Friday, November 28, 2003

स्टैम्प घोटाले से हर आम आदमी भयभीत



आस्ट्रेलिया के मेलबाॅर्न शहर से एसबीएस रेडियो की न्यूज प्रोड्यूसर हर हफ्ते शुक्रवार को फोन पर मुझसे भारत के घटनाक्रम की रिपोर्ट लेती हैं और इसे सोमवार को आस्ट्रेलिया में प्रसारित करती हैं। पिछले कई वर्षों से ये सिलसिला जारी है। आस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीयों के बीच यह कार्यक्रम काफी लोकप्रिय है। भारत में जब भी कोई बड़ा घोटाला होता है तो वे उसके बारे में सवाल पूछना नहीं भूलतीं। पिछले हफ्ते उन्होंने मुझसे मुंबई के स्टैम्प घोटाले के बारे में अपनी शैली में प्रश्न किया, ‘विनीत जी यह स्टैम्प घोटाला क्या है ?’ मैंने रिकार्ड होते हुए इंटरव्यू को बीच में रोक कर उनसे कहा कि आप इस सवाल को फिर से पूछिए कि, स्टैम्प घोटाले का लोगों के जीवन पर क्या असर पड़ेगा ? सच ही तो है कि ये घोटाला बाकी सब घोटालों से अलग है यूं तो हर घोटाला अपनी कोई ने कोई विशेषता लिए हुए होता है। जैसे बोफोर्स, चारा, हवाला, यूरिया,  प्रतिभूति, झामुमो रिश्वत कांड, पर स्टैम्प घोटाले ने तो लोगों का सरकार पर से रिश्वास ही हिला कर रख दिया है। इस घोटाले के प्रभाव का आकलन फिलहाल मुंबई के बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों के मुख्यालयों में ही किया जा रहा है। आम आदमी अभी इसका असर महसूस नहीं कर रहा। पर जैसे-जैसे इसकी परते खुलती जाएंगी वैसे-वैसे लोगों में दहशत फैलती जाएगी।

कारण बिलकुल साफ है। दूसरे सभी घोटालों में जनता के पैसे हजम किए गए और राष्ट्रहितों से समझौता किया गया। पर स्टैम्प घोटाले ने तो देश के करोड़ इकरारनामों को संदेह के घरे में लाकर रख दिया है। चाहे वह इकरारनामा संपत्ति की खरीद-फरोक्त का हो या दो व्यावसायिक कंपनियों के बीच व्यापारिक समझौते का हो या पति-पत्नी के बीच तलाक का हो या दिवंगत माता-पिता की वसीयत के रूप में हो या किसी कंपनी की साझेदारी लेने संबंधी हो। ऐसा कौन सा इकरारनामा है जिसमें स्टैम्प पेपर का प्रयोग नहीं होता ? हर उस बात के लिए जिसका रिकार्ड रखना जरूरी हो या उस घटना को कानूनी स्वीकृति दिलानी हो तो फैसले स्टैम्प पेपर  पर ही लिख कर उनको अदालत में दाखिल किया जाता है या रजिस्ट्रार आफिस में उनका पंजीकरण कराया जाता है। 

जरा सोचिए अगर किसी के पिता वसीयत अपने चारो बेटे के नाम कर गए और उनका वसीयतनामा जिस स्टैम्प पेपर पर लिखा गया उसके बारे में पता चले कि वो मुंबई के अबदुल करीम लाडा साहेब तेलगी की नकली प्रिटिंग प्रेस में छपा था, तो उस वसीयतनामे की वैधता को कोई भी बेटा चुनौती देकर बाकी सभी भाइयों को मुसिबत में डाल सकता है। कल्पना कीजिए कि आपने कोई संपत्ति खरीदी और जैसाकि होता है उसकी कीमत चैक और नकद दोनो तरह से चुकाई और अब बेचने वाला कहे कि जिस इकरारनामे पर बिक्री का सौदा रजिस्टर्ड हुआ था वह स्टैम्प पेपर नकली है। इसलिए सौदा रद्द हो गया। तो क्या आपके पैरों के नीचे से जमीन नहीं खिसक जाएगी? अगर किसी महिला ने श्वसुराल के अत्याचारों से तंग आकर तलाक लिया हो और बहुत लंबी लड़ाई के बाद उसे पति की संपत्ति में से कुछ हिस्सा मिला हो। अब पता चले कि तलाक की शर्तों को जिस स्टैम्प पेपर पर लिखा गया था वो फर्जी था और उस तलाकशुदा का पति इसी आधार पर उस फैसले को रद्द मान ले, तो वो बेचारी किसके दरवाजे पर जाकर न्याय की भीख मांगेगी ? ये तो हुई आम लोगांे की जिंदगी में स्टैम्प घोटाले के असर की बात। पर औद्योगिक जगत में तो मामला और भी संगीन हो जाता है। मान लीजिए किसी कंपनी ने एक दूसरी कंपनी के साथ एक बड़ा व्यापारिक अनुबंध किया और सैकड़ों करोड़ रूपया उस कंपनी को दिया। जिसके बदले में उसे वस्तुएं या सेवाएं आदि लेने का काम अभी पूरा भी नहीं हुआ और पता चले की अनुबंध नकली स्टैम्प  पेपर पर हुआ था तो सारा का सारा कारोबार खटाई में पड़ जाएगा। बड़े वकीलों को मोटी-मोटी फीस देकर औद्योगिक जगत में रोज हजारों किस्म के अनुबंध स्टैम्प पेपरों पर किए जाते हंैं। जबसे मुंबई का स्टैम्प घोटाला प्रकाश में आया है तब से देश की आर्थिक राजधानी में सब सकते में हैं और एक अप्रत्याशित भय से पूरी तरह भयभीत हैं। ऐसा नहीं है कि तेलगी के स्टैम्प घोटाले की चपेट में केवल मुबंई शहर आया हो। अब तक की जांच से पता चला है कि उसका जाल पूरे महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, दिल्ली और चंडीगढ़ तक फैला है। यानी इन राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में पिछले 8 वर्षों से कचहरियों में जो स्टैम्प पेपर खरीदे व बेचे जा रहे थे उनमें भारी तादाद में नकील स्टैम्प पेपरों की थी। इन सभी राज्यों के सभी कानूनी इकरारनामे अब संदेह के घेरे में आ चुके हैं। कभी भी किसी भी इकरारनामें को लेकर कहीं भी कोई भी चुनौती दे सकता है और संबंधित लोगों को भारी मुसीबत में डाल सकता है। ये बेहद खतरनाक बात है। इससे लोगों का विश्वास भारत सरकार में पूरी तरह हिल जाएगा। इसीलिए वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने आनन-फानन में बयान दे डाला कि 1998 से 2002 तक के बीच किए गए सभी इकरारनामे वैध करने पर विचार किया जाएगा।

जाहिर है इतना बड़ा तंत्र तेलगी ने एक रात में खड़ा नहीं कर लिया। नासिक की सरकारी प्रिंटिंग प्रेस से छापे की पुरानी मशीने हासिल करने से लेकर देश को लगभग 35 हजार करोड़ रूपए का चूना लगाने वाला तेलगी काफी होशियारी से चला। उसने राजनीति, प्रशासन और पुलिस के तमाम आला लोगों को इसमें साझेदार बनाया। यह हमारे शासन के नैतिक पतन का वीभत्स चेहरा है। अभी तो महाराष्ट्र के कुछ नेता ही पकड़े गए हैं जिनमें वहां की इंका सरकार के लोग भी शामिल हैं। बावजूद इसके भाजपा या शिवसेना इस मामले पर ज्यादा शोर नहीं मचा रही हैं। नासिक की प्रिटिंग प्रेस भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन है। जहां भारत के नोट भी छपते हैं। इस प्रेस से जुडे़ आला अफसरों की तेलगी से सांठ-गांठ के बिना ये कारोबार पनप नहीं सकता था। इसलिए भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और गृह मंत्रालय की भी इस मामले में पूरी जवाबदेही बनती है।  अगर इसकी ईमानदारी से जांच होगी, जिसकी संभावना न के बराबर है, तो देश के बड़े-बड़े राजनैतिक दिग्गज और आला अफसर इसकी चपेट में आ जाएंगे। इसलिए जिस तरह कश्मीर के आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन को विदेशों से आ रही अवैध वित्तीय मदद के तमाम सबूतों के बावजूद जैन हवाला कांड की जांच की मांग न तो इंका के नेताओं ने की और न भाजपा के, क्योंकि दोनों ही इसमें शामिल थे, उसी तरह इस कांड को भी पूरी तरह दबा देने की साजिश रची जाएगी। ये बड़ी भयावह स्थिति है। 

स्टैम्प पेपर छापना या नोट  छापना सरकार का काम है। कागज के एक टुकड़,े जिसकी कीमत चार आने से ज्यादा नहीं होती, उस पर जब सरकार एक हजार रूपए का नोट या एक हजार रूपए का स्टैम्प छाप देती है तो वही चार आने का टुकड़ा एक हजारा रूपए का बिकता है। इस विश्वास के साथ कि आम आदमी जो ये एक हजार रूपया दे रहा है वो सरकार के खजाने में जा रहा है और ऐसे हजारों रूपए के स्टैम्प लेकर लोग करोड़ों रूपए के इकरारनामें लिखते हैं


अगर स्टैम्प पेपर ही नकली होेंगे, जैसा कि अब सिद्ध हो गया है तो देश के गांव-गांव में सरकार के प्रति अविश्वास फैल जाएगा। लोगों के मन में भारी आसुरक्षा और भय व्याप्त हो जाएगा। जनता का विश्वास खो देने वाली सरकार या व्यवस्था चल नहीं सकती। वो ध्वस्त हो जाती है। हो सकता है कि हमारे दुश्मनों ने देश की सरकार के प्र्रति जनता का विश्वास खत्म करने को ही नकली नोटों और नकली स्टैम्प छापने के काम की साजिश रची हो। पर यह आरोप लगा कर मौजूदा हुक्मरान अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते है। क्योंकि कोई भी साजिश तब तक कामयाब नहीं हो सकती जब तक हमारी पुलिस, खुफिया एजेंसी और सत्ताधीश अपने इमान को गिरवी रख कर करोड़ों रूपए कमाने के लालच में देश की अस्मिता का नंगा सौदा करने को तैयार न हों। उन्होंने ये सौदा किया है तभी स्टैम्प घोटाला इस हद तक फैला हुआ है। अब भगवान ही इस देश की रक्षा करें।

Friday, November 14, 2003

तलुवा चाटू अफसर और चरमराता लोकतंत्र


हाल ही में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों का दौरा करके लौटे मुख्य चुनाव आयुक्त श्री जे.एम. लिंग्दोह ने इन दोनों राज्यों के कुछ अफसरों के आचरण के बारे में नाराजगी जताई है। श्री लिंग्दोह के अनुसार यह अधिकारी निष्पक्ष नहीं हैं बल्कि सत्तारूढ़ दल इंका के हितों को साधते हुए काम कर रहे हैं।  उन्होंने ऐसे तमाम अधिकारियों को कड़ी चेतावनी दी है। श्री लिंग्दोह ही क्यों, हर भारतवासी चाहता है कि चुनाव निष्पक्ष हों। इसके लिए चुनाव में लगे अधिकारियों का आचरण पारदर्शी होना निहायत जरूरी होता है। पर देखने में आया है कि अनेक अधिकारी चुनावों में निष्पक्ष नहीं रह पाते। यहां मध्यम और निचले दर्जे के अधिकारियों या कर्मचारियों की बात नहीं, बल्कि आला अफसरों की बात की जा रही है। श्रीमती इंदिरा गांधी पर आरोप था कि उस वक्त प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी श्री यशपाल कपूर ने उनके चुनाव में रायबरेली जाकर चुनाव प्रचार का काम संभाला था। इस बात पर श्रीमती गांधी का चुनाव निरस्त कर दिया गया और उनकी काफी भद्द पिटी। यहां तक कि उन्हें इमरजेंसी लगाकर अपनी जान बचानी पड़ी। 

पर तब से गंगा में बहुत पानी बह गया। अगर उस मापदंड को लिया जाए, तो देश के ज्यादातर बड़े नेताओं के चुनाव निरस्त हो सकते हैं। उन नेताओं के जो सत्ता में होते हुए चुनाव लड़ते हैं। मैं एक ऐसे आईएएस अधिकारी को जानता हूं जो अपने मंत्री के चुनाव प्रचार को संभालने के लिए एक महीने के अवकाश पर चले गए। सब काम गोपनीय तरीके से हुआ। पर निकट के लोग तो असलियत जानते ही हैं। एक ही उदाहरण क्यों, पिछले दस सालों में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों में अच्छी-खासी तादाद ऐसे अफसरों की हो गई है, जिन्होंने नैतिकता, नौकरी की मर्यादा और लोक-लाज तीनों का बड़ी निर्लज्जता से परित्याग कर दिया। सुश्री मायावती के साथ जिन अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए गए, उन्होंने अगर अपने पद की गरिमा के अनुरूप विवेक से काम किया होता तो उनकी आज यह दुर्गति न होती। गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले भी श्री लिंग्दोह ने गुजरात के तमाम बड़े अधिकारियों पर भाजपा की सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा झुक जाने का आरोप लगाया था। कोई दल इसका अपवाद नहीं है। हर बड़ा नेता चाहता है कि उसके अधीनस्थ आईएएस या आईपीएस अधिकारी उसके निजी गुलाम की तरह काम करें। जो ऐसा करते हैं, उन्हें अपनी सेवा की भरपूर मेवामिलती है। न सिर्फ सेवाकाल में वे सत्ता के केन्द्र बन जाते हैं बल्कि अपने आका की सत्ता छिनने के बाद भी उन्हें मलाई मारने का भरपूर अवसर मिलता है। इस बात का आभास मिलते ही कि उनके आका की सत्ता हाथ से खिसकने वाली है, यह तमाम अधिकारी अपनी पोस्टिंग या तो दूसरे राज्य या केंद्र सरकार में इस प्रकार करवा लेते हैं कि उन पर कोई आंच न आए। या फिर सरकारी वजीफे पर अध्ययन के बहाने विदेश चले जाते हैं। इंतजार करते हैं उस वक्त का जब इनके आका फिर सत्ता में लौटें या फिर तब तक जब तक लोग उनके कारनामे भूल न जाएं। जो अधिकारी अपने आका के साथ बड़े घोटालों में फंस जाते हैं, उन्हें भी कोई खास परेशानी नहीं होती। सब जानते हैं कि चाहे सीबीआई जांच करे, या अदालत मुकदमे सुने। जितने बड़े नेता, उतने बड़े घोटाले और उतनी ही आसानी से कानून के शिकंजों से मुक्ति। जब आका ही छूट जाएंगे तो उनके दाएं-बाएं रहने वाले अधिकारी भी कब तक फंसे रहेंगे। बम्बइया फिल्म की तरह ऐसे हर घोटालों की सुखद समाप्ति होती है। देश को गिरवी रखने वाले बेदाग होकर मालाओं से लदे ढोल-नगाड़ों के बीच विजय का प्रतीक हवा में लहराते हुए विजेता के रूप में अदालतों से बाहर निकलते हैं। फिर चुनाव लड़ते हैं। आश्चर्य है कि जीत भी जाते हैं। शायद जनता भी यह मान ही बैठी है कि जब सभी चोर चोरी कर रहे हैं, तो चोरी कोई जुर्म नहीं। जीतने के बाद ये नेता दुर्दिन में रहे अपने पुराने सेवादारों को वापस सत्ता में खींच लेते हैं। अगर उनका सेवाकाल समाप्त होने को होता है, तो उसे अकारण बढ़वा देते हैं। अगर वे इस बीच सेवामुक्त हो चुके होते हैं, तो उन्हें सलाहकार या विशेष कार्याधिकारी बनवाकर फिर बुला लेते हैं। ठीक ही तो है, नया नौ दिन, पुराना सौ दिन। जिसने पिछले कार्यकाल में लूट के रास्ते साफ किए हों और अपने आका के इशारे पर प्रदेश की जनता के हितों को अनदेखा करने में कोई हिचक न दिखाई हो वैसा अधिकारी ही सब राजनेताओं को रास आता है। किसी एक व्यक्ति का नाम लेने से कोई लाभ नहीं, पर जो लोग रोजाना समाचारों पर निगाह रखते हैं वे जानते हैं कि हर राज्य और केन्द्र सरकार में ऐसे अधिकारियों की भरमार है जिन्होंने अपने राजनैतिक आका को खुश करने के लिए उनके तलुवे चाटना ही अपना जीवन धर्म बना रखा है। यह लोग सेवामुक्त होने के बाद भी अपने इसी गुणके कारण बरसों तक सरकारी बंगले, गाड़ी, हवाई जहाज और वेतन का सुख भोगते रहते हैं। इनमें से जिनकी पकड़ सत्ता पर ज्यादा हो जाती है, वे अनेक महत्वपूर्ण पदों पर भेज दिए जाते हैं। देश में भी और विदेश में भी।

पूरे मामले का निचोड़ यह है कि जो अधिकारी राजनैतिक आकाओं के तलुवे चाटने में हिचक महसूस नहीं करते, वे फायदे में ही रहते हैं। उनका न तो कोई घाटा होता है, न हीं उनके दुर्दिन ज्यादा समय तक रह पाते हैं। इन हालातों में यह स्वभाविक ही है कि अफसरशाही का झुकाव अपने राजनैतिक आकाओं को हर हालत में खुश रखने की तरफ बढ़ता जा रहा है। भौतिकता की इस अंधी दौड़ में जब हर आदमी रातों रात हर तरह की सुविधा जुटा लेना चाहता है तो देश की अफसरशाही क्यों पीछे रहे? जबकि भ्रष्टाचार तो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है ही। बहुत थोड़े अधिकारी ऐसे बचे हैं जो अपने काम से काम रखते हैं और बिना विरोध का स्वर मुखर किए अपने राजनैतिक आकाओं को अपने पर हावी नहीं होने देते। पर यह सही है कि ऐसे सभी अधिकारी गैर महत्वपूर्ण पदों को ही सुशोभित करते हैं और शक्तिशाली मंत्रियों या राजनेताओं की नजरों में उनकी कोई उपयोगिता नहीं होती। पर इससे इन निष्ठावान अधिकारियों को कोई असर नहीं पड़ता। न तो ये तबादलों के पीछे भागते हैं और न ही इन्हें साधारण पोस्टिंग से कोई गिला-शिकवा होता है। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई मंत्री या मुख्यमंत्री किसी ऐसे व्यक्ति को अपने निकट रखना चाहे जिसका आचरण पाक साफ हो और जो केवल जनहित में कार्य करने की सोचता हो। 

आला अफसरांे में बढ़ती इस वृत्ति के कारण भारतीय लोकतंत्र बहुत तेजी से कमजोर होता जा रहा है। जब चाटुकारिता, दलाली या घोटाले करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों को केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पद मिलेंगे, तो उनसे वे राष्ट्र निर्माण की बात भला क्यूं सोचने लगे? जनता त्राहि-त्राहि करती रहे, उसकी हालत में रत्तीभर सुधार नहीं होता। पर ये चाटुकार अफसर और इनके आका को इससे क्या? इनका तो काम वो योजनाएं बनाना होता है जिससे रातों रात अकूत दौलत पैदा हो जाए। बहुत कम राजनेता होंगे, जो इस लोभ का संवरण कर पाते हैं। इसलिए एक-एक करके लोकतंत्र के सभी खंभे ढहते जा रहे हैं। विधायिका और कार्यपालिका के उपरोक्त आचरण से न्यायपालिका का आचरण भी भिन्न नहीं है। खुद भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.पी.भरूचा अपने पद पर रहते हुए कह चुके हैं कि उच्च न्यायपालिका में भी बीस फीसदी भ्रष्टाचार है। शायद इन्ही भ्रष्ट न्यायाधीशों के कारण भ्रष्ट राजनेता कानून की पकड़ से छूट जाते हैं। जनता में इससे हताशा फैलती है और लोकतंत्र के प्रति उसकी आस्था कमजोर पड़ जाती है। यह बहुत दुखद स्थिति है। 

श्री लिंग्दोह ने केवल छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के अफसरों पर उंगली उठाई है। पर हकीकत यह है कि देश का कोई भी प्रांत इस बीमारी से अछूता नहीं है। जब सजा मिलने का डर ही नहीं रहा, तो फिर चोरी भी चोरी से क्यों की जाए? जहां मौका मिले, हाथ मार दो। काका हाथरसी कहा करते थे, ‘‘क्यों डरता है बेटा रिश्वत लेकर, छूट जाएगा तू भी रिश्वत देकर’’। लंबे चैड़े दावों के साथ आगामी विधानसभा चुनाव लड़े जा रहे हैं, पर जीतकर चाहे कोई भी आए आम जनता के हालात में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होने जा रहा। श्री लिंग्दोह भी कहां-कहां पकड़-धकड़ करेंगे?

Friday, November 7, 2003

राजस्थान में चुनाव महारानी और माली के बेटे के बीच मुकाबला

राजस्थान में चुनाव का बिगुल बज चुका है। दोनो सेनाएं आमने-सामने खड़े हैं क्योंकि मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंका) के बीच है। सभी चुनावी सर्वेक्षण इस बात का आभास दे रहे हैं कि इंका के लिए यह चुनाव बहुत आसान हो चुका है। आकलन है कि इंका को 125 से कम सीट नहीं मिलेगी और भाजपा 60 से ज्यादा सीट किसी भी सूरत में जीत पाने की हालत में नहीं होगी। इसके पीछे कोई मौसमी बुखार या चुनावी हवा काम नहीं कर रही है। अब तक यही माना जाता था कि चुनाव के पहले किसी भी मुद्दे पर हवा बना कर मतदाताओं को बहकाया जा सकता है। कई चुनाव ऐसी हवा बना कर ही जीते गए। पर ज्यों-ज्यों लोगों में जागरूकता बढ़ रही है और उन तक सूचना पहुचाने का तंत्र व्यापक होता जा रहा है। त्यों-त्यों लोगों की राजनैतिक दलों से अपेक्षाएं बढ़ती जा रही है। अब वे नेताओं की कोरी बयानबाजी या भड़काऊं भाषण शैली से प्रभावित नहीं होते है। बल्कि ठोस काम देखना चाहते हैं। राजस्थान में इंका की मजबूत स्थिति के लिए यही बात जिम्मेेदार है। मुख्यमंत्री श्री अशोेक गहलोत ने अपने आचरण से जनता का दिल जीत लिया है। 

जहां भाजपा की नेता श्रीमती वसुंधरा राजे का अतीत, वर्तमान और आचरण उनके लिए बोझ बन गया है वहीं श्री अशोक गहलोत का अतीत, वर्तमान और व्यवहार उनकी ताकत बन कर सामने आया है। श्रीमती राजे महारानी थीं और आज भी राजनीति को राजदरबार की तरह चलाती हैं इसलिए उनके अपने दल के कार्यकर्ता ही उनसे कट चुके हैं तो फिर जनता के पास आने का तो सवाल ही नहीं उठता। दूसरी तरफ श्री अशोक गहलोत एक माली के बेटे थे और मुख्यमंत्री बन कर भी उन्होंने खुद को ऐशो-आराम में नहीं डुबोया बल्कि रात के दो-दो बजे तक काम किया और पूरे कार्यकाल में एक दिन चैन से नहीं बैठे, लगातार भागते रहे। अपने प्रदेश के हर इलाके का दौरा करते रहे। जिससे जनता से उनका संपर्क और संवाद मजबूत हुआ। उनकी यह मेहनत आज चुनाव में काम आ रही है।  अपने विधानसभा क्षेत्र के ही नहीं बल्कि पूरे राजस्थान के हर क्षेत्र के गांव के लोगों से सीधा जुड़ाव और व्यक्तिगत संपर्क आज श्री अशोक गहलोत की बहुत बड़ी ताकत है। वहीं दूसरी तरफ श्रीमती  वसुंधरा राजे यंू तो पिछले 14 वर्षों से झालवाड़ा संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहीं हंै। पर इतने वर्षों में भी अपने आम कार्यकर्ता से नहीं जुड़ पाईं। यहां एक उदाहारण पर्याप्त होगा। श्रीमती राजे ने आकाल के दौरान शोर मचाया कि उनके क्षेत्र में दर्जनों लोग भूख से मर गए। जब सारा मीडिया भाग कर वहां पहुंचा तो पता चला कि उनके आरोपों में कोई तथ्य नहीं था। कुछ महीने पहले तक तो श्रीमती वसुंधरा राजे को लोग राजस्थान में जानते तक नहीं थे। पिछले तीन-चार महीनों में चुनाव के कारण मीडिया में बार-बार उनका नाम आने से कुछ शहरी लोग उन्हें जानने लगे हैं।

आमतौर पर विपक्ष का काम होता है सरकार की गलतियों की तरफ जनता का ध्यान आकर्षित करना। अकाल के दौरान भाजपा ऐसा करने से चूक गई। श्री अशोक गहलोत ने भाजपाईयों से कहा कि वे केन्द्र से राज्य को मदद दिलाने में राजस्थान सरकार की मदद करें और फिर क्षेत्र में जाकर देखें कि उस मदद का सही इस्तेमाल हो रहा है कि नहीं। पर इतनी तकलीफ उठाने को भाजपा नेतृत्व तैयार नहीं था। सो आकाल के दौर में ठंडा पड़ा रहा और अब अपनी चिर-परिचित शैली में ब्लैक पेपर आदि छापकर अकाल के मुद्दे को उठाने की नाकाम कोशिश कर रहा है। राजस्थान के लोगों का कहना है कि लगातार चार वर्ष के अकाल के बावजूद मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने जिस कुशलता से राहत कार्यों का संचालन किया उससे उनके आलोचक भी उनके समर्थक बन गए है। श्री अशोक गहलोत ने हर जिले की निगरानी के लिए अपने मंत्रियों और सचिवों को अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी। इस दौरान उन्होंने राजस्थान की जीर्ण क्षीर्ण पड़ी सड़कों को सुधारने का व्यापक अभियान चलाया और राजस्थान के धर्म क्षेत्रों को सड़कों से जोड़ दिया। इससे लोगों को रोजगार मिला और राज्य का       आधारभूत ढांचा मजबूत हुआ। शुरु के दौर में भाजपा के नेता श्री ललित चतुर्वेदी विधानसभा में गर्जन करते थे कि राजस्थान की सड़कों पर चल कर उनके हृदय में फफोले पड़ जाते हैं। उनका कहना था कि इन सड़कों पर इतने ज्यादा गढ्ढे हैं कि उन पर सीधा चला ही नहीं जा सकता। पर आज तस्वीर बिलकुल बदल चुकी है। राजस्थान की सड़कें अच्छी तरह सुधार दी गई हैं। जिसने पांच साल पहले इन सड़कों पर यात्रा की होगी वो अब इन सड़कों को देखकर खुद ही अंदाजा लगा सकता है कि कितना काम हुआ। इसी तरह अकाल के दौरान अच्छे अनाज का भी मुक्त हृदय से वितरण हुआ। बहुत सारे जनजातीय क्षेत्रों में जहां लोगों ने पहले अच्छा अनाज नहीं देखा था उन्हें अकाल राहत में खूब अच्छा अनाज बंटा। 

जहां दूसरे राज्यों में बार-बार बिजली की आपूर्ति में कटौती होती रही वहीं राजस्थान में बिजली की आपूर्ति लगातार सुधरती रही। राजस्थान सरकार के विद्युत विभाग के स्रोतों के अनुसार पिछले 50 वर्षों में बिजली का उत्पादन हुआ 3300 मेगावाट जबकि इन पांच वर्षों में उत्पादन हुआ 1800 मेगावाट। बिजली पैदा करने के लिए राजस्थान में जो भी परियोजनाएं लगी उन्होंने समय से पहले बिजली उत्पादन शुरू कर दिया। नतीजतन देहातों में भी सारी रात बिजली देने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। तीन वर्ष वर्ष पहले जब राजस्थान सरकार ने बिजली की दरे बढ़ाई थीं तो वहां भारी विरोध और हंगामा हुआ था। पर पिछले तीन सालों में बिजली की आपूर्ति इतनी संतोषजनक रही कि लोग अब बढे दाम को भूल गए।

आमतौर पर बड़े लोग गंभीर बीमारियों का इलाज खूब पैसे खर्च करके प्राइवेट अस्पतालों या विदेशों तक में करवा लेते हैं पर गरीब कहां जाए। राजस्थान के गरीब लोगों के इस दर्द को पहचान कर श्री अशोक गहलोत ने एक मुख्यमंत्री जीवन रक्षक कोष़ की स्थापना की। इस कोष से उन लोगों के महंगे इलाज की व्यवस्था की जाती हैं जो गरीबी की सीमा रेखा के नीचे रहते हैं और इस तरह का इलाज करवाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे जितने भी लोगों का इलाज पिछले वर्षों में राजस्थान सरकार ने करवाया वे सब लोग श्री अशोक गहलोत के मुरीद हो गए हैं और अपने गांवों में उनका यशगान करते हैं। 

अपने शासन के शुरूआती दौर में ही श्री अशोक गहलोत ने नौकरशाही की लगाम कसनी शुरू कर दी थी। सरकारी धन का अपव्यय रोकने के लिए उन्होंने सरकारी गाडि़यों के निजी इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इससे नौकरशाही में काफी हड़कंप मचा था। पर जनता में इसका अच्छा संदेश गया। लोगों को लगा कि उनका मुख्यमंत्री जनता के पैसे की बर्बादी रोकने के मामले में गंभीर है। पारंपरिक रूप से भी राजस्थान के लोग सीधे-सच्चे तो होते ही है। पर फिर भी प्रशासन में भ्रष्टाचार न फैल पाए और सभी अधिकारी खुद को जनता के प्रति जवाबदेह माने इसलिए उन्होंने अफसरों पर काफी कड़ाई की है। इसका असर ये हुआ कि राजस्थान की नौकरशाही का रवैया जनता के प्रति सेवा भावी हो गया। इससे आम जनता विशेषकर शहरी लोगों को बहुत सुखद अनुभव हुए।

राजस्थान में यह अब मिथक टूट चुका है कि जनता सत्तारूढ दल से नाराज होकर विपक्षी दल को सत्ता सौप देगी। राजस्थान के लोग वर्तमान सरकार यानी श्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में इंका की सरकार ही बनाए रखना चाहते हैं। असलियत तो चुनावों के बाद ही सामने आएगी। पर ये अवश्य साफ है कि श्री अशोक गहलोत ने नारेबाजी से नहीं बल्कि अपने ठोस काम से जनता का दिल जीत लिया है। उनके नेतृत्व में राजस्थान में इंका को काफी सफलता मिलने की उम्मीद है।

Sunday, October 26, 2003

नैनीताल से सबक लें


आज जब देश के हर शहर में कूड़ें के अंबार लगते जा रह हैं और नगरपालिकाएं उसे साफ कर पाने में नाकाम स्द्धि हो रही हैं तब यह प्रश्न उठता है कि क्या ये कूड़ा इसी तरह हमारी जिंदगी की हिस्सा बन कर रहा जाएगा ? क्या प्लास्टिक के लिफाफे हमारे परिवेश, प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरण में एक बदनुमा दाग की तरह सीना तान कर यूं ही लहराते रहेंगे ? क्या नगरपालिका का निकम्मापन और राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी इस विकराल होती समस्या से कभी निपट भी पाएगी  ? क्या हम फिर से स्वच्छ पर्यावरण में जी पाएंगे ? इन सभी सवालों का जवाब हां में हैं और वो इसलिए कि हिमालय की चोटियों पर बसे शहर नैनीताल ने यह कर दिखाया है। आश्चर्य होता है यह देख कर कि पर्यटन का इतना बड़ा केंद्र होते हुए भी नैनीताल में प्लास्टिक के लिाफाफों का प्रचलन बिलकुल नहीं है। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि प्लास्टिक के लिफाफों में सामन रखना ज्यादा सुविधाजन और कीफायती होता है। खासकर तरल पदार्थ और गीले फल व सब्जियां पर नैनीताल में एक भी दुकानदार कोई भी वस्तु प्लास्टिक के थैले में रख कर नहीं बेचता, सब पुराने अखबार के बने लिफाफे प्रयोग करते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि नैनीताल का मौसम बारहों महीने बरसात का सा रहता है। चाहे जब बादल घुमड़ आते हैं और जब उनका जी चाहे बरस जाते हैं। ऐसे नमी वाले वातावरण में पुराने अखबारों के लिफाफोें में कितना दम होता होगा इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। फिर भी नैनीताल के फल वाले हों या सब्जी वाले, मिठाई वाले हों या किराना वाले, हर वस्तु इन्हीं पुराने अखबारों के लिफाफों में ग्राहकों को देते हैं। इन लिफाफों की कमजोरी जानते हुए नैनीताल के नागरिक खरीदारी करने जब निकलते हैं तो पहले जमाने की तरह घर से कपड़े का बना थैला लेकर निकलते हैं और यह व्यवस्था बड़ें सूचारू ढंग से चल रही हैं। पिछले कई वर्षों से नैनीताल में प्लास्टिक के लिफाफों का प्रयोग बंद हैं। अखबार के लिफाफे इस्तेमाल करने से निर्धन लोगों को रोजगार भी मिला है और चूंकि अखबार पर्यावरण में स्वयं ही घुलमिल जाता   इसलिए इससे कोई प्रदूषण भी नहीं होता। यह व्यवस्था इतनी ईमानदारी व शक्ति से लागू की गई है कि प्लास्टिक का लिफाफा इस्तेमाल करने वाले पर फौरन चालान हो जाता है। नैनीताल  के जिलाधिकारी श्री एके घोस बताते हैं कि इस सफल प्रयोग के लिए सबसे ज्यादा श्रेय नैनीताल के जागरूक नागरिकों को है जिन्होंने कई बरस पहले प्लास्टिक के लिफाफों के कारण पर्यावरण पर हो रहे हमले के लिए खतरों को भांप लिया था तभी उन्होंने प्लास्टिक के लिफाफों का प्रयोग स्व-प्रेरणा से ही बंद कर दिया। इसमें नैनीताल के व्यापार मंडल की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही, बाद में सारे शहर ने इस अलिखित कानून को स्वीकार कर लिया। इसका सीधा प्रभाव नैनीताल और आसपास की पहाडि़यों पर पड़ा है। नैनीताल के बीचोबीच स्थित मशहूर नैनी झील अब पूरी तरह प्रदूषण से मुक्त है। उसकी सतह पर अब प्लास्टिक के लिफाफे नहीं तैरते। बल्कि पन्ने के जैसे रंग का खूबसूरत हरा-हरा पानी चारों ओर अपनी छटा बिखेरती हैं। नैनीताल के पर्यटन स्थलों के आसपास भी अब गंदगी के घेर नहीं दिखाई देते। यह उन लोगों के लिए आंख खोलने वाली बात हैं जो देश के विभिन्न हिस्सों में, पर्यटन या तीर्थाटन के लिए प्रसिद्ध शहरों की प्रशासनिक व्यवस्था देखते हैं। नैनीताल के उदााहारण से यह स्पष्ट है कि जनता और प्रशासनिक सहयोग से देश के सभी नगरों कीे गंदगी साफ की जा सकती है। लोगों को अपने परिवेश की सफाई सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन प्रेरित कर सकता है और प्लास्टिक पर सामूहिक राय से प्रतिबंध लगाया जा सकता है। चूंकि नैनीताल वासियों ने ऐसा संभव कर दिखाया है।  इतना ही नहीं उत्तांचल की सरकार ने पर्यावरण के विनाश को रोकने के लिए नैनीताल में भवन निर्माण को काफी हद तक नियंत्रित कर दिया है। यूं नैनीताल के आसपास बसे बनोरम पर्यटक स्थल भीमताल आदि में काॅटेज निर्माण तेजी से जारी है पर इसका वैसा दूष्परिणाम यहां दिखाई नहीं देता जैसा शिमला जैसे शहरों में दिखता है जो कि अब पूरी तरह सीमेंट के जंगल में बदल चुका है। नैनीताल और आसपास के पहाड़ों पर संघन वृक्षों की मौजूदगी इस बात को सिद्ध करती है कि जनता द्वारा शुरू किए गए चिपको आंदोलन जैसे प्रयासों से वनों की अवैध कटाई को रोक दिया जा सकता हैं और देश की पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है। 

आज जबकि देश के अनेक इलाकों में पहाड़ों पर वनों की अवैध कटाई ने भू-खलन जैसी बड़ी समस्याएं पैदा कर दी हैं वहीं उत्तरांचल राज्य की नागरिकों की जागरूकता ने वनों की अवैध कटाई पर पूरी तरह प्रतिबंध लगवा दिया है। उत्तरांचल राज्य के लोगों को उम्मीद है कि अनुभवी प्रशासक और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ श्री नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तरांचल का क्रमशः विकास होगा। स्थानीय नागरिक कहते हैं कि पूरे उत्तर प्रदेश पर कई बार शासन कर चुके तिवारी जी के लिए उत्तरांचल राज्य तो बहुत छोटा है और इसमें कार्य क्षमता दिखाने का बहुत मौका उनके पास है। 

कुछ वर्ष पहले जब गुजरात के शहर सूरत में प्लेग फैला था तब पूरे प्रदेश में भगदड़ मच गई थी। तब जाकर  देश को पता चला कि सूरत में वर्षों से कूड़ें के अंबार लगे पड़ें हैं और कोई उसे उठाने वाला नहीं है।  उसी समय एक प्रशासनिक अधिकारी श्री राव ने बीड़ा उठाया और सूरत नगरपालिका के झंड़े तले असंभव को संभव कर दिखाया। आज सूरत का साफ-सूरत चेहरा देख कर कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता कि कभी यह शहर इतना गंदा भी रहा होगा। इससे साफ जाहिर है कि प्रशासनिक अधिकारी और स्थानीय जनता मिलकर यदि प्रयास करें तो अपने शहर को साफ कर सकते हैं। इस लेख लिखने का मकसद भी यही है कि जिन-जिन प्रांतों में यह लेख पढ़ा जाता है, उन प्रातों के नगरवासी नैनीताल से प्रेरणा लें कर अपने व्यापार मंडल और नगरपालिका के एक-एक प्रतिनिधि को नैनीताल भेज कर पूरी व्यवस्था को समझें और अपने यहां लागू करें। 

ऐसा नहीं है कि नैनीताल में सब कुछ सर्वोच्च कोटि का है। कुछ बातें वहां भी पर्यटकों को अखरती हैं। मसलन, मिनरल वाटर की बोतलें, बिस्कुट, चाॅकलेट व जूस जैसे खाने के सामानों के रंगीन पैकेट और पान मसाले के पाउच, आज भी नैनीताल और उसकी आसपास की पहाडि़यों पर बदनुमा दाग की तरह पड़े दिखाई दे जाते हैं। इस संबंध में नैनीताल की नगरपालिका को भी एक प्रयोग करनी चाहिए जिससे यह समस्या दूर हो सके। उन्हें चाहिए कि वे मिनरल वाटर बेचने वाली कंपनियों को इस बात का नोटिस दें कि वे अपने उत्पादों के कचड़े को उठाने की व्यवस्था स्वयं करें। ये कंपनियां पीने का पानी बेच कर अरबों रूपए कमा रही हैं और देश की पर्यावरण पर भार बनती जा रही हैं। इस संदर्भ में अमरीका का वह उदाहारण सार्थक रहेगा जिससे कोका कोला कंपनी ने ये पहल की थी। वहां कोका कोला कंपनी ने यह विज्ञापन दिए कि जो कोई भी नागरिक या बच्चा कोका कोला के दस खाली कैन (डिब्बे) लाकर वितरक के काउंटर पर देगा उसे एक भरा कैन मुफ्त मिलेगा। इसीतरह  जिन कंपनियों के उत्पादन आज नैनीताल में कचड़ा फैला रहे हैं उनको भी प्रेरित किया जा सकता है कि वे भी कुछ ऐसे ही स्कीम चला कर हिमालय की इन चोटियों को गंदा होने से बचाएं। जो कंपनी सहयोग न करे उसके उत्पादनों की बिक्री को नगरपालिका प्रतिबंधित कर दे या स्थानीय नागरिक उसका बहिष्कार कर दें। इस तरह नगरपालिका बिना अतिरिक्त आर्थिक भार बढ़ाए अपने पर्यावरण को साफ रख सकेगी। ऐसा ही प्रयोग देश के अन्य शहरों में भी किए जा सकते हैं। 

दूसरी जो बात नैनीताल में खलती है वो ये कि वहां की लोकप्रिय और सबसे ज्यादा भीड़ वाली माॅल रोड पर 24 घंटे कारों की आवाजाही लगी रहती है। इनमें से ज्यादातर कारें सरकारी हाकिमों की होती हैं।  इससे सैलानियों और स्थानीय नागरिकों को बेहद तकलीफ होती है। अब से कुछ वर्ष पहले तक इस सड़क पर वाहनों का आना-जाना प्रतिबंधित था। इतना ही नहीं आजादी के पहले तो इस सड़क पर भारतीय लोगों का भी चलना प्रतिबंधित था। केवल अंग्रेज इस पर घूमा करते थे और सड़क के शुरू में एक तखती टंगी रहती थी जिस पर लिखा होता था कि भारतीय लोगों और कुत्तों का प्रवेश निषेद।’’ आजादी मिली तो इस अपमानजनक प्रतिबंध से भी छुट्टी मिली पर आजादी का मतलब ये तो नहीं की हमें अपने परिवेश से मनमानी करने की छुट मिल जाए ? ये तो साझी धरोहर है। जो आज हमे सुख दे रहे हैं कल आने वाली पीढि़यों को सुख देगी। बशर्तें की हम इसका समूचित संरक्षण कर सकें। 

आज जब चारों ओर निराशा के बादल छाएं हैं राजनैतिक दल जोड़तोड़ में लगे रहते हैं। प्रशासनिक व्यवस्थाएं फिजूलखर्ची की मार से बेदम होती जा रही हैं ऐसे में सूरत और नैनीताल जैसे सफल प्रयोग आशा की किरन बन कर आती है। और वो प्रेरणा देते हैं हम सबको कि अभी भी सब कुछ नहीं लुटा जो बाकी हैं उसे भी अगर बचा लोगे तो खुद तो सुखी होगे ही तुम्हारी आने वाली पीढियां भी सुख पाएगी। व्यवस्था में दोषों का बखान करना सरल हैं पर व्यवस्था बना कर उसे चलाना बहुत दुष्कर। नैनीताल के नागरिक तो बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने अपने शहर की खूबसूरती बढ़ाने में इतना सहयोग किया पर साथ ही यह चुनौती उन सभी शहरों के लिए हैं जो गंदगी के ढेरों के बीच नारकीय जीवन जी रहे हैं, इस उम्मीद में कि कभी कोई मसीहा पैदा होगा और वो उन्हें उनके चारों तरफ की गंदगी से निजात दिलाएगा। ऐसे ख्याली पोलाव पकाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।