की परीक्षा करना। गलती करने पर उन्हें सज़ा देना और हवाई जहाज़ उड़ाने का लाइसेंस प्रदान करना। बिना इस लाइसेंस के कोई भी पाइलट हवाई जहाज़ या हेलिकॉप्टर नहीं उड़ा सकता। इसके साथ ही हर एयरलाइन की गतिविधियों पर निगरानी रखना, नियंत्रण करना, उन्हें हवाई सेवाओं के रूट आवंटित करना और किसी भी हादसे की जाँच करना भी इसी निदेशालय के अधीन आता है। 


ज़ाहिर है कि अवैध रूप से मोटा लाभ कमाने के लिए एयरलाईनस प्रायः नियमों के विरुद्ध सेवाओं का संचालन भी करती हैं। जिनके पकड़े जाने पर उन्हें दंडित किया जाना चाहिए और अगर अपराध संगीन हो तो उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि इन सब अधिकारों के चलते निदेशालय के अधिकारियों की शक्ति असीमित है जिसका दुरुपयोग करके वे अवैध रूप से मोटी कमाई भी कर सकते हैं। 


हर मीडिया हाउस में नागरिक उड्डयन मंत्रालय और नागर विमानन महानिदेशालय को कवर करने के लिए विशेष रिपोर्टर होते हैं। जिनका काम ऐसी अनियमित्ताओं को उजागर कर जनता के सामने लाना होता है। क्योंकि उड़ान के दौरान की गई कोई भी लापरवाही आम जनता की ही नहीं अतिविशिष्ठ यात्रियों की भी जान ले सकती है। इसलिए इन संवाददाताओं को मुस्तैदी से अपना काम करना चाहिये। पर अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि ये लोग अपना काम मुस्तैदी से करने में, कुछ अपवादों को छोड़ कर, नाकाम रहे हैं। इसका कारण भी स्पष्ट है कि ये एयरलाइनस ऐसे रेपोर्टर्ज़ या उनके सम्पादकों कोप्रोटोकॉलके नाम पर तमाम सुविधाएँ प्रदान करती हैं। जैसे कि मुफ़्त टिकट देना, टिकटअपग्रेडकर देना या गंतव्य पर पाँच सितारा आतिथ्य और वाहन आदि की सुविधाएँ प्रदान करना। इसका स्पष्ट उदाहरण जेट एयरवेज के अनेक घोटाले  हैं। नरेश गोयल की इस एयरलाइन ने अपने जन्म से ही इतने घोटाले किए हैं कि इसे कब का बंद हो जाना चाहिए था। किंतु नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अफ़सरों, राजनेताओं और मीडिया में अपने ऐसे ही सम्बन्धों के कारण ये एयरलाइंस दो दशक से भी ज़्यादा तक निडर होकर घोटाले करती रही।    


इन हालातों में, देश के हित में जेट एयरवेज़ के घोटालों को उजागर करने का काम, दो दशकों से भी ज़्यादा से मेरे सहयोगी और  दिल्ली के कालचक्र समाचार के प्रबंधकीय सम्पादक रजनीश कपूर ने किया। इसी आधार पर सीबीआई और सीवीसी में जेट के विरूद्ध दर्जनों शिकायतें दर्ज की और दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका भी दायर की। इस तरह चार वर्षों तक लगातार सरकार पर दबाव बनाने के बाद ही जेट एयरवेज़ पर कार्यवाही शुरू हुई। जिसका परिणाम आपके सामने है।  


अगर केवल जेट एयरवेज़ के अपराधों को ही छुपाने की बात होती तो माना जा सकता था कि राजनैतिक दबाव में नागर विमानन महानिदेशालय आँखें मींचे बैठा है। पर यहाँ तो ऐसे घोटालों का अम्बार लगा पड़ा है। ताज़ा उदाहरण देश की एक राज्य सरकार के पाइलट का है, जिसके पिता उसी राज्य के एक बड़े अधिकारी थे, वे तत्कालीन मुख्यमंत्री के कैबिनेट सचिव, जो कि स्वयं एक पाइलट थे, के काफ़ी करीबी थे। इसलिए इन महाशय की नियुक्ति ही नियमों की धज्जियाँ उड़ा कर हुई थी। नियमों के अनुसार अगर अतिविशिष्ट लोगों को उड़ाने के लिए किसी पाइलट की नियुक्ति होती है तो उसका मूल आधार है कि उस पाइलट के पास न्यूनतम 1000 घंटो की उड़ान का अनुभव हो। लेकिन इनके पास केवल अपने पिता के सम्पर्कों के सिवाय कुछ नहीं था। ग़ौरतलब है कि प्रदेश सरकार के नागरिक उड्डयन विभाग में बिना वरिष्ठतम पाइलट हुए ही इसने स्वयं को इस विभाग का सिर्फ़ ऑपरेशन मैनेजर बनाए रखा बल्कि सभी नियमों को दर-किनार कर दो तरह के विमानों को उड़ाने का काम कई वर्षों तक किया: हेलीकाप्टर वायुयान। जबकि नागर विमानन महानिदेशालय के नियमानुसार एक व्यक्ति द्वारा ऐसे दो तरह के विमान उड़ाना वर्जित है। इससे ऐरोड्यमिक्स की गफ़लत में बड़ा हादसा हो सकता है। फिर भी डीजीसीए ने कुछ नहीं किया? ऐसा उसने केवल मुख्यमंत्री और अतिविशिष्ठ व्यक्तियों से संपर्क साधने और दलाली करने की मंशा से ही किया था। 


इस पाइलट पर यह भी आरोप था कि इसने अपने आपराधिक इतिहास की सही जानकारी छुपा कर अपने लिएएयरपोर्ट एंट्री पासभी हासिल किया था। इसकी शिकायत भीकालचक्रने नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) के महानिदेशक  से की और जाँच के बाद सभी आरोपों को सही पाए जाने पर इसकाएयरपोर्ट एंट्री पासभी हाल ही में रद्द किया गया। 


ग़नीमत है कि डीजीसीए ने इसी पाइलट की एक और गम्भीर गलती पर जाँच करके इसे इसके लाइसेंस को 10 जून 2020 को 6 महीनों के लिए निलम्बित भी कर दिया है। इस पर आरोप था कि एक हवाई यात्रा के दौरान इसने बीच आसमान में को-पाइलट के साथ सीट बदल कर विमान के कंट्रोल को अपने हाथ में ले लिया, जोकि सिर्फ़ ग़ैरक़ानूनी है, ख़तरनाक है, बल्कि एक आपराधिक कदम है। जबकि विमान 10,000 फुट के नीचे उड़ रहा था एवंऑटो पाइलटमोड में नहीं था। ग़ौरतलब है कि यह प्रकरण 2018 की जेट एयरवेज़ की लंदन फ़्लाइट, जिसमें दोनों पाइलट, बीच यात्रा के, कॉकपिट से बाहर निकल आए थे, से अधिक गम्भीर है। उस फ़्लाइट की जाँच के पश्चात पाइलट को पाइलट को 5 वर्ष के लिए निलम्बित किया गया था। लेकिन सूत्रों की मानें तो इस रसूखदार पाइलट ने इस बात को सुनिषचित कर लिया है कि इस निलम्बन को भी वो रद्द करवा लेगा। 


इस पाइलट पर वित्तीय अनियमिताओं के भी आरोप भी है और हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने प्रदेश के मुख्य सचिव को इनके विषय में लिखित सूचना भी प्रदान की है। इस पाइलट के परिवार के तार 200 से भी अधिक कम्पनियों से जुड़े हैं जिनमें अवैध रूप से सैंकड़ों करोड़ रुपयों का हेर-फेर होने का आरोप है, जिसकी जाँच चल रही है।   


ये तो केवल एक ऐसा मामला था जिसकी जाँच डीजीसीए के अधिकारियों को करनी थी। लेकिन डीजीसीए में तैनात अधिकारी अगर स्वयं ही भ्रष्टाचार और घोटालों में लिप्त हों तो न्याय कैसे मिले। डीजीसीए में ही तैनात कैप्टन अतुल चंद्रा भी  ऐसी ही संदिग्ध छवि वाले अधिकारी हैं। ये 2017 में एयर इंडिया से प्रतिनियुक्ति पर डीजीसीए में आए और आज चीफ फ्लाइट ऑपरेशंस इंस्पेक्टर (सीएफओआई) के रूप में कार्यरत हैं। सीएफओआई का पद बेहद संवेदनशील होता है क्योंकि यह विमान सेवाओं और पाइलट के उल्लंघनों पर नजर रखता है और इस मामले में सतर्कता बरतना उसका काम है।


ग़ौरतलब है कि 2017 से आश्चर्यजनक रूप से चंद्रा 19 महीनों तक एअर इंडिया और डीजीसीए, दोनों से वेतन प्राप्त करते रहे, जो कि एक आपराधिक कृत्य है। जब 2019 में मामला उजागर हुआ तो 2.80 करोड़ रुपयों में से इन्होंने 80 लख वापिस किए। इतना ही नहीं फ़ेमा और पीएमएलए के भिन्न उल्लंघनों के लिए प्रवर्तन निदेशालय भी उनकी जांच कर रहा है। 


लेकिन आश्चर्य है कि इन सब आरोपों को दर किनार करते हुए कैप्टन चंद्रा के डीजीसीए में कार्यकाल, जो 30 जून 2020 को समाप्त होना है, की अवधि बढ़ाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है। चंद्रा के ऐसे स्पष्ट अपराध को एअर इंडिया के सीएमडी और डीजीसीए कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? ये लोग नियमों का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केभ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं होगाजैसे दावों पर भरोसा करने वाला आम भारतीय ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई की अपेक्षा करेगा।

Monday, June 22, 2020

सुशांत सिंह राजपूत जैसे और भी हैं

आत्महत्या के बाद से सुशांत सिंह राजपूत के जीवन और व्यक्तित्व के बारे में जितनी जानकारियाँ सामने आई हैं उनसे यह स्पष्ट है कि ये नौजवान कई मायनों में अनूठा था। उसकी सोच, उसका ज्ञान, उसकी लगन, उसका स्वभाव और उसका जुनून ऐसा था जैसा बॉलीवुड में बहुत कम देखने को मिलता है। कहा जा सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत अपने आप में एक ऐसी शख़्सियत था जो अगर ज़िंदा रहता तो एक संजीदा सुपर स्टार बन जाता। 


जितनी बातें सोशल मीडिया में सुशांत के बारे में सामने आ रहीं हैं उनसे तो यही लगता है कि बॉलीवुड माफिया ने उसे तिल-तिल कर मारा। पर ये कोई नई बात नहीं है।  बॉलीवुड में गॉडफादर या मशहूर ख़ानदान या अंडरवर्ल्ड कनेक्शन के सहारे चमकने वाले तमाम सितारे ऐसे हैं जिनका व्यक्तित्व सुशांत के सामने आज भी कोई हैसियत नहीं रखता। पर आज तक कोई भी इस अनैतिक गठबंधन को तोड़ नहीं पाया। इसलिए वे बेख़ौफ़ अपनी कूटनीतियों को अंजाम देते रहते हैं। 


पर इस त्रासदी का शिकार सुशांत अकेला नहीं था। हर पेशे में कमोवेश ऐसी ही हालत है। आज़ादी के बाद से अगर आँकड़ा जोड़ा जाए तो देश भर में सैंकड़ों ऐसे युवा वैज्ञानिकों के नाम सामने आएँगे जिन्होंने इन्हीं हालातों में आत्महत्या की। ये सब युवा वैज्ञानिक बहुत मेधावी थे और मौलिक शोध कर रहे थे। पर इनसे ईर्ष्या करने वाले इनके सुपर बॉस वैज्ञानिकों ने इनकी मौलिक शोध सामग्री को अपने नाम से प्रकाशित किया। इन्हें लगातार हतोत्साहित किया और इनका कई तरह से शोषण किया। मजबूरन इन्होंने आत्महत्या कर ली। 


यही हाल कारपोरेट सेक्टर में भी देखा जाता रहा है। जहां योग्य व्यक्तियों को उनके अयोग्य साथी अपमानित करते हैं और हतोत्साहित करते हैं। मालिक की चाटुकारिता करके उच्च पदों पर क़ायम हो जाते हैं। हालाँकि सूचना क्रांति के बाद से अब योग्यता को भी तरजीह मिलने लगी है। क्योंकि अब योग्यता छिपी नहीं रहती। पर पहले वही हाल था। 


यही हाल राजनीति का भी है। जहां गणेश प्रदक्षिणा करने वाले तो तरक़्क़ी पा जाते हैं और सच्चे, मेहनती, समाजसेवी कार्यकर्ता सारे जीवन दरी बिछाते रह जाते हैं। पिछले 30 वर्षों से तो हर राजनैतिक दल पर परिवारवाद इस कदर हावी हो गया है कि कार्यकर्ताओं का काम केवल प्रचार करना और गुज़ारे के लिये दलाली करना रह गया है। 


संगीत, कला, नृत्य का क्षेत्र हो या खेल-कूद का, कम ही होता है जब बिना किसी गॉडफादर के कोई अपने बूते पर अपनी जगह बना ले। भाई-भतीजावाद, शारीरिक और मानसिक शोषण और भ्रष्टाचार इन क्षेत्रों में भी खूब हावी है। 


आश्चर्य की बात तो यह है कि दुनिया की पोल खोलने वाले पत्रकार भी इन षड्यंत्रों से अछूते नहीं रहते। किसको क्या असाइनमेंट मिले, कौनसी बीट मिले, कितनी बार वीआइपी के साथ विदेश जाने का मौक़ा मिले, ये इस पर निर्भर करता है कि उस पत्रकार के अपने सम्पादक के साथ कैसे सम्बंध हैं। कोई मेधावी पत्रकार अगर समाचार सम्पादक या सम्पादक की चाटुकारिता न कर पाए तो उसकी सारी योग्यता धरी रह जाती है। इसी तरह अवार्ड पाने का भी एक पूरा विकसित तंत्र है जो योग्यता के बजाए दूसरे कारणों से अवार्ड देता है। फिर वो चाहे बॉलीवुड के अवार्ड हों या खेल जगत के या पद्मश्री या पद्मभूषण जैसे राजकीय सम्मान हों। सब के सब योग्यता के बजाए किन्हीं अन्य कारणों से मिलते हैं। इन्हीं सब कारणों से युवा या अन्य योग्य लोग  अवसाद में चले जाते हैं और आत्महत्या जैसे ग़लत कदम उठा बैठते हैं। इन सब परिस्थियाँ से लड़ने में आध्यात्म भी एक अच्छा साधन सिद्ध हो सकता है और ये पीड़ित को शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने में मदद कर सकता है।


चूँकि यह समस्या सर्वव्यापी है इसलिए इसे एकदम रातों रात में ख़त्म नहीं किया जा सकता। पर इसके समाधान ज़रूर खोजे जा सकते हैं। मसलन सरकारी विभागों में बने शिकायत केंद्रों की तरह ही हर राज्य और केंद्र के स्तर पर ‘शोषण निवारण आयोग’ बनाए जाएँ। जिनमें समाज के वरिष्ठ नागरिक, निशुल्क सेवाएं दें। वकालत, मनोविज्ञान, प्रशासनिक तंत्र, कला व खेल और पुलिस विभाग के योग्य, अनुभवी और सेवा निवृत लोग इन आयोगों के सदस्य मनोनीत किए जाएं। इन आयोगों के पते, ईमेल और फ़ोन इत्यादि, हर प्रांतीय भाषा में खूब प्रचारित किए जाएं । जिससे ऐसे शोषण को झेल रहे युवा अपने अपने प्रांत के आयोग को समय रहते लिखित सूचना भेज सकें। आयोग की ज़िम्मेदारी हो कि ऐसी शिकायतों पर तुरंत ध्यान दें और जहां तक सम्भव हो, उस पीड़ित को नैतिक बल प्रदान करें। जैसा महिला आयोग, महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर करते हैं। इन आयोगों का स्वरूप सरकारी न होकर स्वायत्त होगा तो इनकी विश्वसनीयता और प्रभाव धीरे धीरे स्थापित होता जाएगा। 


अनेक समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों ने समाज का अध्यन कर के कुछ ऐसे सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं जिनसे ऐसी शोषक व्यवस्था का चरित्र उजागर होता है। जैसे ‘सरवाइवल औफ़ द फ़िटेस्ट’, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, ‘शोषक और शोषित’। ये सब सिद्धांत समाज की उस प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं जो ताकतवर व्यक्ति के सौ खून भी माफ़ करने को तैयार रहता है किंतु मेधावी व्यक्ति की सही शिकायत पर भी ध्यान नहीं देता। पर जिस तरह अमरीका में हाल ही में एक अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की मृत्यु पुलिसवाले के अमानवीय व्यवहार से हो गई और उस पर पूरा अमरीकी समाज उठ खड़ा हुआ और उन गोरे सिपाहियों को कड़ी सजा मिली। या जिस तरह विश्वविद्यालय प्रशासन की तानाशाही का देशभर में छात्र एकजुट हो कर विरोध करते हैं। उसी तरह हर व्यवसाय के लोग, ख़ासकर युवा जब ऐसे मामलों पर सामूहिक आवाज़ उठाने लगेंगे तो ये प्रवृतियाँ धीरे धीरे कमजोर पड़ती जाएँगीं। इसलिए शोषण और अत्याचार का जवाब आत्महत्या नहीं बल्कि हमलावर हो कर मुक़ाबला करना है।                  

Monday, June 15, 2020

‘ब्लैकमेलर’ की नई परिभाषा

आजकल देश में बड़े घोटालेबाज़ों द्वारा ‘ब्लैकमेलर’ की एक नई परिभाषा गढ़ी जा रही है। आजतक तो पत्रकारिता जगत में उन्हें ही ‘ब्लैकमेलर’ कहा जाता था, जो किसी महत्वपूर्ण अधिकारी, मंत्री या बड़े पैसे वाले के विरुद्ध खोज करके ऐसे प्रमाण, फ़ोटो या दस्तावेज जुटा लेते थे, जिनसे वह महत्वपूर्ण व्यक्ति या तो घोटाले के केस में फँस सकता था और उसकी नौकरी जा सकती थी या वह बदनाम हो सकता था, या उसके ‘बिज़नेस सीक्रेट’ जग ज़ाहिर हो सकते थे, जिससे उसे भारी व्यापारिक हानि हो सकती थी। ऐसे प्रमाण जुटा लेने के बाद जो पत्रकार उन्हें सार्वजनिक नहीं करते या प्रकाशित नहीं करते, बल्कि सम्बंधित व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनकी झलक दिखा कर डराते हैं। फिर अपना मुँह बंद रखने की मोटी क़ीमत वसूलते हैं। ऐसे पत्रकारों को ब्लैकमेलर कहा जाता है और वे आज भी समाज में सक्रिय हैं।


ऐसा बहुत कम होता है कि जिस व्यक्ति को ब्लैकमेल किया जाता है वो इसकी लिखित शिकायत पुलिस को दे और ब्लैकमेलर को पकड़वाए। जब कभी किसी ने ऐसी शिकायत की तो ऐसा ब्लैकमेलर पत्रकार जेल भी गया है। चाहे वो टीवी या अख़बार का कितना ही मशहूर पत्रकार क्यों न हो। पर आमतौर पर यही देखा जाता है कि जिसको ब्लैकमेल किया जा रहा है वह इसकी शिकायत पुलिस से नहीं करता। कारण स्पष्ट है कि उसे अपनी चोरी या अनैतिक आचरण के जग ज़ाहिर होने का डर होता है। ऐसे में वह व्यक्ति चाहे कितने भी बड़े पद पर क्यों न हो, ले-देकर मामले को सुलटा लेता है। 


इससे यह स्पष्ट है कि ब्लैकमेल होने वाला और ब्लैकमेल करने वाला दोनों ही अनैतिक कृत्य में शामिल हैं और क़ानून की दृष्टि में अपराधी हैं। पर उनका यह राज़ बहुत दिनों तक छिपा नहीं रहता। ब्लैकमेल करने वाले पत्रकार की दिन दुगनी और रात चौगुनी बढ़ती आर्थिक स्थिति से पूरे मीडिया जगत को पता चल जाता है कि वह पत्रकारिता के नाम पर ब्लैकमेलिंग का धंधा कर रहा है। इसी तरह जिस व्यक्ति को ब्लैकमेल किया जाता है उसके अधीन काम करने वाले, या उसके सम्पर्क के लोगों को भी, कानाफूसी से ये पता चल जाता है कि इस व्यक्ति ने अपने ख़िलाफ़ उठने वाले ऐसे बड़े मामले को ले-देकर दबवा दिया है। 


जबकि दूसरी ओर जो पत्रकार भ्रष्टाचार के किसी मुद्दे को उठा कर उससे सम्बंधित उपलब्ध दस्तावेज़ों को साथ ही प्रकाशित कर देता है। फिर लगातार उस विषय पर लिखता या बोलता रहता है। इस दौरान किसी भी तरह के प्रलोभन, धमकी या दबाव से बेख़ौफ़ हो कर वो अपने पत्रकारिता धर्म को निभाता है तो ही सच्चा और ईमानदार पत्रकार कहलाता है। 


कभी-कभी ऐसा पत्रकार मुद्दे की गम्भीरता को देखते हुए राष्ट्रहित में एक कदम और आगे बड़ जाता है और आरोपी व्यक्ति या व्यक्तियों के ख़िलाफ़ निष्पक्ष जाँच की माँग को लेकर अदालत का दरवाज़ा भी खटखटाता है । तो इसे ‘जर्नलिस्टिक ऐक्टिविज़म’ कहते हैं। यहाँ भी दो तरह की स्थितियाँ पैदा होती हैं। एक वो जबकि जनहित याचिका करने वाला लगातार मुक़द्दमा लड़ता है और किसी भी स्थिति में आरोपी से डील करके केस को ठंडा नहीं होने देता। जबकि कुछ लोगों ने, चाहे वो पत्रकार हों, वकील हों या राजनेता हों, ये धंधा बना रखा है कि वे ताकतवर या पैसे वाले लोगों के ख़िलाफ़, जनहित याचिका दायर करते हैं, मीडिया व सार्वजनिक मंचों में खूब शोर मचाते हैं। और फिर प्रतिपक्ष से 100 - 50 करोड़ रुपय की डील करके अपनी ही जनहित याचिका को इतना कमजोर कर लेते हैं कि आरोपी को बचकर भाग निकलने का रास्ता मिल जाए। अक्सर ऐसी डील में भ्रष्ट न्यायाधीशों का भी हिस्सा रहता है तभी बड़े बड़े आर्थिक अपराध करने वाले मिनटों में ज़मानत ले लेते हैं जबकि समाज के हित में जीवन खपा देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता बरसों जेलों में सड़ते रहते हैं। 


इस सारी प्रक्रिया में यह स्पष्ट है कि जो पत्रकार किसी ऐसे मामले को उजागर करता है, उसके प्रमाण सार्वजनिक करता है और आरोपी व्यक्ति के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सीवीसी, सीबीआई या अदालत में जा कर अपनी ओर से लिखित शिकायत दर्ज कराता है तो वह ब्लैकमेलर क़तई नहीं होता। क्योंकि जब उसने सारे सुबूत ही जग ज़ाहिर कर दिए तो अब उसके पास ब्लैकमेल करने का क्या आधार बचेगा? 


ख़ासकर तब जबकि ऐसा पत्रकार या शिकायतकर्ता सम्बंधित जाँच एजेंसी को निष्पक्ष जाँच की माँग करने के लिए लिखित रिमाइंडर लगातार भेज कर जाँच के लिए दबाव बनाए रखता है ।जब कभी उसे लगता है की जिससे शिकायत की जा रही है, वे जानबूझकर उसकी शिकायत को दबा कर बैठे हैं या आरोपी को बचाने का काम कर रहे है, तो वह सम्बंधित मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या न्यायाधीश तक के विरुद्ध आवाज़ उठाने से संकोच नहीं करता। ऐसा करने वाला पत्रकार न सिर्फ़ ईमानदार होता है बल्कि निडर और देशभक्त भी। 


ऐसे पत्रकार से सभी भ्रष्ट लोग डरते हैं ।क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसे पत्रकार को किसी भी क़ीमत पर ख़रीदा या डराया नहीं जा सकता। ऐसे निष्पक्ष और निष्पाप पत्रकार का सभी हृदय से सम्मान करते हैं। चाहे वे बड़े राजनेता हों, अफ़सर हों, उद्योगपति हों या न्यायाधीश हों। क्योंकि वे जानते हैं कि ये पत्रकार बिना किसी रागद्वेष  के, केवल अपने जुनून में , मुद्दे उठता है और अंत तक लड़ता है। वे ये भी जानते हैं कि ऐसा व्यक्ति ना तो अपना कोई बड़ा अख़बार खड़ा कर पाता है और ना ही टीवी चैनल। क्योंकि मीडिया सामराज्य खड़ा करने के लिए जैसे समझौते करने पड़ते हैं वो ऐसे जुझारू पत्रकार को मंज़ूर नहीं होते। 


रोचक बात ये है कि इधर कुछ समय से देखने में आ रहा है कि वे नेता या अफ़सर जो बड़े बड़े घोटालों में लिप्त होते हैं, जब उनके घोटालों को ऐसे निष्ठावान पत्रकार उजागर करते हैं तो वे अपने मुख्यमंत्री को दिग्भ्रमित करने के लिए उस पत्रकार को ‘ब्लैकमेलर’ बताकर अपनी खाल बचाने की कोशिश करते हैं। किंतु वैदिक शास्त्र कहते हैं, ‘सत्यमेव जयते’। सूरज को बादल कुछ समय के लिए ही ढक सकते हैं हमेशा के लिए नहीं।

Monday, June 8, 2020

क्या बाबा रामदेव ये हिम्मत करेंगे ?

20 बरस पहले बाबा रामदेव को देश में कोई नहीं जानता था। न तो योग के क्षेत्र में और न आयुर्वेद के क्षेत्र में। पर पिछले 15 सालों में बाबा ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए। जहां एक तरफ़ उनके योग शिविर हर प्रांत में हज़ारों लोगों को आकर्षित करने लगे, दुनिया भर में रहने वाले हिंदुस्तानियों ने टेलिविज़न पर बाबा के बताए प्राणायाम और अन्य नुस्ख़े तेज़ी से अपनाना शुरू कर दिए। बाबा के अनुयाइयों की संख्या करोड़ों में पहुँच गई और उन सब के दान से बाबा रामदेव ने 2006 में हरिद्वार में पातंजलि योगपीठ का एक विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया। 

अपनी इस अभूतपूर्व कामयाबी को बाबा ने दो क्षेत्रों में भुनाया। एक तो आयुर्वेद के साथ-साथ उन्होंने अनेक उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन शुरू किया और दूसरा अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए देश भर में राजनैतिक जन-जागरण का एक बड़ा अभियान छेड़ दिया। उन्होंने काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे को इस कुशलता से उठाया कि तत्कालीन यूपीए सरकार लगातार रक्षात्मक होती चली गई। बाबा के इस अभियान की सफलता के पीछे भाजपा और आरएसएस की भी बहुत सक्रिय भागीदारी रही। ‘बिल्ली के भाग से छींका’ तब फूटा जब लोकपाल के मुद्दे को लेकर अरविंद केजरीवाल ने ‘इंडिया अगेन्स्ट करपशन’ का आंदोलन शुरू किया। जिसमें मशहूर वकील प्रशांत भूषण, शांति भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे, सेवानिवृत पुलिस अधिकारी किरण बेदी, हिंदी कवि डा. कुमार विश्वास, पूर्व न्यायधीश संतोष हेगड़े और तमाम अन्य सेलिब्रिटी भी जुड़ गए। इन सबका हमला यूपीए सरकार पर था, इसलिए बाबा राम देव के अभियान को और ऊर्जा मिल गई। इन सब ने मिल कर साझा हमला बोल दिया और अंततः यूपीए सरकार का पतन हो गया। 

केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार बनी तो दिल्ली में केजरीवाल की। जिसके बाद से इन सभी ने न तो भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है, न काले धन का और न ही प्रभावी लोकपाल का। जिस आंदोलन ने दुनियाँ की नज़र में एक बड़ी राजनैतिक क्रांति का आगाज़ किया था, वो रातों रात हवा हो गई। 

उधर बाबा ने मोदी सरकार में अपनी राजनैतिक दख़लंदाज़ी सफल होते न देख पूरा ध्यान पातंजलि के कारोबार पर केंद्रित कर दिया। जिसके पीछे आचार्य बालकृष्ण पहले से खड़े थे। उनके इस साम्राज्य की इतनी तेज़ी से वृद्धि हुई कि प्रसाधनों के क्षेत्र में हिंदुस्तान लिवर जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी और आयुर्वेद के क्षेत्र में डाबर जैसी कम्पनियाँ भी कहीं पीछे छूट गईं। आज बाबा रामदेव का कारोबार हज़ारों करोड़ का है।

आर्थिक वृद्धि की इस तेज रफ़्तार के बीच बाबा के कुछ उत्पादनों की गुणवत्ता को लेकर कभी-कभी विवाद भी होते रहे और बाबा से ईर्ष्या रखने वाले कुछ लोग उन्हें ‘लाला रामदेव’ भी कहने लगे। पर इस सबसे बेपरवाह बाबा अपनी गति से आगे बढ़ते रहे हैं। क्योंकि उन्हें अपनी सोच और क्षमता पर आत्मविश्वास है। उनके इस जज़्बे का परोक्ष लाभ समाज और देश को भी मिला है। क्योंकि बाबा की प्रेरणा से बहुत बड़ी संख्या में भारतवासियों ने विदेशी उत्पादों को छोड़ कर स्वदेशी को अपना लिया है। दूसरा; इतने व्यापक स्तर पर योगाभ्यास करने से निश्चित रूप से करोड़ों लोगों को स्वास्थ्यलाभ भी हुआ है। तीसरा; पातंजलि के व्यावसायिक साम्राज्य ने लाखों लोगों को रोज़गार भी प्रदान किया है। जिसके लिए बाबा रामदेव की लोकप्रियता देश में आज भी कम नहीं हुई है। 

बाबा रामदेव का व्यवहार बड़ा आत्मीय और सरल होने के कारण, हर क्षेत्र में उनके मित्रों की संख्या भी बहुत है। पिछले दस वर्षों से मेरे सम्बंध भी बाबा से बहुत आत्मीय रहे हैं। अपने टेलिविज़न चैनल के माध्यम से उन्होंने ब्रज सजाने के हमारे विनम्र अभियान में मीडिया सहयोग भी किया है। पर खोजी पत्रकार की अपनी साफ़गोई की छवि के कारण जहां देश के बहुत से महत्वपूर्ण लोग मेरी बेबाक़ी  से विचिलित हो जाते हैं वहीं बाबा जैसे लोग, मेरी आलोचना को भी एक खिलाड़ी की भावना की तरह सहजता से हंसते हुए स्वीकार करते हैं। 

अपनी इसी साफ़गोई को माध्यम बना कर आज जो मैं बाबा से कहने जा रहा हूँ, वह देश की वर्तमान आर्थिक दुर्दशा को, व सामाजिक विषमता को दूर करने की दिशा में एक मील का पत्थर हो सकता है - अगर बाबा मेरे इस सुझाव को गम्भीरता से लें। 

निस्संदेह व्यक्तिगत तौर पर बाबा रामदेव और उनके मेधावी व कर्मठ सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने कल्पनातीत भौतिक सफलता प्राप्त कर ली है। पर भौतिक सफलता या चाहत की कभी कोई सीमा नहीं होती। अपनी पत्नी को 600 करोड़ रुपये का हवाई जहाज़ भेंट करने वाला उद्योगपति भी कभी भी अपनी आर्थिक उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं होता। पर केसरिया वेश धारी सन्यासी तो वही होता है, जो अपनी भौतिक इच्छाओं को अग्नि में भस्म करके समाज के उत्थान के लिए स्वयं को होम कर देता है। इसलिए बाबा रामदेव को अब एक नया इतिहास रचना चाहिए। 

अपनी आर्थिक शक्ति व प्रबंधकीय योग्यता का उपयोग हर गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के लिए करना चाहिए। यह तो बाबा और आचार्य जी भी जानते हैं कि आयुर्वेदिक या खाद्यान के उत्पादनों की गुणवत्ता  बड़े स्तर के कारख़ानों में नहीं बल्कि कुटीर उद्योग के मानव श्रम आधारित उत्पादन के तरीक़ों से बेहतर होती है। बैलों की मंथर गति से, सामान्य ताप पर, कोल्हू में पेरी गई सरसों का तेल, जिसे कच्ची घानी का तेल कहते हैं, कारख़ानों में निकाले गए तेल से कहीं ज़्यादा श्रेष्ठ होता है। इसी तरह दुग्ध उत्पादन हो, खाद्यान हो, मसाले हों, प्रसाधन हों या अन्य वस्तुएँ हों, अगर इनका उत्पादन विकेंद्रियकृत प्रणाली से व गाँव की आवश्यकता के अनुरूप हर गाँव में होना शुरू हो जाए तो करोड़ों ग़रीबों को रोज़गार भी मिलेगा और गाँव में आत्मनिर्भरता भी आएगी। जिसे अंग्रेज़ी हुकूमत ने 190 सालों में अपने व्यावसायिक लाभ के लिए बुरी तरह से ध्वस्त कर दिया था। विकेंद्रीकृत व्यवस्था  से गाँव की लक्ष्मी फिर गाँव को लौटेगी। स्पष्ट है कि तब लक्ष्मी जी की कृपावृष्टि पातंजलि के साम्राज्य  पर नहीं होगी, बल्कि उन ग़रीबों के घर पर होगी, जो भारी यातनाएँ सहते हुए, महानगरों से लुट-पिट कर और सेकडों किलोमीटर पैदल चल कर रोते-कलपते फिर से रोज़गार की तलाश में अपने गाँव लौट कर गए हैं। क्या सन्यास वेशधारी बाबा रामदेव लक्ष्मी देवी को अपने द्वार से लौटा कर इन गाँवों की ओर भेजने का पारमार्थिक कदम उठाने का साहस दिखा पाएँगे ?

Monday, June 1, 2020

देनहार कोई और है: भेजत जो दिन रैन

कोरोना के संकट के दौर में अब्दुल रहीम खानखाना की इन पंक्तियों को सिद्ध करने वाले छोटे बड़े कई लोगों का ज़िक्र आपने देश के हर इलाक़े में सुना ज़रूर होगा। जिन्होंने इन दो महीनों में ये सिद्ध कर दिया है कि आम जनता का जितना ख़्याल स्वयमसेवी संस्थाएँ, सामाजिक संगठन और निजी स्तर पर व्यक्ति करते हैं, उसका मुक़ाबला कोई केंद्र या राज्य सरकार नहीं कर सकती। इन महीनों में किसी भी दल के नेता, मंत्री, सांसद और विधायक जनता के बीच उत्साह से सेवा करते दिखाई नहीं दिए, क्यों ? कारण स्पष्ट है कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था आज तक भ्रष्टाचार के कैन्सर से मुक्त नहीं हुई है। प्रशासनिक अधिकारी हमेशा से भीषण आपदा में भी मोटी कमाई के रास्ते निकाल ही लेते हैं। फिर चाहे जनता बाढ़, भूकम्प, चक्रवात या महामारी किसी की भी मार झेले, उन्हें तो अपनी कमाई से मतलब होता है, जनसेवा से नहीं। इसके अपवाद भी होते हैं ।पर उनका प्रतिशत बहुत कम होता है। इसीलिए सरकार को दान देने के बजाए लोग स्वयं धर्मार्थ कार्य करना बेहतर समझते हैं।    

सेवा को अपना कर्तव्य मान कर करने वाले ये लोग, नेताओं और अफ़सरों की तरह दान देने से ज़्यादा अपनी फ़ोटो प्रकाशित करने में रुचि नहीं लेते। मध्य-युगीन संत रहीम जी दिन भर दान देते थे, पर अपना मुँह और आँखें झुका कर। उनकी यह ख्याति सुनकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने उन्हें पत्र भेज कर पूछा कि आप दान देते वक्त ऐसा क्यों करते हैं ? तब रहीम जी ने उत्तर में लिखा, 
‘देनहार कोई और है, 
भेजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करें,
तास्सो नीचे नयन ।।’

पुणे के ऑटो चालक अक्षय कोठावले की मिसाल लें। प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए अक्षय कोठावले ने अपनी शादी के लिए जोड़े गए 2 लाख रुपयों को खर्च करने में ज़रा भी संकोच नहीं किया। ग़ौरतलब है कि इसी 25 मई को अक्षय की शादी होनी थी, लेकिन लॉकडाउन के चलते उसे स्थगित करना पड़ा। जब अक्षय ने सड़कों पर बदहाल और भूखे लोगों को देखा तो उसने अपने मित्रों के साथ मिलकर इन सभी के लिए कुछ करने की ठानी और शादी के लिए बचाई रक़म मज़दूरों को भोजन कराने में खर्च कर दी। आज अक्षय की हर ओर सराहना हो रही है। 

बॉलीवुड में सोनू सूद भले ही आजतक खलनायक की भूमिका निभाते रहे हों, लेकिन असल ज़िंदगी में उन्होंने प्रवासी मज़दूरों के लिए जो किया है, उससे पूरे भारत में उनकी जय-जयकार हो रही है। सोनू सूद ने सैंकड़ों बसों का इंतेज़ाम किया और 12 हज़ार से अधिक लोगों को उनके घर पहुँचाया। इतना ही नहीं सोनू ने 177 लोगों को एक विशेष विमान द्वारा भी उनके घर तक पहुँचाया। ये सब तब हुआ जब केंद्र और राज्य सरकारें इसी विवाद में उलझी रहीं कि ट्रेन का कितना किराया केंद्र सरकार देगी और कितना राज्य सरकार। या फिर मज़दूरों को उनके शहर तक पहुँचाने वाली बसें पूरी तरह से फ़िट हैं या नहीं। सोनू सूद से कहीं ज़्यादा धनी और मशहूर फ़िल्मी सितारे मुंबई में रहते हैं । जो न सिर्फ़ फ़िल्मों से कमाते हैं बल्कि हर निजी या सरकारी विज्ञापनों में छाए रहते हैं और करोड़ों रुपया हर महीने इनसे भी कमाते हैं। पर उनका दिल ऐसे नहीं पसीजा। 

दूसरी ओर दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के खलनायक प्रकाश राज ने न सिर्फ़ मज़दूरों को खाना देने और घर पहुंचाने में मदद की। बल्कि उन्होंने अपने फार्म हाउस पर दर्जनों लोगों के रहने के इंतजाम भी किया। लॉकडाउन के इस मुश्किल वक़्त में प्रकाश राज की ये दरियादिली लोगों को पसंद आई। सोशल मीडिया पर जहां एक समय पर प्रकाश राज के कुछ बयानों को लेकर काफ़ी हमले हो रहे थे और उन्हें रियल लाइफ़ का खलनायक भी कहा जा रहा था, उनकी इस सेवा से अब हर कोई उनकी तारीफ़ कर रहा है। किसी विचारधारा या दल से सहमत होना या न होना आपका निजी फ़ैसला हो सकता है, लेकिन संकट में फँसे लोगों की मदद करना यह बताता है कि आपके अंदर एक अच्छा इंसान बसता है। जिन मज़दूरों को राहत मिल रही है वो राहत देने वाले से यह थोड़े ही पूछ रहे हैं कि आप कौन से दल के समर्थक हैं, उन्हें तो राहत से मतलब है।  

सेवा के इस काम में देश भर से अनेक ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिन्हें सुन कर हर सक्षम व्यक्ति को शर्मिंदा होना चाहिए। कुछ ऐसा ही जज़्बा मुंबई की 99 वर्षीय महिला में भी देखा गया। सोशल मीडिया में ज़ाहिद इब्राहिम ने एक विडियो डाला है, जिसमें ये बुजुर्ग महिला प्रवासी मज़दूरों के लिए खाने का पैकेट तैयार करती नज़र आ रही हैं। मास्क बनाने से लेकर खाना बनाने तक के काम में पूरे देश में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग की महिलाओं ने भी बढ़ चढ़ कर योगदान किया है। 

गुरुद्वारों की तो बात ही क्या की जाए ? देश में जब कभी, जहां कहीं, आपदा आती है, सिख समुदाय बड़ी उदारता से सेवा में जुट जाता है। इस दौरान भी कोरोना की परवाह किए बग़ैर सिख भई बहनों ने बड़े स्तर पर लंगर चलाने का काम किया। वैसे भी गुरुद्वारों में लंगर सबके लिए खुले होते हैं। जहां अमीर गरीब का कभी कोई भेद दिखाई नहीं देता। 

इसी तरह देश के कुछ उद्योगपतियों ने भी निजी स्तर पर या अपनी कम्पनियों के माध्यम से कोरोना के क़हर में जनता की बड़ी मदद की है। जैसे रतन टाटा व अन्य होटल मालिकों ने देश भर में अपने होटलों को मेडिकल स्टाफ़ या कवारंटाइन के लिए उपलब्ध कराया। उधर बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने बड़ी मात्रा में होम्योपैथी की दवा बाँट कर पुणे के पुलिसकर्मियों और लोगों को कोरोना की मार से बचाया। सुना है कि होम्योपैथी में अटूट विश्वास रखने वाले राजीव बजाज का भारत सरकार को प्रस्ताव है कि वे पूरे देश के नागरिकों को कोरोना से बचने के लिए होम्योपैथी की दवा मुफ़्त बाँटने को तैयार हैं, जिसकी लागत क़रीब 700 करोड़ आएगी। अगर यह बात सही है तो सरकार को उनका प्रस्ताव स्वीकारने में देर नहीं करनी चाहिए। 

‘हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।’ हर काल और हर समाज में परोपकार करने वालों की कभी कमी नहीं होती। सरकार का कर्तव्य है कि वह सत्ता को अफ़सरशाही के हाथों में केंद्रित करने की बजाय जनता के इन प्रयासों को प्रोत्साहित और सम्मानित करे, ताकि पूरे समाज में पारस्परिक सहयोग और सद्भावना की भावना पनपे, नकि सरकार पर परजीवी होने की प्रवृति।